आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रवचन PV02-0013 · भाग 2

ध्यान करना नहीं, ध्यान से काम करना है — दृष्टा भाव से देखो, विचारों में लिप्त मत हो

14 जून 2026 · ध्यान कैसे करें । ध्यान कैसे करते हैं ।ध्यान मे ध्यान । #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान

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मुख्य बातें

ध्यान किया नहीं जाता, घटित होता है

ध्यान सीधा नहीं करना है। ध्यान कहां लगाओगे, बताओ? अगर आप कहते हो कि मैं ध्यान करूंगा, तो क्या करोगे? ध्यान भी क्या किया जाता है? ध्यान तो घटित हो रहा है, बस उसे समझना चाहिए। 'चाहिए' में ध्यान घटित होता है। अब 'चाहिए' में हम राग में लौट रहे हैं या द्वेष में, या राग भी नहीं है द्वेष भी नहीं है — वो जांचना है। जांचने में ध्यान करना है। जांचोगे तो ध्यान आ जाएगा।

मतलब ध्यान नहीं करना है — हमें ध्यान से भी मुक्त होना है। जांचते-जांचते अपने आप को छुड़ा लेना है, तब परम ध्यान घटित हो जाएगा। अभी क्षणिक ध्यान घटित हो रहा है — शरीर की जरूरत में, लालच में, कामनाओं में। इस क्षणिक ध्यान से हमें छुटकारा चाहिए, और यह जांचकर आप अपने आप को निकाल सकते हो। तब परम ध्यान घटित होगा।

ध्यान से काम करना

सब मिलाजुला के ध्यान करना ही नहीं है, ध्यान से काम करना है। ध्यान से ध्यान नहीं करना। काम या तो अपनी जरूरत में करते हो या किसी और की जरूरत के लिए करते हो — तो ध्यान से काम करना, कि कोई गलती ना हो जाए। और क्षणिक ध्यान, जो राग-द्वेष में घटित हो रहा है, उससे अपने आप को मुक्त कराना। मतलब ध्यान से भी आपको मुक्त होना है।

ध्यान एक है, दो नहीं

पहली बात इतना समझिए कि ध्यान एक है, दो नहीं। इस पत्ते के बारे में अगर दुनिया में कोई भी बोलेगा, बोलने का तरीका अलग होगा, लेकिन पत्ता एक ही होगा। ध्यान किसी व्यक्ति विशेष ने पैदा नहीं किया है। जब शरीर के बारे में बोला जाएगा तो पूरे विश्व में शरीर के बारे में वही बोला जाएगा; बोलने का तरीका अलग होगा। आप उसमें कुछ मिलावट नहीं कर सकते।

मैं अपनी तरफ से एक शब्द नहीं बोल रहा हूं। ना मैं सच बोल रहा हूं, ना मैं झूठ बोल रहा हूं — जो है वह बोल रहा हूं। मेरे बोलने से क्या हो जाएगा? इस पत्ते को मैंने पैदा नहीं किया है। किसी की नाक के बारे में बताएंगे तो किसी की मोटी है, किसी की पतली, किसी की लंबी, किसी की छोटी — लेकिन नाक नाक ही है, अंदर तत्व वही है। रूप अलग-अलग हैं, और रूप का नाश हो जाएगा; जब तत्व की बात आएगी तो एक ही है।

बैठो और दृष्टा भाव से देखो

बस बैठ जाना है और दृष्टा भाव से अपने आप को देखना है। कुछ करना नहीं है, कुछ ना करने में बैठना है — सिर्फ देखना है कि क्या हो रहा है। रोकना नहीं है, ऐसी गलती कभी मत करना। आप कहां-कहां भाग रहे हो, क्या-क्या हो रहा है — बस देखना, रुकना नहीं, चाहे अच्छा आए चाहे बुरा।

और देखने के बाद, समझने के बाद, जहां-जहां से पीड़ा हो, जहां-जहां से अशांति हो, उससे छूटने के लिए फिर उठकर काम करना है। यह ध्यान रखना — सिर्फ देखने से बात नहीं बनेगी। आपके घर में मशीन बिगड़ गई और आप उसे जिंदगी भर देखते रहिए, क्या ठीक हो जाएगी? कहां बिगड़ी है, कौन सा सामान चाहिए — जाकर आपको बनाना पड़ेगा, तब कुछ होगा।

तो देखते-देखते समझो कि कहां से राग, कहां से द्वेष क्यों उठ रहा है, क्या कारण है, क्या वजह है — मैं तो सब छोड़ रहा हूं, फिर क्यों फंसा हूं? समझते-समझते अपने आप को निकालना है, और उसके लिए वैसा काम करना है — ईमानदारी-सत्कर्म। ध्यान से उठने के बाद क्या करोगे? ईमानदारी-सत्कर्म में आना पड़ेगा।

आप दर्शक हो, डायरेक्टर नहीं

हमारी आदत ये हो गई है कि फिल्म भी देखते हैं तो कहते हैं — ये ऐसे नहीं, ऐसे होना चाहिए। क्या तुम राइटर हो? डायरेक्टर हो? तुम्हें फिल्म देखने के लिए मिली है। आप दर्शक हो, तो उसमें लिप्त क्यों हो रहे हो? क्या आपके कहने से पात्रों का रोल बदल जाएगा? तो जब आप अपने आप में बैठो, आपको देखना है। आपको यह नहीं कहना है कि ये अच्छे विचार हैं, ये बुरे विचार हैं।

क्या विचार आपके द्वारा पैदा हो रहे हैं? देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में विचार आते हैं और चले जाते हैं; इसके जिम्मेदार आप थोड़ी ना हो। लेकिन आप करते क्या हो — अच्छे विचार को आने देते हो, बुरे को रोकते हो।

गटर की भी जरूरत है

आप रास्ते में जा रहे हो, अच्छी-अच्छी चीजें आईं — बड़ा अच्छा है। गटर आया — अरे, गंदा है। गटर का निर्माण कहां से हुआ? आपकी शुद्धता से। आपके घर में सबसे ज्यादा हितकारी आपका बाथरूम और शौचालय है। अगर बाथरूम-शौचालय, गटर हटा दो, तो आपको भी हटना पड़ेगा। अब आप कह रहे हो बुरे विचार हटा दो।

मैं गुजरात में एक कमरे में बैठा था। एक बालक बाहर से देख रहा था; दूसरे दिन एकांत में आकर बोला — गुरु जी, मेरे मन में बड़े गंदे-गंदे विचार आते हैं। हमने कहा — बेटा, यह तेरा ही हाल नहीं है, मेरा भी हाल यही है, सबका हाल यही है; तू परेशान ना हो। जानकारी है तो विचार आएगा। विचार आते हैं, जाते हैं; ना अच्छे होते हैं ना बुरे — मुझे ठीक लगा तो अच्छा, ठीक नहीं लगा तो बुरा। विचार आ रहा है, आने दे; तेरा जो काम है वो कर। तू विचारों में लिप्त क्यों होता है?

इंद्रियों का काम है जानकारी लेना-देना, और इंद्रियों के पीछे जीवात्मा है। तो विचार तो अपने आप आते हैं, जाते हैं — आप क्या करोगे? फिर उसने कहा — मैं मांस खाता हूं, क्या करूं? मैंने कहा — बेटा, वो तू जान; मेरे से पूछ के तो खाया नहीं था। अब तुझे लग रहा है गलत है तो छोड़ दे, और सही है तो खा — जैसा करेगा वैसा भोगेगा।

इस दुनिया में गटर भी है, शुद्ध नदियां भी हैं, लेकिन गटर की भी जरूरत है — वो सफाई का हिस्सा है। तुम्हारे द्वारा गटर हो रहा है, फिर प्रकृति उसे साफ कर रही है। इसलिए विचार अच्छे भी हैं, बुरे भी — वो ना अच्छे हैं ना बुरे। आपको क्या करना है वो देख लो, बात खत्म। मूल आपका कर्म है — आप इस समय क्या कर रहे हो?

अपनी बात किसी पर मत थोपो

आप किसी को गर्मी में स्वेटर दोगे और ठंडी में कहोगे स्वेटर मत पहनो — तो क्या उस व्यक्ति के लिए आप अच्छे हो? पहली बात आपको समझ होनी चाहिए कि किस व्यक्ति को कब क्या जरूरत है, क्या देना चाहिए — अपने आप को भी। किसी को मलेरिया हुआ है और तुम कह रहे हो गर्मी है, हवा लो। तुम्हें पसीना आ रहा है, वो कांप रहा है — तो क्या वो नाटक कर रहा है? उसमें उसका क्या दोष है?

कहने का मतलब है, अपनी बातें किसी पर थोपिए मत। ज्यादातर हमारे समाज में यही होता है — अपनी बात एक-दूसरे पर ठोकते हैं, सामने वाले की स्थिति नहीं समझते कि उसकी तैयारी नहीं है। उसके स्तर से आप समझाओ, नहीं तो छोड़ दो उसे। जिस मार्ग पर आप स्टैंप मार रहे हो, उस मार्ग से आप क्यों नहीं पहुंचे? आप अपना बोल सकते हो, किसी और के लिए कैसे बोल सकते हो? हम दूसरों का मार्ग उठाकर खुद नहीं पहुंचे, लेकिन मार-मार के लोगों को दे रहे हैं, लड़ाई भी करते हैं।

ध्यान का मेनू कार्ड — अध्यात्म का व्यापार

मैं वेदांत पढ़ाने वाले, ध्यान कराने वाले टीचरों से मिला — उनकी दुर्दशा है, और वो कई ध्यान सिखाते हैं। ध्यान एक ही है, ध्यान का भी ब्रांड बना दिया। भोजन की तरह मेनू कार्ड लीजिए — कौन सा ध्यान करना है, किस साधना में बैठना है, इस साधना का ये चार्ज है; एसी कमरा चाहिए या सामान्य हॉल, चाय-कॉफी-ठंडा क्या लेंगे, नाश्ते में क्या लेंगे — यह हाल है।

अध्यात्म के नाम पर पूरा एकदम व्यापार हो गया है; शर्म आती है। अध्यात्म कभी बेचा-खरीदा नहीं जा सकता, लेकिन बेचा-खरीदा जा रहा है — वो भी भारत जैसे आध्यात्मिक देश में। यह शर्म की बात है। मां का दूध बच्चे के लिए कभी नहीं बेचा जाता।