आप कहीं भी हो। आप अगर गृहस्थ जीवन में हो तो कम से कम एक महीना एकांतवास में जाओ, गुरु के सानिध्य में। ग्यारह महीने परिवार को दो। और आप ग्यारह महीने में जितना कमाते हो, गुरु के कार्य में सहयोग करो। जिसे भी आप गुरु समझते हो, उसके कार्य में सहयोग करो। तभी। अब पता चला, मैं गुरु तो मानता हूं, लेकिन उसके काम में कोई सहयोग है नहीं, लाभ बस लेते जा रहा हूं। तो बोझ तले दब जाओगे। क्या होगा? बोझ तले दब जाओगे ना, क्योंकि आपने अपनी योग्यता का तो दिया ही नहीं। तो सत्कर्म तो हुआ ही नहीं ना। कंजूस होकर ईमानदार भी बनके क्या मतलब, मर जाओगे। कंजूस ईमानदार भी बन गए तो कल्याण थोड़ी ना होगा, क्योंकि आपका पिछला कैसे कटेगा। सत्कर्म जरूरी है ना।
शिष्य का मुख्य गुण है कि मेरा आत्मिक कल्याण हो जाए। यह मुख्य गुण है। और फिर जहां मेरा आत्मिक कल्याण हो, उसकी शरण में रहना। इसी को शिष्य कहते हैं। और फिर जिसके पास रह रहे हो, उसके बताए हुए एक-एक शब्द में जीना। एक-एक शब्द में। तभी आत्मिक कल्याण होगा। अगर एक शब्द भी छूट गया तो नहीं होगा, क्योंकि निन्यानवे भी छेद रहे तो नाव तो वहीं जाने वाली है। निन्यानवे छेद ढक गए, किसी में एक छेद रहा, तो भी दोनों का मिलना एक ही जगह होगा ना। एक-एक शब्द में जीना। गुरु, जिसे भी आप गुरु समझ रहे हो कि नहीं, यह मेरे आत्मिक कल्याण के लिए सहायक है और यह मेरे गुरु हैं। तो गुरु वाक्य ब्रह्म वाक्य। उसके एक-एक शब्द में जीना।
अब ये नहीं, चालाकी करना कि गुरु ने नियम बताया, गुरु जी नहीं हैं, देख नहीं रहे, चलो बतिया लेते हैं। नहीं। इतने लोगों से बतिया क्या है? ये भी, तुम दोनों का पतन हो रहा है। गुरु जी तो नहीं देख रहे हैं, लेकिन जहां तुम्हें जाना है वो तो देख रहा है। वही रास्ता बंद कर देगा। गुरु जी तो नहीं देख रहे हैं ना, लेकिन जहां तुम्हें जाना है वही रास्ता बंद हो गया।
भाई, किसी ने आपको काउंटर पर टिकट दिया। कहा, भाई इस जगह पहुंच जाओगे। टिकट आपने फाड़ के फेंक दिया। तो टीटी पकड़े तो क्या करेगा? और तुमने कहा कि गुरु शब्द देता है ना। गुरु ने टिकट दिया। तो टिकट को आप इतना साधारण ना समझो। वो आपको जगह तक पहुंचाएगा। लेकिन आपने क्या किया? चलो यार, ये कागज है, ये फाड़ के फेंक देते हैं, ऐसे ही चल देंगे। तो फिर कहां जाओगे जब जांच होगी? गुरु शब्द दे रहा है। तो उन शब्दों में जिओगे तब वहां तक पहुंचोगे ना। अगर आप शब्दों में जिओगे नहीं तो फिर पहुंचोगे कैसे? तो गुरु शब्द दे रहा है, तो आपको वो शब्द वहां तक पहुंचाएगा। आप उसे साधारण शब्द ना समझो। उस टिकट को संसार का कागज ना समझो कि यार घर पर तो इतना कागज पड़ा है, यही तो होगा, फाड़ के फेंक दो। नहीं। उस कागज में कुछ है। तो गुरु शब्द दे रहा है तो उस शब्द में कुछ है। उसकी साइन है, कुछ है उसमें। एक नियम है, एक सिस्टम है। वो शब्द दे रहा है तो उसमें कुछ है। वह शब्द आपको तार देगा, जब उसमें जिओगे तब। और तुमने कहा, छोड़ो यार, कहां गुरु जी देख रहे हैं, बतिया लेते हैं। मार लोगे। तुम्हारा जाएगा। उसका क्या जाएगा।
ईश्वर अगर कल्याण करता ना तो कल्याण हो जाता। क्या नहीं? ऐसे ही थोड़ी ना लोग भटकते। कल्याण हमको करना पड़ेगा। कोई ईश्वर नहीं। कोई परमात्मा नहीं। किसी के भरोसे ना रहो कि ईश्वर कल्याण कर देगा। अगर ईश्वर कल्याण करता, ईश्वर के अनुसार अगर दुनिया चलती, तो आपको लगता है दुनिया इतनी गंदी हो जाती? हम इतनी गंदगी में कभी फंस जाते? ईश्वर हमें कभी गंदगी में फंसने देता? तो भैया, ईश्वर का बहाना मत दो। जैसा करोगे वैसा आप बन गए हो। जैसा करोगे वैसा आगे जाओगे। जैसा कर चुके हो, बन गए हो। अब अपना कल्याण कर लो। ईश्वर-ईश्वर मत चिल्लाओ। परमात्मा-परमात्मा मत चिल्लाओ। कुछ होने वाला नहीं है।
अब जिस देश में रहते हो, आप सोचो, नहीं मैं प्रधानमंत्री का गुणगान गाऊं, प्रधानमंत्री का फोटो लगाऊं, और अपराध करूं। तो क्या प्रधानमंत्री आपको छुड़ा लेगा? प्रधानमंत्री भी चक्कर में पड़ जाएगा तुम्हारे, तो वह भी जाएगा, क्योंकि वह भी तो सिस्टम में है। राजा भी तो सिस्टम में है। अब तुम अपराध करोगे तो अपराध की सजा मिलेगी। अब प्रधानमंत्री का फोटो लगा के पूजने से, प्रधानमंत्री का नाम लेने से कुछ नहीं होने वाला है। यह सोचो कि नहीं, उसका माला जपूं और अपराध करूं, बच जाऊंगा। इंदिरा को भी जेल में डाला गया था। तो मैं वही कह रहा हूं। कोई ईश्वर आने वाला नहीं है भाई। जैसा करोगे वैसा आपको मिलेगा। ईश्वर के चक्कर में ज्यादा ना पड़ो। अपने चक्कर में पड़ो। मेरा यही कहना है।
जब ज्यादा दिक्कत हो तो कुर्सी ले लिया कर। अपने शरीर के अनुसार, अगर ज्यादा दिक्कत होती है तो कुछ देर आराम कर लिया कर। तुझे तो बोला था। कर लेता हूं, वैसे भी बैठता हूं, ठीक ही जाता हूं। हां, वही। ऐसा अगर कुछ हो तो कुर्सी ले ले। जैसे यहां तुम्हें तकलीफ हो रही थी, कुर्सी ले ले। मना थोड़ी ना किया मैंने। अपने शरीर के अनुसार रहो। यहां की व्यवस्था जितनी दी गई है, कुर्सी का उपयोग कर ले। और उस पर पूरे नियम में रह। यहां की ऊर्जा तभी तक काम करेगी जब तुम पूरे नियम में रहोगे। नियम टूटा क्या, फिर बहुत कुछ छूटा। वो तुम्हें बाद में पता चलेगा, अभी नहीं।
सत्य व्यक्त नहीं किया जा सकता। लेकिन सत्य तक पहुंचने के लिए व्यक्त किया जा सकता है। तो शरीर छूटने के बाद अगर आप अपने आप में स्थित, स्थिर हो, और कोई उम्मीद नहीं है, तो आप सत्य के साथ चले गए। क्या? क्योंकि कुछ चाहिए ही नहीं। छूटा कुछ नहीं। तो आप गए तो सत्य के साथ होकर चल दिए।
अपने चक्कर में पड़ो। अपने चक्कर में पड़ो मतलब अपना आत्मिक कल्याण करो, अपने कर्म को करते हुए।
शादी करके निपटा दो। शादी भी करने में कम से कम एक महीना अपने आप को दो। दो महीना अपने आप को दो। पत्नी, छोटा बेटा, बिटिया कहती है जब तक शादी ना हो जाए तब तक मत जाओ। कुछ दिन के लिए चलने को कहो तो नहीं चलते। सत्संग सुनने को कहो तो वीडियो भी नहीं सुनती। चलो, तुम अपना कल्याण करो। उसकी जैसी प्रवृत्ति होगी, उसी में रहेगी ना।
अब छोड़। ज्यादा समय बर्बाद मत कर। क्योंकि लाइव भी लोग सुन रहे हैं। तो तू क्या कर, अपने कल्याण में लग जा। और अपनी जितनी जिम्मेदारी है, दो बच्चों की शादी बची है, उनको पूरा कर। मां-बाप भी कितने दिन के मेहमान हैं। मां-बाप की जिम्मेदारी इसलिए हमारी उतनी नहीं है। उन्होंने तुझे और बड़े भाई को नहीं दिया, छोटे भाइयों को कुछ दिया है। अब तू अपने कल्याण में लग जा। छोड़, जाने दे। उन्होंने किसको दिया, क्या दिया, वो छोड़। तू अपने कल्याण में लग जा।
तुझे लगता है कि मेरी जिम्मेदारी दो बच्चों की तो है ही है। उसको निभा। और उस निभाने में भी आता-जाता रहे। और जब निभा ले तो पूरी तरह आ जा। पत्नी को दे, बोल दे, भैया मैं जा रहा हूं अपने आत्मिक कल्याण के लिए। तू अगर मेरे साथ आई है, अगर मेरे साथ चल रही है तो ठीक है। नहीं तो आज से हम आएंगे या नहीं आएंगे, मुझे नहीं पता। ऐसे बोल के निकल सकता है। पत्नी से एक बार बोलना जरूरी कि मैं जा रहा हूं। बार-बार मत बोल। बार-बार नहीं। दो दिन, चार दिन के लिए चलो मेरे साथ, तो नहीं। कहीं और छोड़। तू अपने कल्याण में लग जा।
आप ज्यादा दाम में बेचिए। कम में लेना, बिजनेस का मतलब ही है। कम में लेना, ज्यादा में देना। आप जो माल बता रहे हो वो क्या है? बस क्वालिटी। आप जिस क्वालिटी को बताकर पैसा ले रहे हो, वो क्वालिटी है क्या?
अब जैसे कोई फुटपाथ में सौ रुपये का सामान, एक फुटपाथ वाला लाया, एक शोरूम वाला लाया। अब हो सकता है फुटपाथ वाला एक सौ बीस में ही बेच दे, सौ के ऊपर। लेकिन अब शोरूम वाला वही रेट थोड़ी ना बेचेगा। क्योंकि उसे शोरूम का भाड़ा भी देना है। फुटपाथ वाला अकेले धंधा कर रहा है। शोरूम वाला पूरा लाइट बिल है, वर्कर है, नौकर है। तो भाई वो ज्यादा दाम लेगा, उसी सामान का। एक ही सामान एक जगह कम में मिल रहा है, एक जगह ज्यादा मिल रहा है।
मेरा कहना यही है कि आप जो बता रहे हो, अगर वो क्वालिटी का माल है, कस्टमर को बेच रहे हो, उस क्वालिटी का वो पैसा दे रहा है। किसका पैसा दे रहा है? क्वालिटी का पैसा दे रहा है। और वो क्वालिटी है, तो आप ईमानदार हो। और वह क्वालिटी नहीं है, आप कम कीमत में भी बेच दिए, क्योंकि उसने क्वालिटी का पैसा दिया और वो क्वालिटी नहीं है, और आपने जितने में लिया उससे भी आधे दाम में बेच दिया, तो भी बेईमान हो। बात समझ में आ गई।
आप कितने का लाए, कितने का बेचते हो, वो तो आपके टैलेंट के ऊपर है ना। लेकिन वो क्वालिटी का पैसा दे रहा है। ये याद रखना। वो क्वालिटी का पैसा दे रहा है। जो क्वालिटी बता रहे हो, है? है तो ठीक है, ईमानदार हो। और पता चला वो क्वालिटी नहीं है, तो फिर आप बेईमान हो। बात खत्म। सीधी सी बात है।
हां, ऐसा झूठ लिया जाता है। जिससे बोल रहे हो, उसका हानि ना हो। बहुत लोगों को लाभ हो, और उसमें किसी का हानि भी ना हो, तो झूठ कहां हुआ? झूठ कहां हुआ?
झूठ और सच से ऊपर भी कुछ है। वहां पहुंचो। ये झूठ और सच का चक्कर छोड़ो। आप जरूरत देखो। आप जरूरत देखिए।
अब तो हमारी आदतें हैं क्या? तो कर्म में मत उतारो। बस। कर्म में मत उतारो। अंदर चालाकी आ रही है, आने दो। लेकिन बाहर मत उतारो। अंदर बेईमानी का भाव आ रहा है, आने दो। लेकिन तुम करो मत। वो तो नहीं हो रहा है। तो धीरे-धीरे वो निकल जाएगा। वो भी हट जाएगा।
कहीं ना कहीं एक आलस्य की तरफ ले जाता है। बस तुम करो मत। वो जहां ले जाए, ले जाएगा। तुम करो मत। पक्का ये कन्फर्म भी है कि ये रास्ता है, फाइनल रास्ता। फिर भी वो भटकाव। कोई बात नहीं। भटकने वाला काम मत करो। भटकाव अगर मानसिक हो रहा है तो होने दो, लेकिन तुम कर्म में ना उतारो। प्रतिक्रिया मत दो। आने दो। मानसिक आने दो। क्या फर्क पड़ता है? उसे कर्म में मत उतारो।
तो बस, कर्म में मत उतारो। और ज्यादा से ज्यादा समय, जब भी मिलता है, यहां आओ। आप तो पास में ही हो। ज्यादा दूर नहीं हो। जब भी आपको लगता है कि हमारे पास समय है, चले आओ।
इधर आ जा। अब तेरी स्थिति क्या है? घर की तो विचार तो चलते रहते हैं। विचार तो आते हैं। क्या वो विचार खींचते हैं? कोई ऐसी यादें हैं जो प्रभावित करती हैं, खींच रही हैं। तो बस उसी को हटाना है। बैठ जा ना, आराम से। कोई मुझे खींच रहा है, तो क्यों खींच रहा है? क्या मुझे चाहिए? क्या मुझे वो चाहिए? क्या वो चाहिए, तो किसको चाहिए? मुझे चाहिए। उसके बारे में चिंतन कर। वो पल की यादें वो मुझे क्या दे देंगी? क्या दी?
उस पर चिंतन कर। कि जब मैं वहां था, उसमें जी रहा था, तो मुझे क्या दे दिया? अब मैं अगर जाऊंगा तो मुझे क्या देगा? विचार तो आएंगे ना।
महात्मा बुद्ध को उपलब्धि हो गई। अपने पिता के घर गए ना। तो पिता याद थे ना? पुत्र याद था ना? घर याद था ना? यादें थोड़ी जाने वाली हैं। उन यादों में क्या दुख है? क्या मुझे? नहीं, मुझे नहीं। मैं भी परिवार की बात किया। लेकिन मुझे किसी भी व्यक्ति को लेकर कोई खिंचाव नहीं है। मेरे कोई भी घर का ऐसा कोई सदस्य नहीं है जिसके लिए मैं जाकर मिलूं। अगर मैं सुन जाऊं कि वह खत्म हो गए तो मुझे कुछ दुख नहीं होगा।
अभी मैंने परिवार की बात की ना, तो परिवार याद था, तभी तो बात की। यादें कहीं जाने वाली नहीं हैं। क्या उन यादों में राग-द्वेष है? क्या वो यादें खींच रही हैं? जैसे सामने हम देखते हैं, कोई आदमी मुर्दा जाता है, तो हम कहते हैं इसकी आत्मा को शांति मिले। कुछ हमारे सामने घटना घट जाती है तो हम बाहरी तौर से देखते हैं, दुख हुआ, लेकिन वो दुख टिकता थोड़ी ना है। टिकता तो जब तुम्हारा होता है। जैसे कोई मुर्दा जा रहा है, तुमने कहा इसकी आत्मा को शांति दे। लेकिन पता चला पुत्र है, भाई है, तो दुख हो जाए। और नहीं जमता होगा तो, अगर तुम्हारी बर्बादी का कारण होगा, तुम्हारा भाई होगा, अलगाव हो गया होगा, कहोगे अच्छा हुआ गया। क्योंकि कुछ मिल नहीं रहा था ना। तो याद आएगी। देखना यह है कि क्या उन यादों में राग-द्वेष है?
अभी तो क्या, ये अभी खेल नहीं निकली? हां, बहुत कम हुआ है। वो तो धीरे-धीरे। अब मेरा एक दिन में थोड़ी ना खत्म हुआ। मैं भी पागल की तरह दो हजार ग्यारह से बीस तक घूमा। एक-दो दिन में थोड़ी छूटता है भाई। पत्थर पर रस्सी निशान कर देती है, तो एक दिन में थोड़ी ना कर देती है। सालों लगते हैं ना रे। तो कोई यादें हैं। उन यादों में मुझे कुछ मिला है। तो जब हम नहीं जाएंगे, फिर से मैं वही काम नहीं करूंगा, तो धीरे-धीरे छूट जाएगा। अब पता चला कि एक साल के बाद मैं जाकर दोहरा रहा हूं। दो साल के बाद दोहराया, तो ताजा कर दिया ना। भाई, एक मैंने अपराध कर दिया। मैं उसकी सजा काट रहा था। मैं दो साल सजा काट कर दूसरा अपराध कर दिया। तो दूसरे अपराध का भी तो दंड लग गया। नहीं तो भैया, जितना पुराना किया, जितना पुराना है, बैठ जाने दे उनको।
याद आ रही है तो आने दो। यादें सताएंगी, एक दिन छूट जाएंगी। और जिंदा हो या मुर्दा, सब छूट ही जाएंगे। एक दिन हम, आप बात कर रहे हैं, हो सकता है मैं तुमसे पहले निकल जाऊं या तुम निकल जाओ। हम भी छूटने वाले हैं। ये शरीर छूटने वाला है। और तुम भी छूटने वाले हो। लेकिन ईमानदार बनके जाओ। मेरा यही कहना है। कब, अगला शरीर। हो सकता है कि तुम जब नियम तोड़ रहे हो उसी समय शरीर छूट जाए, तो क्या होगा? बेईमान बन के गए। पता है क्या? कौन सा क्षण तुम्हारा आखिरी होगा, तुम्हें पता है? इसलिए हर क्षण ईमानदारी से जियो। हर क्षण में ईमानदार रहो। पता नहीं अगला क्षण तुम कहां होगे, मैं कहां होऊंगा।
इसलिए जिसके साथ हो, पूरी ईमानदारी से जियो। ईमानदारी और सत्कर्म से ही आपका उद्धार होगा। तो याद तो आती है। याद में खिंचाव क्यों है, वो देखना है। जिसके लिए खिंचाव है, क्या उससे मेरा कुछ कल्याण होगा, कि उससे मेरा पतन होगा? तो मैं अपना पतन करवाने क्यों जाऊं? जब तक समझ नहीं थी तब तक किया। अब तो समझ आ गई, तो फिर क्यों करवाऊं? तो याद तो आएगी, बाबूलाल। ऐसा नहीं कि याद नहीं आएगी। हमें भी अपने भाई-बहन की यादें आती हैं, लेकिन वह यादें कभी सताती नहीं हैं। मैंने कहा ना, अगर मुझे अभी खबर मिल जाए कि कोई निकल गया तो ठीक है, निकल गया। बस। उन यादों में एक पीड़ा है। वह नहीं होना चाहिए। और पीड़ा क्यों है? क्योंकि कुछ चाहिए उससे। पीड़ा यह है कि उससे कुछ चाहिए, या तो वो सुरक्षित रहे। सुरक्षित इसलिए रहे कि वो मुझे कुछ दिया है।
तो यादें नहीं खत्म होने वाली हैं। आप ये ना सोचना कि यादें खत्म हो जाएंगी। यादें नहीं खत्म होंगी। दर्द ना हो। राग और द्वेष ना हो। कोई खिंचाव ना हो। यादें तो सब आएंगी, और भी आएंगी, क्योंकि खाली हो ना। अगर किसी काम में रहते तो यादें कम होतीं। अब पूरी तरह तुम स्वतंत्र हो। कोई जिम्मेदारी नहीं है। बहुत झटपटाते हो, क्योंकि पूरा खाली हो। पूरा खाली हो। पूरा आत्मिक कल्याण का आपको मौका मिला है। जितनी जिम्मेदारी है, गुरु जाने कैसे चलेगा। तुमको थोड़ी टेंशन है। तुम्हें टेंशन रहता तो यादें कम आतीं। तुम्हें कोई चिंता भी नहीं है, फिक्र भी नहीं है।
कोई अगर व्यवस्था की जिम्मेदारी मिली होती तो तुम्हें यादें कम आतीं। लेकिन अभी तो खूब आएंगी। रात-दिन आपको काम ही क्या है? आपको काम क्या है? अतीत की यादें ही तो आएंगी। जेल की तरह लगने लगे। लेकिन जहां याद आ रही है ना, वही जेल था क्या? ये तो तुम मुक्ति के द्वार पर खड़े हो। एक कदम तुम्हारा बस उठा है। और एक कदम तुम्हारा वहां है। अगर ये कदम पूरा रख दो और वो उठ जाए तो बात खत्म। इस समय तुम मुक्ति के दरवाजे पर खड़े हो। एक कदम मुक्ति पर है और एक कदम तुम्हारा अतीत में है। अतीत से जिस दिन तुम्हारा सब छूट गया, उस दिन यह पांव उठेगा और तुम्हारा अगला कदम मुक्ति पर चला जाएगा।
ये दर्द तो पूरा खत्म होगा। ये दर्द यहां का पूरा खत्म। ये जब खत्म होगा तभी आप पूरी तरह इसमें आ पाओगे। फिर इसके बाद फिर दर्द होगा? मतलब फिर दर्द क्यों? समाधि में कोई दर्द नहीं होगा। कोई दर्द नहीं होगा। दर्द तो तभी तक है जब तक ये दूसरा कदम यहां नहीं आया है। छोड़ने में दर्द हो रहा है, तो मिटेगा। सोचते मिट जाएगा। एकदम।
तुम्हें यह देखना पड़ेगा। ज्ञान मिल रहा है, सत्संग मिल रहा है। ये देखना पड़ेगा कि देखो, ये भी तो ऐसे पड़े हैं। मैं ही थोड़ी ना अकेला हूं। इनको क्या मिल रहा है? और ये आनंद से पड़े हैं। पूरा स्वतंत्र हैं, तो भी कहीं नहीं जा रहे हैं। मैं तो मुक्ति के लिए यहां हूं। ये व्यक्ति किस लिए है? ये व्यक्ति तो मेरे लिए है। और यह व्यक्ति जब चाहे चला जाए तो भी नहीं जा रहा है यार। तो मैं क्या जाऊं फिर?
आपसे लगाव तो हो ही जाए। मुझे यह देखना है कि यार, यह व्यक्ति यहां किसके लिए है? इस जंगल में किसके लिए पड़ा है? ये तो जब चाहे गाड़ी उठाए चला जाए। सारी व्यवस्थाएं भी हैं। लेकिन फिर भी यह जंगल में पड़ा है। किसके लिए पड़ा है? क्योंकि उसने मुक्ति पा ली और सोच रहा है तू भी पा ले। नहीं तो मैं जाऊं तो मुझे कोई रोकेगा क्या? मैं तो वहां भी रह के चला सकता हूं। मेरा काम तो हो गया। लेकिन क्या करूंगा जाके? आप लोग उस रास्ते पर हो, इसलिए मैं आपके साथ हूं। हम उनके साथ रह के क्या करेंगे? क्योंकि वही प्रपंच। उनको मुक्ति नहीं चाहिए, उन्हें माल चाहिए। तो उनके साथ रह के मैं क्या करूंगा? उन्हें माल चाहिए। उनको वही प्यारा है जो उन्हें माल दे। तो मैं तो उनके काम का हूं नहीं। तो मैं तो उनके लिए प्यारा हूं ही नहीं।
तो मुझे यह देखना है कि मेरी जिंदगी है। यह सामने भी पड़ा है। मैं तो चलो, मुक्ति, मेरा कल्याण हो जाए, इसलिए हूं। यह किस लिए है? ये तो मुझे व्यवस्था देने के लिए यहां पड़ा है। तो मुझे जहां मैं हूं उसको भी देखना चाहिए। उससे मुझे प्रेरणा मिलती है ना। पूरा मन से आता है कि नहीं हटेंगे तो निश्चित ही पार हो जाएंगे। एकदम पार ही हो जाएगा रे। पार ही कर ले। पार ही कर लो अपने आप को। पार में ही उद्धार है। उद्धार में ही पार है। कैसे भी अपने आप को इस भवसागर से निकाल लो। बुद्धिमानी से, समझदारी से। इसमें चालाकी करो ना। चालाकी ही करना है तो अपने उद्धार में चालाकी करो ना।
बुद्धिमान ही बनना है तो इसमें बन जाओ ना। उस परम स्थिति पर अपने आप को पहुंचा लो। तब आपकी समझदारी का मतलब है। तब आपकी बुद्धिमानी का मतलब है। तब आप बुद्धिमान व्यक्ति हो, चालाक हो।
बस, मैं अपना उद्धार कैसे कर लूं? मैं इस मायाजाल से अपने आप को निकाल कैसे लूं? बस। जैसे आप कहीं जा रहे हो तो आप जगह का सिर्फ नाम याद रखो। लोग आपको पता बताते जाएंगे। लेकिन आपको जगह का नाम नहीं याद है तो आप पहुंच पाओगे? तो मुझे यह याद रखना है कि मेरा उद्धार कैसे होगा, मेरा कल्याण कैसे हो। उसके लिए मैं काम करूं। बस। मुझे मुक्ति चाहिए। मुझे मोक्ष चाहिए। मुझे राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरे कर्ता से मुक्त होकर मुझे उस परम आनंद में आना है। अपने स्व में स्थिर होना है। उस आनंद में मुझे चले जाना है। मेरा स्व है, उसमें मुझे जाना है। मुझे कैसे भी यह दुख, दर्द, सुख से निकलना है। ना मुझे सुख चाहिए, क्योंकि सुख चाहिए तो दुख भी है। दुख सीधा थोड़ी ना है। पहले सुख, बाद में दुख। अगर सुख ना लो तो दुख हो ही नहीं सकता। अगर तू सुख ना ले तो दुख तुझे हो ही नहीं सकता, छू नहीं सकता। लेकिन जब तू सुख भोगता है तो दुख भाई उसका दूसरा पहलू है।
वो सिस्टम तो बहुत कुछ सिखाता है। चौबीस घंटे मगन में चलता रहता है। बस जीवन जियो। उसमें जियो। उसमें जियो, तब कुछ होगा।
हां। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। जब तक आपका आत्मिक कल्याण ना हो जाए, तब तक। जैसे आप इलाज कराते हो। बीमार हो तो दवा तब तक खाना है, और परहेज तब तक करना है, जब तक आप पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो जाते। जिस दिन पूरी तरह स्वस्थ हो गए, दवा भी छूट गई, परहेज भी छूट गया। नहीं तो वैसे ही, जब तक आत्मिक कल्याण ना हो जाए, तब तक ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। यही दवा है।
इसलिए तूने क्या देख लिया है? तेरे को क्या वहां से मिल गया है? तो तू खाली वही जाना चाहती है। बाकी कभी नहीं जाना चाहती। अब ये तो तू ही बता सकती है। मेरे पास सवाल नहीं है। जवाब तो कोई बात नहीं। क्या जवाब? अब बताओ, क्या जवाब देगी? जवाब ही क्या है? कोई जवाब देने का क्या मतलब? लग ही रहा है। उनको जवाब देके क्या मतलब? वो भी समझ जाएंगे कभी ना कभी। अभी चमत्कार चाहिए। अभी के संसार को चमत्कार। कोई बात नहीं। मुझे क्या चाहिए, ये देखना है। अभी के संसार को क्या चाहिए? हमें क्या मतलब? लोगों के उद्धार से क्या मेरा उद्धार होगा? मेरे उद्धार से मेरा उद्धार होगा। तो देखो, आपको क्या चाहिए? संसार को क्या चाहिए? वो तुम छोड़ो। संसार की फिक्र छोड़ के अपनी फिक्र पकड़ ले। बस संसार की बातें ही मत कर भाई।
तू सिर्फ अपनी बात कर। और देख, मेरा कल्याण कैसे होगा। अपने अलावा किसी की बात ही मत कर। बस।
देखो, उन्होंने खुद कहा। देखो, उन्होंने खुद कहा कि मैं राम का दास हूं। उन्होंने खुद गुरु के पास जाकर, गुरु के सानिध्य में रहकर अपना कल्याण किया। लोगों को कल्याण का मार्ग बताया। अब लोग उन्हें परमात्मा बना दे रहे हैं। बात अलग है। उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा। वह तो संत की तरह जीवन जिए और लोगों की सेवा में लगे रहे। तो सीधा कबीर की सुनिए। कबीर वालों की मत सुनो।
अब देखिए। राम का एक भक्त अपने को भक्त बता रहा है और कह रहा है कि आओ, तुम्हें सौभाग्यवती का वरदान दे रहा हूं, आशीर्वाद दे रहा हूं। किसी को कह रहा है, मैं तुम्हारा कल्याण कर दूं। और राम की खुद तीन माताएं विधवा हो गईं। उन्होंने अपने पिता को बचा पाए क्या? कृष्ण का कोई भक्त कह रहा है कि आओ, हम तुम्हें कृष्ण के नाम से आयु दे देंगे। और वो अपने भांजे अभिमन्यु को खुद नहीं बचा पाए। इस प्रकृति में कोई भी आया है तो अपने कर्म का भोग कर ही जाएगा। बस लोगों ने उद्धार का मार्ग बताया, वह तुम कर लो।
तो राम अगर बचाते तो अपने पिता को बचा लेते ना। पुत्र के वियोग में तड़प-तड़प के मरे। एक साधारण श्रवणकुमार के पिता का श्राप नहीं हटा पाए राम। हटाए क्या? वो कोई योगी थे? कोई ऐसे तो थे नहीं। साधारण थे। बोले, जैसे मेरा पुत्र मरा है वैसे तू भी तड़प-तड़प के पुत्र के वियोग में मरेगा, जैसे मैं मर रहा हूं। और वो प्राण छोड़ दिए। पुत्र के वियोग में तड़प के वो खुद मर गए। श्रवण मर गए। तो आप जरा समझो कि अगर कोई कबीर को परमात्मा बता रहा है तो कबीर ने क्या कहा है, वो पकड़ो ना। कबीर वालों को मत पकड़ो।
इसलिए कि लोगों ने क्या किया? महात्माओं के नाम से, राम के नाम से, कृष्ण के नाम से, बुद्ध के नाम से लोगों ने व्यापार कर लिया। अब तुम फसोगे पूरी तरह तब, जब वो बता देगा, नहीं यही पूरी परमात्मा है और हम तुम्हें इनसे मिला देंगे। जरा समझो इस बात को।
कबीर जी की क्या जिज्ञासा थी। गुरु से मिलने नहीं दिया गया, और वह जाकर सीढ़ी पर सो गए। और उनका पैर पड़ा, तो बोले, उन्होंने कहा राम-राम। अरे, बोले मुझे मंत्र मिल गया। तो सोचो क्या जिज्ञासा थी। कबीर ने समभाव, समदृष्टि बताया, कि समानता में जियो। किसी को बुरा-भला मत कहो। बस सत्कर्म करो। जरूरतमंद की सेवा करो। अब कबीर का भी लोग मूर्ति बनाकर पूजने लगे हैं, आरती करने लगे, कबीरपंथी में आरती करने लगे, कबीर को पूजने लगे। तो मैं यह कह रहा हूं कि वाले क्या कह रहे हैं, वो छोड़ दो। उन्होंने क्या कहा है, वो पकड़ो। क्योंकि लोगों ने क्या किया? इनके नाम से इनके प्रचारक हो गए और इनके नाम से व्यापार करने लगे।
तो व्यापार करने वाला हमेशा सामने वाले को, जिसके द्वारा व्यापार कर रहा है, उसे सब कुछ बता देगा। बुद्ध वाला कहेगा बुद्ध सब कुछ है। कबीर वाला कहेगा कबीर सब कुछ है। राम वाला कहेगा राम सब कुछ है। कृष्ण वाला कहेगा कृष्ण सब कुछ है। लेकिन आप देखो तो राम ने भी जाकर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की, रामेश्वरम में। कृष्ण भी गुरु के सानिध्य में गए, अपने आत्मिक कल्याण के लिए। गए कि नहीं गए? जरूरत थी तभी तो गए। राम भी गए, बुद्ध भी गए, कबीर भी गए। तब जरा सोचना चाहिए। तो आप भी। मेरा यही कहना है कि किसी जीवंत गुरु के सानिध्य में जाओ भाई। वाले क्या कहते हैं, उसे छोड़ दो। उन्होंने क्या कहा है, उसे पकड़ो।
मैं ट्रेन में जा रहा था। तो एक ईसाई धर्म को मानने वाला था। उसने कहा कि जीसस तो परमेश्वर है। बोला, जीसस को मानते हो? बोले हां। क्योंकि अगर जीसस को जरा सा भी मानते हो ना, तो जीसस ने खुद कहा कि मैं परमेश्वर का पुत्र हूं। और तुम उन्हें परमात्मा घोषित कर दे रहे हो। यही है धंधा करने वाले, व्यापार करने वाले। ऐसा ही करते हैं। और आप देखो कि वो खुद गुरु के सानिध्य में गए, और उन्होंने कर्म के सिद्धांत को समझाया है कि भैया, जैसा करोगे वैसा पाओगे। जैसा करोगे वैसा बन जाओगे।
तो वाले क्या कहते हैं, छोड़ दो। उन्होंने मुख्य क्या कहा है? कबीर ने क्या कहा है? गुरु नानक जी ने क्या कहा है? बुद्ध ने क्या कहा है? महावीर ने क्या कहा है? कृष्ण ने क्या कहा है? राम ने क्या कहा है? वो पकड़ो। उनके बारे में लोग क्या बोल रहे हैं, वो मत पकड़ो। क्योंकि वह अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए कुछ भी बोल देंगे। उन्हें अपना व्यापार खड़ा करना है। इसे हमें समझना है ना। हमें समझना है कि हमें उनकी सुनना है, सीधा, कि हमें वालों की सुनना है।
परमात्मा से सब है। इसका मतलब यह नहीं कि परमात्मा हर-हर में है। जैसे बल्ब से उजाला है, तो उजाले में बल्ब थोड़ी ना है। लेकिन उजाला निमित्त बना है। बल्ब निमित्त बना है उजाले के लिए। और उजाला निमित्त बना है बल्ब तक पहुंचने के लिए। तो वैसे ही संसार निमित्त है उस परमात्मा तक पहुंचने के लिए। परमात्मा से संसार है, ना कि वो संसार में है। अगर संसार में होता, तब इतनी उथल-पुथल होती तो खोजते क्यों?
भगवान जाने। लोग जाने। अपने को क्या करना है। कल्कि अवतार से अपने को यह करना है कि मेरा कल्याण कैसे हो जाए। मैं क्या करूं कि मेरा उद्धार हो जाए। कल्कि अवतार हो या ना हो, उससे मुझे क्या होने वाला है।
नरक यही है कि आपने अपने तरीके से चाहा और नहीं मिला, तो नरक है। उस समय नरक होता है ना। घर में भी नरक पैदा हो जाता है। आपके तरीके से मिल गया तो स्वर्ग है। और अपने तरीके से मुक्त हो गए तो परम आनंद है। फिर ना नरक, ना स्वर्ग। सीधा परमानंद में हो।
प्रणाम करने से कुछ नहीं होगा। क्या जिसका प्रणाम कर रहे हो, उसका चरित्र भी अपना रहे हो? तब प्रणाम का मतलब है। पता चला कि तुम जिसे प्रणाम कर रहे हो, चरित्र किसी और का अपना रहे हो, प्रणाम किसी और को। कोई मतलब नहीं है। जिसे आप प्रणाम कर रहे हो, तो इसका मतलब आपने उसमें कुछ देखा है। प्रणाम अगर कर रहे हो तो क्या उसके चरित्र को धारण कर रहे हो? तब तो आप उसके जैसे बन जाओगे ना। और पता चला, प्रणाम तुम उसे कर रहे हो, चरित्र किसी और का अपना रहे हो। कोई मतलब थोड़ी ना होगा।
अगर पृथ्वी पर बोलेंगे तो कोई नहीं है। अब एक काम करिए। परमात्मा कौन है, मैं बताऊं, इससे अच्छा है उस परम आनंद में आप स्थिर हो जाएं। उसके बाद आपको खुद पता चलेगा, परमात्मा कौन है, कौन नहीं है। पूछ के कोई मतलब नहीं है।
ब्रह्मचर्य क्या है, आप पहले समझिए। कृष्ण भगवान ने तीन शादी की थीं, उसके बाद भी योगी कहलाए। योगी का मतलब, पूरी तरह ईमानदार हो। ईमानदार और सत्कर्मी अगर है तो योगी है। आप देखो कि आप ब्रह्मचारी हो कि नहीं। शरीर का ब्रह्मचर्य तो मन और बुद्धि भी रख लेते हैं नहीं। कितने पागल हैं। वो तो शरीर का ब्रह्मचर्य ही उनका रहा ना। क्या योगी कहलाए क्या? तो आपको यह देखना है। आप अगर पूरी तरह ईमानदार हो अपने कर्म के प्रति, तो आप ब्रह्मचारी हो। इसलिए कृष्ण भगवान तीन शादी करने के बाद भी, बच्चे को जन्म देने के बाद भी योगी कहलाए। चरित्र क्या है? चरित्र आपका व्यवहार है।
टूट रहा है तो फिर रह क्यों रहा है? चला जा। तोड़ रहा है कि टूट रहा है? हां, इलाज करा के वापस चला आ। फिर जाना है, फिर आना है। नियम मत तोड़। क्योंकि नियम तोड़ने का भी वो लगेगा तेरे को। नियम मत तोड़। शरीर का तो आराम कर लिया कर। बीमारी है तो जा, इलाज करा ले। बुढ़ापा अब क्या होगा, वह देख ले तू। तेरा कल्याण कैसे होगा, वही मैं तुझे बताऊंगा। पूरी तरह नियम में रह। अगर तुझे इलाज की जरूरत है तो इलाज करा के फिर स्वस्थ होकर आ जा। जब जरूरत पड़े, चला जा।
मुस्कुराओ, कोई बात नहीं। कोई इच्छा में तो नहीं मुस्कुराते ना। कोई उम्मीद में तो नहीं मुस्कुराते कि मुझे सामने वाला जवाब देगा। नहीं। गुरु से कुछ बात होती है, हर स्वभाव। कोई बात नहीं। वो तो स्वभाव है। कोई बात नहीं। नियम में ही कल्याण होगा।
एकदम। आप जितना प्रत्यक्ष ज्ञान के द्वारा बताया जा रहा है, आप अगर इस पर चलोगे तो सौ क्या, एक सौ एक प्रतिशत आत्मिक कल्याण होगा ही होगा। और मैं प्रत्यक्ष लाया हूं। प्रत्यक्ष मतलब प्रत्यक्ष। या आपको भी पता है कि मैं अगर इस तरीके से जीवन जिया, इस तरीके से मैं चल रहा हूं, तो मेरा आत्मिक कल्याण संभव है। तो इसीलिए मैं आप लोगों को कहता हूं कि एक व्यवस्था मिली है। आपके कर्म से ही मिली है। निमित्त भले मैं बना हूं। लोग सहयोग दे रहे हैं, वह भी निमित्त बने हैं। उनका भी कल्याण होगा। कहीं ना कहीं, जितना मेरे द्वारा हो रहा है, तन से, धन से और ज्ञान से, सेवा जहां से भी आप कर रहे हैं, उसका परिणाम आपको मिलेगा। तो इसीलिए मैं कहता हूं कि पूरी तरह नियम में रहो। नियम में रहने में ही कल्याण है।
देखो, आपने क्या लिखा है। अगर आप कुछ लिखते हो तो एक बार उसे पढ़ो कि क्या मैंने लिखा है। पढ़ना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि सामने वाले के समझ में आएगा, तभी आपको जवाब देगा। और आप लोग अपना ख्याल रखें। आप लोग अपना कल्याण करें। अपना आत्मिक कल्याण करें। आगे बढ़ें।
देखिए, मन एक ही है। जब हम बाहर कुछ इंद्रियों द्वारा ग्रहण करते हैं, उसे चेतन मन कहते हैं। और अचेतन मन का मतलब है कि अंदर हमने उसे जमा किया है, संचित किया है। तो मन एक ही है। बाहर को चेतन मन, और जिसे हमने संचित किया उसे अचेतन मन।
हमारे पास जितनी भी जानकारियां हैं, जब बाहर की इंद्रियों द्वारा हमें जानकारी नहीं मिलती, तो हम जितनी जानकारी इकट्ठा किए रहते हैं, उसे याद करते रहते हैं। अगर हमारी कामना बाहर से पूरी नहीं होती, तो हम यादों में अपनी कामना पूरी करते रहते हैं। यही चलता रहता है। चेतन मन और अचेतन मन।
डर इसलिए है कि आपने कुछ ऐसा कार्य किया है। कार्य की वजह से डर है, या सुरक्षा को लेकर डर है। आप कमजोर हो, तो कहीं न कहीं डर के पीछे कोई कारण है, कोई वजह है। वह जब तक नहीं हटेगा, तब तक डर नहीं हटेगा।
जैसे मान लीजिए आप कहीं सोए हो और बगल में ही कोई ऐसा जानवर है, जैसे शेर है, तेंदुआ है, और आप अकेले हो। जब तक आप पूरी तरह सुरक्षित, चारदीवारी में नहीं हो जाओगे, या उस शेर और तेंदुए को नहीं हटा दिया जाएगा, तब तक डर बना रहेगा। जैसे आपके घर में सांप आ जाए। अब पूरा परिवार डरा है। कब तक डरेगा? जब तक वह निकलेगा नहीं। जब वह निकल जाएगा, तो डर खत्म। और सोचो कि उसके रहते बोलो कि डर हटा दूं। तो आप कितना भी मानसिक डर हटाओ, लेकिन एक भय बना ही रहेगा।
आप लोग क्या सोचते हो कि हम विचार से सोचें कि हमारे अंदर परमात्मा है, हम शुद्ध आत्मा हैं। लेकिन इससे कुछ होने वाला नहीं। एक धोखा है, और इसमें जिंदगी चली जाती है। आप सोचो कि आपके घर में सर्प फैल गया और पूरा परिवार सोचे। वह निकला नहीं, और आपने आते हुए देख लिया, आपके घर में है, आपको पता है। और कोई कहे कि एक काम करो, डरो मत, डर निकाल दो। ऐसे निकलेगा? सर्प निकलेगा तभी डर निकलेगा, क्योंकि डर का कारण कहां से बना? सर्प से। तो सर्प निकलेगा तभी डर निकलेगा, नहीं तो नहीं। या तो उस जगह को छोड़ के दूसरे घर में चले जाओ, तो डर हट जाएगा। या तो आप जाओ, या तो सर्प जाए।
कहने का मतलब यह है कि बातों से बात नहीं बनेगी। कारण को, वजह को हटाना पड़ेगा, और उसके लिए मेहनत करना पड़ेगा, काम करना पड़ेगा। बातों से बात बनने वाली नहीं है। लोग सोचते हैं, बोलते हैं कि बस मैं शुद्ध आत्मा हूं, मैं ब्रह्म हूं। फिर वह ब्रह्म भी हैं और हरकत ऐसी करते हैं, राक्षसों जैसी। कहते तो हैं मैं ब्रह्म हूं, लेकिन हरकत कैसी है? राक्षस जैसी। तो कोई मतलब थोड़ी है। मानवता नहीं है तुम्हारे अंदर, प्रेम नहीं है, दया नहीं है, करुणा नहीं है, और तुम कह रहे हो मेरे अंदर ब्रह्म है, और घूम रहे हो पागल की तरह। तो ये सब मानने वाली बातों से हटो। प्रत्यक्ष में जीना चालू करो। प्रत्यक्ष में मेरा कल्याण कैसे हो, उस परम सत्ता का साक्षात्कार, आत्मसाक्षात्कार कैसे हो, उसके लिए काम करो। यह बातों से बात बनने वाली नहीं है। इस बात को जरा आप लोग गहराई से समझो। मैं यही बताना चाहता हूं कि बातों से बात नहीं बनने वाली है। उसके लिए आपको काम करना पड़ेगा, उसके लिए आपको मेहनत करना पड़ेगी।
नहीं, जरूरत नहीं है। अहम तब आता है जब आप किसी को नीचा दिखाना चाहते हो, कि मैं कुछ हूं और वह तुमसे कम है, और जब आप इस बात को सिद्ध करना चाहते हो जबकि आप वह नहीं रहते। अगर आप सच में वह हो, तब तो अहम नहीं आएगा, क्योंकि सामने वाले को आप सिखाने के लिए बात करोगे। अहम तब आता है जब आप नहीं हो, और सिद्ध करना चाहते हो कि मैं यह हूं। तब उसमें अहम भाव आता है, और सामने वाले को नीचा दिखाना चाहते हो।
तो अहम भाव तभी आता है जब आप योग्य नहीं रहते, और आप अपने आप को योग्य बताते हो कि देखो मैं यह हूं। जब सामने वाला नहीं मानता, तो उसमें अहम भाव आता है, और वह अहंकार का रूप ले लेता है, और इससे आपका पतन होता है। इसलिए आप जो हैं सो हैं। अपना काम करिए और आगे बढ़िए। न तो खुद नीचे आइए, न तो किसी को नीचा दिखाने का प्रयास करिए। न तो आप छोटा बनिए, न बड़ा बनिए। सिर्फ अपना काम करिए, ईमानदारी से, सत्कर्म से। बस अहम भाव काम ही नहीं करेगा।
हां, अगर किसी से डर है तो प्रेम कहां है? डर के नाते इज्जत कर रहा है, मान कर रहा है, सम्मान कर रहा है, लेकिन प्रेम नहीं। प्रेम अगर है तो व्यक्ति खुल जाएगा पूरी तरह, अपने आप को समर्पित कर देगा, खुल जाएगा।
एकदम मुश्किल नहीं है। इसलिए कि आप हमेशा दूसरों को जानते रहते हो, राग-द्वेष में। बस राग-द्वेष में जानना छोड़ दो। सिर्फ अपना काम करो। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग अपना लो। एक समय ऐसा आएगा कि आप जानने से मुक्त हो जाओगे, और जानने वाला शेष बचेगा।
बस सत्संग सुनते रहो। जैसे किसी भी सामान के बारे में सामने वाला जितनी आपको जानकारी देता है, आपके जरूरत के हिसाब से जरूरत दिखाता है, और अलग-अलग उसमें क्वालिटी बताता रहता है, तो आपकी जिज्ञासा उसमें बढ़ती जाती है। आप गए थे कुछ और लेने, और वह कहता है इसको भी देख लीजिए, और उसकी खासियत बताने लगता है कि इसकी यह खासियत है, आपके जीवन में इसका यह महत्व है, यह ले जाइए, इससे अच्छा है। तो जब उसकी बात पूरी तरह सुनते हो, तो धीरे-धीरे उसके प्रति जिज्ञासा बन जाती है। तो अगर आप सत्संग सुनते रहोगे, तो आपकी आत्मिक कल्याण की जिज्ञासा प्रबल होती जाएगी।
बस करना छोड़ दो। अगर आपको लग रहा है कि यह करने से मैं गिरता हूं, तो करना छोड़ दीजिए। आप कौन हो, इस कौन-हो से परे हो जाओ, तो आपको समझ में आ जाएगा कि मैं कौन हूं।
आप बेईमानी छोड़ दो। बस कुछ भी करो, वहां ईमानदारी हो। बस, कभी गिरोगे नहीं। अगर आपके द्वारा ईमानदारी और सत्कर्म पूरी तरह हो रहा है, तो आप गिर ही नहीं सकते, कभी भी।
नहीं। मोक्ष, मुक्ति, इस पिंड में ही है। अगर आप इस पिंड में मोक्ष नहीं पाए, तो अगला शरीर फिर धारण करोगे। इस पिंड में ही मोक्ष होगा, और आपको पता चल जाएगा कि अब मैं शरीर धारण नहीं करूंगा, अब मैं आगे की यात्रा करूंगा। यह आपको शरीर में ही पता चल जाएगा। अपने आत्मज्ञान के लिए बहुत मेहनत की है, आप भी करिए।
कोई बात नहीं, उसमें क्या हुआ। जीसस के साथ रहने वाला जीसस को ही भेज दिया। महावीर के साथ रहने वाला महावीर के विरोध में जाके गुरु बन बैठा, और महावीर को गालियां और बुराइयां देने लगा। तो कोई बात नहीं है। जो जैसा करेगा, वैसा परिणाम पाएगा। उससे क्या हुआ? आप बस अपने कल्याण के लिए काम करो। जो जैसा करेगा, वैसा पाएगा। अपने को क्या करना है?
इतिहास गवाह है कि बहुत लोग उनके शरण में रहे। बहुत ऐसे क्रांतिवीर हुए जिनको उनके दोस्त और यार ने ही फंसा दिया। कितने हुए कि गए थे शिष्य बनकर, और तरीका सीखकर, गुरु बनकर, और लोगों को ठगने लगे। लेकिन बाद में उनको परिणाम मिला। ऐसा नहीं है।
बस पवित्रता वाला काम करो। मन तो पवित्र है। अगर आप देखोगे तो उसका उससे कोई मतलब नहीं है। न वह अपवित्र होता है, न पवित्र। वह उससे भी परे है। आप देखो कि आपकी स्थिति क्या है, तो आप अपने को सुधारने वाला काम करो।
अब देखो, अपने को क्या करना है। जिसको जैसे रहने में खुशी मिलती है, वह देखे। कानून देखे, संविधान देखे। अपने को क्या करना है? अपने को अपना कल्याण कैसे हो जाए, उसके लिए काम करना है। बस, खत्म बात। जिसको जैसी मर्जी, जैसे उसे सुकून मिल रहा है, वैसे जिए। सबके जीवन पर सबका अधिकार है। अब जिस देश में वह रहता है, उस देश का कानून देखे कि वह सही है कि गलत। अपने को क्या करना है? अपने को यह करना है कि भैया, मैं कैसे इस भवसागर से निकल जाऊं। खत्म बात।
भवसागर वह है जहां फंसे हो, और तुम्हें खुद नहीं पता तुम कहां-कहां फंसे हो। भवसागर का मतलब यही है जिसका आदि और अंत नहीं है। मतलब अगर आपसे पूछा जाए कि आप कहां-कहां फंसे हो, तो आपको खुद याद नहीं है। यही है भवसागर।
वो देवता थे। देवता आपकी इच्छा ही पूछेगा। और कुंभकर्ण भी तो अधर्म का साथ दे रहा था। एक अधर्मी को मारने के लिए अधर्म का सहारा लेना पड़ेगा। अगर कोई तलवार से व्यवहार कर रहा है और तुम फूल लेकर खड़े हो जाओ, तो मारे जाओगे। अगर कोई समाज को प्रताड़ित कर रहा है, समाज में बुरा व्यवहार कर रहा है, समाज के लोगों को सता रहा है, तो उसको अधर्म से ही मारा जाएगा। धर्म खत्म हो गया। धर्म उसके साथ किया जाता है जो धार्मिक हो, धर्म पर चले। और अब सामने वाले ने अधर्म कर दिया, तो धर्म अब रहा कहां। उसको मारने के लिए अधर्म का ही सहारा लेना पड़ेगा।
अगर आप कहो कि एक बेईमान है, और हम समझ गए कि वह बेईमान है और वह गलत करने जा रहा है, तो अब हम उसे रोकने के लिए अगर गलत भी कर रहे हैं तो वह सही है, क्योंकि वह तो गलत ही कर रहा है। अब उसके साथ सही व्यवहार थोड़ी किया जा सकता है। समझने का प्रयास करिए। इस समाज में कुछ काम करना है तो आपको बहुत कुछ करना पड़ेगा।
सब कुछ पहले से निर्धारित करके हम ही आए हैं। लेकिन जब हम यहां आते हैं तो बेईमानी करने लगते हैं, तो उसका परिणाम हमें भोगना पड़ता है। सब फिक्स है, और जब फिक्स में हम फिक्स करने लगते हैं तो हम फंस जाते हैं। हमारे कर्म के आधार पर ही सब फिक्स है। लेकिन हम क्या करते हैं? फिक्स में फिक्स करके फंस जाते हैं।
देखिए, मैंने उदासीन संप्रदाय के बड़े अखाड़े से दीक्षा ली थी। लेकिन अब मैं संप्रदाय से भी मुक्त हो गया। क्योंकि जिसे हमने गुरु बनाया था, वे महंत थे, श्री पूनम दास जी महाराज। तो उन्होंने हमको बोल दिया कि जो तुझे चाहिए मैं नहीं दे सकता, तू जा खोज। तो मैं वहां से निकल गया। फिर भी मैं उनके पास बारह साल तक जाता ही रहा। उन्होंने ना बोलने के बाद भी मैं आश्रम जाता रहा, और मुझे बारह साल के अंदर ही ज्ञान हुआ। दो हजार ग्यारह में निकला था, ज्ञान की खोज में। दो हजार बीस में ज्ञान हुआ, और मेरे बारह साल दो हजार तेईस में पूरे हुए।
मुझे इतना पता था कि किसी भी खोजी को बारह साल तक कुटिया कभी नहीं बनाना चाहिए। तो मैंने बारह साल तक कोई कुटिया नहीं बनाई थी। बस भ्रमण ही करता रहा। और जब बारह साल मेरे पूरे हुए, तेईस में, तो चौबीस में, दो हजार चौबीस में, मैंने यहां अपनों की कुटिया का निर्माण आप लोगों के लिए किया। इसलिए कि मैं पच्चीस-छब्बीस साल में निकला था। जब व्यक्ति पच्चीस-छब्बीस साल में निकल गया और बारह साल भ्रमण कर लिया, कोई घर नहीं बनाया, तो फिर उसे घर की कोई जरूरत ही नहीं है। क्योंकि मुख्य जरूरत, शौक, श्रृंगार और घर, सबकी जरूरत पच्चीस-छब्बीस साल की जवानी में ही पड़ती है। तो मैंने उस समय घर ही नहीं बनाया, बस ऐसे भटकता ही रहा, घूमता ही रहा। तो मुझे जरूरत नहीं थी।
लेकिन मैंने देखा कि लोग मुझसे मिलना चाहते हैं, लोग मेरे पास आना चाहते हैं। तो लोग मेरे पास आते थे, बाहर मिलते थे। लेकिन बाहर इतना एकांत का माहौल नहीं होता था। कोई डिस्टर्ब करता था। दूसरे के यहां आते थे, फिर उन्हें एक-दो दिन में जाना पड़ता था, और सही सत्संग नहीं हो पाता था। तो मैं यह सब देखते हुए अपनों की कुटिया का निर्माण किया। और आज यहां एकांत ऐसा है कि यहां कोई बोलने वाला नहीं है। चाहे जितना चिल्लाकर बोलो, चाहे जब तक सत्संग करो, चाहे जब तक बैठो, कोई पूछने वाला नहीं है कि तुम क्यों बैठे हो, क्या कर रहे हो। तो मैंने साधकों के लिए ऐसे अपनों की कुटिया का निर्माण कर दिया कि आप आराम से आकर यहां साधना कर सकते हो।
पूछने की जरूरत नहीं। जब मैं इस गर्मी में रह रहा हूं, तो आप आके नहीं रह सकते क्या? सिर पर एसी बांध के लाओगे क्या? क्या एसी बांध के घूमते हो? जब यहां इतने लोग रह रहे हैं, तो तुम क्या आदमी हो कि तुमको और कुछ हो? इतने लोग रह रहे हैं। और तुम कह रहे हो कि वहां गर्मी है। हम इस गर्मी में नहीं खड़े हैं क्या?
भाई, प्रार्थना करो कि मेरा आत्मिक कल्याण हो जाए, मुझे आत्मज्ञान हो जाए, मुझे उस परम आनंद की उपलब्धि हो जाए। तब समझ लेना कि आपकी प्रार्थना हो जाती है। यह करो कि मैं उस परम सत्ता से कैसे मिलूं, मैं इस जन्म-मरण से कैसे छुटकारा पाऊं, मैं राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मैं-कर्ता के भाव से कैसे मुक्त हो जाऊं। इसके लिए प्रार्थना करो।
अगर आपको लगता है कि मेरी प्रार्थना सुनी जाती है, तो नश्वर चीजों में मत लगाओ। आज है, वह कल नहीं रहेगा। अगर रहेगा तो तुम उपयोग करने लायक नहीं रहोगे। तो भाई, जरूरत में जियो, और अपने आत्मिक कल्याण के लिए प्रार्थना करो।
आपको खुद पता चल जाएगा। जब आप कहीं जाते हो तो आपको पता है कितना रास्ता, कितना सफर कर लिए हो। तो आपको खुद पता चल जाएगा। नहीं पता चल रहा है, इसका मतलब चल नहीं रहे हो, सिर्फ शब्द लेके घूम रहे हो। क्योंकि आपकी समझ विकसित होगी तो आप देखोगे।
जैसे एक बालक पढ़ाई कर रहा है और बोले, मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं पढ़ाई में आगे जा रहा हूं। तो भाई, तुझे प्रश्न और उत्तर याद हैं कि नहीं? तूने पढ़ा है तो कितना तुझे याद है, कितना गणित लगाना आ गया, कितना नहीं आ गया। तुझे खुद पता चल जाएगा। अब बोलोगे, सन्नाटा। तुम्हें कुछ किताब का याद ही नहीं है, तुम्हें कोई गणित लगाना ही नहीं आ रहा, अंग्रेजी पढ़ना ही नहीं आ रहा, हिंदी पढ़ना ही नहीं आ रहा। तो बस तुम किताब ढो रहे हो। इसका मतलब आप शब्द ढो रहे हो। आपको पता चल जाएगा कि मेरी उन्नति कितनी हुई है, मेरी समझ कितनी विकसित हुई है।
देखिए, ज्ञान मार्ग सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। किसी भी मार्ग से जाओगे, ज्ञान ही चाहिए। तो ज्ञान मार्ग एकदम सीधा है, कि भैया छोड़-छाड़ के आओ। ज्यादा लोग भक्ति मार्ग में जाते हैं, क्योंकि इष्ट के सहारे रहते हैं कि ये छुड़ा देंगे। तो ज्ञान मार्ग सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। इसमें बहुत तेजी से यात्रा होती है। तो सबसे सही तो ज्ञान मार्ग है, लेकिन आपकी सामर्थ्य देखो।
जैसे मान लो कोई बोले कि सबसे जल्दी जाने का रास्ता क्या है, तो प्लेन है। लेकिन प्लेन के लिए टिकट का पैसा भी तो चाहिए, अपनी क्षमता भी तो चाहिए। अगर आपकी क्षमता नहीं है तो ज्ञान मार्ग में नहीं चल पाओगे। क्योंकि ज्ञान मार्ग में सिर्फ आप हो। गुरु भी जिम्मेदारी नहीं लेता। कहता है, मैं मार्ग बता रहा हूं, चलना तेरे को है। और इस मार्ग में अगर आना है तो सर्वप्रथम ईमानदारी अपनाओ, सत्कर्म अपनाओ, और सत्संग सुनो। बस यही है। इसी से तेरा कल्याण हो जाएगा। और प्रत्यक्ष में जीना चालू करो। ज्ञान मार्ग कर्म का सिद्धांत बताता है, कि भैया कर्म से ही तर जाओगे।
तो ज्ञान मार्ग सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। इस मार्ग को आप पकड़ सकते हो, लेकिन आपकी क्षमता भी होनी चाहिए, क्योंकि इसमें कोई आश्वासन देने वाला नहीं है। तारना आपको है। सारी जिम्मेदारी आपकी। गुरु सिर्फ आपको मार्ग बताएगा। कहेगा, तू चलेगा तो मैं तेरे साथ हूं, और तू नहीं चलेगा तो मेरी जवाबदारी नहीं। बाकी और मार्ग पर कहते हैं, कोई बात नहीं, हम कर देंगे। भक्ति मार्ग पर गुरु बैठे हैं, बोलते हैं कोई बात नहीं, तुम यह करो, मैं कर दूंगा। मैं हूं न, मैं तुम्हें वहां मिलूंगा, स्वर्ग में ले जाऊंगा, सत्यलोक में मिलूंगा। क्या-क्या आश्वासन देते हैं।
तो भाई देखो, ज्ञान मार्ग सर्वश्रेष्ठ मार्ग है, लेकिन आपकी क्षमता भी होनी चाहिए। अगर आपकी क्षमता नहीं है तो फिर कोई बात नहीं। वही फ्लाइट से जाना है तो उसका टिकट भी तो चाहिए। अगर एक-आध महीने बाद जाना है तो कम लगेगा। तुरंत जाना है तो टिकट ज्यादा लगेगा। समझ रहे हो? तो यही है। देख लो, आपकी क्षमता क्या है।
आत्मा का कोई स्वभाव नहीं है। वह स्वभाव से परे है। कोई स्वभाव नहीं है, भाव नहीं है। जहां भाव है वहां मतलब है, वहां जरूरत है। चाहे तुम्हारी जरूरत, चाहे सामने वाले की जरूरत। लेकिन जरूरत तो जरूरत है।
अगर आप गुरु के बताए मार्ग पर पूरी तरह चल रहे हो, तो गुरु तुम्हें हर समय देख रहा है। और अगर आप चल रहे हो तो आपकी पूरी आंतरिक मदद करता है, हमेशा, आप कहीं भी रहो।
नहीं। बुद्धि। और इंद्रियों द्वारा, अगर कान से सुनो और आंख से देखो, तभी आप दृश्य के बारे में सोच पाओगे। यह क्या है? अगर जानकारी है तो पता लगाओगे कि यह रूप-रंग क्या है, कौन सा जानवर है, इंसान है क्या, पशु है, पक्षी है क्या। इसके बाद सुनकर, अगर आपने शब्द भी सुन लिया, और अगर आपको शब्द की जानकारी है, तब आप समझ लोगे क्या बोला जा रहा है। तो इंद्रियां निमित्त हैं। मूल में इंद्रियां निमित्त हैं, और मन शरीर के लिए काम करता है। और आपकी जैसी जानकारी है, मिला-जुलाकर इंद्रियां काम करती हैं।
सब कुछ फिक्स था, मतलब आप फिक्स करके ही आए। आप आए थे न। जैसे एक व्यक्ति नौकरी करता है। जैसे सरकारी नौकरी उसकी लग गई, तो सब फिक्स होता है। तुम्हारा इतना पेमेंट है, यह काम करना है। अगर वह ईमानदारी से काम करता रहता है, तो एक दिन रिटायर होकर उसे पेंशन मिलती है, और वह जहां काम करता था वहां से छूटकर अपने घर चला आता है। लेकिन अगर उसी व्यक्ति ने क्या किया? फिक्स तो सब था, उसे बता दिया गया था लेटर में कि यह काम करना पड़ेगा, इसके लिए सब साइन करवा लिया जाता है। लेकिन अगर उसने अपने कर्म में बेईमानी कर दी और पकड़ा गया, तो घर नहीं जाएगा, जेल जाएगा। कहां जाएगा? जेल।
तो ये सब जेल में खड़े हो। यह पिंड है न, यह जेल की तरह है। अब आप सजा काट रहे हो। अपने घर तभी जाओगे जब आपकी सजा खत्म होगी। लेकिन आप क्या करते हो? नई-नई गलतियां करके, नए-नए धाराएं अपने ऊपर लगवा रहे हो। पुराना खत्म ही नहीं हो रहा है। अगर एक अपराधी अपराध करना छोड़ दे, तो फिर जितनी सजा उसे लगी है, जिस दिन वह पूरी होगी, और सत्कर्म और ईमानदारी अगर सही से की, तो जेलर कुछ सजा कम करवा के उसे बाइज्जत बरी कर देगा, सम्मान के साथ। लेकिन अब वह क्या कर रहा है? अपराध पर अपराध करते जा रहे हो। फिक्स तो सब था, लेकिन तुम फिक्स करने लगे। नौकरी करने के पहले ही सब फिक्स होता है न। नौकरी कहती है, भाई तेरा यह काम है। और अगर वह बेईमानी करके पकड़ा जाता है, तो घर न आकर जेल चला जाता है।
तो अगर हम लोग भी ईमानदारी और सत्कर्म अपना लें, और सत्संग सुनें, तो हम एक दिन अपने घर पहुंच जाएंगे। बस तुम बेईमानी छोड़ दो। तुम एक दिन अपने घर चले जाओगे। और जब तक बेईमानी करोगे, बस एक शरीर से दूसरा शरीर, दूसरा शरीर, ऐसे ही शरीर मिलता जाएगा। जैसे मान लीजिए आपकी जेल हो गई, लेकिन जेल में भी जाकर तुमने किसी को मार दिया, वहां भी तुमने कुछ लूटपाट कर दी, तो एक धारा और लग जाएगी। बढ़ता जाएगा। इस जेल से वह जेल, उस जेल से वह जेल। और जितना उलझोगे, उतनी सजा भी बढ़ती जाएगी, और कठोर सजा दी जाएगी आपको।
तो भैया, निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है। आप लोग समझ लो। ईमानदारी और सत्कर्म।
मनुष्य तो शरीर है। आप ही लोगों के लिए बात की जा रही है, जानवर के लिए थोड़ी बात की जा रही है। हमारे मानव शरीर के अलावा जितने भी हैं, उनको कर्म का अधिकार नहीं है। वह भोग शरीर है। अगर आप योग कर रहे हो, अपने कल्याण के लिए काम कर रहे हो, तो अगर इस शरीर में कल्याण नहीं हो पाया तो अगला शरीर आपको मानव का ही शरीर मिलेगा। अगर अपने आत्मिक कल्याण के लिए काम कर रहे हो तो।
और अगर आप आत्मिक कल्याण के लिए काम नहीं कर रहे, बस आपने बच्चों को पैदा किया, भोग कर रहे हो, तब आपको अगला शरीर भोग शरीर मिल जाएगा। फ्री में खाओ, घूमो, क्योंकि योग नहीं किया। योग करने वाले के लिए यह शरीर है। योग का मतलब अपना आत्मिक कल्याण करना, अपने आप को सुधारना, मैं अपने घर वापस कैसे चला जाऊं। तो अगर आपने यह नहीं किया, सिर्फ भोग किया, तो आपको यह शरीर तो मिलेगा नहीं। करोगे क्या लेके? क्योंकि तुम्हें तो भोग चाहिए। तब आप अन्य शरीर में चले जाओगे, और चौरासी लाख योनियों में ऐसे भोग ही करते रहोगे।
जब तक योग है, अपना उद्धार करने के लिए आप काम कर रहे हो, तब तक अगला शरीर यही मिलेगा। और अगर आपको उद्धार नहीं करना है, यह शरीर योग और भोग दोनों का है, और उसमें सिर्फ भोग है, तो आपने क्या किया? योग नहीं किया, सिर्फ भोग किया। तो आपको अन्य शरीर भोग का ही मिलेगा, योग का नहीं मिलेगा। एकदम समझ में भी आता है। यह लॉजिक समझ में आ रहा है। ऐसा नहीं कि किसी पर भरोसा करना है, मुझ पर या किसी और पर। यह समझ में भी आता है। इसी को प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं। यहां भरोसे की बात ही नहीं है। अपने भी समझ में आता है।
साधना तो कर ही रहे हो। साधना तो अकेले होती है, यह तो ईमानदारी है। लेकिन जब आपके द्वारा कोई काम हो रहा है, तो उस कर्म में ईमानदारी है क्या? क्या आप किसी को उस काम के लिए भरोसा दिला रहे हो? क्या आपको प्रत्यक्ष है, या सिर्फ भरोसा ही भरोसा है? भरोसा है तो झूठ है।
अगर तुम एक व्यक्ति को पकड़ लो और बोल रहे हो कि भैया तू इस रास्ते चल, तर जाएगा, और तुझे खुद नहीं पता, तुम खुद नहीं तर पाए हो, तो बेईमान हो गए। आज लोग क्या कर रहे हैं? महापुरुषों की बानी उठा के गारंटी ले रहे हैं, लेकिन वे खुद नहीं पहुंचे। तो बेईमान हैं। अगर तुम जिस मार्ग से खुद नहीं पहुंचे, उस मार्ग का ठप्पा तुम कैसे मार सकते हो कि यह मार्ग आपको पहुंचाएगा? बताओ, तो बेईमान हो गए। आज लोग प्रचारक बन के महापुरुषों की बानी उठा के अपना ठप्पा मार रहे हैं। अगर आप दूसरे के चेक पर साइन करोगे तो चेक बजेगा क्या? अगर उस मार्ग के बारे में आप कह रहे हो कि भैया तुम इस पर चलो, पहुंच जाओगे, तो तुम क्यों नहीं पहुंचे? जवाब दो। तो कहते हैं, भरोसा रखो। यह आदमी फिर झूठा है। अगर इस मार्ग से मैं पहुंचूंगा, तुम क्यों नहीं पहुंचे? तुम चल ही रहे हो।
भाई, पढ़ाने का अधिकारी कौन है? जो पूरी डिग्री पाकर शिक्षक बन गया हो। अगर वह विद्यार्थी ही है तो पढ़ाने का अधिकारी थोड़ी है। अनुमति देगी सरकार। तो हमें खुद समझना चाहिए। आज लोग महापुरुषों की बानी उठा के अपना ठप्पा मार रहे हैं, कि हम कह रहे हैं तुम पहुंच जाओगे, लेकिन खुद नहीं पहुंचे। अब जैसे आप ही ने उस दिन कहा था कि मैं प्रवचन करता हूं। तो आप किसी किताब का करते हो। आप लोगों को आश्वासन देते हो कि यह करोगे तो पहुंच जाओगे। तुम क्यों नहीं पहुंचे? तो यह झूठ है, आप बेईमान हो फिर। आप किस आधार पर कह रहे हो कि भैया ऐसे तुम पहुंच जाओगे? तुम क्यों नहीं पहुंचे? यह प्रश्न खड़ा करो अपने ऊपर। पहुंचने के बाद आप रास्ता बता सकते हो, क्योंकि फिर वह आपका होगा, उसका नहीं। जब आप किसी के बताए मार्ग से उस लक्ष्य तक पहुंच गए, लक्ष्य पर जैसे पहुंचे, तो वह तरीका आपको मिल जाएगा। तब आप किसी को मार्ग बताने के अधिकारी हो।
जैसे आपने कहा कि आप सत्संग करते हो, प्रवचन करते हो। सत्संग तो तभी करोगे जब सत्य तक पहुंच जाओगे। प्रवचन मतलब किताबों से बोलना, किसी भी किताब से बोलना। तो यह बेईमानी है। जब उस किताब के द्वारा, उन शब्दों के द्वारा, खुद का कल्याण नहीं हुआ, तो दूसरे का कैसे होगा? कैसे गारंटी ले रहे हो? तो यह गारंटी लेना ही बेईमानी है। और समझ में भी आता है आप कहां से बोल रहे हो। तो यह बेईमानी है। अगर आप इस मार्ग में भी चल रहे हो, और कोई पूछे भी, तो बोलो, भैया अभी हम पहुंचे नहीं हैं। पहुंच जाएंगे तो आपको बताएंगे।
मेरे साथ ऐसी घटना घटी थी। यहीं पास में रायबेटरपुरा है, खरगोन जिले में। मैं वहां गया था। दो हजार बीस की घटना है, फरवरी की। वहां मेरी बातचीत हुई। लोगों ने खूब बातचीत की, तो सब बहुत प्रसन्न थे। बोले, आप मुझे मार्ग बताओ। एक बालक ने कहा कि अब तो जा ही रहे हो, लेकिन मुझे मार्ग बता के जाओ। तो मैंने कहा, बेटा मार्ग तो मिल गया है, लेकिन अभी ठप्पा मेरा नहीं लगा है। मार्ग मिल गया है, लेकिन अभी पक्का नहीं हुआ है कि इस मार्ग से तुम पहुंच पाओगे। अभी यह नहीं हुआ है। जिस दिन मुझे यह पक्का हो गया, मैं उस दिन तुम्हारे गांव में आकर तुम्हें मार्ग बताऊंगा। तो जब मुझे ज्ञान हुआ, तो मैं फिर उस गांव में गया और उनको मार्ग बताया।
जब मैं पहले घूमता था, तो यह समाज है। किताबों की भी बात बोलो तो कहेंगे तुम ज्ञानी हो। लोग मुझे खुद कहते थे। दो हजार दस से मैंने साधना चालू की। ग्यारह में पूरी तरह निकल गया। तो लोग खुद बोलते थे, आश्रम बना लो गुरुदेव, आप मुझे दीक्षा दे दो। मैंने कहा, भाई मैं खुद चल रहा हूं। लोग मुझे खुद कहते थे, आपको ज्ञान हो गया। मैंने कहा, मुझे ज्ञान हो गया यह आप कह रहे हो, लेकिन मुझे पता है नहीं हुआ। ये जितने भी शब्द बोल रहे हैं, किताबी हैं, लोगों के हैं, मेरे नहीं हैं। और इस बात का मुझे पता है, आपको नहीं पता, इसलिए कि आपने वह किताब नहीं पढ़ी। आपको नहीं पता चल रहा है। आपको लग रहा है मैं बोल रहा हूं, लेकिन आपने वह किताब नहीं पढ़ी है जहां से मैं बोल रहा हूं। गड़बड़ यह है। तो मुझे लोगों ने घोषित कर दिया था, लेकिन मैं नहीं माना। बोला, न तो मैं तुम्हें शिष्य बनाऊंगा, और न मैं अभी गुरु लायक हूं। गुरु ज्ञान का प्रतीक है, लेकिन मैं तो अभी जानकारी का प्रतीक हूं। मैं खुद ईमानदारी से बोलता था।
लोग मेरे पीछे पड़ जाते थे कि अब आप यहीं रुको, आप तो भगवान हो, आप एक काम करो, आश्रम बना देते हैं। मेरे घर वाले खुद मेरा फोटो लगाकर पूजा करने लगे। मैंने इस तरह की साधना की, लेकिन मुझे ज्ञान नहीं हुआ था। मैं मार्ग में चल रहा था। समाज को क्या चाहिए? सिद्धियां। सिद्धि वाली हो तो बस, उनको लगे कल्याण हो जाए। सिद्धियां हमें दो हजार दस में ही मिल गई थीं। अनेक तरह की सिद्धियां मिल गई थीं। वाक् सिद्धि मिल गई थी, स्पर्श सिद्धि मिल गई थी, देखने की सिद्धि मिल गई थी। बहुत सारी सिद्धियां मिल गई थीं। लेकिन मुझे तो अपना आत्मिक कल्याण करना था। तो मैं इन सब चीजों में नहीं उलझा। मैं खुद बोलता था, नहीं भाई, मुझे ज्ञान नहीं हुआ है, मैं उसी की खोज में हूं। तो इतनी ईमानदारी होनी चाहिए। लेकिन अपने बड़प्पन में बोल दो, हां भैया मुझे ज्ञान हो गया। समाज है। समाज तो कुत्ते की समाधि को भी पूजने लगता है, अपनी कामनाओं में। गधे की भी। किसी का भी देखो, भूत-प्रेत, पेड़-पौधे, नदी-नाले, सब पूज रहा है। ईंट-पत्थर सब पूज रहा है, किस कामना में? तो तुम्हें भी पूजने लगेगा। कोई बड़ी बात थोड़ी है।
अरे भाई, तुम कहीं भी जाओ, कपड़े पहन लो। कपड़े का कोई ऐसा लाइसेंस तो है नहीं। सरकार अनुमति देती है, कोई डिग्री नहीं है। अभी गेरुआ पहनो और चले जाओ, भभूत ले लो, माला पहन लो, और दस को पकड़ो। एक-एक को दस अंक दे दो। बोलो जाओ, लॉटरी लगा दे। लग जाएगा? नहीं। अंक लगा दे। शाम तक एक तो आएगा। एक से लेकर दस तक गिनती का अंक दस को दोगे, तो शाम को एक मीठा लेकर पहुंच जाएगा। बोलेगा, आपके आशीर्वाद से लग गया। बोलोगे, हां चलो। नौ भले कहीं जाएंगे, लेकिन एक आएगा। और एक कब तक आएगा? जब तक सब बेच नहीं देगा। वह तो बहुत लोगों को पकड़ के लाएगा। यही तो चल रहा है। तो आप लोग समझो इस बात को। आप जिस मार्ग से नहीं पहुंचे हो, आप बताने के अधिकारी नहीं हो। तो कहीं न कहीं आपसे भी बेईमानियां हुईं, चाहे जैसे भी, लेकिन अब मत करो। क्योंकि समझने के बाद भी करोगे तो ज्यादा गिरोगे। अब मत करो। बाद में घुटन बचेगी। इंद्रियां भोग नहीं ले पाएंगी। देख-देख के घुटन होगी। लोग उसका दुरुपयोग करेंगे। आप गाली बकोगे।
तो भैया, मुझे दो हजार ग्यारह में लोग आश्रम बना के देने के लिए तैयार थे। लेकिन मैंने बारह साल तक आश्रम नहीं बनाया। मैंने कहा कि इस मार्ग में चले हो तो बारह साल का भ्रमण बोला गया है, कि बारह साल सिर्फ भ्रमण करते रहो, बारह साल खोज करते रहो। ज्ञान की खोज करो। ज्ञान गुरु देगा, गुरु की खोज करो। तो मेरा ऐसे बीता। मैंने बारह साल के अंदर कभी भी एक ईंट भी नहीं रखी कि यह मेरा है। कभी भी नहीं। कहीं भी रह लेता था, और हर जगह धक्के ही खाता था, क्योंकि धर्मस्थान पर भी सो जाऊं।
अभी एक घटना बता रहा हूं ओंकारेश्वर की। ओंकारेश्वर में मैं गया, तो एक जन बोले कि आप इस आश्रम में चले जाओ, वह आपको बताएंगे कुछ। मैं उस आश्रम में गया तो वे नहीं थे। भंडार चलाने वाले को कोठारी बोलते हैं। कोठारी के पास गया। बोला, खा-पी के आराम करो। अब वे नहीं मिले। मैंने कहा, आप कुछ बताओ। तो वह बोला, नहीं, खा जाओ, भोजन कर लो। आराम करना है तो आराम करो। मैंने कहा, जब जिसके लिए मैं आया हूं, जब वही नहीं हो रहा है, तो आराम क्या करें? फिर मैं तुरंत वहां से चला गया। और ओंकारेश्वर में नर्मदा तट है, वहीं पर आराम करने लगा। अब ठंड का महीना, क्या आराम होगा? जैसे-जैसे दस-ग्यारह बजे, शरीर कांपने लगा। और शरीर इतना कांपने लगा कि शरीर को संभालने की मेरी ताकत नहीं थी। हताश हो गया था, निराश हो गया था। क्या करूं? इतना कांपने लगा शरीर। आग भी नहीं थी, ओढ़ने को भी नहीं था। करूं तो क्या करूं?
तो मेरे पास पैसे थे, चिथड़े कपड़े। मैं होटल के पास गया। मैंने कहा, आज रात के लिए मुझे कमरा चाहिए। मेरी सामर्थ्य नहीं बची थी कि मैं इतनी ठंड बर्दाश्त कर पाऊं। तो सामने वाला बोला, लगेज है क्या? एक तो कपड़ा देखा। फिर बोला, लगेज है क्या? मैंने कहा, लगेज तो नहीं है। बोला, कोई कमरा नहीं मिलेगा। मैंने कहा, भाई पैसे तो दे रहा हूं, पहचान का प्रमाण भी दे रहा हूं, दे दो। लेकिन उसने नहीं दिया, क्योंकि मेरी स्थिति ऐसी थी। फिर मैं आया। नर्मदा तट की तरफ आया तो एक गणपति का मंदिर था, वह खुला था। तो मैं गया, मूर्ति के पीछे सोया। इतना कांप रहा था। लेकिन फिर एक डर था कि सुबह अगर पुजारी आ गया, और नींद आ गई। वहां टाइलें थीं, ठंड वहां भी लग रही थी, लेकिन कुछ तो आराम था। हुआ यह कि सुबह अगर कोई पुजारी आ गया तो गाली देकर भगाएगा, और चार ही पांच बजे आ भी जाएगा। तो ऐसी स्थिति में मैंने साधनाएं की हैं। जैसे एक व्यक्ति अभी पूछ रहा है, वहां गर्मी है कि नहीं। इतने लोग रहे, इतनी व्यवस्थाएं, फिर भी पूछ रहा है। मुझसे पूछो मैंने कैसी साधनाएं की हैं।
मुझे आश्रम देने के लिए, उत्तर प्रदेश में लोग भगवान घोषित कर दिए थे। बाबा बनना बड़ा सरल है। सिद्धियां आ गई थीं। लेकिन मैं उसमें नहीं फंसा। मैंने निशुल्क सेवा करके आगे बढ़ गया। मेरे घर वाले घोषित कर दिए थे। मेरी भांजी, मेरी बहन फोटो लगाकर पूजा करें। और वह सब सिर्फ कामनाओं के लिए। कोई आत्मिक कल्याण के लिए थोड़ी। उनकी कामनाएं पूरी हो जाती थीं, तो वे फोटो लगा के पूजा करने लगे। मेरी पूजा थोड़ी कर रहे हैं। कामनाओं की कर रहे हैं। निमित्त मुझे बना लिया था। ये सब बातें मुझे समझ में आ रही थीं। ये बकवास कर रहे हैं। अब इनकी कामनाएं पूरी नहीं हों तो फोटो उठा के फेंक देंगे। वह चाहे मेरी बहन हो, चाहे मेरी भांजी हो। सीधी सी बात है। तो यह बात मुझे समझ में आ गई थी। तो मैं यह सब जाल में कभी नहीं फंसा।
महापुरुषों की वाणी उठाकर भगवान बन जाना, सिद्धियां कुछ पाकर भगवान बनना, बड़ा आसान है। लेकिन आत्मिक कल्याण करना इतना आसान नहीं है। इस संसार में कुछ बनना इतना आसान है, लेकिन बनने से मुक्त हो जाना आसान नहीं है। तो भाई, अभी भी बनने से मुक्त हो जाओ। हां, ये बनाएंगे और तुम्हें नोच लेंगे। आप यह मत समझना कि तुम्हें बना रहे हैं। तुम्हें बना रहे हैं और तुम्हें नोच रहे हैं। बकरे को जब खूब खिलाता है आदमी, तो क्या बकरे को खिला रहा है? अगर बकरा सोचे कि मालिक बड़ा सेवा कर रहा है, मालिक एकदम बढ़िया मुझे काजू, बादाम, किशमिश, गेहूं, मक्का सब खिला रहा है, तो यह बकरे की भूल है। एक दिन ऐसी तुम्हारी भी हालत है। तुम्हें कोई भगवान बना रहा है तो आप यह मत सोचना कि तुम्हें बना रहा है। तुम्हें ऐसा काटेगा कि तुम जिंदगी भर रोओगे। खिला रहा है कोई भी। आप देख लो, कोई भी अगर किसी को खिला रहा है तो उसके पीछे कोई कारण है। गृहस्थ जीवन में देख लो, कुछ भी कोई पालता है, अगर वह खिला रहा है तो उससे ज्यादा वसूलने के लिए। तो मैं इस बात को समझ गया था। चाहे वह बहन हो, चाहे भांजी हो, वे फोटो लगा के पूछते थे। तो मुझे लगा कि यह सब इसका नाटक है। बस कामनाओं में पूछ रहा है। लेकिन मुझे क्या करना है? साधना करके निकल जाना है। और इसीलिए मैं अभी भी एकदम सरल जीवन जीता हूं। मुझे पसंद ही नहीं है। मुझे पाखंड पसंद नहीं है। मुझे झूठ पसंद नहीं है। मुझे बेईमानी पसंद नहीं है। अगर मुझे प्रत्यक्ष पता है तभी आपको कहूंगा, नहीं तो नहीं कहूंगा।
आत्मज्ञान तक पहुंचा हूं, तो मैं आत्मज्ञान तक का रास्ता बता देता हूं। परमात्मा की बात जब कोई करता है तो मैं मना कर देता हूं, क्योंकि अभी मैं खुद उससे नहीं मिला हूं। अब मेरा मिलना होगा, लेकिन जब तक मिलूंगा नहीं तब तक आपको कैसे बताऊंगा। तो आत्मज्ञान तक का रास्ता बताता हूं। और आत्मज्ञान अगर आपने कर लिया, अपने आप को, फिर किसी से कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं है। जैसे कोई स्त्री गर्भ धारण कर ले तो फिर उसे किसी की जरूरत ही नहीं है। बस वह इंतजार करे, एक दिन मां बन जाएगी। तो आत्मज्ञान के बाद आपको कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं है। एक समय ऐसा आएगा कि अपने आप ब्रह्मज्ञान हो जाएगा।
तो मेरा यही कहना है कि अगर आपको पता है तो आप बताओ, नहीं तो बोल दो मुझे नहीं पता। यह भी एक ईमानदारी है, कि मुझे नहीं पता है भाई। किसी को ठगो मत। किसी की भावनाओं को ठेस मत पहुंचाओ। आप उस मार्ग से चले नहीं और बोल रहे हो कि तुम पहुंच जाओगे। तू क्यों नहीं पहुंचा? जवाब है तेरे पास। आज इतने कथावाचक हैं, कथा कर रहे हैं। क्या वे तुम्हें मुक्त लगते हैं? लेकिन वे लोगों को आश्वासन देते हैं कथा करके कि तुम मुक्त हो जाओगे। जब तू ही मुक्त नहीं हुआ, तो वह कैसे होगा? और गारंटी खूब ले रहे हैं। लेकिन वहां भी ज्यादा से ज्यादा कामनाओं वाले जाते हैं। आत्मिक कल्याण वाले थोड़ी जाते हैं। तो मेरा यही कहना है कि आप किसी को अगर मार्ग बताओ तो वह मार्ग आप चल के वहां पहुंचे हो, तब बताओ। और नहीं तो मत बताओ, क्योंकि फंसाने का भी दोष लगेगा। इस बात का विशेष ध्यान रखो आप लोग।
आत्मज्ञान के लिए निर्विकार होना पड़ेगा। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मैं-कर्ता से मुक्त होना पड़ेगा। और उसके लिए ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग, यही आत्मज्ञान के लिए निमित्त बन सकता है। और सत्संग प्रवचन नहीं, कथा नहीं। प्रवचन मतलब महापुरुषों की वाणी। कथा मतलब समाज में उन्होंने कुछ काम किया, उसकी कथाएं सुनाई जा रही हैं। सत्संग से आपको आत्मिक कल्याण का रास्ता मिलेगा।
कुछ लेकर, समझकर मौन हो, तब तो रास्ता है। लेकिन अगर आपने समझा ही नहीं, तो मौन का क्या मतलब? पागल की तरह मौन रख लो, उस मौन का कोई मतलब नहीं होगा। अगर आपने सीखा ही नहीं कि कैसे करना है, तो उस मौन का क्या मतलब? कोई मतलब थोड़ी है। देखोगे तो गूंगा तो जिंदगी भर मौन है। कुछ हुआ क्या? मौन का मतलब समझ के मौन हो जाना, और फिर आंतरिक करते रहना, निर्विचार होना।
हां, निर्विकार होना। निर्विचार कभी नहीं हो सकते। जब तक यह शरीर है, तब तक कुछ चाहिए, और कुछ चाहिए तो विचार आएंगे। तो निर्विचार कभी नहीं हो सकते। निर्विकार हो सकते हो, निर्विचार नहीं हो सकते। अब आप एक बात बताओ। जितने भी महापुरुष हुए, उन्होंने किसी के लिए भोजन मांगा या नहीं? अपने लिए मांगा न। तो भोजन का, भूख का विचार आया तभी मांगा। क्या निर्विचार हुए? क्या निर्विकार हुए? आप यह समझिए। आजकल निर्विचार कराने का भी धंधा खूब तेजी से चला है, फल-फूल रहा है। अच्छा धंधा उसी का चलता है जो नहीं होगा। जो होगा उसका धंधा नहीं किया जा सकता। जो नहीं होगा, धंधा उसी का चलता है, क्योंकि कभी होगा ही नहीं, धंधा चलता रहेगा।
मन को लेकर लोगों ने हजारों साल से गुलाम बनाया है लोगों को। और मन शरीर के लिए काम करता है। चल ही रहा है। आप सोचो, अभी भी चल रहा है। तो मैंने यह देखा कि धंधा उसी का चलता है जिसे पता है वह कभी होगा ही नहीं। उसी का धंधा चलेगा। होगा तो धंधा क्या चलेगा? थोड़ी देर के लिए निर्विचार होगा। निर्विचार तब होगा जब आपको कुछ नहीं चाहिए। तो वह स्थिति कुछ देर के लिए बनेगी। लेकिन जब शरीर के लिए चाहिए, तो विचार आएंगे। लेकिन मैं आपको बताऊं, निर्विचार कभी हुआ ही नहीं जा सकता। कभी नहीं हुआ जा सकता। निर्विकार हुआ जा सकता। तो हमें समझ-समझ के यात्रा करनी है।
निर्विषय। निर्विषय मतलब प्रवृत्ति से निवृत्ति। प्रवृत्ति से मुक्त हो सकते हो। अपने तरीके से पाने की इच्छा का त्याग कर दो, प्रवृत्ति से मुक्त हो जाओगे। विषय को खत्म किया जा सकता है। अब आप कौन से विषय में फंसे हो? बेईमानी से अपने आप को छुड़ा सकते हो। किस विषय में फंसे हो? उससे मुक्त किया जा सकता है अपने आप को।
देखिए, एक जानकारी होती है, उसे भी ज्ञान कहते हैं। एक आत्म का ज्ञान होता है। तो समझते-समझते, समझने से मुक्त हो जाएंगे, तो आत्म का ज्ञान होगा, जिसे आत्मबोध कहा गया है।
नहीं। जब आप कर रहे थे तो आपको पता है कि यह गलत है और इसका परिणाम बुरा है। तो आप उस समय अपने आप को बचा सकते थे। आप चाहते तो बच सकते थे। इतनी समझ आप में थी।
तप अपने आप को बेईमानी से छुड़ा लेना है। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मैं-कर्ता के भाव से अपने आप को छुड़ा के अपने स्व में स्थिर हो जाना, तप है।
यहां यह समझना है। एक ईमानदारी है, एक बेईमानी। अगर आप ईमानदारी से जीते हो, आपको कर्म करने का मौका मिला और आपने ईमानदारी से किया, तो वह फिक्स है। अब फिक्स कब करते हो? जब बेईमानी करनी होती है। क्योंकि बेईमानी में ही आपको समझ का उपयोग करना पड़ता है, और तरीका अलग करना पड़ता है। ईमानदारी तो आप जैसा कर्म है वैसा कर दो, वही ईमानदारी है। तो जब आप फिक्स करते हो, तो बेईमानी। जब भी आप बेईमानी करोगे, तो समझ लो कि आप फिक्स कर रहे हो, और आप नए बंधन में बंध रहे हो। बहुत आसान है।
प्रकृति आप किसे समझते हैं? जो दिख रहा है। तो उसमें हम भी तो दिख रहे हैं। तो काम तो करना पड़ेगा। अगर प्रकृति काम करती है, तो प्रकृति तो हम भी हुए। जब तक हम इस शरीर में हैं, तो प्रकृति का हिस्सा तो मैं भी हूं। अगर प्रकृति काम करती है, तो प्रकृति किसके द्वारा काम करती है? लोगों के द्वारा ही तो निमित्त बनती है। अगर यह पेड़ है, तो पेड़ भी ऑक्सीजन दे रहा है, हजारों-लाखों जीव को भोजन करा रहा है। लेकिन पेड़ भी तो रूप में है। प्रकृति मतलब क्या? दिख रहा है। यही प्रकृति है। तो आप भी दिख रहे हो।
तो हमें मिलजुलकर अपने आत्मिक कल्याण के लिए, लोगों के लिए काम करना चाहिए, जिससे समाज का हित हो। प्रकृति काम करती है। प्रकृति आपके द्वारा ही तो काम करती है। आप भी तो प्रकृति का हिस्सा हो।
साधना की जरूरत निर्विकार कराने के लिए है, न कि परमात्मा के लिए। आप यह मत समझना कि साधना करके परमात्मा मिलता है। कुछ न करके परमात्मा मिलता है। तुम्हें करना इसलिए है कि तुमने बेईमानी करके अपने आप को विकारों से ग्रसित कर लिया। विकारों से मुक्त होने के लिए साधना करनी है, न कि परमात्मा से मिलने के लिए।
उनका कर्म ही उन्हें सजा देगा। और गलत बोलने वाले को अब मैं मौका नहीं देता। पहले मैं ब्लॉक नहीं करता था। बोला, एक साल तक इनको छोड़ दो, ये कभी तो सुधरेंगे। लेकिन मैंने देखा कि हमको तो प्रॉब्लम नहीं है, लेकिन जितने लोग मुझे समझते हैं उनको थोड़ी पीड़ा हो जाती है। तो मैंने कहा, इसे ब्लॉक ही कर दो। तो अभी जरा सा भी कोई इधर-उधर लिखता है तो मैं उसे ब्लॉक ही कर देता हूं। क्योंकि मुझे तो नहीं, लेकिन जितने लोग मुझे समझते हैं उन्हें पीड़ा हो जाती है कि गुरु जी को ऐसा बोल रहा है। तो उनको ब्लॉक ही कर दिया। ब्लॉक मतलब फिर संदेश कर ही नहीं सकते।
कोई बात नहीं, कभी न कभी समझेगा। और मैंने बताया न, मैं ब्लॉक कर देता हूं, क्योंकि कितना समय दोगे। भगवान कृष्ण ने कितनी बार कहा, भैया निन्यानवे तक तुझे नहीं मारूंगा, वादा किया। लेकिन सौ होगा तो मार दूंगा। तो सौ गाली पर फिर उन्होंने उठाया और मार दिया। तो हम भी समझने का मौका कई सालों तक दिए। लेकिन अब तुम नहीं समझोगे तो तुम्हारे पीछे कौन पड़ेगा? समझने वाले के पीछे पड़ो। जितने लोग समझना चाहते हैं, उन पर अपनी ऊर्जा खर्च करो, उन पर काम करो। अब तू समझेगा ही नहीं, तो तेरे पीछे कौन पड़े?
कर्म भी दिख रहा है, काम भी दिख रहा है, सत्संग भी। तब भी तुझे लग रहा है कि नहीं, यह नहीं है, यह नहीं है। तो इसको हटाओ। तुरंत हटाओ। क्या करोगे भाई? अगर जिस उंगली में कैंसर हो जाएगा, बहुत ठीक कराने का प्रयास करोगे। अब पता चल जाएगा कि यह ठीक नहीं होगा, तो क्या करोगे? कटवा दोगे। अपना ही अंग कटवा दोगे। तो मौका देते हैं कि भैया तू सुधर जा, सुधर जा। नहीं सुधरे तो बात अलग है।
एकदम। संकल्प यह बनाना है कि मुझे निर्विकार हो जाना है, अपने आप को निर्विकार कराना है। यह संकल्प बनाना है। और यह संकल्प क्या होगा? निर्विकार होने के बाद यह संकल्प भी खत्म हो जाएगा। ऐसा संकल्प मत बना लेना कि एक नया संकल्प पैदा हो जाए।
ध्यान मतलब, जब आप कर्म करते हो, यही ध्यान है। यह जो बैठते हो, यह ध्यान नहीं है। ध्यान यह है कि जब भी आप काम करते हो, बस आप देख लो, ईमानदारी है कि बेईमानी। बस यही ध्यान है। ईमानदारी से करो। बस यही आपको पार करा देगा। बस यही ध्यान है।
संसार में दारू भी बना दी गई है, ड्रग्स भी बना दिए गए, हेरोइन भी बना दी गई है, गुटखा, तंबाकू भी। तो इनके खाने से क्या होता है? रोगी होता है। नहीं खाना चाहिए। तो आपकी परीक्षा तब होगी जब दो विकल्प होंगे। परीक्षा कब होगी? जब दोनों होंगे।
देखो, एक प्रश्न आता है तो चार देते हैं। एक सही रहता है, तीन गलत रहते हैं। आपको चार में से एक पर चुनना है। उसमें से एक सही भी है। अब तीन गलत क्यों दिए? तीन गलत को हटा देना चाहिए था क्या? आता है न, क, ख, ग, घ। आपको उनमें से सही उत्तर चुनना है, और तीन गलत हैं। अब आप कहोगे, तीन क्यों दिए? एक ही देना चाहिए था। तो एक ही देना चाहिए था, तो तुम्हारी समझ की परीक्षा कैसे होती कि तुम्हारी समझ कितनी है, तुम्हें याद है कि नहीं? तो तीन गलत दिए गए, एक सही। तब पता चलता है कि तुम्हें याद है कि नहीं, और तुम्हें आता है कि नहीं। तो भाई, गलत और सही दोनों समाज में चीजें हैं। तभी पता चलेगा तुम किस तरफ जा रहे हो। यही तो संसार है।
ऐसे लोग भगवान कृष्ण को भी मिले हैं। सबको मिले हैं। ये तीन प्रवृत्तियां हैं। देव प्रवृत्ति, राक्षस प्रवृत्ति, और सात्विक प्रवृत्ति। रजोगुण, तमोगुण, सतोगुण। तो जब भी आप समाज में काम करोगे, जब भी आपके द्वारा काम होगा, तो आपको कोई न कोई आपकी आलोचना करेगा, पक्का। आप चाहे तमोगुण अपना लो, चाहे रजोगुण अपना लो, चाहे सतोगुण अपना लो। इस समाज का उद्धार सतोगुण वाले से होता है। रजो और तमो दोनों गुण वाले भटकते रहते हैं, और लोगों को भटकाते रहते हैं, मान-सम्मान के चक्कर में।
तीन प्रवृत्ति हैं। राक्षस प्रवृत्ति, देव प्रवृत्ति, मानव प्रवृत्ति। मानव प्रवृत्ति ही समाज में कुछ कर पाती है। सात्विक प्रवृत्ति अपनाओ। तो आप जब भी कुछ करोगे, आपकी आलोचना होगी ही होगी, क्योंकि तीन प्रवृत्ति हैं और तीनों प्रवृत्ति के लोग हैं। तो आलोचना से मत डरो, गाली से मत डरो। बस अपना काम करो। और आपको यह देखना है कि मेरे काम के द्वारा समाज का हित हो रहा है। बस, बात खत्म।
जब आपको अपने तरीके से चाहिए, आप इच्छाओं में हो, कामनाओं में हो, तो आत्मा ही जीवात्मा है। और जब आप इच्छाओं और कामनाओं से मुक्त हो गए, तो आत्मा अपने आप में स्थिर हो गई, परमानंद में। और देखिए, जितने लोग भी उस परम स्थिति पर उपलब्ध हुए, तो उन्होंने भी तो समाज में इंद्रियों द्वारा ही ज्ञान दिया। उन्होंने बुद्धि का उपयोग किया।
हां। अगर उसकी इच्छा है, और आप उसके बच्चों का पालन-पोषण कर सकते हो, और सामने वाले की भी इच्छा है, उसकी सहमति है, तो कर सकते हो। उसे भी एक सहारा मिल जाएगा।
अनुष्ठान का कोई मतलब नहीं है। समाधि के लिए तो कुछ नहीं चाहिए। आओगे तो समाधि लग जाएगी। कर्म करो। अनुष्ठान से कभी समाधि नहीं होगी। अनुष्ठान से आत्मज्ञान नहीं होगा।
अगर आप बढ़ा सकते हो तो बढ़ाओ। लेकिन धन का भी जितना आपसे हो सकता है, करना ही चाहिए। एक रुपए से लेकर। अब तुम मोबाइल पर लाइव देख रही हो, इसका मतलब रिचार्ज भी कराती होगी। तो ऐसा नहीं कि लाखों-करोड़ों हमको करना है। हमें जिस लायक मैं हूं, मुझे सहयोग करना ही चाहिए, चाहे वह एक रुपए का क्यों न हो। क्योंकि मैं उसके काम का उपयोग कर रही हूं, तो मुझे भी सहयोग करना ही चाहिए।
अगर मैं किसी के काम का उपयोग कर रहा हूं, तो मैं कुछ तो लायक हूं, उपयोग कर रहा हूं। इसका मतलब मेरे अंदर कोई क्षमता है। नहीं तो मैं उपयोग भी नहीं कर सकता। जैसे मंद बुद्धि है, तो मंद बुद्धि थोड़ी उपयोग कर पाएगा ज्ञान का। वह तो बस जितने में उसका जीवन चल जाए, जितने में शरीर की जरूरत, उसी में रहता है। अगर आप किसी के काम को उपयोग करके अपनी समझ को विकसित कर रहे हो, आपको लाभ हो रहा है, तो हमारी योग्यता के अनुसार, उसके काम के अनुसार, उसे जरूर सहयोग करना चाहिए।
एक जैसी है। अगर एक ही होती, तो उनको जब ज्ञान हो जाता तो तुम्हें भी हो जाता। एक जैसी है। अगर एक ही होती, तो हमारा और तुम्हारा अगर एक ही शरीर होता, तो तुम खाओ तो हमारा भी पेट भर जाता, हम खाएं तो तुम्हारा भी। ऐसा नहीं होता। तो एक जैसी है आत्मा, एक नहीं है।
एक सिक्के के दो पहलू हैं। क्योंकि अगर मन ही नहीं काम करेगा, तो आप सोच भी नहीं पाओगे। सोचोगे कैसे? जैसे मोबाइल चलाते हो। अब अगर तीर काम न करे, तो कोई फाइल नहीं खोल पाओगे। अब फाइल ही नहीं है, तो तीर भी क्या करेगा? और फाइल में जितनी जानकारी है, वही खोलेगा। और तीर के माध्यम से आप और जानकारी डाल सकते हो। लेकिन तीर ही सिर्फ माध्यम बनेगा। लेकिन अपलोड करने की उसमें अगर सुविधा नहीं है, तो फिर तीर भी क्या करेगा? तो सब जरूरत है।
नहीं, अलग-अलग हैं। जैसे हाथ है। अब किसी ने कहा, यह हाथ है। तो कहा जाएगा, यह हाथ है। हां, हाथ है। लेकिन अब पूछा जाएगा, यह क्या है? तो तुरंत बोला जाएगा, उंगली है। लेकिन इसको पहले पूरा हाथ ही बोल रहे थे। अब इसको उंगली बोल रहे हो। जैसे इसको बोला जाए, यह क्या है? तो यह शरीर है। यह क्या है? पैर है। यह क्या है? हाथ है। यह क्या है? उंगली है। यह क्या है? बाल है। लेकिन पहले एक शरीर था। तो वैसे ही, जब आप गहराई में जाओगे तो सब अलग-अलग हो जाएंगे। और देखोगे, सब एक ही हैं, और एक-दूसरे का हिस्सा हैं। शरीर का हिस्सा हाथ है। हाथ का हिस्सा उंगली है। लेकिन अब उंगली को गले का हिस्सा नहीं बोल सकते। शरीर का हिस्सा बोल सकते हो। लेकिन कहा जाए कि क्या पैर का हिस्सा यह उंगली है, हाथ की उंगली? नहीं। क्या पैर का हिस्सा यह कान है? नहीं। लेकिन शरीर का हिस्सा है। शरीर का हिस्सा है, लेकिन पैर का हिस्सा कान नहीं है। है न? लेकिन है सब एक ही में।
तो मन शरीर के लिए काम करता है। बुद्धि शरीर में है, और बुद्धि के द्वारा हम अच्छे-बुरे को अर्जित करते हैं। लेकिन मन उसमें निमित्त बनता है। बुद्धि हटा दी जाए तो भी ग्रहण नहीं कर पाएंगे। मन हटा दो तो भी नहीं कर पाएंगे। तो एक सिक्के के दो पहलू हैं। इसे समझने का प्रयास करिए।
अगर वह समझकर अपना सकता है, लेकिन मजाक कर रहा है, अपना नहीं रहा है, तो ऐसे व्यक्ति का त्याग कर दो। सब लोगों को सब ज्ञान है, बस उस रास्ते पर लोगों को चलना नहीं है। लोग सयाने हैं। सब खेल खेले राम गोसाईं, अपना बैठे दास की नाहीं।
बेईमानी मत करो। बेईमानी नहीं करोगे तो आगे का कर्मबंधन नहीं बंधेगा, और पिछला सत्कर्म द्वारा खत्म हो जाएगा। पुराना खत्म करना है तो नया बनाना बंद करो। पुराना, सत्कर्म और ईमानदारी से जियोगे तो खत्म हो जाएगा।
जिसलिए हम मिले हैं, जिस उपदेश को लेकर हमारा मिलना हुआ है, जब तक वह उपदेश पूरा न हो जाए, तब तक साथ। और उपदेश पूरा होने के बाद, अगर मैं कुछ कर रहा हूं और आगे कोई उपदेश नहीं है, तो फिर साथ भी छोड़ने की क्या जरूरत है? आप उसके साथ कुछ काम करो।
हम जिसके लिए मिले हैं, उसके साथ तब तक रहेंगे जब तक मेरा उपदेश पूरा न हो जाए। और जब मेरा उपदेश पूरा हो जाए, और अगर कोई नया उद्देश्य बने, अगर उसके द्वारा पूरा हो जाए, तब तो ठीक है। नहीं तो वह खुद कहेगा, आगे जाओ। और अगर मेरा उपदेश पूरा हो गया और कोई उद्देश्य नहीं है, तो उसके साथ मिलकर सेवा करो। बात खत्म।
विकार मतलब, जब आप देखो कि आपको किस स्वाद के लिए तड़प है। यह पता लगाना आपको है। तो स्वाद भरा भोजन छोड़ना पड़ेगा। तब आप कुछ भी देखोगे, आपने जितना स्वाद लिया है, सब सताने लगेगा। लेकिन जब आप वह भोजन कर रहे हो, तो स्वाद सताएगा नहीं। आप बिना स्वाद वाला भोजन चालू कर दो। नमक, मसाला, कुछ न मिलाओ, और आप खाने लगो। तो स्वाद वाला भोजन आपको खूब सताएगा। जो-जो स्वाद आपने लिया है।
तो आपने बेईमानी के द्वारा अनेक तरह के विकार जमा किए हैं। जब आप बेईमानी करना छोड़ोगे, तब जितने विकार हैं सब निकलने लगेंगे। जैसे आप स्वाद भरा भोजन करना छोड़ दो, तो जितने स्वाद हैं सब बाहर आने लगते हैं। अगर आपसे मैं कहूं कि अभी स्वाद के लिए तड़पो, तो तड़पोगे नहीं। लेकिन दो दिन भी आप बिना स्वाद वाला भोजन करो, तो तीसरे दिन स्वाद के लिए तड़पने लगोगे। दूसरे दिन ही तड़पने लगोगे।
तो कितने विकार हैं, जब आप बेईमानी छोड़ोगे, ईमानदारी और सत्कर्म अपनाओगे, तो आपके विकार आपको दिखने लगेंगे, और सत्कर्म के द्वारा उनकी धुलाई होगी। अनेक तरह के विकार हैं, अनगिनत। जब करना छोड़ोगे, तब समझ में आएगा।
ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। मूल ईमानदारी है, उसके बाद सत्कर्म है। सत्कर्म आपको पहुंचाएगा सत्य तक, ईमानदारी के साथ। दोनों। अगर मान लो आपने ईमानदारी अपना ली और सत्कर्म नहीं किया, तो भी वहीं रुक जाओगे। पिछला कैसे नाश होगा? और आपने सत्कर्म अपना लिया, लेकिन ईमानदारी नहीं अपनाई, तो भी पतन ही होगा। हर स्थिति में। तो दोनों, ईमानदारी और सत्कर्म, और सत्संग। इसलिए सुनना है कि मैं राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और कर्ता के भाव से कैसे छुड़ाऊं अपने आप को। यह सत्संग आपकी सहायता करेगा।
बस बैठना है, बस यही भाव से बैठना है कि मुझे अपने आप को निकाल लेना है। वह चिंतन चालू हो जाएगा। देखते रहो उसको। अगर राग-द्वेष बन रहा है, तो क्यों बन रहा है? जाओ उसके अंदर। किसी से उम्मीद है? किसी की याद सता रही है, तो क्यों सता रही है? कोई इच्छा है? कोई अपेक्षा है? कोई उम्मीद है, दिया-लिया है? जाओ गहराई में। क्या मुझे यह चाहिए? क्यों उनकी याद सता रही है? करो प्रश्न अपने आप से। यही चिंतन है।
आप अनुमान लगाना छोड़ दो। कर्ता का भाव बनेगा ही नहीं। अगर कोई काम कर रहे हो, तो परिणाम आने के बाद बताओ। और परिणाम आने के पहले जब बताते हो, तो कर्ता का भाव प्रकट होता है। तो जब कोई भी काम करो, परिणाम आ जाए तो बताओ। या तो बोल दो, मुझे परिणाम अभी नहीं आया है।
एकदम सही हो रहा है। और लोभ से मुक्त होने के लिए, लोभ तब आता है जब आप अपने से ज्यादा किसी के पास कुछ देखते हो। आप देखो, आपकी योग्यता है क्या। तो लोभ काम नहीं करेगा। और आपके जीवन में उसकी जरूरत है क्या।
नहीं। यहां निशुल्क व्यवस्था है। यहां का नियम पोस्ट में दिया गया है, पढ़ लेना। कम से कम आओगे तो सात दिन रहना पड़ेगा, या सात दिन से ज्यादा, आप आजीवन रह सकते हो। भोजन और रहने की व्यवस्था निशुल्क है, अगर आप यहां नियम में रहोगे तो।
गौतम बुद्ध ध्यान से नहीं तरे। गौतम बुद्ध करते-करते जब थक गए, तो वह पेड़ के नीचे बैठ गए। जब बोले, जब उपलब्धि होगी तो उठूंगा, नहीं तो नहीं। तो वह हठ में चले गए। ध्यान से उनका कल्याण नहीं हुआ है। और उन्होंने जीवन भर कहा, दया, करुणा और प्रेम में जीना चालू करो। उन्होंने कभी भी अपने शिष्यों से ध्यान नहीं करवाया। अब जरा ध्यान को समझो।
धारणा मतलब, मुझे धारणा बनानी चाहिए, क्योंकि मुझे कुछ चाहिए तो धारणा बनानी पड़ती है कि मुझे यह चाहिए। उसे धारणा कहते हैं। तो मुझे निर्विकार की धारणा बनाना है। तो धारणा जब बनाओगे कि मुझे निर्विकार होना है, तो निर्विकार होने का काम करोगे। तो धारणा ध्यान में लग गई, कि मुझे निर्विकार होना है। तो धारणा, ध्यान, और जैसे निर्विकार होगे समाधि लग जाएगी। तो उस समाधि लगने के बाद तुम, मतलब आत्मज्ञान, और तुम्हारे बाद फिर परमात्मा। तो धारणा, ध्यान, समाधि, तुम, ब्रह्म। ऐसे।
और आत्मज्ञान और ब्रह्मबोध में फर्क है। आत्मज्ञान का मतलब खुद का ज्ञान। और ब्रह्मज्ञान का मतलब जिससे आप हो, उसका ज्ञान। आप भी तो किसी से हो, क्योंकि स्वतः तो हो नहीं। स्वतः होते तो खोज की जरूरत नहीं। समझना। अगर मैं स्वतः अपने आप से होता, तो मुझे फिर किसी की खोज करने की आवश्यकता नहीं होती। अगर मैं किसी को खोज रहा हूं, मुझे कुछ चाहिए, इसका मतलब मैं कहीं और से हूं। तो आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान अलग-अलग हैं। आत्मज्ञान का मतलब खुद का ज्ञान, और इसके बाद ब्रह्मज्ञान मतलब जहां से मैं हूं उसका ज्ञान।
हां। एक परम सत्य में, एक अहम में। अर्थात एक जीव वाली मैं, एक अहम। कुछ होना चाहता है, किसी को नीचा दिखाना चाहता है, बड़ा बनना चाहता है। वह मैं तभी खत्म होगा जब बनने की इच्छा का त्याग होगा।
भोगना तो होना चाहिए। लेकिन उचित तरीके से। अगर बीमारी आ गई, तो पहले जितना इलाज करना है, इलाज कराओ। नहीं तो फिर भोग सकते हो।
जैसे रामकृष्ण परमहंस को कैंसर हुआ। तो जब वे भोजन कर रहे थे, तो उनकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। तो शिष्यों ने कहा, गुरुदेव बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। तो बोले, मैं इस मुंह से नहीं खा पा रहा हूं, तो मैं अनेक मुंह से निवाला कर रहा हूं, भोजन कर रहा हूं। तुम्हें तकलीफ की जरूरत नहीं है। लेकिन शिष्य थे, तो उन्होंने स्वामी विवेकानंद से प्रार्थना की कि मां से तुम सीधा बात करते हो, मां से कहो कि गुरु जी का कैंसर ठीक कर दें। तो मां के पास स्वामी विवेकानंद जाते हैं। कहते हैं, गुरु जी का कैंसर ठीक कर दो। बोलीं, अगर कैंसर मैं ठीक कर दूं, तो कैंसर के भोग के लिए फिर इसे आना पड़ेगा। तो मैं चाहती हूं कैंसर का भोग भोग के यह मोक्ष को प्राप्त हो जाए। अगर कैंसर बच गया, मैं तो ठीक कर सकती हूं, लेकिन यह गलत है, क्योंकि उसे फिर भोगना पड़ेगा। भोगना उसे पड़ेगा। फिर भी रामकृष्ण परमहंस ने इलाज करवाया। तो उचित तरीके से इलाज करवाओ। गलत सहारा मत लो। शक्ति का सहारा लेकर, तंत्र-मंत्र का सहारा लेकर इलाज मत कराओ।
जैसे लक्ष्मण को बाण लगा। लक्ष्मण तो शेषनाग के अवतार माने जाते हैं। राम में ताकत थी, हनुमान में ताकत थी। हनुमान जी शंकर के रुद्र अवतार कहे जाते हैं। वे ठीक कर देते। लेकिन फिर भी संजीवन बूटी लाए, वैद्य बुलाया, उचित तरीके से इलाज कराया। तो अपने ऊपर अगर कोई भोग आता है, कुछ भी है, तो अगर उसका इलाज करा सकते हो तो इलाज कराओ। इलाज के बाद नहीं हो रहा है, तो उसको भोगना ही पड़ेगा। लेकिन तंत्र-मंत्र का सहारा लेकर अपने रोग को ठीक मत करो। नहीं तो आपको बाद में ज्यादा भोगना पड़ेगा। बात समझ गए?
सात्विक प्रवृत्ति के लक्षण यह हैं कि हम जरूरतमंद की सेवा करते हैं, और किसी की भावनाओं को समझकर उसे जवाब देते हैं। यह सात्विक प्रवृत्ति के लक्षण हैं।
अब जैसे उस दिन बाबा ने आपको छुआ। यह बात आपको पता है कि आपको छूना अच्छा नहीं लगता, लेकिन बाबा को यह बात पता नहीं थी। तो बाबा आए और उन्होंने आपको ऐसे छुआ। लेकिन आपको बुरा लगा। यह तामसी प्रवृत्ति के लक्षण हैं। आपको सात्विक प्रवृत्ति में रहना चाहिए था कि भाई, उनको नहीं पता था। तो पहली बार आपको बताना था कि बाबा, यह बात है, यह काम है। अब आप क्या करते, कि मुझे छूना पसंद नहीं। अगर मुझसे कोई काम पड़े तो मुझसे दूर से बोल देना। ये सात्विक प्रवृत्ति के लक्षण हैं। लेकिन आपने उनके साथ क्या बर्ताव किया? तामसी। उनको थोड़ी पता था। तो यह सात्विक प्रवृत्ति के लक्षण हैं। यह हमें बता देना है।
और सात्विक प्रवृत्ति वाला हमेशा जनकल्याण में लगा रहता है। जरूरतमंद की सेवा करता है। सत्कर्म में लगा रहता है। सत्संग सुनता है। अपना कल्याण करता है, और अपना कल्याण होने के बाद दूसरों को कल्याण का मार्ग बताता है। यही सात्विक प्रवृत्ति के लक्षण हैं।
और खानपान। अगर मैं कुछ खा रहा हूं और सामने वाले को तकलीफ नहीं हो रही है, तो वह सात्विक प्रवृत्ति। अगर मैं खा रहा हूं और किसी जीव को हमारे द्वारा तकलीफ हो रही है, तो वह तामसी प्रवृत्ति है। तामसी प्रवृत्ति सिर्फ दुख देती है। तामसी और राजसी दोनों प्रवृत्ति दुख देती हैं। सात्विक आनंद में हो जाता है। और सात्विक प्रवृत्ति वाला ही परमात्मा तक पहुंचता है। तामसी और राजसी वाले बस संसार में, जगत में, बड़ा बनके घूमते रहते हैं। कभी राजा, कभी रंक। इनको कुछ चाहिए होता है।
हरि ॐ आप किस लिए बोलते हो? बस ऐसे ही चलता है, ऐसे ही हरि ॐ निकलता है। चलो, कोई बात नहीं, बोलते रहो। एक संबोधन है। कोई जय माता दी, कोई नर्मदे हर, कोई राम-राम, कोई हरे कृष्ण। कोई बात नहीं। शुरुआत के लिए कुछ तो बोलना पड़ेगा। फोन लगाया तो हेलो बोलने से अच्छा है जय माता दी बोल दो, नर्मदे। उससे कुछ भाव ही शुद्ध होगा। बस यही है। कुछ शुरुआत करने के लिए कुछ न कुछ तो संबोधन करना पड़ेगा। अच्छी शुरुआत अच्छी हो। जय माता दी, कुछ भी बोल दो। जो आपको अच्छा लगे, और सामने वाले को तकलीफ न हो।
बस ईमानदारी अपना लें। जरूरत क्या है? जरूरत में जीना। जरूरत में जीने से ही आपका उद्धार होगा, अपनी योग्यता के अनुसार।
जरूरत का मतलब होता है कि जितनी मेरी जरूरत है, और अपनी योग्यता के अनुसार अगर उसमें जियोगे तो बंधन नहीं होगा। अब देख लो, आपकी क्या-क्या जरूरत है। कपड़े में, आपके पास अगर दो हैं तो दो में रहो, ईमानदारी से। आपके पास हजार है तो हजार में रहो। हो सकता है आपकी जरूरत हो और योग्यता न हो, तो योग्य बनो। अयोग्यता में अगर आप कुछ लाओगे तो फंस जाओगे। जरूरत और योग्यता, दोनों होना चाहिए। अगर जरूरत है, योग्यता नहीं है, तो जरूरत छोड़ दो। और जरूरत है, आपकी योग्यता है, ईमानदारी से, तो उसे ला के ग्रहण करो।
अगर कोई पूछ रहा है कि क्या अच्छा है, और हमने कह दिया कि अच्छा है, तो दोनों गिरेंगे। पूछने वाला भी गिरेगा और बताने वाला भी गिरेगा, क्योंकि उसका भी राग आएगा। पूछने वाला तो उसमें लिप्त है। अब यह पूछने वाले की स्थिति पर निर्भर है कि वह किस स्थिति में है। ऐसे ही पूछ लिया, उसका कोई मतलब नहीं रखता, तो बताने वाला किस भाव से बता रहा है? क्या उसको खुश करने के लिए बता रहा है, या सच में अच्छा है इसलिए बता रहा है?
अगर हमारा कोई भाव नहीं है कि हमेशा अच्छा बता करके मुझे कुछ लगे या न लगे, तब कह दिया कि अच्छा है। अब आपने किस भाव से कहा है, वह भाव मायने रखता है। अभी आप राग-द्वेष में हो, तो ठीक शब्द का प्रयोग करोगे तो बेहतर होगा। अच्छा बोलने का है भी नहीं। मैं में ही ज्यादा हम लोग रहते हैं।
अगर मेरा कोई भाव नहीं है उसे खुश करने का, तो अच्छा बोलने की जगह ठीक बोलने में क्या जाता है? अगर मैं ठीक नहीं बोल पा रहा हूं और अच्छा बोल पा रहा हूं, इसका मतलब कुछ न कुछ सामने वाले को खुश करना चाहता हूं। जब तक यह शब्द मिला नहीं था तो बात अलग थी। लेकिन अब तो ठीक मिल गया। ठीक मिल गया, तो ठीक क्यों नहीं बोला जा रहा है? अच्छा लगना चाहिए, यह भी लगा तो राग आ गया। तो ठीक शब्द का प्रयोग करो।