हां, मैं अभी तक तो एक ही में रहता हूं, आगे का पता नहीं। देखो, अपने पास (इतना) समय (कहां था कि) दो कपड़े रखेंगे, उसको सुखाएंगे — तो उसमें मेरा समय तो जाएगा; फिर उसके लिए एक बैग रखना पड़ेगा। तो मैं पूरी तरह खुला निकलना चाह रहा था, इसीलिए मैं एक कपड़े में रहा। (सुखाना —) शरीर पे ही सूखता है, पहने-पहने ही; मैं तो कई-कई (दिन) निकालता भी नहीं हूं। इसलिए कि समय का अभाव (था) — मेरे पास इतना समय नहीं था, क्योंकि उसमें समय देना पड़ता है ना। (तो समय कहां लगाते हैं?) बस खोज में — पूरा समय इसी में लगाना है; उठते, जाते, सोते, बैठते, हर काम उसी के लिए।
साहब, अपने आप सब — जैसे भी हो जाए भाई। पत्ता उठाने से हो जाए, तो पत्ता उठा लूंगा; हमें क्या पता कैसे हो जाएगा। मैं जाता था, (तो) कोई बोलता था — जाओ, वहां माथा टेको, तो मैं वहां चला जाता था; मुझे थोड़ी नहीं पता था कैसे हो जाएगा। जितनी मेरी सामर्थ्य थी, जितना लोगों ने बताया, जितना मैंने उचित समझा, वो कर डाला। (उचित समझना —) ऐसा नहीं कि मुझे लगा कि ये करने से मैं उठूंगा, तभी (करूंगा); (बल्कि) मुझे लगेगा कि ये करने से गिरूंगा, तो मैं नहीं करूंगा। मुझे हर पल अपनी स्थिति देखनी है — गिर रहा हूं, उठ रहा हूं। इसका विशेष ध्यान रखना है कि ये करने से क्या होगा — उठूं या ना उठूं, लेकिन गिरूंगा तो नहीं ना — तब करूंगा।
(गिरना-उठना मन की स्थिति से पता चलता है?) आपके कर्म से पता चल जाता है। (भीतर से ग्लानि लगने लगती है, मन बेचैन होने लगता है —) कुछ तो होता है ना, पता चल जाता है। तो जब भीतर समझ में आने लगे, तो (वो) काम ही मत करो ना। (पर आदत हो जाती है —) तो भोग लो, कोई बात नहीं — आदत है तो भोगो; आदत है, (तो) बनाए रखना, छोड़ना नहीं — (पर) नुकसान आएगा तो बहुत भारी। (जब तकलीफ देगी तो अपने आप छूट जाएगी?) हो सकता है तकलीफ में भी जीने की आदत हो जाए। एक नशेड़ी नशा करता है, इंजेक्शन मारता है, मरने दम तक कहता है कि अब इसे नहीं छोड़ पाऊंगा, मर जाऊंगा — और मर जाता है। तो अगर ऐसी आदत है, तो कोई बात नहीं — मरोगे तुम। झेलने की ताकत तुम्हें जितनी है, उतना कर जाओ, जो भी करना। अरे भाई, शेर सामने आ जाएगा, तो तुम क्या कर लोगे? अब कहोगे — भाई, झेलने की ताकत है या नहीं? अब तुम खत्म। तो एक समय ऐसा आता है, आदत आपको मार देगी। जंगल में जाने से पहले ही सचेत हो जाते; लेकिन जब शेर सामने आ गया, तो अब जो करना है, शेर करेगा। आदतें हमें मार देती हैं। मरने के पहले आदतें छोड़ दो — बुरी आदत — या तो फिर मर जाओ। क्या फर्क पड़ेगा? दुनिया का क्या होगा? मर जाओगे — तुम्हारे पहले भी (दुनिया) चल रही थी, तुम्हारे बाद भी चल रही है। वो बोला ना कि (पत्नी) गई, (तो) दूसरी शादी — तो तुम्हें लगता है कि मैं हूं (तो दुनिया है)? अरे, तुम्हारे जैसे कितने आए और गए। (सोचोगे कि) मैं ज्ञान दूंगा तो लोगों को (मिलेगा) — अरे, तुम्हारे जैसे कितने आए-गए; आपको मौका मिला है; तुम्हारे पहले भी ज्ञान देके गए, बाद में भी देंगे। तो तुम ईमानदारी से, जिस काम को लिए हो, करो — नहीं करोगे तो भी होगा, कर दोगे तो भी होगा; आप ये मत समझना (कि तुम्हारे बिना नहीं होगा)।
अब वो देखना है — ये देखना है कि वो क्या दे रहे हैं। अगर वो मुक्ति का ही मार्ग बता रहे हैं, दुखों से मुक्ति का मार्ग — उनका भाव है — अब जहां तक पहुंचना होगा, पहुंचेगा। (यह कामना हो गई ना?) देखिए, कामना है, लेकिन कामना क्या है? जैसे मान लीजिए पकड़ना कामना है, तो छोड़ना (कामना नहीं है)। अगर समाज-हित के लिए कोई कार्य कर रहा है, और आत्मिक कल्याण का कार्य कर रहा है, तो उसे तो कुछ नहीं चाहिए — तो इच्छा कहां हुई? (क्या हम दूसरों के लिए कुछ करते हैं?) ऐसा बहुत होता है; आप भी करती हैं। जब आप जरूरतमंद की सेवा करते हो, वहां कोई इच्छा काम ही नहीं करती है। (बिल्लों को उठा लाए —) तो ये निष्काम सेवा हुई। (लोग कहते हैं सब अपने लिए करते हैं —) कहने दो ना, कहने से क्या हुआ? वो वही कहते हैं, जो नहीं करते, जिनके अंदर मानवता नहीं होती, वो कह देते हैं। (तड़प तो अपनी है —) तड़प अपनी नहीं है, उसकी (तड़प) देख के (आपकी) तड़प है। आपके पास ना दुख है, ना सुख है, आपके पास कुछ नहीं है। जैसी सामने स्थिति बनती है, वैसा आप फील कर पाते हो, आपकी समझ के अनुसार। और समझ भी आपको बाहर से मिली है। अगर रिएक्शन के लिए कुछ है, और आपके पास वो समझ नहीं है, तो (रिएक्शन) होगा भी नहीं। कोई घटना घट गई, उस घटना को समझने की क्षमता आपको नहीं, तो रिएक्शन नहीं होगा — इसके लिए भी क्षमता चाहिए, समझ होनी चाहिए। जैसे एक व्यक्ति ने आपको बुरा बोला, (और) वो भाषा आपको नहीं आती — बोल तो दिया उसने, लेकिन आप रिएक्शन नहीं दे पाएंगी, आप बोलेंगी — क्या बोले? लेकिन वो भाषा आती है, तो तुरंत रिएक्शन होगा — आप चाहे जवाब दें, प्रतिक्रिया दें या ना दें, लेकिन रिएक्शन हो गया। (उस रिएक्शन को पहले समझना है?) समझ के ही आप रिएक्शन दे रही हैं — आपकी जैसी समझ थी, आपने (वैसा) समझा। वो सारी चीजें हमारे अंदर ही होती हैं, बस घटनाक्रम बाहर होता है, निमित्त बाहर से बनता है। और ये रिएक्शन भी (जिस समझ से) हो रहा है, वो भी समझ बाहर से मिली है — आपके पास कुछ नहीं है। (दूसरों को देख के रिएक्ट करते हैं?) आपको (जो) समझ मिली है, वो (कहीं ना कहीं से) सीखे हो।
बच्चे के अंदर भूख है — खाना नहीं भूला, सफाई करना हम भूल गए; गड़बड़ी ये हो गई। खाना नहीं भूल पाए, हम धोना भूल गए — देखो बच्चे, खाना याद है, (पर) ऐसे धो, ऐसे धो (सिखाना पड़ता है)। हमें बंधन बांधना खूब याद है, (बंधन) निकालना-छुड़ाना नहीं आता — इसके लिए गुरु चाहिए, जैसे मल-मूत्र धोने के लिए मां चाहिए; मां ही सिखाती है ना।
काश मैं नेचुरल जीता! जैसे आप बड़े हो गए, तो हमें जरूरत में जीना चाहिए ना — हम लालच में क्यों गए, संचय में क्यों गए, बड़ा बनने में क्यों गए, बेईमानी में क्यों गए, हम नेचुरल क्यों नहीं जिए? अगर आप नेचुरल जीते, तो पहुंच जाते। (अब भी) नेचुरल आप जियो ना, तो आप पहुंच जाओगे। ये शरीर ही मिला है उससे मिलने के लिए; लेकिन आप ही ने कर्मों का बंधन बांध दिया, आप ही ने बीमारी करके बांध दिया। आपने कुछ ऐसा किया कि आपका जीवन अशांत हो गया — वही कर्म बोल रहे हैं। कर्म कर्म होता है, आप चाहे अच्छा करो, चाहे बुरा। (ऐसा ज्ञान मिल गया तो निकाल लेंगे —) आप निकाल लेंगी। जैसे मां ने सिखा दिया कि मल-मूत्र को कैसे साफ करना है — आज भी मल-मूत्र हम करते हैं, लेकिन गंदगी नहीं लगी है; लेकिन बचपन में जब मैं नहीं सीख पाया था, तो फिर वही मल-मूत्र हाथ में लेके, हो सकता है उसी को खाने में लग जाए, छोटा बच्चा तो कुछ भी (कर ले), क्योंकि उसके पास वो समझ नहीं है; लेकिन खाने वाली समझ है — देखिएगा। हमारी जरूरत की वजह से हम खाना सीखे, लेकिन धोना हमें याद नहीं है। वैसे ही हमने क्या किया? लालच में आके बंधन बांधने लगे, लेकिन छुड़ाना मुझे नहीं आता — उसके लिए गुरु चाहिए। मुझे बांधना खूब आता है, और बंधवाने वालों की संख्या तो बहुत है, लेकिन छुड़ाने वालों की संख्या बहुत कम है, उनकी बातें समझ में ही नहीं आतीं। तो जैसे मल-मूत्र धोना आपको मां ही सिखाएगी — और कोई अगर सिखाए, तो घिन आएगी, समझिएगा — तो ऐसे ही सद्गुरु बहुत कम हैं। वो आपके कचरे को कैसे धोना है, कैसे विकारों से मुक्त होना है, वो आपको सिखाएंगे; क्योंकि उसमें बड़ी मेहनत लगती है, इसलिए सब नहीं करते हैं। (और) वही करवा सकता है, जिसे कुछ नहीं चाहिए — वही (जैसे) मां बच्चे को पालती है; अगर उसे कुछ नहीं चाहिए, तभी पाल पाएगी; अगर कुछ चाहिए, तो फिर अलग तरीके से पालेगी, जिस तरीके से बच्चे को लालच आ जाए, तो वो भी सही ज्ञान नहीं दे पाएगी। गुरु एक स्थिति है — लालच से मुक्त हुआ, तब जाके गुरु-स्थिति है। (बहुत से गुरु हैं जो नहीं हैं —) वो बने हुए गुरु हैं। अगर कोई (बच्चे को) गोद ले ले, आप उसे मां बोल देंगी — (पर) कोई गोद ले ले, तो वो मां हो गई क्या? मां तो (वो), जब उसके अंदर से ममत्व पैदा होगा — ऐसा नहीं कि शरीर से पैदा होगा — ममत्व जब पैदा होगा, और उसे उस बालक से कुछ नहीं चाहिए, उसे मां कहा जा सकता है। (मां को भी तो भविष्य की कल्पना करके चाहिए —) मैं मां की बात कर रहा हूं, मैंने मां की व्याख्या कर दी — भविष्य की कामना करने वाली मां नहीं है; (मां में) तो कामना नहीं रहती।
ये आपको ही समझना है। जैसे जीवन में दो (चीजें) सबसे जरूरी हैं — एक भोजन, एक सांस। सांस अपने आप आ-जा रहा है; एक जरूरत हमें पूरी करनी है ईमानदारी से — भोजन। अब यह आपको जरूरत है या नहीं — हो सकता है 40 दिन में एक ही बार आता है, और एक बार आप उससे मुक्त करा लो एक दिन अपने आप को, कि 40 दिन में एक ही बार आ रहा है — वो देख पाओ तो देख पाओ, वो आप ही के ऊपर है। (ये आगे 15 दिन में हो सकता है —) वो हर घंटे में (भी) हो सकता है। वो आप देख लो, वो आपको देखना है। मेरा सलाह देना भी ठीक नहीं है — वो पर्सनल चॉइस है; मैं आपको सलाह नहीं दे सकता, ये व्यक्तिगत विषय है। देखो ना, आपको जरूरत है या नहीं। अगर (जरूरत) बता रहे हैं कि है, तो कर लो ना — आध्यात्मिक यात्रा में बाधा थोड़ी ना है; अध्यात्म से उसका कोई लेना-देना नहीं। (गलत रास्ता चुन लिया तो?) सुनिए — जीवन में जब भी आप कुछ करते हो, तो अंतरात्मा से जवाब मिल ही जाता है कि आप गलत कर रहे हो कि सही कर रहे हो, मिल ही जाता है। (मिलते वक्त देर हो गई तो?) कोई बात नहीं, भोग लो। (वैसे) कर्म से पहले ही मिल जाता है; और नहीं मिला, तो आप मंदबुद्धि या पागल हो — और मंदबुद्धि-पागल को सजा नहीं दी जाती।
(युवक से) चलिए बेटा, आपसे पूछ रहा हूं — आपने शादी नहीं की, शादी वाला काम किया — हां या ना, बस खत्म। (साधिका से) आप तो प्रोफेसर रही हैं, (उसी उम्र के) युवा ही आप तक पहुंचते हैं, तो आपको तो इसके बारे में बहुत अच्छा नॉलेज है; और आप अभी कह रही हो — 'हो सकता है'।
अपवाद होता है — (पर) उस अपवाद के पीछे भी कुछ है; अपवाद के लिए भी आधार, बेस चाहिए। अपवाद ऐसे नहीं होता। कल्पना के लिए भी कोई आधार-बेस चाहिए — आप सोचो, मैं कल्पना कर लूं, (पर) आधार-बेस नहीं होगा, तो कल्पना नहीं कर सकते। तो अगर अपवाद है, तो इसका मतलब कुछ तो है। मैं कह रहा हूं, कोई कह रहा है 80% — (तो) वो ऐसे ही बता रहा है; हो सकता है 1% हो, लेकिन है। आप परसेंटेज में कतई मत जाइए, क्योंकि परसेंटेज में अगर जाएंगे, तो कुछ नापा नहीं जा सकता — जनसंख्या तक नापी नहीं जा सकती, क्योंकि जनसंख्या नापते-नापते हर सेकंड कई लोग जा रहे, कई लोग आ रहे हैं। यहां कुछ भी पूर्णतः बोला ही नहीं जा सकता। कोई कह रहा है 80% हो रहा है, कोई कह रहा है 1% — मुझे उससे नहीं लड़ना है। क्योंकि आप जिस सोसाइटी में रहते हो — आप अलग सोसाइटी में रहते हो, मैं अलग सोसाइटी में रहता हूं; आप अलग जीवन जी रहे हो, मैं अलग जी रहा हूं; आप अलग समझ पा रहे हो, मैं अलग समझ पा रहा हूं; आप अलग देख पा रहे हो, मैं अलग देख पा रहा हूं — आप 1% तक पहुंचे, मैं 80 तक पहुंच गया। तो मैं उससे लड़ूंगा नहीं।
खंडन तो कभी किसी का करना ही नहीं चाहिए। जीवन में एक बात याद रखना — अगर आपको निकलना हो, तो कभी किसी का खंडन मत करना। अगर आपने खंडन किया, तो आप कभी नहीं पहुंच पाओगे। ऐसे ही छोड़ देना उसको — अपनी दृष्टि से आपने अपनी बात रखी, मैंने अपनी बात रखी, ठीक है, बात खत्म। खंडन करने वाले की यात्रा स्व तक नहीं होती है, वो खंडन ही करता रहता है — (उसमें) फंस भी जाता है; क्योंकि जिसका आप खंडन कर रही हो, अगर उसने स्वीकार नहीं किया, तो उसने आपके प्रति द्वेष बांध लिया ना; (उसका) एंड भी नहीं होता; अब आपको नेगेटिव ऊर्जा वो देगा — काश आप खंडन ना किए होते! अब मुझे (उससे) क्या लेना-देना? 1% हो, 80% हो, क्या फर्क (पड़ता है)? अपवाद के लिए भी कोई आधार-बेस होगा। इसलिए मैंने आज तक किसी का खंडन (नहीं किया) — खंडन करना ही नहीं चाहिए, कभी भी नहीं; वाद-विवाद उठ जाता है, फंस जाओगे आप — अगर आपको निकलना है तो। और आपको कुछ बनना है, तो करो खंडन — वो पांडित्य का प्रदर्शन है; करो खंडन, शास्त्रार्थ करो। स्व की यात्रा करने वाला और आत्मज्ञानी, ये शास्त्रार्थ नहीं करते; ये अपनी बात कह देते हैं, और कहने में सिद्ध हो जाता है — आप समझो या ना समझो। (और जो) नहीं समझोगे, (तो) प्रयास नहीं करेंगे। जैसे कुछ देर पहले हमने कुछ बात कही, (और) उसके बाद कहा — 'समझ सको तो'; तो इन्होंने नहीं समझा, तो हमने प्रयास भी नहीं किया, क्योंकि अभी इनका वो लेवल नहीं है। मैं प्रयास करूंगा, (तो) ये अपसेट हो जाएंगी, और पूरी रात निकल जाएगी। अगर इनको समझना होता, (तो) उसी समय समझ लेतीं; और अगर समझना चाहतीं, (तो) मुझसे — नहीं समझ में आया — (कहकर) क्वेश्चन करतीं। मैंने कुछ कहा, और आपने रिटर्न में प्रश्न नहीं किया, तो इसका मतलब समझने की जिज्ञासा भी नहीं है। (तो) मुझे रिटर्न कुछ नहीं बोलना चाहिए, मुझे सिर्फ मुस्कुरा देना चाहिए, वेट करना चाहिए — (जब) स्थिति उठेगी, (जब) भीतर से जिज्ञासा होगी, तभी जानने की इच्छा होगी। अरे भाई, अगर समझने की क्षमता ही नहीं है — समझने की क्षमता कोई किसी को दे नहीं सकता। बात को समझने के लिए बोला जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता। आप बस अपनी बात को रख दीजिए, समझाने का प्रयास मत करिए। एक बार आपने बोला — (जिसे) समझना होगा, (उसे) समझ में आ जाएगा। अगर नहीं समझ में आया, और समझने की इच्छा होगी, जिज्ञासा कहेगी 'मुझे समझाइए', तब आप फिर बोलिए, अलग-अलग तरीके से। सिखाने वाले को तब तक नहीं भागना चाहिए, जब तक सीखने वाला तैयार है।
मुझसे एक व्यक्ति आया, रायपुरा में, जहां के वो नारायण (बाबा) हैं। उसने कहा कि आपकी स्थिति क्या है? हमने कहा — देखो, मैं अपनी स्थिति बताऊंगा, तो तुम जहां हो, वहीं से समझोगे; और कैसे मैं सिद्ध करूंगा कि मेरी स्थिति ये है? कह तो दूंगा — क्योंकि हर आदमी अपने आप को महान बताने के लिए स्थिति तुमसे तो आगे ही बताएगा, क्योंकि तुम मेरे नीचे बैठे हो; अगर (नीचे) होगा भी, तो मैं कहूंगा तुमसे ऊपर हूं, नहीं तो तुम तुरंत कुर्सी से उतार दोगे। हर आदमी यही करेगा ना। तो हमने कहा — एक उपाय है, मैं वो बताता हूं, इससे पता चल जाएगा, सिद्ध हो जाएगा कि मेरी स्थिति क्या है, तुम्हारी स्थिति क्या है। यहां पे मैं उस जगह बैठा हूं — प्रश्न के उत्तर दूंगा; तुम बैठे हो प्रश्नकर्ता की जगह। तुम मुझसे प्रश्न करो, मैं उत्तर दूंगा — इसमें से एक नंगा होगा ही होगा। मैं नंगा हो जाऊं, तो समझ लेना तुम्हारी स्थिति हाई है, मेरी लो है, बस जगह बदल गई है; और तुम नंगे हो जाओ, तो मेरी स्थिति फिर समझ ही लेना कि तुमसे तो ऊपर है ही है। दो में से एक को तो नंगा होना ही होना है — देख लेना, कितनी देर में कौन नंगा होता है। तब उसने सवाल करना चालू किया, तो फिर वो नंगा हो गया। बोला — अब समझ गए, स्थिति तुमसे ऊपर है। बस, इतनी सी बात है। (इनके साथ कैसे बात करनी है, वो भी समझना है —) तभी आप टिक पाओगे, नहीं तो टिक ही नहीं पाओगे; आप भूल से (यहां) चले भी गए, तो भाग जाओगे यहां से — मिनटों में लोग गए हैं।
(एक व्यक्ति) बोलते ही बोला — हठयोग से गुस्सा चला जाता है, मेरा चला गया। मैंने कहा — हठयोग से गुस्सा जाता ही नहीं। (उसने फिर कहा) हठयोग से गुस्सा जाता है। मैंने कहा — अगर गुस्सा चला गया होता, तो तुम दो बार रिपीट ही नहीं करते; इसका मतलब है कि (गुस्सा) सूक्ष्म है। तुमने दो बार रिपीट किया — एक बार कहा गुस्सा चला गया, और एक बार कहा किताबों में लिखा है। (फिर मैंने) बोला — स्नान वगैरह करना है, कर लो; बोले — बस आपके दर्शन के लिए आया था, जा रहा हूं। बोला — जाओ। ऐसे-ऐसे लोग आते हैं — गुस्से से गए।
अरे भाई, देखिए, मैं एक ही बात कहता हूं — दो में से अगर एक पक्का है, या दोनों पक्के हैं, तब तो पहुंच जाओगे; अगर दो में से कोई कच्चा है, तो भाग लेगा — या तुम, या मैं। तुम पक्के हो, (और) अगर मैं कच्चा हूं, तो मुझे भागना पड़ेगा। मैं पक्का हूं, तुम भी पक्के हो, तो तुम्हारा पहुंचना भी पक्का है। और मैं पक्का हूं, तुम कच्चे हो, तो तुम टिक ही नहीं पाओगे। मैं एक साल से इस स्थान पे बैठा हूं, मैं यहीं हूं — यहां पता नहीं कितने चेहरे बदले। और मैं हर प्रश्न का (उत्तर) बोलता भी हूं; और जिस दिन कोई सिद्ध कर दे कि आपने आध्यात्मिक प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, मैं यहां की जगह छोड़ दूंगा — ये भी बात बताई। मैं ऐसे ही यहां नहीं बैठा हूं। और मैं सामने बोल भी देता हूं — यहां सीखने आए हो, आप सीखने वाले स्थान पे बैठो, सिखाने की बात कतई मत करना। अगर सिखाना हो, तो आप फिर ऐसी जगह बनाओ, और जाओ, ज्ञान दो। आप सीखने वाली जगह बैठो, मैं सिखाने वाला — तब आप बैठो, नहीं तो नहीं। ऐसे तो 20 से मैं घूम रहा हूं, लेकिन 2024 से मैं यहां बैठा हूं, और अभी भी बैठा हूं; पता नहीं कितने चेहरे बदल गए।
उसके बताए हुए मार्ग पे चलो। (टिकना —) आपकी जिज्ञासा पक्की है कि नहीं, पहले ये (देखो)। अगर जिज्ञासा पक्की है, तो आप पक्के हो, फिर यात्रा भी होगी। और जिज्ञासा ही नहीं, बस ऐसे ही चले आए — चलो देखते हैं, बोल तो रहे हैं; ऐसा प्रश्न पूछूंगा, जवाब ही नहीं दे पाएंगे — तो जब ऐसा प्रश्न पूछोगे, तो जवाब की जरूरत ही नहीं है; तुम पक्का करके आए हो कि जवाब ही नहीं मिलेगा — तो जाओ घर। मैं तो उनके लिए बैठा हूं, जिन्हें जवाब चाहिए। (टिकने का मतलब —) अपनी जिज्ञासा पे टिके रहना।
(मुर्गी-अंडा —) हमने कहा — भैया, मुर्गे को तो खोजो, ये मुर्गा बताएगा ना! तुम लोग मुर्गे का नाम ही नहीं लेते, और मेन है मुर्गा। तुम लोग मुर्गी और अंडे की बात करते हो, तो मुर्गे से पूछ लो ना कौन आया? अरे, शरीर तो मुर्गे से निकला ना — उस मुर्गे से पूछ कि तेरे अंदर से पहले मुर्गी आई, या पहले अंडा आया; क्या आया, भाई बता तू। तुम मुर्गे की खोज करो। तुम बोलोगे मुर्गा कहां से आया — पहले मुर्गा तो खोजो; तुम्हारे पास मुर्गी, अंडा तो है, मुर्गा तो खोज लो। उस कहानी में तो मुर्गी और अंडा है — पहले मुर्गे को तो लाओ; तो मुर्गी और अंडे को छोड़ो, पहले मुर्गे को खोजो। अरे, शरीर तो मुर्गे से ही आया ना — हमारा शरीर पिता से ही आया ना, चाहे स्त्री का हो, चाहे पुरुष का हो; चाहे अंडा हो, चाहे मुर्गी हो, मुर्गे से निकला — तो मुर्गे को पकड़ो, और हाथ जोड़ो कि तेरे अंदर से दोनों निकलते हैं, (बता) तेरे अंदर से पहले कौन निकला? मुर्गी निकली, (तो) बाद में अंडा कैसे निकला? या तो तेरे अंदर से दोनों निकलते हैं — तू मुर्गी को भी पैदा करता है, अंडे को भी पैदा करता है — यार बता दे! वो मुर्गा बता देगा। आप लोग मुर्गे की खोज करो — अरे, ये मुर्गा बताएगा ना; आप लोग मुर्गे को लाते ही नहीं। मुर्गा कहीं सोच रहा होगा — यार, मुझे इस कहानी से निकाल दिया! उसे कितना दुख होता होगा कि यार इन लोगों ने मेन मैन, मुझे ही निकाल दिया — हीरो ही चला गया फिल्म में से! सोचो जरा, वो बहुत दुखी होता होगा; और फिर वो हंसता भी होगा कि यार, दुनिया में कोई पैदा हुआ, (जो) मुझे भी लाया — उस कहानी में मुझे लोग निकाल दिए थे, कितना अच्छा व्यक्ति है कि मुझे लाया; मेरा तो नाम ही ये लोग नहीं लेते थे। वो तो अंतरात्मा से आशीर्वाद दे रहा होगा — वो जहां भी होगा, वो मुर्गा मुझे बहुत (आशीर्वाद) देता होगा। बोलते हैं पहले मुर्गी आई, पहले अंडा आया — मुर्गे का तो नाम-निशान भी नहीं है। तो मैं आपको बता रहा हूं कि यार, तुम दोनों को छोड़ो, पहले मुर्गे को खोजो।
तो मैं वही कहता हूं कि आप यहां आइए — या तो आप नंगे हो जाओ, या तो मुझे कर दो; तभी बात बनेगी। मैं तो जिज्ञासु की बात कर रहा हूं।
आप देखिए कि आप जिम्मेदारी को (पकड़ रही हैं, या) भावनाएं आपको पकड़ रही हैं — कि जिम्मेदारी है भी? ये आपको देखना है कि आपने जिम्मेदारी ली है (या नहीं)। (कैप्टन शिप डुबो रहा है, तो सब डूब रहे हैं —) तो छोड़ दो ना शिप। (अपना ही शिप था, अपने ही लोग हैं —) अपने लोग कहां हैं? (अपनी मां है — पर) वो समझ भी तो नहीं रहे, मेरे तरीके से चल भी तो नहीं रहे हैं — मतलब उन्हें मेरी जरूरत नहीं है, हम जबरदस्ती कर रहे हैं। अगर वो मुझ पे निर्भर होते, तो पूरी तरह मेरे तरीके से ही चलते। अगर वो मेरे तरीके से नहीं चल रहे हैं, तो हो सकता है कि वो मुझे ढो रहे हों। आप उन्हें छोड़ दीजिए। (तो ये रिस्पांसिबिलिटी छोड़ना हुआ —) (जिम्मेदारी) है ही नहीं, आप जबरदस्ती लेके रखी हैं; अगर होती, तो आपके बताए अनुसार चलता — नहीं चल रहा है। (ज्ञान का अभाव है वहां —) ज्ञान का अभाव है, तो ज्ञान दीजिए फिर — पहले ज्ञान दीजिए, बाद में दायित्व पूरा करना; पहले बैठा के उनको ज्ञान ही दो; ज्ञान का अभाव है, तो पहले ज्ञान दो, भोजन बाद में देना। (वो कहते हैं, अपना-अपना देखो —) अब देखिए, आ गई ना उसी पे — फिर अपना देख लो; अब क्या डंडा मार के भगाएं आपको? उन्होंने तो बोल दिया ना। जैसे अपनी बहन की अभी मैंने बात बताई — कहा 'लड़कियन के टेंशन बा', तो (मैंने कहा) तू भोग, हम क्या करें — बालक तेरा, कर्म तेरा। हमने सुन लिया, कहा भोग ले। और अगर वाकई में दुख है, तो मेरे तरीके से चलो। अरे भाई, हम क्यों (जिम्मेदारी) लें? उसका पति है, उसका परिवार है — मैं क्यों उसका जवाबदार (बनूं)? (हमें) सुना रहे हैं, हमसे पूछ रहे हैं, हमें बता रहे हैं — तो मेरे पास तो एक ही तरीका है — भोग ले, और जा हॉस्पिटल में इलाज करा ले। (हम लोगों का दुख दूर करें और अपनी बहन का नहीं —) अरे भाई, वही तो कह रहा हूं — वो बहन करवाना भी चाहती है कि नहीं?
(हम तो समझदार हैं —) वही तो बात है — इतने समझदार हैं, फिर परेशान क्यों हैं? इतनी समझदार होतीं, तो फिर परेशान क्यों होतीं? परेशान है, तो समझदार नहीं है — दोनों बातें तो नहीं हो सकतीं। उनके पास समझ नहीं, तो परेशान हैं; आप समझ के साथ परेशान हैं — तो फर्क क्या है? दोनों तो एक ही जगह खड़े हो। (साधिका ने कहा, ज्ञान नहीं होता तो परेशान नहीं होते —) आपने जिम्मेदारी अगर ली, ठीक है; जिम्मेदारी जबरदस्ती मत ढोओ। अगर वो कर सकता है, तो छोड़ दीजिए, और आप अपना कल्याण कर लीजिए। (हमारा पहला कर्तव्य —) आप देखिए, आपकी बहन है — चलिए, उस रिश्ते में जाते हैं — माता की, भाई की, बहन की — अरे भाई, सब अपाहिज हैं क्या? फिर तुम्हारे ऊपर कैसे सबकी जवाबदारी है? मतलब सब मंदबुद्धि हैं, पागल हैं तुम्हारे घर में? तब कैसे आ गई जवाबदारी? बोलिए। (बिजनेस अच्छे से रन करने की) अगर भाई की जिम्मेदारी है, वो नहीं कर रहा है, तो आप (अपनी) रिस्पांसिबिलिटी छोड़ो ना — नहीं कर रहा है, (तो) भोगेगा। पागल है क्या? मंदबुद्धि है क्या? अपाहिज है क्या? अगर ये अवस्था है, तब आपकी जिम्मेदारी बनती है कि उनका सहयोग करो। (बीमार का सहयोग करना भी तो कर्तव्य है —) देख लो, वो बीमार की स्थिति क्या है — पता चला जिंदगी भर अपाहिज रहेगा, और पता चला उसके और भी बच्चे हैं, पति है, सब है — तो हम क्यों करें? (हमें फिक्र हो रही है —) फिक्र, तो दुनिया में और लोग हैं, वहां भी जाओ — एक हॉस्पिटल में चली जाओ, अपाहिज वाले हॉस्पिटल में; आपके पास तो एक-दो लोग हैं, वहां तो सैकड़ों-हजारों हैं, फिर उनकी फिक्र करो, इतनी फिक्र है तो। फुटपाथ पे बहुत लोग सोए हैं, अपाहिज बेचारे — जाके उनका पांव दबाओ, उनका लैट्रिन साफ करो। (चैरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम —) तो करो पहले घर वालों की; (पर) तब तो बाहर वालों का नहीं (करोगी)। घर वालों का, तो आपने (उनसे) कुछ लिया है, इसलिए कर रही हैं। (उनसे प्रेम ज्यादा है —) तो (घर पर ही) करते रहो ना, फिर फंसे कहां हो?
तो रहो ना। (लोग पूछेंगे —) तो घूमते रहेंगे, तुझे क्या करना है? अरे, तू कौन होता है? क्या संविधान ने तुझे अधिकार दिया है कि तू जाके यही पूछेगा शादी हुई कि नहीं? और तू होता कौन है ये पूछने वाला कि मेरी शादी हुई है कि नहीं? हम इजाजत क्यों दे रहे हैं? ये अधिकार तुम्हें कहां से मिला — संविधान से, या मैंने तुझे दिया? अबला नारी मत बनो — फालतू आप अबला नारी मत बनो। आपके पास जवाब है — नहीं किया, तो नहीं किया, बात खत्म। (आप यहीं के हैं या कहीं से आए हैं?) जहां था, वहां भी कहीं से आया था, और यहां भी कहीं से आया हूं — मैं बस आया हूं, अब जा रहा हूं।
आपको जगह में रहना है, कि अपनी जगह में रहना है — अहंकार को पोषण देना है? आपको (बस) जगह में रहना है, तो यहां रह सकते हैं — आजीवन रहो; एक दिन से लेकर आजीवन रहो, यही व्यवस्था है। (अगर ये भी साथ चल रहे हैं, तो हम भी रह लेंगे —) अरे, तो हम हैं ना संभालने के लिए। (यहां के नियम —) सब बेचवा के आओ, और रहो — बेच के आओ, रख के आओ, चाहे जैसे आओ — (पर अगर) वो पीछे का रहेगा, तो वो बांधेगा ना, बार-बार मुंह खींचेगा — वो देख लो। पीछे की नाव जला के आना। लोन पे लिया हुआ घर, चाहे जितना भी है — एक सुई भी है, लेकिन है, तो पीछे खींचेगा ना, आगे बढ़ने से खींचेगा। तो उससे मुक्त होके यहां पे आएंगे — आपकी मर्जी, आप चाहे बंधन में आओ, चाहे मुक्त (होकर) आओ। यहां के नियम में रहोगी, तो रहो, आजीवन रहो। आपको देखना है — अगर शिद्दत से कहीं पे रहना है, तो पीछे का जलाना पड़ेगा; अपने बनाए हुए अस्तित्व को मिटाना पड़ेगा, तभी आप आगे बढ़ सकते हो, नहीं तो वो आपका अस्तित्व पीछा नहीं छोड़ेगा, खींचता रहेगा।
(दूसरों के यहां नियम के बंधन —) साधना हमेशा 'तेरा' में होती है, 'मेरा' में (नहीं) — ये ध्यान रखना। क्योंकि 'मेरा' में तो आप अपने तरीके से जिओगी, और अपने तरीके से अगर निकालना हो, तो घर पे ही निकाल लेतीं, फिर यहां आने की जरूरत नहीं। तो जब आप साधना करो, तो किसी की शरण में करो — इसलिए कहा गया है, जीवंत गुरु की शरण में रहो। (और अगर हम भटक-भटक के, जैसे आपने किया, वैसे कर लें —) करो, रोक कौन रहा है? एकदम भटको, जो मन करे वो करो — पहले कर लो, देख लो, करके देख लो कि कुछ है कि नहीं; ये ना हो कि (बाद में लगे) मैंने ये नहीं किया। यहां पे आए थे दो जन, बोले — हम अनुभव लेना चाहते हैं। जाके ठंडी में एक दिन कांपे; वहीं (गिट्टी पे) खड़े रहे, ठंडी में बैठे रहे। दूसरे दिन पूछा गया कैसा (रहा), बोले — अरे, अद्भुत! लेकिन दोबारा कभी नहीं किए। वो तो बातों में फंस के किए। अगर कुछ अनुभव हुआ (होता), तो दूसरी रात भी नहीं छोड़ते, तीसरी भी नहीं छोड़ते, जब तक उपलब्धि नहीं हो जाती। रात भर तुम कांपे, रात भर सूर्य का इंतजार करते रहे कि कब सुबह हो जाए — तुम्हारी स्थिति का पता तब चल गया, जब तुम दूसरे दिन नहीं गए। रात भर तुम रोए, चिल्लाए, चीखे, लेकिन किसी से बताए नहीं — (कि) हंसी हो जाएगी; बोले — बहुत अद्भुत अनुभव हुआ, शब्दों में बता नहीं सकते — लेकिन दूसरे दिन नहीं गए। अगर कुछ हुआ (होता), आगे कुछ (मिला होता), तब तो तुम जब तक मूल तक नहीं पहुंच जाते, तब तक वहीं बैठे रहते। (बस) जबान दे चुका हूं — (इसलिए एक रात बैठे)।
कॉपी कभी नहीं कर सकते — नकली, नकली रहता है ना। देखिए, कहा गया है कि नकल के साथ अकल होना जरूरी है। मैंने किस स्थिति में किया है, किस लिए किया है (वो देखो)। पहली रात (बैठे), तो दूसरी (रात) क्यों नहीं किए? क्योंकि पहली रात में तो ऐसे ही किए; दूसरी रात में तुम होते। अगर कुछ आपने किया, और एक बार के (बाद) दूसरी बार नहीं किया, इसका मतलब नकल किया, लेकिन बर्दाश्त नहीं कर पाए। अगर थोड़ी भी अकल लगी होती, तो दूसरी रात करते, और फिर तुम होते। पहली रात तो ऐसे ही हो गया — भूल से, भ्रम से, तुक्का लगा। आप कॉपी मत करो — हो भी नहीं (सकती)। सबकी यात्रा अलग-अलग है। कॉपी क्यों कर रहे हो? क्यों कॉपी करना चाहते हो? हम कुछ आपको बता रहे हैं — वो करो ना; आपके लिए, आपकी क्षमता अनुसार बता रहे हैं — आप वो करो ना। अगर वो (कॉपी) करने से कुछ होता, तो मैं इतने घंटे सत्संग क्यों करता? (एक साधक ने बताया कि भाई की देखा-देखी उसने भी चार रोटी ले लीं, पर खा नहीं पाया —) आपने नकल की, लेकिन अकल नहीं लगाई — उसकी क्षमता अलग है, मेरी क्षमता अलग है। अच्छा हुआ, उसने आज चार ही मांगी, आठ नहीं मांगीं! सबकी क्षमता अलग-अलग।
(उसमें) गिर जाएगा आदमी। इसे क्षमता नहीं कहते हैं — वो तो जबरदस्ती किया आपने। (कंपटीशन में वेट) उठा तो लेते हो — आवेश में, जज्बात में; (पर) कभी पीछे की नस दब गई ना, तो जिंदगी भर रोओगे। आवेश है, जज्बात है। (क्षमता बढ़ानी चाहिए —) तो बढ़ानी चाहिए, लेकिन मेहनत करके — काजू, बादाम, किशमिश, छुआरा, मुनक्का खाओ, दूध, घी (लो)। खुद लायक बनो। बहुत लोग ऐसी गलती किए हैं, पछता रहे हैं — उन्हें पता था मैं वजन नहीं उठा पाऊंगा, लेकिन शर्त लगा के उठा लिया, (और अब) रो रहे हैं, बैक साइड की नस दब गई है। इसीलिए (ऐसा) नहीं करना चाहिए।
(दुख) तभी तक है, जब तक उम्मीदें हैं। उन्होंने अपनी बात कही, आप अपनी बात कह दो, बात खत्म। (इनकी उम्मीद है कि मैं समझ गई, वो भी समझ लें —) उम्मीद में ही मोह छिपा हुआ है। जब आपको सामने वाले से कुछ मिलता है, ठीक से, अपने तरीके से, तो उसमें मोह, आसक्ति, बंधन, अटैचमेंट होने लगता है।
(बहन के दुख से डिटैचमेंट —) किया नहीं। वो उनका दुख है — उनका बेटा है, उनका पति है, और ये होगा ही होगा — बीमारी होगी; एक समय ऐसा (आएगा), शरीर छूट जाएगा। अगर मान लीजिए पति का छूटे, (तो) बहन रोएगी कि विधवा हो गई; या उसका छूटेगा, तो ये (पति) कहेगा मेरा बर्बाद हो गया, या कहेगा दूसरी करा (दो), जैसे उसने कहा; बेटे को कुछ हुआ, (तो) बाप रोएगा — ये तो होना पक्का है। हम भी जाएंगे, तो कुछ आंसू हम भी निकाल लेंगे — (जब) बहन (के आंसू) निकलेंगे, तो हम भी रो लेंगे। (अगर वो कहें कि आप स्वार्थी हो —) कोई बात नहीं, (हां) मैं हूं, उसमें क्या हुआ? (उन्होंने) जैसा समझा, बोला — मैंने उसे स्वीकार किया, तो (मैं) क्या करूं?
जब आपने फैसला कर ही दिया — मैं एक घटना बता रहा हूं। होशंगाबाद है, जबलपुर के पहले, मैं वहां गया था — देहरी गांव था, एक महाराज जी थे, बंगाली बाबा, वो चौमासा कर रहे थे, (नर्मदा के) उत्तर तट पे। तो मैं स्नान करके नर्मदा जी (से) आ रहा था — फटे हुए, चिथड़े कपड़े, दातुन लिया, ऐसे कर रहा हूं। दो व्यक्ति आए, आपस में बात कर रहे — मैं उनको सुन रहा हूं — बोले, पागल लगता है; मुझे पागल बोले। धीरे-धीरे, डरते भी हुए, मेरे करीब आए — कहां से आए हो? बोला — मैं अपने गांव से आया हूं। बोले — यहां कैसे? बोला — तुम यहां कैसे? बोले — (मैं) भगवान के दर्शन करने आया हूं। बोला — भगवान गांव में नहीं है क्या? बोले — है। बोला — तो यहां क्यों आए? बोले — आईडी दिखाओ। बोला — तुम आईडी दिखाओ। बोले — मैं इसी गांव का हूं। बोला — कैसे पता चलेगा तुम इसी गांव के हो? मैं भी बोल दूं मैं इसी गांव का हूं; आप मांग रहे हो, तो किस आधार-बेस पे मांग रहे हो? कानूनन अधिकार तो है नहीं। मैंने ऐसा क्यों किया, (वो) नहीं बता रहा हूं। फिर वो लोग बोले — पागल है, हटो। कुछ बच्चे आ रहे थे, तो उन्होंने बच्चों से कहा — वो पागल है। लेकिन मैं बच्चों को देख के मुस्कुरा दिया; उस मुस्कुराने में बच्चे समझ गए, और जाके आराम से स्नान करने लगे। वहां भीड़ हो गई, तो मैंने कहा, एक काम करो, मैं आश्रम पे नहा लेता हूं। जब मैं आश्रम पर पहुंचा, तो मैंने मोटर चालू किया, और पाइप से नहा रहा था, और वो (दोनों) आ गए, मुझे देखने लगे; अब वो सोच रहे हैं कि ये यहां कैसे। फिर उन्होंने जिनके पास (मैं) गया था, उनसे पूछा, तो उन्होंने मेरा परिचय दिया। फिर नहा के मैं गया, तो उन्होंने कहा — आपने बताया क्यों नहीं? बोला — क्या बताऊं? तुमने पहले ही पक्का कर लिया था ये पागल है; तो पागल से पता पूछा जाता है? इतनी समझ तुम में नहीं है? जब तुमने मुझे पागल (होने का) फैसला ही दे दिया, तो पागल पता कैसे बताएगा? आपने मुझे समझदार तो समझा नहीं।
तो कहने का मतलब है कि आपने मुझे जैसा समझा, ठीक है, कोई बात नहीं — क्या फर्क पड़ता है मुझे? आपके समझने से क्या मैं वो हो जाऊंगा? मैं जो हूं, वो हूं। पहले इस बात को सुन लो — मैं जैसा हूं, (वैसा) हूं। आप मुझे कुछ भी मान लोगे, (तो) मैं (वो) हो जाऊंगा क्या? आपके मानने से क्या होगा? और मैं आपको कुछ मान लूंगा, (तो) आप हो जाओगे क्या? ये लोहा है — पूरी दुनिया, पूरा विश्व (इसे) सोना मान ले, (तो) हो जाएगा क्या? बोलिए। नहीं होगा ना? तो आपके मानने से, मेरे मानने से कुछ नहीं होता। मैं जैसा हूं, आप मुझे वैसा स्वीकार करते हो, ठीक है; (नहीं तो) आप जाओ, बात खत्म। मैं अपना काम कर रहा हूं, आप अपना काम करने आए हो — इस जगत में आप जिसके लिए आए हो, वो कर रहे हो, मैं जिसके लिए आया, वो कर (रहा हूं)। (आपके) मानने में मैं थोड़ी ना हूं — आप कुछ कह दो, मैं मान लूंगा? आप हो कौन? और आप फैसला करने वाले हो कौन? और आपके करने से हो क्या जाएगा? मैं जैसा हूं, मैं हूं — बस इतना मैं समझता हूं। और मैंने अपने आप को स्वीकार किया है — तुम करो, चाहे ना करो, उससे मुझे कोई मतलब नहीं। मैंने समझ के किया — अगर मैंने कुछ किया, और मुझे पक्का पता चला (कि) सही है, (और) पूरा ब्रह्मांड (कहे) गलत है, तो मैं नहीं मानूंगा, क्योंकि मैंने अपनी समझ से किया है; तुम्हारी समझ का मेरे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। और मेरी समझ से गलत है, (और) पूरा ब्रह्मांड सही कहे, (तो भी) मैं नहीं मानूंगा। (उसका) प्रमाण भी तो मेरे ऊपर ही आ रहा है — अपने कर्म की जवाबदेही (मेरी है)। अगर यह सही है, तो मेरे सामने गलत सिद्ध करो — तुम सिद्ध भी नहीं कर पा रहे हो, तो मेरे ऊपर मान्यताएं काम नहीं करतीं।
(कैरेक्टर सर्टिफिकेट —) कोई जरूरत ही नहीं है ना मेरी। अगर मैं (सर्टिफिकेट) ले भी लूं, तो क्या हो जाएगा? मुझे पता है मैं कौन हूं। अगर मैं आपसे ले भी लूं, तो क्या हो जाएगा — क्या वो आखिरी होगा? मैं फिर आगे जाऊंगा, कोई कहेगा तुम ये हो — तो वो (सर्टिफिकेट) तो फेल कर दिया; आखिरी तो है नहीं। इससे वो प्रमाणित हो रहा है कि मैं ही नकली हूं, मेरे अंदर कमजोरी है, इसलिए मुझे इससे, इससे, इससे लेना पड़ रहा है — कि दुनिया क्या कहेगी; इससे मुझे पता लग रहा है कि मैं ही कहीं वीक हूं, मैंने अपनी ही वैल्यू नहीं समझी। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे शेर को कोई बोल दे कि ये कुत्ता है — शेर को क्या फर्क पड़ेगा? वो तो जब दहाड़ेगा, तो पता ही चलना है वो क्या है। (हो सकता है जिसने कहा, उसे चित्र में शेर को कुत्ता ही बताया गया हो —) एक कह रहा है कुत्ता, एक कह रहा है शेर — काम की बात आएगी, तो वो अपना सही तरीके से काम कर देगा, कुत्ता हो या शेर हो, क्या फर्क पड़ता है? उसके पीछे कोई काम है — तो आप देख लो, किस लिए गए थे।
मन बोल रहा है, कि आपकी जरूरत बोल रही है, या आपका लालच बोल रहा है — ये बताओ। (मेरे बारे में —) कई लोगों ने मुझसे कहा कि कहां घूम रहे हो? मैंने कहा — खोज रहा हूं। तो उन्होंने कहा कि भगवान तो अंदर है। मैंने कहा कि मुझे पता है बाहर है, तो पहले मैं बाहर खोज लूं, तो बचेगा अंदर — एक पक्ष तो क्लियर करो। मुझे पता है बाहर है, आप कह रहे हो अंदर है — और आप सिद्ध भी नहीं करा पा रहे हो, आप भी तो तुरंत दिखा नहीं पा रहे हो, बस कह ही रहे हो ना? तो मैं एक काम करता हूं — एक जगह तो खोज लूं, आखिर में अंदर तो बचेगा।
(कृष्ण ने कहा भगवान बाहर नहीं —) बाहर-अंदर क्या है, पहले ये बताओ — चलो, मैं आपसे पूछ रहा हूं। पहले बाहर और अंदर को क्लियर करो। (बाहर और अंदर जगत एक ही है —) अंदर क्या है? अंदर तुम कहां हो? तुम्हारे अंदर पंच तत्व हैं, चीजें जो हैं — तुम उसमें कहां हो? अंदर हो, (कि) बाहर हो? ठीक है — तुम कहां हो? (वही तो मैं पूछ रहा हूं कि ये कौन बोलता है कि मुझे जानना है —) वो आपसे पूछ रहा हूं, क्योंकि अंदर-बाहर का नाम आपने ही लिया। (मैं तो अहंकार, अहम हूं —) तो हो कहां? कोई तीसरा भी स्थान है क्या? एक अंदर, एक बाहर — कोई तीसरा स्थान है? नहीं ना? तो तुम अंदर हो कि बाहर, मुझे ये बताओ। (मैं तो कहीं नहीं हूं —) तो जब तुम कहीं हो ही नहीं, तो अंदर-बाहर का कैसे पता चला? तो फिर ये कौन है, जो मान रहा है कि मैं हूं? तो फिर आपसे बात भी आगे नहीं कर पाऊंगा मैं, क्योंकि आप जवाब नहीं दे पा रहे हो। तुम कहां खड़े हो, वो तो बताओ मुझे, तब मैं आपसे बात करूं ना। (मुझे नहीं पता मैं कहां खड़ा हूं —) तो अंदर कैसे बोला कि अंदर भी है? अंदर गए नहीं, तो अंदर कैसे बोल दिया? (किताबी ज्ञान —) ये पहले खोजना पड़ेगा कि आप कहां खड़े हो — बाहर कि अंदर। अगर बाहर खड़े हो, तब अंदर जाओ; और अंदर खड़े हो, फिर अंदर तो है ही नहीं — नहीं तो मिल गया होता। तो देखना है कि आप खड़े कहां हो — वो खोजना पड़ेगा। (और अगर किसी ने बता दिया —) बताने से क्या होता है? प्रत्यक्ष होना चाहिए। (तो अंदर कैसे जाया जाए?) अगर अंदर आपकी खोज है, तो अंदर जाने के लिए काम करो ना, फिर रास्ता पूछो कि कैसे जाऊं। मैं तो (रास्ता) तब बताऊंगा, जब आप ये बता पाओगे कि मैं कहां खड़ा हूं।
(शास्त्रों-वेदों में ऋषियों ने अनुभव लेकर बता दिया कि कौन सा रास्ता सही है, कौन सा गलत; पर मन कहता है इधर भी जाकर एक बार देखूं — और आपने कहा कुछ है ही नहीं, तो क्या मैं समझना बंद कर दूं? फिर अंदर से कौन आवाज करता है कि एक बार देख के तो आओ?) देख लो, कौन आवाज करता है — एक तुम ही तो हो। (मैं वहीं अटक जाता हूं, परेशान आदमी हूं —) हां, ये परेशान आत्मा है — तो अपनी परेशानी दूर कराओ, इलाज कराओ, सही से। (इसका इलाज कहां होगा?) अध्यात्म (में), गुरु के पास। तो जैसे बताया जा रहा है, फिर वैसे करो। (ब्लाइंडली कैसे फॉलो करें, कैसे पता चले कि यह सही बोल रहा है?) अनुभव कब होगा? जब उस पे काम करोगे।
(एक साधिका की बात के बाद) इन्होंने इतना सत्संग सुना, तो इन्होंने एक पॉइंट पकड़ा कि बाहर कुछ नहीं है; लेकिन उसके बाद भी मैंने बोला है, उसके पहले भी बोला है, कि राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, 'मेरा', कर्ता के भाव से मुक्त होना है — तो उसको इन्होंने क्यों नहीं पकड़ा? क्योंकि उस पे काम करना पड़ेगा। मैंने ये भी तो बोला है — बोला है कि नहीं बोला है? तो इसको क्यों नहीं पकड़ा आपने? अब मुक्त होना है — (तो) उस पे काम करेंगे। (और अगर बाहर कुछ नहीं है,) तो फिर कुछ मत करो, तो भोजन भी मत करो — आप स्थिर हो जाओ। आपने मेरी बात मान ली ना कि बाहर कुछ भी नहीं है, तो बात खत्म करो — अगर इस बात को मान लिए, (तो) आप उसी जगह स्थिर हो जाओ। (फिर अंदर कंफ्यूजन क्यों होता है कि ये बात गलत भी हो सकती है?) गलत हो सकती है, तो जहां सही हो, वहां जाओ — किसी पे तो भरोसा कर लो; चलना ही पड़ेगा ना। (किसी को भी पकड़ लूं — ये भी तो गलत है —) तो मत पकड़ो ना। जब गलत ही है, तो तुम डिसाइड करो, तुम्हें चलना है। (अलग-अलग का ज्ञान अलग होता है, यही कंफ्यूजन देता है —) अलग-अलग का तरीका अलग-अलग होता है, अलग-अलग का ज्ञान नहीं होता — अभी शिद्दत नहीं है। ज्ञान अलग-अलग का क्या होता है? हम शब्दों को ढो रहे हैं। जब हमने कहा कि कुछ नहीं है — अगर मान लीजिए आपने मुझे सुना — तो मैंने आपसे ये भी तो कहा कि राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, 'मेरा', कर्ता के भाव से मुक्त हो; जब आप कर्म कर रहे हो, तो उसमें छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड मत करना; कर्म आपके द्वारा हो रहा है, तो ठीक — तो आप इसको करो। अगर इससे नहीं पहुंच पा रहे, तो दूसरा अपनाओ। एक (तो) करो। मैंने आखिरी शब्द बोला है कि उम्मीद से अपने आप को मुक्त करा लो। जब (आप) राग-द्वेष से (मुक्त हो जाओ), उम्मीद से मुक्त करा लो, (और) अगर नहीं हो, तो फिर देखो। लेकिन इतना करने के बाद (ही) — ऐसे कैसे फैसला ले लोगे कि नहीं, सब गड़बड़ है? तो (या) तुम आलसी आदमी हो — करना-धरना कुछ नहीं है, बस बातें करनी हैं, सबको जाके उलझाना है। किसी के पास जाओ, (तो) जैसा बता रहा है, पहले पूरी तरह उस मार्ग पे चलो; पूरी (तरह) चलोगे ही नहीं, (तो) पता कैसे चलेगा? चलने के पहले कैसे कह सकते हो (कि) यह गलत है?
(जैसे कृष्ण को मैं मानता हूं, कृष्ण बोल रहे हैं कि ये चीज गलत है —) तो कृष्ण की बात अगर मान ली कि ये गलत है, तो कृष्ण (ने) क्या बोला, वो करो। और अगर कृष्ण की भी (बात) आप गलत मान लिए, तो मान किसकी रहे हो? (जिसकी मान रहे हो,) उसकी करो — नहीं (तो) बेमतलब का, फालतू सबको उलझा रहे हो कि सब गलत है, तुम ही एक सही हो। अगर कृष्ण ने ये बात कह दी (कि यह) गलत है, और कृष्ण की बात आपको एकदम सही लगी, (और आप कृष्ण को) एकदम पक्का (मानते हो), तो कृष्ण ने भी कुछ (मार्ग) बताया होगा — तो वैसे चल दो। मूल पहुंचना है, चाहे जैसे भी — चलना तो पड़ेगा ही। एक को तो पकड़ना पड़ेगा, बेटा — एक साधन को पकड़ना पड़ेगा ना। कृष्ण ने कहा यह गलत है, (तो) वो छोड़ के कृष्ण ने जैसा कहा, वैसा करो। और फिर अगर वो करके मुझे मेरी राह नहीं मिलती, तो फिर कृष्ण (से) पूछ लेना; फिर कृष्ण झूठा हो जाएगा, फिर दूसरा पकड़ना। चलो तो सही — चलना तो पड़ेगा पहले।
अच्छा, मैं आपसे एक बात पूछता हूं — कृष्ण भगवान ने कहा ये गलत है और ये सही है, तो आपने कृष्ण भगवान की बात कैसे सही कर दी, और इसकी गलत कैसे कह दी? जब आप कंफ्यूज हो, तो आप चलोगे ही नहीं; (और) जब आप कंफ्यूज हो, तो कृष्ण को सही, उसको गलत कैसे माना — ये आपने कैसे कह दिया? क्या आधार है, क्या बेस? जब कंफ्यूज हो, तो सही-गलत का फैसला कैसे तुमने कर लिया? कंफ्यूज बंदा (फैसला) कैसे कर सकता है? (अगर फैसला कर लिया,) इसका मतलब आप कंफ्यूज नहीं हो। (तो पहले उस चीज को करके देखो, और जब रिजल्ट नहीं मिलता, तो फिर कोई और मिलेगा —) बात खत्म। (चलते रहना ऐसे ही —) तब तक, जब तक पहुंच ना (जाओ)। (मुझे लग रहा है ये बिना चले ही पहुंचना चाह रहा है —) कल्पना में। (ये) कंफ्यूज नहीं है, कंफ्यूज करना चाहते हैं सबको।
पहले पूरी बात सुना कर। तेरे में एक बहुत बड़ी कमी है — (सामने वाले का) सेंटेंस पूरा नहीं होता, बस अपनी बात बोलने लगता है। सामने वाला कुछ कह रहा है — उसकी बात (पूरी होने दो); ये कमी तुम्हारे में बहुत है, शुरू से कर रहे हो। पहले आपने कुछ कहा, अब वो कह रहा है — उसकी बात तो खत्म होने दो, वो कुछ कहना चाहता है। बीच में ही बोल दोगे, तो उसकी बात कहां समझ (पाओगे)? पहले तो ये कमी तुम दूर करो — या तो फिर बातें करनी हैं, कंफ्यूज हो, और सबको कंफ्यूज करके निकल जाना है। (अब क्लेरिटी आई — पहले पूरी बात सुनना पड़ेगा —) हां, क्योंकि तुम बताने वाली जगह पे नहीं हो, आप पूछने वाली जगह पे हो। आपने पूछ लिया, तो पहले क्या बताया जा रहा है, उसे पहले पूरी तरह अनुसरण करो। अगर आपने किसी की बात को पढ़ा, और जब आप कृष्ण की बात को पढ़े, तो लगा कि उसकी बात गलत है — तो कंफ्यूजन तो यहां दूर हो गई; नहीं तो आप गलत-सही में जाते ही नहीं। अगर आप एक फैसले तक आ गए, इसका मतलब आप कंफ्यूज नहीं हो — तो फिर कृष्ण के बताए अनुसार चल दो, बात खत्म हो गई। कंफ्यूज कहां हो? अगर कंफ्यूजन होती, तो आप कहते — यार, ये कुछ और कह रहे हैं, कृष्ण भगवान कुछ और कह रहे हैं, मैं करूं क्या? (कंफ्यूज हो तो) आप सही-गलत पे कभी नहीं जाते; सही-गलत पे गए, इसका मतलब बात समझ में आ रही है। तो जिसकी (बात) समझ में आ जाए, (उसकी) लेके निकल, बस — यही बात खत्म।
अरे भाई, ऐसा होता है — मैं खुद ऐसा किया हूं, मैं खुद ऐसा करता हूं। मुझे आपकी स्थिति के बारे में निर्णय नहीं करना है। मुझसे आपने कुछ पूछा, मेरा काम है आपको जवाब देना; आप कौन हैं, क्या हैं, इससे मुझे मतलब नहीं। (स्थिति का अनुमान —) लगाना ही नहीं चाहिए। (जो भी अनुमान लगाएगा,) वो अपनी स्थिति से लगाएगा ना। चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष — यहां पे एक स्त्री, एक पुरुष, बचपन से लेके वृद्ध तक, खड़ा कर दो, और बोलो इन दोनों जनों के बारे में लिखो — सब अलग-अलग लिखेंगे; और है एक ही। सामने तो एक ही है, (तो) अलग-अलग क्यों लिख रहा है? जैसी जिसकी स्थिति रहेगी, वो उसके बारे में (वैसा) लिख देगा।
आपने सुना है — 'जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि' — लेकिन ये गलत है, ये सेंटेंस ही गलत है। 'जैसी स्थिति, वैसी सृष्टि।' दृष्टि के पीछे वाला कोई है — जैसी उसकी स्थिति होती है, वैसा वो देख पाता है। आंखें तो वही की वही रहती हैं। जो इस कैमरे में झांक रहा है, (उस) झांकने वाले की जैसी स्थिति रहेगी, (वैसा देखेगा)। अगर वो डरा हुआ है, तो बाहर भी डर दिखेगा; उसके अंदर जैसी स्थिति है, सामने वाले को वैसा देखेगा। ये मार्केट में सेंटेंस है — 'जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि' — लेकिन ये सेंटेंस ही गलत है; जैसी आपकी स्थिति, वैसी सृष्टि। मैं ये कह रहा हूं, क्योंकि आंखों के पीछे कोई है, जैसी उसकी स्थिति होती है; और जैसी आपको बाहर से समझ मिलती है। जैसे आपको मित्र कभी शत्रु लगता है, और शत्रु कभी मित्र भी लगता है — ऐसा हुआ है जीवन में? आंखें तो वही की वही हैं — देखने वाले की स्थिति क्या है? आंखों का काम है दिखाना, बस — आप बंद कर लोगे, तो नहीं दिखेगा; (आंखें) एक निमित्त (हैं), डिसाइड करने वाले (आप) हैं।
कमी तुम में थी। माँ अकेले रात में चले जाते तो सो नहीं पाते — ये कारण बताया। हम जीवन लगा दिए आप लोगों के लिए; भगाने के लिए नहीं। तुम्हारा कल्याण हो जाए — लेकिन रात को बारह बजे के बाद चले गए। उनकी बहुत गलतियाँ थीं; एक थोड़ी नहीं थी। हमने बोला भी था — महिला हो, सुबह जाना। वो रात को चली गई। अहंकार बड़ा सूक्ष्म होता है — कहाँ आड़े हाथ आ जाएगा। आप अस्तर उठाने आए हो; मेरे सामने ही अस्तर गिरेगा तो मैं कैसे बर्दाश्त कर पाऊँगा। मैंने सुबह जाना बोला। जाने में कष्ट होता है — रात को माता-बेटा जा रहे हों तो रोक भी रहा हूँ। यहाँ दरवाजा पूरी तरह खुला है; लेकिन जब जाते हो तो सामने वाले को भी समझो — उसके ऊपर क्या बीती होगी। मैं किसी को नहीं भगाता; तुम ही भागते हो। टेस्ट भी होता है — जिज्ञासा है कि नहीं, तड़प है कि नहीं, व्याकुलता है कि नहीं; या बस ऐसे ही आए थे। नियम टूटने में नहीं भगाते — एक बार बोले, दो बार बोले; लेकिन जब देख रहे हैं कि समझ के कर रहे हो, जानबूझकर, तो वो गलती नहीं — अपराध हो जाता है।
जब अबोध थी तो गए क्यों? वही मूर्खता है — जाना नहीं चाहिए था। बालक जब रहता है तो माँ को छोड़ के भागता नहीं; जाता भी है तो माँ का ध्यान रहता है। यहाँ दरवाजा खुला है। आप जब जाते हो तो सामने वाले को समझो। मैंने सुबह जाना बोला; जो रुके — उनसे टेस्ट भी होता है। अनजाने में गलती और जानबूझकर समझ के की गई गलती अलग है — समझ के की तो अपराध। सजा इस शरीर में रहने से नहीं है; सजा ये है कि इस शरीर में रहते हुए पता नहीं कि मैं कहाँ से हूँ। और पता भी है तो पता है कि ये मिट जाएगा — ये सजा है। रियल में आप इस समय एक परेशान इंसान हो; पहले उस स्थिति से निकालो, तब रियल में क्या है पता चलेगा। बाहर की जानकारी कभी पूरी नहीं होती; खुद का ज्ञान पूरा हो जाता है।
ऐसा नहीं है। अब पता चला कि आपको योग्यता से ज्यादा पाने की कामना है — ये कामना कभी पूरी नहीं होगी। जितनी योग्यता है जो चाहिए मिलेगा; उसके लिए योग्य बनो। खूब पैसा कमा लो तो पैसे से मुक्त नहीं होंगी — उस डर से मुक्त होने की बात है। जरूरत में जीना है; बेसिक जरूरत देख लो। मुंबई और गाँव में बेसिक जरूरत अलग होती है — आप कहाँ रहते हो ये देखो। देख लो कहाँ रहना उचित है। गाँव में नेचर-प्रकृति है; जब लगे कि फंसने वाली नहीं हो तो ठीक। अनुभव लेकर देख लो। एक लाख लोग आ जाएँ तो किस-किस को जवाब देंगे — शरीर की स्थिति है। बैठना एक जैसा होगा; जितना मुझसे हो सकेगा जवाब दूँगा। या जब तक जवाब नहीं मिल जाता यहीं रहो। माँ आए तो बोलना — एक भी नियम टूटना बर्दाश्त नहीं होगा। माँ के लिए ढील कैसे रखूँ? ढील में अस्तर नहीं उठेगा; नियम में ही अस्तर उठेगा। अपना आश्रम बनाना है तो अगर ज्ञान हो तो बनाना; ज्ञान नहीं है तो मत बनाना।
आप आत्मिक कल्याण चाहती हो — कथा में कैसे जा रही हो? कथा सीखो नहीं; कथा में जियो। ऐसी गलती मत करना — नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी। लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए मत सीखो; पहले उसमें जियो; जब उसी स्थिति पर पहुँचो तो खुद का ज्ञान देना। कथा स्वयं के आनंद के लिए है, व्यापार के लिए नहीं। भजन हो या कथा — एकांत में जाके अपने लिए गाओ; कहीं जाके गाने की क्या जरूरत? अपनी मतवाली चाल में चलो; कोई क्या कहता है छोड़ दो — बस चाल से किसी को तकलीफ न हो। लोगों के बीच रहना पड़ेगा तो उस लायक बनो; ताकतवर बनो। भजन का पैसा लेना ही नहीं चाहिए। एक तरफ आत्मिक कल्याण की बात, और कथा में जिए बिना रट्टा मार के शुरुआत — उसे नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी। तुलसीदास कहते हैं — कथा स्वयं के आनंद के लिए। अगर किसी की मदद के लिए खुद आत्मिक गिर रही हो तो क्या होगा — शरीर का दुख आज-कल खत्म होगा; आत्मा गिर गई तो उठाने में जिंदगी लग जाती है। आपके जीवन का फैसला आपके हाथ में है।
अगर खोल दूँ तो उन पर कोई जानवर वार कर सकता है — अभी उस लायक नहीं। इधर तेंदुआ भी रहते हैं। घर बना के सुरक्षित किया; खिलाना-पिलाना-घुमाना होता है — उनकी सुरक्षा के लिए। छोटे हैं। जैसे माँ बच्चे को बाहर नहीं जाने देती — नुकसान पहुँचा देगा; जिस दिन लायक हो जाएगा छोड़ देगी। बंधन भी सुरक्षा के लिए जरूरी है। मैं भी खुले में हूँ — जब मुझ पर वार करेगा तो तुम काहे को बचोगे।
आत्मिक कल्याण अगर ये भाव है तभी होगा। प्रबल इच्छा — सब काम छोड़कर भोजन; भोजन का मीनिंग शरीर के लिए मालूम हो, तब जाके आत्मिक कल्याण। प्रबल भाव हो तो कुछ भी आने दो — पहले आत्मिक कल्याण, बाद में कुछ और। जैसे नचिकेता — यमराज ने बहुत ऑप्शन दिए, बोले पहले सत्य बताओ। जिस दिन पहले आत्मिक कल्याण पकड़ लोगी, होना पक्का है। नशेड़ी की तरह सत्संग सुनते-सुनते एक दिन आएगा — अब आत्मिक कल्याण के अलावा बात नहीं। वो पहले से मौजूद है; प्रबल इच्छा बन जाए तो रिजेक्शन अपने आप हो जाता है। आत्मज्ञान खोजने के लिए कुछ नया नहीं उतरेगा — पहले से ज्ञान मौजूद है।
उस लायक बनो, फिर रोको; प्रयास करो। रोकने के लिए सामर्थ्य-प्लानिंग चाहिए। मुस्लिम-हिंदू की बात कहाँ से आ गई — मंदिर में भी बलि दी जाती है। आँखें मूंद मत लो; जाके काम करो। कालिदास वाली बात — बलि की जगह अपनी गर्दन रख दी। आँखें खुली हो तो पहुँच जाना। पहले आत्म कल्याण करो। कहना आसान है; करने की बारी पर पता चलता है। चिपको आंदोलन जैसा डेडिकेशन — जो चुभ रहा है उसके लिए काम करो। प्रायोरिटी पहले आत्म कल्याण है। सोशल वर्क के बारे में दिमाग में घुस जाता है कि दूसरों के लिए कर रहे हैं — सब कुछ अपने लिए करते हैं। भगत सिंह ने शिद्दत से किया; शिद्दत से करोगे तो खुद भी हो जाएगा। कफ़न लोग दे देंगे — तुम बस मरो; त्याग-बलिदान करो। एक जीव बचाना है तो जान पर खेल सकते हो; लेकिन हजार बचाने के चक्कर में एक-एक कटते रहेंगे। सही-गलत में कहाँ फँसना — आत्मिक कल्याण कर लो।
ये तेरी हालत नहीं — यही हालत मेरी थी, सबकी हालत है। विचार देश-काल-परिस्थिति में आते-जाते हैं; जैसा नॉलेज है वैसा ग्रहण करोगे। किस विचार पर काम करना है देख ले। नॉनवेज — मुझसे पूछ के खाया था? छोड़ना चाहता है तो तेरी मर्जी; खाएगा तो परिणाम तुझे, छोड़ेगा तो तुझे। मैं कौन होता हूँ फैसला देने। अपना पछतावा हो तो छोड़ दो; नहीं तो कर्म का परिणाम। मेरे बोलने से छोड़ा तो नाटक होगा — दो-चार दिन का। खुद का विचार होना चाहिए। आँखें बंद करके बात नहीं बनेगी — आँखें खोलो, जान की बाजी लगाओ। बलिदान देना पड़ता है। मैंने जवानी का बलिदान दिया। सोचो — ब्याह भी, बंगला भी, और आत्मिक कल्याण भी — कई जन्म लग जाएँ तो भी नहीं होता। बातों से बात नहीं बनती; जीवन लगाना पड़ता है।
लोग सहयोग देते हैं लेकिन आने वालों से नहीं लेते; साधकों से नहीं। बाहर से करना चाहे तो — एक लाख के नीचे नहीं लेता। ट्रस्ट बनने की प्रोसेस में है। कम हो तो भी रहने की ताकत है। दूसरे चैनल बनाते रहते हैं — करने दो, ज्ञान सुन रहे हैं फैला रहे हैं। बोलना तो असली है; किसी भी चैनल से आए फर्क नहीं — मूल शब्द है। मेन चैनल: आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान योगी, आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान सत्संग आदि। कॉपीराइट नहीं देते — ज्ञान फैला रहा है। नंबर डिस्क्रिप्शन में है। बोर्ड देखकर पहचान। जिसको पहुँचना होगा भटक-भटक के पहुँच जाएगा।
अपने आप पर विश्वास तभी होगा जब पूरी जानकारी होगी जो करने जा रहे हो उसके बारे में। अध्यात्म की खोज से पहले पूछो — अध्यात्म क्या है। शुरुआत यहीं से — बेईमानी मत करो; ईमानदारी, सत्कर्म अपना लो। यहाँ सत्कर्म — सत्संग सुनकर अपनाना, अपना कल्याण; और सेवा मिल ही जाती है। जगह का महत्व होता है। करने का भाव रखो। चिड़िया को डालना — आपका खाना तब होता जब दो रोटी की भूख हो और एक बचा लो। पेट भर खा लिया और बचा लिया वो आपका खाना नहीं। खाने से पहले निकालो; मात्रा समझो — अति मत करो। यहाँ साधकों के लिए व्यवस्था है; अन्य जीवों के लिए प्रकृति। अपनी बेवकूफी को मानवता मत कहो। व्यवस्था फ्री में नहीं आती; मजाक मत बनाओ। अंदर जाओ मत — बाहर जाओ। राग-द्वेष-मोह-आसक्ति-इच्छा-अपेक्षा-मेरा-कर्ता मान छोड़ो। परिवार छोड़ दिया काफी नहीं; मान की इच्छा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा छूटी क्या। योग्यता होती तो आत्मज्ञान मिल गया होता — अभी छूटा नहीं; काम करो। यहाँ रहो, सत्संग सुनो, नियम में जियो; धीरे-धीरे समझ आएगा। बाहर से छोड़ना आसान; अंदर से नहीं।
राजा भर्तृहरि जंगल गए — माँ ने कहा जब खूब प्यास लगे तब पानी, खूब नींद आए तब सोना, तो राजघर की याद नहीं आएगी। कमंडल-छड़ी लेकर गए। शंकर ने कहा कोई त्याग नहीं। तकिया छूटा, छड़ी छूटी, कमंडल फेंका, पिंडदान का बचा आटा खाया — फिर भी बोले त्याग नहीं। आठ लिट्टी में से चार माँगीं; चार में पेट नहीं भरेगा कहा तो शंकर ने कहा चार वापस ले लो — बोले छोड़ो, राज छोड़ा पहाड़ छोड़ा, चार लिट्टी में गिर जाऊँ? तब कहा — कुछ नहीं छोड़ा, सब ले गए। जब समय आएगा पता चलेगा क्या छोड़ा। अभी शरीर से छोड़ा है; मानसिक नहीं छूटा। जिस दिन माँग से छूट जाएगा उस दिन — आत्म में खुद ज्ञान है — उपलब्धि हो जाएगी।
आपको कैसे पता चलता है कि आपको भूख लग गई है? ये पता आपको चलता है, कि आपके परिवार वालों को, या और किसी व्यक्ति को? किसे पता चलता है? आपको। इसके बाद जब भोजन आप ग्रहण करते हैं, तो आपका पेट भर गया, ये किसे पता चलता है? आपको कि लोगों को? आपको। आप बीमार होते हैं तो आपको पता चलता है कि लोगों को? मैं पूछ रहा हूँ। कई बार बीमारी ऐसी होती है कि डॉक्टर ब्लड टेस्ट करा के पता लगा लेता है, हमें नहीं पता लगता। कुछ ऐसी बीमारियाँ होती हैं कि रिपोर्ट में भी नहीं आतीं, लेकिन आपको होती हैं, आपको पता होती है। लेकिन नॉर्मल तरीके से देखा जाए तो अगर बुखार हुआ तो किसे पता चलता है? सर दर्द हुआ तो किसे पता चलता है? आप ही को पता चलता है। यहाँ तक रिपोर्ट भी फेल हो जाती है कभी-कभी। ऐसा हुआ है कि बीमारी है लेकिन रिपोर्ट में कुछ नहीं आता है। समझ में नहीं आता कि बीमारी क्या है, कुछ नहीं है, मतलब फेल है। आप पढ़े-लिखे हैं, ये बात किसे पता है? आपको। किसी और को? अगर आप ना बोलें, नहीं बताना चाहें, तो कोई करवा सकता है कि आप पढ़े-लिखे हैं? नहीं पता करवा सकता। आप जब बताना चाहेंगे तभी पता करवा सकते हैं। कहने का तात्पर्य, जीवन की हर बात आप देखेंगे तो ज्यादा से ज्यादा पहले आपको पता चलती है।
तो पहली बात, आप अज्ञानता में, अशांत में, प्रश्न लेके राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता के भाव में फंसे हुए, किसे पता है? आपको। किसी और को? आपको पता है। जब आप इससे मुक्त होंगे तो आप ही को पता चलेगा, ना किसी और को पता चलेगा। ये आपको ही पता चलेगा, क्योंकि ये सब आपको पता है। आत्मज्ञान होगा तो जब आपके प्रश्न हट जाएँगे, उत्तर हो जाएँगे, आपको ही पता चलेगा। और आप जब बोलना चालू करोगे तो समाज को भी पता चल जाएगा। आत्मज्ञान को हम खाने से, बीमारी से रिलेट नहीं कर सकते। एक समझने के लिए उदाहरण दिया जा रहा है, रिलेट नहीं किया जा रहा है। लेकिन आत्मज्ञान का लोगों को भ्रम भी होता है कि अहंकारी हो जाते हैं लोग। आत्मज्ञानी कभी अहंकारी हो ही नहीं सकता। असंभव। काम-क्रोध उसमें रह जाता है। मद और लोभ-मोह, ये तीन आत्मज्ञानी में रहते ही नहीं हैं। इनसे मुक्त हुआ तो आत्मज्ञान हुआ। काम-क्रोध रहता है इसलिए कि उसे अभी कुछ करना है। और जब करना है तो उसमें क्रोध का उपयोग करना ही पड़ता है। घुमा-फिरा के जब वो कुछ करना ही नहीं चाहता है तो क्रोध करेगा क्यों? कुछ करना नहीं है, फिर भी क्रोध किस लिए? अपने लिए नहीं, लेकिन उसके लिए।
सबसे पहले मैंने आत्मा को जाना। आत्मा को जानने के बाद फिर मुझे या तो ये पता लग गया कि सब कुछ परमात्मा है, या तो ये पता लग गया कि कुछ नहीं है। पता लग जाता है। ये दोनों कहने का मतलब है, पता लग जाता है। लेकिन वो देखता है, आपकी दो स्थितियाँ। एक तो सब एक जैसे हैं, लेकिन अपने-अपने तरीके से अलग-अलग हो गए हैं। उस अलगाव से मुक्त होने के लिए वो सामने वाले को बताता है। दो स्थितियाँ बनती हैं। एक ये कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है। अब मेरे सामने या तो मेरे जैसे ही लोग खड़े हुए हैं। अलग-अलग परिस्थितियों से, अलग-अलग चीजों से, वे मेरे जैसे हैं, लेकिन अभी मेरे जैसे नहीं हैं। तो या तो सामने परमात्मा है, या तो कुछ भी नहीं है।
ये कौन बोला कि ज्ञानी आदमी हमेशा एकांत में चला जाता है? वो बात अलग है। आत्मज्ञान के साथ यही प्रॉब्लम है कि सब कुछ किताबों में लिखा है, उसको हम मानना नहीं चाहते। जब तक आपको नहीं होगा, आप उस मार्ग पर चलिए। होगा तो आप ही को पता चलेगा, और किसे पता चलेगा। और जब तक नहीं हो रहा है, तब तक यात्रा करिए। इतनी तो समझ होनी चाहिए। नहीं हुआ है तभी तो आप पूछ रहे हो। यात्रा करने पर पता चलेगा। आप कहीं जा रहे हैं और आपने किसी से मार्ग पूछा, तो उसका काम है आपको मार्ग बताना। मैं लक्ष्य तक पहुँचा हूँ कि नहीं पहुँचा, ये किसे पता चलता है? यात्रा करने वाले को। लक्ष्य नहीं है, तो बिना खोजे खोज ही खत्म हो जाए, ऐसा थोड़ी है। पूछ रहे हो, फिर पता क्यों पूछ रहे हो? असल में सब चीजें इतनी मिली हुई हैं कि समझ में नहीं आता। अगर आप कुछ पूछ रहे हो, इसका मतलब है कि आपका लक्ष्य कोई ना कोई है। नहीं तो पूछते कैसे?
वो बात बातों में बताई नहीं जा सकती। जो नहीं दिख रहा है, दिखने तक पहुँचाने के लिए तो बता सकता है। पहुँचा हुआ आदमी शब्दों से बताएगा, पर आखिर में शब्द खत्म हो जाते हैं। लोग ये कहते हैं कि जैसे ही हमने उसका वर्णन किया, वो वर्णन ही उसको खत्म कर देता है। वर्णन खत्म कर देता है। समझने के बाद सब खत्म हो जाता है। समझते-समझते इतना समझ में आया कि उसे नहीं समझा जा सकता, तो इतना तो समझ में आया। जिस दिन ये समझ में आ गया कि उसे नहीं समझा जा सकता, उस दिन आत्मज्ञान हो जाएगा।
उसकी दो स्थिति दिखती है। एक तो मूल स्थिति वाले दिखते हैं, जो मूल में हैं। और एक वो फंसे हुए दिखते हैं। फंसे हुए से कैसे अपने आप को छुड़ा ले, उसके लिए आत्मज्ञानी बस बात करता है। आत्मज्ञान करवाने के लिए आत्मज्ञानी कभी बात नहीं करता है। आप जहाँ उलझे हुए हो, जहाँ फंसे हुए हो, वहाँ से बस कैसे निकल जाओ। बस बात खत्म हो जाएगी। निकलने के बाद आपको पता चलेगा।
एक आदमी जिसने खाना खाया, उसका पेट भर गया। पेट भरने के बाद उसका मन नहीं रहता खाना खाने का। मेरी दो रोटी में ही पेट भर जाता था, सामने वाला समझ रहा है कि उसको चार चाहिए। जिसको आत्मज्ञान नहीं हुआ, वो कैसे समझे? माँगना बंद कर दीजिए, पता चल जाएगा पेट भर गया। अगर पेट भर गया तो आप भोजन ग्रहण नहीं करोगे। लेकिन आप भोजन की लाइन में भी खड़े हो और कह रहे हो मुझे भूख नहीं है, ये दोनों बातें नहीं हो सकतीं। अगर आपका पेट भर गया तो आप नहीं खाओगे। ना खाने से पता चल जाए। इंसान कमाने के बाद भी कमाता रहता है, खाने के बाद भी जोड़ता रहता है। वो लाइन पर लगेगा, आगे के लिए रखेगा, और यही प्रॉब्लम है इंसान के साथ। आप देखिए आप क्या कर रहे हो, आप कहाँ खड़े हो।
प्रश्न हट गया। बस बात खत्म। जैसे हमने भोजन किया तो भूख हट गई। पता चल गया, पेट भर गया। अगर भूख ना हटे तो पेट नहीं भरा। प्रश्न खड़ा नहीं होता। प्रश्न से मुक्त हो गया वो। प्रश्न खड़ा ही नहीं। खड़ा भी करना चाहे तो हँसी आएगी। पूछ ही नहीं सकता। क्या पूछेगा? ऐसा नहीं कि आगे जाने का रास्ता नहीं पूछेगा। व्यवहारिक जगत में वो पूछेगा, लेकिन अंदर से प्रश्न नहीं उठ रहे। अंदर से कोई प्रश्न नहीं है। एक भी प्रश्न पैदा भी करना चाहे तो नहीं कर सकता।
गुस्सा, मोह, सब खत्म हो गया, क्योंकि कुछ है ही नहीं। एकदम नहीं है, जरा सा भी नहीं है। क्रोध भी उसे करना पड़ता है, रहता नहीं है। उसे अपने साथ जबरदस्ती कर-कर के क्रोध करना पड़ता है, क्योंकि यह व्यक्ति क्रोध से ही समझेगा। ऊर्जा से भी मुक्त हो गया। कुछ अलग ही है वो। आप जिस पॉजिटिव-नेगेटिव ऊर्जा की बात करते हैं, उससे तो बहुत परे हो गया वो। अब वो दायरे में नहीं रहा। वो दायरे से मुक्त हो गया। उसे सामने समाज की दो स्थितियाँ दिखती हैं। एक कि आप वो हो, परम सत्य। एक, आपने अज्ञानता को पकड़ा है। ये दोनों स्थिति आप में वो देख पाता है, क्योंकि आप जहाँ पर हो वहाँ से वो आया है। इसलिए आपकी वो दो स्थिति देखता है। और उसमें वो शब्दों से मदद कर सकता है। शब्दों के बाद आंतरिक भी मदद कर सकता है। कब? जब आप उसके शब्दों का उपयोग करोगे। नहीं तो नहीं। और शब्दों का उपयोग कोई कर रहा है या नहीं कर रहा, ये पता चल जाता है। आप पढ़ाते हो तो पता चल जाता है कि उसने होमवर्क किया या नहीं किया। एक शिक्षक को जैसे पता चल जाता है।
मेरे समझ से बहुत सरल है। अगर आप चाहते हो तो सबसे सरल यही है। लेकिन अगर आप चाहते हो तो। हम चाहते होते तो हम धरती पर ही नहीं आते। अब तो आ चुके हैं। अब आत्मज्ञान चाहोगे तो आपके लिए एकदम संभव है, क्योंकि वो पहले से मौजूद है। आपको कहीं से कोई देगा नहीं। यहाँ बस छुड़ाने की बात हो रही है। आत्मज्ञान कोई किसी को करवाता नहीं है। बस कैसे छूट जाओ, उसके लिए यात्रा करवाता है। अगर आप चाहो तो पक्का है। और आप नहीं चाहो तो कोई किसी को करवा नहीं सकता। अज्ञानता का भी आपको पता है, तो आत्मज्ञान होगा तो आपको ही पता चलेगा पहले। प्रश्न उठ रहे थे, वो हट जाएँगे, उत्तर होंगे। अभी तो वो स्थिति नहीं है। जब आत्मज्ञान हो जाएगा तो बात खत्म हो जाएगी। प्रश्न पैदा भी नहीं कर पाओगे। चाहोगे तो भी पैदा नहीं कर पाओगे।
काम करके भी वो काम नहीं करता। क्रोध करके भी वो क्रोध नहीं करता। काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह, उसके अंदर एक परस भी नहीं रह जाता। अगर ये एक परस भी रहे तो उसे ज्ञान ही नहीं हो सकता। असंभव। मद जब बाहर आता है तो अहंकार का रूप ले लेता है। मद, लोभ और मोह खत्म हो जाते हैं। मतलब कर्ता का भाव खत्म हो जाता है, पूरी तरह। और मेरा का भाव पूरी तरह अमन की स्थिति में चला जाता है। अमन मतलब मन नहीं है। जब चाहिए तो मन आ जाएगा। जब तक शरीर है, तब तक मन शरीर के लिए काम करता है। आपके पास नहीं होता, मन शरीर के लिए काम करता है।
भूख लग रही है तो कुछ भी खा सकते हैं। पर मन कह रहा है कि समोसा खाना है। अगर हम केवल जरूरत में रहेंगे तो रोटी खा लेंगे, और उस चीज को टाल देंगे। पर जब भूख लगेगी दोबारा, फिर मन करेगा समोसा खाने का। अगर आपकी पॉकेट अलाउ कर रही है तो समोसा ही खा लो, कम से कम मन वहाँ से चला जाए। समोसा ईमानदारी के पैसे से खाना। बस इतनी सी बात है। समोसा खाना गिरना नहीं है। समोसा को किस तरीके से खा रहे हो, बात ये है।
जैसे अगर आपने कभी समोसा नहीं खाया, समोसा नहीं देखा, तो मन समोसे पर जाएगा? नहीं जाएगा। जब आप खा लेंगे एक बार, स्वाद ले लेंगे, तो जब भूख लगेगी तब होगा, चलो नाश्ते में समोसा ही ले लेते हैं। पहले आदमी नशा नहीं करता था, तो उसका मन नशे पर एक बार भी नहीं जाता था। जब आदमी ने कई सालों तक नशा किया और उसके बाद छोड़ना चाह रहा है, कह रहा है मेरा मन नशे पर जा रहा है। मन नहीं, उसने अपनी आदत बना ली है, शरीर की आदत बना ली है। पहले नहीं जाता था। अगर मन जाता तो पहले भी जाता। आपने उसकी आदत डाली। शरीर को आदत पड़ गई। जब शरीर को कोई जरूरत होती है तो मन इंगित करता है।
जब तक आपको भूख है तभी तक स्वाद भी अच्छा लगता है। भूख जाने के बाद स्वाद की इच्छा भी खत्म हो जाती है। जैसे ही भूख लगेगी, फिर आ जाएगा। मन सिर्फ इंगित करता है। देना या ना देना आपके ऊपर है। आपने शरीर को आदत डाली है, वही मन इंगित करता है। नहीं देते हो तो लगा रहता है, इसलिए कि आदत डाली है। मन नहीं लगा रहा, आप लगे रहोगे मन के द्वारा। समोसा नहीं खाया, रोटी खा ली, तो अगली भूख तक दिमाग में समोसा घूमता रहेगा। पेट भर गया, जरूरत पूरी हो गई, लेकिन स्वाद की इच्छा है। ऐसे समय ईमानदारी से अगर धन है तो समोसा खा लेना चाहिए। और अगर शरीर को नुकसान हो रहा है, तकलीफ हो रही है, या समोसा खाने से किसी को तकलीफ हो रही है, तो नहीं खाना चाहिए।
मन को कैसे कंट्रोल करें? वो धीरे-धीरे हट जाएगा। मन को कंट्रोल नहीं कर सकते। कंट्रोल करना भी नहीं है। आपको भूख लगी, भोजन करा दो। मन आपके लिए काम ही नहीं करता। मन शरीर के लिए काम करता है, ना कि आपके लिए। जैसे ही भूख लगी, मन भोजन पर जाएगा। भूख मिटा दी तो अगली जरूरत में चला जाएगा। मन सबसे सहायक है, आपकी जरूरतों को इंगित करता है।
आपको एक कार चाहिए, एक ब्रांड सोच ली। जब तक नहीं खरीदोगे, जरूरत पूरी नहीं हो रही। दूसरी कार खरीद लोगे तब भी मन करेगा कि वो वाली मेरे पास नहीं है, क्योंकि आपने चॉइस किया है। ऐसे समय अपनी क्षमता देखो, अपनी जरूरत देखो, और अगर है तो पूरा कर डालो। नहीं है तो छोड़ दीजिए। दो चीजें होती हैं। या तो मेरी योग्यता ऐसी है, या मेरी जरूरत है। दोनों देख लीजिए। जरूरत नहीं है और कार ले रहे हो, फंस जाओगे, तो मत लीजिए। समझदारी से काम करिए। मन में बार-बार आएगा कि योग्यता है, कर सकते हो। अगर मैं ये ले लेता हूँ तो फंस जाऊँगा, तो समझ में आ जाएगी। मन जो काम करता है, तरकीब भी लेके आता है। इंद्रियाँ चार-पाँच हैं। एक तरफ समोसा, दूसरी तरफ आत्मज्ञान, वो विचार है, मन नहीं। मेरे लिए तो एक ही है। चाहिए तो मन है। बस बात खत्म। नहीं चाहिए में मन कहाँ है। मन, विचार, विवेक, सब एक ही में आते हैं। विचार का समूह एक मन लगता है। चाहिए तो मन है, और नहीं चाहिए तो तब भी नहीं है। अपने आप को रोक दिया तो खत्म हो गया।
अगर आपका मन है ही नहीं तो बात खत्म हो जाती है। पर अगर मन है तो या तो करोगे या नहीं करोगे, आपके ऊपर है। करोगे तो आदत पड़ रही है। नहीं करोगे तो छूट जाएगा। आप छोड़ोगे तो छूट जाएगा। समझ कर देखो, क्या जरूरत है। मन शरीर के लिए काम करता है, आपके लिए नहीं।
बहुत जगह आप जवाब देना चाहे, लेकिन रुक गए। चाहे माता हों, पिता हों, भाई हो, सीनियर हो, जूनियर हो। बहुत जगह आप जवाब दे सकते थे। मन ने कहा दो, लेकिन आपने जवाब नहीं दिया। बाद में पछतावा भी होता है। पछतावा इसलिए होता है कि कहीं ना कहीं दबाव में, संकोच में नहीं दिए। दबाव और संकोच में बात नहीं करनी चाहिए। अपनी बात रख दीजिए। निमित्त मन है। मन सहायक है। मन को दोष में मत देखिए। मन सिर्फ निमित्त है। ये आँख है। इन आँखों से आप क्या देख रहे हो, आपके ऊपर है। क्या आँखें दोषी हैं? आप उस दृश्य को देख रहे हो। सामने वाला नहीं चाहता और आप देख रहे हो, तो देखने में आँख का दोष है कि आपका? आपका। दृश्य आया तो नहीं भी देख सकते थे।
जितना आपने निर्माण किया है, वो लालच में बनाया, बेईमानी से, और आपको पता है। शराब किसने बनाई? प्रकृति ने बनाया कि आपने बनाया? समाज ने सिखाया कि शराब गंदी है, तो आप क्यों सीख लिए? बचपन से बताया गया। बच्चों को पिलाओगे? पत्नी को पिलाओगे? माँ को पिलाओगे? क्यों नहीं पिलाओगे? क्योंकि आपको पता है।
जिसमें बच्चा पैदा करने की क्षमता हो, उन्हें मारकर नहीं खाना चाहिए। इसलिए कि एहसास होता है, दुख होता है, पीड़ा होती है। अगर उन्हें फीलिंग है कि ये गलत है और फिर भी खा रहे हैं, तब तो नहीं पहुँचेंगे। अगर उन्हें पता ही नहीं है, तब तो उनका दोष ही नहीं है। क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है।
अगर वेज का ऑप्शन है तो नहीं खाना चाहिए। और अगर जरूरत है तो खाना चाहिए। बात नफरत की, प्यार की नहीं है। बात समझ की है। हो सकता है वेज खाने वाला बहुत ही गिरा इंसान हो। नॉनवेज खाने वाला बहुत सज्जन इंसान हो। बात ये नहीं है। बात ये है कि क्या करके मैं निकल लूँ। क्या हमारे जीवन में उचित है। क्या करके मैं स्व तक पहुँच जाऊँ। क्या करके मैं अशांत भरे जीवन से मुक्त हो जाऊँ। क्या करके मैं राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा से मुक्त हो जाऊँ। क्या करके मैं बेईमानी और दुष्कर्म से मुक्त हो जाऊँ। क्या करके मैं प्रसन्नता में जीऊँ। बस इतनी सी बात है। बिना किसी को तकलीफ दिए।
मैं आपको बताता हूँ। मेरे लिए सबसे प्यारा अगर जिंदगी में रहा तो काम। आज तक, बचपन से लेकर आज तक, मैंने अपनी मर्जी से जिया है। मेरा आज तक कोई मालिक नहीं रहा। जितने गार्डियन थे, फेल हो गए। मेरा कोई गार्डियन नहीं बन पाया। और मेरा जीने का तरीका बस इतना सा था कि मुझे करना है तो करना है। मैंने इतना ध्यान रखा कि मेरे कर्म से किसी को तकलीफ ना हो। बस बात खत्म। ये कार्य मुझे ठीक लग रहा है, मैं कर रहा हूँ।
जी नहीं। समाधि के बाद आत्मज्ञान होता है। अवधूत स्थिति के बाद होता है। समाधि अवधूत स्थिति में लगती है। समाधि आप ये मत समझिएगा कि वैसे बैठ गए और समाधि लग गई। समाधि चलते, उठते, जागते, बातचीत करते लगती है। समाधि एक ऐसी स्थिति है जहाँ राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता, खोज, अनुभव, ईमानदारी, बेईमानी, पाना, खोना, जागना, सोना, कुछ खोजना, कुछ नहीं रहता। उसे अद्भुत स्थिति भी बोल सकते हैं, उसे भयानक स्थिति भी बोल सकते हैं।
अद्भुत कब होता है, होने के बाद। उस समय भयानक स्थिति रहता है। वही स्थिति भयानक है। अद्भुत कब लगता है, जब हो जाता है तो लगता है कि वही स्थिति बहुत अद्भुत थी। जैसे हम बचपन में कुमार होने के लिए एकदम व्याकुल रहते हैं। कब मूँछ आ जाए, कब दाढ़ी आ जाए। कभी-कभी तो मूँछ नहीं आता, चोरी से बना देते हैं। लेकिन आज हम बचपन के लिए तरसते हैं। बचपन की स्थिति गजब थी। वैसे समाधि की स्थिति भी गजब ही होती है। जब वो रहती है तो उससे निकलना चाहते हैं। कब निकल जाए। कुछ अलग ही होता है। और फिर वो चली जाती है तो लगता है कि क्या थी वो, जैसे बचपन चला जाता है। लेकिन बचपन में यही भाव होता है कि कब हम कुमार हों। यहाँ तक कि दाढ़ी-बाल आता नहीं, तो कभी-कभी बालक लोग चोरी से मूँछ बना देते हैं। उसके लिए मार भी खाते हैं घर का। जल्दी से जल्दी युवा होना चाहते हैं, और बाद में पता चलता है कि ये मेरे काम का नहीं, बचपन ही मेरे काम का था।
तो आत्मज्ञान के बाद भी ज्ञान उसके काम का नहीं रह जाता, जिसके लिए इतना प्रयास किया, जिंदगी दाँव पर लगा दी। होने के बाद उसके काम का ही नहीं। बड़ी अजीब बात है। लेकिन उसके बाद ही उसकी यात्रा, परम यात्रा की शुरुआत होती है। एक शब्द भी उसके काम का नहीं रह जाता। तो ये होता है कि इतना प्रेम उसके अंदर होता है कि ये शब्द लोगों के काम के हैं। इसलिए वो अथाह मेहनत करता है। इस दुनिया में, इस पृथ्वी पर अगर सबसे ज्यादा कोई मेहनत करता है तो एक आत्मज्ञानी, जहाँ तक ये मेरा अनुभव है, और मैंने इतिहास पढ़ा है। और उसे कुछ नहीं चाहिए। तन पर फटा पुराना कपड़ा पहन के, पेट में रोटी खाकर, जो जैसा दे दे, और ज्ञान देते हुए निकल जाता है। पूरी जिंदगी मेहनत करता है। वो कभी किसी को नहीं कहता कि मेरे पास दूसरा आत्मज्ञानी चाहिए। उसको दूसरा आत्मज्ञानी नहीं चाहिए। किसके लिए मेहनत करता है। वो तो चाह रहा है पूरी दुनिया हो जाए। वो सोच रहा है पूरी दुनिया को हो जाए, सबको हो जाए।
कोई अगर अच्छा शिक्षक है, तो वो सोचता है हर विद्यार्थी टॉप पर आए, तो उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। क्या वो चाहता है कि मेरा कोई पढ़ाया हुआ विद्यार्थी फेल हो जाए। विद्यार्थी से ज्यादा दुख शिक्षक को हो जाता है, जब विद्यार्थी फेल होता है, अगर शिक्षक ने मेहनत की। उसका भाव है कि जितने लोग पढ़ें, सब टॉप में आएँ। तो ज्ञानी का भाव यही रहता है कि सब निकल लें। और सबसे ज्यादा मेहनत वो करता है। ये व्यक्तिगत मेरा अनुभव है। मैं खुद सोलह घंटे काम करता हूँ। सत्संग के बाद भी लाइव सत्संग खत्म होता है, कभी डेढ़ बजे, कभी दो बजे। इसके बाद भी यहाँ तीन-चार बज जाते हैं। और फिर सुबह सात बजे जाग जाता हूँ।
उसके बाद वो चाहे तो भी नहीं गिर सकता। कैसे भी रहे, जनक की तरह रहे या सुदामा की तरह, वो नहीं गिर सकता। कभी हमें लोग बोलते भी हैं कि आपको तो आनंद में रहना चाहिए, क्या कर रहे हो। तो मेरा भाव ये है कि मैं अकेले गया तो क्या किया। कोई है ही नहीं। अभी हैं, जब तक हैं। ये सब उपलब्धि के बाद की बात है। सौ साल बाद ये लोग नहीं दिखेंगे। कोई भी सौ साल बाद कहीं और दिखेंगे। मैं ये नहीं चाहता कि ये कहीं और दिखें। ये मूल पर जाएँ। अगर ये ना दिखें तो बहुत अच्छा है। मैं नहीं चाहता कि सौ साल बाद ये कहीं और दिखें, और ऐसे ही बस बच्चे पैदा करें, बस वही इनकी जिंदगी हो, खाना और मल साफ करना, उसी में लगे रहें। मैं नहीं चाहता कि सौ साल बाद यही करें। ये मेरा भाव नहीं है। मैं चाहता हूँ कि इससे छूट जाएँ, मूल में चले जाएँ।
बात यही है कि जब तक ये नहीं चाहेंगे, तब तक निकाल नहीं सकते। होगा ही नहीं। कोई भी नहीं करवा सकता। कृष्ण दुर्योधन के पास कितना गए, कितनी बार गए, क्या करवा पाए। नहीं करवा पाए। आप नहीं चाहेंगे तो नहीं। यही तो बात है। सत्कर्म और ईमानदारी जैसे ही आप शुरू करेंगे, आपने जो दुनिया बनाई हुई है, उसका पल्ला भी आपके ऊपर है। बड़ा मुश्किल है, और पता चल जाता है कि हम खुद नहीं निकलना चाहते। कम से कम आईना दिखा दिया। मेरा भाव यही है कि सौ साल बाद क्या, ये अब आगे ना रहें यहाँ। ये मूल में जाएँ। ये अभी कर रहे हैं, सौ साल बाद भी यही करेंगे।
आखिरी कब आएगा। जब ये करना छोड़ेंगे तब। आखिरी कब आएगा। जब आप चाहोगे, तब आखिरी है। परिवर्तनशील का आखिरी कहाँ। जिसका दायरा होगा, उसका आखिरी है। परिवर्तनशील का आखिरी कहाँ है।
आपकी आँख बंद करने से दुनिया खत्म नहीं होती। सपने की स्थिति वो है जो वास्तविक नहीं है। जब सपना प्रत्यक्ष हो रहा होता है, तो लगता है कि सही है। और जब खत्म हो जाता है, तो पता लगता है कि जो चीज थी वो वास्तविक नहीं थी। जब जागोगे तब बोल सकते हो। अभी तो नहीं बोल सकते। सपने से उठोगे तब, जागोगे तब। सपना टूटने के बाद बोल सकते हैं कि सपने में थे। अभी आप एक सपने का आधार लेकर बोल रहे हो कि सपने में हूँ। सपने में हो तो जाग जाओ। जाग क्यों नहीं रहे। सपने का आधार लेकर आप बोल रहे हो, मैं सपने में हूँ। अगर वो सपना नहीं होता, तो आप इसे सपना नहीं कहते। आप अपने आप को समझाने के लिए कर रहे हो। सपना है तो फिर छोड़ दो, सब छोड़ दो। छोड़ नहीं पा रहे हो। इसका मतलब सपना अभी नहीं है। ये बोलने में ठीक लगता है, क्योंकि एक सपने का आधार लिए हो। अगर उस सपने को हटा दिया जाए, तो फिर क्या एक सपना है। जागने के बाद बोल सकते हैं, सपना है। जब तक नहीं जागे, आप कैसे बोलोगे।
समझ कर सपना बोल रहे हो। सपना नहीं है। सपना होता तो छोड़ देते। जी तो रहे हो उसी में। सपना है तो क्यों जी रहे हो। जाग जाओ। हकीकत ही है। जागने के बाद बोलेंगे, सपना है। अभी हकीकत ही है। एक घंटे पहले जो हुआ, वो आपका एक सफर था, यात्रा थी। खत्म नहीं हुई। पर है नहीं। आप आगे बढ़ गए हो। वो पीछे है अभी। उसका उपयोग कोई और कर रहा है। मैं तो वहाँ नहीं हूँ। जो चीजें बनाईं, वो भी वैसे नहीं रहीं, वो भी बदल रही हैं। सब कुछ बदल रहा है। सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है। बस आप नहीं बदल रहे।
हर देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में आप कहते हो, मैं नासमझी में भी था, समझ में भी था। आपकी समझ घट रही है, बढ़ रही है, लेकिन आप वही के वही हो। अगर देखा जाए तो आप स्थिर हो। आप ना कहीं आए, ना कहीं गए। ना कुछ बोले, ना कुछ सुने। जरूरत में ये सब किया। आपने कुछ नहीं किया। ये मैं आखिरी बात आपको बता रहा हूँ। सफर भी आपका नहीं रहा। जरूरत का रहा। आप सफर में भी आप थे। सफर नहीं में भी आप हो। सफर खत्म हो गया तो भी आप हो। सफर में रुक गए तो भी आप हो। हर जगह आप ही आप हो। बस आप वैसे के वैसे हो। ज्यों के त्यों बने हो। आपमें एक प्रतिशत भी बदलाव नहीं हुआ। आपने कहा, मेरे पास समझ कम थी, तो भी आप थे। अब कहो, मेरी समझ बढ़ गई है, तो भी आप थे। समझ बढ़ी क्या। लेकिन आप वही के वही हो। आप ही समझा रहे हो। ये आखिरी है। ना कोई कहीं गया, ना आया। आप ज्यों के त्यों बने हो।
ये आखिरी स्थिति के बाद की बात है। अभी नहीं। अभी तो छुड़ाना है। और छुड़ाने के लिए ईमानदारी के पैसे से मन को करवा दो, और छूट जाओ। समझ कर जी लो। किसी को तकलीफ ना दो। बस, बात खत्म।
तकलीफ होगी, होगी वो जाने। उसका जिम्मेदार मैं नहीं हूँ। लाखों जीव हमारे पैरों के नीचे मरते हैं, उसका जिम्मेदार मैं नहीं हूँ। क्या मैं आसमान में चलूँ। मेरे पास और रास्ता नहीं है। जब आप चलेंगे तो हजारों जीव मरते हैं, ये सबको पता है। आप गाड़ी ले जाते हो, लाखों जीव मरते हैं। घर बनाते हो तो लाखों करोड़ों जीव मरते हैं। मुझे पता है।
मैं जब ये कुटिया का निर्माण कर रहा था, उसके पहले मेरे आँखों से भर-भर आँसू ही गिरते थे। क्योंकि मैं इतने जीवों को लगभग मरते हुए देख रहा था कि अब ये मरने वाले हैं। उसका जिम्मेदार एक व्यक्ति होगा, ये खुद। और इतने लोग आएँगे-जाएँगे। इतनी यात्रा में जितने जीव मरे होंगे, उसका जिम्मेदार ये व्यक्ति बनेगा। लेकिन कोई बात नहीं। बहुत जरूरी है। और मैं देख पा रहा था। नई खुदाई होगी, उसमें कितने जीव मरेंगे, क्या-क्या होगा। लोग गाड़ी से आएँगे, जाएँगे। उसमें मैं निमित्त बना हूँ। आप यहाँ तक आए, तो कौन निमित्त बना। मैं बना। अब कोई भी गाड़ी से आ रहा है, इस रास्ते से उसकी गाड़ी में कितने जीव मर रहे हैं। उसका जिम्मेदार कौन हुआ। आप नहीं, ये व्यक्ति हुआ, क्योंकि आप इस व्यक्ति के लिए आ रहे हो। मैं सब देख पा रहा था।
अगर मेरे लिए घर बनाना होता, तो मैं कभी नहीं बनाता। ये बना है तो पूरी तरह समाज कल्याण के लिए। नहीं तो मैं नहीं बनाता। साफ-साफ बता दूँ, मैं नहीं बना पाता। इतने जीवों की हत्या मैं एक घर के लिए नहीं कर सकता। मैं अपना जीवन कहीं भी काट लेता। बारह-तेरह साल के ऊपर तो मैंने काटा ही, घूम-घूम के। लगभग चालीस वर्ष पूरे हो गए, बीत गए। कुछ ही तो बाकी है। घूमते-फिरते, वैसे भी कब निकल जाए पता नहीं। तो मैं अपने लिए तो घर नहीं बना सकता था। मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी। यदि एक घर, मुझे रहने के लिए, इतने जीवों की हत्या हो, मैं नहीं कर सकता था। और ये सब मुझे दिख रहा था। ये मरेंगे, और उसका जिम्मेदार मैं रहूँगा। कोई बात नहीं। ये कार्य बहुत जरूरी है, बहुत ही जरूरी है। इसकी भी सजा मैं भोगने के लिए तैयार हूँ। मैंने पूरी तरह स्वीकार किया है कि इसकी भी सजा मैं भोगने के लिए तैयार हूँ। मैं भोगूँगा। ये कार्य मानव के लिए बहुत जरूरी है। और अगर ये प्रत्यक्ष ज्ञान मुझे लोगों तक पहुँचाना है, तो मुझे ये करना ही पड़ेगा।
नहीं तो आज जितना एकांत में हम आपसे बात कर रहे हैं, अगर मैं कहीं और होता, आप कहीं और होते, आपके घर पर भी इतना एकांत आप नहीं कर सकते थे। आपकी सोसाइटी थी, लोग थे, आपका परिवार था। नहीं कर पाते। इसलिए मुझे करना पड़ा। और मुझे सब दिख रहा था, साफ-साफ। कई दिन तक तो मैं उठ-उठ के रोने लगा। लेकिन करें क्या, फैसला ले लिया था, बनाना है। और जब फैसला ले लिया, तो कई-कई दिन रात को रो-रो के उठता, जाग जाता, रोंगटे खड़े हो जाते। क्योंकि सब अब मरने वाले हैं, और उस निमित्त मैं बनने जा रहा हूँ। और ऐसा नहीं कि इस शरीर के जाने के बाद बंद हो जाएगा। यहाँ आएँगे। जाने के बाद भी मेरे द्वारा हत्याएँ होंगी। इतना मैं देख पा रहा था।
लेकिन कोई बात नहीं। हम तो अपने बचपन में जब स्वर्ग और नरक के बारे में सुनते थे, तो मैं प्रार्थना करता था कि मुझे नरक देना, क्योंकि नरक में मैं कुछ काम करूँगा। स्वर्ग में तो सब सुखी बैठे रहेंगे। वहाँ जाके करेंगे क्या। तो ठीक है, कोई बात नहीं। भुगत लेंगे, जितना भी होगा। ये हाल है। और सब साफ-साफ दिखता था, समझ में भी आता था, दिख भी रहा था। पर जरूरी है, बहुत जरूरी है।
मैं कुछ बोल नहीं सकता। मेरे समझ से अगर आपके पास भोजन होगा, और आप लोगों की भूख मिटा सकते हो, तो मुझे नहीं लगता कि आप अप्रकट रहोगे। आप प्रकट हो जाओगे। मुझे कोई आत्मज्ञानी नहीं मिला। मेरे जीवन में तो नहीं मिला। तीन लोग अद्भुत मिले हैं। एक चित्रकूट में, एक बद्रीनाथ में, एक नर्मदा तट पर।
चित्रकूट में मिले, तो मुझे पागल बाबा मिले। पागल नाम था, पागल बाबा नहीं थे। फिर वो बोले कि यहाँ एक अवधूत रहते हैं। गटर के बगल में बैठते थे। बोले, चलो, आपको उनसे मिलाता हूँ। लेकिन वो किसी से बात नहीं करते। मैंने कहा, क्यों नहीं करते, मेरे से करेंगे। अब मैंने ऐसा क्यों बोला। क्योंकि मुझे पता है, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे से बात कैसे नहीं करेंगे। अगर मुझे कुछ चाहिए होता, तो मुझसे बात नहीं करते। और जब मुझे कुछ नहीं चाहिए, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि मुझसे बात ना करें। चलो, चलते हैं।
गटर के बगल में बैठे थे। जाके मैं खड़ा हो गया। उनको देखने लगा। वो मुझे देखने लगे। कुछ देर बाद उन्होंने इशारा किया, तो मैंने कहा, आसन दो, ऐसे नहीं बैठेंगे। तो उन्होंने अपनी झोली रखी थी, उसमें से आसन लगा दिया। बैठ गए। हम लोगों ने घंटों बात की। वहाँ भीड़ भी होने लगी। बस उनकी बातों में इतना समझ में आया कि जल्दबाजी मत करो। फिर लोगों ने कहा, आज पहली बार इनको मैं यहाँ बोलते हुए सुन रहा हूँ। आज तक मैंने इन्हें कभी सुना नहीं था। फिर मिलना हुआ, चला गया।
इसके बाद उन्होंने कहा, जाओ, वहाँ नदी है, रात भर वहाँ बैठ जाना। मैं गया, रात भर बैठ गया। हुआ कुछ नहीं। लेकिन मैंने उनकी बात मान ली। जल्दबाजी मैंने नहीं छोड़ी। फिर चित्रकूट से बाहर गया। फिर चित्रकूट आते समय रोड पर जाते मिले। मैंने तुरंत गाड़ी रोकी, उनके पास गया। लेकिन दोबारा मुझसे बात नहीं किए। उन्होंने एक ही बात कही थी, जल्दबाजी मत करना। और वो कोई साधारण नहीं थे। ये दूसरे मिले। सबसे पहले मुझे बद्रीनाथ वाले मिले थे।
बद्रीनाथ की घटना ये है। जब मैं पहुँचा, तो मेरे पाँव पूरे सड़ गए थे। खून निकल रहा था। मैं गाड़ी वाले से बोला, मैं आगे बैठूँगा। केदारनाथ, तुंगनाथ से बद्रीनाथ जा रहा था। गाड़ी वाले ने कहा, ज्यादा पैसा लगेगा। मैंने कहा, जितने पैसे हों, दे देंगे। ये केदारनाथ में जब बाढ़ आई थी, उसके अगले साल की बात है। गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी वाले से बात होने लगी। जब उतरने लगा, तो बोला, आपसे पैसे ही नहीं लूँगा। मैंने कहा, कैसे, पैसे नहीं लोगे, ये कोई बात होती है। जबरदस्ती मैंने उसकी गाड़ी में पैसे छोड़ दिए। मेरा हिसाब-किताब रहता है। भैया, ले लो।
आगे गया। पूछा, बद्रीनाथ का मंदिर कहाँ है। बोले, आगे जाओ। पाँव से चला नहीं जा रहा था, खून निकल रहा था। फिर किसी से पूछा, फिर आगे जाओ। मैंने कहा, बद्रीनाथ को कितना घुमाओगे। आगे एक महाराज मिल गए। कहा, महाराज, बद्रीनाथ का गेट कहाँ है। बोले, आओ चलो, मैं बताता हूँ। ले गए, और गर्म पानी में पहले खड़ा कर दिया। बोले, पहले यहाँ खड़े हो जाओ। गरम-गरम पानी। मेरा चप्पल उठा के रखने लगे। मैं बोला, देखो, चप्पल मेरा मत छूना, महाराज जी। ये मुझे अच्छा नहीं लगता। वो मुझसे उम्र में बड़े थे।
आज भी अगर मैं बस में जाता हूँ, और कोई बुजुर्ग आ जाए, महिला गोद में बच्चा लिए आए, मैं खड़ा हो जाता हूँ, सीट दे देता हूँ। ये बचपन का है, आज भी है। खड़े होने की ताकत मुझमें है। बुजुर्ग हो, गोद में बालक हो, या कोई गर्भवती हो, तब मैं सीट पर नहीं बैठ पाता। चाहे वो मेरी सीट क्यों ना हो। सीट देना ही देना है। जबरदस्ती, आपको बैठना है, बैठिए। औपचारिकता नहीं।
पाँव-मुँह धोया, बाहर आए। बोले, चलो, तुम्हें बद्रीनाथ का दर्शन कराते हैं। फूल-माला लिए। एक मंदिर में घुसा दिया। मैंने सोचा, यही बद्रीनाथ का मंदिर है। अंदर पंडित बोले, वहीं से करो। मैं वहीं खड़ा हो गया। वो बाहर से चिल्लाए, ओ, बड़ा सा बनता है क्या तू, जाओ। मैं कुछ नहीं बोला। पास में गया, दर्शन किया। फिर बोले, अब चलो बद्रीनाथ का दर्शन। मैंने सोचा, घुमा-फिरा के यही मंदिर है। लेकिन वो बद्रीनाथ का नहीं था, कोई और मंदिर था।
ले गए। बोले, अंदर से करोगे कि बाहर से। मैंने कहा, महाराज जी, इतने दूर से आए हैं, अंदर से करेंगे, बाहर से क्यों। बोले, पैसे लगेंगे। मैंने कहा, पैसे लगेंगे तो पैसे दूँगा। लगभग पंद्रह सौ के ऊपर बताया, पंद्रह सौ, दो हजार, ढाई हजार, पूरी तरह याद नहीं। मैंने कहा, महाराज जी, इतने लगते हैं क्या। नहीं करना। अरे रुको, मैं आता हूँ। आए, बोले, चलो, बिना पैसे का करवाता हूँ। खड़ा कर दिया। अंदर गया, दर्शन किया। आसपास विद्वान लोग बैठे थे। बोले, इनसे मिलना है। मैंने कहा, महाराज जी, इनसे मुझे नहीं मिलना। जिससे मिलने आया था, मिल लिया।
फिर लेप दिया। बद्रीनाथ को लेप लगता था। बोले, रख लो। मैंने कहा, महाराज जी, एक कपड़े में रहता हूँ। जीवन भर के लिए रख रहा हूँ। मैं उसे खा लिया। बोला, ये जिंदगी भर के लिए मैंने रख लिया।
और वो क्या करते थे। हटो हटो। महाराज जी केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए हैं। मैंने कहा, महाराज जी, मैं केदारनाथ चढ़ा था पैदल, लेकिन केदारनाथ से बद्रीनाथ गाड़ी से आया। ये बात उन्हें आखिरी तक समझ में नहीं आई। यही बोलते रहे। भीड़ हटाओ। भीड़ भी कुछ नहीं बोलती थी। हटो हटो, महाराज जी केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए हैं। दर्शन कराया, बाहर ले गए।
बोले, कहाँ रुकोगे। मैंने कहा, होटल में। बोले, होटल में रुक जाओ। चलो, भोजन कराते हैं। मैंने कहा, महाराज जी, आप भी खा लीजिए। बोले, नहीं, मैं नहीं खाऊँगा, भूख नहीं है। आगे गए। मैंने कहा, आप भी खा लेंगे तो अच्छा है। अकेले खाना जमता नहीं। कोई साथ में हो तो खाए। बोले, देखो, ये नाटक मुझे पसंद नहीं। एक अन्न भी नहीं खाऊँगा। मैंने कहा, महाराज जी नाराज हो रहे हो, छोड़ो, जाने दो।
होटल में गए। वो बोल रहे, महाराज जी केदारनाथ पैदल आए, बढ़िया खाना लगाओ। मुझे उन्हें आड़े लेकर जाना पड़ता था, सामने नहीं। मैं गाड़ी से आया हूँ। आखिरी तक ये बात समझ में नहीं आई। बैठे। मैंने कहा, आप भी खा लो। बोले, मुझे नाटक पसंद नहीं। उठे और चल दिए। भोजन आया, मैंने किया। बिल देने गया। होटल वाले से पूछा, महाराज जी को जानते हो। बोले, नहीं जानते। और जैसे ही बिल देने गया, वो आ गए। बोले, पैसा है कि दूँ। मैंने कहा, है। कहाँ रुकोगे। बगल में ही कमरा था। पैन कार्ड दिखाया। रूम ले लिया। वो चले गए।
सुबह गरम कुंड में गया। महाराज जी वहाँ थे। मैंने कहा, महाराज जी, जय माता दी। कुछ बोले ही नहीं। लगा, नाराज हो गए। मैं किसी को ज्यादा नहीं मनाता, एक से दो बार। फिर चला गया बद्रीनाथ के मंदिर। कहा, बाहर से दर्शन कर लेते हैं। ऐसे किया। आँख खोली, नजर गई, पीछे खड़े हैं। बोले, कब से खोज रहा हूँ। जब जय माता दी बोला, तब जवाब नहीं दिया, और कह रहे हैं कब से खोज रहा हूँ।
फिर बोले, चलो, लक्ष्मी का दर्शन कराते हैं। ले गए। प्रसाद दो, महाराज जी को। केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए। मैंने कहा, भगवान, मैं क्या कहूँ इनको। इतनी बार बोला। फिर दर्शन कराते रहे। हटो हटो, केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए हैं। बस यही उनका पॉइंट था। मैं बोल भी रहा था, महाराज जी, मैं गाड़ी से आया हूँ। वो माने नहीं।
फिर बोले, एक काम करो, रुक जाओ। मैंने कहा, महाराज जी, मैं रुकूँगा नहीं। बोले, नहीं, रुक जाओ। मैंने कहा, कपड़ा मैं धोता हूँ, नीचे रखता नहीं। कपड़ा कौन पकड़ेगा। बोले, मैं हूँ ना, मैं कपड़ा पकड़ूँगा। और पता है, मैं तुम्हारे लिए साबुन लेने गया था। तेल लाया हूँ। मैंने कहा, महाराज जी, मैं नहीं रखूँगा। मैं पक्का जाऊँगा। बोले, चलो, मेरी कुटिया में चलो।
कुटिया में गए। बोले, तुम्हें पैसा चाहिए। उसी समय मेरा पैसे का अहंकार खत्म हो गया। कॉपी खोली। बोले, जितना पैसा चाहिए, ले लो। पता नहीं उस पैसे में क्या था। पैसा देखते ही पैसे से छूट गया। पैसे का अहम भाव निकल गया। मैंने कहा, नहीं महाराज जी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। फिर मैंने उन्हें कुछ दिया। जबरदस्ती तब उन्होंने लिया। फिर खिलाया-पिलाया, मेरे साथ दिया।
बोले, तुम्हें पता है रात को कहाँ गया था। बस स्टैंड पर। एक तरफ रोक भी रहे हैं, एक तरफ रात को ही बस देख के आए हैं। ये पॉइंट बाद में समझ में आया। रास्ते में पूछा, महाराज जी, आपका नाम क्या है। बोले, मेरे को ऐसा बकवास अच्छा नहीं लगता। मैं तुमको नीचे मिलूँगा। ना नंबर है, ना नाम है। मिलेंगे कैसे। फिर बोले, चलो, बस पकड़ाता हूँ। चाय की दुकान पर गए। बोले, बढ़िया चाय बनाओ, टोस्ट दो। फिर भी कह रहे, महाराज जी केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए। लेकिन वो ड्राइवर वहीं खड़ा था, जिसने मुझे छोड़ा था। पैसा नहीं ले रहा था, तो चेहरा पहचान रहा था। मैंने कहा, महाराज जी, इधर आइए। ड्राइवर यहीं है। चाय अच्छा बनाओ। केदारनाथ बद्रीनाथ छोड़ो बोलना। खाया। बोले, जो इच्छा हो, मन हो, खा लिया करो। फिर बोले, बस पकड़ के चले जाना। चले गए।
बस आने से पहले वो आ गए। बोले, बस आ रही है। बस में बैठा दिया। टंकी से थोड़ा दूर बस रुकी। मैं सीट पर बैठा था। देखा, महाराज जी चढ़ के वापस आ गए। बोले, पैसे वैसे हैं तुम्हारे पास। मैंने कहा, हैं, ठीक है। बस चालू हो गई। नीचे से बोले, मुझे सुबह पता चला कि तुम बहुत अच्छे संत हो। रात को पता चलता, तो अपनी कुटिया में रोकता। सुबह पता चला तुम्हारे बारे में। मैंने कहा, महाराज जी, अब आशीर्वाद दे दो। खिड़की से सर झुकाया। उन्होंने सर पर हाथ रखा। बस निकल गई।
मैंने पीछे मुड़ के देखा। मेरे बस के पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। जिंदगी में ऐसा पहली बार हुआ। मेरे लिए कोई इतना, जिसे मैं जानता भी नहीं। रास्ते भर उनको देखना चाह रहा था। उतर नहीं पाया। और आज तक वापस जा नहीं पाया। उसके बाद चित्रकूट वाले मिले। और आखिरी में नर्मदा तट पर मिले।
ओंकारेश्वर में सब छूट गया था। कहीं जाने के लिए नहीं था। सब खत्म हो गया था। ऐसे ही रो रहा था। आँखों में आँसू। एक महाराज जी रोड के उस पार। मैं उन्हें देखा, वो मुझे देखे, और हम दोनों एक-दूसरे की तरफ खिंच गए। वहाँ पेड़ था, चौतरा था। बैठ गए। बातें करने लगे। उनके पास एक मोबाइल था। मैंने कहा, देखो महाराज जी, मुझे आत्मज्ञान चाहिए। बोला, आप क्यों मोबाइल रखे हो। बोले, तुम कहो तो अभी फेंक देते हैं। मैंने कहा, पक्का फेंक दोगे। बोले, हाँ, फेंक देते हैं, लाओ। मैंने कहा, रुको, फेंको मत, लाओ। फिर बोले, चलो मेरे साथ चलो। जाते-जाते एक होटल आया। बोले, चलो नाश्ता कर लेते हैं। भूख मुझे बहुत लगी थी। मैं पैसा निकालने एटीएम पर गया था, पैसा निकल नहीं पाया था। होटल में पूछा, भोजन करना है, थाली कैसे है। दो सौ, ढाई सौ रुपये की थाली बताई। मैंने कहा, कार्ड से दे देंगे। फिर कहा, छोड़ो, नाश्ता ही करते हैं। नाश्ता किया। नाश्ता के बाद होटल वाले ने पैसा नहीं लिया।
आगे बढ़े, तो उन्होंने कहा, एक बात बताओ, तुम्हारा एक करोड़ में हो जाएगा। मैंने कहा, क्या करोड़। बोले, आश्रम। मैंने कहा, महाराज जी, मुझे आत्मज्ञान के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए। पहले आत्मज्ञान, बाद में कुछ और। मुझे अब कुछ नहीं चाहिए। साथ-साथ चलते रहे। वो समझाते रहे। बार-बार पैसा पूछते थे, एक करोड़ में तुम्हारा हो जाएगा। मैं वही कहता, आत्मज्ञान के अलावा कुछ नहीं। क्या समझाया, मुझे याद नहीं है। पॉइंट बता रहा हूँ।
एक मंदिर में रात रुके। सुबह उठे। बोले, अब से तुम मिले हो, तुम्हारा पूजा-पाठ लेट हो रहा है। ऐसे ना हो कि मैं ज्यादा दिन रुकूँ, तुम्हारा सब छूट जाए। हाँ, मैं जिसके साथ ज्यादा दिन रहता हूँ, उसका सब छूट जाता है। मैंने कहा, महाराज जी, परिक्रमा क्यों कर रहे हो। परिक्रमा से क्या होता है। सुबह पूजा करने जा रहे थे। हम भी बैठे, वो भी बैठे। उन्होंने मेरे पाँव छुए, प्रणाम किया। वो बुजुर्ग थे। जब मेरे पाँव छुआ, तो मैंने उनके पाँव छुए। बोले, पता है, तुममें मैंने कुछ देख के तुम्हारे साथ चला है। मैंने कहा, महाराज जी, मैंने भी आपमें देख के ही चला। फिर उन्होंने कहा, तुम्हें पूरे भारत में कोई आत्मज्ञान करवा नहीं सकता।
रास्ते में मेरे पास पैसे नहीं थे। चप्पल काट रही थी, तो एक-दो ब्लेड के लिए उनसे पैसे लिए थे, बाद में देने थे। उस समय कहा कि पूरे भारत में कोई नहीं करवा सकता। तो अब मैं जा रहा हूँ। शाम का समय। लगभग नौ किलोमीटर पैदल जाना है। जेब में एक रुपया नहीं। एटीएम तक पहुँचने के बाद पैसा मिलेगा। मेरी आदत जल्दी लिफ्ट माँगने की नहीं है। चला जाता हूँ, धीरे। कोई पूछ के बैठा हो तो ठीक। बहुत थक गया, तब माँग लेता हूँ। बोले, रुको। मैंने कहा, नहीं। अब नहीं रुकेंगे। जब होगा ही नहीं, तो रुकना क्यों। समय नहीं है। चला गया।
दो-तीन किलोमीटर बाद एक लड़के से पूछा, मुझे बेड़िया जाना है। रावेर, खेड़ी, नर्मदा तट। बात होने लगी। दो लड़के आए थे, उसी गाँव के। खूब बातें हुईं। वो बोला, लगता है महाराज जी, मुझे आपको छोड़ना पड़ेगा। बाजीराव पेशवा की समाधि देखी क्या। मैंने कहा, नहीं देखी। बोले, चलो, वहाँ घुमाता हूँ, फिर छोड़ दूँगा। वहाँ महाराज जी रुके हुए भी थे। बगल में आश्रम था। महाराज जी से फिर मिलना हो गया। मैंने सोचा, इनका थोड़ा है, दे दूँगा। इस लड़के से ले लूँ, बाद में एटीएम से निकाल के दे दूँगा। महाराज जी रास्ते में कई बार बोलते थे, मुझे आज नर्मदा तट पर कुटिया बना के रहना है। मैंने उस लड़के से कहा, आप महाराज जी के लिए कुटिया बना दोगे क्या। बोला, हाँ, बना दूँगा।
वहाँ शिव मंदिर है। वो शिव मंदिर जाने लगा, तो महाराज जी पीछे हो गए, मैं और वो लड़का आगे। महाराज जी ने पीछे से कहा, भक्त और भूत के चक्कर में पड़ना मत। किसी के होते नहीं हैं। भक्त मिल गए, आगे चले गए क्या। मैंने कहा, अरे महाराज जी, ऐसी बात नहीं है। आगे जाके मैंने कहा, महाराज जी, ये कुटिया बना देंगे। बोले, ये क्या बनाएगा कुटिया। जितना बोलो, मैं बना देता हूँ। ये कुटिया बनाएगा। फिर मैंने उस लड़के से पैसा ले के महाराज जी को देने लगा। महाराज जी ने पैसे नहीं लिए।
फिर मैं वहाँ से चला गया। मुंबई चला गया। फिर मुंबई से उसी स्थान पर आया। फिर वहाँ से नर्मदा तट की यात्रा की। फिर रोते-रोते मुंबई गया। फिर गुजरात गया। फिर गुजरात से नर्मदा तक आया। ऐसे में पता नहीं क्या हुआ। प्रश्न फट गए। उत्तर हो गए।
ये तीन लोग अद्भुत थे। इन्हें हम क्या नाम दें। कोई शब्द का उपयोग नहीं कर सकता। अद्भुत थे। पहले बद्रीनाथ मिले, तो बोले, नीचे मिलूँगा। उसके बाद चित्रकूट, जल्दबाजी मत करो। फिर नर्मदा तट पर ये मिले। ये मेरा आखिरी मिलना था। तीनों अद्भुत थे। तीनों का किसी से मतलब नहीं था। पर तीनों ने मेरी सेवा की। तीनों का नाम मुझे पता नहीं। बद्रीनाथ वाले तो अद्भुत थे। एक आदमी, जिसको मैं जानता नहीं, मेरे लिए पागल हो गया। पैसे का अहंकार भी उन्होंने तोड़ा। ऐसे लोग हैं भारत में। तीन मुझे मिले। शब्दों में उनको नाम भी नहीं दे सकता। नर्मदा तट वाले अभी भी हैं कि नहीं, फिर मिला नहीं। पता ही नहीं। नाम ही नहीं पता। कहाँ से आए, कहाँ गए, पता नहीं। समाज में कोई परिचय नहीं। किसी के द्वारा भी वहाँ पहुँचा जाए, ऐसा नहीं। तीनों जन अद्भुत थे। आत्मज्ञानी मुझे कोई नहीं मिला। इसलिए ये तो अद्भुत थे। इनके बारे में क्या बोलूँ। और अपने आप हुआ। कोई करवाया नहीं। अपने आप हुआ। ये मेरी आखिरी परीक्षा चल रही थी। पृथ्वी पर मुझे कहीं रहने की जगह नहीं थी। तब मुझे एक करोड़ देने के लिए तैयार थे।
उपनिषद पूरी नहीं पढ़ी। मैं बहुत कुछ नहीं पढ़ा। भगवत गीता पढ़ी थी। ज्ञान अपने आप प्रकट हो गया। जैसे ही आत्मज्ञान आया। 2010 में शायद भगवत गीता पढ़ी थी, और कई किताबें पढ़ीं। अगर आप खोजी हो, तो लोग आपकी सहायता भी करते हैं। समय आने पर मदद करते हैं। लेकिन ये अद्भुत होते हैं। इन्हें आप बुद्धि के स्तर से नहीं समझ पाओगे। ये अद्भुत होते हैं, पागल होते हैं। बुद्धि के स्तर से समझा भी नहीं जाएगा। तीन हमारे जीवन में ऐसे मिले। मेरे प्रश्न खत्म हो गए।
दो लोग सफेद में मिले थे, नीचे भी सफेद, ऊपर भी सफेद। एक गेरुआ में मिला था।
इसके बारे में और बोला हूँ। मेरा एक वीडियो है, योगी जी की आत्मकथा, आध्यात्मिक प्रतिज्ञान, योगी चैनल। ढाई घंटे के ऊपर का है। तीन मुझे मिले। तीन बहुत है, प्रमाण। और वो भी लगे हुए हैं। जब उनको कुछ दिखा, तो उन्होंने जितनी मदद कर सकते थे, की। एक ने मुझे आखिरी में जाँचा, लालच है या नहीं। एक ने कहा, तुम संत हो, मुझे सुबह पता चला। एक ने कहा, जल्दबाजी मत करो। वो मेरा आखिरी समय था, 2019 की दिवाली के पहले का। और 2020 में हो ही गया, शुरुआत में लगभग।
मुझे ज्ञान के बाद समझ में आया। मूल्य ज्ञान के बाद पता चला, 2020 में ही आया है। पहले ज्ञान हो गया, बाद में समझ में आया कि इतना सब करने की जरूरत नहीं थी। और बाद में आया कि यही तो करता था, इसका कारण हो गया। मैं यही तो करता था। मैं बोल सकता हूँ, बचपन से। लेकिन पता नहीं था। तो बचपन से इतना समय लग गया। ये मैं बचपन से करता था, क्योंकि मुझे अपना जीवन याद आने लगा कि मैंने क्या किया। कोई अगर शुरू करेगा ये करना, तो वो बस करता रहे। कब होगा, उसके हाथ में है या नहीं, ये नहीं पता। लेकिन होगा पक्का। उसी जन्म में होगा, ये पक्का नहीं है। लेकिन बहुत तेजी से करेगा तो इसी जन्म में संभव है। मैं अगला जन्म तो बोलता भी नहीं। इसी जन्म में करो। मैं तो बोल रहा हूँ, इसी जन्म में करो, अभी करो।
प्रारब्ध क्या है। आपका कर्म ही तो है। प्रारब्ध के पीछे क्या है। आपका काम। आपको महीने का पेमेंट मिला, तो उसके पीछे आप कहेंगे ये प्रारब्ध से मिला। तो एक महीने की मेहनत आपकी थी। जितनी आपने हाजिरी भरी, उतना अगले महीने मिल जाएगा। पूरी हाजिरी भरो। सीधी सी बात है। प्रारब्ध किसके हाथ में है। आपके हाथ में है। पिछले जो बोलते हैं, पिछले दिन का पता नहीं है। जितना पता है उतना करो। जो पता नहीं, उसके पीछे क्यों घूमना।
नींद आ रही है, तो सोए क्यों नहीं। गद्दी है, यहाँ सोना है। कल रात में आए, दिन में इतना मौका मिला, सोए क्यों। बाँसुरी बजा रहे थे। कोई काम भी तो नहीं था। आराम से जाके बिछा के बढ़िया सोए होते, पंखे के नीचे। तब तो इधर-उधर राउंड मार रहे थे। अपने समय की नींद आ रही है, अब यहाँ तोड़ना पड़ेगा, क्योंकि रोज यहाँ यही हालत है।
रह सकता है। क्या दिक्कत है। रह सकता है। जनक इसलिए रहे कि गुरु ने आदेश दिया। उनकी जाने की इच्छा नहीं थी। राजा जनक जाना कहाँ चाहते थे। गुरु ने कहा कि नहीं, तुम एक अच्छे राजा की तरह जीवन जी सकते हो, और तुम्हारी समाज को जरूरत है। अष्टावक्र ने उन्हें सलाह दी, तब वो वापस गए। तो वो रह सकता है।
गिरेगा कैसे। अब वो गिरता कैसे है। व्यक्ति बेईमानी और दुष्कर्म से गिरता है। अब वो करने लायक रहा ही नहीं। कर ही नहीं सकता। अब जो भी होगा, सत्कर्म ही होगा, बस ईमान। यहाँ तक मैं आपको बता दूँ, आत्मज्ञानी ईमानदारी और सत्कर्म से भी ऊपर उठ गया। उसके जीवन में ईमानदारी और सत्कर्म भी नहीं रहा। कर्म ही नहीं रहा। तो गिरेगा क्या। कैसे गिरेगा। जब खुद का कोई काम होता है, तब आदमी गिर सकता है। अब उसके पास कोई काम ही नहीं है। गिरेगा कैसे। जैसा है, वैसा लोगों को बता दे रहा है। बस, बात खत्म। देखने वाले लोग समझेंगे, वो गिर रहा है, उठ रहा है। उसको कुछ नहीं होता। अब नहीं गिर सकता।
हाँ, एकदम। ईमानदारी और सत्कर्म मूल है, ये ज्ञान के बाद देखा, जाँचा। और कुछ नहीं चाहिए भाव बनाओ। जरूरत में जीना चालू करो। सूत्र तो आपको मिल ही गया, सरल तरीके से।
अपने लिए नहीं निकला था। मेरे जीवन में मिलने वाले भी बहुत सज्जन और अच्छे लोग थे। जब मैं ज्योतिष का काम करता था, मैं थक गया था। बोला, यार, इसमें नाम सूरत का कुछ नहीं है। मेरे एक गुरु जी थे, वो ज्योतिष सिखाए थे। मैं उनके पास गया। मैं बोला, मुझे कहीं एकांत में जाना है। अब मेरी इच्छा नहीं है यहाँ रहने की। बोले, क्या करोगे जाके। तुम्हारे पास कुछ है, समाज के लिए कर सकते हो। बोला, नहीं, मुझे जाना है। तो उनका कहना था कि पशु भी अपना भला कर लेता है। तुम्हारे पास कुछ है, और तुम समाज के लिए कर सकते हो। तो मुझे सलाह देने वाले उचित लोग मिले मेरी जिंदगी में। फिर मैं संन्यासी हुआ। संन्यासी, संन्यास के लिए नहीं हुआ, सीखने के लिए। तीन दिन बाद आश्रम छोड़ा। फिर 2015 में कपड़े उतारे। ऐसे घूमता रहा। फिर भी खोज एक थी। फिर आध्यात्म को देखा, व्यापार बन गया। तो मैंने कहा, प्रत्यक्ष ज्ञान ढूँढूँगा। कौन सा ज्ञान। प्रत्यक्ष। इसमें कोई नहीं होगा, सिर्फ वो होगा। इसमें कोई आदमी और नहीं होगा। मैं तो एकदम नहीं रहूँगा, और किसी को घुसने नहीं दूँगा। मैं नहीं रहूँगा, और कोई और भी नहीं घुसेगा। और तब घुसता, जब प्रत्यक्ष नहीं होता। तब आप यहाँ से जाके किसी और से पूछते। मैं यहीं का यहीं खत्म करूँगा। तीसरे को घुसने नहीं दूँगा।
ऐसा कुछ नहीं। ऐसा कुछ अनुभूति नहीं। मेरे तो प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। बात खत्म। ऐसे प्रश्न आने ही बंद हो गए। सारे प्रश्नों के उत्तर मिल गए। प्रश्न हट गए, उत्तर ही रह गए। कोई प्रश्न ही नहीं है। अगर मैं पैदा भी करूँ तो नहीं है। मैं प्रयास भी करूँ तो मैं नहीं पूछ सकता।
पहले प्रश्न आते थे। प्रश्न तो 2011 से लेकर आखिरी 2019 तक। पागल था। रो रहा था, प्रश्न के उत्तर पाने के लिए। मेरे प्रश्न कभी टूटे नहीं। मैं तो रोते हुए प्रश्न करता था, चिल्ला-चिल्ला के। ऐसा सत्संग कभी नहीं मिल पा रहा था।
मुझे ये नहीं हुआ कि प्रश्न करना ही बेकार है, स्वीकार कर लो। मैं पूछ-पूछ के थक गया। अब मैं कहाँ जाऊँ, मुझे नहीं पता। अब मेरे पास सामर्थ्य खत्म हो गई। मैं जितना खोजना था, खोज लिया। अब कहीं जाने के लिए बचा नहीं। ये मेरी आखिरी स्थिति है। आँखों में आँसू, और खड़ा हो गया। अब कहाँ जाऊँ, मुझे पता नहीं। क्योंकि जितनी मेरी सामर्थ्य थी, मैंने पूरी तरह खोज ली। मेरे पास रास्ता नहीं है। ऊपर से लेकर नीचे तक, भिखारी तक को भी नहीं छोड़ा। अब कहाँ छोड़ूँ। थक गया था। कहाँ जाऊँ, समझ में नहीं आ रहा। खोज ही खत्म हो गई थी। जितनी सामर्थ्य थी, धन से, तन से, ज्ञान से, सब लगा दिया था। आखिरी में मैं बचा था। कुछ नहीं मेरे पास बचा था। परिवार से लेकर नाते-रिश्तेदार, सब खत्म हो गया था। मेरे पास कुछ भी नहीं था। एक दिन, कहाँ खोजूँ। थक गया था, क्योंकि सामर्थ्य खत्म हो गई थी। जितना कर सकता था, कर लिया। जनवरी का महीना है। आँखों में आँसू थे। ये मेरी आखिरी स्थिति थी।
एक ही प्रश्न था, आत्मज्ञान कैसे हो। बस इसको कोई तोड़ ही नहीं पाता था। जैसे ही जवाब दे, प्रश्न खड़ा का खड़ा। टूटता ही नहीं था। वो कहे, समर्पण करो, तो समर्पण कैसे हो। भक्ति करो, तो भक्ति कैसे हो। ध्यान करो, तो ध्यान कैसे हो। बताओ कैसे हो। ये कभी टूटा नहीं। मुझे पता था, अगर ये प्रश्न टूट गया तो मुझे ज्ञान हो जाएगा। कुछ नहीं चाहिए का भाव मेरा प्रबल था, इसलिए कभी भी हो सकता था। प्रश्न टूटा, तो मुझे पता था, ये प्रश्न टूटा तो आत्मज्ञान होगा। पक्का। प्रश्न टूटते ही तरीका समझ में आ जाता है। ज्ञान का तो बस खत्म हो जाता है।
और कर्मों के सेटलमेंट के बीच में ही हो सकता है। कभी भी। अगर किसी की उम्र ज्यादा है, मान लो साठ साल की उम्र में आत्मज्ञान हुआ, लेकिन कर्मों का सेटलमेंट बाकी है, बीच में ही हुआ, तो बचा होगा तो आ जाएगा। अष्टावक्र की तरह। घर में ही ज्ञान था। आठ जगह से कुबड़े पैदा हुए। वो भोग बाकी रह गया था, आ गए। ज्ञान का प्रयास उन्हें करना नहीं पड़ा। लेकिन आठ जगह से कुबड़े थे, वो भोग उनका बाकी था, आ गए। जब मृत्यु की व्यर्थता समझ में आ जाती है, तो जन्म-मरण का कोई मुद्दा नहीं रहता। आने-जाने के लिए, आ जाए तो आए, ना आए तो ना आए। ये तभी आएगी, जब इच्छा और अपेक्षा से आप मुक्त होंगे। उसके पहले तो आएगी ही नहीं।
इस जन्म में हर कोई प्रयास कर सकता है, आत्मज्ञान पाने का। इसीलिए तो चिल्ला रहे हैं। किसी भी उम्र में। उम्र का कोई मतलब नहीं है। शरीर की उम्र आपकी थोड़ी है। भोजन कर रहे हो, जा रहे हो। करना है तो कर लो। शादी में जा रहे हो, फिर कर लो। रुकना है तो रुक जाओ।
मूल सिद्धांत सबको पता है, ईमानदारी करना। अगर कोई साधक एकांत में जाता है, तो उसके लिए भी सत्कर्म मायने रखता है। वहाँ भी मिल जाएगा। हम लोग आए हैं, तो यहाँ भी मिल जाएगा। अभी एक दिन की बात है। सत्संग वहाँ हो रहा था। माताजी आ नहीं पा रही थीं। दो लोगों ने उठा के लाया, तो उन्हें मिल गया। प्रकृति हर जगह मौका देती है। अपने आप देती है। कोई भी व्यक्ति जिस स्थिति में भी रहता है, जहाँ भी रहता है, उसके लिए ईमानदारी सबसे जरूरी है। हर जगह मिलता रहता है। चाहे कहीं भी रहो, दुनिया में मिल ही जाता है।
अभी हो जाएगा। आत्मज्ञान कभी भी हो सकता है। जैसे रामकृष्ण परमहंस को आत्मज्ञान के बाद कैंसर का भोग भोगना पड़ा, महर्षि रमण को भी। वही तो मैं कहना चाहता हूँ। आप कभी भी करवा सकते हो। इसीलिए तो इसके लिए प्रयास किया जाता है। जो पेंडिंग कर्म हैं, उनका ध्यान ना दो। अभी से ईमानदारी और सत्कर्म पूरी तरह लागू करो। और वो बिना कार्मिक सेटलमेंट के हो जाए, तो बाद में भोग लिया जाएगा। बाद में भोगना ही पड़ेगा। भोगना तो पड़ेगा।
वो देता है, और कहीं न कहीं उसके पीछे चुनाव आपका भी रहता है। जैसे आज प्रत्यक्ष ज्ञान। मैंने यही भाव बनाया था। देखा कि आध्यात्म बेचा-खरीदा खूब जा रहा है। मैंने कहा, अभी मैं बोलूँ ये गलत है, तो सही क्या है, बताओ। कम से कम गलत के सहारे तो खड़ा है। तो मैंने कहा, मैं प्रत्यक्ष ज्ञान ढूँढूँगा। और आज लोग आध्यात्म को बड़ा बना के रखे हैं, लोग मिलते नहीं हैं। मैं गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले, बस में, ट्रेन में, दुकान पर, रोड पर, गटर के बगल में सत्संग करूँगा। यहाँ तक कि मैं शौचालय के सामने भी सत्संग किया हूँ, ऐसे फटे कपड़ों में। बस स्टैंड पर शौचालय था। जब एक आदमी आकर पूछता है, ध्यान से देखेंगे तो उसमें एक आदमी पूछ भी रहा है। मैंने कहा, मैं घूम-घूम के दूँगा। ले भैया, ये अध्यात्म है। और मैं पूरा इसको खोल दूँगा। जितना रहस्यमय बनाए हैं, मैं खोल दूँगा।
खोज में मुझे इनके ऊपर बहुत गुस्सा आता था। अभी गुस्सा होता है क्या। अब नहीं। खोज में बहुत गुस्सा आता था। अरे वीआईपी। जिज्ञासु कभी वीवीआईपी होता है क्या। शाम को आया करो, महाराज साधना में हैं। सामान्य आदमी को हॉल में भेज दिया। कितनी जिज्ञासा लेकर आया था। और एक कार वाला आदमी आया, दो बजे रात को गेट खोल दे रहे हो। इसलिए मुझे बहुत गुस्सा था। कथा में भी देखो। जो जिज्ञासु है, प्यासा है सुनने के लिए, उसे कोई सुविधा नहीं दी जाती। जिसको रुचि नहीं, उसे कार्ड देकर बुलाते हैं। मैंने कहा, सब खत्म कर दूँगा।
जब मैं कुटिया बनने से पहले घूमता था, तो गाँव के करोड़पति भी रोड पर खड़े होकर सुनते थे। सुनना पड़ता था। जेब में हाथ डाले। और वही झोपड़ी वाला भी था, और सुनते थे। गाड़ी रुक जाती थी। लोग खड़े होकर देखने लगते थे, क्योंकि तेज से बोलता था, आवाज बड़ी है। दूर से सुनते थे। शर्म के मारे पास नहीं आते थे, क्योंकि झोपड़ी वाला था, लेकिन सुनते थे। घर में भी बुलाते थे, सुनते थे। तो मैंने कहा, मैं अध्यात्म के पूरे रहस्य को खोल दूँगा। और हर व्यक्ति आत्मज्ञान को उपलब्ध हो सकता है, जहाँ तक मैं समझता हूँ। अगर वो व्यक्ति मन और बुद्धि से पागल या अबोध नहीं है, और आध्यात्म समझ में आ रहा है, तो आप उस परम स्थिति तक पहुँच सकते हो। ये आपके ऊपर है। पूरा खोल के रख दो। चाहे जिस मार्ग का मुझसे प्रश्न करो, मैं पूरा खोल देता हूँ।
आध्यात्मिक अहंकार हो ही नहीं सकता, क्योंकि आध्यात्म का मतलब अपने आप को सुधारना है।
मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, ये कैसे जाने? यह आप ही को पता करना होगा। कोई आपको बता देगा कि जाना कहाँ है? कोई किसी को बता सकता है कि जाना कहाँ है? आप जाके पूछो। कोई आपसे पूछे, आप बताइए मुझे कहाँ जाना है, क्या बोलोगे? भाई, पूछो कहाँ जाना है, मैं पता बताऊँगा। इतनी सहायता मैं आपकी कर सकता हूँ। लेकिन मैं आपको ये नहीं बता सकता कि आपको कहाँ जाना है। कैसे बताऊँ? कैसे बताऊँ? एक चिड़िया उड़ रही है। वो कहाँ जाएगी? आपको पता है क्या? आप उसे रोक सकते हो? हो सकता है उसके बच्चे इंतजार कर रहे हों। क्या आप उसे कोई दिशा दे सकते हो? नहीं दे सकते। आपको पता करना पड़ेगा कि आपको जाना कहाँ है।
लेन-देन खत्म हो जाता है तो मोक्ष होता है। प्रतिक्रिया देने से राग-द्वेष कैसे होता है? प्रतिक्रिया आप किस भाव में दे रहे हो? शरीर और आत्मा दोनों एक ही जगह पर हैं। यह समझ में आ जाता है। जब आत्मज्ञान हो जाता है, तब भी वही हाल है। और क्या हाल है? बस वो शरीर से अपने आप को अलग देख पाता है। बस, बात खत्म हो गई।
आप आके रह के देख लो। इसलिए कि मैं सेवा नहीं करवाता। इसीलिए इधर से बंधन नहीं बाँधता। इधर सेवा नहीं करवाता। और उधर उसकी सफाई होती है, तो सफाई वो नहीं करवाता। ये बात है। सेवा मैं करवाता, दीक्षा देता, तो फिर यही हाल होता है।
जरूरत से ज्यादा चाहिए, योग्यता से ज्यादा चाहिए, तो राग-द्वेष पैदा होगा। बस इतनी सी बात है। राग-द्वेष में फंस जाओगे। और जितनी योग्यता है, उसमें राग-द्वेष पैदा होगा ही नहीं। ऐसे दुकानदार के पास एक व्यक्ति गया, सामान लिया, कम पैसा था, तो राग-द्वेष पैदा होगा। दिया तो भी राग, नहीं दिया तो द्वेष। और जितना पैसा था, उतना का सामान लेके आ गए, तो राग-द्वेष नहीं होगा।
अब जब मंदबुद्धि है तो कैसे बताया जा सकता है? ध्यान के बहुत वीडियो हैं, देख लेना। आपने जब बोल दिया मंदबुद्धि, तो क्या बोलूँ? मन, बुद्धि, और पागल, और अबोध को तो यह समझ में ही नहीं आएगा।
आत्मज्ञान मतलब स्व का ज्ञान। ब्रह्म ज्ञान मतलब उस परम सत्ता का ज्ञान, जहाँ से मेरा वजूद है, अस्तित्व। यहाँ हर वस्तु कहीं से है, तो फिर मैं भी तो कहीं से हूँ।
विवाह कर लो। सीधी बात है। विवाह कर लीजिए। क्यों नहीं विवाह कर लेते? जैसे शरीर की जरूरत भोजन है, वैसे विवाह कर लो। कृष्ण ने विवाह किया। राम ने विवाह किया। विवाह करके जीवन जियो। उसमें क्या है? बस जीवन में बेईमानी और दुष्कर्म मत करो। इससे आप गिरते रहोगे। बस इतनी सी बात है। और चाहे एक विवाह करो, चाहे दो करो। कृष्ण भगवान ने तीन विवाह किए, तो भी योगी कहलाए। और तुम एक ही में भोगी कहला रहे हो। मतलब एक में तुम परेशान हो गए। तीन विवाह करके वो योगी कहलाए। वो तीन में योगी हो गए और आप एक में भोगी हो गए। बताओ, कैसी लाइफ जी रहे हो? विचार करो इस पर। चिंतन करो इस पर। तीन विवाह करने के बाद भी योगी रह गए, और एक विवाह करने में भोगी रहोगे। क्या बात है? कहीं ना कहीं हमसे गलती हो रही है। अब खोजो, क्या गलती है।
आत्मज्ञानी सब जानता है और त्रिकालदर्शी बन जाता है, ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐसा कुछ नहीं है। सब कुछ जान जाना नहीं है। स्वयं को जानने से मुक्त हो जाता है। बस इतनी सी बात है।
गलत यादें कैसे हटाएँ? सही काम करो पहले। और गलत काम किया तो गलत यादें आएँगी।
आत्मज्ञान की प्राप्ति के मार्ग की शुरुआत ईमानदारी से होती है।
कर्म हो रहा है। आपके द्वारा कर्म हो रहा है, उसे जाँचते रहना। वही ध्यान में ध्यान है। कहीं गलती ना हो जाए।
ध्यान हर वक्त घटित होता है। चाहिए में हर समय तो ध्यान से परेशान हो। आप लोग किससे परेशान हो? ध्यान से। ध्यान से ही परेशान हो। बैठना चाह रहे हो, बैठ ही नहीं पा रहे। कुछ समय के लिए सोच रहे हो कि मेरा ध्यान कहीं नहीं जाए, और जाता ही है। ध्यान से ही परेशान हो। ध्यान से मुक्ति चाहिए। इस बात को समझो, तभी आप स्व में स्थिर हो पाओगे। आपके जीवन की सबसे बड़ी परेशानी का कारण ध्यान है। आप समझ नहीं पा रहे।
मुद्रा मत लो। मुद्रा हटा दो। चिंतन कर रहे हो तो वो सही है। चिंतन करना जरूरी है। जो चल रहा है, चलने दो। सबकी स्थितियाँ अलग-अलग हैं। किसी के लिए चिंतन जरूरी है, इस समय आपके लिए नहीं। चिंतन से भी मुक्त हो जाओगे तो आपके लिए भी जरूरत नहीं। लेकिन किसी ना किसी स्थिति में ध्यान घटित तो होता है। उसके बाद परम ध्यान घटित होता है। उसे एकाकार कहते हैं। अपने आप घटता है। वहाँ प्रयास नहीं रहता। वहाँ उम्मीद नहीं रहती। अपने आप घटित होता है। वो परम ध्यान है।
साक्षी भाव से आप अपने आप को जाँच रहे हो। साक्षी होते-होते आखिर में साक्षी भाव भी छूट जाएगा। यहाँ तक भाव भी छूट जाएगा। जब तक भाव है, तब तक आप बाहर हो। भाव है तो किसी में लिप्त हो। तभी तो भाव पैदा हो रहा है। भाव से भी आखिर में छूटना है।
एकाकार हो गया, ये होने के बाद पता चल जाता है। आपको कैसे पता चला कि आप बालक थीं, फिर कुमार हुईं? विवाह हो गया, कैसे पता चला? माँ बन गईं, कैसे पता चला? ऐसे ही हो जाएगा। आप ही को पता चलेगा। अंदर से लगता है कुछ नहीं हुआ, आदमी बूढ़ा हो जाता है, बाल सफेद हो गए, शीशे में देखते तो दिखता है। अंदर से लगता है जवान हूँ। अंदर से जवान हो तो डाई क्यों कर रहे हो? पता है, मैं बूढ़ा हो गया। ये सब बोलने में अच्छा लगता है। अगर जवान होता तो कलर नहीं करता। खूबसूरत होता तो मेकअप नहीं करता। मेकअप के पीछे कहीं ना कहीं दाग-धब्बे थे। मेकअप उतार के सोना पड़ता है। आईने में मेकअप में भी आप देख रही हो, और बिना मेकअप का आप ही ने देखा। सामना तो करना ही पड़ रहा है।
फर्क पड़ता है रसपान करने वाले को। आपके मेकअप का फर्क उसे पड़ता है जो रूप का रस लेता है, बैकग्राउंड का, कपड़े का, धन का, शरीर का, जानकारी का। यही रसपान है। जिसे कुछ नहीं करना है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आप मेकअप करो या ना करो। जैसे एक बाप के सामने बेटी मेकअप करे या ना करे, कोई फर्क नहीं पड़ता। उसके लिए बेटी है तो है। मेकअप का फर्क वहाँ पड़ता है जहाँ लोग आपको नोचते हैं। धन का मेकअप हो, वैभव का हो, शरीर का हो, टैलेंट का हो। जिन्हें नहीं नोचना, उन्हें क्या फर्क पड़ता है। और खुद की बनाई हुई इमेज में फंसे हो। ओरिजिनल इमेज तो पता है। जिसे मेंटेन करने में फँसी हो, वो बनाई हुई इमेज है।
मैं तो कहूँगा, जितने लोग देखते हैं, बैठ के देखें, जहाँ तक मैं समझता हूँ। लेट के मत देखें। बाकी आपकी मर्जी। आप मुझसे पूछ रहे हो तो बता रहा हूँ। बैठकर ही देखो।
अभी तो कुछ देर पहले बताया, कुछ नहीं। अनुभव से मुक्त हो जाता है। अनुभव करते-करते जब अनुभव करने के लिए कुछ नहीं रहता, अनुभवकर्ता बसता है। फिर वहाँ कर्ता का भाव भी नहीं रहता, क्योंकि करने के लिए कुछ नहीं रहता। तब वो समाधि की स्थिति। और वो कई महीने तक चल सकती है। कुछ बोल नहीं सकते।
आप बोलते रहोगे, बातचीत करते रहोगे। हाँ, कई महीनों तक चलता रहता है।
समाधि को चलते, उठते, जागते, बैठते, सोते, नहाते, धोते। सौ में चले गए। पूरे दिन, उस समय, ये भी नहीं बोल सकते। वो ना बाहर है, ना अंदर है। कुछ महीनों। मतलब मैं बोल सकता हूँ कुछ महीनों तक, चार-पाँच से नीचे, कुछ महीनों तक। चौबीस घंटे सौ में हो, ऐसा नहीं, क्योंकि वो आता है, जाता है। उसमें स्व भी नहीं बोल सकते। कुछ बोल नहीं सकते।
उसमें ना कोई आधार, ना कोई भेष। कुछ नहीं बोल सकते। ये भी नहीं बोल सकते। ऊर्जा तो कह सकते हैं, ऐसा नहीं। मैं तो ये भी नहीं कहूँ। अपने को इसका होना नहीं। नहीं, ये भी नहीं। आत्मज्ञान के साथ यही दिक्कत है, बता नहीं सकता। जैसा है वैसा बता रहा हूँ ना आपको। एकदम जैसा है, एकदम वैसा बता रहा हूँ। तुलना नहीं की जा सकती। हमारे में ऐसा कुछ भी नहीं है कि मैं उससे इसकी तुलना करूँ। एक अस्तित्व नहीं। बेस, बैकग्राउंड, कुछ नहीं। सब खत्म। आधार, बेस, सब खत्म हो जाता है। बैकग्राउंड वो भी नहीं। जिसको कहते हैं कि पानी उड़ गया, आकार छोड़ गया। वहाँ कुछ नहीं बोल सकते। बता तो रहा हूँ। कोई हमें उदाहरण भी नहीं दे सकता। ना तो किसी से तुलना कर सकता हूँ। कुछ बोल नहीं सकता। क्योंकि आप पूछ रहे हैं तो मैं वहाँ देख के बोल रहा हूँ। ये तो नहीं था। हाँ वही, ये तो नहीं था। कितनी भी कल्पना कर लें, कितने भी शब्द निकाल लें, जैसा है वैसा बता दे रहा हूँ आपको।
बार-बार होती रही, ऐसा नहीं। कंटीन्यू। बार-बार बंद और चालू, ऐसा नहीं। वो चल ही रहा था, जब तक वो खत्म ना हो जाए। उसमें आँसू भी गिरते थे। चिल्लाता भी था। कुछ भी होता था, पता नहीं। उसमें सुख-दुख भी नहीं था। कोई पीड़ा भी नहीं थी। कोई घुटन भी नहीं थी। कोई बेचैनी भी नहीं थी। कोई अशांति भी नहीं थी। कोई शांति भी नहीं। कोई प्रसन्नता भी नहीं थी।
बाहर के लोग दिख रहे थे, क्योंकि उनसे कुछ चाहिए नहीं था। वे ऐसे नहीं दिख रहे थे कि आत्मा है। नहीं, ऐसा नहीं। सब दिख रहे थे। और खाना, किसी से मतलब नहीं था। सब था। खाना-पीना, बैठना, बातचीत भी करना था। लोगों से बातचीत भी करना था। ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं कि विश्वरूप दिखा दिया। नहीं, सब बातचीत, सब होता था। सिर्फ यह आंतरिक स्टेट थी, जो खुद को ही पता थी।
लोग मुझे चिल्लाने भी लगे थे। अवधूत-अवधूत नाम दे दिए। सोया रहता था, ये तो अवधूत है। मतलब वो खुद बोलने लगे। लोगों ने मुझे खुद बोलने लगे। मेरे चाल-चलन, उठने-बैठने को देख के वो बात करते थे। ज्यादा, ये तो अवधूत है। हाँ, ये समाधि की स्थिति थी।
प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। पतंजलि सूत्र में जैसे बताया, मुझे नहीं पता। ऐसे-ऐसे कुछ बताया। मुझे नहीं पता।
जब कुछ है ही नहीं, तो कहाँ प्रेम बढ़ जाएगा? प्रेम होने के लिए कुछ होगा, तब ना प्रेम होगा। कुछ नहीं। कोई प्रेम, कुछ नहीं। कुछ नहीं रहता भाई। कुछ नहीं रहता। मेरे समझ से वो कर्म नहीं रहता उसमें। कर्म तो छूट जाता है। कुछ नहीं। क्या बोलें। कुछ नहीं बोल सकते। मैं अगर शब्दों में बोलूँ तो कुछ नहीं बोल सकता। कुछ स्थिति हो तो बोलूँ भी। कोई आधार हो, बेस हो तो बोलूँ भी। भैया, ये था ही नहीं तो बोलूँ कैसे। वहाँ मैं भी नहीं था। क्योंकि मैं हो जाता तो ज्ञान ही हो जाता। वहाँ मैं भी नहीं था। ना बाहर था, ना अंदर था। वो भयानक स्थिति भी है, और अद्भुत स्थिति भी है।
इस स्थिति के बाद कुछ दिन बाद प्रश्न हट गए। उत्तर हो गए। क्या आया, क्या गया, पता नहीं। खत्म तो पहले ही हो गया था। समाधि के पहले ही खत्म हुआ। उस खत्म होते हुए मैंने देखा। उसे मैं रोकने का प्रयास नहीं किया। खत्म तो तभी हुआ जब नर्मदा तट पे वो महाराज मुझे मिले थे। उसी समय खत्म हो गया था। सब मेरा, सब खत्म हो गया था। पूरी तरह खत्म हो गया था। आँखों में आँसू थे, और मुझे पृथ्वी पर कहीं जाने के लिए रास्ता नहीं था। खत्म तो उसी समय हो गया था। उसके बाद समाधि की स्थिति आई।
मेरे समझ से 2019 में दिवाली के पहले की बात है। और दिवाली से एक, दो, तीन, कई महीने मतलब लग गए। कई महीने। लेकिन भयानक भी था। आज मुझे अद्भुत लगता है। लेकिन उस समय कुछ अलग ही था। लोग बोलते भी थे। मैं ऐसे रास्ते से जाऊँ तो बोले, अवधूत जा रहा है। बातें करता था। कभी-कभी बातें नहीं। लेकिन जब तक मैं नहीं बोलूँ, मेरे पास कोई आता नहीं था। जानवर तक भी नहीं आते थे। पता नहीं, मुझे देख-देख जानवर भी भागने लगे। क्या मेरे आँखों में हो गया था? क्या चेहरे पर हो गया था? कैसे मैं खड़ा हो जाऊँ, तो उस रास्ते से लोग आते नहीं थे। डरते थे। अगर मैं ना बोलूँ तो जानवर तक दौड़-दौड़ के भागने लगते थे। पता नहीं क्यों। मैं रास्ते से जाऊँ ना, जानवर आए तो कोई उधर भागे। पता नहीं क्यों कोई उधर भागे। और मैं देखता रहता था, यार ये क्यों भाग रहे हैं। और बड़े तेजी से भागते थे। बहुत तेजी से भागते थे। वो भी डर जाते थे। पता नहीं क्या था।
उसके वीडियो नहीं बने थे। ज्ञान के बाद भी वीडियो नहीं बने। मतलब शायद साल के बाद ही वीडियो बने। कहाँ वीडियो बनाना। मिल गया तो ऐसे रात-रात भर बोलता था। शाम से चालू करूँ, सुबह हो जाए। जो मिलता था, उसे पकड़ लेते थे। आ जा भैया, सब पकड़ा जाते थे। घड़ी देखते, सुबह हो गई। उन्हें पता ही नहीं चलता था। और मैं बोलता रहता था। बोलता रहता था। यही तो सही है। शाम से सुबह हो जाए और सब ऐसे बैठ के सुनते रहते थे। ज्ञान के बाद का, तुरंत बाद का, कुछ समय बाद का। सुनते रहते थे। बोल सकता हूँ कि सोलह, अठारह, बीस घंटे ऐसे लगातार, पागल की तरह बोलना। थकता भी नहीं था। शरीर भी नहीं थकता था। जब सोता था, जब उठा तभी चालू।
ऐसे तो अभी भी मैं सोलह-सोलह घंटे बोल देता हूँ। आप लोगों के बाद सोता हूँ, पहले उठ जाता हूँ। सपने आते हैं। आते हैं तो आते हैं। अभी क्यों सपने आते हैं, हम क्या जाने। मैंने तो ऐसा कभी प्रश्न नहीं किया। आते हैं सपने, आते हैं। मुझसे क्या मतलब? क्या मैं सपनों को रोकने में लग जाऊँ? हाँ, ये तो है। पूरी नींद पूरी आती है। वो तो है ही। सपने आते हैं। फिर कह रहा हूँ, वो तो है। मैं चाहूँ तो सोऊँ और एक घंटे में उठ जाऊँ। नींद का ऐसा कुछ नहीं। मैं सुबह तक ऐसे ही।
ऐसा कुछ नहीं। कभी-कभी अठारह घंटे जागूँ, बीस घंटे जागूँ। कभी-कभी दिन भर सोया रहूँ। रात बस भोजन के लिए उठूँ, शरीर की जरूरत के लिए। कभी-कभी महीनों तक ऐसे। बस महीनों में सोना, बस एक ही काम रहना। उठ के खाना, नहाना, सो जाना। खाना बनाना, आना, सो जाना। बस इतना। महीनों। विचारों को मैंने कभी पकड़ा नहीं। मैंने काम किया। विचारों से कोई मतलब नहीं। विचार आएँगे, जाएँगे, हमसे क्या मतलब।
नहीं लगेगा। क्या करेंगे? करना क्या है? सब तो यही कर रहे हैं, खाने के लिए। हम सो जाएँ, कोई टेंशन नहीं। आप दिन भर किसके लिए कर रहे हो? इसी के लिए। हमें तो ऐसे ही मिल रहा है। आप मेहनत करके इसी के लिए करते हो, तो हमें ऐसे ही मिल रहा है। मैं उस मौके का लाभ लूँ ना। आप दिन भर काम किए, रात को आए, खा के सोए। दिन भर काम किए किसके लिए? इसी के लिए। मुझे प्रॉपर्टी चाहिए था नहीं। संचय मुझे करना नहीं था। शादी मुझे करनी नहीं थी। और मुझे फ्री में रहना था, फ्री में भोजन था। तो मैं उसका लाभ क्यों ना लूँ? मैं क्यों मेहनत करूँ? और वो मेहनत अगर मैं करूँ, और जब मुझे उस फील्ड में जाना हो, तो किसके लिए करूँ? जरूरत क्या है? मुझे प्रॉपर्टी वगैरह चाहिए नहीं जिंदगी में। मुझे रोग भी नहीं होगा। मैं इलाज कराने के लिए कुछ रखूँ, कि मुझे बाद में रोग होने वाले हैं, ऐसा कुछ नहीं था मेरे जीवन में। तो मैं क्या करूँ? फिर मैं खूब सो लेता था। क्या खूब सोता था। मतलब मैं अपना बता रहा हूँ।
मैं सुबह उठा। उठाया गया। वो भी प्यार में, चाय पी लो। चाय-टोस्ट आ गया। चाय-टोस्ट खाया। मंजन भी नहीं किया। खाया और सो गया। फिर दोपहर को उठा, भोजन के लिए गया। स्नान कर लिया। किया तो किया, नहीं किया तो फिर खाया और सो गया। नींद खूब आती थी। मैं जब चाहूँ तब सो जाऊँ। फिर शाम को नाश्ता-वास्ता, चाहे कोई भी, वड़ा पाव, कुछ भी, समोसा, जो मैं ऑर्डर दे दूँ वो बन जाए। फिर सो जाओ। फिर सात बजे, आठ बजे उठो। इच्छा हो तो चाय पी लो। फिर भोजन करो। फिर एक बजे, दो बजे फिर चाय पी लो, और फिर सो जाओ। बस यही मेरा वो था। महीनों-महीनों, दो-दो महीने ऐसे। मोबाइल भी रहा। कुछ देखना हो तो देख लेता था। इच्छा हो तो मोबाइल चला लेता था, नहीं तो रख देता था। एक-एक, दो-दो महीना लगातार पड़ा रहता। बस मात्र इतनी जगह में। वॉकिंग करने भी नहीं जाता था। बस सोना। नहाने के लिए, शौचालय के लिए उठना, बस उससे ज्यादा नहीं। दरवाजा भी नहीं छूता था। महीनों-महीनों मात्र इतनी जगह में पड़ा रहता था। मुझसे किसी से कोई मतलब नहीं।
तो मैं इसीलिए कह रहा हूँ, आप लोग भी विश्राम करिए। इसलिए तो मैंने ये व्यवस्था यहाँ दी है। मुझे मिला था। मुझे भी मिला। मैंने उसे फील किया। इसीलिए कह रहा हूँ, विश्राम करिए आप लोग। आप लोग भाग रहे हो। आप इतने दिन से आए, कोई काम यहाँ बोला गया? मुझे भी नहीं बोला जाता था। मैं जहाँ रहता था, एक काम नहीं बोला जाता था। देखो, आपको किसी ने काम बोला? इसलिए आपको पूरी तरह आपके लिए छोड़ दिया होगा। आप इसका लाभ लो। खूब लाभ लो। रहो, सत्संग सुनो, खाओ, सो जाओ। सत्संग सुनो, खाओ, सो जाओ। विश्राम। आप लोगों को विश्राम की जरूरत है। आप लोग समझ नहीं पा रहे हो। आप लोगों को आराम की जरूरत है।
जब से पैदा हुए तुम खट ही तो रहे हो। क्या, अध्यात्म को समझो? पहले आराम तो करो, एक-दो साल। फिर इसके बाद बात करेंगे अच्छे से। आए नहीं, कूद पड़े आत्मज्ञान में। देखो, इसमें करना-धरना कुछ नहीं है। करना कुछ नहीं है। पहले आराम कर, रुको। दो साल तक खा के सो। फिर आराम से बातचीत करेंगे। अब यहाँ पे मैंने सब व्यवस्था दे दी। एक काम नहीं करना है। यहाँ आपसे किसी से बात भी करने की जरूरत नहीं है। पूरा दरवाजा खुला है। कोई रोकने वाला नहीं, कोई टोकने वाला नहीं। बस यहाँ के सिस्टम में रहिए। खत्म बात। और सिस्टम भी आपके लिए है। सब उसी में जीते हैं। ऐसा नहीं कि किसी और के लिए और है। नहीं, सब उसी में जीते हैं। तो आप लोगों को विश्राम की जरूरत है, और आप लोग कर नहीं रहे हो। हमने तो खूब किया। हमने तो बहुत आराम किया। तो आराम की जरूरत तो है ही।
आपको नहीं लगता क्या, आप लोगों को विश्राम की जरूरत है? आपने पूरा जीवन, जब से आप समझने लायक हुए, सिर्फ पैसे के लिए लगाया। पढ़ाई भी आपने इसीलिए की कि आपको पैसा कमाना है। सिर्फ पैसा, पैसा, पैसा। पागल हो गए हो। सिर्फ पैसा क्या है, बताओ? क्या लाइफ को बना दिया? क्या जिंदगी को बना दिया? सिर्फ पैसा, पैसा, पैसा, प्रॉपर्टी, पैसा, प्रॉपर्टी, पैसा।
मैं तो आप लोगों को सलाह दूँगा। पहले तो आप एक-दो साल तक आराम करो। और बस एक ही काम, खाना-सोना, खाना-सोना। बस ये बहुत जरूरी है आप लोगों के लिए। विश्राम। खाना-सोना, खाना-सोना। इसीलिए मैं यहाँ लोगों को कहता हूँ, रुको। जो रुक जाओ। जो जॉब कर रहे हैं, उनके लिए ये कि केवल काम करो, तो थोड़ा-बहुत तो काम कर लो। आप अभी नहीं छोड़ना चाहते हो। लेकिन मैं कह रहा हूँ, जरा सा निकलो इससे। विश्राम की जरूरत बहुत है आप लोगों को। आप देखिए ना, जब से समझने लायक हुए, आपने शिक्षा भी किस लिए ली? क्या अपने लिए ली? पैसे के लिए। समझ में नहीं आता है आदमी को। जब बड़ा हो जाता है, मैं देखता हूँ तो समझ में नहीं आता। सब कमा रहे हैं। आपको कमाना है, तो वही। आपने अपने लिए क्या किया फिर? कुछ नहीं किया। फिर तो कम से कम सो तो लो।
अरे, कैसे नहीं रहेगा? एक बात बताओ। आत्मज्ञान को छोड़ दो। आत्मज्ञान को इधर-उधर हटाओ। आराम तो कर लोगे जीवन में। क्या होगा, बताओ? एक आदमी दो साल सो ले, और एक आदमी दो साल और कमा ले। क्या कर लेगा? प्रॉपर्टी बना लेगा। नॉर्मल आदमी दो साल सो लेगा, उसके घर वाले उसको निकाल देंगे। जो आज काम करने वाला है, वह एक हफ्ते घर पर नहीं रह सकता। एक दिन नहीं रह सकता। आप सोचिए, क्या आपका जीवन इसीलिए मिला है? बस यही, कमाने के लिए। बस इसीलिए कि सुबह से शाम तक काम करना है, और फिर आकर सो जाना है। बस इसीलिए जिंदगी मिली है?
उसके लिए आपको उनसे निकलना पड़ेगा। हमारे पिताजी घर पे अगर उठा देते थे, तो हम जा के जंगल में सोते थे। पक्का सोते थे। करना पड़ेगा। भाई, तुम्हारा दायरा कहाँ तक है? घर तक ना? हम जंगल में सोएँगे। नींद आती थी। सुबह उठा देते थे, चले जाते थे, बिछा लेते थे, सो जाते थे। क्योंकि नींद के साथ भी यह है कि जब सोने के लिए लेटो तो नींद नहीं आएगी। और अगर कोई काम है तो नींद बहुत आएगी। ऐसा होता है। मैं इसीलिए कह रहा हूँ। और पहली बात, पता नहीं क्या दिमाग में है, सुबह-सुबह जगाना। सुबह-सुबह जगा दिया। अरे यार, सोने तो दो भाई। आराम में है एक व्यक्ति। आराम तो करने दो। लक्ष्मी सात बजे के बाद भी आती है। छह बजे भी आती है, सात के बाद भी आती है। आप ज्यादातर देख लो, जितने सात बजे के बाद उठते हैं, उन्हीं के यहाँ पैसा है। नोट कर लो। वो उठते देर से इसलिए हैं क्योंकि उनके पास पैसा है। दस बजे, आप देखिए, जितने लोग हैं वो ज्यादातर ग्यारह-बारह बजे, आठ के बाद ही मिलेंगे, ज्यादा से ज्यादा।
ब्रह्म मुहूर्त का कोई चक्कर नहीं होता। ब्रह्म मुहूर्त का बस इतना चक्कर है, साढ़े तीन से चार बजे हवा चलती है। स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है। बस इतना चक्कर है, और कुछ नहीं।
जैसे ही सौ में आओगे, तुम्हें पूरा शरीर मिल जाएगा। कर्ता का अधिकार दे दिया ना। और इसी कर्ता से तुम मुक्त भी होगे। तुम ही इसी के थ्रू होकर कर-कर के देख, समझ में आ जाएगा। करने से कुछ नहीं मिलने वाला। इसीलिए तो मैं कह रहा हूँ। आप बताइए ना। हम जब से समझने लायक हुए, पढ़ाई भी की तो पैसे के लिए। पूरी जिंदगी। आप किसी से पूछिए, सत्तर साल, अस्सी साल के आदमी से, कि आपने जीवन में क्या किया, तो कहेगा गाड़ी, पैसा, मकान। बस ये लक्ष्य है। ये तो सिर्फ जरूरत थी, वो भी शरीर की। आपने अपने लिए क्या किया? जिस मकान को आप बना रहे हो, या तो कल बेचा जाएगा, या तोड़ा जाएगा, या प्रकृति तोड़ देगी। इसके लिए आपने पूरी जिंदगी लगा दी। पूरा जीवन ईंट-पत्थर के लिए, धातु के लिए, कागज के लिए। पूरा जीवन आपने लगा दिया। इसलिए आप आराम करें। मैं तो कहूँगा कम से कम एक-दो साल लगातार सोएँ। जॉब छोड़ दें। कोई एक-दो कमा के तो इतना रखे ही हैं। दो साल तक आप आराम से सोएँ। बस विश्राम करें। आराम की बहुत जरूरत है। हाँ, शरीर को नहीं। शरीर तो रात को सो, सुबह तैयार। आपको विश्राम की जरूरत है। आप इस बात को समझिए। शरीर को नहीं। शरीर को तो आप रात को सोए, सुबह तैयार, काम करवाओ। अब मैं आपकी बात कर रहा हूँ। आप बहुत ही थक चुके हैं। आपको विश्राम की जरूरत है।
मैं आपकी बात कर रहा हूँ। आपको विश्राम की आवश्यकता है। शरीर को नहीं, आपको। थॉट से कुछ चिंतन मत करो। कुछ नहीं। अरे, बस सोना है। इस शरीर के द्वारा आराम करना है। बस एक मानसिक शांति। एकदम ऐसा नहीं कि आँख बंद करके सोना है। बैठना है तो अपने लिए। घूमना है तो अपने लिए। लेकिन कोई लाभ-हानि के लिए नहीं। मैं ये भी नहीं कह रहा हूँ कि आप एक बिस्तर पर सो जाओ। मतलब आप बिना मतलब के कम से कम रहो। और हो सके तो, मैं जैसे रहा, एक-दो महीने तक लगातार पड़ा रहता, इतनी जगह में, यहाँ से बाथरूम, बाथरूम से यहाँ। दरवाजा भी नहीं छूता था। कहीं नहीं जाता था। पड़ा रहता। आराम बहुत चाहिए आप लोगों को। हो सके तो एक कमरे में ही रहो। नहीं तो बाहर वाले बात करके खराब कर देंगे। कमरे में रहिए। आराम की बहुत जरूरत है।
साधना नहीं। साधना नहीं करो। विश्राम करो। मैं करता था ना, तो मेरी बहन के अगल-बगल कहते थे कि ये संन्यासी हो गए, जंगल जाना चाहिए था। माता जी, साधना करके क्या करेंगी? क्या पाना है? आप कहते हो ना, संतों की साधना करो। मिला है? मैं कब कहता हूँ? मैं तो कह रहा हूँ विश्राम करो। मैं तो कह रहा हूँ सोइए, आराम करिए। पक्का आपको आराम की जरूरत है। आप इस बात को समझिए, गहराई से लीजिए। आप सोचिए ना, जब से समझ में आप आए, आप क्या कर रहे हैं? आपने क्या किया, बताइए? यही पैसा। मैं एक बात और सुनिए। शिक्षा भी आपने पैसे के लिए ली। अपने लिए नहीं। एक साठ-सत्तर साल के आदमी से पूछा जाए कि बताइए क्या है, बस वही दिखा देगा। पिताजी ने ये बनाया था। मैंने कार ले ली। ये बंगला लिया, दो बना दिए। बस बात खत्म। जिंदगी खत्म। संसाधन को लक्ष्य बना लिया। और संसाधन यूँ ही घूम रहे हैं। आज जहाँ आप घर बनाए हो, या तो आपका नाती। देखो, बाप का, दादा का आपने तोड़ा, बेचा। ऐसा आपका भी होगा, जिसको आप इतनी मेहनत से बना रहे हो। बेटा आएगा, कहेगा, इसको हटाओ, तोड़ दो। जैसे आपने किया। आप समझिए इस बात को। आपकी ये गाड़ी भंगार में जाने वाली है। आदमी कमा रहा है, उसी के तोड़ने के लिए तैयार है। वही पक्का तोड़ेगा। ये गाड़ी जितने शौक से ली, भंगार में जाएगी।
एक बात बताइए। आपके घर में कोई चला जाता है, आप उसका नंबर लेते हो? तीन सौ पचास, दो सौ, महीने का भी उसके ऊपर खर्च नहीं कर सकते। चलो उसका नंबर तो है। जितने लोग उसके परिचय के हैं, संपर्क तो करेंगे। कोई बता दे, उसके घर का, परिवार का, गया। उसका नंबर कोई परिवार वाला लेता है? नंबर चला जाता है। उस आदमी के मरने के बाद हर महीने का इतना भी कोई खर्च नहीं कर सकता। भाई, ले लेते उसका नंबर। उसका जितना परिचय था, फोन आता, जवाब दे देते। संभाल लेते परिचय। तो मेरे समझ से विश्राम की बहुत जरूरत है। इसे गहराई से समझिए। और अपने आप को समय दो। बस पैसा, पैसा, पैसा। प्रॉपर्टी, पैसा, प्रॉपर्टी, पैसा।
मैं आपको बता दूँ, मैं आज तक कल के लिए सोचा ही नहीं। मेरी माँ बोलती थी, संचय किया करो। बोला, माई, किसके लिए? किसके लिए? अगर निकल लिया तो खा जाएँगे सब। मैं खा जाऊँ, ये चलेगा? किसके लिए छोड़ूँ? किसके लिए संचय करें? बताओ, क्यों संचय करें? क्यों संचय करूँ? यहाँ लोग मैं देखता हूँ, मेडिकल करा के रखते हैं। अरे, हार्ट अटैक के आने पहले ही हार्ट अटैक का बनवा लेते हैं। अब आप मानसिक हार्ट अटैक के लिए तैयार हो गए। और कहा जाता है, अगर मानसिक आप सोचने लगो तो स्थिति कभी ना कभी हो जाती है। लेकिन आप देखिए ना, जिनके पास बहुत पैसा है वो भी मर गए। बात सही है। समझाने वाला भी तो मर जाएगा। बिस्तर पे लेट के क्या करेंगे? जब तक जिएँ, जी तो लो। बताओ, इतने समय से एक दिन की अपने लिए छुट्टी नहीं ले सकते। दो दिन की छुट्टी नहीं ले सकते। छुट्टी नहीं है। बस पैसा, पैसा, पैसा। क्या है उसके पीछे? पैसा क्या है? उस पैसे की प्रॉपर्टी नहीं करते। तब आते हैं लोग रिटायर के बाद। अरे, बोला, अब तो आराम करो। आपको ऐसी जगह मिल गई, एकांत मिल गया। आपको क्या चाहिए? मुझसे बोलो। जितनी मेरी योग्यता रहेगी, मैं आपको सहायता करूँगा। बस आप यहाँ आराम करिए। लेकिन लोग भाग जाते हैं।
एक काम मैं किसी से नहीं करवाता। मैं अपना बर्तन माँजने से ले के, भोजन से ले के, सब करता हूँ। किसी से एक काम तक नहीं करवाता। आप जी लो, जीवंत होकर। फिर भी लोग भाग जाते हैं। पता नहीं क्या चाहिए। यहाँ मेडिकल से ले के दवा तक मैं करवाता हूँ। एक पिल्ला बीमार हो गया, अस्सी किलोमीटर जाता हूँ इलाज कराने। अगर यहाँ कोई बीमार हो जाए तो मेरी जितनी सामर्थ्य होगी, उसको इलाज कराने में लगाऊँगा। आप बीमार स्थिति में आओ तो इलाज करा के आओ। यहाँ अगर कोई बीमार हो जाए तो चाहे लाख लगे, चाहे दो लाख, जितनी अपनी सामर्थ्य रहेगी, पूरी तरह लगा दूँगा उसके लिए। एक पिल्ले का पैर खराब हो गया। मैं अस्सी किलोमीटर इलाज करवाने ले जाता हूँ। और वो आज डोलने लगा। पैर से डोलने लगा। तो मैं लोगों को कहता हूँ कि आप चिंता मत करिए। आप विश्राम करिए, आराम करो। फिर भी लोग भाग जाते हैं।
कोई बात नहीं। काम करके देख लिया ना। अब कामचोर बनूँगा। कोई बात नहीं। आप इस पे चिंतन करिए। आप लोग बस पैसा, पैसा, पैसा, प्रॉपर्टी, पैसा, गाड़ी, पैसा। क्या है आपके पास, बताइए। ये जितने साठ साल के लोग बैठे हैं, पचास साल के ऊपर, बताएँ क्या किया। प्रॉपर्टी, पैसा, बच्चे। बस इतना है इनके पास। और कभी आराम नहीं किया? करो आराम। यहाँ इस पे चिंतन करिए। और कभी आराम किया तो शरीर को आराम दिया। जैसे ही ताकत आई, काम करने लगे। मतलब मैं जब एक-दो महीना रहता था ना, तो एक गिलास भी नहीं उठाता था। मेरे काम के लिए मुझे कोई बोलता ही नहीं था। ऐसा आराम करता था। उसके आराम की जगह साधना शब्द करना पड़ेगा। साधना कहने के बाद सब मान जाएँगे। नहीं। आप अपने आप को समय दो।
अभी तो आराम का मतलब सोना समझ रहे हो। आप आराम करिए। जितनी नींद आए, सो लो। शरीर को कितनी नींद आएगी। खाना मिल जाता है तो शरीर में नींद आ ही जाती है। तो बस खाओ और सो। बढ़िया-बढ़िया खाओ। समोसा, एक खाया तो दो खाओ। मैंने अपना बताया। आप उस लायक रहोगे तो मैं मँगा दूँगा। पिल्लों को दूध मँगाता हूँ। आधा लीटर से चालू हुआ, चार लीटर आने लगे। जैसे-जैसे जरूरत हो रही है। छह पिल्ले हो गए, तो उनके लिए दो किलोमीटर से दूध मँगाता हूँ। आप अगर आराम करोगे, जरूरत दिखी तो मँगाऊँगा। साधना करोगे तो मँगाएँगे? देख लो। इंदु जी के लिए पिस्ता वगैरह सब मँगाया था। बादाम, पिस्ता, हमारे सामने आए थे। ऐसा नहीं है। सबको जरूरत पर देता हूँ। आपके हिसाब से अच्छा खाओ। आराम से सोओ। थोड़ा-बहुत टहलना है। मैं बता दूँ, आइसक्रीम तक आती है। इन लोगों को खिलाता हूँ। नमकीन, आइसक्रीम, सब। यहाँ नमकीन भरा हुआ है। सब जरूरत पर। ऐसे कोई खा नहीं सकता। जरूरत लगती है तब। आप खूब खाइए। बस वो ईमानदारी के ढंग से हो। बस बात खत्म। खूब खाओ। एक नहीं, दो समोसा खाओ। उससे क्या होगा? जितना खाना है उतना खाओ। इतना खाओ कि खाने के लिए कुछ ना रहे। इच्छाएँ खत्म हो जाएँ। इतना खाओ। एक इच्छा है तो चाय-समोसा खाओ। सुबह से उठो। अपने को दो दिन समय दो। खाओ। दिन भर खाओ। गोलगप्पे से ले के, पानीपूरी से ले के, भेल से ले के, एकदम पेट भर जाए। खाओ खूब। इसमें क्या हुआ? खूब खाओ। आराम की बहुत जरूरत है। बहुत जरूरत है। बाकी आपकी मर्जी। हम क्या बोल सकते हैं? हमने तो ऐसी व्यवस्था दे दी है।
ये देखो, दो महीने के लिए। अब इन्हें चार दिन बाद भागना है। आए तो बोले, एक से दो महीना रहूँगा। मेरे घर वाले भी आ के अभी मिल के गए। फिर भी भागना है इनको। इन्हें आराम नहीं करना। इन्हें काम करना है। ये बढ़िया। पर कोई कमी है तुम्हें? कोई कमी नहीं है। फिर भी भाग रहे हैं। मैं इतना भी बोलता हूँ, जाते-जाते कमी तो बता दो। बोले, कोई कमी नहीं है। भाग कहाँ रहे हो? बोले, फिर आएँगे। जा क्यों रहे हो? फिर आओगे तो जा ही क्यों रहे हो? जाते-जाते मुझे कोई कमी तो बता दो। बोले, यहाँ कोई कमी नहीं है। मुझ में कमी है। तो बोला, यहीं रहो ना, कमी दूर करो। मैं आपकी सहायता करूँगा। लेकिन चले ही जाते हैं। चले ही जाते हैं। यहाँ आराम है। इसलिए यहाँ कोई टिकता नहीं। अभी तो एक साल कुटिया भी नहीं हुई। अभी सोलह मई को एक साल हो गई। यहाँ पर कोई लगातार अभी रहा ही नहीं। आते हैं, जाते हैं। जाते हैं, आते हैं। हमसे पूछ के नहीं। मूड घिसका, जा रहा हूँ। हमसे कोई नहीं पूछता, जाऊँ कि ना जाऊँ। आराम से जाना। किराया बड़ा है। जब इच्छा हो आ जाना। यहाँ रुकता ही नहीं। यहाँ विश्राम है, इसलिए। यहाँ तो विश्राम है।
कंठी पहना दें, सेवक बना लें, तो खूब रुकेंगे। तब मैं कहूँगा तो जाएँगे? नहीं, नहीं जाएँगे। ये हालत है। नहीं चाहिए कंठी, और हम दे नहीं सकते। बंधन में रुकना कोई रुकना होता है क्या? यह हाल है।
सब के सब, ये भी नहीं रुक पाते। इनको भी हवा लग जाती है। ये भी विश्राम नहीं कर रहे। पहले आराम तो करो। आत्मज्ञान तो बाद की बात है। एक बात बताओ। वो तो आपके अंदर है ना। कहाँ जाएगा? छीन लेगा? किसी की ताकत है? कहाँ जाएगा आत्मज्ञान? कोई छीन लेगा आपसे? जी तो लो जिंदगी में। कहाँ जाएगा। इतना क्या टेंशन ले रहे हो भाई। कहाँ जाएगा? नहीं। आपमें इतनी तो समझ है। इतना तो चिल्ला-चिल्ला के बोला ना, कि जब मेरे अंदर है तो जाएगा कहाँ? तो जिंदगी तो जी लूँ।
पैसे चाहिए। लेकिन आपको जिंदगी जीने से ज्यादा पैसे हो गए। बात ये है। क्योंकि ये भी नहीं समझ में आता कि कितने पैसे की एक लिमिट हो जाए। अब समझिए। समझना पड़ेगा उसके लिए। एवरेज निकाल लीजिए। भाई, हम तो हजार साल नहीं जिएँगे ना। ज्यादा से ज्यादा सौ। सौ गए तो गए, तो बहुत ज्यादा। एवरेज निकाल लो। जियो मस्त। फर्स्ट क्लास लाइफ। सोने की रोटी तो खाना नहीं है। खाना है गेहूँ की। तो एवरेज निकाल लो। लाइफ को उल्टा कर दो। अगर पैसे कम होंगे तो स्टैंडर्ड कम करते जाओ। मैं कह रहा हूँ, एवरेज निकाल लो। इतने महीने का खाऊँगा, साल का इतना, दस साल का इतना, सौ साल का इतना। तो मेरे समझ से अब कितना हो गया? आपकी उम्र कितनी हो गई है?
आप तो कहाँ ले के जा रही हो? अपने समझ की बात है। सुनिए मेरी बात। आपका तो बहुत लिखा-पढ़ी वाली बात है। अपना बहुत ढीठ बात है। एवरेज निकाल लो कि भैया, हम महीने का इतना खर्च करेंगे। और गेहूँ का, घुमा-फिरा के वही रहेगा। तो दस साल निकाल लो। अब कितने साल के हो गए? कितने साल बचे हैं? सौ साल। निकाल लो। सौ साल तो पूरा होता है। लेकिन अब चालीस, पचास, साठ, तो जितना जीना हो उससे। और जो हो गया है, उसका रोटी का जुगाड़ कर लो। और सेविंग कर लो। और खाते रहो। आराम करो। फिक्स उतना बना लो, और फिक्स खाते रहो। खत्म बात। खाओ, पियो, सो। बस। वो साधना है। आराम। आत्मज्ञान तो आपके अंदर है। कौन ले लेगा? किसी की ताकत है क्या? और किसी की ताकत है करवा देगा? इतनी बात समझ में अभी तक नहीं आई। ये तो आपके अंदर है। जब मैं विश्राम करूँगा तो मिल जाएगा। खत्म बात। क्योंकि वो मेरे अंदर है। मुझे विश्राम की जरूरत है। काम में मैं बाहर हूँ। विश्राम में अंदर हूँ। अपने आप में। बस बात खत्म।
प्राप्त हमें नहीं करना। हमें जीना है। परमात्मा को लगे कि मुझे प्राप्त कर ले, अगर उसे जरूरत हो तो कर ले। हमें नहीं प्राप्त करना है परमात्मा। भाई, मुझे जीने के लिए जिंदगी मिली है, और मैं जीना चाहता हूँ। अरे, हम कुछ और कह रहे हैं माता जी। आप कहाँ चली गईं? बात समझ में आ रही है। आत्मज्ञान हमारे में है। कहाँ जाएगा? कौन छीन लेगा? विश्राम करिए। बस। बात खत्म।
आप सोचिए ना। चिल्ला-चिल्ला के लोगों ने यही कहा ना, आपके अंदर है। तो बात खत्म। विश्राम में हम अपने आप में होते हैं। बस बात खत्म। और जब विश्राम करेंगे, सब छूट जाएगा। लोग हमें छोड़ देंगे। दो साल बाद। काम ऐसे ही काम नहीं रहे। ऐसा मेरे साथ हुआ। आप समझिए इस बात को। ऐसा मेरे साथ हुआ। मेरा सोना देख के मुझे सब छोड़ दिए। मेरा यही काम था। मेरे घर वाले बहन को बोलते थे, क्यों इनको रखे हो? और मेरा काम एक ही था, खाना-सोना। और ये भी नहीं। अगर भोजन बने तो हमसे पूछा जाए। ऐसा भी नहीं। किसी के दबाव में रहना, ऐसा भी नहीं। डाँटना भी। अच्छा भोजन नहीं होगा तो नींद कैसे अच्छी होगी? ऐसा नहीं कि उनके दबाव में रहना, कि खा रहा हूँ। भोजन बनना है तो मेरे से पूछ के। उसके आदमी को चाय चाहिए। दो बजे रात को, महाराज जी चाय पियोगे क्या? हम कहे, नहीं। आप बोलते हो तो चलो। उसको पीना है, बोलता था मुझसे। और अगर मैं बोलूँ तो वो बनाएगी, नहीं तो नहीं बनाएगी। बात ये थी। तो आत्मसम्मान के साथ रहना, स्वाभिमान के साथ रहना। ऐसा नहीं कि सो के खा रहे हैं। ये तो और भी कठिन कर दिया।
कमाना-धमाना नहीं है। अरे, केवल सोना, बढ़िया खाना। डाँटना भी, और सम्मान भी चाहिए। माँ बोलती भी थी कभी-कभी, संचय किया करो। बोला, देख माई, तेरा बेटा जितना पूरी जिंदगी में कमाएगा, मैं एक-आध साल में कमा के रख दूँगा। छोड़, हमें खाने-सोने दे। जब लगेगा मुझे कमाना है, तो एक साल में कमा के रख देंगे। आप समझिए इस बात को आप लोग। आप एक लिस्ट बनाइए। मंथली आपका कितना है, एवरेज निकाल लीजिए। और आप जितनी आयु है, मिला-जुला के सौ साल, अस्सी साल तक जितना जीना है, आप जमा करके उसका खाइए। बस बैठ के।
रहेगा। पाँच साल हो जाए तो उसको बढ़ाइए। छोड़ दीजिए, एकदम। ऐसा भी कर सकते हो। मतलब अगर एवरेज में कमी हो रही है तो कर लीजिए। और एवरेज पक्का है, ज्यादा है, तो एकदम तुरंत छोड़ दीजिए। जाके इस्तीफा दीजिए। बस। अगर कम है तब तो करिए। लेकिन जब उससे ज्यादा है तो काहे को करोगे। अगर आपको लग रहा है, जैसे आप शिक्षक हो, आप पढ़ाते हो, और मेरे पढ़ाने से बच्चों का कल्याण होगा, तो निशुल्क पढ़ाना चालू कर दीजिए। ये मैं आपको सलाह दे रहा हूँ। कोई भी शिक्षक हो, वो निशुल्क अपना क्लास लेने लगे। वो भी विश्राम है।
मरना तो है ही इंसान को। कुछ ना कुछ तो बनेगा ही। पक्का तो कुछ भी नहीं है। अब देख लीजिए। मैं तो कहूँगा विश्राम करो। बाकी अगर ऐसा कुछ हो जाए तो वो भी करो। निष्काम करो। पैसे के लिए मत करो। एक बार सेविंग कर लो। अगर करने की इच्छा हो तो समाज कल्याण के लिए करो। विश्राम के साथ। लेकिन पैसे के लिए नहीं। समाज कल्याण भी तो गृहस्थ जीवन में तभी होगा जब आपका पेट भरा हो। एकदम। आप संपन्न होंगे तभी आप समाज कल्याण कर पाएँगे। आप ज्यादा से ज्यादा दस प्रतिशत निकाल दीजिए, कि भाई हम इसको लगा देंगे। अपनी तरफ से कोशिश करिए। जो आप कर सकते हैं, आप कर लीजिए। उसमें आपको ये भी कभी-कभी होगा कि आप हर एक को जाँच नहीं सकते। तो कई बार आपको लगेगा कि आपके पैसे खराब हो गए। तो उसके लिए आप तैयार रहिए। एकदम। तो आप अपनी लिस्ट बना दो, नहीं तो रह जाएगा।
भरते रहो, भरते रहो। एक बार भर दो। ये एक काम की नहीं है। छह महीना बाद मर गए तो लाइफटाइम कहाँ। दूसरे दिन तो मिलेगा नहीं। एक लाख किसी ने जमा किया, तो इतने साल बाद क्या होगा? इससे अच्छा तो खा लो। पता नहीं दस साल बाद कोई और खाएगा। ये लीजिए। मैंने आपको क्या बताया? फ्लैट बेचो। भाड़े पे घर लो। फिक्स करो। आराम से खाओ। मैं ये बता रहा हूँ। आप तो और मेहनत करवाना चाहती हो। मैं विश्राम के लिए बोल रहा हूँ। अगर मान लीजिए आपके पास फ्लैट है, तो उसे बेच दो। भाड़े पे घर लो। और मंथली खाओ। पैसे खत्म हो जाएँ, तो यहाँ आ जाओ। यहाँ तो आओ। मैं तो कह रहा हूँ, कोई भाई रुके। लोग भाग जाएँ तो यहाँ रुकिए ना। फंड-वंड कुछ नहीं जमा करना। यहाँ रुको ना। अच्छा, फिर यहाँ रुको ना। यहाँ ना फंड देना है, ना आपको कुछ देना है। कैलकुलेशन ना बोलिए। अभी मिला भी नहीं है। तो फिर आप यहाँ रुकिए ना। अभी वो बैठी, थोड़ा मिक्स करके, वैसे ही। तो वही तो। यहाँ तो कुछ आपको जमा नहीं करना है। बस आप रह जाओ। सब कुछ आ जाएगा। यहाँ पे भोजन, मेडिकल, सब है। सब है। देख रहे हो, सब आ के रखा है। सब यहाँ पे सब है। ठीक रहिए आप लोग यहाँ।
एकदम। जब बेईमानी और दुष्कर्म करते हो, उस समय एकदम रहते हो। नहीं तो होगा ही नहीं। बेईमानी करते समय पूरी तरह सचेत रहते हो। होश में रहते हो। समझ के करते हो। ये ना करो। बस।
एक जिज्ञासु को, एक साधक को यह ध्यान रखना चाहिए कि गुरु के पास हम इसलिए जा रहे हैं क्योंकि हम अपनी धारणाओं से परेशान हैं। जितनी भी जानकारी हमारे पास है, उससे मुझे परेशानी है, तभी तो जाना पड़ रहा है। अगर मैं उससे परेशान नहीं होता तो मैं नहीं जाता। जितने लोग मेरे आसपास हैं, जितनी मेरी समझ है, जितना मेरे पास सब कुछ है, उसी से मैं ग्रसित हूं, उसी से मैं परेशान हूं। जब आप गुरु के पास जाते हो तो गुरु आपकी धारणाएं तोड़ता है। तुम जो सोच के आए हो, वह नहीं होगा। तुम सोच के आए हो कि ऐसा ही करवाएंगे, वैसा नहीं करवाएंगे। तुम सोच के आए हो कि गुरु बड़ा सरल होगा, तो आपके लिए बहुत जटिल होगा। कोई सोच के आया है कि गुरु बड़ा कठोर है, तो उसके लिए सरल हो जाएगा। कहने का मतलब यह है कि हमारे पास जितना है, हम उसी से परेशान हैं, और उसे ही हमें छोड़ना पड़ेगा।
और आपके लिए तो मैं इतना कहूंगा। इस बार आप आए हो, और मेरा भाव आपके लिए इतना हुआ है कि मेरी नजर आपसे हटे नहीं, क्योंकि हटने लगी है। यह मैं आपको सचेत कर रहा हूं। एक बार हट गई तो दोबारा फिर नहीं जाएगी। न तो मेरे बस में है कि फिर मैं आप पर नजर डाल सकूं, न तो आपके बस में है। मैं आपसे यही सलाह दूंगा। आप पहली बार आए थे, तभी से आप पर नजर थी। आप चाहे दुनिया में जहां भी थे, मेरी नजर आप पर हमेशा बनी रही, आंतरिक रूप से। अब वह नजर हट न जाए। यह व्यक्तिगत मेरी नजर नहीं समझना, भौतिक शरीर की नजर नहीं समझना। एक गुरु की नजर समझना।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु दो होता ही नहीं है। गुरु सिर्फ एक होता है। मेरी यही सलाह है कि गुरु को शरीर रूप में देखो ही मत। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु एक होता है, दो नहीं होता। जहां से भी आपको ज्ञान मिले, वही मेरा गुरु है। ऐसा मेरे द्वारा कुछ कार्य न हो जाए कि उसकी नजर हट जाए। क्योंकि उसकी नजर हट गई तो कोरे शब्द लेकर घूमते रहोगे, होगा कुछ नहीं। जैसे आप किसी को अपने परिचय वाले के यहां भेज रहे हो, और सामने वाले को कह भी दिए कि मेरा परिचित पहुंच रहा है, इसका अच्छे से ख्याल रखना। लेकिन वह यह भी कह सकता है कि अभी यह इस लायक नहीं रहा, तो जहां गए वहीं भगा दिए जाओगे। ऐसा कोई कर्म न हो कि गुरु की नजर हट जाए। गुरु तो होता ही नहीं। गुरु मेरा तेरा होता ही नहीं। मेरे तेरे से जो मुझे मुक्त करा दे, वही गुरु है।
जैसे इस पृथ्वी पर पानी एक ही जगह से आता है, दो जगह से कभी नहीं आता। निमित्त अनेक हैं। मेरा नल, तेरा नल, हर नल। दूर दूर, सात कोस पर हो, बीस कोस बाद पानी हो, तो स्वाद बदला रहेगा, लेकिन वह भी प्यास बुझाएगा। शरीर से अलग अलग तरीके से ज्ञान देते हैं, जिस तरीके से तुम समझ पाओ। लेकिन पानी एक ही जगह से आता है, दो जगह से नहीं आता। आप बाहर मत देखो। आप सिर्फ पानी को देखो। पानी से प्यास बुझेगी, नल से प्यास नहीं बुझेगी। आप लोग नल को लेकर परेशान हो। गुरु दो होता ही नहीं है। गुरु सिर्फ एक होता है। जैसे परमात्मा एक है, तो गुरु भी एक ही है। इन धारणाओं को तोड़ो। गुरु आपकी धारणाएं तोड़ता है।
अगर वह आपकी समझ से करेगा, तब तो आप वही के वही रह जाओगे। आपकी समझ से आप ग्रसित हो, परेशान हो, तो आपकी समझ से थोड़ी करेगा। अगर आपकी समझ से कर दे तो आप वहीं के वहीं रहोगे, उसी जाल में फंसे रहोगे। अच्छा तो लगेगा कि मेरी मर्जी से हो रहा है, लेकिन तेरी मर्जी से क्या हुआ। तेरी मर्जी से ही तो तू बंधन में फंसा है। तेरी जितनी भी इच्छाओं की पूर्ति करता गया, उसी में तो तू फंसा। आज अगर फंसा है तो कहां फंसा है। अपने ही कर्मों से, अपनी ही इच्छा से, अपनी ही कामना से। अपने जैसा करवाना चाहा, होता गया तो फंसता गया। जहां नहीं हुआ वहां द्वेष में फंसा, जहां हो गया वहां राग में फंसा। गुरु के पास तेरी मर्जी नहीं चलेगी। तेरी मर्जी से तू फंस जाएगा। अब उसकी मर्जी चलेगी। जब मुक्त पुरुष की मर्जी चलेगी तो तुम मुक्त हो जाओगे। अगर बंधन वाले की मर्जी चलेगी तो तुम बंधन में फंस जाओगे। तेरी मर्जी अगर चल भी जाए तो तेरा पतन है। आज अगर देखा जाए तो तेरे पतन का कारण तू ही तो है, दूसरा नहीं।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है, शरीर का प्रतीक नहीं है। हां, उस शरीर को सम्मान है। जिस पात्र के द्वारा मैंने जल और भोजन ग्रहण किया, उस पात्र को सम्मान है। जिस शरीर के द्वारा मुझे मार्ग मिला, उस शरीर को प्रणाम है। लेकिन मुझे ज्ञान को पकड़ना है, उस शरीर को नहीं। शरीर को प्रणाम करना है, क्योंकि उसी के द्वारा तो मिला मुझे। नल को प्रणाम करना है, क्योंकि नल निमित्त हुआ प्यास बुझाने का। हमारी क्षमता नहीं थी कि हम पानी निकाल लेते। नदी निमित्त है, तालाब निमित्त है। हमारी क्षमता थोड़ी है एक बूंद पानी निकाल लेने की। नहीं है। हमारी क्षमता थोड़ी है ज्ञान निकाल लेने की। तो मुझे नदी को, तालाब को, नल को, कुएं को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि वही तो निमित्त हैं। अगर वे नहीं होते तो हमारी प्यास नहीं बुझती। इस शरीर को भी प्रणाम है, इसलिए कि यह शरीर नहीं होता तो मुझे ज्ञान भी नहीं मिलता। ज्ञान तो घूम रहा है जगत में, जैसे पानी पृथ्वी में है। इसे निकालोगे कैसे। पानी ऊपर भी है। तुम्हारी क्षमता है क्या, बरसा दोगे। तो उस नल को प्रणाम है जिसके द्वारा मेरी प्यास बुझी। लेकिन मूल हमें पानी से मतलब रखना है। मैं आपको फिर से यही सलाह दूंगा। मौका मिला है, पार कर जाओ।
हो जाओ। ईमानदार बनो। कुछ भी हो जाए, ईमानदार हो ही जाओ। उसका परिणाम कुछ भी आए, क्या फर्क पड़ता है। जहां भी रहोगे, तुम तो रहोगे। कम से कम ईमानदार बन के तो रहोगे। और आखिरी में तो आप जिसको बचाना चाहते हो, वह छूट ही जाएगा। तो बेईमान बनके क्यों छूटो। साथ छूट रहा है। अगर साथ ही छूटना है तो ईमानदार बनके छूटो। क्या आप उसे बचा लोगे। क्या बेईमानी करके उन रिश्तों को बचा लोगे। जिंदा या मुर्दा, छोड़ना तो पड़ेगा। ऐसा तो नहीं कि वह रिश्ता था, है और रहेगा। रिश्ता बना है, मिट जाएगा। उसे बचा तो नहीं सकते। कम से कम जा ही रहे हो तो बेईमान बन के तो मत जाओ। इसलिए ईमानदार हो जाओ, पूरी तरह। परिणाम कुछ भी आए, क्या फर्क पड़ता है। जहां भी पाओगे, अपने आप को तो पाओगे। अपने साथ कम से कम ईमानदार तो हो जाओगे। ईमानदार का तो साथ कर लोगे। अभी तो एक बेईमान के साथ हो। घुटन है, वह तुम ही हो।
कुछ भी हो जाए, क्या फर्क पड़ता है। जहां भी रहूंगा, मैं तो रहूंगा। ईमानदार के साथ तो जिंदगी रहेगी, चाहे जितना भी हो जाए। उसका नहीं देखना। जिसको बचाना चाहते हो, क्या वह नहीं छूटेगा। छूटेगा। क्या आपको लगता है कि बेईमानी से आप उसे बचा लोगे। बचा तो नहीं पाएंगे। इसलिए ईमानदार हो ही जाओ। अभी भी मौका है। ऐसा न हो, मौका चला जाए। फिर ईमानदारी का भी कोई मतलब नहीं है। ईमानदारी का मतलब तब तक है जब तक आपके हाथ में कर्म है। क्योंकि ऐसी अवस्था आएगी, आपसे कर्म छीन लिया जाएगा। फिर क्या करोगे। एक बेईमान के साथ घुटन होगी बुढ़ापे में। कम से कम जीना है तो ईमानदार के साथ जियो। ईमानदारी पकड़ो, और किसी भी स्थिति में वह छूटे नहीं। सब छूट जाए, चलेगा। इसलिए कि ईमानदारी ही आपको उस परम सत्ता से मिला सकती है, और कोई नहीं।
छोटी छोटी बातों में भी नहीं होना चाहिए। कहीं जा रहे हो, उचित जगह नहीं है। बाथरूम आ गया, आदमी देखता है। थूक आ गया मुंह के अंदर, देखता है इधर उधर कोई देख नहीं रहा, लेकिन उचित जगह नहीं है थूकने के लिए, थूक दिया। नहीं थूकना चाहिए। मैं तो देख रहा हूं। अगर मैं नहीं देख पाऊं, तो दोष नहीं है। जैसे एक बालक नहीं देख पाता कि कहां मल मूत्र करता है। मैं अपने आप तो देख ही रहा हूं। तुम तो देख रहे हो, और तुम्हें यह भी पता है कि यहां थूकना और बाथरूम करना मना है। मन में भी आता है कि यहां सही नहीं है। तो नहीं करना चाहिए। अभी भी ईमानदारी पकड़ लो। और कैसे भी, किसी भी तरीके से अपना कल्याण कर लो। ऐसा न हो, प्लानिंग में जिंदगी चली जाए। सब हाथ से चला जाए। पता चला, समझ है तो समय नहीं, समय है तो समझ नहीं। बहुत सौभाग्यशाली हैं जो समय पर समझ का उपयोग करके निकल जाते हैं। एक दिन ऐसा होगा, करने लायक ही नहीं रहोगे। अभी मौका है, समझ भी है, समय भी है, शरीर भी है। हाथ से गया तो गया सब। फिर कुछ नहीं कर पाओगे।
कष्ट इसलिए होता है कि जिस रिश्ते को आपने खड़ा किया है, जिनके साथ हो, उनका जीवन बेईमानी से है। उनको आपने बेईमानी से अपनाया है। आपने ईमानदारी से नहीं अपनाया। अगर शुरुआत में ही ईमानदारी से अपनाते तो यह कष्ट नहीं होता।
जब नया रिश्ता बनाते हो तो बहुत सारी बातें करते हो कि यह करेंगे, वह करेंगे। वह सारी बातें ईमानदारी की नहीं होतीं। रिश्ता बनाने के बाद फिर ईमानदार बनोगे, तो कष्ट होगा। जैसे आप जॉब करने गए, तो आप अपने बारे में बता दीजिए कि मैं जिस पद को स्वीकार कर रहा हूं, उस पद का मुझे काम बताइए, और उस काम के अलावा मैं कुछ नहीं करूंगा। यह आपको बोलना पड़ेगा। लेकिन जॉब पकड़ने के लिए कुछ भी बोल देना। जब बेईमानी से ही पकड़ा है, तो जब वहां ईमानदारी अपनाओगे तो आपको तकलीफ बहुत होगी, क्योंकि बेईमानों की संख्या ज्यादा है। आप अपने बारे में पहले बता दो कि मैं ऐसा हूं, और मैं ऐसा करूंगा, न आगे न पीछे। अगर स्वीकार करो तो ठीक है। नहीं स्वीकार करते तो मैं जा रहा हूं। तकलीफ तब होती है जब हम शुरुआत बेईमानी से करते हैं और फिर उम्मीद करते हैं ईमानदारी की।
अगर शुरुआत बेईमानी से कर दी है, तो अब उससे बोलो। वह छूट भी सकता है, कुछ भी हो सकता है। तकलीफ होगी आपको। हो सकता है वह छोड़ के चला जाए। लेकिन आप तो रहोगे। कम से कम घुटन में तो नहीं जियोगे। कम से कम छूटे तो ईमानदार बनके छूटे। अब से शुरू कर दो। प्रॉब्लम तो होनी ही है, क्योंकि आपने हर रिश्ते को, हर पल को बेईमानी से प्राप्त किया है। कहीं न कहीं आपने खुल के बात नहीं की। दबाव में, संकोच में, परिस्थिति के कारण, स्थिति के कारण, कि नौकरी न मिले अगर मैं सच बोलना चालू कर दूं।
आप अपने बारे में पहले बता दो कि मैं ऐसा हूं। जिस पद के लिए आया हूं, इस पद का काम मुझे इतना आता है, और मैं इस पद को तभी अपनाऊंगा जब आप मेरी बात सुनेंगे। अगर मेरी जरूरत है तो आप बोलिए। मैं इस पद के अलावा कोई काम नहीं करूंगा। अगर आप मुझसे पहले से और काम बोलोगे तो मैं कुछ करने वाला नहीं। पहले मुझे पूरा बता दीजिए, काम का सिस्टम क्या है आपका, आप क्या करते हो। आप जानो कि आपका काम क्या है।
जानवरों के साथ इसलिए रहना पसंद लोग करते हैं कि वे जवाब नहीं दे पाते। मैं तो सबके साथ रहना पसंद करता हूं जिसको जरूरत है। अगर वे जवाब देते, और आप उनकी भाषा समझते, तो आप भी उनके साथ रहना पसंद नहीं करते। वे जवाब नहीं दे पाते। आप चाहे उन्हें मार दो, चाहे डांट दो, बिना मतलब का कुछ भी बोल दो, तो आपका सारा गुस्सा बड़े आराम से उतर जाता है। सारी फालतू चीजें आपके अंदर की बड़े आराम से उतर जाती हैं। आप उन्हें दबा दो, आप उन्हें पटक दो। कुछ देर में चें चें करके जाएंगे, फिर वापस बुलाओगे, आ जाएंगे। तो फिर आपको अच्छा लगता है। एक कमजोर व्यक्ति जानवरों के साथ रहना बड़ा पसंद करता है। हम उसके साथ कुछ भी करते हैं, वह जवाब नहीं देता। जानवरों के साथ आप कुछ भी करते हो, अटपटी बातें करते हो, सारी भड़ास उस पर उतारते हो, बड़े आराम से। उसे क्या पता। अगर वह जवाब भी दे रहा है तो तुम्हें उसके जवाब का पता नहीं है। इसलिए बड़ा अच्छा लगता है।
हम उस परम सत्ता से आए हैं। हम सबको कंट्रोल करना चाहते हैं। और जो मेरे कंट्रोल में आ जाता है, उसके साथ मुझे जीने में बड़ा अच्छा लगता है। अगर मेरे कंट्रोल में कोई नहीं आता। अब जानवरों में क्या, शेर के साथ रहोगे। नहीं। जितने तुम्हारे अधीन हैं, जिनसे तुम्हें भय नहीं, उनके साथ रहना पसंद करोगे। बहुत लोग शेर के साथ भी रहते हैं, लेकिन तुम्हें कहा जाए तो नहीं रहोगे, क्योंकि तुम उन्हें काबू में करने की क्षमता अभी नहीं रखते। जितनों को तुमने कंट्रोल कर लिया है अपनी जिंदगी में, चाहे जानवर हो, चाहे इंसान हो, चाहे कोई भी हो, उनके साथ आपको जीना अच्छा लगता है। हर देश दूसरे देश पर कंट्रोल करना चाहता है। हर व्यक्ति की यही नीति है कि वह कंट्रोल करना चाहता है।
कंट्रोल तो मजबूरी में हुआ है। जैसे गुरु के यहां समर्पण। गुरु के यहां चल ही नहीं रही है तुम्हारी। उसे भी अपने अधीन करने आए थे। मात तो उसे भी देने आए थे। लेकिन उसके यहां नहीं चली। तोड़ना तो उसे भी चाह रहे थे। कंट्रोल तो उसे भी करना चाह रहे थे, कि मैं तुमसे ज्यादा हूं, कुछ मैं ऐसा करूंगा कि मैं तुमसे ज्यादा दिखूंगा। लेकिन एक गुरु ऐसी सत्ता है जहां आपकी चलेगी ही नहीं। चाहे आपका बैकग्राउंड हो, चाहे पढ़ाई हो, चाहे लिखाई हो, कुछ भी। चलेगा नहीं। जीव आत्मा इसी में तो फंसा है, कंट्रोल करने में।
इस बात को समझ लो। कंट्रोल की आदत छोड़ो। अगर कंट्रोल करना है तो अपनी बुरी आदतों का कंट्रोल करो। आपके द्वारा कोई उठना चाहिए, गिरना नहीं चाहिए।
असली सवाल यही है कि मैं कैसे इन सवालों से मुक्त हो जाऊं। सवालों से मुक्त होना मतलब मैं उस मूल में चला जाऊं। जब तक मेरे सवाल हैं, मतलब मैं कहीं और हूं। जब तक व्यक्ति रास्ता पूछ रहा है, तब तक वह कहीं और है। असली सवाल यही है कि मैं सवालों से कैसे मुक्त हो जाऊं। यह आखिरी सवाल है। अब इस सवाल तक, कि मैं सवालों से कैसे मुक्त हो जाऊं, यहां तक पहुंचने के लिए हो सकता है आपको अनेक सवाल करने हों। जब तक सवाल है, इसका मतलब मैं कहीं और हूं, मतलब मैं मार्ग में हूं। जब तक सवाल है, तब तक मैं मार्ग में हूं।
माइंड में कुछ नहीं रखना है, और मैं आपको माइंड में रखने के लिए कुछ दूंगा भी नहीं। पहले तो आप रुको। आप आए हो किसके लिए, पहले वह तो पक्का हो जाए। आप जिसके लिए आए हो, क्या वही चाहिए। क्या आप उस लायक हो। बस भाव बना लिया है। क्या मैं उसके लिए कुछ कर सकता हूं। अब जिसके लिए आए, वह आप जानते ही हो। तो बस रुकना है। माइंड में तो कुछ अलग से डालना ही नहीं है, क्योंकि माइंड में तो लेकर आए हो। तभी तो मैं वहां पहुंचा। जो भाव लेकर आया था, वह यहां पहुंचने के बाद नहीं रहा। अब देखो क्यों नहीं रहा।
बहुत सारे सवाल पूछूंगा, जवाब चाहूंगा, यह तो पूछ ही रहे हो। जो भी कुछ सोचा था, वह एकदम से नहीं रहा। जो सवाल मन में थे, वे नहीं हैं। वे शायद धीरे धीरे आएं, दोबारा मुलाकात में। कोई बात नहीं। मैं जितना पूछ सकता हूं, मेरे सामने आए, मैं पूछ लूं। आएंगे तो फिर मौका मिलेगा, फिर पूछ लूंगा। पूछ तो रहा ही हूं, चाहे अभी के हों, चाहे पहले के हों। हैं तो मेरे सवाल ही। हो सकता है यही सवाल, अपने जवाब से, उस सवाल को खत्म कर दे।
हमारी आदतें जहां भी रखोगे, वहीं रहेंगी। जगह बदलने से आदतें नहीं बदलतीं। इस फूल को उठाओ, यहां से वहां रख दो, तो भी वही फूल रहेगा। जगह बदल जाएगी, आदतें तो हमारी वही रहेंगी। ओवरथिंकिंग किसी का सही नहीं है। अध्यात्म में भी ओवरथिंकिंग सही नहीं है।
अपने जीवन में दो प्रश्न करो। मैं यह करने जा रहा हूं, क्या मैं इस लायक हूं। जवाब मिले हां या ना। अगर हां मिले, तब तो बढ़ जाओ। दूसरे प्रश्न की जरूरत नहीं है। अगर उत्तर यह आए कि मैं इस लायक नहीं हूं, तो एक प्रश्न और अपने आप से करो, कि मैं मेहनत करके इस लायक बन सकता हूं। अगर उत्तर ना मिले, तो बात खत्म। अब आप नहीं कर पाओगे। और अगर उत्तर मिले कि हां, मैं कर सकता हूं, मेरी काबिलियत है, बस मुझे जरूरत है कि ऐसा कोई व्यक्ति मिल जाए जो मुझे सपोर्ट कर दे, तब आप आगे बढ़ जाओ। तब आपकी ओवरथिंकिंग काम नहीं करेगी।
दो सवाल हर व्यक्ति को, हर युवा को, जहां भी जा रहे हो, कुछ लेना है या करना है, दो सवाल करो। ये दो सवाल आपको सही जगह पहुंचा देंगे, जिस लायक आप हो। पहला सवाल, मैं कुछ करने जा रहा हूं, क्या मैं इस लायक हूं। हां, तो कर दो। नहीं लायक हूं, तो दूसरा सवाल, क्या मैं उस लायक बन सकता हूं। हां, बन सकता हूं, तो कर दूं। अब दोनों में अगर ना मिले तो बात खत्म। तब कुछ नहीं होगा। प्राकृतिक हो जाए, जिसे चमत्कार कहते हैं, वह हो जाए तो बात अलग है। लेकिन आपसे अब नहीं होगा। आपका प्रयास करने का भी कोई मतलब नहीं होगा।
कोई मतलब ही नहीं है। मेरे मानने से न तो हो जाएगा, न मेरे न मानने से। वह है तो रहेगा, नहीं है तो नहीं रहेगा। मेरे मानने से, न तुम्हारे मानने से, कुछ होने वाला नहीं है। देखना यह है कि मेरा कल्याण किस में है। मैं कहां खुश हूं। मैं जहां हूं, वहां खुश हूं क्या। हूं तो ठीक है, मैं रहूंगा। तब तो कोई निकाले, चाहे कोई भी आ जाए, मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा। नहीं निकलना चाहूंगा। और अगर मैं वहां हूं और खुश नहीं हूं, तो बस मैं वहां से कैसे निकल जाऊं। बस यही बात है। ईश्वर है या नहीं है, उससे क्या लेना देना। मैं कह दूं कि नहीं है, तो भी वह है तो रहेगा, और नहीं है तो नहीं रहेगा। मैं कह रहा हूं, अगर होगा भी तो मुझसे क्या लेना देना, और नहीं भी हो तो क्या लेना देना।
मुझे जिंदगी मिली है। मुझे यह देखना है कि मैं कहां खुश हूं। मैं अपने जीवन का अंत किस तरीके से करना चाहता हूं। मैं इस शरीर को कहां लगाना चाहता हूं। कौन सा काम मेरे लिए बहुत प्रिय है, बहुत अच्छा लग रहा है, जिससे मेरा भी लाभ हो और समाज के लिए लाभदायक हो, किसी को परेशानी न हो। वही करते हुए मुझे अपना अंत कर देना है। जीवन का अंत ऐसे हो भी जाएगा, चाहे जहां भी रहो। तो देखो, तुम्हें कहां खुशियां मिल रही हैं। तुम कहां खुश हो, बिना किसी को तकलीफ दिए। बिना किसी को तकलीफ दिए तुम्हें यह देखना है कि मैं कहां खुश हूं। क्या मतलब परमात्मा, क्या मतलब भगवान, जब मैं खुद ही परेशान हूं। मेरे लिए परमात्मा का क्या महत्व है। कोई महत्व है क्या। इतना दयावान होता तो परमात्मा आ जाता। मैं तकलीफ में हूं और आ नहीं रहा है, तो क्या मतलब मेरा, परमात्मा है या नहीं। मैं कैसे इतनी समझ को विकसित करके वहां से निकलूं, मुझे उसके लिए काम करना है।
ये जितने कमजोर लोग होते हैं, वे या तो परमात्मा को हां कहते हैं या ना कहते हैं। जिनको जीवन में कुछ नहीं करना है, दो ही बातें करेंगे। या तो है, या तो नहीं। और दोनों कमजोर हैं। कमजोर व्यक्ति हमेशा परमात्मा के सहारे जीता है, या तो हां में या तो ना में। जो ना कह रहा है, उसको भी शिकायत उसी से है। ना में भी हां है। जब नहीं है, जो चीज नहीं है उसकी बात क्यों करना। इसका मतलब तुम्हारे जीवन में वह है, कहीं न कहीं से है। अगर आप जाकर किसी से यह सिद्ध करवा रहे हो कि परमात्मा नहीं है, तो इसका मतलब तुम्हारे जीवन में जरूर है। आप ऐसा व्यक्ति चाहते हो जो परमात्मा को प्रत्यक्ष करा दे। आपका ना कहना यह दर्शाता है कि है। अगर कोई चीज नहीं है, तो उसके बारे में बात नहीं करोगे।
बचपन में माता पिता ने परमात्मा की सोच दिमाग में भर दी थी। उन्होंने डाला था। अब तो नहीं। अब तो आपकी समझ विकसित हो गई। पहले वे अपने हाथ से तुम्हारे शरीर को धोते थे। अब तुम धुलवाते हो क्या। वे बोलें भी कि धो दो, तो आप शर्मा जाओगे कि नहीं, अब मैं धो सकता हूं। जरूरी नहीं कि जितना उन्होंने डाला था, वही लेकर मैं घूमूं। अब तो मैं समझदार हो गया। मेरी समझ विकसित हो गई। क्या माता पिता ने जितना सिखाया है, उतना ही कर रहे हो। अगर उतना ही कर रहे हो, तो अपने हाथ से तो धोते भी नहीं, वही धो रहे थे। जब समझ विकसित हो गई, तब मुझे यह देखना है कि मेरे जीवन में क्या है।
परमात्मा है या नहीं, आप एक बात बताओ। अगर आपको किसी से कुछ नहीं चाहिए, तो वह है या नहीं है, आपको कोई मतलब है क्या। यहां परमात्मा की खोज थोड़ी लोग कर रहे हैं। परमात्मा से कुछ चाहिए, इसलिए परमात्मा की खोज कर रहे हैं। परमात्मा आ जाए और बोले कुछ नहीं, तो आप कहोगे कैसा परमात्मा। परमात्मा है तो बोलोगे कुछ दिखाओ मुझे। अगर परमात्मा सच में आ जाए और कह दे मैं परमात्मा हूं, लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकता, तो आप उसे परमात्मा मान सकते हो क्या। आपकी कामनाएं, आपकी इच्छाएं। आपकी सामर्थ्य नहीं है कि आप पूरी कर पाओ, इसलिए परमात्मा की बातें करते हो।
परमात्मा का आश्वासन लोग देते हैं। कमजोर आदमी हमेशा परमात्मा को हां या ना बोलता है, क्योंकि वह ना में भी कुछ पा रहा है। कुछ लोग खंडन करते हैं, उन्हें भी कुछ मिलता है। हां वाले भी पा रहे हैं, ना वाले भी पा रहे हैं। लेकिन सामर्थ्यवान व्यक्ति न हां में जाता है, न ना में जाता है। वह सिर्फ अपना काम करता है। मैं जिसके लिए जन्म हुआ हूं, मैं उस उपदेश को समझूंगा, उस पर मैं काम करूंगा। मुझे मतलब नहीं है कि परमात्मा है या नहीं है। मुझे क्या मतलब। उससे क्या लेना देना। वह परमात्मा जाने। मैं हूं। इसमें तो संशय नहीं है। मुझे जीवन मिला है। मुझे किस तरीके से अपने जीवन को खत्म करना है। एक दिन तो खत्म हो जाएगा। मेरे हाथ से यह शरीर तक चला जाएगा। अब इस शरीर को मैं कहां लगा दूं। इस शरीर को इस संसार में कहां लगा दूं। आप कुछ भी करोगे, शरीर तो चला जाएगा। तो यह देखना है कि इस शरीर को मैं कहां लगा दूं। अगर इस शरीर से एक दो लोग लाभ ले रहे हैं, तो इस शरीर के द्वारा ऐसा कुछ काम हो जाए कि हजारों, लाखों, अरबों लोग लाभ लें। आने वाली पीढ़ी लाभ ले। नहीं, हमसे क्या मतलब परमात्मा है या नहीं। मैं कह रहा हूं, परमात्मा होगा भी तो क्या होगा, और नहीं भी हुआ तो क्या होगा। मेरी जिंदगी मुझे मिली है। मेरी जिंदगी कहां मुझे लगानी है, मुझे यह देखना है। मैं कहां अपनी जिंदगी लगा के खुश हूं, बिना किसी को तकलीफ दिए। बस जिंदगी जीते हुए निकल जाना है।
यहां परमात्मा नहीं चाहिए। परमात्मा से कुछ चाहिए, इसलिए परमात्मा चाहिए। आप अपने जितने कर्म किए हो, उन्हें मिटाना चाहते हो। अपने दुख को हटाना चाहते हो, इसलिए परमात्मा चाहिए। या यह भी हो सकता है कि दुखी नहीं होना चाहते हो, और भगवान से डर रहे हो, इसलिए परमात्मा चाहिए। लेकिन मेन तो कर्म है। मैंने कुरान पढ़ा नहीं, तो कह नहीं सकता। किसी ने कहा था कि वहां स्वर्ग नरक की बातें होती हैं। किसी ने कहा था कि मान लिया जाए कि ईश्वर नहीं है, अल्लाह नहीं है, जीसस नहीं है, लेकिन शर्तें अगर हों, और फिर तू नरक में जाए तो क्या करेगा। अगर हो तो क्या फर्क पड़ता है। मैं जैसा कर्म करूंगा, वैसा तो मुझे परिणाम मिलेगा।
बहुत लोग जेल में पड़े हैं, कैदी। उस जेल में भी कई तरह से रखे गए हैं। एक ही तरीके से उनके साथ व्यवहार नहीं किया जाता। जैसा जिसने कर्म किया, वैसा पहुंच गया। तो मैं जैसा काम कर रहा हूं, वहां मैं पहुंच जाऊंगा। नर्क क्या है। मैं अगर बेईमानी कर रहा हूं तो मैं तो अभी भी नर्क में हूं। नर्क क्या समझते हो। क्या ऊपर है क्या। एक आदमी सड़ रहा है, तड़प रहा है, नर्क नहीं है क्या। एक आदमी सब कुछ रहते घुटन में जी रहा है, डिप्रेशन में जी रहा है, सड़ रहा है। सारी व्यवस्था उसने जुटा ली है, फिर भी वह सड़ रहा है। उसका इलाज नहीं हो पा रहा है। वह मरने का इंतजार कर रहा है। तो क्या यह नर्क नहीं है। जितना आप चाहते थे उतना पढ़ लिए, अपनी क्षमता के अनुसार, तो क्या आपका जीवन अभी नर्क नहीं है। परेशान हो तो यह नर्क नहीं, यही तो नर्क है। आपका जीवन घुटन में है। जितना आपने चाहा होता चला गया, और आप फिर भी घुटन में हो, तो नर्क में ही तो हो। और कहां हो। अगर मैं आनंद में नहीं हूं, प्रसन्नता में नहीं हूं, तो मैं नर्क में ही हूं। इस पिंड में ही नर्क है। इस पिंड में स्वर्ग है। इस पिंड में मोक्ष है। इस पिंड में ही मुक्ति है। इस पिंड में ही बंधन है। जितना है, इस पिंड में ही है। और अभी जैसे हो, वैसे ही आगे जाओगे।
आप देखो, आप कोई भी पद पर हो। आप हजार किलोमीटर जाते हो तो कहते हैं यह इसी पद पर है, और उस पद के अनुसार आपको इज्जत देते हैं। आप जिस कंपनी में काम करते हो, जिस पद पर हो, उस कंपनी की किसी भी ब्रांच में चले जाओ, उसी पद से इज्जत मिलेगी, वैसा ही व्यवहार आपसे लोग करेंगे। तो आप जैसे हो, जिस स्थिति में आप इस पिंड में हो, इस पिंड को छोड़ने के बाद आप वहीं जाने वाले हो। एकदम क्लियर कर लो अपनी बात को।
मैं उन्हीं प्रश्नों का जवाब देता हूं जिनके उत्तर से आपके जीवन में लाभ होगा। और मैं उन प्रश्नों का जवाब नहीं देना चाहता जिनसे आपके जीवन में कोई मतलब ही नहीं है। मैं सीधा उन्हें हटा देता हूं, क्योंकि आपको लाभ ही नहीं होगा, तो मेरे जवाब देने से क्या मतलब।
आप परमात्मा के बारे में पूछो। मैं बहुत अच्छा बोल सकता हूं उसके बारे में। लेकिन मैं नहीं बोलूंगा, क्योंकि आपके जीवन में उसका अभी कोई महत्व नहीं है। आपके जीवन में अभी आपका महत्व है। जहां हो, वहां से निकालो। परमात्मा का कोई लेना देना है ही नहीं।
एक सामान्य व्यक्ति है। उसके घर में भोजन नहीं है। उसके बारे में जाकर उसके राजा के बारे में बताओ कि राजा ऐसा है, रानियां उसकी ऐसी हैं, राजमहल ऐसा है, राजा ऐसे ऐसे खाता है। तो वह दरिद्र, वह भूखा आदमी कपाल पटक देगा। उसको दो वक्त का भोजन दे दो। भूखे आदमी के जीवन में भोजन का महत्व है। राजा का कोई महत्व नहीं है। ये फूल सुंदर तभी लगते हैं जब पेट में रोटी हो। व्यक्ति हर तरीके से भरा हुआ है तो ये फूल उसको सुंदर लगते हैं। लेकिन व्यक्ति हर तरीके से खाली हो। किसी का बेटा बीमार हो और आप जाकर अच्छे से अच्छा फूल दो, क्या आपको लगता है वह फूल को महसूस कर पाएगा। उसको और दर्द देगा। तो ऐसे ही आपके जीवन में भी परमात्मा का कोई महत्व नहीं है। अभी नहीं है। उस बाप के बच्चे बीमार हैं, क्या उसके जीवन में फूल का कभी महत्व नहीं होगा। जब वह ठीक हो जाएगा, तब होगा।
जहां आप हो, जब वहां सब ठीक हो जाएगा, तब उसका भी महत्व पता चल जाएगा। तब वह फूल को महसूस कर पाएगा। कब। जब उसके बच्चे ठीक हो जाएंगे। कोई भी व्यक्ति, जिससे हम प्रेम करते हैं, अगर वह बीमार है, उस अवस्था में उसे फूल दो तो दोनों महसूस नहीं कर पाएंगे। लेकिन वह ठीक हो गया, और तब जाकर आप उसे फूल दीजिए, तब खुश भी होगा, उस फूल को महसूस कर पाएगा। तो जिस दिन आप ठीक हो गए, तो आप परमात्मा को महसूस कर पाओगे। संपन्न व्यक्ति ही परमात्मा को महसूस कर पाता है। दरिद्र नहीं। दरिद्र का मतलब खाली। इस पृथ्वी पर वही व्यक्ति परमात्मा को महसूस कर पाया है जो पूरी तरह संपन्न हो चुका है। और आप करना भी चाहो, अगर वह करना भी चाहे, इस फूल को महसूस तो नहीं कर पाएगा। उसे यही फूल घुटन देगा। तो अभी आपके जीवन में अगर मैं परमात्मा की बात करूं तो आपको घुटन देगा वह परमात्मा। आप जहां हो, जब वहां से निकल के पूरी तरह संपन्न हो जाओगे, तब आप परमात्मा को महसूस कर पाओगे। और उसका कोई भी सदस्य बीमार है तो फूल दोगे तो घुटन होगी। ठीक हो गया तो वही फूल उसे प्रसन्नता महसूस कराएगा। संपन्न हो जाओ। परमात्मा छोड़ो। पहले बीमारी को ठीक करो, तकलीफ को ठीक करो। तकलीफ में आदमी कुछ महसूस नहीं कर पाता।
भूखे आदमी को आप बोलो, चलो बगिया में घुमाता हूं। भूखा आदमी बगिया में जाकर क्या करेगा। हर तरफ भोजन ही खोजेगा। तो जहां हो, जहां तकलीफ है, जहां परेशानी है, वहां से अपने आप को निकालो। पृथ्वी पर जिन्होंने भी परमात्मा को महसूस किया है, वे संपन्न थे। उन्हें कुछ नहीं चाहिए था। तो हमें परमात्मा की बातें ही नहीं करनी चाहिए। हमें तो यह बातें करनी चाहिए कि मैं इस स्थिति में हूं, इस जगह पर मैं हूं, इस जगह को पसंद नहीं कर पा रहा हूं, मैं स्वीकार नहीं कर पा रहा हूं, मैं बहुत पीड़ित हूं इस जगह से, मानसिक रूप से जहां भी मैं हूं, वहां से निकलने का उपाय बताओ। पहले तो वहां से निकलो। भूख शांत होने पर सब अच्छा लगता है। पहले हमारी भूख शांत होनी चाहिए। गुरु भूख को शांत करता है।
सुबह निकले हैं। मैंने गुस्सा किया, जिसका आपको कारण का पता ही नहीं। ऐसा कुछ आपने किया ही नहीं कि मैं गुस्सा करूं, और मैं आपको गुस्सा करने के लिए निकला भी नहीं था। लेकिन डांट तो सबने देखी। सबने देखा। लेकिन रात को आपके लिए गाड़ी हमने भिजवाई। उसको महसूस करो। आप आए। उतनी रात को व्यक्ति सो जाता है। लेकिन आपको आते हुए देखा, उतरते हुए देखा, सीढ़ी पर चढ़ते हुए भी देखा। अपना जर्मन शेफर्ड सीढ़ी तक छोड़ने आया, तो इसने हाथ से हटाया। मैं अंदर ही था। लोकेश ने ऐसे हाथ से किया, तो फिर वह वापस आया। आप उतरने के बाद थोड़ा उसे छूना चाहे, वह भी मैं देख रहा था। जब तुम नहा धो के आए, भोजन करने लगे, तो इसने आपको खिचड़ी दी, लेकिन पापड़ नहीं दिए। तो पापड़ के लिए आवाज किसने लगाई। हमने लगाई। तब उसने पापड़ दिया।
अब बताइए, कौन सा पलड़ा भारी है। उस पलड़े की चर्चा क्यों नहीं हुई। डांट की चर्चा तो हो गई, लेकिन डांट के पीछे बहुत कुछ दिया, उसकी चर्चा तो आई ही नहीं। क्या वह मेरी जिम्मेदारी थी। क्या मेरा वह दायित्व था। कुछ नहीं। लेकिन मैं आपको देख रहा था। अभी उसकी चर्चा तो हुई ही नहीं। उसकी चर्चा मुझे करनी पड़ी, क्योंकि इस पलड़े को आप लोग भारी कर रहे थे। नहीं तो मैं उसकी भी चर्चा नहीं करता। उस दिन दो बजे के बाद तक मैं जागता रहा। जब तक ये आ नहीं गए, तब तक मैं जागता रहा, इनके लिए। लेकिन यह किसी ने थोड़ी देखा।
मैं वही तो कह रहा हूं। आवाज लगी तो मुझे समझ में आ गया। लेकिन समाज तक क्या पहुंचता है। डांटना। उस डांट के पीछे कितना प्रेम छिपा हुआ है, यह लोग नहीं देख पाते, क्योंकि तुम भी तो नहीं बताते। जैसे लाइव में भी लोग सुने होंगे कि तुम्हें डांट पड़ी, लेकिन तुम्हें उसके पहले कितना मिला, वह तो कोई नहीं देख पाया, मेरे अलावा। शायद तुम भी नहीं देख पाए। लोकेश भी देखता, तो बीच में रोक देता, कि गुरु जी ने डांटा, लेकिन गुरु जी ने पीछे कितना दिया। वह तुम नहीं देख पाए, और वह भी नहीं देख पाए। देखता तो जरूर बोलता। देने वाला ही जानता है। क्या मेरी जिम्मेदारी थी, दायित्व था, कर्तव्य था, कि मैं उतनी रात तक जागता रहा तुम्हारे लिए, और तुम्हें देखता रहा। खिचड़ी मिली तो पापड़ नहीं मिली। देने वाला नहीं दे पाया। जब मैंने उसे फोन किया, तब जाकर वह पापड़ लेकर आया। मैं बोला, तुझे पहले देना चाहिए था। फिर मीठा देने के लिए भी कहा, नहीं तो उसने मीठा दिया। यह न लाइव वालों को पहुंच रहा है, न उन लोगों को पहुंच रहा है।
और डांट की तुम्हें जरूरत ही थी, तभी तो डांट मिली। घास थोड़ी उखाड़ रहे हो। कचरा उखाड़ रहे हो। घास तो मैं कहीं भी लगा दूं, उखड़ जाए। घास नहीं उखाड़ रहे हो तुम लोग। कचरा उखाड़ रहे हो। कचरा बाहर उखाड़ रहे हो, तो तुम्हारा भी कचरा साफ हो रहा है। घास उखड़वाने के लिए बुलाया क्या। क्या मेरे पास कोई आर्थिक कमी है। ऐसी तो बात नहीं है। मैं तो वह लगा दूं, अभी कुछ ही देर में उखड़ जाएंगे। तुम घास नहीं उखाड़ रहे हो। घास उखाड़ते मैं तुम्हें उखाड़ने भी नहीं देता। तुम यहां जिस काम के लिए आए हो, वह करो। उस कचरे को साफ करने में तुम्हारा कचरा साफ हो रहा है। और तुमसे यहां क्या, घास रूप में। मैं तो एक गिलास पानी आज तक किसी से नहीं मांगा। कोई बोल दे यहां कि मैं तुमसे घास उठवाऊंगा।
व्यक्ति बहुत कुछ देख पाता है, लेकिन बहुत कुछ रहता है जो वह नहीं देख पाता। हमें क्या पड़ी है कि हम किसी को डांटें। इतना समय है मेरे पास, और मैं इसी के लिए थोड़ी ले रहा हूं। लगे रहो अपने कल्याण में।
आप ही लोगों के लिए है। सौ कमरे भी बना रहा हूं, बनाने वाला हूं। और आप लोग आराम से रहिए। आराम से अपने आत्मिक कल्याण के लिए साधना करिए। ज्ञान से, आपकी जरूरत से, पूरा सहयोग दिया जाएगा, जिससे आपका आत्मिक कल्याण संभव हो पाए। हमारे तरफ से कोई कमी नहीं रहेगी। अगर कोई कमी है तो आप लोग बताओ। मैं पूछता हूं, अगर कोई भी कमी हो। कमी तो हम में है। अगर कोई भी कमी हो तो आप मुझसे बोलिए। मैं तैयार हूं। अगर मेरे प्राण भी ज्यादा होंगे तो मैं वे भी देने के लिए तैयार हूं। बस तुम्हारा आत्मिक कल्याण हो जाए, क्योंकि आत्मिक कल्याण का महत्व मुझे पता है। तुम्हें हो या न हो, मुझे पता है। तो आप लोग आराम से रह के अपने आत्मिक कल्याण के लिए साधना करिए। कोई भी कमी हो तो आप मुझसे कहिए। मैं उस कमी को हटाऊंगा। बस आप में कमी न हो। अगर यहां कोई कमी नहीं, और आप में कोई कमी नहीं, तो अवश्य लक्ष्य तक पहुंचेंगे ही।
आप बस इस इच्छा को बनाए रखें, और इस इच्छा के लिए काम करते रहें। हम आपका पूरा सहयोग करेंगे, पूरी तरह। जिस प्रकार भी सहयोग लगेगा, मैं करता रहूंगा। बस आप अपनी इच्छा पर काम करते रहिए। क्योंकि आपकी अगर इच्छा हट गई तो मैं भी कुछ नहीं कर सकता। आपकी इच्छा बनी रहे। मेरी इच्छा तो है क्या। कहीं आप इच्छा न तोड़ देना।
हमारी इच्छा तो थी, है, और रहेगी। तभी तो हम रात दिन इतनी मेहनत में लगे हैं। नहीं तो दो बजे तक आपको कैमरे में क्यों देखते। क्या जरूरत थी। कौन देखेगा। हमारे यहां सब सो ही गए थे। लेकिन मैं देख रहा था कि आप आ जाओ, आप स्नान कर लो, खा पी लो, फिर मैं विश्राम करूं। अब आप बोलोगे कि देखे कैसे थे। तब कुछ घटना तो बतानी पड़ेगी। जो कहता है, बोल तो दिए। चलो इन्हें देखें, तो इनकी कुछ घटना बताई। लेकिन मुझे देख रहे थे, ऐसा तो हो नहीं सकता। क्यों जरूरत है दो बजे जागने की। तो पहले आप सामान हॉल में रख के आए, फिर इन्होंने कहा सामान लेकर इधर आओ।
मैं पूरी तरह से तैयार हूं। हर तरीके से सक्षम होकर, पूरी तरीके से धन से, तन से और ज्ञान से सक्षम होकर मैंने यह कार्य की शुरुआत की। अब आप ही लोगों के ऊपर है। हम तो खुल के कहते हैं, अगर कोई भी कमी हो तो मुझे बताइए। बस आप अपना आत्मिक कल्याण कर लो। मैं हर कमी को हटा दूंगा। लेकिन तैयार आप रहो। आप नहीं हटा पाएंगे तो मैं तो पीछे हूं, मैं हटा दूंगा। लेकिन तैयार तुम रहो, उठाने के लिए। तुम तैयारी कर दो कि नहीं, मैं हटना चाहता हूं, तो मैं हटा दूंगा। क्योंकि तुम्हारी क्षमता होती तो हट ही जाते। बस तुम तैयारी कर लो कि नहीं, बस अब पूरी तरह हटना है।
जीवात्मा की क्षमता होती, तब तो हट ही जाता। बस तुम तैयार हो जाओ कि नहीं, बस अब हटना है, और हटने के बाद मैं फिर इधर आऊंगा नहीं। कहीं ऐसा न हो कि हटाने लगे और पता चला कि नहीं, अभी कुछ बाकी है। आप बस तैयार हो जाओ, और बाकी काम तो मेरा है। तैयारी में कोई कमी न रहे। मैं पूरी तरह तैयार हूं। बस तैयारी आपकी हो जाए, हम निकाल देंगे। आप निकलने की तैयारी कर लो। पूरी तरह लग जाओ। लगना तुम्हें है।
देखो, कोई व्यक्ति गिर जाता है तो लोग उसे अस्पताल तक पहुंचा देते हैं, उसे घर तक पहुंचा देते हैं। लेकिन कोई गिरने का नाटक करे तो कोई नहीं पहुंचाएगा। अगर तुम सच में गिर गए, और तुम असहाय हो, जा नहीं सकते, तो वह तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुंचाएगा। उसे पहुंचाना ही पड़ेगा। अगर वह नहीं पहुंचाएगा तो वह गिर जाएगा। उसकी ताकत नहीं होगी तो उसे दोष नहीं लगेगा। लेकिन अगर ताकतवर व्यक्ति है, और उसके सामने कोई तड़प रहा है, और वह नहीं उठा के उसके घर तक पहुंचा रहा है, तो जिम्मेदार फिर वह होगा। उसे भोगना पड़ेगा।
तो एक सक्षम व्यक्ति अगर है, और सच में आप निकलना चाह रहे हो, तो वह निकाल देगा आपको। लेकिन बात वही है कि सच में गए हो। अब तुम्हें निकलना नहीं है, निकलने का नाटक कर रहे हो, तो फिर नहीं निकालेगा। आपके सामने कोई नाटक कर के गिर जाए, और आपको पता चल जाए कि यह तो नाटक है, चल सकता है, लेकिन कहे मुझे पहुंचाओ, तो आप उसे पहुंचाओगे क्या। लेकिन सच में हाथ पांव टूट जाएं, वह कहे नहीं, जाने दो, आप चिंता मत लो, हम चले जाएंगे। आप खुद डांटोगे, कैसे चला जाएगा। मैं तुम्हें पहुंचाऊंगा। तुम जाने लायक ही नहीं रहे। यह मेरा काम है, क्योंकि मैं ले जाने लायक हूं। लेकिन वह व्यक्ति नाटक करे कि लो मैं गिर गया, जरा उठा के मेरे घर तक ले जाओ, और तुम्हें पता है कि डोल के जा सकता है, तो आप दो चार थप्पड़ और मार दोगे। अगर आप तैयार हो जाओ तो सक्षम व्यक्ति है, वह निकाल देगा आपको। तैयारी आपकी हो जाए, निकलने की।
मूर्ति पूजा, शास्त्र, सब सहायक हैं। वह सब तो आप कर ही लिए हो। यह आखिरी यात्रा में बैठे हो। आपको पता है, जब रामकृष्ण परमहंस को तोतापुरी ज्ञान करवा रहे थे, तो बोले, काली मां का रूप भी छोड़। चीरा लगाया था, अंदर से उन्होंने रूप हटाया। यह आखिरी यात्रा है। माला जप ही लिए, भजन सुन ही लिए, मूर्ति पूजा कर ही लिए। और आपको यह भी पता है कि सहायक हैं, पहुंचाएंगे नहीं। आखिरी में गुरु वह सब छुड़वाएगा। अब आपने जितना किया है, वह मुझे छुड़ाना पड़ेगा, क्योंकि वह धारणा आपने बना ली है, वह नहीं छूटती। वह सहायक भी है। यहां तक पहुंचा दिया। अब मुझे उसे छुड़ाना है।
जिस नाव ने मुझे किनारे पहुंचाया, उस नाव को ही मुझे छोड़ना है। तभी तो मैं आगे जा पाऊंगा। आप यहां तक आए हो, वही सहायक हुई है, और वही अब आपको छुड़ाना है। सहायक भी वही हुई है। अब वही आपसे मुझे छुड़ाना पड़ेगा। आपकी धारणाएं तोड़नी पड़ेंगी। आप कर ही लिए हो। बिना छूटे ज्ञान नहीं होगा। रूप, शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श। दृष्टा, दृश्य, दर्शन। जब तक आप रूप से मुक्त नहीं होगे, तब तक उपलब्धि नहीं होगी। मानसिक बंधन है। अब यह आखिरी जगह बैठे हो आप, जहां अब मुझे सब छुड़ाना पड़े। सिर्फ तुम, और तुम ही में सब कुछ है। जितना करके आए हो, वही सहायक भी हुआ है। अब वही मुझे आपसे मानसिक छुड़ाना है।
यह पीएचडी लेवल का स्थान है। आप आखिरी जगह आए हो। और जितना आप करके आए हो, वही सहायक हुआ है, और वही आपसे मुझे छुड़ाना भी है। क्योंकि शरीर से छोड़ के आए हो, लेकिन मानसिक नहीं छूटा है। अब मानसिक छुड़ाने का काम मेरा है। आप डटे रहो। जो हमारा सहायक बना है, वही मुझे छोड़ना भी पड़ेगा। जो कक्षा एक को अगली कक्षा तक पहुंचाने के लिए सहायक बनी, उस कक्षा को छोड़ना पड़ेगा। जो किताबें उस कक्षा तक पहुंचाने में सहायक हुईं, वही किताबें मुझे छोड़नी पड़ेंगी। यह एक चरण है, एक स्टेप है, एक सहायक है। यह जितना आप करके आए हो, मूर्ति पूजा, माला, यह सब सहायक हुआ यहां तक आने में। अब इसकी जरूरत नहीं है, क्योंकि अब आपको मैं में होना है। उस मैं को मैं से मिलन करवाना है। तो एक मैं को खत्म करना पड़ेगा। वह जड़ रूपी जो मैं है।
जो नाव मुझे पहुंचाने में सहायक हुई, ऐसा नहीं कि मैं उस नाव से उतरा और उसे डुबो दूं। उस नाव को रहने दो। और लोगों के लिए सहायक बनेगी।
एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब सध जाए। एक कौन। आपसे अलग है, तो एक कहां हुआ, दो हो गए। एक ही को साधो। एक को साधना है, अपने आप को समझना है। साधना किसकी है। एक की। क्योंकि हमारे अलावा कोई, अगर हम कह रहे हैं ब्रह्म भी है, तो दो हो गया। एक ही को साधना। साधना क्या है। अपने आप को सुधारना। सुधार कर इंतजार करना।
अब मैं क्या करूं। मतलब अब बस हो गया, आपने कर दिया। अगर आपके पास करने के लिए कुछ नहीं बचा, तो बस रुक जाओ। बात खत्म हो गई। अगर मैं यहां आकर खड़ा हो गया, अब मैं क्या करूं, इसका मतलब न तो आपके पास कुछ करने के लिए है, न करने की क्षमता है। और अगर कुछ करने के लिए है तो क्षमता नहीं है। तभी तो हो रहा है, मैं क्या करूं। क्योंकि अगर करने की क्षमता नहीं है मेरी, और क्षमता है तो कुछ करने के लिए नहीं है, मतलब हर तरीके से मैं खत्म हो गया। तो बस अब क्या करो। इंतजार करो। अब तुम कुछ मत करो। और इंतजार नहीं हो रहा है, अब क्या करूं, इसका मतलब अभी भी कुछ करना बाकी है। जबरदस्ती क्या करूं पर आ गए। क्या करूं उठ गया, तो बात ही खत्म हो गई, तो प्रयास भी खत्म हो जाएगा। और अगर मैं अब क्या करूं, यह प्रयास कर रहा हूं, इसका मतलब अभी कुछ करना बाकी है।
एक ही साधे सब सधे। एक को साधो। एक कौन। तुम। क्योंकि तुम्हारे अलावा किसी को साध रहे हो, तो फिर तुमसे अलग हुआ, दो हो गए। अपने आप को सुधारना ही साधना है। अब क्या करूं आ गया, तो बस अब कुछ नहीं। अब रुक जाओ। रुक जाना भी होगा।
भाई, इस शरीर का सदुपयोग हो, जहां जरूरतमंद है। आज जिस जगह की शरणागति ली हुई है, वहां सब ठीक होकर जा रहे हैं। किससे ठीक हो रहा है। क्या शरीर से। क्या शरीर की व्याधि दोबारा नहीं आएगी। क्या वह ठीक होकर जा रहा है। हां, होकर जा रहा है। वह तो अस्पताल में भी होकर जा रहा है, शरीर। कुछ केस ऐसे हैं जो अस्पताल से ठीक नहीं हुए। मैं कह रहा हूं, ठीक होने से क्या उसका जन्म मरण से, दुखों से मुक्त हो गया। नहीं। अभी नहीं। तो उस योग्य भी तो नहीं है। मैं वही कह रहा हूं कि आप इसमें मत लगो। शरीर को ठीक कर दिया तो क्या ठीक कर दिया। क्या फिर नहीं होगा। बिल्कुल होगा।
शरीर कभी भी देखो। जब लक्ष्मण को बाण लगा, तो हनुमान जी, जिन्हें शंकर का अवतार माना जाता है, पहाड़ उठा के लाए। क्या उन्हें संजीवनी बूटी की पहचान नहीं थी। बोले, हमें नहीं पता, क्योंकि यह काम वैद्य का है। तो इलाज को कभी भी तंत्र मंत्र से नहीं कराना चाहिए। शाबर मंत्र वगैरह का प्रयोग करके, क्योंकि आपको पता है, उसका बहुत ही दोष लगता है। तंत्र मंत्र से अगर आप किसी शक्ति के द्वारा करवाते हो। महाकाली ने कहा कि मैं इस कैंसर को ठीक कर सकती हूं। ठीक करने की क्षमता मेरी है। लेकिन इसे फिर भोगना पड़ेगा। आप जिस शरीर को धाम के द्वारा ठीक कर रहे हो, धाम वाले भी गिर रहे हैं, तुम भी गिर रहे हो, क्योंकि तुम भी सहयोग कर रहे हो। अलग तरीके से किया जा रहा है, प्राकृतिक तरीके से नहीं किया जा रहा। तो धाम के लोग भी गिर रहे हैं। वह गुरु भी गिर रहा है। वह भी गिर रहा है।
लक्ष्मण को बाण लगा तो क्या राम की सामर्थ्य नहीं थी। हनुमान की सामर्थ्य नहीं थी। स्वयं लक्ष्मण की सामर्थ्य नहीं थी। लेकिन वैद्य को बुलाया गया, संजीवनी बूटी दी गई, प्राकृतिक तरीके से इलाज कराया गया। तो वही तो संदेश दे के गए, कि आप लोग ये शाबर मंत्र वगैरह का प्रयोग मत करना, नहीं तो आपको बहुत पीड़ा झेलनी पड़ेगी। जैसे आज हम कोई बुरा काम करते हैं, बुरा काम करके किसी को बचा लेते हैं। लेकिन जब पकड़े जाएंगे तो बचाने वाले की भी नौकरी जाएगी, और उसको भी सजा डबल हो जाएगी।
अपने आप हो रहा है, अपने आप आया, इसमें दोष नहीं है। लेकिन हम जाकर किसी से करवा रहे हैं तो दोनों को दोष लगता है। जिनकी शरणागति ली है, जिनका धाम है, वहां कोई नहीं करता, मोर पंख वगैरह कुछ नहीं करता। अगर अपने आप हो रहा है तो कोई बात नहीं। अपने आप हो, लेकिन मैं उसमें लगा हूं, तो मैं गिर जाऊंगा। अगर अपने आप हो रहा है, लेकिन मैं करता नहीं हूं, तो मैं नहीं गिरूंगा। लेकिन अगर कोई करता है कि नहीं, मैं कर रहा हूं, तो गिरेगा। स्वयं प्रकृति से, अपने आप हो रहा होगा। अपने आप हो रहा है तो कोई बात नहीं। लेकिन अगर मैं कर रहा हूं, किसी मंत्र द्वारा, किसी तंत्र द्वारा, किसी विधि द्वारा, तो दोष है। बस एक ही इलाज है। प्राकृतिक इलाज कराओ, दवा के द्वारा। और अगर प्रार्थना से हो रहा है तो वह जाने, जिसकी प्रार्थना हो रही है। वहां बीच में कोई माध्यम नहीं है। तो बस खत्म बात।
पुजारी इतना कहता है कि कर्ता धर्ता सामने हैं, अपनी जो भी विनती है वहां अर्जी रखो। लेकिन पुजारी को पता नहीं क्या विनती रख रहे हो। मैं एक ही बात कहूं। एक ही काम करो। बस यहां से निकल लो। इसी के लिए, खुद के लिए काम करो। और अगर किसी का सहयोग करना है तो इसी के लिए करो। यह शरीर का काम है। शरीर के लिए बड़ा अस्पताल है। बहुत लोग हैं। इसमें जीवन मत लगाओ।
दाढ़ी बढ़ गई, लोग इज्जत देने लगे। मैंने कहा, यह मान सम्मान तो दाढ़ी को मिल रहा है। उसी दिन दाढ़ी कटवाई। मैंने कहा, यह नहीं चाहिए। मुझे सत्य तक जाना है। सत्य है क्या। मैं कौन हूं। और मेरा उद्देश्य क्या है, जीवन का। तो शरीर के चक्कर में रहोगे, चाहे अपने, चाहे किसी और के, तो सत्य तक नहीं पहुंचोगे। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे है सत्य। और सत्य के बाद फिर वह है। भय, अभिमान पहले नष्ट होगा। तो इन सब के चक्कर से निकलो, और अपने चक्कर में पड़ो, कि मैं इस चक्कर से फिर मुक्त हो जाऊंगा।
आज आप भी शरीर के द्वारा दीपक बन के, स्वयं ही साधक को प्रज्वलित कर रहे हो। सदुपयोग ही करवा रहे हो। यह करो। सत्य। सबसे पहले आपने अपना उद्धार करा, स्वयं का। आप अपना उद्धार करोगे, तभी तो किसी और का कर सकते हो। अगर आप अपना उद्धार नहीं कर पाओगे, उद्धार करने का तरीका ही जब मालूम नहीं है, तो आप दूसरों का उद्धार कैसे करोगे। नहीं कर पाओगे। कोई शिक्षक पढ़कर शिक्षक हुआ, तब पढ़ा पाया। अगर शिक्षक नहीं बनता, और उसके अंदर पढ़ाने की जिज्ञासा जाग गई, और शिक्षक नहीं बन पाता, तो नहीं पढ़ा पाता।
अगर किसी का उद्धार करना है तो सर्वप्रथम पहले अपना करना पड़ेगा। तभी तो किसी और का कर पाएगा। अब अनपढ़ आदमी किसी को पढ़ाना भी चाहे तो पढ़ा पाएगा क्या। कहे, मैं भाव से पढ़ाना चाहता हूं। पढ़ा पाएगा क्या। अगर अनपढ़ आदमी सोच रहा है कि इस समाज से अनपढ़पन दूर हो जाए, तो उसे खुद शिक्षित होना पड़ेगा। तब वह जाकर कईयों को अनपढ़ से पढ़ा लिखा बना सकता है। लेकिन एक अनपढ़ आदमी सोचे कि नहीं, मेरा तो भाव है कि मैं पूरे संसार को पढ़ा लिखा कर दूं। हो पाएगा क्या। संभव नहीं है। तो उद्धार की इच्छा जगी, तो पहले देखा कि अपना उद्धार करना पड़ेगा। क्योंकि मैं जब अपने सारे बंधनों को काट दूंगा, तब मुझे छुड़ाना आएगा। तब मैं आपके बंधनों से आपको छुड़ा सकता हूं। एक तैरने वाला ही तैरना सिखा सकता है। बिना तैरने वाला तो डुबा देगा। एक सीखा हुआ व्यक्ति ही सिखाता है। अगर वह नहीं सीखा है तो आपको सिखा सकता है क्या। और भी गड़बड़ कर देगा। कहने का मतलब यह है कि उद्धार अगर किसी का करना है, तो आपको सर्वप्रथम पहले अपना खुद का उद्धार करना होगा। तब आप जाकर किसी का उद्धार कर सकते हो। तब वह क्षमता आप में आएगी।
भाव भी आपकी स्थिति पर निर्भर करता है। आपकी जैसी समझ है, वैसा ही भाव बनेगा। समझ के ऊपर ही भाव है। अगर आपकी समझ नहीं है वहां की, तो वहां का भाव नहीं बना पाओगे। जिसकी आपको समझ नहीं है, वहां का भाव बनाना हो तो बना पाओगे क्या। नहीं। तो जब गुणातीत को धारण करते हो, तो भाव अपने आप आ ही जाता है। भाव को धारण नहीं करना पड़ता। समझ को धारण करना पड़ता है। और जैसी आपने समझ धारण की, वैसा भाव आपके अंदर आ जाएगा।
सात्विक, तामसी, राजसी। तमोगुण, सतोगुण, रजोगुण। जिस गुण को धारण करते हो, वैसा भाव बनने लगेगा। तो आपको गुण को अपनाना है, न कि भाव को। भाव तो निर्भर है आपकी समझ पर। उसी के आधार पर। गुण आपने कोई और धारण किया, भाव कोई और बनाया, तो भाव नहीं टिकेगा। वह तो नाटक वाला रहेगा। तो जिस गुण को आपने धारण किया है, वैसा भाव बनता जाएगा। और एक दिन भाव से भी आप मुक्त हो जाओगे।
एक समय ऐसा आएगा कि आप भाव से भी मुक्त हो जाओगे। उस वक्त आप अपने आप में स्थिर हो पाओगे। भाव किसको बोलोगे। वही भावनाएं। जब तक चाहिए, तब तक भाव है। भाव शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श में घूमता रहता है। जब तक आपको चाहिए, तभी तक भाव है। चाहिए खत्म, भाव भी खत्म। सिर्फ तुम हो।
ऐसी स्थिति बनती है साधक की, हर व्यक्ति की। लेकिन लोग बोलते हैं, बोर हो रहा हूं, घुटन होने लगी, क्योंकि अब किसी भाव में जा नहीं पा रहे हैं। तो वे जाकर, जो समझते हैं, जो देखते हैं, जो सुनते हैं, उस भाव में अपने आप को रख लेते हैं, शिफ्ट कर लेते हैं। ऐसा कभी नहीं करना कि आप किसी भाव में नहीं जा पा रहे हो, तो क्या करूं, उस समय अपने में टिकना चाहिए। जब आपको लगे कि आप किसी भाव में नहीं टिक रहे हो, तो उस समय कहीं अपने आप को लगाना नहीं चाहिए। कमजोर व्यक्ति क्या करता है। एक नए भाव में लगा देता है। उस समय मौका है अपने में स्थिर होने का।
जब किसी भाव में आप टिक नहीं रहे हो, तो कई बार ऐसा होता है कि न भजन सुनने का मन करे, कुछ नहीं। कुछ भी नहीं करेगा। तो उस समय कुछ करो भी मत। नया मत करो। क्योंकि पुराना जितना आपने किया है, अब उसमें टिकने का मन नहीं हो रहा है। टिकने की इच्छा नहीं हो रही है। तो अब कुछ नया धारण मत करो। रुक जाओ। तब लगता है कि मन कहीं भी नहीं लग रहा, तो बैठ जाओ। अब आप वहीं रुक जाओ। लेकिन गलती क्या होती है। नया धारण कर लेता है। जाकर कुछ नया करने लगता है। फिर उसमें लिप्त हो जाता है। उससे रस लेता है।
जब ऐसी स्थिति हो, विचलित की स्थिति, कि नहीं, अब जितना मैंने ग्रहण किया है, कहीं मन नहीं लग रहा है, कहीं मैं अपने आप को नहीं लगा पा रहा हूं, तो उस समय कहीं कुछ धारण नहीं करना चाहिए। यह शुभ लक्षण है। कुछ धारण नहीं करना चाहिए। आपके पास जितना भी है, आप उसमें शिफ्ट नहीं हो पा रहे हो, रस नहीं ले पा रहे हो, तो उस समय नई जगह शिफ्ट मत करो। उस समय रुक जाओ। रुके रहो, कितनी भी देर। जब तक नया लो ही मत। नया तो धारण ही मत करो। जाओगे तो वही पुराने में ही जाओगे, और उसमें रस आ ही नहीं रहा। और तब फिर जाओगे, फिर समझने लगोगे। और जब आप नया धारण करते हो, तो नया जब तक अच्छा लगता है। लगता है, इससे पुराने ठीक थे। तो फिर पुराने में शिफ्ट हो जाते हो। तो उस समय क्या करना है। नए में नहीं जाना।
उस समय रुक जाना है। कोई भी नई जानकारी, नई पहचान, नए लोग, कुछ जाना नहीं है अपने आप को लेकर। उस घुटन में, वह चाहे कुछ भी हो, उसी में रहना है। तब आप अपने आप को देख पाओगे। अपने आप को समझ पाओगे। अपने आप को महसूस कर पाओगे। लेकिन ज्यादातर क्या होता है। हम कहीं शिफ्ट कर देते हैं। घर में भी कोई बोलता है कि मन नहीं लग रहा, तो बोलते हैं जा, घूम आ। जा, टीवी देख। तो जब वह घूमने जाता है, वहां घूम के थक जाता है, तो कहता है, इससे अच्छा तो पुराना वाला ठीक था। तो फिर वह पुराने में चला जाता है।
एक समझ होती है। अब मैं कैसे व्यक्त करूं। कैसे वह स्थिति बताऊं। खुशी बताऊं, खुशी व्यक्त करूं। वह कुछ ऐसा है जैसे गूंगा गुड़ का स्वाद कैसे बताए। जैसे कोई पहुंच गया, बस शांत, लंबी सांस, यहां लक्ष्य पहुंच गया, बस आराम से बैठेंगे, पहुंच गए। अब जैसे एक व्यक्ति हो, और उससे पूछ रहे हो। उसके साथ दोनों घटना हुई है, शादी की भी, और उसके साथी की मौत की भी। बोले, मुझे व्यक्त करो। तो क्या व्यक्त करे। एक काम कर, तू शादी कर, और जब साथी मरे, तब वह अनुभूति करना। अब जिसका मरा ही नहीं, जिसने किया ही नहीं, उसे मैं कितना भी बताऊं कि मुझे यह हुआ, यह दुख था और यह सुख था। शादी में तो पहले सुख आता है, बाद में दुख आता है। लेकिन गड़बड़ साथी मिल गया तो पहले दुख आया, और मर गया तो सुख आया। अब आपके साथ अगर वह घटना नहीं घटी, और आप पूछ रहे हो, तो आप न उसके सुख में सम्मिलित हो पाओगे, न उसके दुख में सम्मिलित हो पाओगे, क्योंकि घटना आपके साथ नहीं घटी। तो आपको क्या बताएं। आप उसमें लीन नहीं हो पाओगे।
घायल की गति घायल जाने। मीराबाई ने कहा, घायल की गति घायल जाने। जो गति घायल की है, वह मैं कैसे बताऊं, क्योंकि आप उसमें लीन नहीं हो पाए। अगर मैं किसी भाषा में आपको बता रहा हूं, और भाषा आपको नहीं आती, तो मैं कहानी सुना के क्या मतलब है। कहानी सुनाने का मजा तब है जब उस कहानी में आप लीन हो पाओ। आप लीन तभी हो पाओगे जब आपके साथ घटना घटी हो। घटना नहीं घटी है तो आप बस सुनोगे, और हम पागल की तरह बोलेंगे। हमें भी सुनाने में रस नहीं आएगा, तुम्हें भी नहीं आएगा। तुम ही किसी को सुनाओ और वह समझ नहीं पाए, नहीं आएगा। आपके साथ घटित होगा, तभी आपसे बात करने में मजा आएगा। जैसे अष्टावक्र राजा जनक से खूब बात करते थे, अन्य शिष्यों को भी छोड़ देते थे। तो घटना को तब व्यक्त किया जाए जब तेरे साथ भी हो जाए। तब दोनों मिलके बात कर सकते हैं। फिर तो बात करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, क्योंकि हो ही गया। फिर तो गूंगा और गुड़ दोनों आपस में समझ लेंगे।
एक बार यह प्रसंग आया कि महात्मा बुद्ध और महावीर एक ही समय हुए। बहुत बार ऐसा होता था कि वे एक ही धर्मशाला में होते थे, अलग अलग कमरों में। तो उनके शिष्य बोलते थे कि आप लोग मिलते क्यों नहीं, बात नहीं करते। तो कहें, क्या करेंगे। हमारे पास कोई बात ही नहीं है। हम दोनों बैठेंगे तो निशब्द ही हैं। कोई बात ही नहीं है। यह बात भी तुम्हारे लिए करनी पड़ रही है। टकराव तो तब होगा जब दोनों विपरीत होंगे। दोनों एक जैसे होंगे तो क्या बात करें।
आप लोगों का गणित कुछ और है, लेकिन यह आध्यात्मिक गणित कुछ और है। वहां प्लस और माइनस मिलता है तो कुछ होता है। लेकिन यहां माइनस और माइनस मिलेगा तो कुछ नहीं होगा। प्लस और प्लस मिलेगा तो कुछ नहीं होगा। मतलब एक जैसे मिलेंगे तो क्या बात करें। बात तो तब होती है जब दोनों अलग हों। लेकिन यह गणित फाइनल है। प्राकृतिक गणित यह है कि नर और नर मिलेंगे, मादा और मादा मिल गई, तो कुछ नहीं होगा, तीसरा पैदा नहीं होगा। लेकिन नर और मादा मिलेगा तो पैदा होगा। एक जैसे मिलेंगे तो कुछ नहीं होगा। जब अलग मिलेगा, तभी कुछ पैदा होगा। दो एक जैसे मिले तो क्या पैदा होगा। दोनों एक जैसे हैं तो कुछ पैदा होगा क्या। चाहे अज्ञानी हों, चाहे ज्ञानी हों। दोनों अगर एक जैसे हैं तो कुछ पैदा नहीं होगा।
जैसे नारद और रत्नाकर दोनों विपरीत थे। अगर एक जैसे होते, वह भी डाकू होता और यह भी डाकू होता, तो दोनों ही तलवार लेकर लूटते, एक जगह एक दूसरे को मारते। कुछ पैदा नहीं होता। कुछ नया नहीं होता। कुछ नया तभी होता है, नए का जन्म तभी होता है, जब दोनों अलग अलग हों। यहां तो फिर एक पहुंचा हुआ होना चाहिए, और एक जिज्ञासु होना चाहिए। दोनों पहुंचे हैं तो कोई बात नहीं। और दोनों नहीं पहुंचे हैं तो भी कोई बात नहीं। बात तो तब होगी। नया कुछ घटित तब होगा जब एक पहुंचना चाह रहा होगा, और एक पहुंच गया होगा। एक पहुंचने की जिज्ञासा वाला, और एक पहुंच चुका होगा।
देखो, आत्मज्ञान तभी संभव है जब आप ईमानदारी और सत्कर्म अपनाते हो। और बाकी सब सहायक है। अगर ईमानदारी आपने नहीं अपनाई तो आत्मज्ञान संभव है ही नहीं। ईमानदारी ही आपको सत्य तक ले जाएगी, वह भी सत्कर्म के साथ। क्योंकि पिछला सत्कर्म के द्वारा कटेगा। ईमानदारी अगर अपना ली तो नया बंधन बचेगा नहीं। पिछला समाप्त होगा। आप सत्य तक पहुंच जाओगे।
और बाकी, आप अगर ईमानदारी और सत्कर्म नहीं अपनाए, तो आप कुछ भी करो, आपके पतन का कारण ही बनेगा। चाहे पूजा पाठ हो, तप हो, कुछ भी करो, वह आपके पतन का कारण बनेगा। इसलिए कि आप उसके द्वारा कुछ ऊर्जा ग्रहण करोगे। ऊर्जा जाग्रत होगी, और वह आपके विनाश में लगेगी। तो इस बात को पूरी तरह समझ लो। ईमानदारी के साथ सत्कर्म अपना के अगर कुछ भी कर रहे हो, तो सब सहायक है।
ऊर्जा मतलब, आपके पास आपकी समझ ही ऊर्जा है। आपका धन आपके पास ऊर्जा है। आपके शरीर की ताकत आपके पास ऊर्जा है। जैसे आप शरीर किसी को दिए, शरीर से मेहनत की, तो शाम तक वह मजदूरी देता है। लेकिन शरीर से मेहनत, अब शरीर के साथ समझ भी देते हो। अब शरीर ही दे दो, लेकिन समझ का काम न करो, तो पैसे नहीं देगा। तो आप ऊर्जा दे रहे हो तो ऊर्जा मिल रही है। तो तन, धन और समझ, ये तीन ऊर्जा हैं। तो आप किसी को देते हो तो आपको रिटर्न पैसे के रूप में देता है। अलग अलग, कोई आपको शरीर की जरूरत के रूप में देता है। ये सब ऊर्जा है। पूरे ब्रह्मांड में ऊर्जा ही ऊर्जा है। सब यहां ऊर्जा ही है।
आपका कर्म बताएगा न। आपका कर्म बताएगा कि आपका आत्मिक कल्याण हो रहा है कि नहीं हो रहा है। ईमानदारी और सत्कर्म जीवन में है, तो आपका आत्मिक कल्याण हो रहा है। और अगर ईमानदारी और सत्कर्म जीवन में नहीं है, तो आपका आत्मिक कल्याण नहीं हो रहा है। खत्म बात। नहीं, यह तो मेरा कर्म ही तय करेगा न, कि मेरा क्या हो रहा है।
हो सकता है न। कोई भी हो सकता है। आयु में छोटा हो या बड़ा हो, कोई भी हो सकता है। शरीर को तो देखो ही मत। आप उसके अंदर को देखो। अष्टावक्र को घर में ही ज्ञान था। राजा जनक उनकी आयु में कितने ज्यादा थे। अष्टावक्र ने राजा जनक को ज्ञान दिया। ऐसा कुछ भी नहीं है कि आयु से ज्ञान नापा जाए। शरीर देखकर ज्ञान मत नापो। अंदर को देखो।
हां, काफी समय लग गया। जब हाथ जोड़ जोड़ के थक गया, कुछ नहीं हुआ। लेकिन बहुत कुछ हुआ। इतना समझ में आया कि कुछ नहीं हुआ। वह भी एक समझ है। एक मिलने की आशा थी, और मिलने की आशा टूट गई, तो यह भी तो एक समझ ले आई। तो हाथ जोड़ के ही पता चला। हाथ जोड़ने का मतलब नहीं है। कर्म करने का मतलब है। लेकिन यह हाथ जोड़ के ही पता चला।
आत्मा छोड़ो। यह शरीर ही है। रूप का नाश होगा, तत्व का नहीं होगा। यह फूल है। फूल के रूप को मिटाओगे, तत्व को नहीं मिटा सकते। कोई ऐसा साधन है आपके पास कि आप इसे मिटा सकते हो। नहीं मिटा सकते। रूप को मिटा सकते हो, तत्व को नहीं मिटा सकते। तो आत्मा छोड़ो। यह शरीर ही था, है, और रहेगा। बस भिन्न भिन्न रूप में रहेगा। तुम इस रूप से मिटाओगे, कोई और रूप धारण कर लेगा। तो मिटाया तो कुछ भी नहीं जा सकता।
खत्म तब करोगे जब उसे देख पाओगे कि उसको धारण करने के लिए मैंने क्या किया। मैंने धारण करने के लिए जो किया, तो मैं क्या करूं कि वह अब हट जाए। क्योंकि जिसको मैंने धारण किया, उसे मैं छोड़ भी सकता हूं। मेरी स्वतंत्रता है। अब मैंने उसको धारण किस स्थिति में किया, किस परिस्थिति में किया, वह देखना पड़ेगा। जरूरत में किया। ज्यादा के चक्कर में किया। लोभ के चक्कर में किया। बड़ा बनने के चक्कर में किया। जब यह देख पाओगे, फिर आप छोड़ भी पाओगे।
मेन तो कर्म है। मुझे तो बस अपने आत्मिक कल्याण के लिए, और किसी के आत्मिक कल्याण के लिए अरदास करनी चाहिए। बाकी नहीं। और यह आप गुरु वाणी पढ़ते हो। गुरु नानक जी को हम भी प्रणाम कर रहे हैं। उन्होंने पहली और आखिरी बात यही कही है। सार यह है कि अगर प्रार्थना ही करनी है तो अपने आत्मिक कल्याण के लिए कर लो, या किसी और के आत्मिक कल्याण के लिए कर लो।
गुरुद्वारा किसके नाम से बना है। गुरु के नाम से। गुरु नानक जी के नाम से। उनका कहना क्या था। मेन तो यही है कि अपना कल्याण करो। और इसके लिए तुम सत्कर्म करो। जरूरतमंद की सेवा करो। बस। तभी हम उनकी बात मानेंगे। इन लोगों की बात मानेंगे तो फिर तो हमें हटा दिया जाएगा। वहां से जाओ, और कुछ और करो। जहां रह के अगर मेरी नैया डूब रही है, मुझे अब उस भंवर में अपनी नैया को क्यों रखना। एक रोजी रोटी के लिए मेरे को यह क्यों करना। और कुछ करो।
गुरु नानक जी के जीवन में कितना संघर्ष था। था कि नहीं था। तो हम फिर संघर्ष से क्यों भाग रहे हैं। हम क्यों संघर्ष से भाग कर बेईमानी को पकड़ रहे हैं। गुरु नानक जी ने तो यही कहा, अपने आत्मिक कल्याण के लिए काम करो। उसके लिए ईमानदारी से कर्म करो। परिवार चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा, तो और कोई काम पकड़ लीजिए। घर पर बैठकर वही कर सकते हो जो सीखा है। बस निकालो। प्रार्थना करो कि मुझे पहले तो इस दलदल से निकालो, जहां से मैं डूब रहा हूं। क्योंकि मैं किसके लिए जन्म लिया था, और गुरु द्वारा किसके लिए बनाया गया था, और यहां क्या हो रहा है, क्या करवाया जा रहा है। गुरु नानक जी के मेन उद्देश्य पर काम करिए, जिससे कल्याण हो।
यहां क्यों नहीं आते, कटोरा लेकर। वहां कटोरा लेकर आते हैं, क्योंकि उस कटोरे का किसी ने आश्वासन दे दिया है। चाहे जिस तरीके से। यहां क्यों नहीं आते। किसी ने आश्वासन दिया, तभी आए, कटोरा लेकर। मैं घटना बता रहा हूं। हम कार में बैठे थे, गुजरात में। कार के अंदर बैठे थे। हमारे पीछे दो लोग थे। तो दो बच्चे भीख मांगने आए। उन्होंने बाहर से मुझे देखा। पहले तो ऐसे किया। जब मुझे देखा तो हंसते हुए दोनों चले गए। मतलब उन्हें पता चल गया कि यह क्या भीख देगा, और मैं कार में बैठा हूं। गलती से मांग लिया। इसलिए मैं कपड़े नहीं बदलता। आपके पास कोई अगर मांगने आता है, तो आपने उम्मीद दी है। ऐसे नहीं आता है। यहां क्यों नहीं कोई आता। यहां इतनी भीड़ में एक व्यक्ति ऐसा बैठा है क्या, बताओ। क्यों नहीं बैठा है। क्योंकि यहां कोई आश्वासन नहीं है। अगर कटोरा ले कोई आ रहा है, इसका मतलब आपने उसे पहले आश्वासन दिया।
दुकान आपने खोली, बाद में देखा, दुकान जैसी मैं चाहता था वैसी लग गई है, पहुंच जाओ। पहले आपने खोला। संकेत पहले आपने दिया। संकेत का तरीका अलग था। जैसे लोग कहते हैं कि यह महाराज जी हैं, किसी से मांगते नहीं, मिल गया तो खाए। तो गांव के बगल में क्यों रहते हैं। बीहड़ जंगल में चले जाएं। उन्हें पता है, गांव में कोई न कोई देगा। बाहरी रूप से मांग रहे नहीं, लेकिन आंतरिक रूप से मांग रहे हैं। उन्हें पता है कि गांव में कोई न कोई आकर भोजन पूछ ही लेगा। नहीं तो वे बीहड़ जंगल में क्यों नहीं चले जाते। जब कोई नहीं मांगता, तो चलो बीहड़ जंगल में चलते हैं। उसको देना होगा तो देगा, नहीं देगा तो नहीं। लेकिन बगल में गांव के हैं। कहते हैं, नहीं, यह तो महाराज किसी से खाते पीते नहीं। तब हम ऐसे लोग मिले, मांगते नहीं, किसी से मिला तो खा लिया, नहीं तो ऐसे भजन करते। क्या भजन कर रहा है। यह तो धरती पर बोझ है। किया क्या।
मैं कह रहा हूं, ठाठ से जानवर अगर आपके दरवाजे पर बंधा है, कोई दूध नहीं दे रहा है, उसका गोबर भी काम में नहीं आ रहा है, तो ऐसा जानवर किस काम का। मेरा कहना है कि अगर कोई पड़ा है, आपको लग रहा है त्याग इसने किया, क्या वह तो पृथ्वी पर बोझ है। कम से कम ग्रहण तो कर ही रहा है। तो अलग अलग तरीके से मांगा जाता है। अगर आप कटोरा ले आ रहे हो, तो कटोरा वाले तब आए जब आपने उन्हें आश्वासन दिया। कटोरा वालों के पास इतना समय नहीं है। वे बहुत व्यस्त होते हैं, क्योंकि हर जगह तुम आओ, तुम्हारा कटोरा मैं भरूंगा, यह कहेंगे तुम। नहीं तो वह बुला रहा है मुझे। मैं तो कितनों को छोड़ के आया हूं। मेरा कटोरा भरने के लिए वह भी बुला रहा था, लेकिन मैंने तुम पर भरोसा किया। मतलब वह एहसान भी जताएगा, मैंने तुम पर भरोसा किया।
मेरा यह कहना है कि आप देखिए, पहला व्यक्ति जिसने उसकी स्थापना की, उसने किस उद्देश्य से किया, वह देखिए। अगर वह देख के, अगर आप उसको देखकर वहां रहेंगे, तो आपका कल्याण होगा। आजकल शहरों में भी, गांव में भी, गुरुद्वारे बन रहे हैं, पार्टीबाजी चल रही है। अगर कुछ उसमें अपने आप को नहीं लगता, उनकी नहीं मिलती, तो एक नया स्थान खड़ा कर देते हैं। चलो, पांच सात जने मिलके, तो वह अलग हो जाता है।
मैं आपको बता रहा हूं। गुरु नानक जी के पुत्र श्रीचंद हुए, तो बड़ा अखाड़ा बनाया गया। मैं उदासीन बड़े अखाड़े से संन्यासी हुआ। जहां आपने वीडियो देखा होगा, झगड़ा हुआ था। उदासीन बड़ा अखाड़ा था वह। वहां से मैं संन्यासी हुआ। लेकिन श्रीचंद किस मार्ग पर गए। तंत्र मंत्र पर गए। शाबर मंत्र का उन्होंने किया। वे गुरु नानक जी के मार्ग पर नहीं गए। वे अलग हो गए। तो मैंने देखा कि जिसके लिए मैं आया था, वह तो यहां नहीं है। जिसके लिए मैं यहां आया हूं, वह तो यहां नहीं है। आरती पूजा तक है। रिद्धि सिद्धि तक है। तो मैंने कहा, यह तो मुझे नहीं चाहिए। तो फिर मैं वहां से निकला। निकला, तो देखो, मैंने खड़ा कर दिया। आज इसका बेस मैं खुद हूं। आधार मैं खुद हूं। लेकिन मैंने छोड़ा उसे। तो यह खड़ा करने में मुझे फिर बारह साल भ्रमण करना पड़ा। इसका आधार, बेस, कोई और नहीं है। कोई संप्रदाय नहीं है।
लेकिन मैंने जिसे धारण किया, अपने आत्मिक कल्याण के लिए, मैंने देखा वहां तो और कुछ हो रहा है। मुझे यह नहीं चाहिए। मैं तो आया था आत्मिक कल्याण के लिए। मैं उस परम सत्ता से मिलने आया था। यहां तो रिद्धि सिद्धि है। मुझे नहीं चाहिए। तो मैं वहां से हट गया। तो अगर आप गए हो तो देख लो। वहां अगर गड़बड़ हो रहा है तो आप हटो। उस झुंड को क्यों पकड़ रहे हो। छोड़ना तो पड़ेगा। तो मुझे भी बारह साल ऐसे भ्रमण करना पड़ा। अगर मैं नहीं हटता तो वहां तो बढ़िया था। हमारे गुरु जी बोलते थे, जिसको गुरु बोले, बढ़िया कपड़ा पहन ले, खाता भी पड़ा रह। और मैं आपको बताऊं, उस आश्रम में ऐसा है कि आप बाहर, गेट के बाहर भी निकलने की जरूरत नहीं है। सारी सुविधा उपलब्ध है। कभी गेट तक भी आने की आवश्यकता नहीं है। आप वहीं जाओ, और आखिरी में शरीर निकलेगा आपका। लेकिन है क्या। रिद्धि सिद्धि। वहां सारी व्यवस्था है। जंगल जैसा है। खाना, पीना, रहना, तेल, साबुन, सब। निकलोगे क्या। निकलने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन मैं निकला। क्यों निकला। क्योंकि मैं उसके लिए गया ही नहीं था। और मैं भी उसके लिए गया होता तो मैं वहीं पड़ा रहता।
मुझे यह देखना है कि मैं चाहे गुरुद्वारे में हूं। गुरुद्वारे में अगर आप हो तो देखिए, गुरु नानक जी के बताए हुए मार्ग पर वह चलाया जा रहा है क्या। उस स्थान को तो आप रहो, नहीं तो छोड़ दो। आप कोई स्थान का निर्माण करो। लेकिन जिसने उसकी स्थापना की है, हमें तो उसके बताए हुए अनुसार चलना है। तो आप देखो कि वह कर रहे हो कि नहीं। उनकी वाणी किसके लिए बोली जाती है। अपने आत्मिक कल्याण के लिए। या तो मेरे सामने वाला बैठा आत्मिक कल्याण के लिए सुन रहा है, तो नहीं। भौतिक कल्याण के लिए तो नहीं। और अगर मैं गुरुद्वारे में भौतिक कल्याण के लिए प्रार्थना कर रहा हूं, फिर मेरा क्या होगा। कोई रोजी रोटी कमाने के लिए, भाई किसी का बढ़ जाए, किसी की लड़की की शादी हो जाए, किसी का बिजनेस, व्यापार बहुत अच्छा चले। वाणी पढ़ के स्वर्ग दिला देंगे। मरे तो होता ही है। उसको तो पहुंचा देते हैं ऊपर, परमात्मा के पास। लेकिन ऐसा संभव नहीं है। तो फिर हम कौन से खेल कर रहे हैं। तब तो कहना पड़ता है, हमें इसको आवागमन के चक्र से मुक्त किया जाए। अब बताओ। कितनी बड़ी बेईमानी है। आपको लग रहा है वह आवागमन के चक्र से मुक्त हो गया। नहीं होगा। वह तो हमें भी मालूम पड़ता है।
फिर मेरा क्या होगा। जिस दिन मैं खड़ा रहूंगा, और मेरा हिसाब किताब जब होगा, तो फिर क्या होगा। मैं अपने कर्म से कहां जाऊंगा। यह सब गलत हुआ है। आप खुद निर्णय लीजिए। क्या आप जिसकी विधि कर रहे हो, कि इसको मैं आवागमन से मुक्त करने के लिए यह विधि कर रहा हूं, तो क्या वह आवागमन से मुक्त हो गया। फिर क्या होगा आपका। मजबूरी में कहना पड़ता है। लेकिन यह बात उसे पता है क्या, करवाने वाले को। करवाने वाले को भी पता ही होता है, लगभग। फॉर्मेलिटी पूरी करनी है। उसे भी मालूम है कि नहीं मुक्त होंगे। तो आप उससे बोलिए कि भाई देखो, अगर कोई ऐसा आए तो बोल दो कि देखो, यह हम विधि कर दे रहे हैं, आवागमन से मुक्त होगा नहीं होगा, मुझे नहीं पता। यह तो कह देते हैं। जब हम कीर्तन में करते हैं, तो उनको सुनाते भी हैं कुछ कहानियां, तो उसमें भी कह देते हैं कि ऐसे जो आपने कर्म किए हैं, उसका कर्म का फल आपको भोगना ही पड़ेगा। तो विधि का क्या मतलब। यह भी सब सुना देते हैं। फिर विधि का क्या मतलब। विधि का तो वैसे यही है कि वह क्रिया कर्म जो है, संसार जब उसके कर्म से ही मिलेगा, तो उसके लिए फिर किया क्यों जा रहा है। वह तो लोकचाल है। बस इसको खत्म करना चाहिए। करना चाहिए, क्योंकि हमारी ऊर्जा और कहीं लगेगी।
लोगों को यह भ्रम है कि इसका यह नहीं किया तो यह मुक्त नहीं होगा, या हमारे ऊपर ही आ जाएगा। लेकिन भ्रम को डालने वाला मैं तो हूं। भ्रम को बढ़ावा कौन दे रहा है। सभी लोग, अगर करने वाले ही खत्म हो जाएं, तो करवाने वाले तो अपने आप खत्म हो जाएंगे। जब मुझे लग रहा है कि यह करने से कुछ नहीं होगा, तो मुझे तो करना ही नहीं चाहिए। मैं वह विधि क्यों कर रहा हूं। मैं किसी के अंधविश्वास को बढ़ावा क्यों दे रहा हूं। कोई और कुछ करो। अब तो चिंतन में यही होगा। मेरी नौकरी पकड़ के चिंतन भी यही होगा कि अब करूंगा क्या। करेंगे क्या, क्योंकि यह पेट है। मेरे पेट के पीछे और पेट हैं। अगर यही पेट होता, तब तो यही रुक जाते। तो प्रार्थना करो कि मैं इससे निकलना चाहता हूं। कोई न कोई मार्ग मिलेगा निकलने के लिए।
जहां तक मैंने समझा, जला देते हैं, वह भी ठीक करते हैं। शरीर का क्या करेंगे। ऐसे कहीं रखेंगे तो सड़ जाएगा। तेरहवीं भी कराते हैं, पूरी और वड़ी खिलाते हैं, वह भी अच्छा है। कम से कम लोगों को खिला तो रहे हैं, क्योंकि खिलाने से मानवता जगेगी। यहां तक ठीक है। लेकिन यह कि आवागमन से मैं मुक्त कर रहा हूं, ऐसा हो ही नहीं सकता। मैं खिलाने तक सही समझता हूं। जब से वीडियो सुनने लगे, तब से समझ आने लगी कि यह गलत कर रहे हैं। पहले तो यह हमारा पेशा ही था। पहले तो ऐसे ही करते थे। दिमाग में चिंतन भी नहीं था इस बात का कि यह गलत हो रहा है, कि हम आवागमन से मुक्त करवा रहे हैं। पहले ध्यान ही नहीं था इसी तरफ। यहां तक ठीक है, खिलाने पिलाने तक। लेकिन हम उस जीवात्मा को मुक्त कर रहे हैं। उसके नाम से खिला पिला दो। उसे कुछ मिले या न मिले, लेकिन आपके अंदर मानवता जगेगी। कुछ लोगों से मिलोगे, नई नई बातें होंगी, नए नए लोग मिलेंगे। यहां तक ठीक है। लेकिन यह विधि कि मैं उसे आवागमन से मुक्त करता हूं, वह फंसा हुआ है, मैं इस विधि से, और मुझे पता भी है ऐसा होगा ही नहीं। यह भी पता है। दोनों बात का पता है। ऐसा होगा भी नहीं। कर्म उसका जहां ले जाना होगा, ले जाएगा। और मैं कहानी में भी यही सुना रहा हूं। और फिर मैं विधि भी कर रहा हूं कि मैं आवागमन से मुक्त भी कर रहा हूं। मतलब क्या। कितना खिलाड़ी हूं मैं। इसलिए तो मैं कहता हूं, सब खेल खेले। और मैं फिर वह गुरु नानक जी के नाम से कर रहा हूं। गुरुद्वारे में कर रहा हूं। अब वह मुझे क्या बता के गए, और मैं उनके नाम से क्या कर रहा हूं।
जितने भी महान लोग हुए, उन्होंने तो यही कहा। दया, करुणा, प्रेम, सेवा, समभाव, समदृष्टि। यही कहा। और जरूरतमंद की सेवा, और ईमानदारी। बस यही कहा। अगर यह नहीं पकड़े, तो फिर आप उनकी मूर्ति ले के क्या करोगे। कोई मतलब नहीं। परिणाम तो करने से आएगा। मूर्ति से परिणाम नहीं आएगा। परिणाम तो करने से आएगा। आपने क्या पढ़ा, उससे परिणाम नहीं आएगा। आपने पेपर में क्या लिखा, उससे परिणाम आएगा। आप किसकी मूर्ति ले बैठे हो, उससे परिणाम नहीं आएगा। आप कर क्या रहे हो, उससे परिणाम आएगा। आप कौन सी किताब ले बैठे हो, उससे परिणाम नहीं आएगा। आप पेपर में लिख क्या रहे हो, उससे परिणाम आएगा।
जब से मिले हैं, तब से गुरु पद को जाना है, कि गुरु पद क्या है। जो ग्रंथों में हमने पढ़ा है, जैसे किसी ने लिख दिया कि ऐसे गुरु नानक देव जी गए थे, ऐसे यह हुआ, वह हुआ, तो उन्होंने ऐसे कर दिया। वह सब बातें, उनका खंडन हो रहा है। नहीं, वे अगर गुरु पद पर थे तो यह सब कुछ कर ही नहीं सकते थे। यह करते ही नहीं। यह भी पक्का है कि वे गुरु पद पर थे। यह भी पूर्ण विश्वास है कि वे पूर्ण गुरु थे। लेकिन लेखकों ने लिख दिया। जैसे लिख दिया, वैसा ही चल रहा है। वैसा ही हम सुना रहे हैं लोगों को। अब उनसे घृणा होने लगी है। यह सब बनी हुई कथाएं हैं। ऐसा उनका आचरण और आचार व्यवहार नहीं था। कुछ भी, मतलब बचपन की भी कथाएं आती हैं। काफी कथाएं उनकी मशहूर हैं, जो बार बार प्रचारक सुनाते हैं, प्रभावित करने के लिए, लोगों को जोड़ने के लिए। जैसे लिखी हैं, वैसे ग्रंथों में लिखी हुई हैं, वैसे पढ़ पढ़ कर सुनाते हैं। लेकिन अब समझ आने लगी कि गुरु पद पर जो स्थित है, उसका ऐसा आचार व्यवहार नहीं होता। वे तो बहुत करुणामय होते हैं। और वे आत्मिक कल्याण के लिए ही मार्ग बताएंगे। जन्म जन्म के दुखों से मुक्त हो जाओ। कर्म का सिद्धांत बताएंगे। गुरु पद को जिसने भी प्राप्त किया, उन्होंने कर्म का सिद्धांत ही तो बताया। कि जैसा करेगा, वैसा परिणाम मिलेगा। उन्होंने बताया कि तू कैसा कर कि तुझे परम सत्ता मिल जाए। वह परम स्थिति प्राप्त हो जाए। वह परम आनंद प्राप्त हो जाए।
तो मुझे बस इतना देखना है कि मैं अगर गुरुद्वारे में हूं, तो क्या गुरुद्वारे वाला काम कर रहा हूं। गुरुद्वारा गुरु नानक जी के नाम से बना है, किसी और के नाम से नहीं। तो मुझे मेन उनको पकड़ना है। फिर उनकी वाणी को पकड़ना है। उन्होंने क्या कहा है, और क्या किया है, और क्या करने के लिए मुझे बोला है। क्या किया है उन्होंने। उन्होंने क्या कहा है, और मेरे लिए क्या कहा है, वह देखो। क्योंकि हो सकता है उन्होंने कुछ किया, और तुम्हारे लिए कुछ और कहा। क्योंकि उन्होंने उस क्षमता से किया, वहां तुम होगे ही नहीं। और यहां रह के अगर तुमने वह प्रयास किया तो तुम्हारा पतन हो जाएगा। तो यह देखना है, उन्होंने क्या किया, क्या कहा, क्या बोला है आपके लिए। तो मुझे गुरु नानक जी को पकड़ना है। मैं जहां हूं, वहां के मेन को पकड़ना है। बीच में लोग क्या करें, उनको नहीं पकड़ना है। अभी भी मौका है। एक दिन तो यह छूट ही जाएगा।
उनके तीन ही उपदेश मेन उन्होंने दिए। किरत करो, नाम जपो, और वंड छको। कहने का मतलब, किरत करो। दुनिया में अगर आए हो तो कुछ न कुछ करो। कुछ न कुछ भी क्या। कुछ न कुछ में भी धर्म की किरत करो। धर्म की किरत करनी है। बेईमानी नहीं करनी है। धर्म की किरत में यह आ गया कि बेईमानी न हो। जो भी तुम्हारी किरत हो, उसमें बेईमानी न हो। तुम्हारी सच्ची सुच्ची किरत हो। उसमें बेईमानी न हो। तो नाम जपना है, परमात्मा का नाम लेना है। और जो भी तुमने प्राप्त किया है, उससे दूसरों का सहयोग करना है। बस यही तीन उन्होंने उपदेश मेन दिए थे। जरूरतमंद की सहायता करनी है, मदद करनी है। पहले तो तुम्हारी किरत में बेईमानी नहीं होनी चाहिए। फिर दूसरे नंबर पर परमात्मा के नाम से जुड़ना है, परमात्मा का नाम लेना है। तीसरे नंबर पर जो भी तुमने कमाया है जिंदगी में, उसका दसवां हिस्सा तो जरूरी है। जितना आपने कमाया है, जरूरत से। जैसे दस हजार आप ले रहे हो, महीने का कमाते हो, धर्म से, बेईमानी के अलावा, बेईमानी जिसमें नहीं है। अगर आपकी औसत दस हजार की है, तो एक हजार एक महीने में आपका वह दूसरों की मदद में जाना चाहिए। इतना करने से आप उस परम सत्ता से मिल जाओगे।
तनख्वाह की बात तो बाद की है। बेईमानी नहीं छूट रही। तो फिर तनख्वाह क्या करें। उन्होंने कहा ईमानदारी। ईमानदारी हम भूल गए। उन्होंने यह नहीं कहा कि नौ हिस्सा लूटना और दसवां हिस्सा दान कर देना, इससे कल्याण होगा। नहीं। पहला स्टेप है ईमानदारी। बेईमानी का त्याग। तब दसवां हिस्सा।
मेरा तो इतना ही कहना है कि अगर आप कुछ कर रहे हो, आप उसके साक्षी रहिए कि मैं जैसा कर रहा हूं, क्या वैसा होगा। अगर नहीं होगा तो मैं फिर कर क्यों रहा हूं। तो बेईमानी हो गई। मैं कम से कम अपने आप को हटा लूं। जैसा जो करेगा, वैसा परिणाम। तो मुझे यह देखना है कि मैं किसी भी महापुरुष को मानता हूं, क्या मैं उसके बताए अनुसार चल रहा हूं। यह देखना। दसवां हिस्सा तो बाद की बात है। पहले तो ईमानदारी। सर्वप्रथम पहले ईमानदारी। ईमानदारी के बाद का कमाया हुआ दसवां हिस्सा। बेईमानी का दसवां हिस्सा नहीं।
कहानी आती है कि गांव का एक प्रधान था, एक गरीब था। दोनों ने भोजन लाया। प्रधान ने पूछा कि आप मेरा भोजन क्यों नहीं ग्रहण कर रहे, इसका ग्रहण कर रहे हैं। मेरे भोजन में क्या कमी है। ठाकुर, भोजन तो इससे भी अच्छा है। इसकी तो रोटी ही सूखी है। फिर कहानी कहती है कि उन्होंने रोटी ली। एक से खून और एक से दूध निकला। तो आपको लग रहा है कि आपके बेईमानी के पैसे को वे स्वीकार करेंगे। दसवां क्या, पूरा भी दे दो तो कोई मतलब नहीं। क्योंकि आपने किसी का खून चूसा है। बेईमानी का मतलब, आपने किसी को पीड़ा दी है। बेईमानी हमेशा किसी व्यक्ति को, किसी जीव को पीड़ा देती है। तो अगर पीड़ा दे के कुछ ला रहे हो, तो आपको लग रहा है कोई महान है तो ग्रहण करेगा।
तो प्रार्थना करिए। किसी भी तरीके से पूरी तरह ईमानदारी अपना लीजिए। अपनी जरूरत में जीना चालू करिए। और कोई भी ऐसा काम लीजिए जिससे आपका आत्मिक कल्याण हो। अगर कोई भी काम लग रहा है बेईमानी है, तो उसे तुरंत त्याग कर दो। कोई न कोई रास्ता मिल ही जाएगा।
जब ऐसी स्थिति बनती है, मुझे अपने आप में रहना है। मैं जहां हूं, किसी के सानिध्य में हूं, तो मुझे कहीं अपने आप को नहीं लगाना है। अगर वह कह रहा है कि यह करो, तो मैंने कर दिया, करके हट गया। मुझे उसमें लिप्त नहीं होना है। मैं करके भी नहीं किया। मैं कहीं अपने आप को रस में नहीं लगा रहा हूं। मैं तो अभी भी उस घुटन में हूं। क्योंकि कोई अगर कह रहा है, यह कर दो, तो सत्कर्म है। मुझे करके, कर दिया, छूट गया, क्योंकि उस रस ले ही नहीं सकता। घुटन चली जाती है। उसमें मुझे लिप्त ही नहीं होना है। मुझे करके, घुटन तो चल ही जाएगी। घुटन भी थोड़ी टिकेगी। लेकिन मुझे कहीं से रस नहीं लेना है।
अगर मेरे से कोई योग्य कहे, जिस सानिध्य में मैं हूं। ऐसा नहीं कि भाई, मेरी स्थिति तो ऐसी है, तो तुम तो गिर जाओगे। तो सत्कर्म ही तुमने छोड़ दिया। मुझे कहीं नहीं लगना है। अगर कोई कह रहा है, वह भी मेरे से योग्य है, वह कह रहा है कि यह कर दो, तो वह तो मैं करके भी नहीं कर रहा हूं। वह तो मेरे द्वारा सत्कर्म हो रहा है। लेकिन मुझे अपनी घुटन को लेकर कहीं खुद नहीं लगाना है। अगर वह सामने वाला कह रहा है कि यह कार्य कर दो, तो वह कार्य कर दिया। बात खत्म। मैं तो वहीं का वही हूं। मैं कार्य करते हुए भी वही हूं। यह कार्य उसका मैं कर रहा हूं, उसके द्वारा कर रहा हूं। मेरे द्वारा कुछ नहीं करना है उस समय। नया रस पान नहीं करना है। नया रस नहीं लेना है।
अगर आप किसी के सानिध्य में रह रहे हो, आप उसे परेशान कर ही नहीं सकते। वहां सिर्फ सुधर सकते हो, या तो भगा देगा। आप उसे कभी परेशान नहीं कर सकते। गलती हो जाए तो ध्यान दो कि आगे से ऐसा न हो। प्रयास तो हो जाता है कि आगे से ऐसा न हो। फिर भी हो ही जाता है। कोई बात नहीं। हो जाता है। उसका काम है बताने का। मेरा काम है, आगे से ऐसा न हो। कोई बात नहीं। घिसते रहो। जब पहुंच जाएगा। करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निशान। कोई बात नहीं। जानबूझ कर मत करो। हो गया तो क्या करूं, मैं भूल ही जाता हूं। तो कोई बात नहीं। आपने कहा तो मैंने किया, और मैंने याद रखा। भूल गया तो मैं क्या करूंगा। कोई बात नहीं। घिसते रहो।
मैं तुझे छोड़ नहीं रहा हूं। तू मत छोड़ना। आने दे। विचारों को छोड़। तू क्या कर रहा है, वह देख। मैं क्या बोल रहा हूं, वह सुन, और उतना कर। विचार आ रहे हैं, आने दे। उन्हें हटा भी मत। आने दे। क्या करने से परिणाम आएगा। विचार आ रहे हैं, आने दे, क्योंकि हमारे पीछे किए गए कर्मों के ही तो विचार हैं। हमें खींचेंगे। मेरा काम यह है कि मेरा उद्धार किस में है। मुझे सिर्फ उतना करना है।
तू ईमानदारी अपना ले। ईमानदारी उनके अंदर है, अपनाने की क्षमता, तभी तो कह रहा हूं। कोई बात नहीं। धारण कर लिया। लेकिन अब तो छोड़ दे। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में धारण हो गया। कोई बात नहीं। अब छोड़ के, ईमानदारी अपना कर, सत्कर्म में लगे रहो। घिसते रहो अपने आपको। क्या कपड़े को एक बार में मैल छूटता है। दो बार में नहीं। फिर एक पाउडर से नहीं छूटता, दूसरा लाते हैं, तीसरा लाते हैं। आला लाते हैं। साबुन से काम नहीं चलता तो आला डालते हैं। लेकिन अब रंग का कपड़ा है तो आला भी नहीं डाल सकते। किसी न किसी तरीके से घिसते रहते हैं।
आंसू भी गिर जाएं तो वे भी बेईमानी के ही लगते हैं, ऐसा लगता है। कोई बात नहीं। वह स्थिति सही है या गलत है। न गलत है, न सही। क्या कर रहा है, उससे परिणाम आएगा। बस वही। क्या विचार आ रहा है, उससे परिणाम नहीं आएगा। मैं क्या कर रहा हूं, उससे परिणाम आएगा। विचारों में मत भागो। विचारों को रोको भी मत। क्योंकि विचार हमारे पिछले कर्मों से आएंगे ही आएंगे। तुम बस क्या कर रहे हो, वह देखो। जैसा करोगे, वैसा बन जाओगे। विचारों के पीछे नहीं जाना है।
जो कुछ हो रहा है, जो कुछ होगा, जो स्थिति के साथ में जो भी हो रहा है, उसको साइड करो। और जो कर रहे हो, उस पर पूरा ध्यान लगाओ। लगे रहो।
कोई बात नहीं। भोग की इच्छा है और अध्यात्म की इच्छा भी है, दोनों एक साथ हैं, तो भोग ईमानदारी से करो। बस। खत्म बात। और क्या, दोनों एक साथ हो सकती हैं क्या। क्या भोग की इच्छा भी हो सकती है, और अध्यात्मिक इच्छा भी हो सकती है। हां, हो सकती है। ईमानदारी ही आपको उससे मिलाएगी। बस ईमानदारी अपनाओ, और सत्कर्म अपनाओ। खत्म बात।
अंतर इसलिए है कि सुख किसी और से है। वह दे रहा है, तो सुख है। वह नहीं देगा, तो वही सुख दुख में बदल जाएगा। लेकिन आत्मा में जो है, वह परम आनंद है। वह परम आनंद आपसे है। वह आपसे है, इसलिए वह कभी जाने वाला ही नहीं है। सुख किसी और के देने पर टिका है। आत्मा का परम आनंद आपसे है, और वह कभी जाने वाला ही नहीं है।
ज्ञान का ज्ञान ही आत्मज्ञान है। तो एक ज्ञान है, बाहर से मिलता है, गुरु के द्वारा, जिसे सतगुरु कहा गया है। सत स्वयं के लिए है। जब वह बोला, तो गुरु आपके लिए। जब उस गुरु के द्वारा आप सत तक पहुंचते हो, तो आपके अंदर से ज्ञान आता है। तो ज्ञान का ज्ञान यही है। एक ज्ञान छूट गया, और दूसरा ज्ञान प्रकट हो गया।
अगर आपको लगता है, तो जोड़ लेना चाहिए। मूर्तियों के आगे सिर झुकाना हो, हाथ जोड़ना हो, तो जोड़ लेना। उसमें कुछ नहीं है। लेकिन आप हाथ जोड़ के मांग क्या रहे हो। प्रार्थना क्या कर रहे हो। वह मायने रखता है। हाथ जोड़ने में कुछ नहीं है। आप मांग क्या रहे हो, प्रार्थना क्या है, वही देखना है, वही मायने रखता है।
नहीं, मुझे यह जानना नहीं चाहिए कि उसे कैसा लगा। जैसे मैंने इसे डांटा, तो उसे बुरा लगे या अच्छा लगे, मुझे क्या फर्क पड़ता है। मुझे पता है, मैंने उसे क्यों डांटा। तो मुझे पता होना चाहिए कि मैं क्या कर रहा हूं, किस लिए कर रहा हूं। गिल्ट नहीं फील होना चाहिए। उसे बुरा लगता है, अच्छा लगता है, वह जाने। उसका काम है, वह जाने। मैं किस भाव से, कौन सा काम, किसके लिए कर रहा हूं, यह मुझे पता है। अगर उसे नहीं पता है, तो जिम्मेदार वह होगा। मैं नहीं।
साधक को ध्यान रखने वाली योग्य बात यह है। जब वह साधना कर रहा है, इसका विशेष ध्यान रखे कि साधक का मतलब है मैं कुछ सीखने जा रहा हूं। और सीखना इसलिए चाहता हूं कि मैं सुधरना चाहता हूं, अपने आप को बदलना चाहता हूं। बदलाव के लिए मैं साधना करने जा रहा हूं। अगर मैं सीखने जा रहा हूं तो मेरे सामने कोई है, और उस व्यक्ति ने कोई नियम बनाए हैं। उस नियम और अनुशासन में जब आप पूरी तरह जिएंगे, तब आप सीख पाएंगे। पहले जाकर वहां के नियम को समझिए।
आपकी गलती क्या है। आज के साधकों की हालत यह है कि पहले वे व्यवस्था को चेक करते हैं। नियम से तो उन्हें कोई मतलब ही नहीं। वे लेट्रिन चेक करेंगे, शौचालय चेक करेंगे, व्यवस्था चेक करेंगे, लेकिन नियम चेक नहीं करेंगे कि मैं कुछ सीखने आया हूं, इस सीखने में क्या-क्या नियम का पालन करना होगा। उनसे यह मतलब नहीं है। उन्हें बस व्यवस्था से मतलब है। व्यवस्था मिल जाए, और उन्हें कोई भी नियम अगर बताओ तो नियम जी नहीं पाते। तो साधना आपकी कैसे होगी? जब आप अनुशासन में ही नहीं जिएंगे, नियम का पालन ही नहीं करेंगे, साधना कैसे होगी आपकी? और जब आप ही उस लायक थे, तो साधना करने जाने की क्या जरूरत थी? उस जगह पर क्यों गए? क्योंकि आपकी वजह से बहुत लोग परेशान हो रहे हैं। अगर आप कहीं जाते हो और वहां के नियम का पालन नहीं करते हो, तो सामने वाला व्यक्ति आपको देखे, अपने आप को देखे, या काम को देखे, क्या करे वह? फिर क्या होता है, उस जगह की व्यवस्था बिगड़ जाती है आपकी वजह से। और फिर आप कहते हो पाखंड हो रहा है। पाखंड के जिम्मेदार आप हो।
क्या आप पाखंड कर रहे हो, यह नहीं दिख रहा है। जब आप नियम तोड़ रहे हो, यह पाखंड नहीं? जब आप नियम तोड़ रहे हो तो आपको यह अपना पाखंड नहीं दिखता। आप कहते हो, कहीं पर जाकर आज लोगों की शिकायत ही है कि पाखंड हो रहा है। अरे, पाखंड जरा अपना देख लो। जब आप कहीं जाकर नियम तोड़ते हो तो आप पाखंड नहीं कर रहे हो? वह पाखंड आपको नहीं दिखता। और आप कह रहे हो मेरा कुछ हो नहीं रहा है। कुछ नहीं होगा। अगर आप इस तरह से जीते रहे तो आपका कुछ होने वाला नहीं है।
पहले आप कहीं जा रहे हो तो वहां का सर्वप्रथम काम है, नियम को पूरी तरह पूछ लेना। यहां मैं रहना चाहता हूं, यहां साधना करना चाहता हूं, मैंने साधक के जीवन का चुनाव किया है, यहां का नियम बताइए। मैं उस नियम में देख लूं। अगर मैं उस नियम को पूरी तरह स्वीकार कर लूं, मेरे लायक रहेगा, तो रहूंगा, नहीं तो मैं निकल जाऊंगा। लेकिन क्या आज तक आपने ऐसा किया? नहीं। जाते ही लेट्रिन कहां है, बाथरूम कहां है, यहां भोजन की क्या व्यवस्था है, गर्म पानी है कि नहीं है, यह जरूर चेक करते हो। आज तक आपने यही चेक किया, और इसीलिए आपको आज तक यही मिला। जिसके लिए गए हो, वह मिलता नहीं। क्यों नहीं मिलता, पता है? इसीलिए, क्योंकि आप उसके लिए गए ही नहीं हो। मूल के लिए नहीं, आप तो गए हो व्यवस्थाओं के लिए। व्यवस्थाओं को देखते हो। हलवा अच्छा था, पूरी अच्छी थी, वहां की मिठाई अच्छी थी, पंचमेवा बढ़िया था, पनीर बढ़िया था, काजू बादाम बढ़िया था। बस यही होता है। वहां की लड्डू अच्छी थी, देसी घी की लड्डू थी। आपके पास जाते हो तो यही सब बातें घर पर करते हो। वहां का भोजन बड़ा बढ़िया था, लड्डू बहुत बढ़िया था, वहां का काढ़ा बहुत बढ़िया था। क्या बताऊं, इतनी दूर से काढ़ा पीने आए। सोचने वाली बात है, आप अटके कहां हो। ईमानदारी से अपने आप को पूछिए। पहला आपका प्रश्न क्या रहता है, वहां व्यवस्था क्या है।
एक आदमी वहां जी रहा है। क्या वह बिना व्यवस्था के जी रहा है? एक व्यक्ति अगर वहां रह रहा है तो बिना व्यवस्था के रह रहा है क्या? फिर भी आप व्यवस्था पूछ रहे हो। तो कहीं भी जाइए, साधक को ध्यान रखना चाहिए। पहले जाके, अगर आपको साधना करनी है, जहां पर रहना है, ईमानदारी से पहले वहां का नियम पूछो। और जब पूरी तरह नियम को स्वीकार करो, तो उस नियम में जियो, नहीं तो वहां की ऊर्जा नहीं मिलेगी आपको। आप ऊर्जा से वंचित रह जाओगे। आप यह मत समझ लो कि सामने वाले व्यक्ति को मैं चोरी से गया, बात कर ली, यह कर लिया, और उसने देखा नहीं। देखने वाला देख रहा है। यही तो आपकी भूल है। आप वही गलती संसार वाली वहां भी कर रहे हो। तुम्हें लगता है देखने वाला यह शरीर है। यही गलती है। देखने वाला यह शरीर नहीं है। यह शरीर बस निमित्त है। देख रहा है जिसे देना है, वह देख रहा है। आप सोच रहे हो वह बेवकूफ है। आप जहां पर खड़े हो, वहां से वह बेवकूफ ही है, कि आप अपने लिए नियम का पालन नहीं कर सकते और वह आपके लिए नियम का पालन कर रहा है। इसी बेवकूफी की वजह से वह उस स्थिति में पहुंच गया, और इसी तुम्हारी चालाकी की वजह से तुम रगड़े जा रहे हो। यह चालाकी रही तो ऐसे ही रगड़े जाओगे। यह ध्यान रखना।
हमारे मुंह से पहली बार यही निकलता है, क्या वहां व्यवस्था है, क्या हम आना चाहते हैं। एक व्यक्ति वहां रह रहा है, जीवित। ऐसा भी नहीं कि उसका पुतला बना है। क्या व्यवस्था वहां है, लेट्रिन है, बाथरूम है। इतने हजार किलोमीटर से लेट्रिन करने मध्य प्रदेश में आ रहे हो। जरा सोचो, वह व्यक्ति रह रहा है, आपको यह सब पूछने की क्या जरूरत है। आप किसके लिए आ रहे हो, ज्ञान के लिए या व्यवस्था के लिए? और एक आदमी अगर जीवित रह रहा है तो आप भी तो इतना तो मिलेगा जितने में आप जीवित रह सको। फिर आपको यह सब पूछने की क्या जरूरत है? आप सोचिए जरा इस बात को। मैं आप लोगों को सचेत कर रहा हूं कि आप समय बर्बाद मत करिए। आप लोगों को पाखंडी कहते हो, आपका पाखंड आपको नहीं दिखता। साफ-साफ करते हो, और आपको दिख ही नहीं रहा कि मैं भी पाखंडी हूं। आप कभी नहीं देख पा रहे हो। मैं यही देख रहा हूं। आजकल के साधक बस व्यवस्था पूछते हैं। सर्वप्रथम लिस्ट निकाल दो, भोजन का और बाथरूम का और बिस्तर का। और इससे आपको निकलना पड़ेगा। अगर आप साधक हो तो आपको इससे निकलना पड़ेगा। साधक कभी व्यवस्था नहीं देखता। साधक ज्ञान देखता है, कि मैं जिस लिए जा रहा हूं मेरा काम होगा कि नहीं। क्योंकि एक व्यक्ति जीवित है तो मैं भी तो रह लूंगा। वह पुतला नहीं है जिसके पास मैं जा रहा हूं, कि पत्थर का, मिट्टी का उसका पुतला बनाया गया है। तब पूछते तो बात अलग थी। जीवंत आदमी आपको बुला रहा है, पुकार रहा है, आओ, और आपके प्रश्नों के उत्तर देंगे। तो आप प्रश्नों के उत्तर के लिए आए हो कि व्यवस्था के लिए? वह भी तो रह रहा है, तो आपको रखेगा, आपको व्यवस्था देगा। लेकिन आप गए हो, वहां पूरा नियम सुनने के बाद भी नियम तोड़ रहे हो, मजाक कर रहे हो। नियम सुन लिए, उसके बाद भी उसे बोलना पड़ रहा है कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो। मतलब आपको मजाक लग रहा है। एक व्यक्ति का जीवन लग जा रहा है और आपको हंसी आ रही है। आप मजाक करने के लिए आए हो। इसे बहुत गहराई से समझिए।
अगर आप अपने परिवार से भी कहोगे, मुझे चौबीस घंटे समय दो, तो मुझे नहीं लगता एक-दो दिन कोई दे पाएगा। ऊब जाएगा तुमसे। आप अपने परिवार में जिसे भी आपको लग रहा है कि बहुत प्यार करता है, आप बोल दो कि बस ज्यादा नहीं, मेरे पास लगातार एक-दो महीने रहो, मुझे छोड़ के मत जाना। रह के देख लो। आप इन सब बातों को समझिए। आप समय बर्बाद मत करिए। मैं आप लोगों को भी बोल रहा हूं, आने वाले लोगों को बोल रहा हूं। अगर आप नियम का पालन नहीं कर सकते, अनुशासन में नहीं जी सकते, और यहां का नियम बता दिया, तो कृपया करके यहां मत आओ। क्योंकि मेरा भाव यह नहीं कि भीड़ हो। मेरा भाव बस इतना है कि आप लोग साधना करके आपका आत्मिक स्तर उठे। पर परिवार बस आपका नहीं है, इस व्यक्ति का भी है। इस बालक के मोबाइल पर मेरे घर से भी फोन आ चुका है, लेकिन आज तक मैंने यहां से बात नहीं की। ऐसा नहीं कि बस आप ही को चाहने वाले दुनिया में हैं। सात महीने के ऊपर हो गया। इसके नंबर उन लोगों को मिल गया, तो लोगों ने इस पर संपर्क किया कि मेरी बात कराओ। तो हमने मना कर दिया। हमने कहा छोड़ो, जाने दो, मेरे लिए काम अभी बहुत जरूरी है। आपको लगता है मेरा ही घर है, मेरे ही लोग हैं, और कोई लावारिस है। आपको यह सब बातें समझना चाहिए।
मैंने यही देखा कि अगर कुछ गड़बड़ी हो रही है, उसकी जिद हम लोग खुद हैं। साधक का जीवन उतनी व्यवस्था में होना चाहिए जितने में वह जी सके। और व्यवस्था तो उसे पूछना ही नहीं चाहिए। वह व्यक्ति रह रहा है, व्यवस्था आपको देगा। अगर वह जी रहा है तो आपको भी जीने का तो देगा, इतना तो देगा ही। मूल पर बातें करो। सात महीने के ऊपर हो गए, कभी मैंने फोन हाथ में भी नहीं लिया। अगर मैंने किसी से बात की है तो काम को लेकर बात की है। अभी तक मेरे घर से फोन आया, लेकिन हमने बात नहीं की, क्योंकि मेरे लिए काम जरूरी है। मैं काम कर रहा हूं। हां, कोई अगर खत्म हो गया तो बात अलग है। आईसीयू में गया तो बात अलग है, तब बात करनी पड़ेगी। और अगर आपको इतनी इमरजेंसी है तो नंबर तो दिया गया है। आपके लिए यह व्यवस्था है। इससे क्या होता है, एक आदमी आपकी रखवाली करे कि अपना काम करे? आप बात करो उधर, वह चुप रहे। आप बात मत करो। सुबह हमने कितनी बार आवाज मारी। एक दिन कह दिया गया कि यहां पर आपस में बात करना मना है। अगर आप नहीं रह सकते तो मत रहो। रोक कौन रहा है? मैं लाइव में इसलिए बोल रहा हूं कि अगर ऐसे लोग हैं तो मत आएं। अगर साधक हो तो आओ। यह साधक के लिए मैं इतना समय दे रहा हूं। यह व्यवस्था साधक के लिए है, और किसी के लिए नहीं है। आप समझिए, यह टाइमपास वालों के लिए एकदम व्यवस्था नहीं है। कृपया ना आएं। समय बर्बाद करने वाले ना आएं। और अगर यहां के नियम का पूरी तरह पालन कर सको, तब आओ, नहीं तो मत आओ। मुझे भीड़ नहीं बढ़ानी है। यह दिखाना नहीं है कि देखो कितने साधक साधना कर रहे हैं। आप इस बात को पूरी तरह समझ लीजिए। आप अगर यहां रहिए तो चाहे एक दिन रहो, लेकिन एक दिन पूरी तरह सधकर रहो, नहीं तो मत रहो। क्यों रह रहे हो? मैं नहीं चाहता कि यहां से जाने के बाद कोई कहे कुछ नहीं हुआ। यहां आए हो तो होना चाहिए। यहां से जाओ तो कुछ सीख के जाओ। आपके जीवन में बदलाव आना चाहिए, नहीं तो कोई मतलब नहीं होगा।
क्या आपके यहां लेट्रिन, बाथरूम नहीं था? क्या आपके यहां भोजन नहीं है? क्या कोई कमी है? आप क्यों समय बर्बाद कर रहे हो? जब आप इतना कीमती समय निकाल रहे हो, तो कह दिया गया मोबाइल बंद, तो बंद, बात खत्म। अब एक आदमी आपकी रखवाली करे, कौन बात कर रहा है, कौन नहीं कर रहा। यही आपने साधक के जीवन का चुनाव किया, आपको नियम बता दिया, देखभाल करे क्या? इसे समझिए। आप लोग बहुत बड़ी गलती कर रहे हो। हमें कितनी बार बोला, व्यावहारिक बातें करना मना है। कोई देखता हूं वहां बात करे। एक आदमी क्या करे, आपके पीछे पड़े? यह कोई बात होती है? आप लोग मजाक कर रहे हो। हमें सात महीने के ऊपर हो गए, और आज तक मैंने कभी अपने घर वालों से बात तक नहीं की। फोन भी आया तो भी नहीं किया। मैं एक व्यक्ति आपको पूरा समय दे रहा हूं और आप मजाक कर रहे हो। कोई नियम बनता है तो ऐसे ही नहीं बनता है। उसके पीछे जीवन लग गया है एक व्यक्ति का। आप उस नियम में रहकर देखो। पहले अगर वह नियम बनाया है, उसके पीछे कुछ रहस्य है। जब आप उसमें जियोगे तब समझ में आएगा। वह व्यक्ति कितना आपके पीछे पड़ेगा? अब हम यही देखें क्या, कौन कहां बैठा है, किससे बात कर रहा है? एक बार आपको समझा दिया गया और आपने स्वीकार कर लिया तो बात खत्म हो गई। कहीं भी जाते हो साधना करने, वहां के नियम को पहले समझ लीजिए। अगर आपको लगता है कि मैं अपना पाऊंगा तो रहो, नहीं तो नर्मदे हर बोलकर चलो अपने घर, कि मुझसे नहीं होगा।
इसका विशेष ध्यान दो। कहीं भी जा रहे हो, पहले तो वहां नियम पूछिए। व्यवस्था बाद में पूछना। व्यवस्था पूछने की जरूरत नहीं है। अगर एक व्यक्ति जीवित रह रहा है तो इतना तो देगा, इतना तो व्यवस्था करेगा। इतनी तो उसमें मानवता है, इतना तो व्यवस्था देगा जिसमें आप जी सको। अगर उसने आपको बुलाया है, बोला है आओ, हम यहां पर हैं, और साधक के लिए भोजन और रहने की निशुल्क व्यवस्था है, तो जरूर वह कुछ समझ के ही बोल रहा है। ऐसे ही नहीं बोल रहा है। तो आपकी व्यवस्था की है। व्यवस्था तो आपको पूछना ही नहीं चाहिए। आप अपने मेहमान के घर मेहमान बनकर गए और बोलोगे क्या-क्या बनाओगे? कोई बात होती है यह? यही संस्कार आपने सीखे। जब से पैदा हुए, मतलब आप किसी मेहमान के यहां गए और पूछ रहे हो कि अच्छा, भोजन में मुझे क्या-क्या बनाओगे। जरा सोचो इस बात को। आपके यहां अगर मेहमान आ जाए, और उन्होंने कहा कि भोजन में क्या-क्या बनाओगे, आपको कैसा लगेगा? बुरा लगेगा। फिर आप सोचिए, तो आप क्या करते हो। और हर जगह के नियम होते हैं। आपके मेहमान आए, सीधा बेडरूम में चला जाए, तो अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए मर्यादा में जीना सीखो। पहले जीना तो सीखो, मर्यादा में। समय बर्बाद मत करिए। मैं आप लोगों को इसलिए बता रहा हूं, लाइव में भी लोगों को बता रहा हूं। दुनिया में कहीं भी साधना करने जाओ, वहां के नियम में जियो, तब आपको कुछ समझ में आएगा। और नहीं जी सकते तो मत जाओ। जरूरत क्या है? कोई जबरदस्ती आपको पकड़ के तो नहीं ले जा रहा है। आप मत जाइए। अगर आप नहीं जी सकते तो मत जाइए।
इससे क्या होता है। एक आदमी की गड़बड़ी से पूरा माहौल खराब हो जाता है। जैसे कहावत है, एक सड़ी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। एक सड़ी निकल जाए तो पूरे तालाब की तरफ बास मारता है। जब तक वह एक नहीं निकलेगी, मतलब जितनी अच्छी है उसका प्रभाव खत्म। एक सड़ी निकल गई, पूरा तालाब बास मारने लगता है, जब तक वह निकले नहीं। एक आदमी अगर इधर-उधर किया, पूरी व्यवस्था को बिगाड़ देगा। पूरा व्यवस्था डगमगा जाता है। दूसरा आदमी देखता है और वह बड़े आसानी से कहता है कि मैं तो जा रहा हूं। लेकिन तुमने कितना व्यवस्था को बिगाड़ दिया, यह आपने नहीं देखा। जाते-जाते आपने क्या छोड़ के जा रहे हो, पहले वह तो देखो। जहां कहीं जाओ तो अपनी छाप छोड़ के जाओ। कहीं जाओ तो अपनी छाप छोड़ के जाओ, कि मैं उस नियम में पूरी तरह जिया। आपको लगना चाहिए कि मैं गया था, इतने दिन साधक बनकर रहा, और मैंने पूरी तरह वहां के नियम का पालन किया। एकदम सीना ठोक के कह सको। और आप कह रहे हो कुछ नहीं हुआ। आप खुद नियम का पालन नहीं किए तो होगा कैसे? जब आपने खुद नियम को तोड़ दिया तो होगा कैसे? अब आप सामने वाले का दोष दोगे, लेकिन आपका दोष नहीं दिख रहा, कि आपने नियम को तोड़ ही दिया। होगा कैसे? उसमें सामने वाला क्या करे? तुमने भोजन के पहले फिटकरी घोल के पी ली और कह रहे हो भोजन में स्वाद नहीं आ रहा है, तो सामने वाला क्या करे? घंटों से भोजन बनाया होता है। फिटकरी का पानी कुल्ला कर लो, फिर भोजन करो, स्वाद ही नहीं मिलता। तो आपकी हालत यह है। अब कह रहे हो तुमने भोजन कैसा बनाया। भोजन बड़ा बढ़िया है, लेकिन तुम फिटकरी का पानी कुल्ला कर रहे हो। गया था, कुछ हुआ नहीं। अरे, आप उस नियम में जियो। उस नियम को जब तुमने तोड़ ही दिया तो होगा क्या?
हम आते ही बता देते हैं। भाई, ध्यान से समझो। यहां बारह के बाद का नाश्ता है, शाम को भोजन है। व्यावहारिक बातें करना नहीं है। मोबाइल चुप है, नंबर यह है, इमरजेंसी के लिए। वह भी कोई आईसीयू में हो, या कोई निकल गया, तब फोन करेंगे। आप जितना दिन चाहो, एक दिन से लेकर आजीवन रह सकते हो। और यहां पर बातचीत ना करना। सत्संग होगा तो सत्संग में बैठना, जब तक सत्संग हो। और अगर कोई वृद्ध है तो उसे दो टाइम भी भोजन दिया जाएगा। अगर कोई बीमार है तो उसको भी दो टाइम, तीन टाइम भोजन दिया जाएगा। यह जब बोल दिया गया, और जब इतना बोल दिया गया, तो अब बोलने के लिए बचा क्या? और आपने कहा हां। लेकिन वह सुबह उठा तो कह रहा है बातचीत मत करो। अब एक ही काम रहे, कि आपकी रखवाली करें। अब इतनी दूर से आकर किसी को अपनी रखवाली में लगा दिए, और वह आपकी रखवाली करे, कौन कहां बात कर रहा है। या तो सीधा बोल दे कि नर्मदे हर, तुरंत बैग लो, निकल लो। या तो यह बोले आपसे कि आपने नियम तोड़ा, आप तुरंत जाओ। या तो क्या करेगा वह? बोलना पड़ेगा उसे सुबह-शाम यही। या वह सीधा एक ही बात कहेगा, भाई साहब, हाथ जोड़ता हूं, बस निकल लो। और मैं इतना जरूर कह देता, लेकिन मुझे मालूम है कुछ न कुछ तुम सीख रहे हो यहां, इसलिए मैं यह कह नहीं पा रहा हूं। लेकिन मुझे कहना पड़ेगा। आने वाले समय में मैं बोल देने वाला हूं कि भाई साहब, बस अब जाइए, हो गया, साधक जाइए, और कहीं साधना करिए। आपके पास कोई कमी नहीं है। आप आराम से घर पर रहकर साधना करो। वही बात करो अपने परिवार से, और वही साधना करो। जब परिवार की इतनी चिंता थी तो साधक की जिंदगी का चुनाव क्यों किया? वहीं रहते, अपने घर पर आराम से, वही कमरे में साधना करते। इस पर कोई संशय हो, कोई प्रश्न हो, तो आप लोग निःसंकोच बोल सकते हो।
जब आपको समझा दिया गया तो क्या यह कर रहे हो? आपकी तो कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। हमारे गुरुदेव हमारे लिए इतना कुछ कर रहे हैं। आपने देखा, किसी से मैं पर्सनल बात किया? आज क्या आपको नहीं लगता, हमारे चाहने वाले भी हजारों में होंगे? हम तो कुछ भी नहीं। ऐसा नहीं है। लेकिन जब कुछ करना है तो त्याग करके बैठना पड़ता है। ऐसे ही नहीं होता। क्या हमारे मिलने-जुलने वाले जिंदगी में नहीं होंगे? हजारों होंगे। लेकिन मुझे काम करना है। मेरे लिए सबसे प्रिय काम यह है। इसलिए मैं आप लोगों को भी बोल देता हूं, अब मुझे बोलना न पड़े। और लाइव में आने वालों के लिए बोलता हूं। अगर आप इतना नियम का पालन कर सकते हो, तब आकर यहां पर साधना करो। और नहीं तो फिर आने की जरूरत नहीं है। कोई मतलब नहीं। आकर टाइमपास, आपका भी समय बर्बाद होगा, मेरा भी समय बर्बाद होगा, क्योंकि मुझे भी समय देना पड़ता है। नहीं तो मैं अपने आप में पढ़ा रहूंगा। आप लोग तो बैठते हो, हम तो दिन भर बोलते रहते हैं। क्या हमारा शरीर नहीं थकता होगा? आपका सुनने में थक जाता है। एक व्यक्ति सुबह से लेकर रात तक बोल रहा है, किसके लिए? आपके लिए बोल रहा है। क्यों? क्योंकि आप में बदलाव आ जाए। और कोई बात है क्या? तो समझना चाहिए। मैं इसलिए बोल रहा हूं कि आने वाले साधक भी सचेत हो जाएं, आप लोग भी सचेत हो जाइए। और नहीं तो मुझे सीधा कहना पड़ेगा, बस हो गया। यह देखो रास्ता है। जिस रास्ते से आए हो, उसी से निकल लो। क्योंकि जाना वही है आपको। रास्ता तो वही घुमा-फिरा के होगा। वे लोग भी आपका इंतजार कर रहे हैं। क्या जरूरत है फोन से बात करने की? जाके प्रत्यक्ष मिलो उनसे। फोन से बात करने की क्या जरूरत है? जाकर प्रत्यक्ष मिलो उनसे, प्रत्यक्ष बातचीत करो। यह सब बातों को समझना चाहिए।
कहीं आप गए हो तो अपनी छाप छोड़ के जाओ, कि सच में आप वहां पर रहे, और आप अपने आप से कह सको, सीना ठोक के, कि मैं पूरी तरह वहां के नियम का पालन किया, पूरी तरह मैंने अनुशासन में जिया। यह आप अपने आप से कह सको। नहीं होगा तो सुबह आने वाली है, निकल लेना ही। नहीं तो निकल लेना। मैं अभी कह रहा हूं, जब इतने दिन से नहीं सुधर सका। अभी यहां पर इतने दिन हो गए, मेरा भी दस दिन हो गया। अभी इतनी कोशिश कर रहे हैं, फिर भी कुछ माया घेर जा रही है। वही, जब बहुत अपने आप को कंट्रोल करके, कोशिश करके संभाल रहे हैं। एक रास्ता तो है जाने का। यह तो स्वतंत्रता है। मैं खुल के कहता हूं आप लोगों से। हमने तो आपको बांध के नहीं रखा है। यहां कोई गुरु दीक्षा भी नहीं दी, कि क्या होगा, हमने इनको गुरु बना लिया। ऐसी भी कोई बात नहीं। यह भी डरने की जरूरत नहीं है आपको। हमने आपको दीक्षा भी ऐसा नहीं दी कि बंधन हो गया, कि हमने तो इनको गुरु बना लिया, गुरु के विरोध में सोचना पाप है। यह पाप है न, पुण्य है। मुझे जाकर गाली भी दोगे तो कोई फर्क आपको नहीं पड़ने वाला। आपको आशीष ही मिलेगा हमारे तरफ से। आप हमें गाली भी दोगे तो भी मेरा काम बस एक ही है, आपको आशीर्वाद देना। और मेरे पास कोई काम नहीं, और मेरे पास इसके अलावा जिंदगी में कुछ बचा भी नहीं।
हमारी स्थिति इसके जैसी हो रही है। बार-बार मार-मार के लाना पड़ता है जगह पर। आपको इसके जैसी हो रही है, क्योंकि ऐसी अव्यवस्थाओं से आते हैं हम यहां। यहां व्यवस्थित होने में थोड़ा समय लगता है। आपको कुछ सोचना ही नहीं है।
यहां कमी क्या है, मुझे बताओ। आप जबरदस्ती नियम तोड़ रहे हो। क्या कमी है, मुझे बताइए। एक कमी बताओ। एकदम बताना, खुलकर। आपको क्या कमी इतने दिन में हुई? चलो, कोई भी मुझे बता दे। एक कमी कोई गिना दे। संकोच ना करना, क्योंकि लाइव में भी सुन रहे हैं लोग। खुल के बात करना। एक कमी मुझे गिना दो। यहां पर एक परेशानी आपको यहां हुई इतने दिन में, मुझे गिना दो। यह लाइव में भी संदेश जाएगा लोगों को।
ऐसा नहीं कि जिया हमने भी नहीं है। हम दो हजार उन्नीस में पांव धोने के लिए लोटे से धोते थे। हमने जिंदगी ऐसी नहीं जिया कि आप ही ऐसे रह रहे हो। मुझे अगर रहना हो तो मैं नहीं रहूं। मैं काम की वजह से आया हूं। अगर मुझे रहना हो तो मैं शहर में रहना पसंद करता हूं, क्योंकि मैं ज्यादा शहर में रहा करता हूं। मेरा रहना ज्यादा वही हुआ। मेरा अगर काम हटा दिया जाए तो मैं इतना बैठ भी नहीं पाऊंगा, और मैं यहां रह भी नहीं पाऊंगा। मैं आपको सीधा बता दूं। मुझे एक से दो दिन रहना भारी पड़ जाए। ऐसा नहीं कि व्यवस्थाओं में आप ही जिए हो। मैंने भी अच्छी से अच्छी व्यवस्थाओं का उपयोग किया है। मैं भी कपड़े में क्रीज नहीं पड़ने देता था। मैंने भी ऐसी जिंदगी जिया है। ऐसा नहीं है। लेकिन जब काम करना होता है, आदमी को उस लेवल पर आना पड़ता है, तभी काम होता है।
आप यह मत बताइए कि मैं बहुत अच्छे व्यवस्था से आ रहा हूं और मैं इसे यहां पर एडजस्ट कर रहा हूं। यहां पर एक नंबर की व्यवस्था है। मैं तो नदियों के किनारे ऐसे बिना बिस्तर का सोया था। वहां भी नहाने के बाद रात को कांपता था रात भर। और मैंने खुद की जिंदगी खुद के सपोर्ट से जिया है। ऐसा नहीं कि मैं अपने परिवार के बैकग्राउंड से जिया हूं। मैंने उस बैकग्राउंड को खुद खड़ा किया, और खुद मैं ऐसी लाइफ जिया हूं।
जब आप यह सुनाते हो कि मुझे एडजस्ट करना पड़ता है, मुझे आप पर हंसी आती है। क्योंकि यह आपका नाटक है, कुछ नहीं है। क्या एडजस्ट करोगे, बताओ? मुझे नहीं पता है आप लोग कैसी लाइफ जीते हो। क्या हमने नहीं जिया है? आप कभी पिछला प्रोफाइल देख लेना। हमने इसीलिए लोगों के लिए डाली है, कि देख लेना। ऐसा नहीं है। मैं पहले नहीं डाला था, बाद में मैंने डाला। जरा देख लेना। मुझे अपने लाइफ में जो करना था, मैंने पहले ही कर लिया। और मैं काम को काम के तरीके से करता हूं। बस ऐसा नहीं कि आप कार से उतरे हो। मैं भी कार चलाकर उतरा हूं। हमने भी कार जिंदगी में ली थी। ऐसा नहीं है। यह सब बातों को समझिए। अगर आपको कोई समय दे रहा है तो आप समय का उपयोग करिए, सदुपयोग करिए, दुरुपयोग मत करिए।
और जब मैं निकला था तब भी मुझे कुछ नहीं चाहिए था। आज भी मुझे कुछ नहीं चाहिए। ऐसा नहीं कि इस काम के पीछे मुझे कुछ चाहिए। मुझे तब भी कुछ नहीं चाहिए था, आज भी कुछ नहीं चाहिए। ना पाप, ना पुण्य, ना सत्कर्म, कुछ नहीं। मैं परमात्मा से अभी भी कहता हूं कि इतनी कृपा करना मुझ पर, कभी कृपा ना करना। मुझे कुछ नहीं चाहिए, तो नहीं चाहिए। बस यह काम मैंने मांगा था, यह काम मैं कर रहा हूं। लेकिन काम को काम के तरीके से करूंगा। आप लोगों की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करूंगा। और आप ना सुनाओ कि मुझे एडजस्ट करना पड़ा। यहां कोई कमी ही नहीं है।
एडजस्ट तब करना पड़ता, कि दो में से एक कंबल दिया जाता। या तो दो में आधा तू मोड़े, आधा वह। तब मुझे बोलते कि पैर खुला है और मैं एडजस्ट कर रहा हूं। तब मुझे भी अच्छा लगता, यार यह आदमी एडजस्ट कर रहा है। आधा कंबल इसको उढ़ाया, आधा इसका इतना खुला है। कुछ देर यह ढकता है, कुछ देर वह ढकता है। तब मुझे लगता कि आप एडजस्ट कर रहे हो।
गर्म पानी सुबह मिल रहा है नहाने को। ब्रश है, मंजन है, साबुन है। इसके बाद यहां पर भोजन की व्यवस्था है, नाश्ते की व्यवस्था है। क्या कमी है कि एडजस्ट कर रहे हो? मुझे समझ में ही नहीं आ रहा है। कमी क्या है, बताओ? नाश्ते में, भोजन में, वही आप क्या एडजस्ट कर रहे हो, बताओ? कल भी, मैं क्या एडजस्ट कर रहा हूं, बताइए? क्या एडजस्ट कर रहे हो? यह एडजस्ट करना, एक रोटी हो, अगर चार टुकड़े हो जाएं, उसे कहते एडजस्ट करना। क्या वह स्थिति आपकी है? नहीं। घर से भी अच्छा, जैसी मां खिलाती थी वैसे आप खिला रहे हो। यहां पर एक ही कमी है, कि यहां पर कोई कमी ही नहीं है।
मैं एक-एक चुन-चुन के व्यवस्था करता हूं। किसलिए, पता है? आप लोग साधना कर पाओ, और किसी के लिए नहीं। एक आदमी को मैं, अगर साधक नहीं है, तो निकल लो। साधक के लिए बस, कि आप लोग साधना करके आपका आत्मिक स्तर उठे। ना मुझे गुरु बनना है, ना आपको चेला बनाना है। ऐसा कुछ भी नहीं। ना आपको दीक्षा देना है, ना लेना है। यहां बस करना है। मेरा भाव बस इतना है कि आप लोग आ रहे हो, आप लोगों का स्तर उठे, आप कुछ सीख सको, कुछ समझ सको, अपना आत्मिक कल्याण कर सको। इसलिए मैं काम कर रहा हूं। इन सब बातों को समझिए और आगे बढ़ो। और आप यह मत सुनाइए कि एडजस्ट कर रहा हूं। एडजस्ट यह कुछ ऐसा है ही नहीं। एक नंबर की व्यवस्था आप कर रहे हो। कमी हो तो बताओ। फिर जब कहोगे एडजस्ट कर रहा हूं, तो बात नहीं। आप लोग साधना करिए जिसके लिए आए हो। चाहे एक दिन रहो, लेकिन पूरी तरह। दो दिन रहो, पूरी तरह। आप लोग आ रहे हो तो घर पर बोल दो कि दो स्थिति में फोन करना। सीधी सी बात है। या कोई निकल जाए, या तो इमरजेंसी, आईसीयू में कोई जाए। इसके पहले मत करना। चाहे वह एक दिन रहो, चाहे दो दिन रहो। अगर यह बात ना जम पाए तो यहां से रास्ता वही जाता है, आपके घर तक। रास्ता तो बताने की जरूरत नहीं है। आपको किसी से पूछने की जरूरत नहीं। आने में तो पूछना पड़ा, जाने में तो पूछना भी नहीं पड़ेगा। अगर इस तरीके से नहीं रह सकते तो सीधा बस वही रास्ता आपके घर तक जाता है। सीधा घर चले जाइए। क्यों किसी को परेशान कर रहे हो।
मुझे कुटिया बनाने के पहले मैं आपको बताऊं। जिंदगी में अभी तक, कुटिया के पहले, कभी आटा और दाल का भाव मुझे मालूम करना नहीं पड़ा। ईंट का भाव मालूम नहीं करना पड़ा, सीमेंट का भाव मालूम नहीं करना पड़ा, लोहा का, दरवाजे का, यह सब भाव मालूम नहीं करना पड़ा। अब सब मालूम। गिट्टी का, रेत का, खिड़की का, अब सब मालूम करना पड़ रहा है। आज तक अपने जीवन में इतनी मेरी उम्र हो गई, मुझे कभी सब्जी का भाव नहीं मालूम करना पड़ा, कि प्याज कैसे किलो। हमसे कोई मतलब नहीं रहा। अब मालूम करना पड़ रहा है। यही मैं देख रहा हूं। कभी मेरे जिंदगी में ऐसा मौका आया नहीं, क्योंकि मैं कभी खुद बना के घर में रहा नहीं। ऐसा कभी जिंदगी में मौका नहीं आया। मुझे कभी भाव-ताव यह सब जानने की जरूरत ही नहीं पड़ी, कि सब्जी और दाल का मुझे पता करना पड़े क्या भाव है, ईंट-पत्थर पता करना पड़े। कभी नहीं ऐसा मौका मिला। अब मौका मिला है। अब मुझे पता करना पड़ता है, पन्नी कितने की आई, यह धागा कितने का आ रहा है। अब पता करना पड़ रहा है। मेरा मकसद है कि लोगों को इससे लाभ मिले। बड़ी मानवता है। लाभ मिले तो। ना लाभ मिले तो यह काम बंद हो जाए। कोई मतलब नहीं है। काम करके कुटिया बना के, यह हमें सब दीवारें नहीं खड़ा करना। यह हमें ईंट-पत्थर जिंदगी में नहीं जोड़ना। यह काम बंद हो जाए। अगर ना हो तो कोई मतलब नहीं है।
मैं इनके क्षेत्र में घूम रहा हूं दो हजार उन्नीस से। आज तक हमने किसी के दरवाजे पर जाके कभी नहीं बोला कि मुझे एक गिलास चाय बनाओ, या भोजन बनाओ। कभी नहीं। एक रुपया किसी से लेना-देना नहीं। दो हजार उन्नीस से इनके क्षेत्र में रह रहा हूं। यह सब बनाने में भी मैंने आज तक किसी से बोला नहीं कि मुझे कोई सहयोग दो। लोगों ने बोला, हमने ही मना कर दिया। हम कहे, नहीं। मेरी जिंदगी एकदम साफ-सुथरी है। मैं काम को काम के तरीके से करता हूं। मुझे काम को काम करना है। मुझे यह नाम, शोहरत, पैसे के लिए मैं काम नहीं कर रहा हूं, कि बस आए साधक, भीड़ देख ली, इतने साधक हैं। नहीं। मैं अभी भी समझा रहा हूं। अब तो आगे मैं यही कहने वाला हूं कि भाई, कर लो, हो गया। हो गया, क्या करूंगा? आज जिस कार्य के लिए आप बैठे, वह काम नहीं होगा तो फिर क्या करेंगे? अच्छा बताओ, क्या करेंगे? यहां रह के। हमें भी हो गया। बारह साल से घूम रहा था। अब मुझे भी, मैं भी फोन नहीं दबा पा रहा हूं। मैं भी तो आप लोगों के लिए बैठा हूं। आप लोगों का इंतजार कर रहा हूं। आप लोगों की व्यवस्था दूं। आप में लगा हूं। तो आपको जब लाभ ही नहीं हो, हम यहां रह के क्या करेंगे? आप ही बताइए। यही ईंट जोड़ना बस यही रह गया। इस उम्र में बाल पक गए। अब यही रह गया। मुझे जब जोड़ना था जवानी में, तब तो यह जोड़ा नहीं। अब मैं यही करूंगा। भाई, यह सब का शौक कब होता है, जब युवा अवस्था रहती है। वह तो गई।
इसलिए कहीं भी जाइए, वहां के नियम को पूरी तरह पहले पूछिए। व्यवस्था बाद में पूछ लेना। शौचालय भी देखो, दोनों तरह का मैं बनवाया। मैं खुद देख-देख के यहां काम किया हूं। दोनों तरह का बनाया हूं। बोलना नहीं पड़ा। गीजर के लिए मेरे से कोई बोला थोड़ी। हमने खुद लगाया। और मैं आज तक उस गीजर में नहीं नहाया हूं। मैं सीधा जाता हूं, कूदता हूं, चला आता हूं, स्नान करता हूं। आज तक हमने उस गीजर का उपयोग नहीं किया। वह गीजर किसके लिए लगा? आप लोगों के लिए लगा। मुझे पता था ऐसे लोग आएंगे जिन्हें जरूरत पड़ेगी। यहां तो जितनी सुविधाएं साधक के लिए जरूरी हैं, वह हैं। आप इतनी व्यवस्था, इतनी स्वतंत्रता में साधना नहीं करोगे, कैसे करोगे? आप मुझे बताओ, आपके लिए क्या किया जाए? मैं और एक आश्रम का निर्माण करूं क्या? एक आश्रम का और निर्माण करूं, वहां पर आप लोगों को भेजूं? फिर आप बोलिए कि हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए। यहां का तो सिस्टम बन गया है। अगर कोई व्यवस्था चाहिए तो मुझसे कहिए। मैं वहां फिर एक और आश्रम का निर्माण करने वाला तो हूं, आगे जाकर, परिक्रमावासियों के लिए। तो आपके लिए एक और आश्रम का निर्माण करें। आप लोग बताइए कि मुझे ऐसी-ऐसी सुविधाएं चाहिए, और इस सुविधा के द्वारा मैं एकदम परम स्थिति को उपलब्ध हो जाऊंगा। मैं वैसी भी व्यवस्था कराऊं, जितना मुझसे हो सकेगा। आप कह के देखिए। हम आपको कराएंगे। बस मुझे लगना चाहिए कि उसमें आपका स्तर उठेगा। मुझे भी लगना चाहिए। अगर ऐसा कुछ है तो बोलो। ऐसा कुछ है तो बोलो कि भाई, मुझे यह सुविधा दो तो हमारा स्तर और उठ जाएगा। यह आसन मुझे लाओ तो मेरा स्तर और उठ जाएगा। मैं करूंगा व्यवस्था, अगर उचित रहा तो। कुछ नहीं। आप लोग आए हो इतने दिनों में, आपका कोई नाम नहीं पूछा। कोई एक आदमी आपको टोका नहीं, कि यहां क्यों बैठे हो, और क्या चाहिए आपको।
हम इनके क्षेत्र में इतने सालों से घूम रहे हैं। कभी कोई कह नहीं सकता कि हमने किसी से एक रुपया मांगा। कभी नहीं, आज तक नहीं। एक कपड़े पर मैं जीता हूं। बोल नहीं सकता कोई। इतना शुद्धता से हम जिंदगी को जीते हैं। मेरा भाव बस इतना है कि आप लोगों का आत्मिक स्तर उठे, और आप परम स्थिति को उपलब्ध हो। मेरा भाव यह है। मेरा भाव यह नहीं है कि आप भटकते रहो। मैं इस काम की शुरुआत इसलिए किया हूं कि लोग उस परम स्थिति पहुंचें। और मुझे इतना मालूम है कि अगर आप प्रयास करोगे तो दुनिया की कोई ताकत नहीं सकती। वह स्थिति आपकी मूल है। यह मुझे पक्का पता है। और आप नहीं प्रयास करोगे, मैं आपको बोलता हूं, दुनिया की कोई ताकत आपको पहुंचा भी नहीं सकती। यह भी आप समझ लीजिएगा। कोई पैदा नहीं हुआ। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी प्रत्यक्ष आ जाएं, आपका कुछ नहीं कर सकते। और अगर आप चाह लो अपना आत्मिक कल्याण, तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी रोक नहीं सकते। यह भी आपको बता दूं। यह आपको पक्का बता रहा हूं। ऐसे ही नहीं। यह मेरा व्यक्तिगत जीवन का अनुभव है। इसलिए मैं आप लोगों को बोलता हूं कि आप लोग प्रयास करिए। यह आप कर सकते हो, आराम से, बहुत आराम से। लेकिन उसके लिए आवेश और जज्बात दोनों हटाने पड़ेंगे। आवेश और जज्बात, यह दोनों हटा के आगे बढ़ना पड़ेगा। यह ध्यान रखना। आवेश और जज्बात में आए, तो गए। आवेश, जज्बात, जरा सा विपरीत हुआ, लो मैं जा रहा हूं। होम जाने के लिए आए। मेरे घर पर कोई कमी है क्या? यह है आवेश और जज्बात।
प्रेम में झुक के रहना सीखो। सीखने में झुको। जहां सीखना है, वहां झुकना पड़ता है। पानी कहां जाता है? ऐसे-ऐसे ज्ञान ऐसे जाता है। जरा सा ऐसे किए, सब आ गया। चलो, खत्म। क्या हो गया? वापस भर रहा था, लेकिन आपने ऐसे कर दिया, गया, सब खत्म हो गया। हो गया काम। निकल लिए, गठरी लेके सर पर ला लिए, और जहां से आए थे आवेश ने पहुंचा दिया। जन्म-जन्म से चिल्ला रहे थे, कोई मिले, मार्ग बताए। मिले, मार्ग बताए, तो काला टाइट कर लिए और निकाल लिए गठरी लेके। यही होता है। प्रार्थना कर रहे थे, कोई मिले मुझे, मार्ग बताए। हे परमात्मा, कुछ दया करो, मुझ पर कृपा करो, कोई मुझे मिल जाए, कोई सदगुरु से मिलाओ, कोई गुरु से मिलाओ, कोई मुझे मार्ग बताए। और जब पहुंचते हैं तो वहां क्या आ जाता है? आवेश और जज्बात। कि लो, मैं जा रहा हूं। मेरे यहां कोई कमी है क्या? बस निकल लिए। गठरी लाद ली। फिर से गठरी लाद ली। कैसे। गुरु ने मेहनत करके कुछ उतरवाया था, लेकिन नहीं, तुरंत लाद ली, और कहे मैं जा रहा हूं। उसने कितनी मेहनत की आपके लिए। आपको समझ में आ रहा है। वह व्यक्ति दिन-रात आपके लिए लगा रहा, और एक झटके में आपने कहा लो, जा रहे। सोचिए जरा। एक व्यक्ति रात-दिन आपके लिए लगा रहा, और आपने एक झटके में उसकी मेहनत को खत्म कर दिया। एक झटके में गठरी लाद ली और निकल लिए। और वह देखता रहा आपको। वह रोक नहीं सकता। वह व्यक्ति रोक नहीं सकता। बात यह है। वह यह भी नहीं कह सकता कि आप रुको। समझो, यह हालत है।
जीवन लगा के उसने खोजा। उसकी जिंदगी चली गई। और फिर जब देने लगा, तो कुछ आप में, फिर एक मेहनत वहां किया, और एक मेहनत फिर आप पर करना पड़ा। और फिर एक झटके में आप आवेश और जज्बात में आए। और आए किसके लिए, पता है? व्यवस्था के लिए। शब्दों में, शब्दों के जाल में फंसे, और व्यवस्था में फंसे। और बस उसने जितना दिया था, ले, गठरी उठाए, और निकल लिए घर पर। सोचिए जरा उसका। मतलब उसने कितनी मेहनत आपके लिए किया था। आप सोच सकते हो। वह व्यक्ति आपको पूरी व्यवस्था देकर सुला रहा है। और वही व्यक्ति कुछ साल पहले नदियों के किनारे पड़ा था, ऐसे पागल की तरह कांप रहा था। कैसे-कैसे मेहनत कर-करके वह व्यक्ति उस स्थिति पर पहुंचा, और आपको सीधा बता रहा है। और आपके आवेश और जज्बात ने उसे एक झटके में खत्म कर दिया। फिर वह देख रहा है आपको। गठरी जाते हुए देखो, जहां से आया था, फिर चला गया। फिर उसी दुनिया में। रोक भी नहीं सकता। रोकने का अधिकार उसके पास नहीं है। यह हालत है। वह तो बस देखता रहा। क्योंकि अब तो वह उस पीड़ा से मुक्त हो गया, उस तकलीफ से वह मुक्त हो गया, उस अशांत भरे जीवन से मुक्त हो गया। वह तो बस आपको देख रहा है, कि जहां से आया था, फिर वही निकल लिया। वह तो आपको रोक भी नहीं सकता। उसने तो अपने आप को निकाल लिया, और आपके लिए मार्ग खोजा था। और आपने बड़ी प्रार्थना की थी कि मुझे कोई मार्ग बताए। आपकी भी प्रार्थना थी कहीं न कहीं। और जब बताने वाला मिल गया, तो मात्र कुछ जरूरतों के लिए, झूठी मान के लिए, कि बस शब्दों की बात थी और बात कुछ नहीं थी। और उस शब्दों के जाल में फंस के, और कहे मैं तो अब जा रहा हूं।
इस मार्ग की खोज में मैं इतना पागल हो गया था कि मुझे जानवर भी मुझसे भागने लगे थे। आदमी तो छोड़ दो। मेरे पास जानवर तक नहीं आते। मैं अगर खड़ा हो जाऊं तो मेरे पास जानवर तक नहीं आते थे। आदमी तो छोड़ दो। मैं जब तक ना बोलूं। जानवर मुझे देख के भाग जाते। इस स्थिति में मैं अपने आप को ला दिया था खोज में। यह इतनी आसानी से नहीं मिल गया है कि किसी ने मुझे गिफ्ट दे दिया है। इसमें मेरी जिंदगी लग गई। कभी-कभी मैं सोचता था, इससे अच्छी मौत है। एक बार खत्म, खूबसूरत है। एक बार मार देती है। इतना मुझे अथाह में, कि कभी-कभी मैं लगता था कि मौत इससे प्यारी है। एक बार में खत्म कर देगी। कि मैं ऐसे ही नहीं, प्रत्यक्ष ज्ञान मिल गया है, कि ऊपर वाले ने ले ली बात। इसके लिए जिंदगी चली गई। और इसके पीछे पूरी तरह मेहनत है। मेरी मेहनत है इसके पीछे। ऐसे ही नहीं मिल गया। कहने का मतलब इतना है कि आप लोग लाभ लीजिए। आवेश और जज्बात को हटा दीजिए। यह आपको गिरा देंगे।
आवेश एक झटके में ऐसे भरता है, और तुम एक झटके में कहते हो, लो निकल। जैसे जो हठयोग करते हैं, तो हठयोग भी क्या, आवेश, उसको भी आवेश बोल सकते हैं कि वह किस स्थिति में कर रहे हैं और किसके लिए कर रहे हैं। हठयोग कर रहे हैं कुछ नहीं चाहिए कि, जैसे सब कुछ करके जब थक जाता है तो एक स्थिति होती है। तो वह क्या, उसे आवेश नहीं बोल सकते। वह स्थिति होती है। कर-करके जब करने के लिए कुछ नहीं रहता, तो एक स्थिति होती है। वह आवेश नहीं। आवेश तो तब है जब पहले दिन ही कर बैठो। आवेश तो तब है जब पहले दिन ही कर बैठो। सालों-साल मेहनत करता है। जब नहीं होता, थक जाता है, खोज करके, कर-करके, तो हठयोग एक स्थिति है। आवेश पहले दिन का है।
हो सकती है। बच्चों को घर पर ही पढ़ाओ ना, विद्यालय भेजो ही मत। क्या जरूरत है? गाइड भी मिलती है, किताब भी मिलती है। प्रश्न हल करने की जरूरत नहीं, बोल दो रट्टा मार ले। कोई जरूरत नहीं है। घर पर ही बच्चों को पढ़ाओ, विद्यालय क्यों भेजते हो? आप सुबह से लेकर शाम तक सिस्टम के लिए गए। सिस्टम में रहकर काम होता है। वही तो बात है। घर पर साधना कभी भी हो ही नहीं सकती। सिस्टम बन ही नहीं सकता, बनेगा ही नहीं। घर घर है। कितना भी अरबपति आदमी हो, राजा भी हो, अपने बच्चों को विद्यालय ही भेजना पड़ता है। महल में तो विद्यालय बन ही नहीं सकता, बनेगा ही नहीं। यह समझने की बात है।
बस यह आखिरी में पता चलता है। प्रकृति आखिरी गुरु है। जब आपको कोई बताने वाला नहीं मिलेगा, तो आखिरी में प्रकृति आपको ज्ञान करवा देगी। ज्ञान पहले से मौजूद था, आप छूट गए, पूरा तरह। खोजते-खोजते खोजने को कुछ नहीं बचा, तो ज्ञान ही तो बचेगा। क्या बचेगा? आपको प्राकृतिक ज्ञान हो जाएगा। खोजते-खोजते जब खोजने को कुछ नहीं बचेगा, सब खत्म हो जाएगा, तो खोजने वाला भी खत्म हो जाएगा। क्योंकि उसी के सहारे तो खड़ा था। खोज के सहारे खोजने वाला बचा था, तो खोजने वाला भी खत्म हो जाएगा। बात खत्म हो जाएगी। जैसे ही बाहर का मिटा, ऐसे ही खोजने वाला भी तो मिट जाएगा। तो बात ही खत्म। खोजते-खोजते, खोजने के लिए जब कुछ नहीं बचता, तो खोज ही बचती है। बात खत्म हो जाती है। वही अहम भाव खत्म गया। और उसमें सब, मेरा-तेरा, राग-द्वेष, मोह, शक्ति, इच्छा, अपेक्षा, सब खत्म हो गया। तो बचा कौन? सत्य। बस बात ही खत्म हो गई। तो ज्ञान ही बचेगा। और बचेगा क्या? शेष क्या बचेगा? ज्ञान बचेगा।
हां, तो वही तो बात है। कुछ नहीं करना है। आकर कुछ दिन रहो। कुछ ना करने में तो रह नहीं पा रहे हैं। यही तो बात है। इन्हें फावड़ा चाहिए। फावड़ा इन्हें चाहिए। काम क्या? हां, वही इन्हें चाहिए। कोई साधना, कोई विधि क्या? नहीं। इन्हें कोई विधि चाहिए। इन्हें कोई आसन चाहिए।
आप करते रहिए। जैसे आप झाड़ू मार रहे हो, कितना भी मन में गंदे विचार आएं आपके अंदर, तो झाड़ू तो साफ कर देगा, अपना काम कर देगा। झाड़ू मारना मत बंद करिए। आप जो भी कर रहे हो, आप करिए। विचार आने दीजिए। आपको क्या करना है विचारों से।
नहीं भागना चाहिए। एकदम नहीं भागना चाहिए अपनी जिम्मेदारी से। यह तो परमात्मा की व्यवस्था का उल्लंघन है। आप जिम्मेदारी लिए हो, उसको निभाते हुए आगे बढ़ो।
डर का सामना कैसे करें, क्रोध का निवारण करें, जीवन में प्रेम कैसे आए। अपने तरीके से चाहिए, उसका त्याग कर दीजिए, तो क्रोध नहीं आएगा। और प्रेम तब पैदा होगा, जब आपको कुछ नहीं चाहिए। तब आप सामने वाले से बात करेंगे तो वहां प्रेम पैदा होगा। कुछ नहीं चाहिए में आ जाओ। और डर का निवारण करना है तो अपने आप को मजबूत बनाओ।
बस ईमानदारी से जीवन जीते हुए सत्कर्म करें, और मेहनत करें, और आगे बढ़ें।
मन में निगेटिव थॉट्स आते रहते हैं। थोड़ा घबराहट आ रही है। ऐसा विचार आ रहा है, कुछ फेंकने के लिए, चलाने के लिए, गाली देने के लिए। तो आने दो। प्रभावित मत होइए। आप इतना तो कर सकते हो। आ रहे हैं, आ रहे हैं। मैं जा रहा था, रास्ते में गटर आ गया। क्या करोगे, गटर में कूदोगे कि अपना आगे निकल जाओगे? गटर से प्रभावित हो क्या आप? अप्रभावित रहकर क्या करोगे? तो प्रकृति की व्यवस्था है। जनरल थॉट आदमी को चलित करता है। नहीं होना चाहिए। नहीं होने के लिए क्या करना है? मतलब बस आ रहा है, आने दीजिए। उसके जिम्मेदार आप नहीं हो।
आप जा रहे थे, रास्ते में गटर दिखा, बदबू आई। उसके जिम्मेदार आप हो कि प्रकृति है? आप नहीं। बस खत्म बात। आपने अपने आप को जिम्मेदार मान लिया। विचार आ रहे हैं, वह गलती आपकी है। बेमतलब का मान लिया। हवा आ रही है, उसके जिम्मेदार आप हो क्या? यह मेरा मन, मेरे अंदर से आ रहा है, मेरा सोच, मेरा विचार, मेरा थॉट। आपके पास तो एक भी विचार नहीं है। सब विचार बाहर के हैं। मेरे अंदर से आ रहा है, कहां से अंदर से आ रहा है? विचार कहां से पैदा होते हैं, बाहर से कि अंदर से? देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में हमारे विचार बदलते हैं, उड़ते हैं, आते हैं, जाते हैं। उसके जिम्मेदार हम थोड़ी हैं। आपको किस पर काम करना है, वह देख लो।
फिर आप दुकान पर गए। सामान बहुत दिखाया। क्या सब सामान का पैसा लेगा? आप कहोगे, यह मुझे दे दो, पैक कर दो। उसका मूल्य लेगा। और आप कहोगे, नहीं, मुझे कोई पसंद नहीं। कहेगा ठीक। उसकी कोई फीस है क्या? बोलेगा नहीं, देखने का चार्ज नहीं लगता। वैसे ही विचार है। अगर ऑप्शन ही नहीं रहेंगे। अब दुकान पर जाओगे, कहेगा सामान दिखाओ। नहीं, थोड़ी अलग क्वालिटी। मैं तो एक ही रखा हूं। कैसे दुकानदार हो, कई सामान रखना चाहिए। अगर विचार भी नहीं आए तो आप कहोगे, यार कोई बात है, विचार तो आना चाहिए। विचार आएगा तभी तो चुनाव कर पाओगे, क्या सही है, क्या गलत। अगर विचार नहीं आएंगे तो काम कैसे करोगे? विचार है तो ऑप्शन है। सब विचार से हमको कुछ मतलब, आपको जिस पर काम करना है, करो।
जब आप कपड़े की दुकान पर जाते हो, फल की दुकान पर जाते हो, तो वह अनेक तरह का कपड़ा दिखाता है। अगर एक ही बस दिखाए, तो लेना तो आपको एक ही है, लेकिन कई कपड़े क्यों देखते हो? विचारों की वैरायटी है। गुस्सा एक विचार है। वही तो मैं कह रहा हूं कि वह आता है, आने दीजिए। आपको किस पर काम करना है, वह देख लो। आपको जितना सामान दिखाता है, क्या सबका बिल पे करना पड़ता है? जितना लेते हो, उसका बस। अच्छा, वह ना दिखाए, बोले एक ही है, तो लोगे क्या? बोलोगे नहीं, वैरायटी दिखाओ। लेना एक है, देखते कई हो। वैसे ही हमारे पास कई विचार आते हैं। हमारे पास ऑप्शन आते हैं। किस विचार पर काम करना है, देख लो। विचार हमारे सहायता करते हैं। जब इसे समझ लोगे, बात समझ में आ गई। विचार आपकी सहायता करते हैं। जिन विचारों को आपने शत्रु मान लिया है, जिन मन को आपने शत्रु मान लिया, ये सब आपकी मदद के लिए रखे गए हैं। आप समझ क्यों नहीं पाते। अगर यह नहीं रहेंगे तो काम कैसे करोगे। विचार आपको ऑप्शन देते हैं। अगर विचार नहीं आएगा तो काम कैसे करोगे, बताओ।
आप जब कोई सामान लेने जाते हो तो कई दुकान के पते आते हैं। अगर एक ही का पता है, दूसरे का नहीं है, तो मजबूरी में आपको वही सामान लेना पड़ेगा। यह सब बचपन से बोला हुआ है, सब मतलब अच्छा ही सोचना है। वही तो गलती है आपकी। अच्छा है, ना बुरा है। उपयोग करो। कभी-कभी आपको जहर भी खरीदने जाना पड़ता है। अब तुम कहोगे, संसार में जहर ही नहीं होना चाहिए। कभी-कभी व्यक्ति को जहर भी खरीदना पड़ता है, उसे बचाने के लिए। जब जहरीला कोई भी जीव किसी को काट लेता है, उस समय किसका इंजेक्शन लगता है? तब आप बोलोगे। अब आप कहोगे, नहीं, पॉइजन का विचार तो आना ही नहीं चाहिए। अब आएगा ही नहीं तो लाओगे कैसे? जिसे आप गंदा समझ रहे हो, वह आपके काम के हैं। आप क्यों नहीं समझ रहे। अभी काम के नहीं है, कभी न कभी उसकी भी जीवन में जरूरत पड़ सकती है। उस जानकारी को मिटाना चाहते हो अपने अंदर से? यह आपने जानकारियां इकट्ठा की हैं, वही तो विचार आते हैं। क्या आप अपनी याददाश्त मिटाना चाहते हो? क्या आपको करना ही नहीं जीवन में कुछ? यह विचार क्या है? आपकी जानकारी ही तो है। क्या इस जानकारी को हटाना चाहते हो अपने अंदर से? फिर काम कैसे करोगे? यह जानकारी आपके लिए सहायक है। इसके लिए आपने बहुत मेहनत किया है। आप इसका बस उपयोग करना सीख लो। विचार आपके सहायक हैं। मन आपके सहायक है। आप क्यों नहीं समझ पा रहे हो इस बात को।
जैसे बैठे हैं हम ध्यान में, ऐसे-ऐसे दृश्य, विचार आते हैं, जो कभी देखे नहीं, सोचे नहीं, अनुभव नहीं। होते कि विचार हमने कभी सोचा भी होगा? आपने नहीं सोचा है। आपने अगले हफ्ते रविवार को क्या खाया था, आपको पता है? अब बताइए। आपने जितना संचय किया है, उतना निकलता है, और कुछ नहीं। अंदर तो आपके पास कुछ नहीं, बस आप हो। अगर जितनी जानकारी हटा दी तो खत्म। संचय कहां होते हैं? आपके अंदर। यही तो बात है। आपके अंदर अनलिमिटेड स्टोरेज है। पांच इंद्रिय कैमरा हैं। कान, आंख, नाक, मुंह, स्पर्श। ये पांच कैमरे लगे हैं। हर समय आप जानकारी इकट्ठा कर रहे हो। जितना आपने जमा किया है, जब इसे बाहर से नहीं मिलता तो अंदर का निकाल लेता है। बस इसका यही काम है। ध्यान में कभी आते हैं जो विचार, उसमें कभी सपनों में, ये सब इसी प्रकार से निकलते हैं। विचार बहुत सहायक हैं। आपको किस पर काम करना है, काम करो। इन सब पर ध्यान मत दो। विचार बहुत सहायक हैं। मन बहुत सहायक है। इसको उपयोग करना सीख तो लो।
तो हम विचलित क्यों हो जाते हैं? यही, विचारों को रोकने में। और क्या, गंदे विचार हैं। नहीं। आज जिसका उपयोग नहीं करना चाह रहे हो, कल किए थे, तो वही तो विचार आ रहे हैं। तो आप मत करिए। बात छोड़ दीजिए। आप अच्छे-बुरे में फंस गए। गड़बड़ी यह हो गई। कुछ अच्छा है, ना बुरा है। यही तो बात है। इसमें भूतकाल का भी कुछ सही-गलत आ जाता है। आएगा ना। जितना आपने किया है, वह तो आएगा। वही तो आ रहा है विचार बनकर। वही ज्यादा आ रहा है। तो आएगा ना। वह ज्यादा तब आएगा जब आप उसे रोकते हो। स्प्रिंग को ऐसे करोगे तो, पहले तो छोड़े थे तो इतने पर ही था। लेकिन आपने क्या किया, ऐसे दबा के छोड़ दिया, तो क्या होगा? फिर उछलेगा। तो यही गड़बड़ आप कर रहे हो। जबरदस्ती कर रहे हो, विचारों को रोक रहे हो। वह अपने आप आ रहे हैं, जा रहे हैं। और देखो, विचार बदलते रहते हैं। आपको क्या करना है, वह देख लो। मैं कह रहा हूं, आप झाड़ू मार रहे हो। कैसे भी विचार आएं। अगर आप झाड़ू मारो तो गंदगी साफ होगी कि नहीं होगी। आपको क्या करना है, वह देख लो। आपको क्या मतलब विचारों से।
अब आप दुकानदार को सलाह दे रहे हो, मुझे यह सामान चाहिए, लेकिन सब सामान हटा दो। अरे, सब सामान आपको नहीं चाहिए, लेकिन लोगों को चाहिए। आपकी जरूरत नहीं है। बस आप ही के लिए दुकान नहीं खोली गई है। तो प्रकृति आपके लिए बस नहीं है। फल होता रहता है। बस आता-जाता रहता है। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में बदलता रहता है। इधर से इधर जाएगा। बस आप ऐसे बैठे हो। कोई सड़ा हुआ, बदबू आया, गया। उसमें आप बह गए। फिर वह गया भी, बस खत्म हो गया। यूनिवर्स से आता है। वही तो बात है। इसी को तो समझना है। हमारा नहीं है। हार्ड डिस्क बाहर है। आप रोकना चाह रहे हो, और वह आपके बस में नहीं है। और आप उसे जबरदस्ती कर रहे हो, इसलिए आप परेशान हो।
अच्छे विचारों को रोक नहीं पाते, और बुरे विचार रुक जाते हैं? ना। अच्छे विचारों को लाना चाहते हो, बुरे विचारों को रोकना चाहते हो, तो ताकतवर कौन हुआ? बुरे विचार को आपने ताकतवर बना दिया। अच्छे विचारों को खा-खा के कमजोर बना दिया। तब वो बुरे विचार आते हैं ज्यादा। इसलिए आपने उसे बहुत दबाया। तो जाएंगे कहां? आपने यही तो जिंदगी भर किया है। इससे छुटकारा कैसे पाया जाए? छुटकारा क्यों पाना? आने दो। देखते रहो।
विचार के बारे में समझ में आ गया। मन को लेकर, विचार को लेकर यही सब भ्रांतियां तो पाल के रखे हो। बेमतलब सिखाई गई। पहले आपसे पहले जिसने बताया, विचारों को रोको, विचारों को रोको। वही तो गड़बड़ हो गई। मैं कह रहा हूं, एक बात बताइए। आप बैठ गए। मैं सड़ा हुआ सामने कुछ डाल दूं, और मैं बोलूं इसकी बदबू रोक लो। ऐसा विचारना है, तुम्हारी ताकत है? नाक बंद करोगे, कितनी देर कर लोगे? तब वह भी आएगी। चलिए। मैं कह रहा हूं, रूप ही, सामने कुछ ऐसा रख दो, और मैं कह दूं विचार मत लाओ। आपकी ताकत है? हो ही नहीं सकता। मैं कोई संगीत बजा दूं। आपकी ताकत है कि आप उसमें ना जाओ? अगर भाषा समझ में आती है तो हो ही नहीं सकता। मैं आपको फूल का स्पर्श कराऊं, या कांटा चुभोऊं। आपका मजाल है कि आप उसमें ना बहो? आपके बस में है नहीं। तब देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में विचार आते हैं, जाते हैं। मैं आपके मुंह खोल के कुछ डाल दूं, और बोल दूं स्वाद नहीं लेना। आपकी ताकत है? नहीं लोगे।
आप बेमतलब का काम कर रहे हो। विचार अपने आप आते हैं और जाते हैं। आपको क्या करना है, वह देख लो। इतना क्लैरिटी आना है। वह हमारा नहीं है। यह सब हमारा नहीं है। आपके पास कुछ भी नहीं है। आपके अलावा क्या? एक जानकारी आपके पास, बस तरीका है उपयोग करने का। आपके पास बताइए, एक जानकारी आपकी हो। यहां तक आपके पास प्रश्न भी एक भी नहीं है। सब आपने बाहर से लिया है। प्रश्न बाहर से लिया है, तो उत्तर भी आपको बाहर से मिलना पड़ेगा। मिलेगा तभी आप प्रश्न से मुक्त हो पाएंगे।
आपके पास कुछ भी नहीं है, बस आत्मज्ञान है। स्वयं का कुछ भी नहीं। स्वयं के पास तो ज्ञान आपने पकड़ लिया, जबरदस्ती मेरा है। आपके पास कुछ भी नहीं है। आप बेमतलब का परेशान हो कि मेरे विचार और तेरे विचार, मेरे कर्म और तेरे कर्म। और आपके पास कुछ भी नहीं। अगर बाहर की जितनी जानकारी है सब हटा दिया जाए, तो आपके पास क्या बचेगा? आप बताओ मुझे। और आप कहते हो, यह मैं कहां से आ गया।
पहला यहां का नियम, मोबाइल बंद। इमरजेंसी के लिए नंबर दे देना घर पर। कोई भी इमरजेंसी में फोन करे। देखिए, सामने नंबर है। मोबाइल आपको बंद करके अपने बैग में ही रखना है। वह भी बंद करके। बैग में होता है, मन कंट्रोल नहीं होता, उसी को तो करना है। जरूरत नहीं है। जरूरत है तो फिर बंधन हो जाएगा। आप रखिए। मैं फोर्स से नहीं लेता। मेरी जरूरत है तो मैं देता हूं। आप नहीं। अभी मेरे पास एक ही कपड़ा है, मैं कुछ रखता भी नहीं। इधर सब अपना-अपना सामान रखते हैं। अगर आगे आने वाले समय में लॉकर वगरह बना तो ऐसी व्यवस्था करवानी पड़ेगी। बात आपकी सही है, लेकिन आपको अभी बैग में रखना है।
इसके बाद, बारह बजे के बाद यहां नाश्ता मिलता है। शाम को भोजन। भोजन में एक बार। नाश्ते में जितना मिले उतना लेना है। भोजन में एक बार लेना है। मांगना नहीं है, और ना छोड़ना है। बस इसी तरीके से जीवन जीना है। सुबह काढ़ा मिल जाएगा। और व्यावहारिक, किसी से बातें नहीं करना है। सत्संग जब भी होगा, तब सुनना है। और फिर आत्मिक चिंतन के लिए कहीं भी आप बैठो। यहां खंभे के उधर जाना नहीं है। यह व्यवस्था निशुल्क है, साधकों के लिए। एक दिन से लेकर आजीवन तक रह सकते हो।
यही साधना है। साधना क्या करना है, पहले यह समझ लो। यही साधना है। स्टार्टिंग पॉइंट है। मेरे को क्या करना है? सत्संग सुनना। कुछ नहीं, बस सत्संग सुनिए। सुनके आत्मचिंतन। क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना है। कुछ नहीं करना। विचार आता है ना, उसका थोड़ा, वह आने दो, आने दो। आपको यहां बस, आप चाहे बैठो, चाहे खड़े रहो, कुछ करना नहीं। यह ध्यान रखना। कुछ ना करने में रहना है। बस बात खत्म। और कोई भी जरूरत हो तो मुझसे बोलना।
मुद्रा में बैठिए, थोड़ा वह आपके ऊपर है। फिर वही करना हो जाएगा। मुद्रा में क्यों बैठोगे? खुल जाओ ना, छोड़ दो। मुद्रा करके तो आ गए ना, थक गए ना। मुद्रा करके कुछ हुआ क्या? अभी मुद्राएं करके, विधियां करके नहीं थके हो? क्या आप विधियां कर-कर के थके हो या नहीं? थके हो तो फिर और एक नई विधि क्यों? अभी तक यही बात है। तो यहां कुछ नहीं करना है। बस सत्संग सुनना है, और यहां के सिस्टम में रहना है। और अगर कोई भी प्रश्न हो, कुछ भी अगर आपको पूछना है, तो मुझसे पूछना। यहां सब साधक हैं। कोई भी आपको जरूरत पड़े, मुझे आप बोलिएगा। और यहां एक दिन से लेकर आजीवन रह सकते हो। नियम, इसी नियम में यहां रहना है। कुछ ना करने में रहना।
यहां जब भोजन बनाया जाता है तो हम अपना भोजन खुद बनाते हैं। आप लोग अपना भोजन मिलकर बनाते हैं। यहां कोई भोजन बनाने वाला अलग से नहीं है। यहां पर भोजन सब मिलके बनाते हैं, अपने लिए, स्वयं के लिए।
सब कुछ फिक्स है। फिक्स करने में हम फंस गए। काश हम जीते। तो बस जियो। और राग-द्वेष से मुक्त होने के लिए काम करो। और जितना कर दिया, कर दिए उसकी भरपाई करो। ईमानदारी अपनाओ। सत्कर्म करके, जब आप ईमानदारी अपना लोगे तो आगे का बंधन बंधे नहीं। और सत्कर्म द्वारा पिछला आपका निकलेगा। बस यही यात्रा है।
जैसे मान लीजिए आपने बेईमानी की। किसी से की। अकेले तो नहीं कर सकते। और जब आपने किसी से बेईमानी की, तो उसने क्या किया? अनेक तरह की बददुआ आपको दी। आपके साथ भी कोई करेगा तो आप ही यही करोगे। फिर इसके बाद अब क्या हुआ, कि अब आप ईमानदारी अपना लिए। बेईमानी का त्याग कर दीजिए। अब सत्कर्म किए, जरूरतमंद की सेवा की, तो सत्कर्म हो गया। उन्होंने अनेक तरह के, रोम-रोम से आपको आशीर्वाद मिला, तो उसकी सफाई होने लगी। एक समय ऐसा आएगा, उस मूल स्थिति में पहुंच जाओगे। सत्कर्म से पिछले वाला कर्म का नाश होता है, बस खत्म। और एक समय ऐसा आएगा, आप उस मूल स्थिति में, अपनी परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे। फिर ना आपके जीवन में ईमानदारी रहेगी, ना बेईमानी रहेगी। जितना सत्कर्म ज्यादा करता है, उतना जल्दी। जब तक सत्कर्म करना पड़ेगा, जब तक पूरी सफाई ना हो जाए। पूरी सफाई हो गई तो सब खत्म, कर्म खत्म।
सत्कर्म से पुराने कर्म खत्म होंगे, पुराने विकार खत्म हो जाएंगे। हां, आत्मज्ञान के बाद भी कर्म होता है, लेकिन कर्ता का भाव नहीं रहता। निमित्त बन जाता है। तो बंधन नहीं बनता। फिर वह निकल लेता है।
आप अगर बीस रुपये किलो वाला लेकर चार रुपये वाला खा रहे हो, और एक रुपये वाला बांट रहे हो, तो यह सत्कर्म नहीं है। आप एक रुपये वाला खाकर बीस रुपये किलो वाला बांटो।
हां, हजार करोड़ रुपये बेईमानी से कमा लिया। कमाने के बाद समझ में आया, मैंने जो भी किया है गलत करके पूरा कमाया है। अभी वह सत्कर्म में लगाना है। सत्कर्म में लगाए तो उसका थोड़ा-थोड़ा तो असर पड़ेगा। अगर पूरी तरह बेईमानी छोड़ के, समर्पण करके लगा रहा है, कुछ असर पड़ेगा। लेकिन भोगना पड़ेगा, तो ठीक है।
लोग देने के लिए तैयार हैं, तो नहीं। मैं तो सीधा मना कर देता हूं। मुझे नहीं चाहिए। मुझे नहीं चाहिए। कहीं भी दे दो। कहीं भी दो। हमसे क्या मतलब। बहुत सारी चीज है, दो। हमें नहीं चाहिए।
और पहली बात, आप राशन का बोल रहे हो, कि राशन का हम लेकर और किसी को बांट देते हैं। पहली बात तो, जब आपकी वह स्थिति है ही नहीं, तो आपको राशन लेना ही नहीं चाहिए। लेना ही बेईमानी है। क्योंकि अगर सरकार किसी को राशन दे रही है, तो जरूरतमंद को दे रही है। और अगर आप लेकर किसी और को दे रहे हो, तो आप तो सीधा बेईमानी कर रहे हो। बेईमानी है।
ब्रह्मचारी आप हो कि शरीर है? अगर आप हो तो रोल है। और शरीर है तो वही आपका पतन होगा। ब्रह्मचारी आपको होना है। ईमानदारी, ब्रह्मचर्य। यही तो गड़बड़ हम कर दे रहे हैं। शरीर का ब्रह्मचर्य रख रहे हैं। जहां ब्रह्मचर्य रखना चाहिए, वहां नहीं रख रहे हैं। जिस ब्रह्मचर्य से हमें लाभ होगा, वह नहीं रख रहे।
शरीर के ब्रह्मचर्य से अगर कुछ हो जाता, तो जितने पागल, जितने मंदबुद्धि थे, सब उपलब्ध हो जाते। उन्होंने तो खर्च नहीं किया। सब बचा के रखा है। उन्हें पता ही नहीं है। लेकिन उनके शरीर में ऊर्जा तो है। समझ की जरूरत है। ऊर्जा से नहीं। शरीर को चलाने के लिए, कामकाज करने के लिए ऊर्जा की जरूरत है। लेकिन अध्यात्म में समझ की जरूरत है।
बस कुछ नहीं चाहिए, आ जाओगे। आखिर में पहुंच जाओगे।
आनंद की स्थिति में स्थिर नहीं होना है। जब आप स्थिर होंगे, तभी आनंद आएगा। आनंद में स्थिर नहीं होना है। होंगे तभी आनंद आएगा।
मोह हमें उससे होता है, जो कोई व्यक्ति इस जीवन में हमारे तरीके से हमें देता है, तो उसके प्रति मोह हो जाता है। तो अपने तरीके से चाहिए, उसका त्याग करो। और लेने का भाव छोड़ के देने का भाव बना दो, तो मोह खत्म हो जाएगा, धीरे-धीरे।
और लोभ हमें तब आता है, जब हम गाड़ी से जा रहे हैं। जब तक हमारे सामने से छोटी गाड़ी जाती है, हमें कोई दुख नहीं होता। जैसे ही बड़ी गाड़ी गई, लोभ आ गया। लोभ हमें दूसरों को देख के जागृत होता है। तो आप देखो, क्या इसकी मेरे जीवन में जरूरत है। जरूरत है, तो योग्यता है। अगर जरूरत है तो योग्य बनिए, और लाइए। और जरूरत नहीं, तो लेकर करोगे क्या। बस सीधी सी बात है।
यह तो जब हम उस स्थिति में पहुंचेंगे, तब आप भी अनुभव करोगे। उस स्थिति से हर व्यक्ति जाने वाला है।
मन क्या है। क्या है, यह नहीं बताया जा सकता। क्या है में काम करता है। जैसे बाल बाल है। अब बाल क्या है? बाल बाल है। बस खत्म। सर पर है, इधर भी है, नहीं, हर जगह है। बाल बाल है। अब बाल का खाल मत उधेड़ो। कुछ नहीं मिलेगा। बाल में खाल नहीं होता। होता है, लेकिन आप क्या कर रहे हो, पता है? बाल की खाल उधेड़ने में लगे हो।
आत्मज्ञान कभी भी आप करवा सकते हो, गुरु कृपा से।
ईमानदारी क्या है, और कैसे करें। आप बस कर्म करते हुए इतना ध्यान रखिए कि छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड, यह ना हो। बस ईमानदारी होगी। आप यह मत करो।
साधना कैसे करें। साधना का मतलब होता है अपने आप को सुधारना। तो बिगड़ने वाला काम मत करो, यही है साधना। आप बिगड़ने वाला काम बंद कर दीजिए, यही है साधना।
योग्यता से अधिक का मतलब। आप दुकान पर गए, तो आपको सामान लेना है। पता है कितने का है। तो जितना जेब में पैसा हो, उतना लो। अगर योग्यता से ज्यादा चाहिए, जेब में पैसा कम है और सामान ज्यादा चाहिए, तो दुकानदार से फिर मिला-जुला के, मिलावटी बात करनी पड़ेगी। दुकानदार ने दिया तो कहोगे, दुकानदार बहुत अच्छा है, प्रचार करोगे। नहीं दिया, कहोगे बहुत बुरा है। और ना बुरा है, ना अच्छा है। दुकान खोल के बैठा है। पैसा दो, और सामान ले लो। लेकिन दुकानदार को भी आपने अच्छा-बुरा बना दिया। तो प्रकृति दुकान की तरह है। जैसा आप करते हो, वैसा आपको परिणाम मिलता है। और आप हो सेटिंग के चक्कर में।
सेटिंग के चक्कर में, मुक्ति चाहिए तो जुक्ति लगाना छोड़ दो। जुआ लगाना छोड़ दो। बस बात खत्म। जुआ ही तकलीफ देता है। आपको परेशान किया, आपका जीवन अशांत किया। जुआ ही है। आप हर जगह जुआ लगाते हो। यह छोड़ दो। जुआ लगाना, सेटिंग करना छोड़ दो। सेटिंग में राग-द्वेष पैदा होता है। सेटिंग हो गई तो राग, नहीं हुई तो द्वेष। बस सेटिंग करना छोड़ दो। और जब तक सेटिंग करोगे, ऐसे दौड़ते रह जाओगे। ऐसे दौड़ते ही रह जाओगे।
जरूरत ही नहीं है। मन आपके लिए काम ही नहीं करता। नियंत्रण कैसे करो। मन तो शरीर के लिए काम करता है। भूख लगी, भोजन पर गया। आप रोक लो? नहीं। भोजन कर लो। भोजन पर ले जाओ। नहीं जाएगा। अब आप कहो कि मैं इस रोएँ पर नियंत्रण कैसे करूं। यह रोआँ, आप कुछ नहीं कर सकते। हाथ आप हिला सकते हो, रोआँ नहीं हिला सकते। रोआँ हाथ के लिए काम करता है। हाथ इस शरीर के लिए काम करता है। और यह हाथ से भोजन खाया जाता है, इसलिए हाथ काम करता है। मतलब जितने भी अंग काम करते हैं आपके, जो हिलाने से हिलते हैं, वह इस शरीर की जरूरत है। और इस शरीर की जरूरत आपको है। इसका उपयोग आप अच्छे तरीके से करें। उतने अंग पर आपका बस है। कंट्रोल आपका पलक पर है, लेकिन इस पलक के रोएँ पर नहीं। इस बात को समझना।
अब तुम कहो कि नहीं, मैं कंट्रोल करूंगा। एक रोआँ हिला आऊंगा। पूरी जिंदगी हिलाते रहो। हिला भी लोगे तो क्या हो जाएगा? आप जितने भी मन को रोकने का काम कर रहे हो, यह रोआँ हिलाने के बराबर है। मैं कह रहा हूं, हिल भी जाएगा तो क्या कर लोगे। आप एक अपना बाल हिलाओ। हिलेगा क्या? शरीर में इतने बाल हैं। हिलेगा? जरा इस बात को समझिए। अब यही देख लीजिए। आप ना लाओ, नहीं। लेकिन हिलाओ, हिलेगा, क्योंकि यह खाओगे तो हिलेगा। इसलिए समझो, हर अंग का कोई मतलब है। अगर वह हिल रहा है तो उसके पीछे भी कुछ काम कर रहा है। नहीं तो नहीं हिलता। वह जरूरत के लिए बनाया गया है। आप बेमतलब का उसे रोक रहे हो। अब रोएँ से कोई ना आपको लाभ होगा, ना हानि होगी। वह शरीर के लिए काम कर रहा है। इस हाथ के लिए काम कर रहा है। आप इस पर कंट्रोल नहीं कर सकते। अगर आप इस पर कंट्रोल करने लगो तो आप भटक जाओगे। इस बात को समझिए।
अब आंख पर पलक है। इसका कंट्रोल आपके हाथ में नहीं है। यह आंख के लिए काम करता है। और देखो, वह अपने आप काम करता है। कुछ देर आप इसे रोको, या अपने तरीके से हिलाओ। आप घबरा जाओगे। करके देखिए। कुछ देर आप ऐसे इसे हिलाओ। देखो, यहां सब अपने आप काम कर रहा है। बेमतलब का परेशान। बेमतलब जिंदगी मिली थी जीने के लिए। क्या आपने अपने तरीके से चलाने के चक्कर में बर्बाद कर दिया। आप मालिक बनना चाहे, कि मैं जैसा चाहूं ऐसा रोआँ हिले। नहीं, कुछ नहीं होगा। ऐसे हिलाते रहो। मन शरीर के लिए काम करता है, आपके लिए नहीं करता। आप इस बात को समझिए। आप बेमतलब का परेशान। अब कोई बोले कि मैं नाक को हिलाना चाहता हूं। तो यह पालन नहीं। नाक अपना काम कर रहा है। सब यहां अंग अपना-अपना काम कर रहे हैं। वैसे मन अपना काम कर रहा है। आपको क्या करना है, वह देखो। जिंदगी जीने के लिए मिली है। आप बेमतलब अंगों को रोक रहे हो। अब कोई बोले कि नहीं, इस पलक के रोएँ को मुझे अपने तरीके से हिलाना-डुलाना है। जिंदगी भर कर पाएगा क्या? अच्छा कर लिया तो क्या होगा? मैं बता रहा हूं क्या होगा। अगर आप शरीर का रोआँ या बाल हिला दिए, कि भाई चल, ऊपर खड़ा हो जा। खड़ा हो गया। अच्छा, इससे क्या हुआ? कुछ नहीं। मैं कह रहा हूं, आपके कहने से, इशारे से नाचने भी लगे। खड़ा हो जा, खड़ा हो जा। गिर जा, गिर जा। अच्छा, क्या हुआ? क्या मिला? बस यही है। आप यही कर रहे हो। मतलब वह काम कर रहे हो जिससे आपको लाभ भी नहीं है।
वैसे जिंदगी में आपने पाल के रखा है मान की इच्छा, दिखावा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा। इन चारों से लाभ नहीं है। लेकिन नहीं, पाल के रखे हो। इसी से तो मैं खड़ा हूं। इसको तो मैं जाने नहीं दूंगा। चार को हटा दो तो आप खत्म। पूरी जिंदगी चारों के चक्कर में। ये चार को छोड़ दो। अगर आपने चार की इच्छा छोड़ दी, तो छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड, आप कर भी नहीं पाओगे। यह चार के लिए आपको करना पड़ता है। और ये चार छोड़ भी नहीं रहे, और किसी से कह भी नहीं सकते। आप किसी से खुल के, माइक पर बोल नहीं सकते, कैमरे के सामने, कि मैं इसके लिए जीता हूं। शर्म आएगी। अपने परिवार तक से नहीं कह सकते। मतलब इसको हर व्यक्ति घुमा-फिरा के पाल के रखा है। लेकिन किसी से नहीं कह सकता। ये चारों तो आपके हाथ में हैं। छोड़ क्यों नहीं रहे। तो फिर वही। अच्छा, इसके लिए साधना की क्या जरूरत है? यह छोड़ने के लिए कोई साधना की जरूरत है? लेकिन नहीं। यह नहीं छोडूंगा, और साधना करूंगा। यह नहीं छोडूंगा, और साधना करता रहूंगा। फिर ऐसे भटकते रह जाओ।
संत ने कहा था। एक-दो संत की बात हो रही थी। तो उन्होंने कहा, तुम कौन सी सिद्धि प्राप्त कर। तुम कौन। पानी पर चलना। हां, बस वही, पानी पर चल देते हैं। वो बस बोले, इसके लिए कितने साल लगाए? बोले, इसके लिए मैंने बीस साल लगा लिए। तो दूसरे संत नाव में बैठते हैं, और जाके गंगा जी के पार हो जाते, और नाव वाले को बीस रुपये देते। बोले, मैंने सिद्धि के बीस साल लगाए। तब बताओ, कोई मतलब नहीं है। अच्छा, इससे मतलब भी क्या है? मैं बोला, इससे क्या फायदा है? लाभ समाज को, और आपको क्या? अहंकार को। कुछ नहीं। बस और क्या। अच्छा, लाभ तो। ऐसे हिलाते रहो। मतलब बेमतलब का हम काम कर रहे हैं। बेमतलब का, जिसका कोई मतलब ही नहीं है जीवन में। तब भी हम काम कर रहे हैं। अपने जीवन में भी हो रहा है। सामाजिक जीवन में बहुत हो रहा है। चार को छोड़ दो। बात खत्म।
अब आपको जवाब मिल गया होगा। ये चारों को छोड़ दो। यह तो आपके ऊपर है करना। जब बोलचाल करें, लेन-देन करें, उसमें ध्यान रखें।
जरूरत में जीना, इसे कहते हैं जिंदगी जीना।
आत्मज्ञान के बाद भी विचार पहले की तरह आते-जाते रहते हैं। पहले आत्मज्ञान तक तो पहुंचो। सब हमसे ही पूछ लोगे। पहले उस स्थिति तक पहुंचो। उस स्थिति तक कैसे पहुंच जाओ, उसके लिए हम आपको मार्ग बता रहे हैं।
निर्विकार होने की। राग-द्वेष से मुक्त होने की।
बेईमानी करना बंद कर दो। कर्म करते हो, बस इतना ध्यान रखो कि छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड ना हो। और इससे भी गहराई में जाना है, तो बस आप मान की इच्छा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा, दिखावा, और बड़ा-छोटा बनने की इच्छा का त्याग कर दो। आप बेईमानी कर भी नहीं पाओगे। कर ही नहीं पाएगा। अगर आप ये चार चीजों का त्याग कर दो जीवन से, तो आप कर भी नहीं पाओगे। और यह त्याग नहीं किया, तो फिर आपको बेईमानी करनी ही पड़ेगी, चाहे कुछ भी हो जाए।
गाड़ी लेके आ गया। चार को दिखाने का मन करता है। वह दिखावा आगे आता है, अंदर से आता है। वह खत्म करना पड़ेगा। नहीं, जरूरत भी हो सकती है। जरूरत भी हो सकती है। वह जरूरी नहीं। अगर हम अच्छे कपड़े पहन रहे हैं, अच्छी गाड़ी का उपयोग करें, अच्छे मकान का उपयोग करें, हमारी जरूरत भी हो सकती है। आखिर हमारे पास वैभव तो रखेंगे क्या। मन में आ गया, मैं दिखाऊं। अब वह आपके ऊपर है, कि आप अपनी जरूरत के लिए लिए हैं, कि आप दिखाने के लिए लिए हैं। वह आपके ऊपर है। वह आपको देखना है, कि मैं किसी और को नीचा दिखाने के लिए इसका उपयोग कर रहा हूं, या मैं इसका उपयोग अपनी मस्ती के लिए कर रहा हूं। बस यह आपको देखना है। यही कंडीशन है। ये चारों में अप्लाई होता है।
राम भगवान आए, कृष्ण भगवान आए। उन्होंने भी तो बोलते हैं, लग्जरी से लग्जरी लाइफ जी के गए। नहीं। पूरा वीवीआईपी, वीआईपी, वही सब। है उनके आगे। उन्होंने क्या नहीं उपयोग किया अपने जीवन में। पांच प्रकार का माल खाया। लेकिन ईमानदारी से जिए। क्या नहीं किया उन्होंने। विवाह नहीं किया? बच्चे नहीं पैदा किए? सब कुछ किया। राजा नहीं बने? क्या नहीं किया। ईमानदारी से किया। बस यही बात है। ईमानदारी से किया। ये चार चीजें लोग बेईमानी से करना चाहते हैं। करना है, लेकिन करते बेईमानी से हैं। तो आप ईमानदारी से करो।
आप बिजनेस कर रहे हो तो बिजनेस को बिजनेस के तरीके से करो। व्यवहार मत करो। बिजनेस में व्यवहार नहीं होना चाहिए। आप बिजनेस में व्यवहार क्यों कर रहे हो। बिजनेस को, काम को काम के तरीके से काम करो। और आप दिए हो तो लेने की क्षमता भी होनी चाहिए। यह थोड़ा प्रैक्टिकल बात हो गया। आप व्यापार में व्यवहार क्यों कर रहे हो। आप कोई काम कर रहे हो तो काम के तरीके से काम को करो। काम में व्यवहार क्यों। आपको क्षमता जितनी है, उतना दो। थोड़ा जागृत होना पड़ेगा।
महाभारत में क्या सिखाया भगवान कृष्ण ने। न तो किसी का छीनो, न तो कोई छीने तो बर्दाश्त करो। यही धर्म कहता है। सारा सार उसी में आता है। और काम को काम के तरीके से करो। काम में व्यवहार क्यों। मोह में देते हैं ना, तो फिर वही तो गलती है। मेरा है। हां, तो बस वही परिणाम भोगो। फिर अगर आप काम को काम के तरीके से करोगे तो कभी फंस नहीं सकते। और काम को जब अपने तरीके से करते हो, तब आपको फंसना ही फंसना है। फसोगे ही।
अपना बनाओ ही मत। परिवार में होता है ना। बिजनेस करना है, परिवार बसाना है। बिजनेस करके घर में आता है ना, और खाओ-पियो। एक में हिसाब रखो, अलग क्या। अगर आत्मिक स्तर उठाना है, और गिराना है तो सब लपेट-लपेट के आनंद कर लो। हिसाब-किताब नहीं रखने वाला व्यक्ति परेशान रहता है। बिजनेस करता हूं, वह फैमिली पर्सनल है। फैमिली में आए, बिजनेस अलग है। ऐसे फैमिली का त्याग कर दो, जो फैमिली आपको विवश करे, परेशान करे। तो ऐसे फैमिली के पास रहना क्यों।
नहीं। क्यों? इजी नहीं है। गलत आदमी के साथ जिंदगी क्यों जीना। अच्छा, एक बात बताओ। सुनो। आपको अगर इस उंगली में कैंसर हो जाए, किसी को भी, और पक्का हो जाए कि अगर आपने इसे नहीं कटवाया तो यह पूरा शरीर खराब कर देगा, तो क्या करोगे? उधर अप्लाई नहीं होता। नहीं। क्यों नहीं होता। अप्लाई नहीं होता तो नहीं। अप्लाई करोगे तो भोगो। नहीं अप्लाई करोगे तो भोगो। होता है, आप भोगोगे। आपको भोगना पड़ेगा। अभी शरीर को बचाने के लिए उंगली कटवा दोगे। नहीं? हाथ भी अगर कटवाना हो तो शरीर को बचाने के लिए कटवा दो। अगर मेरी भावनाओं को कोई नहीं समझ रहा है, अगर मुझे ईमानदारी से नहीं जीने दे रहा है, तो अपना हो ही नहीं सकता। तो ऐसे व्यक्ति, ऐसे जगह का त्याग कर देना चाहिए। बात खत्म। अगर कोई व्यक्ति मुझे गिरा रहा है तो अपना कहां हुआ। अपना तो उठाता है ना।
यह बात मैं इसलिए बोला। पिता हो, माता हो, बेटे का हो, बेटी का हो। दूसरे के घर शादी करते हैं ना। बाद में भी उधर, वो पैसे दे दो, ये पैसे दे दो, थोड़ा हेल्प करो। ऐसा करता है। वही फैमिली सेंटिमेंट। लेकिन मैंने कहा, त्याग ही परम सुख है। उन व्यक्तियों का त्याग कर दो, उस जगह का त्याग कर दो, जो लोग मुझे समझते नहीं। वो लोग एडवांटेज लेते हैं। ये लोग देने का फोर्स करते हैं। उसका त्याग ही परम सुख। करना पड़ेगा। और नहीं तो भोगो।
बंधन कैसे बनता है। अपने तरीके से जब मुझे कुछ चाहिए, तो उसमें बंधन बनता है। या तो राग का, या तो द्वेष का। तो अपने तरीके से चाहिए, उसका त्याग करें। उचित तरीके में जियो। योग्यता से ज्यादा जब आपको मिलता है, तो उसमें राग-द्वेष होता है। योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करो।
लोगों के उकसाने पर क्रोध क्यों होता है। उकसाने पर इसलिए क्रोध होता है कि आपको बैक सपोर्ट मिल जाता है, और सामने वाला कमजोर रहता है, तब आपको क्रोध आ जाता है। पहले क्रोध इसलिए नहीं आया। क्रोध तो आया, लेकिन बाहर इसलिए नहीं आया कि वह मजबूत था, आप कमजोर थे। और जैसे ही आपको बैक सपोर्ट मिल जाता है, आप उस पर क्रोध कर बैठते हो।
नहीं। वह प्राकृतिक हुआ। इसके जिम्मेदार आप नहीं। अगर आप पहले से प्लानिंग करते कि मैं यहां यह डाल रहा हूं, और इन चींटियों को फिर कुत्ता आएगा और चाटे, तब आप गलत हो। यह तो प्राकृतिक हुआ।
ईमानदारी और सत्कर्म करो। मूल यही है। और ध्यान में ध्यान करो। अभी तक ध्यान ही कर रहे हो। ध्यान में ध्यान करो। जब भी आप कुछ कर रहे हो, इतना ध्यान रखो, कोई गलती ना हो जाए। यही है ध्यान में ध्यान।
आलस्य। अब आलस्य की वजह से अगर आप कर नहीं रहे हो, तो वह काम आगे बढ़ेगा नहीं। वही रुक जाएगा। तो रुकावट तो आ ही गई। इसलिए आलस होना ही नहीं चाहिए। शारीरिक, मानसिक दोनों। क्योंकि मानसिक तो आप फैसला लेते हो, मुझे यह करना है। और करते किससे हो? शरीर से। शरीर से करते हो ना। तो मेन तो अभी आपके लिए शरीर ही है। अभी मानसिक वाली स्थिति पर पहुंचे नहीं हो। मानसिक वाली स्थिति पर व्यक्ति आत्मज्ञान के बाद पहुंचता है। अभी तो हमें बाहर से छुड़ाना है। अभी तो शारीरिक ही करना पड़ेगा। शारीरिक आलस शरीर की असमर्थता से भी आता है। तो बीच में रुकावट है, तो उसके लिए शारीरिक सुधार करना सही है। हां, शारीरिक सुधार करिए। लेकिन अगर आप साधना करेंगे तो वह शरीर अपना सुधार कर लेगा। अगर आप उसे उस जगह ले जाएंगे, तो धीरे-धीरे आप देखेंगे, आप स्वस्थ भी होते जाएंगे। आप किस तरफ बह रहे हो, किस तरफ जा रहे हो। आप मजबूत होते जाएंगे। और पता चला, उस कमजोरी की वजह से आप कर नहीं रहे, तो आप और कमजोर हो जाओगे। मानसिक भी कमजोर होंगे, शारीरिक भी हो जाएंगे।
मैं आप लोगों को एक बात बताता हूं। यही सब। मौजूद हो। गर्मी में बाथरूम लगता है तो आप तुरंत उठकर चले जाते हो। लेकिन ठंडी में जब बाथरूम लगता है तो आप नहीं जाते हो। क्या आपसे, आपके शरीर में ताकत नहीं रहती? खूब रहती है। आप घंटों नहीं जाते हो। बहुत जब तेज लगती है, तब जाते हो। अब बताइए तो। जबरदस्ती वाला आलस है या नहीं। इसका तो अनुभव सबको होगा। मुझे भी है। बाद में उठेंगे, तभी जाएंगे। अब यह आलस जबरदस्ती है या नहीं, बताओ। तो ऐसे ही हम आलस करते हैं। जहां पर जरूरत नहीं। और यह बचपन से है। अभी भी होगा। यही, नींद कब आती है। वही तो, नहीं चाहता तो नहीं सोना है। एक झापड़ मार लेना अपने मुंह पर।
महान व्यक्ति अपने पर अनुशासन करता है। कमजोर व्यक्ति दूसरों पर अनुशासन करता है। यह ध्यान रखना। जिंदगी में याद रखना। महान व्यक्ति कभी आप पर अनुशासन नहीं करेगा। महान व्यक्ति स्वयं पर अनुशासन करता है। वही महान होता है। और कमजोर व्यक्ति हमेशा दूसरों पर अनुशासन करना चाहता है। यह आप ध्यान रखना। यह तो आप देख लेना, कि आप कमजोर हो कि महान हो। आप महानता की तरफ जा रहे हो कि कमजोरी की तरफ जा रहे हो। आप ध्यान रखना।
आलस में इधर दो टाइम खाना करके, इधर कुछ करना नहीं है। यह आलस में आता है। यही भी आलस में। आप रहो तो समझ में आ जाएगा। कुछ करना नहीं आता। अगर कुछ करे तो आलस्य में आ जाएगा क्या। जब कुछ नहीं करना है तो बस आप कुछ ना करने में जियो। अगर कोई व्यक्ति इस नियम को बनाया है, कुछ समझ के बनाया होगा। आप उसमें जियोगे तो समझ में आएगी। आलस्य तो वह है। आपके लिए जरूरी था, आपने कह दिया था, और कर नहीं रहे हो, और आप करने लायक भी हो। वह आलस्य है। अगर आप करने लायक नहीं हो, तब आप नहीं कर पा रहे हो, तो वह आलस्य नहीं है।
जैसे किसी का शारीरिक वजन बहुत है। इच्छाएं साधक बनने की हैं, और रास्ते पर चलने की इच्छा। लेकिन जो शरीर है, वह साथ नहीं दे रहा। क्योंकि वह कई सारी वजन के कारण। शारीरिक दिक्कतें शरीर में आना शुरू हो जाती हैं। उस कारण से व्यवहार बदलता है। अगर वह सही रहे तो उसका व्यवहार अलग रहेगा। शारीरिक वजन कम हो तो उसका व्यवहार अलग रहेगा। यह मैंने अनुभव किया है। तो उस व्यक्ति को अपनी साधना के लिए अपने आप को सही करना सही है। एकदम सही करना ही चाहिए। अगर कुछ करने से हमारा हित हो, या और किसी का हित हो, तो जरूर करना चाहिए। करना ही चाहिए।
अगर आपको लग रहा है कि मैं यह करने से मेरा हित होगा, तो आपको जरूर करना चाहिए। और आपको लग रहा है कि मैं कर भी सकता हूं, तो तब जरूर करना चाहिए। तब तो पीछे हटना ही नहीं चाहिए। लेकिन आप विवश हो। आप प्रयास किए, नहीं हो पा रहा है, तब बात अलग है। फिर आपका कोई न कोई आपकी मदद कर ले। यह भी बात आपको बता दूं। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। जब आप किसी भी कार्य के लिए पूरी तरह प्रयास करते हो, और आपसे विवश हो जाते हो, लाचार हो जाते हो, नहीं होता है, तो कोई व्यक्ति आकर आपकी मदद कर देता है। जैसे मान लीजिए आप कोई बोझ उठा रहे हो, आप बड़े परेशान हो, और उठा-उठा के नहीं उठा पा रहे, तो कोई व्यक्ति देख के आता है और कहता है, मैं उठवा देता हूं।
कोई व्यक्ति रोड पर गिर जाता है। उस समय लोग कुछ नहीं देखते हैं। उसको गोद में उठा के उसके घर तक, या हॉस्पिटल तक पहुंचाते हैं। पहुंचाते हैं कि नहीं पहुंचाते। आपने ऐसा दृश्य देखा भी होगा, या किया भी होगा। और अगर वही व्यक्ति सामर्थ्यवान होता, और कहता मुझे ले चलो, आप ले जाते? अगर वही व्यक्ति नहीं गिरा होता, और वह बोलता कि मुझे ले चलो, मेरे घर तक छोड़ दो, गोद में उठाकर आप छोड़ते? कारण पूछते। क्यों? बोल देता, ऐसे ही, मैं स्वस्थ हूं, जा सकता हूं, लेकिन मुझे गोद में उठा के आप छोड़ दो। छोड़ोगे नहीं। लेकिन अगर वह डोल नहीं पा रहा है, तो जरूर आप किसी तरीके से उसकी मदद करो। कि ठीक है, मैं आपको आपके घर तक तो पहुंचा दूंगा। यह मानव का कर्तव्य है। यह करेगा ही।
बुरे वाला काम मत करो। दबा के देख लो। आप जब किसी को दबा रहे हो, तो उसके साथ आप भी तो जा रहे हो। आप उसके साथ आप भी तो जा रहे हो। तो आप भी तो गिर रहे हो। आपको समझ में नहीं आ रहा, आप भी तो गिर रहे हो।
जरूर कमाना चाहिए। ईमानदारी से खूब कमाओ।
हां, ईमानदारी से सोचना चाहिए। और ईमानदारी से काम करके, उनके लिए अगर कुछ कर सकते हो तो करो। उन्हें संस्कार दीजिए। बच्चों को संस्कार देना सबसे जरूरी है। आज लोग क्या कर रहे हैं। बच्चों को बस वैभव दे रहे हैं, और संस्कार नहीं बना रहे। उनको समय ही नहीं देते। इसलिए वृद्धाश्रम बढ़ता जा रहा है।
अपने आत्मिक कल्याण के लिए आप साधना करिए। निर्विकार होने के लिए काम करिए, तो गुरु प्रसन्न रहता है। प्रसन्न तो है ही, अभी भी है। लेकिन लापरवाही करोगे तो बर्दाश्त नहीं करेगा। आपके कल्याण में ही उसकी प्रसन्नता है। आप यह कभी मत सोचना कि मैं उसके लिए कुछ कर सकता हूं। नहीं, क्योंकि उसे तो कुछ नहीं चाहिए। आप उसके लिए कुछ भी नहीं कर सकते। उसके लिए अगर करना है तो बस आप अपने आप को निर्विकार करा लो। बस बात खत्म। कर दिया आपने उसके लिए।
आप जो भी कार्य कर रहे हो, उस कार्य में एक तो लगेगा धन की ताकत, एक लगेगी आपकी शरीर की ताकत, और एक लगेगा ज्ञान की ताकत। देखिए, अगर डर लग रहा है तो कहीं न कहीं तीनों में से एक कमी है। तभी आप आगे नहीं बढ़ पा रहे।
ईमानदारी से पारिवारिक कर्तव्य भी करो, और साधना भी करो।
जब आपके द्वारा काम हो रहा है, तो उस काम के पहले आपका ध्यान वहां गया। उस काम को ध्यान से करिए। यही ध्यान में ध्यान है।
रात को ध्यान कर सकते हैं। कभी भी कर सकते हैं।
ध्यान में झटके लगते हैं। बस उसका इलाज कराओ। झटके क्यों लगते हैं। कहीं और तो तकलीफ शरीर में नहीं है?
ईश्वर के बारे में कुछ बोल नहीं सकते। ईश्वर बताएगा।
मुक्ति उससे होती है जो बंधन में है। अब देख लो, बंधन में कौन है। यह आपको देखना पड़ेगा।
माता और पत्नी में बहुत झगड़ा होता है, तो सब अलग-अलग चले गए हैं। माता अलग, पत्नी अलग। तो आप भी अलग निकल लो। फिर आप क्या कर रहे हो। जब आपको छोड़ के चले गए, आपके लिए तो अच्छा मौका है अपनों की कुटिया में आने का। सब छोड़ ही दिए, तो आप क्या पकड़ के बैठे हो। सबने आपको छोड़ दिया। अपनों की कुटिया का निमंत्रण है। आ जाइए। एक दिन से लेकर आजीवन तक। आपके लिए तो बहुत अच्छा मौका है। छोड़ दिया। आपको छोड़ना नहीं पड़ा।
जितने लोग आत्मिक कल्याण के लिए साधना कर रहे हैं और जितने लोग चाहते हैं कि मेरा आत्मिक कल्याण हो जाए, उनको विशेष यह ध्यान देना है कि मेरे द्वारा सत्कर्म हो। हर व्यक्ति को देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में जीने का तरीका आना चाहिए, तभी तुम पार कर सकते हो। अगर हर मौके पर तुम चाहो कि मुझे कोई बताए, तो तुम आगे मोक्ष की तरफ बढ़ ही नहीं सकते, क्योंकि अपाहिज व्यक्ति को जहां कोई छोड़ता है, वहीं रुक जाता है। अपाहिज मत बनो, चाहे वह शारीरिक हो चाहे मानसिक हो। अपाहिज व्यक्ति को जहां तुम छोड़ दो, वहीं खत्म हो जाएगा।
और अध्यात्म एक ऐसी यात्रा है कि एक समय ऐसा आएगा कि आपको अकेले सारा फैसला लेना पड़ेगा। आपका कोई सहायक बन सकता है, चाहे गुरु हो, चाहे मूर्ति पूजा हो, चाहे माला हो, चाहे मंत्र हो, चाहे आपकी ईमानदारी हो, चाहे सत्कर्म हो। लेकिन हर देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में आपके अंदर खुद यह क्षमता होनी चाहिए कि मैं फैसला ले सकूं। हर वक्त, हर क्षण आपको कोई बताने वाला नहीं रहेगा, और आपको हर क्षण अपने कर्म के प्रति ध्यान देना है कि अगर मुझे कुछ ठीक करना है तो मैं किस तरीके से ठीक कर सकता हूं। जैसे इस काम को मैंने बोला, इसके पहले आपके अंदर आ जाना चाहिए था कि इसे कैसे ठीक किया जा सकता है। अगर मेरे अंदर आ सकता है कि उसके लिए गेट खोल दो, वह चला जाएगा, और देखो वह चुप हो गया, तो यह आपके अंदर क्यों नहीं आया? यह आपके अंदर आना चाहिए कि इसे ठीक कैसे किया जा सकता है।
मशीन की तरह जीवन मत जियो, अपने अंदर मानवता लाओ कि मैं क्या कर सकूं। अपने शरीर को देखो ना, अपने शरीर को भोग में खत्म करो या योग में खत्म करो। योग का मतलब क्या होता है? आंख मूंद के बैठना नहीं। योग का मतलब होता है साधना, और साधना का मतलब होता है कि मैं किसी के लिए क्या कर दूं। जब आप परोपकार की भावना रखते हो कि मुझे सत्कर्म करना है, मुझे परोपकार करना है, मेरे पास धन नहीं है, मेरे पास बस तन है, मेरे पास समझ भी उतनी नहीं है, तो प्रकृति तुम्हारी जिज्ञासा को लेकर व्यवस्था दे देती है। लेकिन तुम क्या करते हो? तुम बोल दोगे कि मैंने तुम्हारा ठेका लिया है? अरे, तेरा ठेका कौन लेगा? तुझे अगर कल्याण करना है तो ज्यादा से ज्यादा सेवा करेगा, तभी ना होगा। पहले तो तूने मांगा कि मुझे सत्कर्म का मौका मिले, मैं ईमानदारी से जीवन जियूं, और जब मिल गया तो कहता है मैंने ठेका लिया है, मैं क्यों करूं? तो मांगा क्यों? तब प्रकृति आपको देना बंद कर देती है।
क्योंकि कर्म करके ही आप फंसे हो, तो कर्म करके ही मुक्त होगे। आपने अपनी कामनाओं की, वासनाओं की पूर्ति के लिए काम किया और आप बुरी तरह फंस गए। अब आप ईमानदारी से सत्कर्म करोगे, तब जाकर आपका कल्याण होगा। अब आपकी इतनी पावर नहीं है कि बड़ा सत्कर्म कर सको, उतना धन नहीं है, उतनी समझ नहीं है, पर तन का बल है। तो तन का बल, जहां आप गए हो, वहां पूरा झोंक दो, जैसे कोई कहे कि मैं पूरी तरह सेवा में ही अपने आप को समर्पित कर दूंगा। लेकिन जब तुम्हें अपने आप को निकालने का, ज्यादा से ज्यादा सेवा का मौका मिला, तो तुमने क्या किया? जिसकी सेवा का मौका मिला, उसको तुम परेशान करने लगे। तो तुमसे मौका छीन लिया गया। अब क्या करोगे? अब आंख बंद करके कहीं बैठो, उससे कुछ नहीं होने वाला है।
विचार कभी गलत-सही नहीं होते। जो किए हो, वही तो विचार आ रहे हैं। विचार ना गलत होते हैं ना सही होते हैं, विचार सिर्फ विचार होते हैं। विचार आएं तो आएं, हमें क्या करना? मैं कह रहा हूं, तुम्हारे सामने कोई नंगा जाए, कोई कपड़ा पहन के जाए, कोई शराब पी के जाए, तुम्हें क्या मतलब? विचार तो आएंगे कि कोई नंगा जा रहा है, उसने लाल कपड़े पहने हैं, वह यह कर रहा है। विचार तो आएंगे, लेकिन हमें क्या मतलब? उन विचारों के साथ मुझे जाना नहीं है, क्योंकि विचारों के साथ अगर काम किए तो दोष लगा। तो इसका विशेष ध्यान देना है कि मेरे शरीर के द्वारा वह काम ना हो।
उसी का तो हमें पता लगाना है। जब मैं शरीर के द्वारा कामनाएं छोड़ दूंगा, अभी शरीर के द्वारा कामनाओं की, वासनाओं की पूर्ति कर रहा हूं, जब वह मैं छोड़ दूंगा, तब। क्योंकि जब तक मैं शरीर के द्वारा कोई कामना कर रहा हूं, तो यही मेरा घर है। अगर मैं कामना छोड़ दूंगा तो मैं यहां से मुक्त हो गया, तो इसके बाद मैं अपने घर जाऊंगा। लेकिन पहले यह छोड़ो। कामना छोड़ने के बाद ही जा सकते हो, पहले कैसे जाएंगे? तब तक तो यही घर आपका है ना। आधी छूट गई और कुछ बची, तो एक रत्ती भी बची है तो आप यहीं हो। मैं कह रहा हूं, किसी का बहुत बड़ा मकान है, किसी की एक झोपड़ी है, तो दोनों को घर ही बोला जाएगा ना। किसी का कई किलोमीटर में घर हो और किसी की एक झोपड़ी हो, दोनों को घर ही बोलोगे। तो चाहे इतना हो चाहे इतना, अगर तुममें मोह है, वासना है, तो तुम यहीं हो। वासना मतलब रस लेना; बेईमानी से कुछ भी पाने की इच्छा है तो वह वासना है। ईमानदारी से कुछ पाने की इच्छा वासना में नहीं आएगी, वह तो जरूरत है, चाहे मेरी जरूरत, चाहे उनकी जरूरत जो लोग मुझसे जुड़े हैं। तो बस कामनाओं से मुक्त हो जाओ।
यह भी हो सकता है कि मेरा घर कल्पना में हो, वास्तव में नहीं हो। तो इस घर से परेशान हो या नहीं हो? ऐसा तो नहीं कि इस घर में बड़े आनंद में हो। जिस घर में हो, उसमें बड़ी घुटन है। तो पहले यह घर छोड़ो। कल्पना ही सही, छोड़ने के बाद पता तो चल जाएगा, कम से कम वह भ्रम तो मिटेगा। कोई रिस्क तो नहीं है ना कि बहुत बड़ा महल छोड़ रहे हो जिसमें आनंद है। जिस घर में तुम रह रहे हो उसमें बहुत घुटन है, तो पहले वहां से छोड़ो। अगर वह घर कल्पना भी होगा तो पता तो चल जाएगा, तुम मुक्त तो हो गए, भ्रम तो टूटा ना। कोई रिस्क नहीं है, हमारे पास कुछ है ही नहीं। क्योंकि जहां मैं हूं, अगर दुखी हूं, तो वैसे छूट जाए तो ज्यादा अच्छा है, दुख मिटेगा। अगर पीछे कुछ नहीं है तो भी मैं तो हूं, दुख से तो मुक्त हुआ। और अगर मैं जहां हूं वहां प्रसन्न हूं, तो सवाल ही नहीं उठता; तब तो कोई घसीटे तो भी नहीं जाओगे, शरीर से जाओगे, मानसिक नहीं जाओगे। और अगर छूटोगे तो वहीं जाओगे।
वासना छोड़ते ही बीच में कोई स्टेशन नहीं आएगा; या तो यह घर, या तो वह घर। आप बोलते हो कि छोड़ने में स्टेशन है, तो जब आप छोड़ रहे हो, आपके पास एक घर थोड़ी है, बहुत सारे हैं। आपके पास घर ही घर हैं। एक घर तो भौतिक दिख रहा है, इतने घर हैं कि आपको खुद नहीं पता। अनेक पिंडों में घुसे हुए हो। हो सकता है सामने वाले को भी पता ना हो। जीवन में बहुत लोग ऐसे हैं जिनसे मेरा राग-द्वेष है और उनको पता नहीं है। जैसे अपने दोस्तों में शादी तक की बात कर लेते हैं और जिससे शादी करनी है उसे कुछ नहीं पता; स्कूल-कॉलेज में ऐसा ही होता है कि यह तुम्हारी भाभी, वह तुम्हारी भाभी, और उस भाभी को कुछ नहीं पता, और वह किसी और की भाभी बन गई।
अंदर उथल-पुथल हो रही है, लेकिन आप क्या करते हो, वह करो। आप पीछे मत हटो। लेकिन अगर आप भी विचार का साथ दे दोगे तो आप भटक गए। आप क्या करते हो, उससे परिणाम आता है ना; आप क्या सोचते हो, उससे परिणाम नहीं आता। परिणाम तो हमेशा इससे आता है कि आप क्या करते हो। आप दुकान पर गए, तुमने विचार बनाया कि मैंने सारा सामान ले लिया, तो क्या तुम्हें उसका मूल्य देना पड़ेगा? लेकिन तुमने जितना इस शरीर के द्वारा लिया, उसका मूल्य तो पे करना पड़ेगा। तो तुम क्या विचार बनाते हो, उससे कोई मतलब नहीं। आपके द्वारा काम क्या हो रहा है, उससे परिणाम आता है। तो विचार को आने दो।
बस एक ही लाइन पकड़ के रखो: ईमानदारी ना छोड़ना, चाहे फिर प्राण टूटने की भी बात आए। कुछ भी छूट जाए, आगे कुछ भी बात आ जाए, मैं तो कह रहा हूं कुछ भी, मतलब कुछ भी, प्राण भी चला जाए, ईमानदारी ना छूटे। कुछ भी हो जाए, यह पक्का; बस ईमानदारी पकड़, ईमानदारी मत छोड़ना। और जितनी ताकत है, उसके द्वारा सत्कर्म करो। ईमानदारी तो पकड़ ली, और ताकत का भी उपयोग करना है। तो ईमानदारी और सत्कर्म, यह कभी ना छोड़ना। आखिर में तुम ही बचोगे, और जब तुम ही बचोगे तो उसमें तो सब कुछ है।
इनसे संबंध जरूरत में है, और उससे संबंध जरूरत से मुक्त होने में है। इनसे संबंध शरीर तक का है और उससे संबंध मेरा है, और जब मैं इनसे संबंध छोड़ दूंगा तो मेरा उससे मिलना हो जाएगा। मैं एक ही जगह रह सकता हूं, या तो यहां या तो वहां। दो से तीसरी जगह नहीं है। तीसरी जगह हो तो मुझे बताओ, कोई नजर में हो तो बताओ। हमारी नजर में दो जगह हैं: एक तो यहां, और यहां छोड़े तो वहां।
जैसे हम नींद में होते हैं, जिसको सुषुप्ति बोलते हैं, उस समय हम कहां होते हैं? शरीर में ही सो जाते हैं, तो वह तीसरी जगह नहीं होती। शरीर को आराम दे रहे हैं, पांच तत्व में ही तो है ना। फिर स्वप्न देखते हैं, तो शरीर के द्वारा ही तो देखते हैं।
अपने घर जाने के लिए यह घर कैसे छूट जाए, इसके लिए काम करना है। प्रयास नहीं करना, काम करना है। इसके लिए मैं क्या कर सकता हूं, वह करना है। प्रयास करना ही नहीं, सिर्फ काम करना है। जहां मैं हूं, वहीं से काम करना शुरू कर देना है। प्रयास में जिंदगी चली जाएगी, मिलेगा कुछ नहीं।
कल्याण के लिए जितना सत्कर्म कर सके, कर। अपने शरीर को पूरी तरह झोंक दे। यह शरीर क्या मांगता है, पता है? आराम। लेकिन आराम में तेरा हराम होगा। इसलिए इस शरीर को पूरी तरह सत्कर्म में झोंक दे। उठने के बाद, सोने के पहले मैंने क्या किया, उससे परिणाम मिलेगा। इस शरीर को सेवा में लगा दे, जरूरतमंदों की सेवा में। तुझे क्या लगता है? सेवा ही निकालेगी ना।
गुस्सा आता है तो होना नहीं चाहिए ना। इतना मजबूर क्यों हो गया कि कोई बार-बार बोले? बोल दे कि अभी दे देता हूं, बना देता हूं। और वह अपने लिए तो बोल भी नहीं रहे थे, लोगों के लिए बोल रहे थे ना। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सेवा तो नहीं बोली। तो अपने गुस्से को हटा। ऐसा ना हो कि तेरा गुस्सा तुझे गिरा दे। जीवन में उठने का मौका मिला है, अपने कल्याण में पूरी तरह लग जा। तू कहता है कि शरीर थक गया था; हो सकता है वह तुझसे ज्यादा थका हो, तभी तो बोला। तुझे दिखा कि दोष किसका था? तेरी कमजोरी थी। चल अच्छा है, कम से कम देख लेगा तो अपने आप निकाल लेगा। कोई बात नहीं, होता है।
मुझे सोच-समझ के बोलना चाहिए कि अगर सामने वाला व्यक्ति मुझे सार्वजनिक कार्य के लिए बोल रहा है, तो हो सकता है वह मुझसे ज्यादा थका हो। वह भी मुझे कार्य करते देख रहा है और वह भी कर रहा है। हो सकता है उसे और कोई बहुत जरूरी काम हो। तो अगर मेरे पास कोई और काम नहीं है, तो मुझे वह काम कर देना चाहिए। करते हुए बहुत होगा तो मैं गिर जाऊंगा, और गिर गया तो बातें खत्म, तब तो मैं पहुंच ही जाऊंगा, तब तो कोई रोक ही नहीं सकता। काश मैं उतनी मेहनत करूं कि गिर जाऊं; अपने आप को इतना झोंक दूं सत्कर्म में कि बस मैं खत्म ही हो जाऊं। काश ऐसा हो जाए। कोई बात नहीं, उतार-चढ़ाव होता है, लेकिन कैसे भी अपने कल्याण में लग जाओ।
क्योंकि हमको हमेशा गिरना आता है, उठना भूल गए हैं। देखो, खाना हर जीव को आता है। जीव पैदा हुआ, उसे कुछ नहीं पता, लेकिन जानवर के बच्चे मां के स्तन को ढूंढ लेते हैं। लेकिन धोना सिखाना पड़ता है। वह शुरुआत जरूरत में करता है, फिर उस खाने में गिरने लगता है; खाने में ही हम गिरे हैं, खाना हम नहीं भूले। उसके पास कोई समझ नहीं है, इंद्रियों का कोई ज्ञान अभी नहीं है, लेकिन खाना उसे आता है, वह सही जगह डालता है। बहुत सारे छेद हैं, कान में नहीं घुसाता, सीधा मुंह में ही लाता है। तो कुल मिलाकर हमें अपना बिगाड़ना आता है। इसलिए बड़ा संभल के चलना पड़ेगा।
सेवा कर रहा है, उसी में आत्मचिंतन तो हो ही रहा है। अपने आप को छुड़ाने के लिए ही तो सेवा कर रहा है, तो वही तो आत्मचिंतन है। आप अपने आप को छुड़ाने के लिए क्या कर रहे हो, वही आत्मचिंतन है। इसी भ्रम में सभी लोग रहते हैं कि ऐसे बैठ जाओ, वही आत्मचिंतन है। तू सबका छोड़, अपना कल्याण कर ले और पूरी तरह अपने आप को आत्मिक चिंतन में लगा दे। आत्मिक चिंतन का मतलब है कि क्या करके मैं अपने आप को छुड़ा लूं, क्योंकि कुछ करके ही छूटूंगा।
आत्मचिंतन की जगह सेवा ही करनी है। आत्मचिंतन क्या है, इसे जरा गहराई से समझो। चिंतन का मतलब होता है कि कुछ बिगड़ गया है, उस पर चिंतन हो रहा है कि इसे कैसे बनाया जाए। आत्मा जीवात्मा हो गई है; मैं अपनी आत्मा हूं, तो मैं कैसे छुड़ाऊं? जैसे कोई गुलाम बन गया है, तो सामने वाला कह रहा है कि भाई, इसकी भरपाई कर दो तो गुलामी छूट जाएगी। वह उसकी भरपाई कर देगा तो गुलामी से मुक्त हो जाएगा। गुलाम किसी कारणवश गुलाम बना है; उसने कुछ लिया है, उसकी भरपाई कर रहा है। तो आत्मचिंतन यह है कि मैं इस आत्मा को इस भवसागर से कैसे छुड़ाऊं, और छुड़ाने के लिए काम करना पड़ेगा।
सेवा में अपने बंधन दिखते भी हैं और भरपाई भी साथ में होती है, दोनों काम होते हैं। आंखें बंद करके बैठने में केवल बंधन दिखते हैं, भरपाई कहां से होगी? तो सेवा श्रेष्ठ है, आत्मचिंतन यही है। आंखें खोल के क्या कर रहे हो, वही आत्मचिंतन है।
सीधी सी बात, अगर आप एकदम सरल भाषा में देखोगे तो मैं गुलाम हूं, अपनी इच्छा-वासनाओं का गुलाम हूं, और अपनी गुलामी से मुक्त होना चाहता हूं। तो यह जो सेवा है, यह जो काम मैं दूसरों के लिए करता हूं, जिसमें ना मुझे कोई वेतन मिलेगा और ना वाहवाही मिलेगी, वही निष्काम कर्म है। उसे करके मैं अपनी स्थिति सुधारूंगा, और जब मैं भरपाई कर दूंगा तो गुलामी से मुक्त हो जाऊंगा। दो गुलाम हैं: एक गुलामी से मुक्त होने के लिए काम कर रहा है, एक बैठा है। जो काम कर रहा है वह मुक्त हो जाएगा, और जो बैठा है वह वहीं नहीं रहेगा, उसका ब्याज बढ़ता जाएगा। हर जगह ब्याज लगता है। पूरा परिवर्तनशील संसार है, यहां मूल एक जैसा रह ही नहीं सकता; मूल सिर्फ परम सत्ता है। आप यह मत सोचना कि केवल बाहरी ब्याज लगता है, प्रकृति में भी ब्याज देना पड़ता है।
देखो कि भोग आप जरूरत में कर रहे हो या वासना में। अगर भोग को केवल जरूरत में यूज़ करोगे तो आप मुक्त ही हो जाओगे, प्रयास नहीं करना पड़ेगा।
अब यह आपको देखना है कि शादी आपकी जरूरत है क्या, क्योंकि अध्यात्म अलग है, शादी अलग है। ऐसा जरूरी नहीं कि शादी ना करो तो जन्म बच जाए; हो सकता है शादी ना करो तो भी जन्म चला जाए। हो सकता है शादी करके भी आप ईमानदारी, सत्कर्म के साथ आध्यात्मिक जीवन जियो, तो आपका वहां कल्याण हो जाएगा। और हो सकता है शादी नहीं की लेकिन बेईमानी में लगे हो, तो इससे क्या होगा? तो यह आपको देखना है कि मेरा उद्धार कैसे होगा, क्या मैं शादी करके भी अपने उद्धार के लिए काम कर पाऊंगा। ऐसा मत सोचना कि शादी नहीं करूंगा तो उद्धार हो जाएगा; हो सकता है और भी अपना पतन कर लो, अपनी ऊर्जा को गलत जगह लगाओ। सर्वप्रथम ईमानदारी को धारण करो और सत्कर्म को। अब क्या करना है, देखो, लेकिन यह ना छूटे, तो तुम्हारा आत्मिक कल्याण हो जाएगा। चाहे शादी करो, चाहे ना करो, इससे कोई मतलब नहीं है।
देख लो कि आपका उद्धार किसमें है, शादी करके उद्धार है कि शादी ना करके। पूरी तरीके से निश्चित करके ही कोई कदम उठाना, और जल्दी से जल्दी, क्योंकि 60 के बाद सोचोगे कि शादी हो जाए, तो भी नहीं होगी। पक्का तुम्हें करना है, यह आप ही को पक्का करना है। हां, यह ध्यान रखना कि सामने वाले को तकलीफ ना देना। पता चला कि ले आए और दो महीने बाद बोल रहे हो कि मैं आध्यात्मिक हूं, घर छोड़ के जाने लगे। किसी का जीवन नर्क ना करना, नहीं तो उसका भी दोष लग जाएगा। पता चला तुम शारीरिक वहां हो लेकिन मानसिक कहीं और हो। वह तो आध्यात्मिक नहीं है, उसकी इच्छा शादी की है। तुम शादी बोल के कर रहे हो, तो शादी का पूरा फर्ज निभाना; करना है तो करो, नहीं तो मत करना।
कर्म के सिद्धांत को समझो। अब देखो, आप हो कहां। जैसे वाल्मीकि जी थे, उन्हें नाम दे दिया गया और नाम से उन्होंने अपना उद्धार कर लिया। और अगर आप कर्म में जी रहे हो, कर्म के सिद्धांत पर, तो आप कर्म पर ध्यान दो। आप कहां हो, वहीं से आपको दिया जाएगा। किसी को नाम दिया गया, मंत्रों द्वारा उसने अपना कल्याण किया। और अर्जुन को कर्म का सिद्धांत बताया गया, क्योंकि अर्जुन एक राजकुमार थे। तो आप कहां हो, यह देखो।
नहीं, जगह बदलने से स्थिति नहीं बदलती है। आपने जगह बदली, तो जिस जगह पर गए, क्या वैसा आपने काम किया? तब आपकी स्थिति बदलेगी। क्या उस जगह के लायक काम किया? एक जगह छोड़ के दूसरी जगह तक पहुंचने में क्या आप वह काम कर रहे हो? तब आपकी स्थिति बदलेगी। लेकिन आपने काम नहीं किया, तो आप हिमालय पर भी चले जाओ, सड़ोगे, कुछ नहीं होगा। आपने जगह बदली, क्या जगह बदलने के बाद काम शुरू किया? तब आपकी स्थिति बदलेगी। लेकिन आपने काम की शुरुआत नहीं की, आपने अपना स्वभाव वैसा का वैसा रखा, तो आप कोई भी जगह बदल दो, कुछ नहीं होने वाला है। जगह के साथ परिवर्तन आपको अपने आप में भी करना पड़ेगा।
देखो, यहां आत्मिक कल्याण की जगह है। तो आत्मिक कल्याण के लिए जो लोग काम कर सकते हैं, उन्हीं का आत्मिक कल्याण होगा। अगर कर ही नहीं सकते, तो कुछ हो ही नहीं सकता। करना तो पड़ेगा। कर नहीं सकते तो कुछ नहीं हो सकता, तब जहां हो वहीं रहो।
पहले प्रपंच किसे समझते हो? समाज में रहने को, कि प्रपंच करने को? अगर प्रपंच कर रहे हो तो छोड़ना पड़ेगा और अपने आत्मिक कल्याण के लिए काम करना पड़ेगा, आप चाहे जहां हो। और गृहस्थ जीवन में हो तो कम से कम 12 महीने में एक महीना एकांतवास करो।
प्रत्यक्ष ज्ञान की पुस्तक अभी नहीं है, आगे तैयार हो रही है। अभी मानसिक तैयार हो रही है, आगे तैयार हो ही जाएगी।
आपने नाम-दान ले रखा है और सत्संग अच्छा लगता है, तो जितना सत्संग में बताया जा रहा है, उतना करो।
ध्यान के बहुत वीडियो हैं, वह देखना। ध्यान से आप जो कर रहे हो, उसे ध्यान कहते हैं। ध्यान से काम करना, उस काम में ईमानदारी से कर्म रखना, अगर यह ध्यान है तो वह ध्यान है, और इसी ध्यान से परम ध्यान घटित होगा।
(यहां जो कुत्ते हैं, उनके बारे में किसी ने कमेंट किया था कि आप डॉग लवर नहीं हैं, ब्रांडेड लवर हैं।) मैं आपको बता दूं, मैं लवर सिर्फ एक ही का हूं, अपने आत्मिक कल्याण का। मैंने अपने आत्मिक कल्याण के लिए ही काम किया, और आत्मिक कल्याण के बाद मैं और लोगों का आत्मिक कल्याण कैसे हो जाए, उसके लिए काम कर रहा हूं। तो मैंने यहां अगर डॉग को रखा है, पिल्लों को रखा है, तो यहां की सुरक्षा के लिए रखा है, जरूरत में रखा है। और मैं उन्हीं पिल्लों को रखता हूं जो यहां की सुरक्षा सही से कर पाएं। मैं लवर सिर्फ अपने आत्मिक कल्याण का हूं, परमात्मा का हूं, अपने काम का हूं, और मेरे काम में जितने लोग जरूरत में आते हैं, उनको मैं अपने पास रखता हूं। यहां तक कि मैंने अपने आप को भी उस लायक बनाया। तो मैं अगर किसी से प्रेम करता हूं, तो अपने काम से प्रेम करता हूं; यहां तक कि मैं अपने आप से भी नहीं करता।
उस आसक्ति के पीछे कुछ चाहिए। उस कुछ चाहिए का त्याग करो। आसक्ति मोह से ही मिलती है।
हां, देखने वाले पहले तो आप ही हो, क्योंकि करने से पहले ही आप देख लेते हो कि क्या करने जा रहे हो।
परम सत्ता से सीधे ही मार्ग मिल रहा है, पर वह किसी के द्वारा ही मिलेगा। अब किसी विद्यार्थी को कोई शिक्षक पढ़ा रहा है, तो शिक्षक सीधा थोड़ी ना मिला। वह सोचे कि नहीं, हमें सीधा विद्यालय पढ़ाए, तो विद्यालय क्या है? विद्यालय ने ही तो शिक्षक दिया है। और आप पढ़ने के लिए तैयार हो, तो हो सकता है कि वह शिक्षक अच्छे से ना पढ़ाए, तो वह किसी और शिक्षक को भेज दे। तो आप यह मत सोचो कि मुझे विद्यालय सीधा पढ़ाए। विद्यालय के द्वारा ही, उसके स्कूल के द्वारा ही वह शिक्षक मिला हुआ है। तो जिसके द्वारा आपको आत्मिक कल्याण का मार्ग बताया जा रहा है, आप वह ग्रहण करो और आगे बढ़ो। उसके द्वारा मूल सत्ता के द्वारा ही बताया जा रहा है।
हां, एकदम हो सकता है, ईमानदारी और सत्कर्म के साथ।
जब बढ़ोगे तो जांचने की जरूरत ही नहीं है। जांच रहे हो, इसका मतलब बढ़ नहीं रहे हो, सिर्फ जांच ही रहे हो, कुछ कर नहीं रहे हो। करोगे तो जांचने की जरूरत नहीं है।
नहीं, साधना से तो मुक्त हो गया। बस आप लोगों के लिए काम चलता है।
खाली समय में सत्कर्म और कर्म सोचना चाहिए, कि मैं क्या करूं कि मेरा आत्मिक कल्याण हो जाए।
कितना लेनदेन बाकी है, कुछ नहीं, बस लेनदेन करते रहो; जिस दिन लेनदेन खत्म, उस दिन खत्म। जैसे आपने किसी स्कूल में एडमिशन ले लिया, तो कितने दिन बाकी हैं, यह आपको थोड़ी गिनना है, वह खुद गिन रहा है। आपने किसी पद को प्राप्त किया, किसी पद पर हो, किस दिन रिटायर होगे, यह तुम्हें गिनने की जरूरत है क्या? नहीं, वह खुद गिन रहा है, क्योंकि उस पद के पीछे कोई और बैठे हैं, वे इंतजार कर रहे हैं कि तुम हटो और वह पद कोई ले।
चेतन मन और अचेतन मन। चेतन मन मतलब आप इंद्रियों द्वारा कुछ काम कर रहे हो। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श, इनके द्वारा आपने संचित किया है, और जहां संचित हुआ है, वहां अचेतन मन है। जो आप अभी जमा कर रहे हो, बाहरमुखी, तुरंत, वह चेतन मन है, और जितना जमा किए हो, वह अचेतन मन है। जब यह बाहर से नहीं मिलता है, तब हम अंदर चले जाते हैं।
साधना का मतलब सीधा, अपने आप को सुधारना ही साधना है।
मलाई मैं खा रहा हूं और दोष मन को दे रहा हूं। सब कुछ चलाना सीख रहे हो, लेकिन अपने को चलाना सीख नहीं पा रहे हो। वह कर रहे हो जिसकी अपने बच्चों से उम्मीद नहीं करते। जैसे आप गुटका खाते हो, लेकिन क्या आप चाहोगे कि आपके बच्चे खाएं? बताइए, आप क्यों खाते हो? नहीं खाना चाहिए, तो अब छोड़ दो।
अभी विचार तुमने बनाया। अगर आपने वहां विचार बनाया, तो आपको कोई सलाह देने वाला मिल गया। मतलब वह सलाह देने वाला शरीर है, शरीर में कोई और दिलवा रहा है। मेरी बात समझना, क्योंकि मैं आपका नाम नहीं जानता, आप भी मेरा नाम नहीं जानते। आप गाड़ी खाली करने, सामान लेकर आए हो और चले जाओगे, और आपने गाड़ी के पास विचार बनाया। तो एक काम करो, गुटका जेब में है तो फेंक दो। लेकिन फेंकना तो हमेशा के लिए। थूकना तो चाटना मत, चाटना है तो थूकना मत। लेकिन फेंकना ऐसे नहीं, आवेश में, जज्बात में नहीं; पहले सोच-समझ लो कि क्या हमेशा के लिए छोड़ोगे। थूक चाटना है तो थूकने की क्या जरूरत, क्योंकि आत्मिक गिर जाओगे ना। और आपने विचार बनाया और आपको कोई बोल रहा है, तो समझ लो कि वही बुलवा रहा है, क्योंकि मेरी प्लानिंग नहीं थी कि मैं आपको गुटके के लिए बोलूं। आपने विचार बनाया और तुरंत आपको कोई सलाह देने वाला मिल गया, इसका मतलब वह दिलवा रहा है। तो उसकी बात मान लो, फिर खत्म करो, जाओ फेंक दो हमेशा के लिए।
क्या बुद्धि इतनी गिरी है तुम्हारी? तो मत खाओ ना। आप अपने आप को कंट्रोल में नहीं कर सकते? गुटका क्या कोई जबरदस्ती मुंह में बांध के खिलवा रहा है? मत करो ना। देखिए, आपके जीवन में यह मौका मिला कि आपने विचार बनाया। कोशिश नहीं; थूकना तो चाटना मत, चाटना तो थूकना मत, पर आवेश में नहीं। कभी अपना थूक चाटो, तो कैसा लगता है? जब तक मुंह में है, तभी तक ठीक है। कहने का मतलब, मात्र गुटके के लिए आत्मिक मत गिरना। यही तो गंदी आदत है, और आप इससे दुखी भी हो, निराश भी हो, पैसा भी खर्च कर रहे हो, खा के भी परेशान हो। अब हमेशा के लिए छोड़ना, और जब भी मौका मिले तो यहां आना। यह अपनी कुटिया है, यहां रहने-भोजन की व्यवस्था साधक के लिए निशुल्क है; कभी रहना हो, साधना करनी हो, तो आना।
अभी विचार बना और सलाह देने वाला मिल गया, विचार कामयाब हो गया। हम शुरुआत सत्संग की कर रहे थे और यह आपके लिए हो गया। अब इसे हमेशा के लिए त्याग दो; त्याग ही परम सुख है, लेकिन अब फिर अपनाना मत। देखो, जीवन में सबसे जरूरी क्या है? भोजन, सांस, पानी, और यह हमें प्रकृति देती है। तन ढकने के लिए कपड़ा समाज के लिए है; अकेले रहें तो कपड़े की जरूरत नहीं है। हम समाज में आना-जाना करते हैं तो तन ढकने के लिए कपड़ा चाहिए कि अभद्रता ना लगे। क्योंकि हमारे पास समझ है, हमें पता है क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्या उचित है, यह सब समझ के हमें जीना पड़ेगा। त्याग करना तो पूरी तरह करना। आवेश में, जज्बात में आके हम छोड़ तो देते हैं, दो दिन बाद फिर खाने लगते हैं। देखो, इन्होंने भी यहीं पर छोड़ा, बहुत सालों से खा रहे थे, और आज तक खाया नहीं, लेकिन इच्छा बहुत हुई।
क्या होता है, एक बार बुराई की आदत लग गई, तो अच्छाई करने के लिए हमें प्लानिंग करनी पड़ती है। देखो, बच्चों को शिक्षा देने के लिए हमें शिक्षक लगाना पड़ता है, ट्यूशन लगाना पड़ता है, लेकिन गाली सीखने के लिए कोई लगाया? और सबको अच्छी से अच्छी गाली आती है। अगर बैठ के गाली का खेल खेला जाए तो शाम हो जाएगी, कोई जीत नहीं पाएगा, कोई हार नहीं पाएगा। किसी ने ट्रेनिंग नहीं दी, किसी ने सिखाया नहीं, लेकिन कैसे सीख लेते हो? बचपन से आज तक एक व्यक्ति बताओ जिसने आपको एक मिनट भी गाली सिखाई हो। किसी से सुना, और उससे भी अच्छी-अच्छी नई गालियां अभी पैदा कर दोगे, अपने अंदर से। तो यह चीज ऐसे काम करती है: बुराई अपने आप पैदा हो जाती है, अच्छाई को पैदा करना पड़ता है। बुराई आपको कहीं से मिल जाती है तो उसकी अनेक अपने अंदर पैदा कर लेते हो। खेत में देखिए, फसल बोनी पड़ती है, हर साल लगानी पड़ती है, लेकिन जितनी फसल को नुकसान करने वाली चीजें हैं, वे अपने आप आ जाती हैं। इनको आज तक कोई निकाल नहीं पाया, ऐसी कोई दवा नहीं बनी कि इनका नाश कर दे।
हमारी जरूरत तो अनाज की है, हमें घास-फूस थोड़ी चाहिए, लेकिन वह अपने आप पैदा हो जाता है। पैदा होता है, लेकिन अगर हमें फसल उगानी है तो हम उसे निकालते हैं ना। तो ऐसे ही अगर अपने आप को समझना है, तो हमें गंदगी निकालनी पड़ेगी। गंदगी अपने आप आ रही है, लेकिन उसे लो मत ना, उसको ग्रहण मत करो। तभी तो आपकी परीक्षा होगी कि आप शुद्धता की तरफ बढ़ रहे हो या नहीं। अशुद्धता अपने आप आती है, शुद्धता के लिए हमें प्रयास करना पड़ता है।
क्यों आती है? क्योंकि हमने अशुद्धि धारण कर ली। हमारे जीवन में सबसे ज्यादा अगर हमने कुछ काम किया है तो अशुद्धि का किया है। आपने बचपन से लेकर आज तक सबसे ज्यादा शुद्धता का काम किया या अशुद्धता का? ज्यादा तो आपने उसे ही बनाया ना। यह पीछे से नहीं आ रही, हमने पैदा किया। शुद्धता तो आपका स्वभाव है, तो उसको क्यों नहीं बढ़ाया? चाहे जहां से भी आ रहे हो, आप ही आ रहे हो ना। सबसे पहले आप शुद्ध थे, लेकिन धीरे-धीरे आपने अशुद्धि धारण की, सबसे ज्यादा उसी को बढ़ावा दिया, और आज आपके पास सबसे ज्यादा अशुद्धि है, इतनी ज्यादा हो गई कि आप उसी से परेशान हो।
जैसे आदमी ने शुरुआत में मौज-मस्ती के लिए गुटका खाया, लेकिन आज इनकी उम्र लगभग 49 है और 20 साल से गुटका खा रहे हैं। अब यही आदमी खा के पछता रहा है, इसे पता है यह गंदा है, लेकिन छोड़ नहीं पा रहा। इसके अंदर छोड़ने के लिए पछतावा है, तभी तो विचार बनाया। लेकिन इसके अंदर छोड़ने की ताकत नहीं मिल रही थी, यह कमजोर था। तो प्रकृति ने कहीं से ताकत दी। मैंने बोला ना, प्रकृति कल्पवृक्ष की तरह है, आपको जो चाहिए, ऐसे लोगों से मिलाती है। तो यह व्यक्ति अभी विचार करते ही इस आदमी के पास आ गया, और तुरंत इसका भाव इतना प्रबल हो गया, क्योंकि कई सालों से पछता रहा था, कि जा, तुझे अब ऊर्जा वहां से मिलेगी और छोड़ने में तुझे आसानी होगी। तेरी ताकत नहीं हो रही है, लेकिन मैं तुझे ऐसे व्यक्ति से मिला रहा हूं जो तुझे सलाह देगा, तुझे समझ में आएगा, तुझे ऊर्जा मिलेगी और तू उसे फेंक पाएगा। हमने आपको कई बार कहा है कि जो आपको चाहिए, वैसे लोग मिलेंगे। यहां तो यह सामान छोड़ने आया था, हमारे पास बैठने थोड़ी ना आया था; देखा सब लोग बैठे हैं, तो जब तक सामान खाली होगा तब तक हम भी बैठ लेते हैं।
हर आदमी को गलत-सही का पता है, लेकिन उसने अपनी गलतियों को इतना बढ़ा दिया है कि छोड़ना भी चाह रहा है, लेकिन उसके अंदर वह ताकत नहीं है, क्योंकि उसने सात्विक एनर्जी बहुत कम कर दी, इतनी कम कर दी कि वह फैसला लेने के लायक ही नहीं रहा, उसका आत्मविश्वास उठता ही नहीं, इतना अपने आप को दबा दिया। वह ताकत कब मिलेगी? जब आप सात्विक एनर्जी के पास, सात्विक के पास चले जाओगे, तो वह अपनी तरफ से आपकी आत्मा को ताकत देगा, सीधा सहारा लगा देगा। इस व्यक्ति के घर वाले परेशान थे, यह नहीं छोड़ रहा था, पत्नी समझाती होगी, बच्चे समझाते होंगे, लेकिन यहां कुछ देर बात हुई और छोड़ दिया। इसकी सात्विक ऊर्जा जागृत हो गई, आत्मा को पोषण मिल गया, आत्मा की ताकत और हो गई, और इसने तुरंत फैसला ले लिया। हम जब भी बुराइयों की तरफ जाते हैं, हमारे घर-आसपास वाले लोग समझाते हैं, लेकिन समझाने वाले की इतनी ऊर्जा नहीं है कि वह काम कर जाए। तो जब आप सच में समझने वाले रहोगे, तो धीरे-धीरे आपको ऐसी ऊर्जावान जगह भेज देगा कि आपका भाव तुरंत प्रबल हो जाएगा और बुराई छोड़ने में बड़ी आसानी होगी। इसलिए कहा गया है कि हमारे जीवन में संगत का बहुत असर पड़ता है। यह व्यक्ति मेरे बारे में नहीं जानता, मैं इसके बारे में नहीं जानता, लेकिन आत्मिक ऊर्जा इसको इधर से मिली और इसने तुरंत फैसला लिया कि यही मेरे लिए ठीक है, इसे बल मिल गया। जिसको पैसे से खरीदा था, उसको फेंक के खुश है। अगर जेब से गिर जाता तो पछताता कि मेरा गुटका गिर गया। यह होता है बल।
इसलिए कहा गया है कि आपको जो चाहिए, मिलेगा, बस आप अपने भाव को बनाइए। हम तो लाइव लोगों के लिए सत्संग करने वाले थे, प्रश्न-उत्तर लेने वाले थे, इसका गुटका थोड़ी ना छुड़ाने के लिए सत्संग कर रहे थे, लेकिन शुरुआत इसी से हो गई। अब हमेशा के लिए छोड़ना; थूकना तो चाटना मत। आप लोगों के लिए कुटिया का निर्माण हुआ है, कभी भी आना, संकोच मत करना, अपना आत्मिक कल्याण करना, लेकिन अब खाना मत। आपके लिए भी अच्छा है, पैसे भी बचेंगे, कचरा खाने से बच जाओगे, और आप खुद पछता रहे थे।
इसी चीज को समझो। कोई भी अपने जीवन में बुराइयों की तरफ जा रहा हो, तो छोड़ दो, अभी समय है, और आप ही को छोड़ना है, क्योंकि वह बहुत तेजी से बढ़ता है। जितनी भी झाड़ की चीजें हैं, बहुत तेजी से बढ़ती हैं। बुराई अगर आप एक पकड़ोगे तो दो मिलेंगी, उसके साथ और आ जाती हैं; इसकी पैदावार बहुत तेज है।
जरूर, जरूरी है। गटर के पास बैठ जाओगे तो उसकी बदबू से आप अपने आप में नहीं हो पाओगे, और वहीं समुद्र के पास बैठोगे, सागर के पास, नदी के पास, वृक्ष के पास बैठोगे, तो अलग ही भाव रहेगा।
इसे समझना पड़ेगा। इच्छा दो होती हैं: एक जरूरत की इच्छा होती है, और एक मान के लिए चाहिए, वह इच्छा होती है। कामनाएं, कुछ ना कुछ तो हमें जीवन जीने के लिए चाहिए। हम उन कामनाओं में फंसे हैं जो मुझे मान के लिए चाहिए, बड़ा बनने के लिए चाहिए, दिखाने के लिए चाहिए कि मैं कुछ हूं, मुझे कुछ बनना है। हम उस इच्छा के चक्कर में फंसे हैं।
इच्छा से ही कामना पैदा होती है। जैसे मुझे भूख की इच्छा जगी, तो भोजन की कामना हुई कि भोजन मिल जाए। इच्छा से कामना आएगी, कामना से इच्छा नहीं आएगी; पहले इच्छा होगी। अगर भूख लगी ही नहीं, तो भोजन की कितनी भी आप इच्छा बनाइए, कामना नहीं होगी कि मिल जाए। पहले जरूरत होगी, फिर कामना होगी कि मुझे इस प्रकार का भोजन चाहिए, मिल जाए। तो ये दोनों अलग-अलग हैं।
इच्छा दो हैं: एक इच्छा अपनी जरूरत है, एक इच्छा हम मान के लिए बनाते हैं, और उस इच्छा से परेशानी है। अपेक्षा क्या है? हमने किसी के लिए किया तो हमने अपेक्षा बना ली कि वह मेरे लिए करे, उसका रिटर्न मिले, वह अपेक्षा है; कोई भी काम करते हैं तो अपेक्षा में करते हैं। उसके बाद आता है भाव। इच्छा में, जरूरत में भाव बन जाता है। भाव दो होते हैं: एक जब जरूरत होती है, कर्म के पहले, क्योंकि जब कोई इच्छा जगी तो उसके लिए कर्म करना पड़ेगा, और एक कर्म के बाद।
जरूरत में भाव पैदा होता है। भाव तो दो में रहेगा ना; एक में आ गया तो कैसा भाव? भाव भी दो में काम करता है, इसका ऐसा भाव है, उसका वैसा भाव है। एक में आने के बाद तो भाव भी खत्म; किसके लिए भाव करोगे? भाव तो किसी के लिए करना कर्म में आता है ना, कर्म के पहले और कर्म के बाद एक भाव बनता है, उससे फल का निर्णय होता है। अब कुछ नहीं चाहिए, तो भाव क्या? इसलिए आप निर्विकार होने का भाव बनाइए, कि विकार मुझसे कैसे हटें, उन्हें हटाने का भाव बनाइए। यह आखिरी भाव है। यह भाव प्रबल हो गया और इस पर काम किया, तो विकार खत्म होंगे। विकार आपने धारण किए हैं, उनसे अब अपने आप को हटाना है।
आत्मज्ञान मतलब स्वयं का ज्ञान, ब्रह्मज्ञान मतलब उस परम सत्ता का ज्ञान। वह ज्ञान वह करवाता है, हमारी क्षमता नहीं है कि हम उसका ज्ञान कर लें; वह करवाता है।
बस आप एकाग्र हो जाओ। आपको क्या चाहिए, देख लो, अच्छा-बुरा देख लो, और देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में फैसला लो। आपके जीवन के लिए क्या उचित है, देख के फैसला लो, बात खत्म।
आपका कोई दायित्व है, कर्तव्य है, जिम्मेदारी है, जो आपको रोक रहा है, या लालच रोक रही है। कुछ पाने की इच्छा है, वह रोकती है। देखिए, आपको क्या पाने की इच्छा है, क्या लालसा रह गई, क्या कामनाएं रह गईं जो आपको पूरी करनी हैं। आंतरिक देखिए, आंतरिक समझने का प्रयास करिए, बाहरी नहीं।
कुछ नहीं चाहिए, ऐसे होकर उनके दर्शन के लिए काम करो। उनसे भक्ति करो, निर्विकार होने के लिए भक्ति करो, उतनी पवित्रता लाओ। ऐसा कुछ करो कि प्रभु आपको दर्शन देने के लिए तरसें; आप कहो मत दो, तो भी दें। सब तो प्रभु दर्शन के लिए घूम रहे हैं। ऐसा काम करो कि प्रभु आपके लिए तरसें; आपको प्रभु के लिए तरसने की क्या जरूरत? इतना प्यार कर लो कि किसी और से प्यार करने के लायक ना रहो, इतनी मोहब्बत, इतना प्रेम आपके अंदर होना चाहिए। तुम क्या हो? वासना में बस घूमते रहते हो। प्रभु नहीं चाहिए, प्रभु से माल चाहिए, उसके लिए प्रभु चाहिए। प्रभु नहीं चाहिए, प्रभु की ताकत चाहिए। अगर प्रभु के पास कुछ ना हो, तो प्रभु भी नहीं चाहिए। माल के लिए प्रभु चाहिए, और यह बात प्रभु को पता है कि यह मुझसे मिलने के लिए नहीं, माल के लिए, ताकत के लिए मुझे बुला रहा है; अगर मेरे पास ताकत नहीं होती तो मेरे पास खड़ा भी नहीं होता। प्रभु को इतना पता है कि यह प्रभु मिलन के लिए नहीं, प्रभु से मिलने पर कुछ हो जाएगा, उसके लिए बुला रहा है। और जब तक यह रहेगा, तब तक प्रभु दर्शन नहीं होगा।
अभी तक आप क्या हो? प्रभु से इसलिए मिलना चाहते हो कि उससे मिलके कुछ हो जाऊंगा। क्या पैसे वाला हो जाऊंगा, नाम, शोहरत, पैसा, गाड़ी, बंगला; और अगर यह नहीं, अध्यात्म में आ गए, तो ज्ञानी हो जाऊंगा, परम ज्ञानी हो जाऊंगा, मोक्ष मिल जाएगा, मुक्ति मिल जाएगी, गुरु बन जाऊंगा। कुछ ना कुछ है, तो प्रभु चाहिए ही नहीं। हमें तो उससे कुछ ना कुछ चाहिए, इसलिए प्रभु चाहिए, और यह बात प्रभु को मालूम है, इसलिए वह आता नहीं है। उसे पता है कि इसे क्या चाहिए; वह दे देता है और बस उसमें लगा देता है कि तू लगा रह इसमें।
मैं एक जगह था, वहां मैंने बोल दिया था कि जब तक जाग रहा हूं, कोई भी आए; एक बार सो गया तो कोई भी आए, इमरजेंसी हो तो उठाना, नहीं तो मत उठाना। तो मैं बाहर निकला तो बालकों ने कहा कि महाराज जी, आपसे दो लोग मिलने आए थे, बहुत देर रुके, आप नहीं निकले तो चले गए। मैंने पूछा, कुछ काम बता रहे थे? बोले, नहीं, दर्शन के लिए आए थे। मैंने कहा, अभी तक पृथ्वी पर ऐसा एक भी आदमी नहीं मिला मुझे जो मेरे लिए आया हो; ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने पता लिया कि कहां से आए थे, उस गांव में गया, दोनों आदमियों का पता किया, उनसे मिला, बुलाया, बैठा और बोला, बताइए, आप मुझसे मिलने आए थे? बात धीरे-धीरे बढ़ी, तब उन्होंने अपना काम बताया कि किस काम के लिए आए थे। तो मेरा भ्रम टूटा, नहीं तो जिंदगी भर सोचता कि कौन ऐसा आदमी था जो मुझे खोज रहा था। मुझे अगर कोई खोजे, तो मेरे समझ से वह या तो परमात्मा है, या परमात्मा के एकदम करीब रहता है, उससे उसकी बातचीत सीधी होती है। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है।
आप खुद इस पर अनुभव करो। आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो सिर्फ आपको खोजे? नहीं, उसको कुछ ना कुछ आपसे चाहिए। आपके रूप को भी नहीं, रूप के पीछे वाले को देखने की तो क्षमता ही नहीं है। कोई रूप को देख रहा है, कोई शब्द को, कोई सुगंध को, कोई स्वाद को, कोई स्पर्श को देख रहा है, लेकिन मुझे कोई देखे, मुझसे मिलने आए, ऐसा कोई पृथ्वी पर व्यक्ति हो जो मुझे खोज रहा हो, तो जरूर वह परमात्मा ही होगा, या फिर परमात्मा जैसा ही होगा, क्योंकि दो से एक में हो जाता है, फिर वह परमात्मा में विलीन हो जाता है, कुछ बचता नहीं। इसलिए उन लोगों को ढूंढते-ढूंढते गया कि क्या पता कौन महापुरुष हैं जो मुझसे मिलने आए थे, जीवन में पहली बार कोई मुझसे मिलने आया।
तो प्रभु दर्शन नहीं चाहिए; प्रभु के दर्शन से कोई कामना है, कोई इच्छा है, कोई उम्मीद है कि आप उसे पूरा करें। प्रभु आके भी क्या करें? प्रभु की ताकत चाहिए। और जब तक ऐसा भाव है, तब तक दर्शन नहीं। अच्छा, आ भी जाएं और प्रभु बोलें कि मेरी ताकत खत्म हो गई, तो आप कहोगे, प्रभु जाओ; उसी के लिए तो हमने तुम्हें बुलाया था, और आके कह रहे हो कि मैं खाली हूं, तो निकल लो, क्योंकि खाली लोगों को हम पूछते नहीं। हम संसार वाले ऐसे हैं कि भरे-भरे को पूछते हैं, खाली को तो कचरे में फेंक देते हैं, इस खाली का बोझ और कौन ढोएगा।
हम जीवन भर नोट को लक्ष्मी-लक्ष्मी कहके, गिर जाए तो उठाकर माथे से लगाते हैं, और जब नोटबंदी हुई तो सब आग लगा दिए, फेंक दिए। क्योंकि लक्ष्मी उसमें नहीं थी? जब तक उसमें ताकत थी, चल रहा था, तब तक लक्ष्मी थी, और जब फैसला हो गया कि यह नोट नहीं चलेगा, तो नोट फेंके गए। लक्ष्मी कहां गई? तुम्हारा भाव कहां गया, तुम्हारा समर्पण कहां गया, तुम्हारी श्रद्धा कहां गई? तब तो नोट को गिरते ही उठा लेते थे, सीने से लगा लेते थे। अब 50 पैसे, एक रुपया गिरा है, तो उसे नहीं उठाते। पहले जब गरीबी थी तो पांच पैसा, दस पैसा भी गिरे तो लक्ष्मी थी। अब क्या हुआ? लक्ष्मी है, लेकिन उसकी ऊर्जा कम हो गई, इसलिए नहीं झुकते; कौन अपना समय खराब करेगा। एक नंबर के लालची। अगर हमारे जीवन में लालच की परीक्षा हो, तो हम एक नंबर के लालची निकलेंगे, टॉप पर आएंगे। लेकिन हम हमेशा अपनी लालच को छुपा के सही तरीके से पेश करते हैं कि भाई, यह मेरी जरूरत है, लालच नहीं।
क्या बताइए, बस इतना ही लिखा है। हमने तो जिंदगी अपनी सेवा में समर्पित कर दिया है। बोलिए, मेरे लिए क्या, आपके लिए सेवा है। जिस लायक में मैं हूं, जरूर करूंगा।
इस लायक में हूं, और मुझे लगेगा इससे आपका जीवन होगा, और मैं उस लायक रहूंगा, तो जरूर करूंगा। जीवन में मदद ही तो की है। मदद करके ही यहां पहुंच गया।
अब देखिए, इसके लिए आप इलाज कराइए और सही तरीके से जांच कराइए, अगर ऐसा कुछ है तो। और सही तरीके से नियम और संयम का पालन करते हुए उस पर काम करिए। देख लीजिए।
आप देखिए कि गलत शब्द वो आपको इसलिए बोल रहा है कि ऐसे ही बोल रहा है, तो अपने स्वाभिमान और आत्मविश्वास की रक्षा करिए। आत्मरक्षा करिए, और उसे उस तरीके से जवाब देकर निकल जाइए। और ज्यादा वो गलती कर रहा है तो उस व्यक्ति और उस जगह का त्याग कर दीजिए। बात खत्म।
बस लेने का भाव छोड़ के देने का भाव बना लो, मोह रहेगा ही नहीं। मोह अपने तरीके से मिलता है, तब होता है। तो अपने तरीके का त्याग करके लेने का भाव छोड़ दो, देने का भाव बना लो। बात ही खत्म कर दो।
तो ये तो है ना, आत्मदर्शन करो। बात यही तो है। प्रभु में पावर नहीं रहा तो क्या करोगे?
आत्मज्ञानी पुरुष ऐसा कर ही नहीं सकता। सही गलत में जाना क्यों, ऐसा कर ही नहीं सकता।
उन्होंने ऐसा कहा है, लेकिन वह कर नहीं सकता ना। यही तो बात है, कर नहीं सकता, क्योंकि वह कर्ता के भाव से मुक्त हो गया। वो करता रहा ही नहीं, तो ऐसा कर ही नहीं सकता। आप क्यों नहीं समझते यह बात? उन्होंने इस बात को कह के उनकी श्रेष्ठता बताई है। तो ऐसा कर नहीं सकता। इतना महान होता है, उसे दोष नहीं लगता। दोष वाला काम ही नहीं करता।
बाहर का छोड़ोगे। जब करना बंद करोगे, तो अंदर से भी छूटेगा।
किसके लिए संभव बोल रहे हो? अंदर से कुछ मिल भी नहीं रहा। अंदर कुछ है ही नहीं है, तुम ही हो, तो मिलेगा क्या? आत्मज्ञानी अगर है, तो कभी बेईमानी नहीं कर सकता, और किसी को तकलीफ नहीं दे सकता। यह वो कभी नहीं कर सकता।
श्रद्धा। बस कुछ ऐसा करो कि राम आपको पा ले।
जब आप लालची हो तो वशीकरण यंत्र आपके काम कर जाएगा। कुछ नहीं चाहिए तो कोई वशीकरण नहीं होता। सीधी साधी बात है। लालची लोगों पर काम करता है। क्या एक का दो में मेहनत काम करेगा? वहां सब, मोहन, वशीकरण, सब काम करता है।
क्या बताएं? स्थितप्रज्ञ पुरुष, उस स्थिति में आप पहुंचे? सत्यप्रज्ञ और स्थितप्रज्ञ एक ही बात है। दो हों या एक हों, तुम एक हो ना। बस सब छोड़ दो।
व्याख्या करते तो हम हैं। ये दोनों का मतलब क्या है? चलो, आप बताओ। स्थिति मतलब जो स्थित हो गया अपने आप, सत्य में। और सत्यप्रज्ञ, जो सत्य में स्थित हो गया। बात तो एक ही है। मुझे लगता है बस वही तो बात है, घुमा फिरा के एक ही है। दो तो आपने पैदा कर दिया है, और दूसरे को छोड़ नहीं रहे हो। दूसरा छोड़ोगे कि तुम खत्म हुए? क्या तुम्हारा काम है पैदा करना? पैदा करते हो तभी लगता है मैं हूं। अगर कुछ पैदा नहीं किया, कुछ बोला नहीं अपने तरीके से, लगता है यार, मैं कहां हूं। हां, मैंने कोई नई खोज की है अभी। हां, वो भी बताऊंगा।
छोटे से डर नहीं लगता। छोटे से डरना भी चाहोगे तो नहीं डर लगेगा, लेकिन शेर से डरना भी नहीं चाहोगे तो डर लगेगा। जब भी डर लगता है तो अपने से बड़े से लगता है। तो अगर आपको डर निकालना है तो जहां निकालना है, उससे ताकतवर बन जाओ। बात खत्म।
बिल्ली भी तो काटती है, उससे डर क्यों नहीं लगता? क्योंकि आप उठा के पटक दोगे। काटता तो शेर भी है, लेकिन शेर से डर लगता है, क्योंकि हमारी ताकत वहां पर काम नहीं करती। वहां हम सुरक्षा में जाते हैं। अगर दिखावा भी करते हैं तो मैंने देखे, लोग कई लोग शेरों का वीडियो लेते हैं, ऐसे बाघों का। तो कई लोग आसपास उनके रहते हैं। ऐसा वीडियो आपने भी देखा होगा, लेकिन वो डरे हुए हैं। उनकी वजह से ऐसा लगता है कि डर नहीं है, लेकिन डर है।
शरीर को देते हैं तो लगेगा, आपको तकलीफ होगी। और मानसिक तो मानसिक है, कोई बात नहीं। शारीरिक मत कीजिए।
क्योंकि आपको शरीर उपयोग करने के लिए मिला है, तकलीफ देने के लिए नहीं।
जितना आप बेमतलब का काम कर रहे हो, जिससे आप अशुद्ध हो रहे हो, वह बंद कर दो। बात खत्म। कितना सीधा और सरल है। लेकिन आप क्या कर रहे हो? उपलब्धि चाहिए। बेईमानी बिना तो नहीं चलेगी। परसेंटेज में छोड़ा हूं कुछ। अब बताओ, परसेंटेज में बेईमानी छोड़ रहे हो? अरे, हां या ना। या तो आप ईमानदार हो, या तो बेईमान हो। बात खत्म। या तो पवित्र हो, या तो अपवित्र हो। बात खत्म। या तो जिंदा हो, या मर गए। नहीं, लेकिन नहीं। परसेंटेज में जाना है? किस्मत?
बहुत अच्छे तरीके से रह सकते हो। समाज नहीं छूटता है, और मित्र वगैरह नहीं छूटते। लालच छूटती है। रस भरी बातें छूटती हैं। बिना मतलब की बातचीत छूटती है। यह छूटता है।
सत्कर्म करो। अपने आप को पूरी तरह पवित्र कर दो। बस। जितने लोगों को आज तक प्रभु का मिलना हुआ है, प्रभु दर्शन हुआ है, वह उन्होंने अपने आप को पवित्र किया है। इतना तो इतिहास पढ़े हो, पूरी तरह। तो सीधी साधी बात है, अपवित्रता में उसका मिलना होगा नहीं। इतना तो पक्का है ना। पवित्रता में होगा। तो अपने को उससे मिलने के लिए प्रयास करना चाहिए, पवित्र बनाने के लिए।
आप बताओ फिर, लेकिन हम क्या कर रहे हैं? पवित्र नहीं कर रहे, अपने आप को अपवित्र कर रहे, और उसके मिलने के लिए साधना कर रहे। और ऐसा कभी हो नहीं सकता। बेईमानी नहीं छोड़ेंगे, लहसुन प्याज छोड़ देंगे। क्या, जेब काटना लोगों का नहीं छोड़ेंगे, मन रोकेंगे, निर्विचार होने का प्रयास करेंगे, जो कि कभी हो नहीं सकता। विचारों से मुक्त होने का प्रयास करेंगे। लहसुन प्याज छोड़ देंगे, लेकिन बेईमानी, जिससे मैं अपवित्र हुआ हूं, बेईमानी करके, वह नहीं छोड़ूंगा। हां, जिससे कुछ हो जाएगा वो नहीं कर रहे, जिससे कुछ नहीं होगा वो कर रहे।
अब मन कभी रोका नहीं जा सकता। जब तक चाहिए चाहिए में मन काम करता है। आपको देखिए ना, आपको क्या चाहिए, उचित या अनुचित। इसके बाद निर्विचार भी नहीं हुआ जा सकता। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति, विचार आएंगे। विचारों से कभी मुक्ति पाई नहीं जा सकती। लेकिन लोग साधना करवा रहे हैं, ध्यान कर रहा हूं। ध्यान किया ही नहीं जा सकता। ध्यान घटित हो रहा है, उसे समझना है। जितना काम नहीं किया जा सकता उतना लोग करवा रहे हैं, और लोग एकदम भ्रमित हैं। ध्यान करना है, ध्यान कर। अरे भाई, ध्यान को समझना है। प्राकृतिक में आ जाना है। अप्राकृतिक हम कर रहे थे, अपनी कामनाओं में, अपने तरीके से। उसका त्याग कर देना। बस यही है साधन।
जितना आप बेमतलब का काम कर रहे हो, जिससे आप अशुद्ध हो रहे हो, वह बंद कर दो। बात खत्म। कितना सीधा और सरल है। लेकिन आप क्या कर रहे हो? उपलब्धि चाहिए। बेईमानी बिना तो नहीं चलेगी। परसेंटेज में छोड़ा हूं कुछ। अब बताओ, परसेंटेज में बेईमानी छोड़ रहे हो? अरे, हां या ना। या तो आप ईमानदार हो, या तो बेईमान हो। बात खत्म। या तो पवित्र हो, या तो अपवित्र हो। बात खत्म। या तो जिंदा हो, या मर गए। नहीं, लेकिन नहीं। परसेंटेज में जाना है? किस्मत?
अपवित्र कैसे किए हो, पहले यह देखना पड़ेगा, और वो बंद करना पड़ेगा। और फिर ईमानदारी से जीवन जीते हुए सत्कर्म करना पड़ेगा। सत्कर्म करके अपने आपको पवित्र कर सकते हो, और ईमानदारी अपना के।
एकदम। अगर आपके जीवन में कोई भी आपका मजाक बनाए तो उस व्यक्ति और उस जगह का त्याग कर देना चाहिए। और अपने आप को इतना ताकतवर बनाना चाहिए कि वह आपका मजाक बनाए, फिर उसके बाद खुद आपसे माफी का एहसास करें। माफी मांगे नहीं। शर्म के मारे आ रहा है, तो भी ऐसा कुछ काम करो जगत में।
अगर योग बाकी रहा तो मिलता है। अगर भोग और भोजन रहा तो मिलकर करेगा भी क्या? करना तो भोग है, तो अन्य शरीर में भोग और भोजन है। इसमें योग है। योग खत्म हो गया, योग करने की कोई इच्छा ही नहीं है, तो भोग चाहिए तो भोग और भोजन आपको निशुल्क मिलेगा। अगर योग की इच्छा रह जाती है, कि नहीं, मुझे योग करना है, भोग और भोजन तो मैं स्थिति परिस्थिति में करना पड़ रहा है, तो वो शरीर मानव का ही मिलने वाला है।
ईमानदारी करके जरूर बढ़ाया जा सकता है, और सत्कर्म करके तेजी से बढ़ाया जा सकता है।
आत्मदर्शन तक पहुंचो। कोई भी शक्ति के चक्कर में मत पड़ो। एहसास, फीलिंग, यह सब से अपने आप को निकाल लो।
भूतकाल, भविष्य काल, वर्तमान काल, भूत प्रेत सब बोले जाते हैं। अपने को इतना करो कि आप प्रत्यक्ष हो, और उस पर काम करो। अपने आप पर काम करो। अपने आप को निकालो।
इस दुनिया में बहुत सारी चीजें हैं जो दिखती भी हैं और नहीं भी दिखतीं। दृश्य में दिखती हैं, अदृश्य भी हैं। हमारी देखने की क्षमता नहीं है। बहुत सारी चीजें, यहां तक जीव भी हैं। जैसे यह शरीर बोला जाता है, शुक्राणु में हमें नहीं दिखता, लेकिन इतना बड़ा शरीर है। कहने का मतलब है, देखने से अपने आप को छुटकारा दिला दो। जब तक उम्मीद है, तब तक देखने की इच्छा है। उम्मीद से अपने आप को मुक्त करा लो। उम्मीद ही भटकाव है। अपने तरीके से चाहिए, अपने तरीके से दिखे।
कोई बात नहीं। जानना तब तक चाहेंगे, जब तक अपने आप को नहीं जान पाए। तब तक जानने की लालसा बनी रहेगी। कुछ जानना है, देखना है। जब तक आत्मदर्शन नहीं होगा, तब तक यह लालसा नहीं जाएगी। इसलिए आत्मदर्शन के लिए काम करो।
किस स्थिति में आप शरीर छोड़ते हो? भोग और भोजन में, उसके साथ योग बाकी है। अगर योग बाकी है तो मिलेगा, और नहीं बाकी है तो मनुष्य शरीर लेकर करोगे क्या? भोग और भोजन ही करना है तो अन्य जीवों को भोग और भोजन निशुल्क मिलता है। प्रयास भी नहीं करना है, पैदा भी नहीं करना है। मानव शरीर में तो पैदा करना पड़ता है, तब खाने को मिलता है, कर्म करना पड़ता है। तो अगर योग बाकी रहा तो मिलेगा। अगर योग बाकी नहीं रहा तो लेकर करोगे क्या?
लाखों लोग हर सेकंड में मरते हैं, हर सेकंड में जन्म लेते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है। आपका कर्म आपको लेकर जाता है। आपका कर्म ही आपको ले जाता है, आगे की यात्रा करवाता है। अगर कामनाओं में हो तो शरीर मिलेगा। इच्छा और अपेक्षा में हो, और इच्छाओं से मुक्त हो गए, अपेक्षाओं से, तो शरीर लेकर करोगे भी क्या? आप निकल जाओगे आगे।
तो हमारे ही कर्मों के साथ समय मिला है ना। जैसा हमने कर्म किया, उसका उतना समय लेगा। हां, सब कुछ, जो किया है, मिल रहा है। जो कर रहा हूं, आगे मिलेगा। बस यही है। जो भी मिल रहा है हमने ही किया है। तो अगर बदलाव करना है तो बस वर्तमान में अपने आप को बदल लो, बस अगला बदल जाएगा। बहुत आसान है। जटिल हमने बना दिया ना।
आत्मरक्षा में हां। आत्मरक्षा में आप कुछ भी करते हो तो उसमें दोष नहीं लगता है। लेकिन शौक की रक्षा में नहीं। वो तो पाप हो गया। आत्मरक्षा में दोष नहीं लगता है, आप कुछ भी कर दो। शौक की रक्षा में फिर वही बेईमानी हो जाएगी।
हमारी बातें सामाजिक में ही काम आएंगी। उसी में तो आप जी रहे हो। अध्यात्म अलग और समाज अलग नहीं है। हमने अलगाव कर दिया, अलगाव नहीं है। तो ऐसे अगर मान लो, कोई यहां से सांप जाए, तो एक हमारी मान्यता यह है ना कि ये मेरे को काटेगा। नहीं, क्यों काटेगा? वो तो जा रहा है, चला जाएगा। तो यहां से अगर बीच से निकलेगा तो लोग उसको मारेंगे नहीं। अगर वो जा रहा है तो जाने दो, अपनी जगह चला जाएगा। एक जीव दूसरे जीव को तभी काटता है, या तो उसे भूख लगी हो, या तो उसे परेशान किया हो। ऐसे नहीं काटता।
क्योंकि मैं आपको अनुभव बताऊं। मैं नर्मदा तट पर ऐसे सोया रहता था। जैसे ही मैं ऐसे उठूं तो मेरे ऊपर से कोई बड़ा बड़ा जीव ऐसे कूद के चले जाए। उन्होंने मेरे को एक बार भी नुकसान नहीं पहुंचाया। मैं ऐसे झाड़ियों में जाके सोता था, जहां सांप वगैरह रहते हैं। आज तक इन्होंने मुझे कभी भी तकलीफ नहीं पहुंचाई। लेकिन हम तो देखते ही मार देते हैं। जैसे मान लो सांप आ गया, चीता आ गया, शेर आ गया। मतलब वही बात है, ताकतवर है तो हम भाग लेते हैं, और कमजोर है तो हम भगा देते उसको, या मार देते हैं। सुरक्षा में जियो। लेकिन अगर बच सकते हो, जरूरत नहीं है, तो मारने की क्या जरूरत है?
वो अपनी दुनिया में मस्त है, हम अपनी दुनिया में मस्त रहें। आज यहां कुटिया बनी है, कोई जीव कभी परेशान नहीं किया। सब अपने अपने में हैं। इतने महीने से, आप बताइए, पूरा जंगल है, कभी आपको कहीं किसी जीव ने परेशान किया? कोई नहीं किया। आप जी रहे हो, वो जी रहा है। सब तो धरती माता की संतान हैं। जीव तभी आपको काटते हैं, या तो आपने उनको खतरा दिखाया, या तो उन्हें भूख लगी है, भोजन दिखता है, तभी। बस इस स्थिति में वो काटते हैं।
इसलिए कि बेईमानी नहीं छोड़ते। बेईमानी ज्यादा सिखाई जाती है समाज में, एक दूसरे को सिखा रहे हैं।
अपनी कामना है, मन की नहीं। अपनी कामनाओं को समझो, क्या उचित है, क्या अनुचित है। यही जीवन है।
आपके शरीर की जरूरत है तो शादी करो, नहीं तो मत करो। आत्मिक कल्याण के लिए आप मार्ग पर चलो। पाप क्यों लगेगा? पाप तो तब लगता है जब आप दूसरे को मना करते हो कि शादी मत करो, और उसकी इच्छा होती है, और आप इच्छा उस पर थोपते हो। आप स्वयं फैसला ले सकते हो। जीवन में आपको क्या चाहिए। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श, इन पांच इंद्रियों द्वारा हम अपनी जरूरत पूरा करते हैं। आप देख लीजिए, आपको कैसे करना है, क्या करना है। पाप तो तब लगेगा जब आप किसी के साथ जबरदस्ती करोगे, बेईमानी करोगे। यही पाप है। मूल इसी को छोड़ दो।
ऐसा नहीं है। इसे बहुत गहराई से समझिए। बेईमानी की जब हम शुरुआत करते हैं, तो ऐसा नहीं कि हमने एक ही दिन में कमाना चालू किया। बेईमानी में व्यक्ति क्या करता है? चौबीस घंटे मेहनत करता है। अब जैसे ही ईमानदारी अपनाई, उसने मेहनत कम कर दी। जैसे इस व्यक्ति ने कहा कि जब मैं बेईमानी करता था तो मैं बच्चों को समय नहीं देता था, रात को खाता था। इसका मतलब ये हर वक्त लगा था। समय कहां दे रहा था? हर वक्त बेईमानी के व्यापार में। यानी काम तो कर ही रहा था, चौबीस घंटे। ऊर्जा भी दे रहा था, ताकत भी। अब कोई व्यक्ति चौबीस घंटे काम कर रहा है, और जैसे ही ईमानदारी अपनाई उसने आठ घंटे काम चालू किया, तो इनकम तो कम हो जाएगी।
मेरा कहना ये है कि मैं अब अपने बच्चों में जाऊं। जरूरत क्या है? पहले ये समझो। जरूरत यह है कि मैं इतना सामर्थ्यवान बन जाऊं, धन से, तन से और समझ से, कि मेरे सामने कोई भी आए, मैं उसकी जरूरत पूरा कर दूं। मैं उस लायक बन जाऊं। जैसे आज यहां आपके घर में लिमिटेड लोग हैं, लिमिटेड ही आ सकते हैं। लेकिन यहां अनलिमिटेड आ सकते हैं। तो एक व्यक्ति ने अपने आप को उस जगह लाके खड़ा कर दिया कि कितने लोग भी आ जाएं, मैं उसे रहने की व्यवस्था से लेकर खाने-पीने का सहारा, ओढ़ना-बिस्तर, सब दूंगा। वो आपके जैसा ही था। लेकिन उसने दिन-रात मेहनत की, ईमानदारी से, और अपने आप को वहां लाके खड़ा कर दिया, अनलिमिटेड। तो आप मेहनत करिए। जरूरत क्या है? जरूरत इतना है कि मैं क्या कर दूं कि मेरा कल्याण हो जाए। मैं अपना कल्याण कैसे कर दूं।
मेरा कल्याण मेरी जरूरत है। मेरी जरूरत ये वैभव का नापतोल नहीं है। मेरा कल्याण मेरी जरूरत है। तो मेरे द्वारा क्या हो जाए कि मेरा आत्मिक कल्याण हो जाए। अब मेरे आत्मिक कल्याण के लिए मुझे सत्कर्म करना है। सत्कर्म के लिए तीन चाहिए। एक चाहिए धन, एक चाहिए तन, और एक चाहिए मेरी समझ। अब तीनों को ज्यादा से ज्यादा खर्च करो। ज्यादा से ज्यादा खर्च करोगे तो ज्यादा से ज्यादा लाना भी पड़ेगा। तो ज्यादा से ज्यादा मेहनत करो, कि तीनों मेरा कैसे बढ़े, और तीनों समाज के सदुपयोग के लिए खर्च करो, जरूरतमंद के लिए। सिकुड़ो मत। अगर बेईमानी में आप चौबीस घंटे लगे थे, तो ईमानदारी में भी चौबीस घंटे लगो। आप सिर्फ अपनी बीवी-बच्चों तक मत सिकुड़ जाओ। वो तो जानवर भी करते हैं, कि मैं अपने बच्चों के साथ समय देने लगा। समाज में और बच्चे आपको नहीं दिखे? मैं अपने परिवार को समय दूं, इससे क्या हो जाएगा? मुझे सुकून मिले, शांति मिले। इससे क्या हो जाएगा? इससे नहीं होगा। मुझे मेहनत और बढ़ा देनी चाहिए।
अब यहां रहने वाले मुझे देखते हैं। जैसे बाबूलाल कल देख रहे थे। दो बजे के बाद सोने गए। आप लोगों की एक नींद पूरी हो जाती है। बाबूलाल की एक नींद पूरी हो गई। दोबारा उठे तो मैं जाग ही रहा था। मैं घूम रहा था, कि और क्या कर दूं। देख रहा था कि अब मैं यहां से जाने वाला हूं। क्या इन लोगों को कोई कमी नहीं होनी चाहिए? क्योंकि मैं अब तब आऊंगा, जब वहां अपनों की कुटिया के निर्माण कार्य की शुरुआत कर दूंगा। मुझे कितना समय लगेगा, कुछ पता नहीं। तो कोई कमी तो नहीं है इनके लिए। अब मैं चौबीस घंटे काम करता हूं। साथ वाले देखते भी रहते हैं। यहां वाले प्रत्यक्ष देखते हैं कि मैं दो बजे के बाद सोता हूं। इनकी एक नींद पूरी होती है, तो मैं इनको जागते हुए मिलता हूं, कि मैं और क्या कर दूं। कहने का मतलब ये है कि आप मेहनत को बढ़ाइए। आप क्या करते हो? चलो, मैंने बेईमानी छोड़ दी। ईमानदारी अपना ली। अब आपने क्या किया? मेहनत कम करना शुरू कर दिया। अब आप कह रहे हो कि ईमानदारी से पैसे कम आते हैं। आप एक बात बताइए। चौबीस घंटे दे रहे थे। अब आठ घंटे दोगे तो इनकम तो कम हो जाएगी। आप ईमानदारी में चौबीस घंटे देके देखो। कई गुना ज्यादा पैसे आएंगे। आप देके तो देखो। जिस तरीके से आप बेईमानी में मेहनत कर रहे थे, अगर उस तरीके से ईमानदारी में मेहनत करो, तो आपको लग रहा है कि उससे कम पैसा आएगा? नहीं लगेगा। लेकिन अभी आप सिकुड़ गए। अपने बच्चों में सिकुड़ गए, अपनी पत्नी में सिकुड़ गए, कि अब समय देने लगे। बड़ी शांति है, सुकून है। यह शांति-सुकून कोई काम का नहीं है। ये तो जानवर के पास भी है। शांति-सुकून तो तब होता, जब आप कहते कि पहले तो मैं अपने बच्चों को समय दे रहा था, अब मैं अनेकों बच्चों के लिए कुछ कर रहा हूं, अनेकों परिवार के लिए कुछ कर रहा हूं, अनेकों जरूरतमंद की सेवा कर रहा हूं। तब कोई मतलब था।
ईमानदार होने का मतलब ये नहीं कि अपने परिवार तक सीमित रहो। ईमानदारी के साथ सत्कर्म। सत्कर्म मतलब हमारे आसपास जरूरतमंद की सेवा। तो ईमानदारी से, शुद्ध, और ज्यादा से ज्यादा आप धन कमा सकते हो। बेईमानी में भी आप कई वर्ष समय लगाके तब जाके पैसा कमाते हो। ऐसा नहीं कि एक ही दिन उठाया और सामान बदलना शुरू कर दिया। व्यापार की शुरुआत आपने पहले ईमानदारी से की थी कि बेईमानी से सीखी? बेईमानी से सीखी। जब आप कस्टमर को अपने हाथ में लेते हो तो ईमानदारी से ही लेते हो। जीवन में जब पहले काम की शुरुआत की, जीवन को याद करो। बेईमानी से हम शुरुआत नहीं करते। हम सीधा बेईमानी नहीं करते। अगर हम सीधा बेईमानी करें तो कस्टमर हमारे पास आएगा ही नहीं। भरोसा तो ईमानदारी का होता है। जब हमने दुकान खोली, समाज को ईमानदारी ही दिखाई। की बेईमानी, लेकिन तुरंत नहीं की। धीरे-धीरे की। जिसके पास से काम सीखे, उधर से बेईमानी सीखी। जहां हम काम सीखते हैं, जिसके द्वारा सीखते हैं, भले वो बेईमान हो, लेकिन उसको हम ईमानदारी दिखाते हैं, तभी वो काम सिखाता है।
आप मुख्य बात पकड़ो। आप कितने भी बेईमान हो, लेकिन हमेशा ईमानदार नौकर चाहिए। जिसने आपको काम सिखाया, जब आपने काम सीखने की शुरुआत की, अगर उस समय बेईमानी दिखाते तो मालिक काम ही नहीं सिखाता। आपने बेईमान व्यक्ति से भी पहले ईमानदारी से काम सीखा। हमारे जीवन की शुरुआत ईमानदारी से होती है। जब आप किसी सेठ के यहां काम सीखने गए, तो अपने आप को ईमानदार ही बताया, कि बेईमान बताया? पहले ईमानदार बताया। ईमानदार बता के काम सीखा। फिर उसमें ये सीखा कि बेईमानी इसमें कैसे होगी। शुरुआत बेईमानी से सीधी नहीं होती। कर ही नहीं पाओगे। शुरुआत जीवन की ईमानदारी से होती है। फिर धीरे-धीरे हम बेईमानी करने लगते हैं। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा जीतने लगते हैं। और धीरे-धीरे बेईमानी हमारी बढ़ती जाती है। और उसमें हम कितनी मेहनत करते हैं, वो देखो। ऐसा नहीं कि पहले दिन काम सीखने गए और कह दिया, हम तो बेईमान हैं, क्या मुझे रखोगे? आपको लगता है रखेगा? क्योंकि बेईमान सेठ को भी ईमानदार नौकर चाहिए। बेईमान आदमी को बेईमान पसंद नहीं। अगर मुझे किसी के द्वारा काम सीखना है, तो मुझे अपना स्तर ईमानदार का लगाना पड़ेगा। तभी वो काम सिखाएगा, नहीं तो नहीं सिखाएगा।
तो आप देखिए, बेईमानी में कितनी मेहनत करते थे और ईमानदारी में कितनी करते हो। अगर ईमानदारी में उतनी मेहनत कर दो, तो बेईमानी से कई गुना मिलेगा। लेकिन आप क्या करते हो? मैं तो आध्यात्मिक हो गया, मेहनत ही कम कर देते हो। अब खुद जोड़ो। चौबीस घंटे काम कर रहे थे। बच्चों को समय, परिवार को समय क्यों नहीं दे पाते थे? क्योंकि हर वक्त काम में लगे थे। पार्टी भी अगर कहीं कर रहे थे दोस्तों के साथ, तो उन्हीं दोस्तों के साथ जिनके द्वारा बिजनेस बढ़ता था। हर वक्त काम ही कर रहे थे, तो पैसे खूब कमाते थे। इसमें भी खूब मेहनत करो। लेकिन आध्यात्म जैसे आया, आदमी रुक जाता है। मेहनत को बढ़ा दो। बेईमानी का धन एक तरफ से आया, दूसरी तरफ दे रहे थे। ईमानदारी का आया तो टिकेगा।
आज यह स्थान बना। यह स्थान हम पहले दिन निकल के नहीं बना दिए। मैंने पहले बारह साल भ्रमण किया। जब बारह साल का भ्रमण हुआ, जब मुझे लगा मैं उस योग्य हो गया, तब मैंने अपनों की कुटिया का निर्माण किया। क्या मैं बारह साल पहले नहीं बना सकता था? मैं तो ज्योतिष था। बहुत आराम से मुंबई में आश्रम बना लेता। मेरे लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। लेकिन मैं उस लायक था ही नहीं। जिस कार्य के लिए निकला था, मैं उस लायक था ही नहीं। तो पहले मैंने अपने आप को उस लायक बनाया, फिर अपनों की कुटिया की स्थापना की। तो आप अपार मेहनत करो। सिकुड़ो मत, फैलाओ। अपने आप को सिकोड़ मत लो, कि मैं और मेरे बच्चे, मैं और मेरा परिवार। अपने आप को इतना फैला दो कि आप गिनती ना कर पाओ, आपके कितने परिवार हैं, कितने बच्चे हैं, कितने भाई-बहन हैं, कितनी मां हैं। आप गिन भी ना पाओ। लोगों के लिए जीना सीखो। महान व्यक्ति वही होता है जो लोगों के लिए जीता है। जो भी लोगों के लिए जीता है, वो महान होता है।
अपनी महानता को जागृत करना है, तो लोगों के लिए जीना पड़ेगा। बातों से बात नहीं बनेगी। ईमानदार कंजूस मत बनो। ईमानदार सत्कर्मी बनो, तब कल्याण होगा। सामने वाले की जरूरत, अपनी क्षमता के अनुसार, उसे सहयोग करो। और अपनी क्षमता को हमेशा बढ़ाओ। धन से, तन से, और समझ से। अपनी क्षमता बढ़ाओ। आप में अपार संभावना है क्षमता बढ़ाने की। अनलिमिटेड। आप अपने आप को उस परम स्थिति तक ले जा सकते हो। बोल के नहीं, करके। हम सिर्फ बोलते हैं। बोलने से कुछ नहीं होगा। करने से होगा। करने से परिणाम आएगा, बोलने से नहीं।
ईमानदारी में मेहनत करो। ईमानदारी में तो सबसे ज्यादा संभावना है आगे जाने की, आगे बढ़ने की। कुदरत भी सपोर्ट करती है। सब लोग सपोर्ट करते हैं। ईमानदार व्यक्ति के सामने बेईमान भी खड़ा नहीं होता। वो पीछे-पीछे बोलता रहता है। सामने आने पर चुप हो जाता है। ईमानदारी में इतना बल है।
भाई, देख तो, अंदर तेरे अंदर है। कारण मेरे अंदर थोड़ी है। मेरे अंदर कारण है तो मुझे ही तो देखना पड़ेगा। अब कोई और देख के मेरे कारण का क्या करेगा? या तो गुरु बता सकते हैं, या मैं खुद देख सकता हूं। इसमें तो कोई कुछ नहीं कर सकता। इससे ज्यादा प्रत्यक्ष क्या हो सकता है? जैसा है, वैसा हमें मिल रहा है। उससे ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। वो तो हमारे ऊपर डिपेंड है, कि हम कितना पचा पाते हैं, हमारी कैपेबिलिटी कितनी है, हमारी पात्रता कितनी है। उसी के ऊपर डिपेंड है।
मुझे ये देखना है, कि जिस मकसद से कार्य किया है, और जिस मकसद से मैं गया हूं, मैं कर रहा हूं या नहीं। मुझे भीड़ नहीं देखनी। पुराने लोग हैं कि नहीं हैं। पुराने लोगों को लेकर क्या करोगे, और नए लोगों को लेकर क्या करोगे? हमें तो ये देखना है, कि मैं जिस उपदेश से आया हूं, वो कार्य कर रहा हूं कि नहीं। हमसे क्या मतलब, पुराने लोग आएं चाहे ना आएं। क्या फर्क पड़ता है? हम तो इस व्यक्ति के लिए आए हैं। ये तो है। अगर ये चला गया होता, तब बात बनती, कि वो नहीं है इसलिए कुछ ऐसा हो रहा है। अगर आपको पुराने लोगों की याद सता रही है, इसका मतलब आप उसमें लिप्त हो गए हो।
ये शब्द ही कहां से आया, कि पुराने लोग नहीं दिख रहे? अपने अलावा, और गुरु के अलावा, गुरु के शब्दों के अलावा, तीसरे की बात ही नहीं करनी। मुझे क्या मतलब पुराना-नया? अगर मैं कह रहा हूं कि पुराने लोग नहीं दिखे, इसका मतलब मेरी किसी न किसी से आसक्ति हो गई है। मैं पुराने लोगों को क्यों देखना चाहता हूं? नए लोगों को क्यों नहीं देखना चाहता, या नए लोगों को क्यों देखना चाहता हूं? मैं अपने कल्याण के लिए आया हूं। मैं हूं, वो है। मेरे लिए तो जिसके पास गया हूं, वो। उसके अलावा मेरी जिंदगी में कोई नहीं होना चाहिए। क्योंकि जितने लोग जिंदगी में थे, उन्हीं से तो मैं परेशान था। अब यहां भी आसक्ति मान लूं। पता चला कल बाबूलाल चला जाए, तो बाबूलाल चला गया। बाबूलाल के लिए मैं आया था? मैं तो इस व्यक्ति के लिए आया था। ये व्यक्ति शुरू से लेकर अभी तक है कि नहीं है? ये कहीं गया क्या? मैं भी तभी से हूं। यहां आया हूं शुरू से। तो ये तो है।
आपके द्वारा बहुत लोगों को समझ मिलेगी। मेरे अंदर से ये कहां पैदा हुआ, कि पुराने लोग नहीं दिख रहे? कुछ एक-आध आदमी उस टाइम उस लायक नहीं होंगे, वो नहीं आए। जैसे इंदौर से वापस चला गया, तो इस लायक नहीं था, इसलिए नहीं आ पाया। उन्हीं के अंदर कमी है। ऐसे लोग ना आएं तो ठीक है। आगे क्या उतापात करेंगे? और आज देखो, संख्या पुराने लोगों की सबसे ज्यादा है। इसका जवाब प्रकृति ने दे दिया। पुराने लोगों को गले मिल लोगे? आज संख्या देखो, तो सबसे ज्यादा पुराने लोगों की संख्या है।
आपसे पूछा गया था, यमुना के तट पर, हरियाणा में आश्रम बन रहा है, कैसा लग रहा है? तो आपने बात ही पलट दी। हमसे क्या पूछा जाता है, हम जवाब क्या देते हैं। यही हमारी गड़बड़ी है। जिस उपदेश से गए हैं, क्या मैं वो कर रहा हूं? मुझसे कुछ और पूछा जा रहा है, और मैं जवाब कुछ और दे रहा हूं। उस जवाब का क्या मतलब है?
किसी ने पूछा, टिकट लेने गए, कहां जाना है? आपने किसी और स्टेशन का नाम बता दिया, उसने टिकट फाड़ दिया। फिर कह रहे हो, जाना तो यहां था। वो बोलेगा, नाम क्यों लिया? भरपाई मैं करूं? लेकिन आपकी ऊर्जा गई। आपका धन गया। रिटर्न भी करेगा तो कुछ काट ही लेगा। ऐसे बोलने में बहुत कुछ खो जाता है। वो पूछ रहा है कहां जाना है, और आपने कुछ और स्टेशन का नाम ले लिया। उसने तुरंत दे दिया। फिर आप कहो, यहां तो नहीं जाना, यहां जाना है। जब पूछा कहां जाना है, तो दूसरा स्टेशन का नाम क्यों लिया? स्टेशन बढ़िया है, उससे क्या हुआ?
जीवन में इतना याद रखो। मुझसे क्या पूछा जा रहा है? उसका जवाब अगर मेरे पास है तो दे दूं। नहीं है तो बोल दूं, नहीं पता। दो में से एक बात। या तो जवाब मेरे पास है, या नहीं है। मैं दूसरी बात क्यों करूं? उसमें समय बर्बाद होगा। अगर यही आदत रही, तो हम हमेशा उल्टा-सीधा मांगते रहते हैं।
जैसे कहानी है। शंकर भगवान का भक्त था। रोज नदी पार करके जाता था। गांव वालों ने रोका, फिर भी गया। शंकर भगवान प्रसन्न हो गए। बोले, क्या चाहिए? बोला, चूना तो ठीक है, लेकिन तंबाकू दे दो, गीला हो गया। क्या तंबाकू के लिए भक्ति कर रहा था? वैसे ही, मांगना भी आना चाहिए। समय पर जवाब देना आना चाहिए। आपका सवाल और उसका जवाब, यही आपको पहुंचाएगा। या आपका सवाल और उसका जवाब, तभी आगे बढ़ोगे। सवाल कुछ और और जवाब कुछ और, तो उसका कोई मतलब नहीं, कोई मीनिंग नहीं। अब पुराने लोग सबसे ज्यादा हैं। अब क्या करोगे? गले मिलोगे?
आप इस पर चिंतन करिए। मैं इसलिए कह रहा हूं कि आप लोग किसी के चक्कर में मत पड़ो। आप लोग सिर्फ एक व्यक्ति के लिए यहां आए हो। मेरे अलावा तुम्हारी जिंदगी में दूसरा होना ही नहीं चाहिए। और मेरे लिए, तुम्हारे जीवन में तीसरा आना ही नहीं चाहिए। अगर तीसरे की एंट्री हुई, तो इसका मतलब तुम गए। जिस उद्देश्य को लेकर आए हो, अब उसकी पूर्ति नहीं होगी। क्योंकि तुमने तीसरे को पकड़ लिया। लक्ष्य से विचलित हो गए।
अर्जुन के साथ क्या हुआ था? पांचों पांडवों के साथ। सबने बोला, मुझे पेड़ दिख रहा है, ये दिख रहा है, वो दिख रहा है, चिड़िया दिख रही है। अर्जुन ने कहा, मुझे आंख दिख रही है। क्योंकि कहा गया था, निशाना आंख पर लगाना है। अब तुझे दिख क्या रहा है? सबने अलग-अलग कहा। अर्जुन ने कहा, मुझे आंख दिख रही है। बोले, मार दे।
तो मैं जिस उपदेश से गया हूं, और मुझसे अगर कोई सवाल कर रहा है, और मैं यहां किसी से सवाल कर रहा हूं, तो मुझे जवाब ही चाहिए। उसके अलावा कोई बात ही नहीं करनी। उसके अलावा बात की, इसका मतलब तुम उसमें गए थे। हमें भीड़ नहीं देखनी। मुझे मेरा मकसद देखना है। जिस उद्देश्य को लेकर मैं इस व्यक्ति के पास आया हूं, क्या मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो रही है? हो रही है तो ठीक है। नहीं हो रही, तो छोड़ दो। चाहे उसके पास लाखों लोग हों। मुझसे क्या मतलब? मैं कहीं गया हूं तो उपदेश लेकर गया हूं। जीवन में ये बात याद रखो। किसी और को मत देखो।
मैं जिसके पास गया हूं, क्या उस उपदेश की पूर्ति हो रही है, हां या ना? अगर हां, तो मैं उस उपदेश की पूर्ति करूंगा। वहां तब तक रुकूंगा, जब तक मेरी पूर्ति नहीं हो जाती। और नहीं हो रही, तो मैं चला जाऊंगा। मुझे उस व्यक्ति से और मुझसे मतलब है। मुझे तीसरे से मतलब नहीं, कि किसके उपदेश की पूर्ति हो रही है और किसके नहीं। अगर किसी के उपदेश की पूर्ति हो रही है और मेरी नहीं, तो उसके उपदेश की पूर्ति से मेरा क्या होने वाला है? मेरा थोड़ी कुछ होगा। वो दुनिया के लिए भगवान हो, मुझसे क्या मतलब? क्योंकि मैं भगवान थोड़ी खोज रहा हूं। मैं परमात्मा थोड़ी खोज रहा हूं। मेरी, मेरे उपदेश की पूर्ति हो जाए। मैं उस व्यक्ति को खोज रहा हूं। मुझे भगवान थोड़ी चाहिए। मुझे परमात्मा थोड़ी चाहिए। परमात्मा लेकर क्या करूंगा? चलो, परमात्मा भी मिल गया। लेकिन अगर मेरे उपदेश की पूर्ति नहीं हो रही, तो ऐसे परमात्मा को लेकर क्या करूंगा?
क्योंकि जीवन में मैं किसी से मिल रहा हूं, तो किसी उद्देश्य को लेकर मिल रहा हूं। उद्देश्य पूरा होना चाहिए। और वो पूरा नहीं हो रहा, सामने वाला परमात्मा भी हो, तो मुझसे क्या मतलब। मेरे उद्देश्य की पूर्ति कर दे, ऐसा व्यक्ति मेरे जीवन में चाहिए। मिल गया, तो मैं करता रहूंगा। नहीं मिला, तो मैं खोजूंगा। मुझे और किसी से मतलब नहीं। और जहां मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो रही, उसको पूरा संसार, पूरा विश्व परमात्मा मान ले, मुझे क्या मिलेगा? क्योंकि मेरे लिए मैं क्या हूं, वो मायने रखता है। आप क्या हो, वो थोड़ी मायने रखता है। मेरी जिंदगी मुझसे है, तुझसे थोड़ी।
मैं अपने स्तर को उठाने तेरे पास आया हूं। मैं अपनी समझ को विकसित करने तेरे पास आया हूं। मैं तेरे लिए तेरे पास थोड़ी आया हूं। मैं अपने लिए तेरे पास आया हूं। तो मुझे सीधी बात करनी चाहिए। जिस के लिए गया हूं, वो हो रहा है? हो रहा है, तो मैं उस व्यक्ति के पास रुकूंगा। नहीं हो रहा, तो मैं आगे बढ़ूंगा। जब ये भाव रहेगा, तब जाके आपका आत्मिक कल्याण होगा। तब आपके उद्देश्य की पूर्ति होगी। दुनिया की हर ताकत आपकी मदद करेगी।
तुम नहीं फंसे हो, दूसरों को फंसा दोगे। आप जैसे लोगों से प्रेरणा लेते हैं लोग। जैसे कोई बुजुर्ग है, कोई पढ़ा-लिखा है, कोई काम कर रहा है, तो बच्चे उससे प्रेरणा लेते हैं। मेरा कुछ नहीं होने वाला। लेकिन जितने लोग मुझसे प्रेरणा लेंगे, उनका कुछ होगा। आज हम जितना सीखते हैं, समाज को देख के ही सीखते हैं। बाद में छांटते हैं। लेकिन समाज को देख के ही सीखते हैं। मेरा तो कुछ नहीं होगा। लेकिन जितने लोग मुझसे प्रेरणा लें, उनका तो कुछ होगा। तो मुझे उस तरीके से बोलना चाहिए, उस तरीके से जीना चाहिए, कि मुझसे कोई सीख के आगे बढ़े। मैं नहीं फंसा हूं। लेकिन मेरे शब्द किसी और को तो नहीं फंसा रहे। मैं विचलित नहीं हो रहा। लेकिन मेरा चाल-चलन ऐसा नहीं होना चाहिए कि दूसरा विचलित हो रहा हो। उसका जिम्मेदार तो मैं हुआ। तो शब्दों का प्रयोग, उठना, बैठना, चलना, सोच-समझ के करना होगा। क्योंकि एक सीखने वाला है, एक सिखाने वाला है।
हम लोग सबसे ज्यादा कहां से सीखते हैं? देखकर और सुनकर। और वो ज्यादा सीखते हैं। बच्चों को कोई गाली सिखाता है? आपने अपने बच्चों को कभी पकड़ के गाली सिखाई? लेकिन बच्चों को गाली आती है। कहां से आती है? समाज से। समाज मतलब तुम ही से। उसमें तुम भी एक हो। देख के, सुन के आती है। तो चलो, मैं विचलित नहीं हो रहा, लेकिन कुछ ऐसे वाक्य तो नहीं बोल रहा कि लोग विचलित हो जाएं, लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचे। शब्दों को बहुत समझ के बोलना चाहिए। पूर्वजों ने कहा था, सुनो, समझ लो पहले, और फिर धुनो। इसका परिणाम क्या है?
आप सीधे-साफ व्यक्ति हो। अपने कल्याण में लगे रहो। आपका कल्याण हो जाए। मेरा भाव यही है कि आप लोगों का कल्याण हो। आपका भाव पूरा होगा। इसमें किसी किस्म का संदेह नहीं। बोलने का मतलब यही है। काम करने का मतलब सिर्फ इतना ही है। एक चीज नोट कर लो। आखिरी तक आप जहां लगे हो, वही चले जाओ। आखिरी तक आप किस भाव से लगे हो, वही यात्रा आगे होगी। वही मेरी यात्रा पूरी होगी। आप लगे हो, तो यात्रा पूरी होगी ही होगी। कोई डाउट नहीं। मेरे को भी नहीं है। किसी और को भी नहीं रहना चाहिए। मुझे डाउट नहीं होना चाहिए। बस, मुझे और मेरे गुरु। दो को डाउट नहीं होना चाहिए। आप तो शुरू से ही मेरे उसमें हो।
आपने उसे बीच रास्ते में छोड़ दिया, और आप लायक थे आगे पहुंचाने के। आपने उस समय के लिए कर दिया। पूरे विश्व का सोच उस समय के लिए कर दिया। अब उसे जरूरत पड़ेगी, कोई और मिल जाएगा। मैं उस वक्त क्या कर सकता हूं? ऐसे अगर मैं सबका नंबर लेता रहूं, मैं फंस जाऊंगा। अगर सबका नंबर लूंगा, कि आगे कुछ हो तो बोलना, तो आप फंस जाओगे।
अभी आप मुझे मिले हो, और अभी आपकी जरूरत ये है। सबसे बड़ी जरूरत सर्वप्रथम भूख होती है। अगर किसी व्यक्ति का इलाज कराना है और भूख लगी है, तो पहले भूख मिटानी पड़ेगी। भूख नहीं मिटाओगे, तो इलाज करा के भी क्या करोगे? सर्वप्रथम भूख। उसके बाद व्याधि दूर करना, रोग दूर करना, रोग का इलाज कराना। उसके बाद तन पर कपड़ा। उसके बाद मकान। क्योंकि मकान नहीं भी है, भोजन है, तो कहीं भी सो जाएगा। बहुत अच्छा महल भी दिला दो, लेकिन भोजन नहीं है, और बीमारी में सड़ रहा है, तो कोई मतलब नहीं। तो सर्वप्रथम भूख, फिर इलाज, फिर मकान, फिर तन पर कपड़ा। तन पर कपड़ा समाज के लिए चाहिए।
मुझे कोई व्यक्ति मिला, उस समय मैं उसके लिए क्या करूं, कर दिया, बस बात खत्म। उसे और कोई मिल जाएगा उसके बाद। ऐसा नहीं कि उसका नंबर लेकर उसके पीछे भागना है। मुझे ये काम नहीं करना, क्योंकि मैं फंस जाऊंगा। उसके बाद एक बीमारी और खड़ी होगी। जिससे जुड़ा होगा, वो उसे लेकर चला आएगा। मुझे प्रकृति ने जिससे मिलाया, उसके लिए करना है। आप उसको बोल दोगे कि ये नंबर ले लो, जरूरत है, तो वो अपने पड़ोसी को, रिश्तेदारों को, सबको लेकर आ जाएगा।
सिकुड़े इसलिए, कि पहले चौबीस घंटे काम कर रहे थे, अब आठ घंटे काम करने लगे। अपने परिवार को समय ज्यादा देने लगे। तो सिकुड़ गए। काश और भी ईमानदारी के साथ मेहनत करके परिवार को सपोर्ट कर सकते थे। लेकिन मोह में आ गए। मोह में शांति दिखने लगी। अपने बच्चे दिखने लगे। बच्चे प्यार से बातें करने लगे। पत्नी अच्छी बातें करने लगी। लेकिन उनको दे क्या रहे हो? पेट ही तो भर रहे हो। पहले भी भर रहा था। क्या लगता है कि तुम्हारे शब्दों से उनका आत्मिक कल्याण हो जाएगा? ऐसा कुछ नहीं। उनको दे क्या रहे हो? और इतना सज्जन परिवार भी नहीं था। जब तुम बेईमानी कर रहे थे, तब पत्नी ने नहीं कहा कि बेईमानी की रोटी नहीं खाऊंगी। ऐसी पत्नी नहीं थी। तुम बेईमानी कर रहे थे तो भी मजा ले रही थी। अब तुम्हारी ईमानदारी का मजा ले रही है। बच्चे भी वैसे ही। एक तरह से अपने शरीर का शोषण करवाने लगे। पहले बेईमानी में करवाते थे। अब परिवार में करवा रहे हो। तब भी तुम्हारा उपयोग किया। अब भी कर रहे हैं। काश वो समय अपने आत्मिक कल्याण के लिए लगाते। ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करते।
अगर आप बेईमान हुए, तो सिर्फ आप बेईमान थोड़ी थे। उन्होंने आपको सहयोग दिया। अगर आपकी पत्नी खड़ी हो जाती, कि हम ईमानदारी की रोटी खाएंगे, आपके बेईमानी के पैसे का जीवन नहीं जिएंगे, तो क्या वो आपको छुड़ा सकती थी? छुड़ा सकती थी। लेकिन वो बेईमान थी। तुम चाहे जैसे भी खिलाओ, मुझे तो मौज करनी है। ऐसे लोगों को ज्यादा समय मत दो। वो हर वक्त तुम्हें लूटेंगे। जब आदमी सफल होता है, तो लोग उसका उपयोग करते हैं। असफल हो जाता है, तो ताली बजाते हैं, हंसते हैं। समाज, मतलब आपका बनाया हुआ समाज, पूरी प्रकृति की बात नहीं कर रहा। आपके जितने लोग हैं, जब आप कुछ नया करने निकलोगे, तो पहले आप पर हंसेंगे। फिर बोलेंगे, मुझे तो पहले मालूम था, ये कुछ नहीं कर पाएगा। हर स्थिति में मजा लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए जीना छोड़ो। उनके लिए सिकुड़ना तो बर्बादी है। तुम पहले भी बर्बाद हो रहे थे, अभी भी हो रहे हो। आप देख नहीं पा रहे।
पुराने कर्मों का छुटकारा कैसे मिलेगा? आप बोले, मैंने भरपाई कर दी। कहां कर दी भरपाई? भरपाई इतना आसान है क्या? प्रकृति एक-एक दाना डालो तो कई गुना देती है। बीज डाला तो कई गुना देके खत्म कर देगी। फल का बीज डालो तो पता नहीं कितने साल तक देगी, सौ साल तक, जैसा वृक्ष हो। बड़ा पेड़ हो, एक बीज डाल दिया, पता चला कई सौ साल फल दिया। तुमने बेईमान के साथ बेईमानी की होगी, तब तो तुरंत लिया-दिया, कुछ ही दिन में खत्म। और अगर किसी ईमानदार व्यक्ति के साथ बेईमानी कर दी, तो पता नहीं कितने सालों तक झेलना पड़ेगा। बीज तो दोनों हैं। फल का बीज हो चाहे अनाज का, पौधे तो दोनों में लगेंगे। लेकिन एक कुछ दिन में नष्ट हो जाएगा, एक कई साल चलेगा। तभी आपने भरपाई थोड़ी की है। आपको लग रहा है कि किसी के साथ बेईमानी की, हॉस्पिटल में पैसा दे दिया, तो भरपाई हो गई? भरपाई नहीं हुई। पेड़ से पेड़ है, तो भरपाई नहीं हुई। आप ये मत समझना कि मैं भर दिया हूं। अब ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करो, और मेहनत बढ़ा दो।
आप बेईमानों को समय दे रहे हो, और बड़े खुश हो, शांति है। आप मोह के बंधन में फंस गए। काश ईमानदार होते तो ठीक लगता। सच पूछो तो तुम्हारी बर्बादी का कारण तुम्हारा परिवार ही तो है। बेईमानी करते थे, उन्हें पता नहीं था? पता था। कभी रोका क्या? बेईमानी का परिणाम उन्हें मालूम नहीं था? अपने बच्चों को सिखाते हो, झूठ मत बोलो। पत्नी भी सिखाती है। और जब आप बोल के आते थे, तो आपको क्यों नहीं मना किया? आपकी कमाई का धन क्यों खाया? देखा जाए तो आपकी बर्बादी के जिम्मेदार वो हैं। पहले तो आप हो। लेकिन प्रेरणा तो वो भी थी। अगर वो आपके विरोध में खड़ी हो जाती, तो या तो आप सुधर जाते, या उसे छोड़ देते। लेकिन वो स्वार्थ थी। हम किसको समय दे रहे हैं? जिसने हमें बर्बाद किया। अब इसे बहुत गहराई से देख लो। बर्बादी का कारण बना, और उसी के साथ सुकून मिले। इससे कुछ नहीं होने वाला। आपने भरपाई अभी नहीं की। आपने क्या किया? बेईमानी से धन कमाया। कुछ हुआ तो उस पैसे से अपने आप को बचाया। सुरक्षित किया। भरपाई थोड़ी हुई है। रोग को भोगा, रोग का इलाज करा लिया। अगर कुछ घटना घटी तो उसे रोक लिया, अपनी पावर से, बेईमानी की पावर से।
इसे अच्छे से समझ लो, मैं किसका साथ दे रहा हूं, मैं किसको समय दे रहा हूं। देखोगे, जिसने हमें बर्बाद किया, उसके साथ बड़े सुकून से हूं। मोह के जाल में मत फंसो। प्रत्यक्ष देखना सीखो। रिश्ते को पीछे हटाओ। अगर देखोगे, तो आपकी बेईमानी को आपके परिवार ने ही बढ़ाया। चाहे पत्नी हो, चाहे मां हो, चाहे बाप हो, चाहे भाई। जितने लोगों ने आपके धन का उपयोग किया, वो जिम्मेदार थे। उनका साथ छोड़ो। जिम्मेदारी है, तो उन्हें जरूरत में दो। और ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करो। उन्हें कितना दो? उतना ही दो, जितने में चल सके। उससे ज्यादा धन बचे, सत्कर्म में लगाओ। साथ छोड़ें चाहे रहें, मोह में मत फंसो।
पहले मैं बेईमानी करता था, बड़ा परेशान था। अब ईमानदारी अपना ली। क्या किया? परिवार को पूरा समय। वो कौन सा परिवार है? उसका चेहरा तो देख लो। अगर एक बार विरोध करते, तो तुम उतना आगे नहीं जा पाते। शुरुआत पर ही रोक सकते थे। ऐसे लोगों को समय देके खुश मत हो जाओ। ईमानदारी अपनाने के बाद रोका गया, क्यों ईमानदारी अपना रहे हो? तो फिर तुमने क्या किया? फिर उन्हीं को समय दिया। इसलिए ईमानदारी अपनाने के बाद ज्यादा से ज्यादा ताकत इकट्ठी करो। धन, तन का बल, समझ का बल। और वो जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। जितनी जिम्मेदारी है, उनको जरूरत में दो। और बचा हुआ धन, चाहे तन का बल, चाहे समझ, सत्कर्म में लगाओ। एक महीना अपने आप को कहीं सेवा में झोंक दो। तन का बल कहां खर्च करोगे? एक महीना जरूरतमंद की सेवा में कहीं झोंक दो, जहां आपको लगे कि जरूरतमंद है। अपनी समझ के साथ।
अगर मैं कहूं, तो तुम्हारे पापा को जीवन में नहीं दिलाना चाहिए। अब तुम कमा के ही लेना।
और मैं उस बच्चे को यह कह दूं। अगर उसके पापा को साइकिल देना है, तो घर पर कोई काम पड़ता है, जितना मजदूरों को देता है, उस काम में उसको लगाए, उसका पेमेंट निकाले। और जब साइकिल का मूल्य हो जाए, तब जाके साइकिल खरीद ले।
ये तो दौड़ ही रहा है। तो मैं तो कहूंगा, दिलाना ही नहीं चाहिए। साइकिल टूटी नहीं, इसने तोड़ दी। तीन तोड़ दी, तो चौथा भी तोड़ देगा। इसके पापा खुद मजदूरी कराएं, और फिर ये साइकिल लाएगा, तो नहीं तोड़ेगा। और तोड़ेगा, तो फिर कमाए, तब नहीं तोड़ेगा।
इससे क्या फर्क पड़ता है? वो है या नहीं है? मेरी जिंदगी तो है। मैं तो हूं। लोग हैं मेरे आसपास। बेईमानी भी है, ईमानदारी भी है, सत्कर्म भी है। सब समझ में आ रहा है। तो मुझे क्या मतलब ईश्वर से? खेल यहां ईश्वर का नहीं है। ना तो ईश्वर मुझे चाहिए। खेल है, मैं क्या कर रहा हूं। क्या खेल रहा हूं। किस खेल का मैं मास्टर हूं, और मैं उसमें क्या कर रहा हूं, ये देखना है।
मास्टर ब्लास्टर है, किसी न किसी चीज में। यहां हर व्यक्ति मास्टर है। राजा अगर मास्टर है, तो सैनिक भी मास्टर है। वो अलग जगह मास्टर है, ये अलग जगह मास्टर है। मास्टर यहां सब हैं। राजा कहीं और मास्टर है, तो सैनिक पब्लिक को ही धौंस दे रहा है। एक हवलदार है। हवलदार के ऊपर कोई है, सेठ है, तो उसको सलामी मार रहा है। लेकिन कोई अगर उससे नीचे है, तो उसको डंडा दिखा रहा है। आप ये मत सोचना कि वो आखिरी पोस्ट पर है, हवलदार है, इसलिए कुछ नहीं। उसकी भी एक पोस्ट है। मास्टर तो वही है, अपने खेल में।
अब पता चला, उसे डंडा तो मिला है। अब उस डंडे का उपयोग कहां कर रहा है? लोगों को दबाने में, कि लोगों को बचाने में। मास्टर वो भी है। यहां सब मास्टर हैं। यहां हर व्यक्ति मास्टर है।
पत्नी निर्भर नहीं है। निर्भर आपने किया है। तो उसकी जरूरत पूरी करो, और आगे जाओ।
जीव का स्वभाव है मालिकपन बनना, क्योंकि वो मालिक के साथ था। वो सब पर अधिकार जमाना चाहता है। अगर वो किसी के अधीन है, तो मजबूरी में है। जीव कभी भी अधीनता स्वीकार नहीं करना चाहता। शेर अगर आदमी के कंट्रोल में हो गया, तो कोई कारण बना है। वो अधीन नहीं रहना चाहता। लेकिन अधीनता स्वीकार की है, तो उसके पीछे कोई कारण है।
यहां जीव का स्वभाव है, चाहे राजा हो, चाहे रंक हो, कंट्रोल करना चाहता है। और किसी के अधीन रहना नहीं चाहता। अधीन रहना मजबूरी है, परिस्थिति है। विद्यार्थी शिक्षक से शिक्षा इसलिए ले रहा है कि मैं तुमसे आगे निकल जाऊं। शिक्षा इसलिए नहीं ले रहा कि मैं तुमसे नीचे रहूं। शिक्षा इसलिए ले रहा है कि मैं तुमसे आगे चला जाऊं। यहां हर आदमी हर आदमी को कंट्रोल करना चाहता है। और अगर आपको लग रहा है कि ये मेरे अधीन हो गया, तो वो आपको कंट्रोल नहीं कर पा रहा, इस समय। अब आपसे कुछ ले रहा है। धीरे-धीरे अपनी ताकत विकसित कर रहा है।
मां-बाप बच्चों को जन्म देते हैं। बच्चे जब तक छोटे हैं, कंट्रोल में रहते हैं। जब उनकी पावर होती है, तो पीट के कहते हैं, चुप। आप ये मत समझना कि उसने एक दिन में पीटा। ये योजना बचपन से चल रही थी। मैं कब बड़ा हूं, कब पावरफुल हूं, कब इसे कंट्रोल करूं। और जब बड़ा होता है, तो कंट्रोल कर लेता है। कंट्रोल एक दिन में नहीं किया। एक दिन में उसने नहीं किया। योजना बचपन से चल रही थी। स्वभाव ही है, अधीन रहना नहीं चाहता, लेकिन दूसरों को अधीन करना चाहता है। हमेशा।
बस उसकी एक जगह नहीं चलती, गुरु के यहां। गुरु ज्यादा पावरफुल है, इसलिए? नहीं। गुरु ज्यादा होता तो ये उसे पार कर देता। जीव ऐसा है कि सबसे ऊपर जा सकता है, सबसे नीचे जा सकता है। बीच में खड़ा है। ये सबको पार कर रहा है, या नीचे जा रहा है, या ऊपर जा रहा है। गुरु अगर सिर्फ ज्यादा होता, तो जीव उसे भी पार कर देता। गुरु अनलिमिटेड है। चाहे नीचे में, चाहे ऊपर में। वो तुमसे नीचे भी जा सकता है। तुमसे ऊपर भी जा सकता है। अनलिमिटेड है।
गुरु का भाव रहता है कि तुम्हें अधीनता से मुक्त कराए। इसलिए जीव गुरु को स्वीकार कर लेता है। क्योंकि उसमें देख पाता है कि ये मुझे अधीनता से मुक्त कराना चाहता है। तो स्वीकार कर लेता है, कि ये मेरा हितैषी है। बाकी दुनिया में और कोई नहीं। चाहे मां-बाप, भाई-बहन, जितने भी हैं, सब एक-दूसरे पर कंट्रोल करना चाहते हैं। लेकिन गुरु एक ऐसी सत्ता है इस पृथ्वी पर, जो आपको अधीनता से मुक्त कराना चाहता है। इसलिए गुरु के यहां वो नहीं चलती। गुरु के यहां उसकी सारी पावर खत्म हो गई। अभी एक अनपढ़ भी झाड़ू मार रहा है, और पीएचडी किया हुआ भी लैट्रिन कर रहा है। वहां पावर काम नहीं करेगी, क्योंकि गुरु अनलिमिटेड है, और वो आपको अधीनता से मुक्त कराना चाहता है। ये बात उसे समझ में आ गई।
बाकी लोग क्या कर रहे हैं? एक-दूसरे को अधीन बनाना चाहते हैं। ये लड़ाई राग-द्वेष की है। गुरु के यहां ये नहीं चलता। अपने घर में देखो। ऐसा हो सकता है कि लड़ाई ना हुई हो आपस में, लेकिन राग-द्वेष बनता ही रहता है। बनता इसलिए है कि एक-दूसरे को कंट्रोल करना चाह रहे हैं, बता नहीं रहे। गुरु इससे मुक्त कराता है। इसलिए गुरु के यहां उसकी वो ऊर्जा नहीं निकलती।
कंट्रोल तो उसे भी करना था। शुरुआत में करना ही चाहता था, कि ऐसा प्रश्न पूछूंगा, जवाब नहीं दे पाएंगे। इतने गहरे प्रश्न हैं, आज तक कोई जवाब नहीं दे पाया, ये कैसे दे पाएंगे। कंट्रोल तो उसे भी करना था। लेकिन कंट्रोल नहीं कर पाता। एक ही जगह है।
घर वाले बचपन की बात ज्यादा याद दिलाते हैं। हमारी कमी को उभारते हैं। इसलिए कि उन्हें लगता है, तुम उन्हें कंट्रोल कर रहे हो, तुम उन्हें दबा रहे हो। तब वो परिस्थिति याद दिलाते हैं, देख, तेरी अधीनता तुझे दिखाता हूं। आज तू ज्यादा पावरफुल बन रहा है, तो वो बात याद दिला के तुम्हें गिरा देते हैं। जब भी लगेगा कि तुम उनको पार कर रहे हो, उन्हें दबाना चाहते हो, तो तुम्हारी बुरी परिस्थिति याद दिलाएंगे। तुम वही हो। तब वहां चुप होना पड़ता है।
गुरु अगर देख लेता है, तो समझाने के ढंग से गिल्ट में नहीं ले जाता। वहीं से उठा लेता है। गिल्ट को खत्म करता है। गिल्ट मत करो। हो गया, हो गया। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति थी। तुम उस परम स्थिति को उपलब्ध हो सकते हो। तुम में ये संभावना है। गुरु याद दिलाता है, जितना भी स्थिति-परिस्थिति में तुमने धारण किया है, तुम ये नहीं हो। और समाज बताता है, तुम ये ही हो। समाज मतलब घर वाले। हमारे लिए जितने लोग परिचित हैं, वही हमारा समाज है।
मां-बाप कैसे-कैसे पाले हैं, सब याद दिलाते रहते हैं। हम भूखे सोए, तुमको खिला के सुलाया। वो सारा क्यों बताते हैं, पता है? क्योंकि दबे रहो। ऐसे तुम दबे रहो। ऋणी रहो तुम। हम उनके ऋणी रहे। फिर शास्त्रों में ऐसा लिख दिया गया कि मां-बाप का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता। ऋण है ही नहीं। क्योंकि उनके मां-बाप ने भी उनको वैसा ही किया। ऋण नहीं है। ऋण किसी का भी नहीं है।
आपके कर्मों से देखो। कितने लोगों का जन्म हुआ, मां मर गई। क्या वो नहीं पलते? तो यहां हमारे कर्मों से मुझे सब कुछ मिला है। मैं किसी का ऋणी नहीं हूं। मेरे कर्मों के आधार पर मुझे सब फिक्स होकर आया है। अगर मैं बेईमानी ना करूं, तो मैं मुक्त हो जाऊं। क्योंकि सब फिक्स होकर आया है, कि मैं कितना भोगूंगा, कौन-कौन मुझे मिलेगा, कौन-कौन अपमान करेगा, क्या-क्या घटनाएं होंगी। सब पक्का है। अगर मैं बेईमानी ना करूं, तो मुझे ईमानदारी की भी अलग से जरूरत नहीं। क्योंकि ईमानदारी तो मेरे कर्म में है ही। तो मैं अपने पीछे के भोग से मुक्त हो जाऊंगा। मैं किसी का ऋणी नहीं हूं। यहां कोई किसी का ऋणी नहीं।
बस अपने पापों का कर्ज है। जितना कर्म किया है, चाहे अच्छा हो, चाहे बुरा हो, दोनों का फल भोग रहे हैं हम। अच्छा किया हो तो भी, बुरा किया हो तो भी, दोनों का फल भोग रहे हैं। राजा से रंक, रंक से राजा। और राजा-रंक से मुक्त होना है, तो फिर वही करो। सत्कर्म अपना लो, ईमानदारी के साथ। तो मुक्त हो जाओगे।
मधुर रस मतलब शराब। शास्त्रों में मधुर रस बोला गया, सोम रस बोला गया। आप कोई भी नशा कर रहे हो, तो देखो। सिर्फ नशा करने से कोई नहीं गिरता। नशा के बाद काम क्या करता है? मुख्य बात उस नशे का उपयोग करने के बाद कर्म क्या करता है। उस कर्म से गिरेगा, नशा करने से नहीं। नशा करने से धन का नुकसान होता है, तन का नुकसान होता है, और समाज के ताने सुनने पड़ते हैं। नशे से हमारे जीवन में कोई लाभ नहीं। ना तो ये पूरी शरीर की जरूरत है। तो किसी तरह का नशा नहीं करना चाहिए। बाकी, सिर्फ नशा करने से हमें दोष नहीं लगता। हम कर्म क्या करते हैं, उससे पाप-पुण्य लगता है।
अगर उसको सही मात्रा में लेते हैं, तो आपको देखना है, आप उसे दवा में उपयोग कर रहे हो, कि नशे में उपयोग कर रहे हो। जैसे एक खांसी की सिरप आई थी, कोरेक्स। धीरे-धीरे वो कम मिलने लगी। क्योंकि बनी थी खांसी के लिए, और लोगों ने उसे नशे में उपयोग करना शुरू कर दिया। दो-दो, तीन-तीन बोतल पी लो, सो जाओ। डिप्रेशन में जाते थे, उसको पी लेते थे। महक कुछ नहीं आती थी, कोई प्रॉब्लम नहीं थी। लेकिन अब आपको सीधा मिलता भी नहीं। मेडिकल में एनआरएक्स में आती है, बंद। कहीं-कहीं खास जगह दिखती है। वो भी कहते हैं, डॉक्टर से लिखवा के लाए हो। वो भी लिमिट में मिलेगी।
कहने का मतलब, देखना ये है कि आप उसका दवा का उपयोग कर रहे हो। क्योंकि दवा का दूसरा रूप जहर है। कोई बुखार की ही दवा हो, लेकिन आप बीस टेबलेट खा लो, सौ खा लो, तो क्या हो जाएगा? नुकसान। तो अगर आप ले रहे हो, तो दवा के लिए ले रहे हो कि मौज के लिए ले रहे हो, वो देखना पड़ेगा।
देश का सिस्टम बेईमान नहीं है। सिस्टम पर बैठने वाले लोग बेईमान हैं। ना तो देश बेईमान है, ना तो सिस्टम बेईमान है। सिस्टम हमेशा ईमानदार होता है। तभी तो सिस्टम है। अब सिस्टम पर बैठने वाला कौन है? वो तो हम ही लोग हैं। तो ना सिस्टम बेईमान है, ना देश बेईमान है। बेईमान हम लोग हैं। काश इस बेईमानी को छोड़ दिया जाए। तो यहां भी कल्याण हो जाएगा, और वहां भी कल्याण हो जाएगा।
ऐसा नहीं है। कहा गया है, जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन। वैसा होगा मन, मतलब वैसी आपकी प्रवृत्ति जागृत होगी। जैसा आप अपने शरीर को पोषण दोगे, वैसी प्रवृत्ति जागृत होगी। राजसी, तामसी, सात्विक।
अगर आपने ईमानदारी का भोजन दिया अपने शरीर को, तो आपके अंदर सात्विक प्रवृत्ति जागृत होगी। आप में सात्विकता जागेगी, काम करने की भावना जागेगी। आपने राजसी दिया, तो राजसी जागेगी। तामसी दिया, तो तामसी जागेगी। रजोगुण, सतोगुण, तमोगुण। तो कैसा आहार आप देते हो, वो आपके ऊपर है।
इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं हो सकती। सामने वाला मांग रहा है, इसका मतलब आप दुरुपयोग कर रहे हो। देखिए, सामने वाला इसका उपयोग क्या कर रहा है। क्या उसे साइकिल की जरूरत है? एक है, तो दूसरा क्यों? शौक में आदमी बर्बाद होता है। जरूरत में जियो। शौक कभी पूरा हो सकता है? नहीं हो सकता। फिर आप अपने बच्चे को बर्बाद करने की दिशा में बढ़ा रहे हो। जरूरत में जीना सिखाओ। उसे बैठकर समझाओ। जरूरत में जीना सिखाओ। इच्छाओं की पूर्ति, वस्तुओं की पूर्ति, इस पृथ्वी पर कभी हो सकती है? एक के बाद एक। कभी पूर्ति हो सकती है? नहीं हो सकती।
एक दिन तो आपको उसे ना ही कहना पड़ेगा। नहीं, वो तो मांगता ही रहता है, जब दिलाते रहते हो। आप क्या करिए। अगर वो कुछ मांग रहा है, तो उससे पूछिए, क्यों। इसका उपयोग क्या करोगे। जरूरत हो तो दिलाओ। नहीं तो मत दिलाओ। उस धन का उपयोग कहीं और करो। क्योंकि दिलाने में धन लग रहा है, और वो धन का उपयोग नहीं हो रहा। मतलब उसकी इच्छा की पूर्ति हो रही है। क्या उसकी इच्छाओं की पूर्ति हो सकती है? आप उसे बढ़ावा दे रहे हो, तो आप उसे पतन की तरफ ले जा रहे हो। आप उसे जरूरत में जीना सिखाओ।
जैसे बच्चा खिलौना मांगता है। एक खिलौना छोड़ के दूसरा मांगता है। वो टूटा क्यों? पहले ये पूछिए। जानकर तोड़ रहा है, तो नहीं देना है। क्योंकि दूसरा भी तोड़ेगा, तीसरा भी तोड़ेगा। एक दिन हमारी ऊर्जा ही खत्म हो जाएगी। या तो वो लेने लायक नहीं रहेगा, या दिलाने लायक। ये स्थिति आने वाली है। इससे अच्छा अभी रुक जाओ। अभी समय है, समझ है। दोनों हैं। ऐसा ना हो, समय और समझ दोनों ना रहें। फिर क्या करोगे?
खिलौना की स्थिति में उसने तोड़ा, कि टूट गया। फिर उसको खिलौना की जरूरत भी है कि नहीं? क्या वो खिलौना के लायक है कि नहीं? पता चला, समझ उसकी खिलौने से पार हो गई। अभी तक हम जरूरत में नहीं जी रहे। इच्छा हुई, वो पूरी कर दी। आप भी मत लाओ। आप भी देखो, जरूरत है आपको क्या। ये समझ अभी आई है। बस अभी से जीना चालू करो। पीछे छोड़ो। अब से जीना चालू करो। मेरी जरूरत क्या है, मेरी आवश्यकता क्या है, ये आपको देखना है। हो सकता है आपको एक करोड़ की गाड़ी की जरूरत हो, क्योंकि उस गाड़ी से आप कुछ करना चाहते हो। वो आप देखिए। क्या उसकी जरूरत है? क्या खिलौना तोड़कर खिलौना मांग रहा है?
जैसे इसने साइकिल तोड़ी। टूटी नहीं, तोड़ दी। तीन तोड़ दीं, तो चौथी भी तोड़ देगा। इसके पापा खुद मजदूरी कराएं, फिर ये साइकिल लाए, तो नहीं तोड़ेगा। और तोड़ेगा, तो फिर कमाए, तब नहीं तोड़ेगा। किसी को ऊपर उठना सिखाओ। उसका पतन मत करो। क्योंकि इच्छाओं की पूर्ति कभी की ही नहीं जा सकती। जरूरत में जियो। जरूरत में जीना सिखाओ।
सबकी अपनी-अपनी जरूरत है। अपनी सामर्थ के अनुसार, समाज के अनुसार, काम के अनुसार, सबकी जरूरत है। क्योंकि सबके समय की वैल्यू अलग-अलग है। एक ही कंपनी में सब काम करते हैं। लेकिन कोई एक घंटे में जाके निकल आता है, वो लाखों की पगार ले रहा है। कोई आठ घंटे काट रहा है, उसको उससे कम पगार मिल रही है। सबकी वैल्यू अलग-अलग है। सबके समय की वैल्यू अलग-अलग है। सबकी जरूरत अलग-अलग है।
यहां देखो, कितने लोग आधा पेट खा के सोते हैं, इसी समाज में। कितने लोगों के पास घर है, तो बारिश में चू रहा है। सही मकान नहीं है, झोपड़ी है। कितने लोग फुटपाथ पर रह रहे हैं। लेकिन राष्ट्रपति को कितने घर दिए गए हैं। कहीं जाओ, एरिया में डॉक्टर उपलब्ध नहीं, शिक्षक उपलब्ध नहीं, स्कूल नहीं। लेकिन राष्ट्रपति के लिए कितने डॉक्टर लाइन से खड़े हैं। क्यों? क्योंकि उसकी जरूरत है। उसके द्वारा ऐसा काम भी हो रहा है। इसलिए उसे सुरक्षा की जरूरत है। अभी कोई बोल दे, राष्ट्रपति के जितनी मुझे भी सुरक्षा दो। नहीं कह सकता। आप में मानवता नहीं है, ऐसा सरकार से कह सकता है? मेरे पास एक घर नहीं है, और राष्ट्रपति के पास कितने घर होते हैं? राष्ट्रपति भवन में ज्यादा होते हैं, ऐसे भी। डॉक्टर कितने होते हैं? बहुत डॉक्टर, बहुत सुरक्षा कर्मी, बहुत कुछ होता है। अब बोलोगे, क्या जरूरत है? मेरे पास एक घर नहीं। भाई, उसका लेबल है। अब उसकी जरूरत उतनी है। अब वो कहीं जाएगा तो करोड़ों की गाड़ी से जाएगा, और गाड़ी भी बुलेटप्रूफ रहेगी। तुम ऐसे भी कहीं चले जाओ, तुम्हें कोई नहीं पूछेगा। कहोगे मारो, तो भी कोई नहीं मारेगा। गोली खराब हो जाएगी। अब तुम यहां से बैठकर कहो, राष्ट्रपति को जितनी सुरक्षा मिलती है, मुझे भी दो। मैं इस देश का निवासी हूं। मेरा भी देश है। मुझे भी सरकार इतनी सुरक्षा दे।
तो क्या होता है? सबकी जरूरत अलग-अलग है। जैसा काम, वैसी जरूरत। राष्ट्रपति के द्वारा वैसा काम भी तो हो रहा है। क्या ये व्यक्ति वो काम कर सकता है? राष्ट्रपति वाला कार्य आपके द्वारा थोड़ी होगा। नहीं तो आप वहां होते। तो यहां क्या होता है? आपकी वैल्यू से, आपकी जरूरत और आपकी योग्यता के अनुसार, आपको व्यवस्थाएं मिलती हैं। अपने बच्चों को उतना ही दिलाइए, जितनी जरूरत हो। उनसे पूछिए, दिलाने के बाद इसका उपयोग क्या करोगे।
ऐसे मुझे भी कोई कह सकता है। आप तो बोलते हो जरूरत में जियो, दो गाड़ियां खड़ी हैं, एक और ले रहे हो। सात-आठ लाख की गाड़ी क्यों नहीं लेते, फॉर्च्यूनर क्यों ले रहे हो? आप जैसे लोग भी बोल सकते हैं, हमें तो बोलते हो जरूरत में चाहिए, और आप इतनी बड़ी गाड़ी, क्या जरूरत है? जरूरत मेरी जरूरत है। मेरा काम है। जरूरत तभी तो लिया जा रहा है। जब मैं सेवक रूप में था, तब क्या जरूरत थी। अब इसकी जरूरत पड़ गई। फैलाव हुआ। उपयोग भी हो रहा है। यहां जितना बनता जा रहा है, उसका उपयोग हो रहा है। पहले आप आए थे तो उधर ही था। अब इधर देखो, उपयोग तो हो रहा है। तो सबकी जरूरत अलग-अलग है। आप उससे कम कंपेयर मत करना।
आपकी योग्यता के अनुसार ही आपके पास जितना धन, समझ और तन का बल है। आपकी योग्यता के अनुसार, आपके कर्म के अनुसार। अब आप उसका उपयोग कैसे करते हो। मेरा कहना है, आप अपनी जरूरत को समझो। अपने काम को समझो। सबकी जरूरत सबको पता है। मेरा काम किस तरीके से फैलेगा, ये मुझे पता है। आपका काम किस तरीके से फैलेगा, ये आपको पता है। अपने काम में क्या-क्या साधन लगता है, आपको पता है। मेरे काम में क्या-क्या साधन लगता है, मैं लूंगा। काम करना है।
एक इंजीनियर है, और वही बिल्डिंग बनाने में एक मजदूर है। दोनों की जरूरत अलग-अलग होगी। वो लैपटॉप ले आएगा, बिल्डिंग के पास। मजदूर कहेगा, इसकी क्या जरूरत है, हमारी तरफ फरसा उठा। तो बिल्डिंग बनेगी ही नहीं। बिल्डिंग तभी तू बना पा रहा है, जब ये नक्शा दे रहा है। नक्शा उस कंप्यूटर के द्वारा ही बन रहा है। कंप्यूटर हटा दो, उसे इतनी अच्छी व्यवस्था ना मिले, इतना अच्छा घर ना मिले, तो मानसिक काम नहीं कर पाएगा। तब मजदूर बोले, तू मेरे साथ चल, फरसा लगा। अगर उसके साथ लग गया, तो बिल्डिंग ही नहीं बनेगी। उसकी समझ से मैं लग जाता हूं, तो क्या वो पुल बन पाएगा? दिख तो रहा है कि मजदूर पुल बना रहा है। क्या मजदूर पुल बना रहा है? वो किसी के द्वारा बन रहा है। इंजीनियर के द्वारा नक्शा निकला। इंजीनियर भी किसी सिस्टम के द्वारा निकाला है। तो उतना तो उसे सिस्टम चाहिए। मान लो, अपने दिमाग से बता भी दे, ऐसे-ऐसे कर देना। क्या तुम बिना पेन, कॉपी, बिना नक्शे के कर पाओगे? ठेकेदार को इंजीनियर सब बता ही दे, बिना लिखा-पढ़ी के। क्या ठेकेदार पूरा याद कर पाएगा, कौन सा पिलर कहां रखना है, कितना मिलीमीटर सरिया, कितना माल, कितना मटेरियल, कितना सामान डालना है? ठेकेदार याद कर सकता है? वो पूरा सिस्टम से निकाल के देता है। ये नक्शा है। ऐसे-ऐसे तुम्हें बनाना है। दिख तो रहा है कि मजदूर बना रहा है, ठेकेदार बना रहा है। लेकिन वो किसी के द्वारा। यहां हर काम किसी के द्वारा हो रहा है। हम यहीं रात में फंस जाते हैं।
जैसा व्यक्ति काम करता है, वैसा उसे साधन चाहिए। इंजीनियर को फरसा दे दोगे, तो कुछ नहीं कर सकता। हाथ-पैर में ही मार लेगा। मजदूर को कंप्यूटर दे दोगे, तो कुछ नहीं कर सकता। नाटक चलाएगा, इसमें कुछ नहीं कर सकता। तो जिस लायक आप हो, वैसा आपके पास व्यवस्था है। वैसा आपके पास साधन है। साधन को उलट-पुलट भी कर दो, तो काम ही नहीं हो पाएगा। मजदूर को गाड़ी दे दो, इसका बंगला दे दो, लैपटॉप दे दो, बावला हो जाएगा। शराब पी के उसी रूम में लोट जाएगा। लैपटॉप, जैसे तीन साइकिल तोड़ी, वैसे लैपटॉप तोड़ देगा, टीवी तोड़ देगा, पी के सब तोड़ डालेगा। और इंजीनियर क्या करेगा, अगर इसको फरसा चलवाओगे? कभी पैर में मार लेगा। उससे नहीं हो पाएगा।
कहने का मतलब ये है। अपनी जरूरत और अपनी क्षमता के अनुसार आपको साधन दिया गया है। यहां सबका जैसा काम है, वैसा साधन दिया गया है। जैसे कंपनी में सबको साधन अलग-अलग दिया जाता है। जिसका काम है, हेल्पर को अलग, सुपरवाइजर को अलग, मैनेजर को अलग, मालिक को अलग। वैसे ही ये एक प्रकृति की कंपनी है। यहां सबको योग्यता के अनुसार साधन दिया गया है। और अगर आप बेईमानी से कोई साधन और लाए, तो उसकी भरपाई करनी पड़ेगी। तो देख लो, मेरी क्षमता क्या है। मैं क्या काम कर रहा हूं। मेरे काम को आगे बढ़ाने में क्या-क्या साधन चाहिए। वो साधन के द्वारा ही काम होगा। सब यहां एक-दूसरे के पूरक हैं। बेईमानी मत करो।
ध्यान लगने का मतलब देखो। बेचैनी कम होने लगेगी। घुटन कम होने लगेगी। पश्चाताप होने लगेगा। आंखों में आंसू आने लगेंगे। अपनी गलतियों पर पश्चाताप होगा। अब मैं नहीं करूंगा। मैं कैसे निकल जाऊं इस भवसागर से? मैं फंस गया हूं, पूरी तरह। फंसने के लिए मैंने ही कर्म किया है। अगर ध्यान लगने लगेगा, तो ये सब दिखने लगेगा।
जितने भी मेरे साथ दुर्व्यवहार हुए हैं, या मैंने किसी के साथ किए हैं, और मेरे साथ किसी ने किया है, इसका जिम्मेदार मैं हूं। मेरे कर्मों के द्वारा ही मुझे सब कुछ मिला है। तो जब ध्यान घटित होगा आपके जीवन में, तो ये सब दिखने लगेंगे। पश्चाताप होगा, आत्मग्लानि होगी, आंसू आएंगे। आपको अपने कर्मों पर रोना आएगा। अगर किसी को बोल रहे हो कि इसने मेरे साथ गलत किया, तो आप कहोगे, उसने गलत तब किया जब मैंने कभी गलत किया होगा। राग-द्वेष भी नहीं होगा।
आप समझ जाओगे। कर्म के सिद्धांत को समझ जाओगे, कि अगर मेरे साथ कोई कुछ हो रहा है, तो उसका इंतजार मैं ही तो था। मैंने कभी किया था, तभी तो हो रहा है। ध्यान घटित होगा, तो आपको सब मिलाजुला के पश्चाताप होगा। आत्मग्लानि होगी। घुटन होगी। बेचैनी होगी। फिर धीरे-धीरे बेचैनी हटने भी लगेगी। पश्चाताप के आंसू होंगे आपकी आंखों में।