अपने को क्या मतलब कि सृष्टि किससे बनी? अपने को यह देखना है कि मैं अपना आत्म दर्शन कैसे करूं। हम सृष्टि की खोज करने थोड़ी निकले हैं — उसे अभी छोड़ दो, वह आगे की चीज है; उसमें उलझे तो कभी नहीं पहुंच पाओगे। मैं अपनी खोज कर रहा हूं, सृष्टि की नहीं।
गुरु शब्द है। शब्द के द्वारा आप सत तक पहुंच गए तो हो गए सत, और किसी के लिए बोले तो हो गए सतगुरु — बस यही है। गुरु के द्वारा स्वयं तक पहुंचे, गुरु खत्म हुआ, सत तक पहुंचे; इसलिए सतगुरु कभी दिखाया नहीं जा सकता। आप जिन शब्दों से सत तक पहुंच गए, वह आपके लिए सतगुरु हुए; और आप भी पहुंचकर किसी और के लिए बोलोगे तो आप सतगुरु हो। जैसे शिक्षक कभी विद्यार्थी था — सीखना-सिखाना ही जीवन है। जो सत तक नहीं पहुंचा सका, झूठ तक पहुंचा रहा है, उसे सतगुरु क्यों कह रहे हो? सत तक पहुंचोगे तो भवसागर में गोते खाना बंद। गुरु शब्द है, शब्दों को लेकर चलना है, शरीर को नहीं। वहां कोई गुरु लेने नहीं आता, कोई खींचकर नहीं ले जाता — आत्मा चैतन्य है, जड़ नहीं; चैतन्य में पहुंची तो परमात्मा की यात्रा कर लेगी, चेतन (शरीर) में फंसी है तो जगत की यात्रा करेगी। तुम्हारा कर्म ही तुमको तारे, कर्म ही उभारे, कर्म ही फंसाए।
उनके नाम की मोहर लगाते हैं क्योंकि वे फेमस हैं, और अपनी बना दी। जरा सोचिए — क्या गुरु नानक जी या कबीर जी ने कभी किसी को अपने पांव धोकर पिलाया? वे तो जल्दी पांव भी नहीं छुआते थे, पैर धोकर पिलाने की तो बड़ी दूर की बात। आज उनके नाम से लोग अपने पैर धो-धोकर "चरणामृत" बोलकर पिला रहे हैं और लेने वाले बोतल भर-भर के ले जाते हैं — यह अंधविश्वास की हद है, पाखंड की हद है। कबीर साहब ने कब किसी को ऐसा करने की अथॉरिटी दी?
हमें अभी एक ही धुन की जानकारी है — जो कान से सुनते हैं। आपने कोई गीत सुना, फिर एकांत में बिना बाजे के गुनगुनाते हो तो धुन, ढोलक, हारमोनियम सब अंदर से सुनाई देता है — क्योंकि आपके अंदर एक अनलिमिटेड मेमोरी है जो शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श जमा करती रहती है। बैठते हो तो वही चेतन-अचेतन मन में जमा हुआ रिपीट होता है, और उसी को "अनहद" बोल देते हैं — इसी में आप फंस गए। ध्यान में जो धुन सुनाई दे रही है, वह आपके अचेतन मन में जमा है, वही निकल रहा है।
ब्रह्म मुहूर्त में सबसे पहले मुर्गा उठता है और काट दिया जाता है — अगर ब्रह्म मुहूर्त में उठने से कुछ हो जाता तो मुर्गे को पहले मोक्ष होता। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से एक लाभ है — उस समय वातावरण शुद्ध रहता है, साढ़े तीन-चार बजे की हवा स्वास्थ्य के लिए अच्छी है, शरीर स्वस्थ हो सकता है। लेकिन उससे परमात्मा नहीं मिलेगा; आत्म दर्शन आपके कर्म से है — उठने के बाद क्या करते हो। एक आदमी 3:30 बजे उठकर पाप करने लगा, दूसरा 8 बजे उठा और उठते ही चिड़ियों को दाना डाला, भूखों को भोजन कराया — किसको उपलब्धि होगी? जो सत्कर्म कर रहा है। जब भी उठो सत्कर्म करो, जब भी सोओ सत्कर्म करके सोओ — यही नियम बना लो।
यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे — पिंड ब्रह्मांड से जुड़ा है; ब्रह्मांड में बदलाव होता है तो पिंड में भी होता है। आपने नोट किया है, गर्मी में भोजन करते हो तो पसीना छूटता है, क्योंकि जठराग्नि भोजन पकाने के लिए बाहर से गर्मी खींचती है; ठंड में भोजन के बाद और ठंड लगती है, क्योंकि उसे बाहर से ठंड मिलती है। वैसे ही प्रकृति में जो होता है, मेरे साथ भी होता है। (बीमार हो तो रात 12-1 बजे भी अस्पताल ले जाते ही हो — समय देखकर नहीं रुकते।)
मैं आपको सीधी-सीधी एक बात कहता हूं — "कुछ नहीं" में आ जाओ, बात ही खत्म कर दो, सारा खेल खत्म। दुनिया के किसी भी मार्ग से जाओ, आना यहीं है — ईमानदारी मुक्ति, बेईमानी बंधन। अभी तक जितना भी बोला गया, बस यही बोला गया; इसके अलावा किसी ने कुछ नहीं बोला।
कबीर की बात कर रहे हो तो कबीर की बात करो, उनके प्रचारकों और अनुयायियों के इतिहास में मत जाओ। क्या आपने किसी पुस्तक में पढ़ा कि उन्होंने किसी को ध्यान में बैठाया? कबीर साहब ने कभी किसी से ध्यान नहीं करवाया — उन्होंने कहा "ना जप में, ना तप में, ना ध्यान में, ना योग में" मैं हूं। अब उनके नाम पर लोग ध्यान करवा रहे हैं, तो उनके अनुयायियों को खड़े होकर पूछना चाहिए कि जब उन्होंने कहा ध्यान से नहीं मिल सकता, तो हमसे ध्यान क्यों करवा रहे हो? पर वे खुशी से ध्यान कर रहे हैं।
अभी तक जितने महापुरुष हुए, उन्होंने बस एक ही बात कही — ईमानदारी अपनाकर सत्कर्म करो; इसके बाहर कोई बोला ही नहीं, बोल ही नहीं सकता। यही मूल है, और लोग यही नहीं अपनाते। महापुरुषों ने सत्संग में जीने का तरीका बताया, और तरीके में बस इतना — ईमानदारी अपना के सत्कर्म में लग जाओ। जितनी किताबें लिखी गईं, इसके अंदर ही लिखी गईं। मुक्ति तो तुरंत है — ईमानदारी अपना लो, मुक्त हो गए, आगे का बंधन बनेगा नहीं। सत्कर्म करोगे तो रोम-रोम से आशीर्वाद मिलेगा, विकारों से मुक्ति में सहायता मिलेगी, और अपने कर्म का भोग भोगते हुए मोक्ष तक पहुंच जाओगे। कितना सीधा, सरल रास्ता है। कृष्ण भगवान ने अर्जुन को ज्ञान दिया तो अर्जुन ने कोई विधि नहीं की, समझते-समझते उपलब्धि हो गई।
कोई कुछ भी बोल देगा, मान लोगे? आत्म दर्शन के बाद मोक्ष होता है; ज्ञान होने के बाद मोक्ष पक्का होता है। अर्जुन को आत्म दर्शन हो गया था, ज्ञान की उपलब्धि हो गई थी — फिर मोक्ष कैसे नहीं होगा? एक तरफ कहते हो आत्मज्ञानी है, विराट रूप देखा, और फिर कहते हो मोक्ष नहीं हुआ — दोनों बातें एक साथ कैसे?
दोनों बातें एक ही व्यक्ति बोल रहा है और तुम उसके सामने हाथ जोड़े हो, क्योंकि तुम डरे हुए हो, विरोध करने की क्षमता नहीं है। संत रविदास जी ने माता गंगा को भेंट भेजी, गंगा ने स्वीकार की और बदले में कंगन दिया — तो माता गंगा थीं, तभी भेंट स्वीकार की; इसी से सिद्ध हो गया। रामकृष्ण परमहंस को काली मां भोजन कराने आती थीं। फिर कहेंगे रामायण काल्पनिक — जबकि कबीर जी ने कहा "एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में लेटा..."। कबीर ने मूर्तिपूजक को ही गुरु बनाया, "राम-राम" सुनकर मंत्र मिल गया — मंत्र से होता है (वाल्मीकि मरा-मरा जपकर), तंत्र के मंत्र से पतन होता है। मोबाइल जैसा यंत्र काम करता है तो मानते हो। हमारे साथ खुलेआम धोखा हो रहा है, और मैं उस धोखे को स्वीकार करके बढ़ाने में मदद भी कर रहा हूं — इन बातों को समझिए।
यहां के लोग बहुत सज्जन हैं। यह नर्मदा परिक्रमा मार्ग है — यहां महिला चाहे रात 2 बजे आ जाए, पीने वाला भी उसे सुरक्षित छोड़ देगा, हाथ जोड़कर एक तरफ हट जाएगा; अकेली लड़की भी "नर्मदे हर" बोलकर परिक्रमा में जाती है। कहीं भी रुक जाओ, घर वाला नाम-पता या आईडी नहीं पूछेगा, बस कोड वर्ड है "नर्मदे", खुद बाहर सोकर आपको अंदर सुलाएगा, भोजन कराएगा। मां की इतनी प्रबल कृपा, दया, करुणा, प्रेम है — और फिर लोग कहते हैं यह सिर्फ नदी है। इसलिए यहां कुटिया बनाई कि जब यह शरीर नहीं रहेगा, कुटिया रहेगी, और आने वाले साधकों को कभी परेशानी न हो — यहां कभी कमी नहीं पड़ेगी; प्रकृति ऐसी है कि कोई संसारी दृश्य-शब्द है ही नहीं, साधक अपनी साधना करे।
कामनाओं वाले मेरे पास आते ही नहीं, उन्हें पता है मेरे पास ज्ञान के अलावा कुछ नहीं; 2019 से इस क्षेत्र में रहा, कभी किसी से कुछ मांगा नहीं, भोजन के लिए भी नहीं। कोई ऐसी चीजों के लिए आशीर्वाद मांगता है तो मैं बोलता हूं — मेरी हालत खुद देख लो, ऐसी हालत बनानी है तो ले लो आशीर्वाद; जो आप हो वही तो दोगे। एक व्यक्ति ने कहा कपड़े के साथ गाड़ी भी देना, मुझे आशीर्वाद दो — मैंने कहा अगर मेरे आशीर्वाद से गाड़ी आती तो मैं अपने ऊपर हाथ रख लेता, तेरे द्वारा क्यों लेता? सिद्धांत सीधा है — हां तो हां, ना तो ना।
साधकों से हम नहीं लेते। कोई देना चाहे तो कहते हैं — मेहनत की कमाई है, सोच-समझकर लगाना, ऐसा न हो कि लगाने के बाद पछतावा हो; यह नंबर है, उस पर बात करना। वहां वाले जानबूझकर उल्टी बात करते हैं — अहम भाव में रहोगे तो दोगे ही नहीं; जो फिर भी सीधे से बात करे, समझ आ जाता है उसका ईमानदारी का धन है। कोई धंधा सीधा नहीं लिया जाता, पहले पूछताछ होती है। 1000-2000 वालों से कहते हैं ट्रस्ट बनेगा तब देना, क्योंकि उसका उपयोग नहीं हो पाएगा; जिसका अमाउंट काम आएगा उसे हां, नहीं तो ना। सेवा करने वाले इतने ईमानदार हैं कि करोड़ों भी कोई दे तो मुझसे पूछे बिना नहीं छूएंगे, और कभी नहीं कहते "इतना लगाइए"। एक दानदाता लाखों देना चाहते थे, बस एक बार मुझसे फोन पर बात करके कंफर्म करना चाहते थे; कर्ज लेकर निर्माण हो रहा था, जरूरत भी थी — पर मैं फोन पर किसी से बात नहीं करता, तो एक से करूं तो सबसे करनी पड़ेगी; इसलिए मना कर दिया — वह भी अपनी जगह सही, मैं भी। ज्ञान के बाद भी परीक्षा देनी पड़ती है। यह परमात्मा का कार्य है — ईमानदारी से हो तो ठीक, नहीं तो मत हो। मेरा रोम-रोम ईमानदार है, मैंने अज्ञानता में भी कभी मतलब से किसी से बात नहीं की। यहां लेनदेन की बात मत करो — ज्ञान लो, सत्संग सुनो, अपना आत्मिक कल्याण करो, यही मेरे लिए सेवा है। कुटिया बनने से पहले ही पता है एक दिन मिटेगी — मिटने वाली चीज के लिए अपने आप को नहीं गिराना।
एक दायरा होता तो कर भी लेते, दायरा तो है नहीं — एक से करूं तो सबसे करनी पड़ेगी, कितने कॉल आएंगे, फिर सत्संग ही नहीं हो पाएगा। एक काम करो — सत्संग सुनो, और बात करनी हो तो कुटिया पर आ जाओ, सीधा प्रत्यक्ष बात करो। प्रत्यक्ष में अलग ही बनता है: वहां से आप रूप और शब्द से (दो इंद्रियों से) समझ रहे हो, यहां तीन बढ़ जाती हैं — स्वाद, सुगंध, स्पर्श; पांचों इंद्रियों से समझते हो और संग भी मिल जाता है, जिससे चेतना का स्तर बढ़ता है।
12 साल तक भ्रमण किया, कुटिया नहीं बनाई; मेरा न कोई एक भक्त है न एक चेला — मैं सीधा ज्ञान देता हूं, बिना बंधन का, बिना शिष्य बनाए; ये लो और अपना आत्मिक कल्याण करो; गुरु मानो या न मानो, आपकी मर्जी। कबीर जी ने कहा जीवंत गुरु चाहिए — जो खुद पहुंचा हुआ हो उससे कल्याण होगा। वृक्ष बहुत विराट था पर सूख गया, अब वह छाया थोड़ी देगा; छोटा ही पेड़ हो, जाकर वहां बैठ जाओ, पर वह जीवंत होना चाहिए। किसी और की चेकबुक पर कोई और साइन करके सबको चेक बांट रहा है — मुख्य जगह जाओगे तो बाउंस हो जाएगा, और बाउंस का चार्ज भी लगेगा — काम भी नहीं हुआ और समय भी बर्बाद। गद्दी पर बैठे लोग जानते हैं उनके पास अपना कुछ नहीं, इसलिए पुराने नामों का प्रचार करवाते हैं।
बेईमानी साथ में नहीं आती, बेईमानी करनी पड़ती है — जन्म लेने के बाद आप करते हो। साथ में आपका कर्म आता है, बेईमानी नहीं। आप बेईमानी करते रहते हो, तो वही बेईमानी का प्रारब्ध बन जाता है, और उसका फल या सजा मिलती है।
सजा तो आपको दिख नहीं रही — एक बालक राजा के यहां जन्म लेकर दूध पी रहा है, एक झोपड़ी में भूखा है; कोई काना, लंगड़ा, बहरा है, कोई शरीर की पीड़ा में है — यही सजा है। जो उसका कर्म है, उससे उसे योनि मिलती है और कर्म का भोग भोगता है। मनुष्य का जामा मिला था, अपने कर्म से नीचे पशु योनि में आ गया — इससे बड़ी सजा क्या? कुत्ता बढ़िया खा-पी रहा है, पर जिस मकसद के लिए मनुष्य शरीर मिला था वह चूक गया। मानव शरीर योग के लिए मिला है, भोग के लिए नहीं — जितनी जरूरत है उसमें जीकर योग करो, यानी अपने आप को साधो, निर्विकार करो।
नहीं, सत्कर्म करना भी योग है। योग मतलब अपने आप को साधना, सुधारना — सब इसमें आ गया। जैसे बेईमानी एक ऐसा शब्द है जिसमें छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड सब आ गया; जैसे घर में "भोजन लाओ" बोलो तो दाल, चावल, रोटी — जो बना है सब आ गया, अलग-अलग गिनती नहीं गिनानी पड़ती। बाहर की दुनिया में जो योग (आसन) समझ रहे हो, वह योग नहीं।
आंतरिक ईमानदारी और मेहनत करो और आगे बढ़ लो — आप ही हो जो अपने आप को तार सकते हो, और आप ही हो जो अपने आप को भटका सकते हो, कोई दूसरा नहीं। कबीर जी के कोई 60 लाख शिष्य कहता है, उनमें से दो पहुंचे — प्रत्यक्ष गुरु के रहते सब क्यों नहीं पहुंचे? क्योंकि कोई किसी को नहीं पहुंचा सकता। जब कबीर के रहते सब नहीं पहुंचे, तो आज कबीर आपको कैसे पहुंचाएंगे? इस भ्रम में मत रहना कि कोई यहां मिलेगा, वहां मिलेगा — तुम्हारे अलावा कोई है तो तुम उस तक पहुंच ही नहीं सकते। ज्ञान के पहले गुरु भी छूट जाता है — आनंद गौतम बुद्ध में फंसे रहे, उनके जाने के बाद ज्ञान हुआ। घंटी, धुन सुनाई दे रही है, कोई खड़ा दिख रहा है, तो समझ लो फंसे हो। जहां ज्ञान समझ में आए, ज्ञान लेकर निकल लो — किसी को पकड़ो मत, अपने आप को पकड़ो।
एकदम सही, तर्क विचार हैं, विचार सत्य नहीं। पर प्यास लगी, पानी पिया, प्यास बुझ गई — पानी अपनी जगह चला जाएगा, लेकिन प्यास तो बुझ गई। प्यास बाहर से लगी है तो पानी भी बाहर से ही देना पड़ेगा। वैसे ही यह तर्क, यह उदाहरण आपको सत्य तक लेकर जाएगा, बाद में यह भी खत्म हो जाएगा। सारे महापुरुषों ने भी समाज के ही उदाहरण लेकर समझाया। अनुभव करते-करते जब अनुभव करने वाला ही बचता है, वह सत्य है — अनुभव से मुक्त हो जाना है।
चल ही रही है, यह बोल सकते हैं; कितनी बाकी है नहीं बता सकते। रोक हमारी तरफ से ही है — हम इस काम में लग गए कि जाना तो पक्का है, क्यों ना जाते-जाते आप लोगों के लिए कुछ कर दूं; यात्रा बहुत तेज चली थी, मैंने धीमी कर दी, नहीं तो आपसे बात भी नहीं कर पाते। रोकने के लिए कुछ भाव बनाना पड़ता है — जैसे रामकृष्ण परमहंस सत्संग के बीच उठकर पत्नी से पूछते थे क्या बना रही हो; उन्होंने कहा जिस दिन पूछना बंद करूं, समझ लेना एक-दो दिन और; और वैसा ही हुआ। मुझे भी लोगों के कल्याण का लगाव रखना पड़ा; यह भाव अज्ञानता में ही बना लिया था कि घूम-घूमकर ज्ञान बांटूंगा, नहीं तो इस पृथ्वी पर रहने का कोई कारण नहीं। अज्ञानता में आदमी कामना और लोभ में धीमा होता है, अपने भोग, नाम-पैसा-शोहरत के लिए — वह ठीक नहीं; ज्ञान के बाद इंसान जगत के हित के लिए रुकता है, वही महान है।
आत्म दर्शन तक पहुंच गए तो किसी से प्रश्न पूछने की जरूरत ही नहीं — जैसे स्त्री गर्भ धारण कर ले तो फिर पुरुष की जरूरत नहीं, वह मां बनेगी; एक बार आत्म दर्शन कर लो, बात खत्म, कुछ पूछने को बचा ही नहीं। साक्षात्कार की निशानी — हर प्रश्न का उसके पास प्रत्यक्ष उत्तर होता है, और उसे अपने तरीके से कुछ भी नहीं चाहिए।
हम तो सबको जवाब देते हैं — उलझो, सुलझो, जो करो करो। यह प्रत्यक्ष है, उलझा नहीं पाओगे, क्योंकि जो खत्म ही हो गया उसे क्या उलझाओगे? कम से कम सुन तो रहे हैं, कभी समझ लेंगे। जब तक इस शरीर में हूं, आप मुझे गाली दोगे, मैं ज्ञान दूंगा — आपकी गाली कभी खत्म होगी क्योंकि आपने धारण की है, और ज्ञान अंदर से आ रहा है, कभी खत्म नहीं होगा।
यहां परमात्मा की यात्रा नहीं, आत्म दर्शन की यात्रा हो रही है — स्वयं की यात्रा। और तुम बिगड़े हो, तो सुधरने के लिए नियम पकड़ना पड़ेगा। हम सबका ख्याल रखते हैं, पर जब उस लायक हो; बुखार ही नहीं है और दवा मांगो तो कैसे दूं?
कितना भी ध्यान करो, अगर सद्गुण को नहीं पकड़ा तो कुछ होगा ही नहीं; सद्गुण पकड़ लिया तो ध्यान ही ध्यान है, ध्यान करना नहीं पड़ेगा। ध्यान तो हर वक्त घट रहा है — आपका मन जहां जा रहा है वही ध्यान है; भूख लगी तो ध्यान भोजन पर गया। उसे समझना है, ध्यान करना नहीं है — ध्यान को समझकर ध्यान से मुक्त होना है।
कोशिश क्यों कर रहे हो? सीधा छोड़ दो — जितनी बुराई वाली आदतें हैं। आप बोलते हो मन यहां जा रहा है — मन भूख पर जा रहा है, प्यास पर जा रहा है; पर भोजन देने के बाद बोलो कि मन भूख पर जाए, नहीं जाएगा; प्यास मिटने के बाद पानी पर नहीं जाएगा। मन जा रहा था तो आप जा रहे थे — मन को दोष दे रहे हो। मन आपका सबसे बड़ा सहायक है, वह हमेशा इंगित करता है।
कंप्यूटर का एरो (माउस पॉइंटर) देखो — पूरी स्क्रीन पर जहां ले जाओ जाता है, पर उसकी कोई फिक्स जगह बताओ? कुछ देर माउस छोड़ दो तो एरो गायब, फिर कुछ देखना हो तो तुरंत प्रकट। सिस्टम में इमेज, वीडियो, सेटिंग सबकी जगह है, एरो की कहीं नहीं। वैसे ही मन का कोई स्थान नहीं — कामनाओं से मुक्त होगे तो मन गायब, कुछ नहीं चाहिए तो मन खत्म; वह है भी, नहीं भी है। जड़ होता तो दिखता, किसी को मन दिखा? मन शरीर के लिए काम करने वाला इंडिकेटर है, आपके लिए नहीं — भूख लगी तो इच्छा न हो तब भी भोजन के लिए क्लिक-क्लिक करता रहेगा, बाथरूम लगी तो क्लिक-क्लिक। कबीर साहब ने मन को मित्र बताया — मन जैसा मित्र नहीं। एरो के चक्कर में पड़ोगे तो क्या होगा? उसे बदल नहीं सकते — एरो का उपयोग करो, जहां ले जाना है ले जाओ। और एरो कभी गंदा नहीं होता — कंप्यूटर पर अच्छा देखो या बुरा, गंदे आप होते हो; मन भी शुद्ध-अशुद्ध दोनों नहीं।
नहीं, आप ले जा रहे हो अपनी समझ से; मन तो आपके शरीर की जरूरत की चीजों तक लेकर जाता है — इसलिए वहां लगता नहीं। परमात्मा का तो तुम्हें अता-पता ही नहीं, तुम जबरदस्ती मन को परमात्मा में लगा रहे हो — यह भी एक धोखा है। काश सब जगह से मन को छुड़ा लेते, "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाते, तो वही मन आपको मूल जगह ले जाता — उसका काम ही है बताना कि आपको क्या चाहिए।
एकै साधे सब सधे — अपने आप को साधना है, इस शरीर के द्वारा उस साध्य तक पहुंच सकते हो। इस शरीर को आखिरी का पता है: पृथ्वी पर जब से नर-मादा आए, शरीर से शरीर निकल रहा है — जिंदा से बच्चे पैदा होते हैं, मुर्दे से नहीं; शुक्राणु के भी पीछे जाओ, तो एक समय ऐसा रहा होगा जब यह शरीर पूरी तरह निर्विकार, चैतन्य होकर परमात्मा के सामने खड़ा रहा होगा, क्योंकि इसका निर्माण उसी ने किया। अभी इसे विकारों से भर दिया है। शुक्राणु अगर जड़ होता तो चलकर अंडाशय तक कैसे जाता? वह चेतन है। कोई अंग कट जाए तो कुछ देर हिलता रहता है, फिर स्थिर हो जाता है — आत्मा तो एक ही है, पर चेतनता उसमें थी। इसलिए इस शरीर के द्वारा उस साध्य तक पहुंचना है।
शरीर थोड़ी बंधा है, आत्मा ही बंधी — शरीर ने कभी कहा कि मुझे भोजन दो? तुमने आज तक जितना किया, अपनी समझ से ही किया। सिगरेट पर लिखा है कैंसर होता है, दारू पर लिखा है — फिर भी पी रहे हो, तंबाकू खा रहे हो; तुम समझ के ही सारी गलतियां कर रहे हो। तुमने बेईमानी समझ के की — अपने स्वार्थ के लिए — तो भोगा कौन? विकार कौन धारण कर रहा है? तुम ही। गाली किसी ने नहीं सिखाई, पता भी है गलत है, फिर भी देते हो। बेसमझी में तो दंड ही नहीं — पागल को दंड नहीं, सुधार घर भेजा जाता है; समझदार करे तो दंड। आपका जीवन अशांत है तो आपके कर्मों से ही है। आत्मज्ञान के बाद भी विकार सामने आते हैं, पर वह समझ के उन्हें पकड़ता नहीं — वह अपने को जाल से निकाल चुका; फंसे तो समझ के ही फंस सकता है। जैसे मेरे पास (दान का) ऑप्शन आया, मैंने समझ के ना बोल दिया — हां भी कह सकता था। पहले फंसने में मेहनत, अब छोड़ने में उससे ज्यादा मेहनत — पर अभी ज्ञान मिला है तो अभी इसका उपयोग कर लो।
नर्मदा में नहाते समय मेरे पैर से एक पत्थर टकराया, उससे आवाज आई "मुझे छुड़ा दो, मुक्त कर दो"; ढूंढा तो उस पर धागे बंधे थे, धागे खोलकर उसे मुक्त किया — तब समझ आया कि पूरी पृथ्वी में चेतनता है। जो अपने आप चल, बोल, हिल-डुल नहीं सकता उसे हम जड़ कह देते हैं, पर वह जड़ नहीं, चेतनता उसमें भी है, चाहे कम हो — प्रकृति जड़ स्वरूप नहीं, चेतन स्वरूप है। गेहूं जड़ होता तो गेहूं से गेहूं कैसे पैदा होता? पानी 100 डिग्री पर उबालकर बोतल में बंद कर दो, फिर भी कीड़े पैदा हो जाते हैं; कपड़ा बांधकर रख दो तो कीड़े निकल आते हैं; पत्थर ठंड में ठंडा, गर्मी में गर्म होता है; लोहे के तार से विद्युत प्रवाहित होती है। चेतनता हर जगह है, गंदगी में भी — पर चेतनता परमात्मा नहीं। कण-कण उससे है, जैसे बल्ब से उजाला है पर उजाले में कहीं बल्ब नहीं, फिर भी उजाला बल्ब से अलग नहीं। परमात्मा से कण-कण, परमात्मा से आत्मा, परमात्मा से जगत; उस जगत को माध्यम बनाकर परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है।
आज तक आत्मा को कोई नहीं देख पाया। पांच तत्वों में से हवा को तो सीधा देख नहीं पा रहे, और आत्मा को देखने चले? किसी ने वजन भी बता दिया 21 ग्राम, 22 ग्राम — कुछ भी! शब्द का आदान-प्रदान हो रहा है, पर शब्द को भी देख नहीं पाते, बस सुनते हो; कान न हों तो सुन भी नहीं पाओगे। तो आत्मा को क्या देखोगे?
हो सकता है पहले उनका आना आपको अच्छा न लगता हो — माता-पिता का भाव था कि आएं, तो आते थे, और उस समय आपका भाव बना था कि "ना आएं, ना आएं" — आपने वही ऊर्जा भेजी। उनके जाने के बाद आना बंद हो गया। अब आपकी समझ बढ़ी तो उनका आना अच्छा लग रहा है, वियोग का पता चल रहा है। प्रकृति कल्पवृक्ष की तरह है — जो आप मांगते हो वह देती है, जैसे-जैसे आप योग्य हो जाते हो।
सब अपने-अपने तरीके से कहते हैं — कोई वाटर कहता है, कोई पानी, कोई जल, कोई नीर; सबके पीछे एक ही है। नाम के पीछे नामी है — नाम नामी का पता बताएगा, तो उसका चरित्र अपनाओ। मैं तो सीधी बात कहता हूं — परोपकार करो और निकल लो।
अगर निर्विचार हो गए तो आपको कैसे पता चला कि मैं निर्विचार हो गया — बिना विचार के? "मैं शांति महसूस कर रहा हूं" — यह भी एक विचार है; "मैं निर्विचार था" — यह भी विचार है। फिर विचारों में आ ही जाते हो। निर्विचार कभी नहीं हुआ जा सकता, निर्विकार हुआ जा सकता है।
हमने कब कहा मन मरेगा? मन नहीं होता तो मैं आप लोगों से बात कैसे करता? ज्ञान के बाद मन कमजोर नहीं, और मजबूत होता है — जहां लगाना है वहां लगेगा, फिर वह नौकर बन जाता है। पहले भी था, पर तुमने उसे कामनाओं में रखा था। मन तो अभी भी पवित्र है — कंप्यूटर पर चाहे जैसा वीडियो देखो, एरो कभी गंदा नहीं होगा, गंदे आप होगे।
उन्होंने काली से छुड़ाया नहीं; जो उनके अंदर कल्पना थी, एक लगाव, ममत्व, स्नेह था, उसे खत्म किया। और तोतापुरी ने भी आखिर में जाते-जाते कहा कि तेरी मां काली है; आने के बाद तट पर यही कहा कि तेरी मां ने मुझे बुलाया है। लोग आधा-अधूरा पढ़ते हैं — अपने मतलब की बात निकालकर दे देते हैं और बाकी हटा देते हैं।
ऐसा कुछ नहीं, ज्वालामुखी भी अग्नि तत्व है; शरीर पांच तत्वों — अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश — से बना है। खाली जगह को आकाश तत्व कहते हैं। एक खाली होता है तो दूसरा भरता है, एक हटाओगे तो दूसरा रखोगे — यही परिवर्तन है। सांस ले रहे हो तो खाली है तभी हवा जा रही है, भर दो तो नहीं जाएगी; खाली जगह न हो तो आप कुछ कर नहीं पाओगे।
आपके शरीर में कितने रोम-छिद्र हैं, कितने बाल, एक बार के वीर्य में कितने शुक्राणु, शरीर में कितने बैक्टीरिया — कोई गिन सकता है? सिर्फ अनुमान फेंक देते हैं करोड़ों-अरबों, और अनुमान फेल हो जाता है। जब इस शरीर का ही नाप-तोल आज तक नहीं कर पाए, तो ब्रह्मांड का क्या करोगे? इन सब चक्करों में न पड़कर आत्म दर्शन करो।
जो अपने से चल, उठ, बोल सकते हैं, सबमें पांचों तत्व हैं; पशु में समझ है, बुद्धि है, सब है — बस कर्ता का भाव नहीं है। उनकी प्रवृत्ति एक ही है — जीना; वे अपनी मर्जी से न आगे जाते हैं, न पीछे। हमारे पास तीन प्रवृत्तियां हैं — सात्विक, राजसी, तामसी; जिसका उपयोग करोगे वैसा होगा — सात्विक से परमात्मा से मिलना होगा, राजसी-तामसी में संसार में जकड़े रहोगे।
पूरे विश्व में पानी एक ही जगह से आता है, नल (निमित्त) अनेक हैं — किसी ने छोटा नल लगाया तो इतना पानी, बड़ा लगाया तो उतना; जैसा जिसका शरीर, वैसा ज्ञान निकल रहा है। ऐसे ही गुरु ज्ञान का प्रतीक है, गुरु एक स्थिति है, कोई व्यक्ति विशेष नहीं; गुरु एक होता है, ज्ञान एक ही जगह से आ रहा है। शरीर खत्म हो गया, तो जहां से ज्ञान मिले, ज्ञान लेकर आगे बढ़ो।
कैसे भटके हो, देख लो और उसे छोड़ दो। आत्मा में ज्ञान पहले से मौजूद है, बस अज्ञानता को — जो आपने धारण किया है — छोड़ दो, ज्ञान हो जाएगा; एकदम सरल है। किसी ने कहा कुछ शब्दों में अध्यात्म बता दो, मैंने कहा "उम्मीद छोड़ दो" — बात खत्म। उसके बाद भी "कैसे" पूछ रहे हो तो अभी समझने लायक नहीं हुए, तो धीरे-धीरे समझो।
गुरु शब्द है, शरीर नहीं; आज तक जिसने बोला, शब्दों के द्वारा ही बोला। जानवर से भी सीख सकते हो, पर वहां भी कुछ टकराव हुआ, तभी सीखे — टकराने से जो ध्वनि निकलती है उसे शब्द कहते हैं; कभी-कभी शब्द नहीं निकलता, फिर भी अंदर शब्द बनते हैं — हर तरह से शब्द ही सिखा रहे हैं।
वह इस जगत के पार है — पहले इस जगत को पार करो। सातवें पर जाओगे तो पता चल जाएगा है या नहीं; किसी के कहने भर से मान लेना अंधविश्वास है — आपके पास रास्ता क्या है? एक तरफ कहते हैं हर जगह है, सर्वव्यापी है, दूसरी तरफ कहते हैं खोजो — हर जगह होता तो हर कण को जेब में रख लेते, चूमते। हर कण उससे है, उसमें वह नहीं — जैसे बल्ब से उजाला निकलता है, उजाले में बल्ब नहीं; पर उजाले को माध्यम बनाकर बल्ब तक पहुंचा जा सकता है, वैसे ही इस जगत को माध्यम बनाकर परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है। ये सब घुमाने वाली बातें हैं, गहराई से समझो और निकलो।
जब आपको भूख लगेगी तो भूख लगी है यह पता नहीं करना पड़ेगा — आप भोजन ढूंढने लगोगे। जिसकी भी जिज्ञासा है आप खोजने लगोगे; आपको पता नहीं करना पड़ेगा कि मेरी जिज्ञासा क्या है। आपको जो चाहिए आप खोजने लगोगे अपने आत्मिक कल्याण के लिए।
योग्यता से जब ज्यादा आप पाते हो तो जरूर आपको चापलूसी करनी पड़ती है, सामने वाले के साथ बेईमानी करनी पड़ती है। मिल जाता है लेकिन बाद में उसका दंड भी भोगना है। योग्यता से ज्यादा पाओगे संभाल नहीं पाओगे — अहंकार हो जाएगा, खुद लोगों को सताओगे क्योंकि क्षमता नहीं थी। जैसे किसी वस्तु पर उसकी क्षमता से ज्यादा भार दे दो तो उसका क्या होगा — बाद में बहुत पीड़ा होती है।
हमसे क्या मतलब? कौन क्या कर रहा है? मुझे जीवन जीना है। मेरे जीवन पर मेरा अधिकार है। मैं कैसे जीवन जिऊंगा यह मैं तय करूंगा — कोई और तय थोड़ी ना करेगा। हम ना किसी का विरोध करते हैं, और हमारा कोई विरोध करे तो मैं बर्दाश्त भी नहीं करता। जिस देश में रहते हैं उसके कानून के खिलाफ अगर कार्य करेंगे तो कार्रवाई होगी — कानून का होगा। कोई व्यक्ति विशेष/संप्रदाय/समूह को किसी पर कार्रवाई करने का अधिकार नहीं। सबका अपना-अपना जीवन जीने का अधिकार है। किसको कैसे जीवन/कपड़े पसंद — वह तय करेगा। जब गलत करेगा तो परिणाम भोगना पड़ेगा।
जब हम समझने लायक हुए तो जीना चाहते थे — दुनिया को समझूंगा और जीऊंगा। लेकिन जन्म देने वालों ने अंदर बीज डाल दिए: बड़ा बन, और समाज की वर्ण व्यवस्था में पैदा हुए — कुछ नीचे, कुछ ऊपर। बीच में लटका दिया। आगे होते तो साधक/सेवक बनके निकल जाते, नीचे होते तो भी निकल जाते; बीच में रखकर इतनी गहराई से डाला कि आज भी निकाल नहीं पा रहा — बड़ा बनने की इच्छा। बड़े को मान-सम्मान मिलता देखा तो बेईमानी चालू, मान की इच्छा, लालच, दिखावा, योग्यता से ज्यादा पाना। वर्ण व्यवस्था को गहराई से समझो तभी निकल पाओगे। योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करो; ज्यादा चाहिए तो परिश्रम करो, ईमानदारी से काम करो और सत्कर्म अपनाओ।
पृथ्वी के जितने जीव हैं वो बच्चों को जन्म देते समय शूद्र होते हैं — मल-मूत्र साफ करते हैं। फिर भोजन व्यवस्था — वैश्य। फिर ताकत/रक्षा — क्षत्रिय। आखिर में ज्ञान देके छोड़ती है — ब्राह्मण। हर जीव के अंदर ये चार हैं। ब्राह्मण का काम सतमार्ग बताना, क्षत्रिय की रक्षा, वैश्य व्यापार ईमानदारी से, शूद्र निष्काम सेवा। चारों वर्ण किसी और के लिए अपना लो तो महात्मा। महात्मा के पास वर्ण व्यवस्था पूछते ही नहीं — सब एक जैसे बैठते हैं।
जो आधा भरा देखकर इज्जत मांगता है वो समाज का एक नंबर का बेईमान है। ईमानदार व्यक्ति खाली को देखता है — खाली को भर दो तो पूर्ण हो जाएगा। भरा देखने वाला आपको आगे नहीं जाने देता। हितैषी हमेशा कमियां देखेगा ताकि निकाली जा सकें और तुम पूर्ण हो सको। पॉजिटिव देखने वाले को समाज इज्जत देता है — वो बेईमान है। खाली बताओ क्योंकि भरने में पूर्ण होगा।
ये अपने हाथ में है। जवाब इसलिए देना पड़ता है क्योंकि आत्मज्ञान के बाद परम सत्ता की यात्रा अपने आप चल रही है — मेहनत कुछ नहीं, सिर्फ इंतजार। अगर उसी इंतजार में किसी और के लिए कुछ ऐसा काम कर दिया जिसका परिणाम भोगना पड़े, यात्रा रुक जाएगी। गर्भधारण के बाद मां की यात्रा अपने आप होती है; मेहनत नहीं पर उचित रहन-सहन संभालना पड़ता है। नियम सबके लिए — राजा/राष्ट्रपति भी गलती करे तो सजा मिलेगी। सचेत रहो।
ईमानदारी बेसिकली दृष्टा बनना है — अपने हर एक्शन पे नजर रख के बैठे हो। जो काम रोज कर रहे हो उस पर दृष्टा बनना; वही ईमानदारी है सूक्ष्म रूप में। लोगों ने दृष्टा बन जा कहा पर बताया नहीं कि तू जो काम कर रहा है उस पर दृष्टा बन।
जज सजा देता है लेकिन जज गलती करे तो जज को भी सजा। रूल सबके लिए। राजा/राष्ट्रपति गलती करें तो भी सजा। ना तुम ना मैं — कोई बचेगा नहीं। इसलिए सचेत रहो। मूल से जब भटक सकते हो तभी आत्मज्ञान की बात है — वहां से हट सकते हो।
इनका लाख जन्म में उद्धार नहीं होगा। ये जन्म तो छोड़ दो। बिना खटखटाए बंद/खुले दरवाजे में जाना — रेखा पार करना — गिरना है। बचपन से सिखाया जाता है मे आई कम इन; जो मर्यादा लांगता है वही दुखी है। सभ्य बच्चे पढ़ाई में कमजोर भी हों तो शांति से जीते हैं क्योंकि मर्यादा नहीं लांगी।
शक्तिपात मतलब आपकी स्थिति को आपको दिखाना — सच्चाई सामने आ गई। अगर गुरु कहे इंतजार करो तो मतलब अभी योग्य नहीं; वो योग्य बनाकर जवाब देगा। तुरंत मांगोगे तो काम का नहीं — छह-सात साल का बच्चा शादी मांगे तो क्या? योग्य होने से पहले दे दिया तो योग्य क्यों बनाएगा — वो खो दिया। गुरु के शब्द आखिरी शब्द; इंतजार करो।
लाभ ले लो बहुत अच्छे तरीके से। आज वो तुम्हारे दरवाजे पर आया है; कल तुम उसके दरवाजे जाओगे तो मिल नहीं पाओगे। देश-काल-स्थिति बदल जाएगी। मूर्ति बाजार में हो तो कोई भाव मोड़ता है; मंदिर में आ जाए तो परछाई भी कोई नहीं पाता। जैसे-जैसे अस्तर उठता है दूरियां बढ़ती हैं — तुम परिवार से दूर, मैं तुमसे दूर। जाने से पहले ले लो। आत्मज्ञान तक पहुंच जाओ।
गुरु से संयोग है लेकिन वियोग नहीं — कब? जब यात्रा करोगे। शिष्य बनकर रहोगे तो गुरु संयोग और वियोग दोनों से मुक्त करता है। दुनिया से संयोग है तो वियोग; गुरु से संयोग है वियोग नहीं जब शिष्य बनकर रहो।
अपने क्षमता/दायरा/रेखा समझो। जिससे बात कर रहा हूं — क्या वो बात उससे करनी भी चाहिए? सामने कौन है, पर्सनैलिटी, योग्यता, क्षमता क्या है, क्या उससे ले सकता हूं? मौका मिला तो सुरती/सब्जी मांगने वाले मत बनो। रेखा के अंदर रहोगे सुरक्षित।
प्रत्यक्ष ज्ञान कहता है तू जहां है अगर दुखी/निराश/राग-द्वेष/घुटन है तो वहां रह के क्या करेगा? पहले ये छोड़ — खुद परेशान है तभी छोड़ेगा। रिस्क भी नहीं क्योंकि जहां हूं परेशान ही हूं; संसार में और सुख का ऑप्शन नहीं। दो ही रास्ते — संसार या परमानंद; एक जी लिया, दूसरा देख ले आनंद है या नहीं — दोनों क्लियर तो पूर्ण। लालच में कहीं मत जाना चाहे आनंद/परमानंद का। प्रत्यक्ष ज्ञान आश्वासन नहीं देता — कहता है जहां हो ठीक हो तो रुक, नहीं तो निकल। तू क्या मानता है वहां से निकालेंगे; दबाव-संकोच में ज्ञान नहीं। तुरंत की बात — अतीत/भविष्य नहीं। तू तैयार हो तो दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।
दो लोग हमेशा फेल होते हैं — एक बिना तैयारी कूद जाते हैं, दूसरे पूरी जिंदगी तैयारी करते रहते हैं। गुरु ने एक बार कह दिया भाग जा — ऐसी तैयारी करके आओ कि गुरु ना बोले भाग जा। घर में बैठ के उतना सेंसर करो; तभी शक्ल दिखाने का फायदा। गुरु की ऊर्जा/समय बर्बाद मत करो बिना तैयारी।
रास्ता बताने वाला जिम्मेदार होता है, भटकने वाला नहीं। रास्ता गलत बताया और चला तो बताने वाले की जिंदगी नष्ट। एक शिष्य स्वीकार किया और कल्याण नहीं कर पाए तो गौ हत्या का पाप गुरु को लगता है। गुरु संस्कार/जिज्ञासा से स्वीकार करता है — मुक्ति-मोक्ष के अलावा कुछ नहीं चाहिए तब। एक बार स्वीकार किया तो लाख जन्म भागने पड़ें छोड़ेंगे नहीं। गुरु लायक नहीं और शिष्य बना रहे तो 100 गौ हत्या का पाप गुरु को। जितना ऊंचाई पर उतना डरो — एक शब्द में पद चला जाएगा।
हां आपकी समझ काम आएगी। समझ कम है तो गुरु से लेते रहो कि कहां सचेत हो जाऊं — गुरु बताएगा कहां-कहां सचेत रहना है। सचेत तभी रहोगे जब पास में कुछ होगा — जेब में जितना अमाउंट उतना सुरक्षित रखोगे।
जो टारगेट लिया पूरा करो। भावनाओं में मत फंसो। चोर ने 20 के लिए हाथ डाला तो 20 निकाले — भावनाओं में नहीं फंसा। तड़पने वाले तड़पने के लिए पैदा हुए; उद्देश्य लेके चले तो लाखों रोकेंगे, गिड़गिड़ाएंगे — उस समय करके निकलो। रोकने वालों की संख्या बहुत ज्यादा, साथ देने वालों की कम। "तुम ही मेरे सब कुछ" कहने वाले देना बंद करो तो शक्ल बदल जाएगी।
सीधा कह दो आज से हम तुम्हारे लिए मर गए और उस पर अड़ जाओ। मरा हुआ व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता, रिस्पांस नहीं देता। एक बार कह दिया मर गया फिर उनके लिए जिंदा मत होना। भावनाओं के चक्कर में कभी मत पड़ो — ये यात्रा नहीं करने देंगे, बीज डाल देंगे कि कहीं पाप तो नहीं। इनसे बच के रहना — बाधक हैं।
देश-काल-स्थिति-परिस्थिति जब चाहोगे ऐसी बनेगी कि निकल जाओगे। महारानी प्रत्यक्ष उदाहरण — पुत्र/पति/मां मोह था; बताए अनुसार चली तो एक झटके में सब टूट गया (कम से कम एक साल लगा)। जैसा कहा वैसा किया। लक्ष्य दिखना चाहिए; उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मास्टर बोलेगा क्या करना है। मास्टर को अच्छे से जांच लो; उसके बाद उसका एक शब्द आखिरी शब्द — बना दे तो बना, तोड़ दे तो तोड़; फैसला मत लेना।
लक्ष्य दिखना चाहिए। उस तक पहुंचने के लिए मास्टर बोलेगा क्या करना। जिसके अंडर में गए पहले उसको जांच लो। मास्टर के शब्द आखिरी शब्द। फैसला मत लेना — जिसके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति, उसके एक शब्द आखिरी। वो कहे बना तो बना, तोड़ तो तोड़।
अब तुम बंद कर। खुद उठेगी तो कुछ करेगी — खुद मेहनत कर। 3:00 बजे उठ के कुछ करना हो तो ही उठना, नहीं तो सोए रहना। जब उठना तब नहीं उठना। कुटिया में आ जा — अकेली आ जाती है तो फिर खुद करना पड़ता है।
साधना कर अपने आत्मिक कल्याण के लिए। तेरे पोस्ट के लेने को बहुत लोग खड़े हैं — क्यों बेमतलब कब्जा? अगर लगता है पोस्ट की जरूरत या समाज में कुछ हो रहा है — जरूरत कभी पूरी नहीं होती। जहां नौकरी कर रहे हो क्या सिर्फ तुम्हारी जरूरत है? नहीं — तो निकल जाओ। मन को समझाने की बजाय तू समझ जा; मन छोड़ दे।
ऐसा काम करो जीवन में। जूते-चप्पल के राख मत बनो। सोचने से कुछ नहीं होता — करने से होता है। एक दिन सोच ही रह जाएगी, क्षमता निकल जाएगी। तभी फैसला ले लो। महान दिव्य आत्मा के वस्त्र याद में रखे जाते हैं; सांसारिक के बच्चे कहते हैं अशुद्ध हटाओ।
पब्लिक प्लेस (रोड) जहां कोई बात रख सकता है; सार्वजनिक प्रोग्राम में जिसको अनुमति है वही बोले। जिसके लिए उठे उसने वैल्यू नहीं दी — ऊर्जा बर्बाद। पहले मुझसे पूछो क्या सलाह दे सकता हूं। यहां सीखने आए हो तो सिखाने की बात मत करो — सिखाने वाला एक, सीखने वाले अनेक। सुनो, बुनो, फिर धुनो। ऊर्जा ऐसे खर्च मत करो नहीं तो घुटन में जीओगे। संस्कारहीन टैलेंट रोटी को मुहताज रहता है।
अगले शरीर का इंतजार करो और निकलने के लिए प्रयास/भाव रखे रहो। अगला शरीर मिले तो शरीर से निकलने के लिए काम करो; धन कमाना है तो धन को निकलने में लगाओ। बिना मतलब आश्वासन नहीं — मेरे बस में होता तो कर देता। धन/तन हो तो सब लगा दो; कुछ नहीं तो अगले शरीर का इंतजार — अगला शरीर पक्का है।
ऊर्जा को बहुत सोच-समझ के खर्चो। दुरुपयोग होगा तो घटेगा, सदुपयोग होगा तो बढ़ेगा। सामने वाला स्वीकार करे तो स्तर तुरंत बढ़ता। बिना मतलब बोला और उपयोग नहीं हुआ तो ऊर्जा माइनस — मिला कुछ नहीं। जहां से ऊर्जा कई गुना रिटर्न मिले वहीं उपयोग करो। नहीं तो कमजोर होकर गिड़गिड़ाओगे।
तेरे पास क्या है? धन नहीं, शरीर भी नहीं — जवानी भोग में गवा दी तो अब कुछ नहीं होगा क्योंकि ऊर्जा खत्म। अगला शरीर पहले ले — पता नहीं भोग वाला मिलेगा या योग वाला, 84 लाख योनियों का लपेट। कर्ता का अधिकार मानव में है। अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करो। सामने उदाहरण — रो रही है मुक्ति मांग; क्यों जवानी नहीं निकली?
अब अकेले में पूछना तो सत्संग करवा लेना — और लोगों को लाभ मिले। जीवन में एक सत्संग करवा; फिर अकेले भी मौका दूंगा। कुटिया में भी नहीं — जब लगे समाज के लिए कुछ काम किया तब अकेले में दूंगा।
पहले भगवान को समझ लो, परमात्मा समझ से परे है। भग मतलब योनि — जो अपने आप को जन्म और मरण से मुक्त करा ले, वह भगवान है। संसार में भी हम सामर्थ्यवान को भगवान मानते हैं; जिसने अपने आप को छुड़ा लिया, वह इंसान से भगवान हो गया, और फिर वह परमात्मा की यात्रा करता है। परमात्मा के बारे में आज तक किसी ने सीधा नहीं बोला — लोगों ने अनुमान लगाए कि विराट है, अनंत है, सर्वव्याप्त है, पर वह कैसा है पता नहीं। उस तक पहुंचने का सीधा मार्ग है अपने आप को पवित्र करा लो। और ध्यान रखो, अंतर समझना ही अंतर है — जैसे पानी की एक बूंद और बाकी पानी में बड़े-छोटे के सिवा कोई भेद नहीं। यह अंतर हमने राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, मेरा के भाव और लालच में आकर पैदा किया है, और इसी अंतर में हम भटक रहे हैं; इसी भेद से अपने आप को मुक्त कराना है।
बाहर रूप की वजह से सब अलग दिखते हैं, पर रूप के पीछे जाओ तो एक ही मिलेगा। यह अलगाव एक समय नहीं था और एक समय बाद नहीं रहेगा — यह भ्रम है। अलग-अलग दिखने से भी कोई तकलीफ नहीं; अभी यहां बैठे लोगों से आपको ना राग है ना द्वेष। पर जैसे ही आपने किसी से कुछ मांगा, फंस गए — जिसने दिया उससे राग, जिसने नहीं दिया उससे द्वेष। सब दे दें तो भी राग में फंस गए, उनके पिंड में घुस गए कि "यह आदमी बहुत अच्छा है"। इसलिए उम्मीद से अपने आप को मुक्त कराओ — उम्मीद ही दुख है, उम्मीद ही सुख है। जिनसे आपने कुछ लिया-दिया नहीं, उन्हें छोड़ने में ना दुख होगा ना सुख, कुछ अलग ही होगा; आंखों में आंसू आएंगे और पता नहीं होगा क्यों, क्योंकि पहली बार बेमतलब जिए।
क्योंकि ज्यादातर हमने जीवन मतलब में बिताया है — हमने एक दूसरे को यूज़ किया है। अगर कोई हमारे काम आया तो वह अच्छा, नहीं आया तो बुरा। देखोगे तो हमने एक दूसरे का यूज़ ही किया है, इसीलिए आज जीवन घुटन में है। जहां लेनदेन नहीं, मतलब नहीं, वहां ना राग है ना द्वेष — वहीं से घुटन मिटती है।
हां, जिसने अपने आप को राग-द्वेष से छुड़ा लिया, जो उस उपलब्धि को प्राप्त हुआ, वह भगवान ही है। पर देखो आपने कहां गलती की — कृष्ण स्वयं गुरु के पास गए और ज्ञान लिया, राम स्वयं गुरु के पास गए और ज्ञान लिया; उन्होंने यही कहा कि जीवंत गुरु के शरण में जाओ तभी कल्याण होगा, और आपने कृष्ण-राम को ही पकड़ लिया। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में सब बदल जाता है। पेड़ बहुत विशाल था, दादा-परदादा छांव लेते थे, पर अब सूख गया; बगल में एक छोटा हरा-भरा पेड़ है — बैठना कहां ठीक है? जैसे पद पर वर्तमान में जो है वही काम करेगा, वैसे जीवंत गुरु ढूंढो। और खोजना पड़ेगा — ऐसे ही नहीं मिलेगा; व्याकुल होगे, इधर-उधर धक्के खाओगे, थक जाओगे, तब जाकर मिलना होगा।
ज्योतिर्लिंग मतलब पहले ऊर्जा आई, बाद में स्थापना हुई — उनकी इतनी सामर्थ्य थी; और उनकी गिनती है, 12। शिवलिंग मतलब पहले शिवलिंग लाया गया, बाद में उसमें ऊर्जा का आवाहन किया गया — वे करोड़ों-अरबों हैं, उनकी गिनती नहीं। ज्योति मतलब प्रकाश पुंज, जिसे कभी नापा नहीं जा सकता — एक दिया जला दो, उसकी लंबाई-चौड़ाई नहीं नाप सकते। मिला-जुलाकर आखिर में सब एक ही से है। और अगर आपको ज्योत में ही वह नजर आता है तो ठीक है — भाव में ईश्वर का वास है; प्रह्लाद को खंभे में दिख गया और वे निकल आए।
शिव के बारे में अभी तक कोई नहीं बोल पाया। ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता, विष्णु को पालनकर्ता और महेश को संहारकर्ता बोला गया है। हमारे शरीर के जन्मदाता पिता हैं — शरीर शरीर से निकलता है। मां दो बार पालती है — एक बार गर्भ में, और फिर जब संसार में आने योग्य नहीं रहते तो मल-मूत्र साफ करके संसार के योग्य बनाती है। और अपने विकारों का संहार स्वयं को करना है। इस तरह ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रत्यक्ष हैं — माता-पिता और स्वयं।
अगर एक ही होता तो हम दो क्यों कहते — स्वयं को शिव क्यों कहना पड़ता? मतलब कहीं ना कहीं वह अलग है। स्वयं के बाद उसकी यात्रा शुरू होती है। जो खोज रहा है और जिसे खोजा जा रहा है, वे अलग हैं तभी तो खोज रहे हो; एक ही होता तो खोजने की क्या जरूरत थी।
अलग तो है ही है, तभी तो सुनाई दे रहा है — सुनने वाला अलग है और जिसे सुना जा रहा है वह अलग है; एक ही होता तो हमेशा सुनाई देता। और इंद्रियां भी तभी पहुंचाती हैं जब भाषा आती है — शब्द आया पर भाषा का ज्ञान नहीं तो आवाज सुनाई देगी, मतलब नहीं। अलगाव तो हो ही गया है; अब इस अलगाव को कैसे खत्म किया जाए, उसके लिए काम करना है। और अलगाव हुआ कहां है? इच्छा और अपेक्षा में।
गुरु ऐसा होता है कि होकर भी नहीं होता, और वह आपको सीधा उससे ही जोड़ता है। उसके बिना तो आप उससे जुड़ ही नहीं पाओगे, और क्योंकि वह होकर भी नहीं है इसलिए बीच में अटकाता नहीं — सीधा जोड़ता है। करते-करते-करते कुछ नहीं करने में पहुंच जाना है, बस वही तुम हो।
जीवंत आदमी चाहिए। स्टेशन पर ऑनलाइन बता रहा था कि गाड़ी इस प्लेटफार्म पर आएगी, आएगी, पर इंक्वायरी पर जीवंत आदमी ने तुरंत बताया कि गाड़ी तो खड़ी है — नेट ने कुछ काम नहीं किया। कोई मैप देखकर जा रहा था, पुल आधा था, गाड़ी गिर गई। रास्ता नहीं पता तो देखकर जाओ, पर पूछ-पूछकर जाना जरूरी है। सोच-समझकर यात्रा करो, सोच-समझकर जीवन जियो।
यह तो सबसे सरल है — कुछ ना करना। हमने इसे जटिल बना दिया है, क्योंकि सब चाहिए के पीछे दौड़ रहे हैं। रसपान के चक्कर में हम हर वक्त शारीरिक और मानसिक रूप से दौड़ रहे हैं। कुछ समय के लिए तो कुछ नहीं चाहिए में बैठ ही सकते हो।
एक बार आनंद में हो गया तो हो गया, बात ही खत्म — वहां दुख-सुख कहां है, दुख का लेवल ही नहीं आता, क्योंकि कुछ नहीं चाहिए। उस आनंद के लिए शब्द ही नहीं हैं; कौन सा आधार दूं, किसी भी सुख से उसकी तुलना नहीं हो सकती, उसका कोई पैमाना नहीं। भोजन, संसाधन — ये सब सिर्फ जरूरत हैं। अपना जीवन देखूं तो तन पर बस कपड़ा है; ना कोई बैलेंस है, ना कोई आदमी। अगर शरीर काम करना बंद कर दे तो ऐसा कोई नहीं जो एक गिलास पानी दे या हाथ पकड़कर उठाए — और मुझे 1% भी फिक्र नहीं; उस तड़पने में भी मुस्कुराता रहूंगा, देखते हुए निकल जाऊंगा। भविष्य की रत्ती मात्र भी फिक्र नहीं — यही है वह आनंद। और ऐसा व्यक्ति किसी को अपना बनाने का प्रयास भी नहीं करता।
निष्काम कर्म करने की कोशिश करोगे तो कभी नहीं होगा। ईमानदारी से सत्कर्म करो — जरूरतमंद की सेवा करो, बस वही निष्काम कर्म है। गीता में कहा गया कि कर्ता और मेरा के भाव से मुक्त हो जाओ, पर कैसे मुक्त होगे, यह उसमें इतने डिटेल में नहीं लिखा। एक व्यक्ति आए थे, बोले 700 श्लोक कंठस्थ हैं, लेकिन मैं दुखी हूं। पढ़ने-सुनने से जानकारी तो इकट्ठी हो जाती है, पर प्रत्यक्ष का मतलब प्रत्यक्ष ही होना चाहिए।
इतने साल इस गांव में रहा, गरीब से अमीर तक मिले, पर ना कोई भक्त बना ना चेला, मैं परिचय भी नहीं पूछता — क्योंकि मैं बनाना नहीं चाहता, बनने से मुक्त कराना चाहता हूं; बनना ही भटकाव है। आप बनते-बनते परेशान हो गए हो — कभी किसी का बेटा, कभी पति, फिर किसी का शिष्य बना दिया और कंठी दे दी, पर कल्याण नहीं हुआ। अब ना मुझे बनना है ना बनाना है; ना शिष्य की इच्छा है ना गुरु की। सेवक का मतलब जो चरणों में रहे — उसके नीचे कोई स्टेज ही नहीं, तो गिरेगा कहां? इसलिए मैंने आत्मिक रूप से सेवक भाव स्वीकार किया और उसमें जीता भी हूं — सुबह से भोजन नहीं किया, सेवा में लगा हूं; गुरु के भाव में होता तो पहले भोजन करता और आप मेरा इंतजार करते। जो काम लिया है उसे पूरी मेहनत से करता हूं, लोगों को मार्ग बताकर निकल जाना है।
आता तो नहीं है; आ सकता है, लेकिन वह नहीं लाएगा तभी नहीं आएगा — उस पर किसी और का बस नहीं चलता, उसी के ऊपर है। ऊपर जाने में जरूर समय लगता है, पर नीचे आने में कुछ नहीं लगता। इसलिए मैंने सेवक का काम चुन लिया, निमित्त मात्र — अब कैसे गिरूंगा?
आगे क्या होगा, यह भी पता नहीं कि वहां तक जिएंगे कि नहीं, पर चिंता बनाकर फ्यूचर में ही रहते हो। फिर भी जहां पर आप खड़े हो, वहां बनाना भी जरूरी है, सेविंग भी जरूरी है — आप अपनी जगह सही हो। मैं कहीं और खड़ा हूं, आप कहीं और; आपके पीछे कोई निर्भर है, मेरे पीछे कोई नहीं। इसलिए आपको व्यवस्था करनी पड़ेगी।
अकर्म का मतलब है कर्म करते हुए अकर्ता का भाव लाओ। विकर्म — हो सकता है बुरे कर्म को विकर्म कह दिया हो। क्योंकि हमारे पास दो ही तरह के कर्म हैं — ईमानदारी से सत्कर्म, और बेईमानी से दुष्कर्म। यही है, और कुछ नहीं।
इसके बारे में मैं कुछ नहीं बोल सकता, मैंने कभी इस पर काम नहीं किया। मैंने मूल पर काम किया कि मैं कैसे निकल जाऊं। आप कह सकते हो मैं अपने जीवन में मतलबी इंसान रहा — अपने काम के अलावा बात नहीं की; जिससे लाभ होगा वह करूंगा, नहीं तो नहीं। एक श्लोक "कर्म प्रधान विश्व करि राखा" से काम हो गया, तो दूसरा क्यों पकड़ूं? ओम किसने पैदा किया, वही व्यक्ति बताएगा, और वह दुनिया में है नहीं। पर एक व्यक्ति मेरे सामने है — मैं स्वयं — तो क्यों ना अपने बारे में जानूं? जिसने अपने आप को जान लिया वह सब जान गया; राज्य पर कब्जा करना है तो सैनिकों से दोस्ती से अच्छा राजा से मिल लो। व्याख्याकार मत बनो, व्याख्यान उलझाने का काम करता है — देखो कि आपका कल्याण कैसे होगा, वह पकड़ लो।
जब आप बहुत परेशान हो — प्यास लगी है, जेब में पैसे हैं पर आसपास कुछ नहीं — और एक आदमी बोतल देकर कहे "पी लीजिए", उस समय वह भगवान ही लगता है। ट्रेन छूटने वाली हो और कोई सही प्लेटफार्म बता दे, तो वह भगवान ही लगता है। आप भी किसी भूखे को भोजन कराओ तो जब तक उसका पेट नहीं भरता, आप उसके लिए भगवान हो। तो भगवान कौन? जो जरूरत में सहायता दे, और सहायता समर्थवान व्यक्ति करता है। देखो कितनों के लिए आप भगवान बने और कितने आपके लिए बने। और जो अपने आप को निकाल दे, वह सबसे समर्थवान है — वही भगवान है।
नया-नया विवाह हुआ, पति-पत्नी कमरे में बातें कर रहे हैं और बार-बार कोई खटखटाता है — पापा, फिर मां, फिर भाई — तो पत्नी कहेगी "तू उन्हीं को देख ले, मूड मत खराब कर"; ससुराल में यही पति कहेगा। वैसे ही भक्ति में, प्रेम में और सत्संग में उठा-उठी मत करो, आपकी वजह से लय टूट जाती है। यह कथा या प्रवचन नहीं, किसी की उठाई वाणी नहीं — यह उतर रही है; एक भी शब्द छूट गया तो पूरा समझ नहीं आएगा, जैसे किताब की दो लाइनें छूट जाएं। इसलिए सत्संग में मल-मूत्र का त्याग करके बैठो, और सब छोड़कर बैठो। किसी को शुगर जैसी बीमारी हो, जाना ही पड़ता हो, तो पहले बता दो। और अगर नहीं हो पा रहा तो पहले अपने रोग का इलाज कराओ — प्रथम सुख निरोगी काया — फिर आगे बढ़ो। ऐसे ही जब प्रेम में बैठ सको तभी विवाह करो, नहीं तो आपके द्वारा किसी का जीवन बर्बाद होगा।
जितने लोग आए थे, उन्हें मैं पूरा समय देना चाहता हूं। अगर मैं आपसे सत्संग कर रहा हूं और परमात्मा भी आ जाए और कहे चलो, तो बोलूंगा रुको, अभी इन्हें समय दे रहा हूं; वह जाना चाहे तो कहूंगा तुम जाओ, बाद में मिलेंगे — क्योंकि मुझे ना इनसे कुछ चाहिए ना उससे। मैं जहां भी जीता हूं पूरी तरह जीता हूं, नहीं तो मना कर देता हूं कि मैं तुम्हारे साथ नहीं हो पाऊंगा। जब आप किसी के साथ हो तो पूरी तरह हो, नहीं तो मत हो — यही जरूरत है।
बताना चाहिए था — यह आपकी गलती है; अपनी गलती किसी दूसरे पर मत थोपो। अगर कोई रोगी या बुजुर्ग हो तो मुझे बताए; मैंने सबसे कहा है कि कोई प्रॉब्लम हो तो बताओ, नहीं बताया तो उसके जिम्मेदार आप हो। आपके पास दो रास्ते हैं — एक, यहां के पूरे नियमों का पालन करो; दूसरा, नहीं हो पा रहा तो वापस घर जा सकते हो। दोनों में आप स्वतंत्र हो; यह स्वतंत्रता मैं दे रहा हूं।
क्योंकि हम पूरी तरह लगते ही नहीं, और जब तक पूरी तरह नहीं लगोगे, नहीं होगा — साधना पड़ता है। जहां भी जाओ, पहले वहां के नियम पूछ लो और अपनी पूरी बात रख दो; इसमें हानि आपकी है, मेरी नहीं। जब एक व्यक्ति आपको पूरी तरह समय दे रहा है तो आपको भी पूरी तरह देना पड़ेगा। रहोगे तो पूरी तरह रहो, नहीं तो मत रहो — टाइम पास नहीं कर सकते। जब कोई बीच में उठकर जाता है तो शब्द उसके छूटते हैं, और कई लोगों का मन भी इधर-उधर जाता है। यह आप अपने लिए कर रहे हो, मेरे लिए नहीं — अपनी क्षमता बढ़ाओ।
मुझे इससे कुछ नहीं चाहिए। हां, मैं पेपर पर लिखकर दे सकता हूं कि जो साधक सही में साधना करेगा उसे परमात्मा मिलेगा — परमात्मा है, और साधना से ही मिलेगा; बस उतनी प्यास होनी चाहिए। और मैंने खुद को मतलबी इसलिए बताया कि आप भी इतने मतलबी बन जाओ कि अपने काम की बात करो, तभी पहुंच पाओगे। आप क्या करते हो — जाते किसी और काम के लिए हो और करने कुछ और लगते हो।
किस आधार पर, किस स्थिति से कह रहे हो? आप मेडिटेशन कर रहे हो, अभी उसके आखिर तक नहीं पहुंचे — अभी उसके बारे में बस नॉलेज है, इसलिए अभी फाइनल कुछ मत बोलो। यात्रा की अभी शुरुआत हुई है, और ब्रह्म की तरफ जाने के लिए कुछ नहीं करना है। आप जिस जगह बैठे हो उसे देखो — इस समय आप सुनने वाले की जगह हो, सलाह देने वाले की नहीं; सलाह मत दो, लय मत तोड़ो, जो कहा जा रहा है उसे सुनो और ग्रहण करो।
नहीं। बेटे ने ऐसा कुछ कर दिया कि लोग उसे उठाकर कैदखाने में डाल गए, तो उसमें पिता क्या करे? बेटे को अपराध करने से पहले सोचना चाहिए था। यह सिस्टम है, उसमें पिता भी कुछ नहीं कर सकता। तो अपराध की सजा काट लो — बाहर पिताजी इंतजार ही कर रहे हैं।
लोग बोलते हैं, हम नहीं बोलते। जब हम उससे मिले नहीं तो कैसे बोल दें कि वह कैसा है — बस प्रचलित हो गया। हम तो बस इतना बोलते हैं कि निकल लो — अपने आप को निर्विकार कराओ; राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से मुक्त कराओ।
जीवन में दबाव और संकोच में कभी कहीं मत रहना — मैं सलाह भी दे रहा हूं और मैंने जिया भी है; नहीं तो आप जिंदगी में उठ नहीं पाओगे। जहां दबाव-संकोच ना हो, वहीं आपका स्तर उठ सकता है। जो सिस्टम है, उसका उपयोग करो; उसमें जी सकते हो तो रहो, नहीं तो निकलने का एक रास्ता है — यह स्वतंत्रता सबके पास है, किसी ने कभी छीनी नहीं। पर सिस्टम को बदलने की सलाह मत दो — एक प्रोफेसर साहब बोले पैसा देता हूं, दो टाइम भोजन की व्यवस्था करो; मैंने कहा आपका पैसा यहां नहीं चलेगा, सिस्टम के लायक नहीं हो तो चले जाइए। मैंने 12 साल अपने आप को पूरी तरह खत्म करके, बहुत सोच-समझकर यह व्यवस्था बनाई है। हां, अपनी समस्या बताओ — उचित लगेगा तो हां बोलूंगा, नहीं तो ना।
आप जहां खड़े होकर बात कर रहे हो, वहां मैं नहीं खड़ा हूं। एक संन्यासी को कभी ऐसे नहीं करना चाहिए। हां, भिक्षुक है तो अलग बात है — वह भी पेट के लिए अल्पाहार, बस उससे ज्यादा नहीं; सुख के लिए नहीं, सुविधाओं के लिए नहीं। मैं वह नहीं था। 2011 से निकला हूं, कभी किसी को नहीं बोला कि मेरे लिए बनाओ — मेरे लिए उससे अच्छा मरना है; पूछा तो खाया, नहीं तो कोई बात नहीं। मेरे साथ भी परिस्थितियां बनीं, पर मैंने कहा तूने फैसला लिया है, तुझे आगे ही जाना पड़ेगा। जो व्यक्ति अपने आप को नहीं छोड़ता, वह आपको भी नहीं छोड़ेगा।
साधक बनना, खोजी बनना इतना आसान नहीं है जितना हम समझते हैं। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि मरना इससे आसान है — साधना में ऐसा आता है कि मौत उससे अच्छी लगती है। पहले साधक बनिए — साधक के पूरे नियम पढ़ लो और साधक बनकर रहो, कोई भी प्रॉब्लम हो तो कहो। और आपको अपने आप पर अनुशासन की सख्त जरूरत है — अगर आगे बढ़ना है तो यह बहुत जरूरी है।
ऐसा नहीं कि भूख-प्यास आप ही लोगों को लगती है, मुझे भी लगती है — यह शरीर है। लेकिन मेरे लिए सबसे जरूरी यह काम है, क्योंकि इससे कई लोगों का आत्मिक कल्याण हो सकता है। यह शरीर कभी ना कभी जाएगा, इसके चक्कर में मैं नहीं पड़ता; पर जाने से पहले कुछ लोगों के लिए देकर जाएगा। जिसका काम है, वह टिकाएगा। और आप लोग अपनी जगह सही हो — आप खाना खाइए, पानी पीजिए, आपका शरीर भी जरूरी है।
जब निकला था, उसी समय दो बातें जीवन में फिट कर ली थीं — मुझे कुछ नहीं चाहिए, और मुझे समाज के लिए काम करना है। फिर उस स्थिति में आया तो फिट हो गया कि निकलना है, और निकलने से पहले जितना हो जाए कर देना है। ना मुझे सरल बनना है, ना गुरु, ना शिष्य, ना गृहस्थ, ना साधु, ना महात्मा, ना बैरागी, ना उदासी, ना ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र, ना सहज — मुझे करते हुए निकल जाना है। ना मुझे पाप से मतलब, ना पुण्य से, ना सेवा से, ना सत्कर्म से; जैसा काम है, काम के तरीके से होगा।
जितना बोलता हूं उतना करना है, तभी बोलता हूं — फॉर्मेलिटी पूरी नहीं करता। कोई जाता है तो किराया-भाड़ा पूछ लेता हूं, और सच में देने के लिए ही पूछता हूं; ऐसा नहीं कि कैमरे पर कुछ और, जिंदगी में कुछ और — जैसा हूं पूरी तरह वैसा हूं। पहले जब दवा का काम करता था, लोग कहते महाराज जी श्रद्धा-विश्वास से खाएंगे; मैं कहता नहीं, गाली देते हुए खाओ, दवा काम करेगी, इसमें आशीर्वाद और श्रद्धा की आवश्यकता नहीं। लोग फोटो लगाकर पूजने लगे, "माता जी प्रणाम" कहने लगे, तो मैं कहता मैं लड़का हूं — मुझे यह पसंद नहीं, क्योंकि मुझे कुछ बनना नहीं है। मैं काम को बहुत ईमानदारी से करता हूं, ताकि जब उससे मिलूं तो कह सकूं कि जिस काम को लिया था, पूरी ईमानदारी से किया; कोई कमी हो तो मुझे बचा।
आज तक हम किसी को ब्लॉक नहीं करते — क्यों करें? मुझे अच्छा या बुरा दोनों नहीं बनना। मैं सिर्फ अच्छा बनने के लिए आपको गिरते हुए नहीं देख सकता — मैं बुरा ही सही, लेकिन आप उठ जाओ; आप जिसके लिए आए हो वह हो जाए। आप कितना समय निकालकर, कैसे-कैसे यहां आए हो, तो आपका एक सेकंड भी बर्बाद नहीं होने दूंगा; मेरी बातों से ठेस लगे तो लगे। अच्छा बनने के लिए मुझे कैमरे के सामने सरल नहीं होना। जो गाली दे रहा है, उसे भी कभी ना कभी समझ में आएगा। मुझे जवाब उसे देना है, आपको नहीं।
क्योंकि हर सुख का परिणाम दुख है — यह बात मुझे पता थी, तो मैंने दुख को ही चुन लिया, और मैं दुख में ही मस्त रहता हूं। मुझे नरक भी जाना पड़े तो जाऊंगा; कहां भेजोगे? नरक में ही सेवा करूंगा — स्वर्ग में तो सब सुखी रहेंगे, वहां करेंगे क्या?
मुझे कोई रोकने वाला नहीं है, मैं एक घंटा सत्संग करके अंदर बैठ जाता, आराम से भोजन करता। पर पता नहीं कौन से शब्द से, कौन सी लाइन से आपका कल्याण हो जाए। आप साल भर में एक-एक घंटा लेते तो कितना होता — तो एक ही दिन में इतना देता हूं कि कई महीने का हो जाए। मेरे जीवन में पहले काम, बाद में आराम; क्योंकि काम में कुछ लोग हैं, मैं उनकी भावनाओं को समझता हूं, उनकी इज्जत करता हूं। समय दिया तो पूरी तरह दिया, नहीं तो मना कर दूंगा — मैं इतना जवाबदार इंसान रहा। अभी नहीं, तो कभी ना कभी आपको समझ आएगा कि वह व्यक्ति क्यों चिल्ला रहा था — जैसे मां-बाप बचपन से चिल्लाते हैं और हम उनके जाने के बाद समझते हैं।
वहां हमें कुछ ऐसा मिल गया था — स्पर्श विद्याएं मिल गई थीं, और हमने उसे भी सेवा में लगा दिया; 16-18 घंटे, कभी 24 घंटे भी मेहनत की, दोपहर से अगली सुबह हो जाती थी। लेकिन वे सब लोग कामनाओं में थे, शरीर तक थे; और मैंने देखा कि शरीर का दुख तो बस क्षणिक है — यह ठीक करो, फिर वह। मुझे तो आगे ही बढ़ना था, आखिर तक पहुंचना था, और लोगों को आखिरी मार्ग बताना है। उसका भी सदुपयोग कर दिया और आगे निकल गया।
बड़े प्यार से बोलना, सरलता से चलना, हावभाव से बैठना, सम्मोहित करने वाला माहौल — इसकी ट्रेनिंग होती है; म्यूजिक बजाया जाता है, अगरबत्ती लगाई जाती है, प्रभाव डालने के लिए। भले अंदर गालियां आ रही हों, लोगों के सामने बहुत सज्जन बनकर रहते हैं — यह सब मैंने देखा है। मैंने यह सब जिंदगी में नहीं सीखा। मैं एकदम खुला बोलता हूं, जितना समझ में आया है वह अपनी बात रखता हूं; आप क्या लेते हो आपके ऊपर है। अपना काम खुद करता हूं, खाट भी खुद जोड़ता हूं। कोई ना समझे तो एक परम सत्ता है, वह तो समझेगी।
एक व्यक्ति बड़ौदा से आया था — आसन पर जूते निकाल रहा था, फिर काढ़ा पीकर वहीं गिरा दिया जहां लोग बैठते हैं; बोला गलती हो गई। फिर सत्संग छोड़कर नर्मदा घाट पर चला गया, सोचा मैं बाद में साधना कराऊंगा — पर यह सत्संग ही साधना है। हम गलती पर गलती किए जा रहे हैं और हर बार कहते हैं "सॉरी, गलती हो गई" — यह आदत पड़ गई है, अब सॉरी बोलने में भी लगता है मैं कुछ हूं, मेरी कुछ सोसाइटी है। रास्ते में किसी को धक्का लगे तो तुरंत हाथ जोड़ते हो, वह लोगों को आकर्षित करने के लिए करते हो — घर में वही हो तब नहीं करते। इसे बहुत गहराई से समझना: गलती मान लेना काफी नहीं, उसे दोहराना बंद करो; ध्यान से जियो, जिस काम के लिए आए हो वह करो।
हमारा कर्तव्य है — आप यहां आए तो आपकी व्यवस्था करना, भोजन देना, रहने की व्यवस्था देना, कोई कमी लगे तो दूर करना, और आपकी पूरी तरह रक्षा करना; मैं मिट जाऊंगा पर आपको यहां तकलीफ नहीं होने दूंगा। पर आप कहोगे मैं जा रहा हूं, तो मैं रोक नहीं सकता — रात को जाओगे तो कहूंगा कुत्ते से सावधान होकर जाना, दिन में रास्ता पूछोगे तो बता दूंगा। जब तक रहोगे, आपके हित के लिए बताता रहूंगा। आओ आपकी मर्जी, जाओ आपकी मर्जी — यह सब साधकों के लिए बना है, किसी व्यक्ति विशेष का इस पर नाम नहीं लिखा। हमारा बस भाव है कि आप लोगों का जल्दी से जल्दी आत्मिक कल्याण हो।
परमात्मा खोज का विषय नहीं है, वह सारे विषयों से परे है। मुझे परमात्मा का पता मालूम नहीं; पर परमात्मा है, तो उसे मेरा पता मालूम है। जब मैं योग्य हो जाऊंगा तो वह मिल जाएगा — सीधी सी बात है।
सब तो एक ही से है, बात ही खत्म — पूछने की क्या जरूरत? बस अनेक लोगों ने रूप बदल दिया। पानी से बर्फ हुई, बर्फ के टुकड़े हुए, उससे आइसक्रीम बनी और अनेक ब्रांड में बेच दी गई — हम भी ऐसे ही अनेक ब्रांड बनकर घूम रहे हैं। हमारे में लोगों ने बाहर से अलग-अलग कलर मिला दिया है — कोई काला, कोई लाल, कोई सफेद। जो भी आपके पास है, बाहर का ही है; बाहर का कलर हटा दो तो सब क्रिस्टल क्लियर, एक जैसे। पहले ब्रांड मिटाओ।
मेरा का जुड़ाव कहां से हुआ? अपने तरीके से चाहिए, वह मिल रहा है — इसलिए अपने तरीके का त्याग करिए। कर्ता का भाव कब प्रकट होता है? जब परिणाम का पता नहीं और आप अनुमान लगाते हो। अनुमान सही निकला तो राग, गलत निकला तो द्वेष; सही हुआ तो आप लोगों को खोजोगे, नहीं हुआ तो लोग आपको खोजेंगे। इसलिए अनुमान लगाना छोड़ दो, जितना पता है उतना बताओ, परिणाम आने पर बोलो। मेरा कहना है त्याग मत करो, पैदा ही मत होने दो — पैदा हो गया तो हटा नहीं पाओगे। जीवन में "ठीक" शब्द का प्रयोग करो — अच्छा बोलोगे तो राग, बुरा बोलोगे तो द्वेष; ठीक में आप होते हो, और मेरा-कर्ता का भाव गिर जाएगा।
कोई बात नहीं, शरीर से प्रतिक्रिया ना दो; मन में आ गया तो आने दो, मुंह से ठीक ही कहो। धीरे-धीरे पहले बाहर से बंद करो, फिर अंदर से भी होने लगेगा। ठीक में ना अच्छा है ना बुरा — भोजन को ठीक कहा तो सामने वाला बुरा नहीं मान सकता; वह पूछे "सच में अच्छा नहीं बना?" तो भी आपको यही कहना है — ठीक है। सामने वाले की उम्मीद अच्छा सुनने की है, लेकिन आपको तो निकलना है। आपको बस इतना देखना है कि ऐसे शब्दों का प्रयोग ना हो जिससे किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे; फिर भी पहुंचती है तो उसका जिम्मेदार वह है, क्योंकि लोग सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण — तीनों में जीते हैं।
हां, वह चापलूसी हो जाती है — और चापलूसी बेईमानी है। जब भी आप संसार में काम करोगे, आलोचना होगी; कुछ मत करो, मंदबुद्धि हो जाओ, तब कोई आलोचना नहीं करेगा। बस आपको यह देखना है कि मैं आलोचना वाला कार्य कर रहा हूं या नहीं — कर रहे हो तो छोड़ दो, नहीं कर रहे तो आगे बढ़ते रहो; ऐसे कितने आएंगे-जाएंगे। मुझे भी गालियां आती हैं, मुझे पता है मैं गाली वाला काम नहीं कर रहा — होता तो छोड़ देता। कम से कम उसकी गाली ऐसी जगह खड़ी हो रही है जहां से प्रतिक्रिया नहीं मिलेगी; किसी राग-द्वेष वाले के यहां देता तो प्रतिक्रिया उठती, बंधन बनता। हो सकता है उसके साथ लोगों ने ऐसा किया हो, वहां नहीं निकाल पाया तो यहां निकाल रहा है — निकाल ले। गाली ही तो दे रहा है, क्या फर्क पड़ता है; और आपको भी अपने को जांचने का मौका मिल रहा है।
जैसे कली और फूल — नाम दो हैं, पर है एक ही। नहीं खिला तो कली, खिल गया तो फूल। प्रेम शुरुआत है, खिल गया तो वही आनंद। उस आनंद को बताने के लिए कोई आधार चाहिए, पर संसार में ऐसा कोई सुख नहीं जिससे उसकी तुलना कर सकूं। मेरे अनुभव में इस समाज में सबसे ज्यादा खुशी मां-बाप बनने में होती है — सुनकर आंखें भर आती हैं; पर वह इससे भी आगे है। कौन सा उदाहरण उठाएं? इसलिए पहुंचो — वह पहुंचकर ही अनुभव किया जा सकता है।
सगुण में तो हम बात कर रहे हैं, और बात करने वाले के पीछे जो है वह निर्गुण है — आपके सामने दोनों मौजूद हैं। जिसे देखा जा रहा है वह नहीं रहेगा, देखने वाला रहेगा। आप मुझे देख रहे हो, मैं आपको देख रहा हूं — देखने वाले रह जाएंगे।
2011 में कृष्ण जन्माष्टमी को उदासीन बड़ा अखाड़ा के एक महंत जी से दीक्षा ली और नाम पड़ा गोविंदा दास। तीसरे दिन मैं रोया और उनके पीछे घूमता रहा कि दीक्षा क्यों दी, मुझे अनुभव कराओ। उन्होंने कहा जन्म-जन्म लगते हैं; मैंने कहा कोई तो जन्म आखिरी होगा, यही आखिरी है — मैं अबोध हूं, काम-क्रोध-मद-लोभ से भरा, भटका हुआ हूं, लेकिन खोजकर रहूंगा। तब उन्होंने कहा, तुझे जो चाहिए, जा सद्गुरु ढूंढ — गुरु ने हमें खुद छोड़ दिया। इसलिए मैं नाम नहीं बोलता; भस्म उतार दी, कंठी टूट गई तो पहनी नहीं; आश्रम में अब भी आना-जाना है। मुझे कोई बर्दाश्त नहीं कर पाता था, क्योंकि मैं सीधी बात करता हूं — अच्छा-बुरा लगने के लिए नहीं बोलता। अगर आपको अपनी बात रखने की स्वतंत्रता है, तो मुझे भी अपनी बात अपने तरीके से रखने की स्वतंत्रता है। जीवन में तीन गुरु रहे — घर में ही एक चचेरे भाई, फिर एक ज्योतिष के गुरु, और एक संन्यास के गुरु — सब छूट ही गए, बचा मैं।
मैंने ही उसे कहा था, और उसने नशे में, बिना जाने कि कितना गहरा हो जाएगा, काट दिया — नस बस बच गई। उस समय भी मुस्कान ही थी, आंख में आंसू नहीं था; बोला इसे बांधो और हॉस्पिटल चलो। उस आदमी के प्रति आज तक मेरे मन में 1% भी कुछ नहीं, जरा सी भी ग्लानि नहीं — उसने मेरे कहने से काटा, उसका 1% भी दोष नहीं। डॉक्टर को भी बाद में ईमानदारी से बता दिया कि कैसे कटा था। उस घटना से मैंने सीखा कि किसी को इतनी ही छूट दो कि वह तुम्हें हानि ना पहुंचा पाए। यह सीखने में इतने टांके लगे — सीखना इतना आसान नहीं है।
हमारे शरीर के नौ दरवाजे गंदगी के होते हैं। सोने के बाद भी हाथ कहीं नहीं जाते; अगर जाना है तो जागना पड़ेगा — वह जगा देगा। इसे कहते हैं योग निद्रा। अगर कोई यहां तक पहुंच गया तो नहाए चाहे ना नहाए, कोई फर्क नहीं पड़ता। आश्रम में लोगों ने शिकायत की कि गोविंदा दास बिना नहाए आरती में आ जाता है; मैंने बताया कि आप आज नहाए, मैं कल से नहाकर बैठा हूं — मैं अशुद्ध ही नहीं हुआ। तब वे समझ गए और फिर कभी किसी ने नहीं टोका।
सीखने को तभी मिलता है जब हमें ठेस पहुंचती है — जब चोट लगती है तब चूकता है। उस समय अगर आपने अपने आप को संभाल लिया तो संभल गए, नहीं तो भाग जाओगे; बहुत कम लोग संभाल पाते हैं, ज्यादातर भाग लेते हैं — "दो दिन बाद आता हूं" कहकर जाते हैं और लौटते नहीं। जब अहम पर ठेस लगे, अपने आप को संभालो और पूरी तरह जांचो — ठेस क्यों लगी, मुझे यह क्यों बोला गया, इसके पीछे क्या कारण है। साधक होता है तो पूरी तरह जांच लेता है।
ऐसे जाने वाले लोग भटकते रहते हैं। देखो, पूरे खेत में फसल नहीं होती, मेड़ पर होती है, और मेड़ के लिए लाठियां-गोलियां चल जाती हैं — "तुमने मेरी मेड़ क्यों काटी"। जिस तरफ मेड़ कटी है, समझ लेना कटने वाला कहीं ना कहीं मजबूत और बेईमान है; और जिसकी तरफ घास है, वह या तो कमजोर है, या सभ्य, पढ़ा-लिखा, संस्कारी है इसलिए नहीं काट रहा — या अंदर से वह भी तैयारी कर रहा है। इतना बड़ा खेत है, पर लड़ाई मेड़ की है — यही ईगो की हालत है।
आप मतलबी को कुछ अलग समझ लिए। मतलबी का मतलब है — आपको जो चाहिए, जिसके लिए गए हो, उसके अलावा कोई बात मत करो; ऐसे मतलबी बनोगे तो लक्ष्य तक पहुंचोगे। स्वार्थी अलग होता है — किसी ने आपके लिए किया और समय आने पर योग्य होकर भी आप उसके लिए नहीं करते, वह स्वार्थी है; ऐसे स्वार्थी मत बनो — जिसने आपके लिए किया, जरूरत पड़ने पर योग्य हो तो बिना बोले उसकी सहायता करो। हां, इतने स्वार्थी बनो कि "स्व" का अर्थ ढूंढो। जब मैं संन्यास में था, एक गुरु भाई ने पोछा मारने को कहा कि यह सौभाग्य सबको नहीं मिलता; मैंने कहा तुरंत पकड़ो यह सौभाग्य, मैं पोछा मारने नहीं, ज्ञान की खोज में आया हूं — पोछा ही मारना होता तो घर पर मां-बाप का करता। जिसके लिए गए हो, वह मूल करो।
मैं तो एक बात कह चुका हूं — निर्विचार नहीं हुआ जा सकता, निर्विकार हुआ जा सकता है। जब कुछ करोगे और विचार ही नहीं रहेंगे तो करोगे कैसे? महात्माओं ने भी भूख का विचार आया तभी भोजन मांगा। बुद्ध ने शिष्य से कहा कि यह चौमासा वहां करूंगा और जमीन बताई — विचार आया तभी ना बताया। इसलिए बेमतलब निर्विचार होना मत चाहो, निर्विकार हो जाओ और उसके लिए काम करो। जब तक कुछ करना है, विचार आएगा; जब कुछ नहीं करना, तब बात खत्म।
उसके अंदर मद, लोभ और मोह नहीं रह जाते; काम और क्रोध रहते हैं, और वह उनका उपयोग करता है — क्योंकि इन्हें हटा दे तो इस शरीर से काम ही नहीं होगा। जैसे भगवान राम ने समुद्र से पहले प्रार्थना की, और जब समुद्र ने रास्ता नहीं दिया तो धनुष-बाण उठा लिया — क्रोध का उपयोग किया। आत्मज्ञानी अपने क्रोध का उपयोग समाज के हित के लिए करता है, अपने लिए नहीं; आप उसे झापड़ भी मार दो तो अपने लिए नहीं निकालेगा, जिसमें आपका हित होगा उसी में निकालेगा। उसका दूसरे का भाव छूट जाता है, अपना-पराया खत्म हो जाता है। उसे अपने क्रोध को जांचने या लिमिट रखने की जरूरत नहीं पड़ती; साधारण व्यक्ति आवेश में बहकर अपनी जरूरत के लिए क्रोध करता है, वह बिना जरूरत कुछ नहीं करता — धर्म की रक्षा के लिए, आपके हित के लिए, जरूरत पड़ने पर ही।
वहां ऐसा कोई मंच नहीं जहां जाकर सत्संग की, ज्ञान की बातें रख सकें। वहां है नाम, शोहरत, पैसा, और फिर पाप धोना। मुझे ना नाम चाहिए, ना शोहरत, ना पैसा, और ना पाप धोना है — मुझे अपना पाप भोगना है, जितना हमने किया है। इसलिए कुंभ जाने का मैंने कोई मतलब नहीं समझा। आपको लगता है कुछ ऐसी बात है तो आप जाकर आओ और अपना अनुभव बताओ।
मेरी कोई राय नहीं — आपको लग रहा है वहां खिले हुए ठीक हैं, उन्हें लग रहा है प्रभु के चरणों में ठीक हैं; सबकी अपनी-अपनी भक्ति है। फूल तो कभी ना कभी गिरेगा ही, वहां हमेशा खिला नहीं रहेगा, कोई ना कोई निमित्त बनेगा — तो क्या फर्क है? चाहे जैसे भी कोई कर रहा है, उसे करने दीजिए; वह उसकी स्थिति है, आप अपनी स्थिति से उसे क्यों रोकें। स्वामी विवेकानंद ने एक भक्ति में लगे व्यक्ति का भाव अपनी ऊर्जा से भक्ति से हटा दिया, तो रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें बहुत डांटा और वह विद्या भी ले ली। किसी की भावनाओं को समझो — मैंने जीवन में यही सीखा है। जाकर कहो "मां, जहां चढ़ाना है तोड़कर चढ़ाया कर" और फिर उनके चेहरे की खुशी देखना। यहां इतने लोग आते हैं, मैंने आज तक किसी को नहीं बोला कि किस मार्ग पर जाओ।
आत्मिक कल्याण के लिए साधना करो, पर यहां बाहरी आवाज नहीं कर सकते। अंदर से चाहे जितने मंत्र करो, जितना चिल्लाओ, जितनी क्रियाएं करनी हों करो। बाहर से बोलोगे तो आपने कोई मंत्र किया, उन्होंने कोई और — दोनों मंत्रों में टकराव होगा और राग-द्वेष हो जाएगा; पता नहीं तुम उसके देवता को पसंद करते हो या नहीं। द्वंद्व अंदर ही रहे; अंदर से करने से कई गुना ज्यादा लाभ होता है, मुख्य तो मानसिक ही है। यहां किताब पढ़ना भी मना है — यहां बस एक ही किताब पढ़ सकते हो, अपनी, स्वयं की; बहुत किताबें पढ़ लीं, अब अपनी किताब पढ़िए।
भैया, वहीं से लाइव देखो और जब चाहे तब उठो, जब चाहे तब सोओ — यहां आने की आवश्यकता नहीं। यहां आओगे तो यहां के सिस्टम में ही रहना पड़ेगा; हो सकता है रात को सत्संग हो तो सुबह तक बैठना पड़े, सुबह सोना पड़े, दिन में देर से उठना पड़े — क्योंकि एक व्यक्ति भी तो जाग रहा है, बैठा है। हां, कोई बुजुर्ग या रोगी हो तो हम खुद कहते हैं आप आराम करिए। और नियम का पालन वहां तक करिए जहां तक पूरी तरह बर्दाश्त कर सकें; उसके आगे अपनी बात रख सकते हैं।
नहीं, शब्द तो खत्म हो जाते हैं — शब्द तो किसी और के लिए, बाहर के लिए होते हैं। आत्म दर्शन का मतलब है वही रह जाता है, बस बात खत्म। इस भ्रम में मत रहना कि वहां किसी का दर्शन होता है — कि दर्शन करने वाला अलग और जिसका दर्शन हो रहा है वह अलग, कोई आत्मा दिखेगी, सब सफेद हो जाएगा। ऐसा कुछ नहीं है; दर्शन से मुक्त हो जाता है, कोई छवि नहीं रहती, स्वयं ही रहता है। जब होगा तो बस हंसी आएगी कि हम क्या-क्या समझे बैठे थे।
मेरा तो कहना है कि बस कुछ ना करने में आ जाओ। देखने वाला बनना — मतलब कोई सामने है तभी तो देख रहे हो; इसलिए देखने में नहीं, दिखने में आ जाओ। देखोगे तो एक प्रयास है, देखने में एक जोर है; दिखने में समर्पण है, कोई प्रयास नहीं — जैसा है वैसा दिख रहा है। देखने में कुछ बचा रह जाता है, दिखने में सब खत्म हो जाता है — दिखना आखिरी है। "दृष्टा ही दृश्य है" — यह भी पकड़ लिया तो फिर फंस गए; बस दिखने में आ जाओ, बात खत्म। तब खुद को ही पता चल जाएगा कि जिसे ढूंढ रहा था वह तो मैं ही हूं।
जीवन में अगर आपने ईमानदारी और सत्कर्म अपना लिए, तो आप कुछ भी करोगे वह साधना बन जाएगा — यही मैं बता रहा हूं। मूल मंत्र को पकड़ लो — ईमानदारी और सत्कर्म; फिर कुछ भी करोगे, साधना हो जाएगी। यह नहीं पकड़ोगे तो कुछ भी करो, उस ऊर्जा का क्या करोगे — खर्च तो करोगे, फिर कहां लगाओगे?
अगर आप हमेशा दृष्टा में रहना चाहते हो, तो बस योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग कर दो — बात ही खत्म। आपको लगता है फिर आपसे छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड हो पाएगा? बिल्कुल नहीं हो पाएगा, और आप पूरी तरह सचेत हो जाओगे। मैं मूल बता रहा हूं कि गड़बड़ी कहां से हो रही है — ईमानदारी, सत्कर्म, उम्मीद, सब छोड़ो, बस योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करो। मतलब — जितना जेब में पैसा है उतना दुकान से सामान लो; जितना वजन उठा सकते हो उतना उठाओ। ज्यादा चाहिए तो योग्य बनो, योग्यता के लिए मेहनत करो — ज्यादा पेमेंट चाहिए तो ओवरटाइम करो। अपनी योग्यता सबको पता है, जानवरों तक को — एक कुत्ता जानता है किस पर वार करना है, किससे भागना है; गिलहरी गौरैया को भगाती है, बड़ा पक्षी गिलहरी को। बस इसे याद रखना है — इतना करना पड़ेगा, पर कितना सरल है; यही साधना है, भटकाव और दुख की बात खत्म।
जब मुझे प्रत्यक्ष मिल गया कि बिना मेहनत के ये पार हो सकते हैं, तो इन्हें घंटों ध्यान में बिठाकर, यह करो-वह करो कराकर परेशान क्यों करूं, इनके घंटे क्यों बर्बाद करूं — उससे कुछ हल भी नहीं हो रहा। एटीएम से पैसे निकालने जितना सरल मार्ग मैंने खोजा है; एक आदमी तो इसमें खत्म हुआ ही है — कॉलेज से निकला था, बाल सफेद हो गए — आप क्यों खत्म हो रहे हो? उसके अनुभव का फायदा उठाओ, समझकर निकल लो। हां, सत्संग से भी आत्मज्ञान हो जाता है — अर्जुन को वहीं हुआ; उन्होंने एक भी विधि का प्रयोग नहीं किया, प्रश्न पूछते गए, उत्तर मिलते गए, समझते गए और विकार धीरे-धीरे खत्म हो गए। सत्संग भी साधना है। बिना ज्ञान के ना भक्ति कर सकते हो, ना ध्यान, ना योग-क्रियाएं — पहले भी ज्ञान चाहिए और आखिर में भी ज्ञान।
आपका कैसे कल्याण होगा, वह आपके ऊपर है। वैसे तो खाली होकर सुनो। कोई काम कर रहे हो तो उसके साथ भी सुन तो रहे हो — कुछ शब्द तो जा रहे हैं; वह रिकॉर्डिंग है, फिर रिपीट करके आराम से सुनो। ऐसे भी कर सकते हो।
भेद केवल इच्छा और अपेक्षा का है, और कोई भेद नहीं। इच्छा-अपेक्षा के कारण ही अलगाव है। आत्मा इच्छा-अपेक्षा में फंसकर जीव बन गई है, इसलिए उसे जीवात्मा कहते हैं। जैसे ही इच्छा-अपेक्षा हटेगी, जीव का नाश हो जाएगा — जैसे पानी से बर्फ बनी, बर्फ को फिर उसी जगह ले आओ तो बर्फ का नाश हो जाता है, पता नहीं चलता कहां से आई कहां गई। आत्मा या तो माया में रहेगी, जीवात्मा बनकर, या ब्रह्म में; दोनों जगह एक साथ नहीं रह सकती।
जैसे बर्फ अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश के माहौल की वजह से बनी हुई है, पर किसी भी बर्फ को तोड़ो तो पीछे पानी ही मिलता है — बर्फ और पानी को अलग नहीं किया जा सकता। वैसे ही जीव के पीछे आत्मा ही है; पानी ही बर्फ है, पर बर्फ पानी नहीं है। आत्मा ने जगह बदल दी — प्रभु की माया को छोड़कर अपनी माया, अपनी दुनिया खड़ी कर ली, उसमें ग्रसित हो गई और अब अपने ही अस्तित्व से परेशान है।
इच्छा मतलब जरूरत से ज्यादा चाहिए, योग्यता से ज्यादा चाहिए — इसी में तो फंसे हो। अपेक्षा मतलब हमने किसी के लिए किया तो वह भी मेरे लिए करेगा; वह उतना नहीं करता तो दुख हो जाता है। ब्रह्म के पास जाना है तो बस इच्छा और अपेक्षा से अपने आप को मुक्त करा लो।
नहीं। सीधी सी बात, यही साधना है — इच्छा और अपेक्षा से अपने आप को मुक्त कराओ। कुछ बनने की, कुछ पाने की इच्छा मत रखो, नहीं तो तुम अलग से एक आनंद पैदा कर दोगे और उसकी नकल में फंस जाओगे। मैं भी निर्णय नहीं करूंगा कि मूल क्या है, क्योंकि निर्णय कर दिया तो वैसा बन जाएगा, एक और नई दुनिया तैयार। आप कुछ तैयार मत करो, बस अपने आप को सुधारो; क्या होगा क्या नहीं होगा, वह छोड़ दो।
जरूरत सामने आती है — भूख लगती है तब भोजन की इच्छा होती है। पर स्वाद की इच्छा आप करते हो, पहले के अनुभव से प्लानिंग करते हो। आप भोजन में या जरूरत में नहीं फंसे हो, आप स्वाद में फंसे हो। बोलचाल का भी स्वाद है — दिन भर अपने तरीके से बात न हो तो घुटन होने लगती है, आपको रस भरी बातें और हां में हां मिलाने वाला चाहिए।
दिन में आपको एक चापलूस चाहिए जो आपकी बढ़ाई करे, तभी दिल में तसल्ली होती है और लगता है मैं कुछ हूं। इसलिए आप ताकतवर से भाग जाते हो, जो आपकी औकात दिखा दे। अपनी जिंदगी उठा के देखो — जिन्होंने विरोध किया, उनसे आप दूर हो गए, और जो कहते हैं "तुम बहुत अच्छे हो", वही आपके जीवन में हैं। खोज तो रहे हो "मैं कौन हूं", पर जब कोई बताता है कि आप यह हो, तो बर्दाश्त नहीं करते। यह निर्विकार होने में एकदम बाधक है।
आईना वही बताता है जो आप हो; वह आपको खूबसूरत नहीं बना देगा। आईने के माध्यम से आप अपने आप को संवार सकते हो — आईना सिर्फ निमित्त है, संवारोगे आप। उसका काम ही नहीं है आपको संवारना; उसके सामने जो जैसा आता है, वैसा दिखता है। संवार सको तो संवार लो, नहीं तो निकल लो।
बर्दाश्त इसलिए नहीं करते कि आपके अहम भाव को ठेस पहुंचती है, अपमान लगता है — जबकि उसका भाव अपमान करने का नहीं है। ऐसा लगता है कि यह बात अकेले में भी कही जा सकती थी, पर अकेले में तुम सुधरोगे नहीं; अकेले-अकेले में तो तुमने जिंदगी को नर्क बनाया है। बिगड़े समाज में हो, तो सुधारने के लिए समाज के बीच में ही डांटना पड़ेगा।
अकेले में ले जाकर समझाया तो आप कहोगे "देखो मुझे कितना मानते हैं", और उसके प्रति आपका आसक्ति-बंधन हो जाएगा। जो व्यक्ति आपका यूज करेगा, वह आपको एकांत में समझाएगा, फिर शोषण करेगा, भावनाओं से खेलेगा। सुधारने वाला जब भी तोड़ेगा, समाज में तोड़ेगा — आपको नहीं, आपकी गलतियों को जलील करेगा, ताकि आप ऊपर उठ जाओ। जिसे सच में आपसे कुछ नहीं चाहिए, वही समाज में डांट सकता है, जैसे अपना बाप ही उठाने के लिए झापड़ मार सकता है।
जो व्यक्ति जीवन में आपका हित चाहता है, वह कभी आपकी बड़ाई नहीं करेगा — बड़ाई वाला काम कर दो तो भी नहीं; वह हमेशा आपकी कमी बताएगा, आप थक जाओगे। और आपका शोषण करने वाला हमेशा बड़ाई करेगा, तभी तो वह आपको यूज कर पाएगा। यह बाद में पता चलता है।
एक बात जीवन में याद रखना — बिना मतलब के दो ही सहलाते हैं: एक माता-पिता, एक गुरु, और कोई नहीं। माता-पिता हाथ से सहलाते हैं, गुरु निगाहों से। बाकी जो भी आपको सहलाएगा, वह जरूर कहीं न कहीं से शोषण करेगा, तभी सहलाएगा। यह स्थिति की बात है — माता-पिता की स्थिति और गुरु की स्थिति। अगर कोई गुरु स्थिति पर है और आपको देखता है, तो मत समझना कि ऐसे ही देख रहा है।
संसार पहले शोषण करता है, फिर पोषण — और पोषण भी शोषण के लिए करता है। शोषण करवाना बंद कर दो, पोषण भी नहीं करेगा। इस भ्रम में मत रहना कि वह आपका पोषण कर रहा है; जैसे कसाई छोटे बकरे को इसलिए खिलाता है कि मोटा-तगड़ा हो जाए। कहीं भी काम करो, सिस्टम यही है — आपको जितना देंगे, उससे कई गुना कमाएंगे; आप भी कंपनी खोलोगे तो यही करोगे।
अपने सुख के लिए, बस और कुछ नहीं। जैसे दांत दांत के लिए नहीं, स्वाद लेने और अपनी पूर्ति के लिए चाहते हैं। आप यह मत सोचना कि आप किसी और का सुख चाहते हो — यहां कोई किसी का सुख नहीं चाहता। एक माता-पिता और एक गुरु ही अपने बच्चों का सुख चाहते हैं, दुनिया में और कोई ऐसा रिश्ता नहीं।
नहीं। आपको अकेले के लिए मिल रहा है, और एक व्यक्ति ने अनेकों के लिए पाया — बहुत फर्क है। साधक के दो भाव होते हैं: या तो अपना कल्याण, या जगत कल्याण। एक आदमी के भोजन के लिए कमाना हो और लाखों-करोड़ों के लिए कमाना हो, तो ज्यादा पीड़ा किसे झेलनी पड़ेगी? जो लाखों के लिए कमाए। शुरुआती भाव से ही वह पीड़ा आती है।
आप एक प्रतिशत भी नहीं भटक रहे हो। आप सुख में भटके हो, व्यवस्था में भटके हो — दुख में नहीं, जहां पैरों से खून गिर रहा हो और फिर भी रास्ता चलना हो। धोखा भी मिला तो कोई बात नहीं; आपको वैसा सामना नहीं करना पड़ा।
इतिहास उठाओ — जितने लोग समाज कल्याण के लिए निकले, उनके शरीर के साथ बहुत दुख हुआ। बात बड़े-छोटे लक्ष्य की नहीं है; समाज कल्याण का भाव अपने आप पैदा होता है, यह आंतरिक प्रबल भाव है, बनाया नहीं जा सकता। अंदर से अपना कल्याण चाह रहे हो और बाहर से जबरदस्ती कहो कि समाज कल्याण के लिए निकले — ऐसा नहीं होता। जिनके अंदर से समाज कल्याण का भाव निकलता है, उन्हें बहुत कष्ट का सामना करना पड़ता है; जिन्हें पहले अपना कल्याण करना है और बाद में हुआ तो समाज का भी करेंगे, उन्हें कम।
सेवा के नाम पर मेवा खाने वाले बहुत हैं, वह बात अलग है। सच में पूरी तरह समाज के लिए काम करने वालों की संख्या बहुत कम है। ज्यादा संख्या इसी की है कि "आप सेवा दीजिए, आपका कल्याण हो जाएगा" — यानी केवल यूज करने वाले।
कर्म प्रबल है। पर कर्म से परमात्मा को नहीं पाया जा सकता, नहीं तो कर्म बड़ा हो गया और परमात्मा छोटा। कर्म से आपने पकड़ा है तो कर्म से छोड़ा जा सकता है। इसलिए कितनी बार बोला है — "ना करने" में आ जाओ, "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओ, तो कर्म खत्म हो जाता है। कर्म द्वारा हमने अपने आप को विकारों से ग्रस्त किया, और कर्म द्वारा ही निर्विकार हो सकते हैं।
"कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओ तो कर्म खत्म हो जाता है। उसके बाद कुछ दिन अवधूत की स्थिति रहेगी, फिर प्रेम पैदा होगा, फिर आत्मज्ञान होगा, फिर परमात्मा की यात्रा होगी। कर्म तो आत्मज्ञान के बहुत पहले, अवधूत स्थिति के पहले ही खत्म हो जाता है।
न राग, न द्वेष; न पाप, न पुण्य; न अच्छा, न बुरा; न छल, न कपट, न चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — कुछ भी नहीं। न पाना, न खोना; न देना, न लेना; न खोज। वहां शून्य भी नहीं रहता। समाधि भी वही अवस्था है — समा-अवस्था; नाम अलग हैं।
अभी तो मिला नहीं है; जब मिल जाता तब ऐसा कहना उचित होता। अभी तो कल्पना में जीना है कि क्या मिलेगा, क्या भोगना पड़ेगा। यहां समझने के लिए कम से कम छह महीने तो रहना पड़ेगा; पर कोई छह दिन में भी आगे निकल सकता है — वह उसकी योग्यता पर है। जब वह आ जाएगा, तब तो कहोगे ही नहीं कि मिल गया।
हो सकता है। बहुत लोग गुरु की शरण में रहकर उपलब्ध हो गए; संख्या बहुत कम है, तो उस कम में तुम क्यों नहीं हो सकते? अंतिम अवस्था में कुछ दिन निराधार विचरण करना भी पड़ता है, पर ज्यादा दिन नहीं।
वे भटके नहीं थे, अपना काम करने गए थे — 14 वर्ष में कितने राक्षसों का वध किया, वह नहीं दिखा? कष्ट उन्होंने खुद स्वीकार किया था, उन्हें लेने भी लोग गए थे। कष्ट तुम्हें लग रहा है, उन्हें थोड़ी था। उन्होंने कभी अपने मुंह से कहा कि कष्ट है? आप क्यों जोड़ रहे हो?
मुझे तो वहां (लग्जरी में) रहना कष्टमय लगता है और यहां बड़ा आनंद लगता है। बंबई से एक साधक आए थे जो एक लाख के गद्दे पर सोते थे; जाते समय आंखों में आंसू लेकर बोले कि एक लाख के गद्दे पर इतनी सुकून से नहीं सोया जितना दो फुट की चटाई पर। कष्ट देखने वाले को लगता है, जो अंदर रहता है उसे नहीं।
जब कहीं भी आपका ध्यान लगे, तो देखिए क्यों लग रहा है — उसमें राग-द्वेष उठ रहा है कि नहीं; बस इसे देखते जाइए, यही ध्यान में ध्यान है। और जब अच्छाई-बुराई कुछ न मिले, तो केंद्रित करने की जरूरत ही क्या है? ध्यान से भी मुक्त हो लो।
इच्छा और अपेक्षा से मुक्त करा लें। दूर से फल की दुकान देखो तो बस फल की दुकान दिखती है, कोई मतलब नहीं। पर जब लेने गए, तब छंटनी शुरू — यह कच्चा है, यह पका है, यह सड़ा है, छोटा-बड़ा, रेट कम करो। जब तक नहीं चाहिए था तब तक बस फल की दुकान थी; जैसे ही "मुझे चाहिए" आया, वहीं से भेद की शुरुआत होती है। संसार भी ऐसे ही दिखता है।
ईमानदारी की आवक हो, उससे भोजन की व्यवस्था और अपने बच्चों का पालन-पोषण करें। भूखे को भोजन, प्यासे को पानी। आंतरिक ईमानदारी और मेहनत रखें — मेरे कर्म से किसी को तकलीफ न हो, हो तो उसका जिम्मेदार मैं हूं। मान की इच्छा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा, दिखावा और बड़ा-छोटा बनने की इच्छा का त्याग करें।
जिसका मंत्र कर रहे हैं, वे बताएंगे। अगर आप ईमानदारी और सत्कर्म से यह सब कर रहे हैं और आपको कुछ नहीं चाहिए, आत्मिक कल्याण के लिए कर रहे हैं, तब सही मार्ग पर हैं; कोई कामना लेकर कर रहे हैं, तब गलत मार्ग पर — सीधी सी बात।
खरीदोगे तो मूल्य दोगे, और मूल्य दे रहे हो तो अच्छा-बुरा देखना ही पड़ेगा। आप फल में नहीं फंसे हो, आप वहां फंसे हो जहां से माल (पैसा) ला रहे हो। महापुरुषों ने भी 56 प्रकार का भोजन किया। खाने-पीने में नहीं फंसे — पैसे में फंसे हो कि जो पैसा आया है वह ईमानदारी का है या बेईमानी का। माल नहीं होता तो भूख लगने पर कोई जो दे देता, लेकर निकल लेते, इच्छा भी नहीं रखते।
अभी पीछे का जा रहा है और आगे का बंधन नहीं बन रहा; रोज सत्संग सुन रहे हो, समझ बढ़ रही है। ईमानदार तो आप यहां रह ही सकते हो। पर अगर पीछे जाकर चोरी से मोबाइल पर बात करते हो, तो आप बहुत ज्यादा गिर रहे हो। यहां बंजर नहीं, उपजाऊ जमीन है — जो बीज डालोगे तेजी से बढ़ेगा; पर एक-एक बार गलती करके नीचे उतर जाओगे तो सामने वाला कितनी बार ऊपर चढ़ाएगा?
योग्य गुरु हर वक्त एक ही बात कहेगा — आपकी सफाई, यानी आपके अंदर क्या विकार हैं वह बताएगा, घुमा-फिरा के "अपने आप को सुधारो"। जो बने हुए गुरु हैं, वे आपके पास जो है (धन) उसकी सफाई की बात करेंगे और उसका बढ़ावा देंगे। बस इतना फर्क है, यही पहचानने का तरीका है।
योग्य गुरु के सामने सब एक जैसे रहेंगे, बैकग्राउंड काम नहीं करता। अयोग्य गुरु के यहां गरीब बाहर झाड़ू मारेगा, भीड़ में भोजन करेगा, और अमीर कमरे में साथ बैठकर भोजन करेगा। योग्य गुरु के यहां कोई करीब या दूर नहीं — जो निर्विकार होने के लिए काम कर रहे हैं वे करीब हैं, जो नहीं कर रहे वे दूर। जरा सा जताने का प्रयास किया, आप गए। सच्चे गुरु के सामने आपकी सोसाइटी नहीं, खोज काम करेगी।
जहां गए हो वहां के पूरे सिस्टम का, नियम का पालन करो, उसे समझो और स्वीकार करके रहो, तभी लाभ होगा। पहली बात, आपस में बात ही नहीं करनी चाहिए। "भाव ऐसा नहीं था" कहकर किसी को जगह से हटाना भी गलत है — आप कौन होते हो हटाने वाले? गलती हो तो तुरंत मान लो।