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प्रश्नोत्तर — भाग 21

योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 134 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

आपका भाव क्या है — क्या आत्मज्ञान के लिए कोई विधि या कठिन मेहनत करनी पड़ेगी?

यह अनुभव का विषय है — आप चाहो तो एकदम आसान है, आप न चाहो, कोई और चाहे, तो बहुत जटिल है। मेरा तो बस भाव इतना है कि आप लोग अपने स्व की स्थिति में पहुंचें, मैं इसी के लिए काम कर रहा हूं, क्योंकि मुझे इतना समझ में आया कि आत्मज्ञान का अधिकारी हर व्यक्ति है, और बहुत आसानी से पहुंचा जा सकता है — बस समझदारी से लगने की जरूरत है। कुछ करना नहीं है, कोई विधि वगैरह नहीं; बस समझ के जीना ही साधना है — समझ के जीवन जीने में आप अपने आप तक पहुंच जाओगे।

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जब हम सो जाते हैं तो कोई इच्छा-अपेक्षा नहीं बचती — तब तो हम स्व में ही होते हैं?

वह प्रकृति की एक व्यवस्था है, शरीर को आराम देना; हम तो जागने की बात करते हैं, सोने के बाद की बात हम भी नहीं करते। और सोने की इच्छा? कभी-कभी नींद आती है, आप घंटों रोक लेते हो — नींद शरीर की जरूरत है, इच्छा नहीं। इच्छा तब बोलेंगे जब शरीर नहीं चाहे फिर भी सोते ही रहे — जरूरत से ज्यादा सोओगे तो वही तकलीफ देने लगेगा, राग-द्वेष होगा। बस जरूरत में जीना चालू कर दो और योग्यता से ज्यादा पाने का त्याग करो — आगे बंधन बंधेगा ही नहीं, बात तुरंत खत्म।

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अब समझ आया कि इच्छा-अपेक्षा हम पैदा करते हैं, वही बंधन और वही अज्ञान है — क्या यह अज्ञान हम समझ के धारण करते हैं?

हां, बस वही बंधन है, वही अज्ञान है, और यह हम समझ के धारण करते हैं। अज्ञानता धारण करने के लिए भी ज्ञान चाहिए — ज्ञान से ही अज्ञानता धारण कर पाओगे, नहीं तो नहीं कर पाओगे।

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जमीन के अंदर लोहे को जंग नहीं लगता, जमीन से अलग करते ही हवा लगती है और जंग लग जाता है — तो स्व भी कहीं से तो अलग हुआ होगा, तभी इच्छा-अपेक्षा हुई?

हां, एकदम — तभी उसको इच्छा-अपेक्षा हुई; अगर वह वहां से अलग नहीं होता तो इच्छा-अपेक्षा नहीं होती। अभी तो यात्रा हो रही है अपने आप को छुड़ाने के लिए; फिर जब वह स्व में आ जाएगा, तब जहां से वह है, वहां के लिए उसकी यात्रा होगी।

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इच्छा-अपेक्षा को समझकर छोड़ देना बहुत भगीरथ काम है — पर अगर स्व को जान लिया तो इच्छा-अपेक्षा वहां आ ही नहीं सकती, तो पहले स्व को क्यों न जानें?

बिना उम्मीद छूटे स्व को जाना ही नहीं जा सकता, यह क्यों नहीं समझ रहे हो? बिना मिटे बर्फ पानी नहीं हो सकता — बर्फ और पानी एक ही चीज है, तो उसका तार काट दो, कहीं से उसका कनेक्शन काट दो। उम्मीद छोड़नी पड़ेगी, और कोई रास्ता नहीं। स्व में सेटिंग मत करो।

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हम सब माया के इस संसार के भीतर बैठे हैं, और बाहर निकलने का रास्ता भी माया के भीतर बैठकर बताया जा रहा है?

एकदम — क्योंकि माया को तोड़ने के लिए माया का ही प्रयोग करना पड़ेगा। अगर हम पानी में डूब रहे हैं तो निकलने के लिए पानी में ही तैरना पड़ेगा, उसी पानी का सहारा लेना पड़ेगा, उसी पानी में हाथ-पांव चलाने पड़ेंगे।

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इच्छा-अपेक्षा जड़ है और स्व चेतन है — तो क्यों न सीधे चैतन्य को जानने का प्रयत्न किया जाए?

इच्छा और अपेक्षा मानसिक है; उसे जड़ भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह अपने आप नहीं आ सकती — हमने पैदा की है, चैतन्य ने चेतन शरीर के द्वारा जड़ वस्तुओं के लिए पैदा की है। पांच इंद्रियों द्वारा जो हमने संचित किया है, वह भी अंदर-बाहर हमें घुमा रही है; वर्तमान में डालना बंद कर दो, तो भी पिछला जितना जमा किया है, वह परेशान करता है। घुमा-फिराकर एक ही रास्ता है — इच्छा और अपेक्षा से अपने को मुक्त करा लेना; सीधी भाषा में, उम्मीद से अपने आप को छुड़ा लेना, बस बात खत्म।

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इच्छा-अपेक्षा से अलग होकर स्व में आ गए, पर वही स्व वापस इच्छा-अपेक्षा खड़ी करेगा?

नहीं, स्व अपनी यात्रा करेगा — अब वह समझ गया है, अपने आप को उसने खुद छुड़ाया है, भोग लिया है; अब क्यों फंसेगा? अब तो जहां से आया है, उसके लिए अपनी यात्रा करेगा। और वहां जाएगा कब? जब स्व में स्थिर होगा — और स्व में स्थिर होने के लिए इच्छा-अपेक्षा से मुक्त होना पड़ेगा, कोई और रास्ता नहीं।

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अहम वृत्ति से स्व खुद को कर्ता मानता है, उसी से इच्छा-अपेक्षा जुड़ी है — स्व कर्ता कब मानता है?

स्व कर्ता नहीं है। अपने आप को कर्ता कब मानता है? जब उसे मान की इच्छा होती है — अकेले में कर्ता अपने आप को नहीं मान सकता।

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प्रभु ने तो सबके लिए कुछ सोचा होगा कि इच्छा-अपेक्षा में फंसे मेरे बच्चे वापस मेरे पास कब आएंगे?

अगर प्रभु के बस में होता तो सबको छुड़ा लेता — उसने तो छुड़ाकर ही रखे थे; जब हम उससे अलग हुए, तभी तो बंधन में आए। अब छुड़ाना प्रभु के बस में नहीं, मेरे बस में है — यहां प्रभु कुछ नहीं कर सकता; कर सकता तो हमें परेशान कैसे रखता? प्रभु की तरफ से न मुक्ति है न बंधन — मेरी तरफ से बंधन है और मेरी तरफ से ही मुक्ति मिलेगी। सीधी-सी बात है, इसे समझो।

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स्व के कर्ता को जाने बिना इच्छा-अपेक्षा का अंत नहीं आ सकता — जैसे गेहूं पर छिलका रहे तो वह उगता रहता है, छिलका हटा दो तो नहीं उगता; तो क्या स्व को जाने बिना इच्छा-अपेक्षा उगती नहीं रहेगी?

बिना इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हुए स्व में आ ही नहीं सकता, क्योंकि अब वह इच्छा-अपेक्षा में जा चुका है, जीवात्मा हो गया है — वह बदल गया है, और जब तक बदलाव खत्म नहीं होगा, स्व में नहीं आ पाएगा। बदलाव कब खत्म होगा? जब इच्छा-अपेक्षा छोड़ेगा। इच्छा-अपेक्षा का आवरण चढ़ा हुआ है, तभी वह जीवात्मा हो गया है; जब इसे छोड़ेगा तभी जीव का नाश होगा और तभी वह आत्म तत्व में स्थिर होगा, नहीं तो नहीं हो सकता। तो वह छिलका जिस तरीके से हमने बताया, उस तरीके से निकाल लेना।

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आत्म तत्व में स्थिर हुए बहुत-से साधु-संत भी वापस इच्छा-अपेक्षा में आ गए, इसका प्रमाण वेद में है — फिर?

हम यहां आपसे बात कर रहे हैं, वेद से नहीं। जितने लोग वापस आए, वे आत्मज्ञान की तरफ नहीं बढ़े थे, सिद्धियों की तरफ बढ़े थे — आठ सिद्धियों के अंदर काम कर रहे थे; उनको तो स्व मालूम ही नहीं था। वे इच्छा-अपेक्षा में ही ऊपर गए थे, तो इच्छा-अपेक्षा में नीचे आ गए, इसमें क्या बड़ी बात है? स्व के कर्ता पद से उन्होंने सिद्धि प्राप्त की, स्व को नहीं जाना, इसलिए वापस आना ही पड़ा। स्व को तभी जाना जा सकता है जब इच्छा-अपेक्षा से मुक्त होगे; इच्छा-अपेक्षा में रहकर जानने का प्रयास करोगे तो फिर वहीं आओगे जहां ये लोग आए।

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जब तक मूल को नहीं जानेंगे, इच्छा-अपेक्षा का अंत नहीं हो सकता — तो मूल को जानने का रास्ता क्या है?

मूल को कैसे जानोगे? जब इच्छा-अपेक्षा से मुक्त होगे, नहीं तो जान ही नहीं पाओगे। आपके पास मूल को जानने का कोई और दूसरा रास्ता है तो हमें भी बताइए, हम भी सुनना चाहते हैं। इस रास्ते के अलावा कोई रास्ता नहीं — यह रास्ता पहला और आखिरी है।

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परमात्मा से आत्मा के अलग होने से लेकर वापस जाने तक की पूरी यात्रा क्या है?

ध्यान से समझो — परमात्मा से आत्मा अलग हुई और इस पिंड में आई; पिंड में आई तो ज्ञान में ही होगी, लेकिन कुछ इच्छा रखकर आई — उसकी बनाई हुई दुनिया को देखने की; पिंड में आने की उसे जरूरत नहीं थी, धारण किया तो जरूर कुछ देखना था। पहले वह जरूरत में जी, बाद में इच्छा-अपेक्षा में जीवात्मा हो गई — जैसे पानी से बर्फ हो गया। अब इच्छा-अपेक्षा से मुक्त कराए तो वह स्व में, आत्म में आएगी, और फिर आत्मा परमात्मा की यात्रा करेगी; जीव परमात्मा की यात्रा नहीं कर सकता, इतनी क्षमता उसमें नहीं है। बनाने वाले का ज्ञान तब होगा जब स्व इच्छा-अपेक्षा छोड़कर आत्म तत्व में स्थिर होगा — तब शुरुआत होगी। ऐसे आया है, ऐसे ही छुड़ाकर वापस जाना है — यही यात्रा है, और कोई रास्ता नहीं।

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अगर पहली बार स्व ही फंसा, तो फंसा कौन — और अज्ञान आया कैसे, अज्ञान है क्या?

अगर स्व फंसेगा तो उसको कोई मुक्त नहीं करवा सकता। अपने आप से कोई कैसे अलग होगा? अज्ञान कैसे आया — जिसने उसको बनाया, उससे अलग हुआ, इसीलिए; बनाने वाला ज्ञान है, हम उससे अलग हुए तो अज्ञान हुआ। अज्ञान क्या है? स्व को नहीं जानना, खुद को नहीं जानना — वह अज्ञान है। और सब चीज को जैसा है वैसा, सही जगह समझ लेना — वह ज्ञान है। बात खत्म हो गई; तो इच्छा-अपेक्षा से मुक्त होने के लिए काम करो।

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स्व को जानने की कोई विधि है?

एक विधि बहुत तेज है — जहां बैठ गए, उठो ही मत, बस बात खत्म; सबको जानने के बाद ही उठना। यह फाइनल विधि है आपके लिए, मेरी तरफ से — एकदम फास्ट; इसमें कुछ छोड़ना-बढ़ाना नहीं है, न इच्छा, न अपेक्षा, न कुछ। वैसे यह विधि भी नहीं है, विधि से भी परे है, क्योंकि मैं विधियां तो देता ही नहीं। सीधी बात है — जहां आप फंसे, वहां से आप निकलो, तभी निकल सकते हो। बैठोगे तो जान जाओगे कि अब बचेगा क्या — जानते-जानते जब जानने के लिए कुछ नहीं बचेगा, तो जानने वाला ही बचेगा, वही स्व है। इससे सरल क्या लोगे? कुछ करना ही नहीं है।

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किसी जगह स्थिर होकर बैठ जाने से स्व मिल जाएगा — यह कैसे हो सकता है? और श्वास जैसी चीजें तो हम न करें तो भी चलती रहती हैं?

बैठना क्या स्थिर हो गया? बात खत्म करो — "ना करने" में आ जाओ, क्योंकि करने से तो मिलेगा नहीं; ना करने में हो गए तो जो शेष बचेगा, वही है — करना ही भटकाव है। जब कुछ करके स्व को जाना ही नहीं जा सकता, तो कुछ करने की क्या जरूरत? और जो अपने आप चल रहा है, उसे चलने दो ना, आपको क्या करना है? बस आप कर्ता में मत आओ; चल रहा है, चलने दो। गाड़ी रहे या न रहे, मैं तो रहूंगा।

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गुड़ चखने पर पता चलता है कि मीठा है, नमक चखने पर खारा — तो स्व की अनुभूति के लिए भी कुछ तो करना होगा?

तो करिए। लेकिन गुड़ हमसे अलग है — उसे चखा तो अनुभूति से नाम दिया "मीठा"; वहां जो चख रहा है और जिसे चखा जा रहा है, दो हैं। और यहां तो एक ही है।

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स्व की विशेषता चैतन्य, गति और जान है — क्या चैतन्य स्व से अलग है, और जैसे उंगली कट जाए तो कुछ देर बाद अचेत हो जाती है, क्या स्व भी ऐसे अलग होता है?

स्व खुद ही चैतन्य है, तो फिर दोनों अलग-अलग कहां हैं? चैतन्य स्व की स्थिति है, वह अलग है ही नहीं — जहां भी स्व है, अभी भी चैतन्य है। उंगली काटी तो वह शरीर है, स्व नहीं; पूरा शरीर प्रकृति से है — स्व को काटा ही नहीं जा सकता। और आपके पीछे जो वृक्ष है, उसे पता है — विज्ञान ने इसे सिद्ध कर दिया है कि उसे डंडा दिखाओ तो वह डरता है; हमें नहीं पता कि उसे पता है कि नहीं। जिसकी भाषा आप नहीं समझते, उससे आप भी बात नहीं कर सकते।

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स्व को जाने बिना मोक्ष पद नहीं मिलता — यही मेरा अनुरोध था?

हां, एकदम सही है, यह तो है ही। और मोक्ष तभी होगा जब आपका लेनदेन पूरा होगा — लेनदेन पूरा हुए बिना मोक्ष नहीं होगा; जिसके साथ किया, उसके साथ। आप सपने में मिली जेल का उदाहरण दे रहे हो — आप सपने से जागे कि नहीं? तो सपने से जाग जाओ, स्व में बस जाओ — आज यहां से उठना तभी, जब स्व में हो जाओ।

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मैं उठूंगा तो भी स्व में ही हूं — क्या उठने में कर्ता भाव आ जाएगा?

उठना तो सहज है — जानने के बाद मैं उठ रहा हूं तो सहज है, और उठकर जहां जाना है वहां जा रहा हूं, वह भी सहज है। लेकिन उठने के बाद उसी जगह पर जाऊं जहां नहीं जाना था, तो वह कर्म है। तो उठने के बाद कहां जाओगे, देख लेना। आपको सबसे तेज रास्ता बता दिया — बस कुछ न करने में हो जाओ, बात खत्म।

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जब तक स्व नहीं मिलता, जरूरत में किया कर्म भी कर्म ही है, और स्व में गति है तो जहां दृष्टि डालेगा वहां कर्ता पद आ जाएगा — क्या कर्ता भाव बंद हो सकता है?

तो स्व को पहले पा लो, फिर कर्म करो। जब तक स्व में नहीं आया, तब तक कर्ता भाव बंद नहीं हो सकता; स्व को खोज लिया तो उसके बाद कुछ नहीं आने वाला, बाद में तो आनंद ही आनंद है। तो बस उसी को खोज लो — जब यह पक्का हो गया, तो अब समय क्यों बर्बाद करना? कुछ न करने में आ जाओ, बात खत्म।

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क्या सबका स्व एक ही है — जैसे "अहं ब्रह्मास्मि" में सबका एक बोलते हैं?

सबका स्व एक ही जैसा है — एक नहीं, एक ही जैसा। अहम का नाश करो तो ब्रह्म है। ध्यान रखना, अगर एक होता तो एक को जानने से सब जान लेते — एक अपने आप को जानता तो पूरा विश्व अपने आप को जान लेता।

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स्व को जाने बिना यह दुनिया नहीं छोड़नी चाहिए — पर क्या स्व को जानने के लिए संसार या कोई कार्य छोड़ना जरूरी है?

तो अब कितना इंतजार करोगे? अब तक समय बर्बाद किया, आगे मत करो — बस इसी को जानने के लिए काम करो, वही काम करो जिससे यह जाना जाए; अगर यह जीवन में पक्का हो गया है, तो इसके अलावा कोई काम न करो। कार्य छोड़े बिना करना है, तो करिए ना। अपने को तो निकलना है, बस इतना पता है; जिसको रहना है, वह रहे।

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स्व आया कैसे — स्व को बनाने वाले की बात?

वह आया तभी तो फंसा है। वह तो स्व बताएगा — वह कोई नहीं बता सकता।

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गुरु जी, इस सुनसान पहाड़ी के प्राचीन मंदिर पर आप कब से आ रहे हैं, यहां की क्या विशेषता है?

जब मैं यहां आया तो साथ के लोग नारियल लिए थे; बकरी-गाय चराने वाले बच्चे आ गए, मेरा भाव बच्चों को खिलाने का रहता है, पर नारियल सड़ा निकला। मैंने बच्चों से पूछा — भोजन बचा है, मुझे कराओगे? वे बोले साधु लोग हमारे यहां भोजन नहीं करते — वही जात की बात आ गई। मैंने उनकी टिफिन मांगी, बचा हुआ भोजन मां को भोग लगाया, खुद खाया और सबको बांट दिया, और सब बच्चे मिलकर मुझे गले लगाए। झूठा तो लोगों के लिए है — शबरी ने बेर चखे, वह सोचती थी प्रभु के मुख में कोई खट्टा बेर न जाए, वह प्रेम था। नर्मदा भ्रमण में 2019 के आखिर में भविंदा गांव रुका था और जनवरी 2020 में यहां पहुंचा था। बड़ा दिव्य स्थान है; मैं जब भी इधर आता हूं, यहां कुछ देर बैठता हूं, सो जाता हूं, मुझे अच्छा लगता है।

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ऐसी सुनसान जगह में अकेले बैठना या कोई एकांत मंदिर ढूंढ लेना — खुद को जानने में यह कितना सहायक है?

जीवन में सत्संग है, किसी जीवंत गुरु का सानिध्य है, तब एकांत का कुछ मतलब होगा। मैं तो भ्रमण में यहां आया, रुका, चला गया। मान लो आप टिक भी गए, तो संसाधन की व्यवस्था कैसे करोगे? व्यवस्था करने में राग-द्वेष हो जाएगा, और व्यवस्था साथ ले आओगे तो उसमें अहंकार रहेगा — वह अशुद्ध है, उससे कुछ होगा ही नहीं। साधना कभी भी "तेरा" में होती है, "मेरा" में नहीं — तेरा मतलब परमात्मा की दुनिया; अपनी दुनिया से निकलोगे तब तेरा की दुनिया समझ में आएगी। अपनी व्यवस्था करके साधना करोगे तो अहम भाव बढ़ेगा, क्योंकि आपकी व्यवस्था दूषित है — अगर उसमें शुद्धता होती तो उसे छोड़कर भागते क्यों? शुद्ध जगह ढूंढ रहे हो, इसका मतलब जहां हो वह अशुद्ध है; अशुद्ध व्यवस्था जहां भी ले जाओगे, अशुद्ध ही रहेगी। इसीलिए कहा गया है — कोई खोजी है, जिज्ञासु है तो जीवंत गुरु ढूंढे और उसके सानिध्य में रहे; मैं भी तो जीवंत गुरु ही ढूंढ रहा था।

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कोई सोचे कि मुझे गुरु नहीं बनाना, मैं भी आपकी तरह 12 साल अपनी व्यवस्था (सेविंग) करके भ्रमण करूंगा और खुद ठहर जाऊंगा — उसकी तुलना में गुरु के सानिध्य में रहने वाले साधक का क्या?

मैं तो गुरु की खोज कर रहा था — 2011 से आखिरी 2019 तक हमने गुरु की ही खोज की, कि कोई मुझे बता दे। ऐसे तीन लोग मुझे मिले जिन्होंने मार्ग बताया; एक ने तो बस इतना बोला कि भैया जल्दी मत करो — मुझे उतने की ही जरूरत थी। कच्चे फल पर कई पत्थर मारो तो वह फट जाता है पर गिरता नहीं, और पका फल बस एक हवा के झोंके से हिलकर गिर जाता है — मैं उनकी बात कुछ ही शब्दों में समझ जाता था। मुझे न किसी पर संशय था, न अपने आप पर; पता था एक दिन अपने लक्ष्य पर पहुंच जाऊंगा। जो अपनी व्यवस्था करके निकलेगा, वह तो राग-द्वेष में फंस जाएगा — रास्ते में बिना मतलब के लड़ाई-झगड़े हो जाते हैं, पता भी नहीं चलता राग-द्वेष कैसे पैदा हुआ। गुरु के सानिध्य में रहोगे तो गुरु होने नहीं देगा।

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गुरु कैसे खोजें — गृहस्थ के लिए तो घर छोड़कर "गुरु कहां है" पूछते घूमना संभव नहीं?

गुरु मिल जाए तो रुक जाओ; जब तक न मिले, खोजते रहो। कोई सामान या पता कैसे खोजते हो? पूछते हो ना — एक दुकान पर नहीं मिलता तो उसी दुकानदार से पूछते हो कहां मिलेगा। ढूंढना तो पड़ेगा, सीधी-सी बात है; कम से कम 12 महीने में एक महीने के लिए तो गुरु ढूंढने भ्रमण पर निकलो, और गुरु मिल जाए तो उसके सानिध्य में एक महीना बिताओ। बातों से बात नहीं बनेगी।

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तो क्या बाहर निकलना ही पड़ेगा — बिना एकांत के बात नहीं बनेगी?

निकलना ही पड़ेगा — चाहे गुरु ढूंढने, चाहे गुरु के सानिध्य में, चाहे एकांत में कहीं रहने। एकांत में ही आत्मिक चिंतन होगा, भीड़ में थोड़ी होगा। विद्यार्थी भी एकांत कमरे में जाकर पढ़ता है; जहां सब बातचीत कर रहे हों, वहां पढ़ पाएगा? जब कुछ सीखना है तो सब माहौल छोड़कर एकांत में जाना ही पड़ेगा — एकांत जीवन में बहुत जरूरी है।

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शबरी जंगल में रहकर इंतजार करती थी — क्या कोई अपने ही घर, किसी खाली फ्लैट में एकांत करके यह सब नहीं कर सकता, जैसे घरवाले कहते हैं "यहीं व्यवस्था कर देते हैं"?

"मेरा" में नहीं होगा। शबरी ने इंतजार किया तो गुरु का आदेश था कि तुम्हें इंतजार करना है, राम आकर दर्शन देंगे — गुरु के आदेश से वहां रुकी थी, सारी जिम्मेदारी गुरु की थी। तेरा में तो निकलना पड़ेगा; यह "मेरा" आपके अहंकार को पोषित करता है, यह कवर तोड़ना ही पड़ेगा। जहां आपका मेरा है, वहां मान-प्रतिष्ठा-दबदबा है, कोई ऊंची आवाज में बात भी नहीं करेगा; जब आवरण हटाकर सामान्य नागरिक बनकर बाहर निकलोगे तो कोई भी बोल देगा, डांट देगा, धक्का मारेगा, दुत्कारेगा। तो अपने एरिया से बाहर निकलो, अपना बैकग्राउंड छोड़कर सामान्य व्यक्ति बनकर निकलो — मैंने फटे कपड़े ऐसे ही थोड़ी पहने थे। जब आवरण छोड़कर आप कमजोर हो जाओगे, तब लोग असली तरीके से, खुलकर बात करेंगे; आवरण का प्रभाव रहेगा तो जैसा आवरण, वैसी बात, और अहंकार पोषित होगा। प्रभाव वाला आवरण छोड़ दो, ऐसा आवरण धारण करो जिससे लोग प्रभावित न हों।

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आप कहते हैं ज्ञान आत्मा के अंदर ही है, जैसे जमीन के अंदर पानी — तो वह ज्ञान अपने आप कैसे प्रकट होता है?

पानी अंदर तो है लेकिन अपने आप प्रकट नहीं होता, उसे खोदना पड़ता है। वैसे ही आपके अंदर ज्ञान है, लेकिन आप कहीं और चले गए हो — वहां से हटकर अपने आप में आना पड़ेगा, ज्ञान के स्रोत पर पहुंचना पड़ेगा। आपने उसे इच्छा और अपेक्षा में बंद कर दिया है, इच्छा-अपेक्षा में राग-द्वेष का बंधन मान लिया।

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राग-द्वेष हुआ क्यों?

इच्छा-अपेक्षा में — आपको अपने तरीके से चाहिए हुआ। आपने सामने वाले से अपने तरीके से उम्मीद बनाई और उसने अलग तरीके से व्यवहार किया, तो राग-द्वेष पैदा हो गया: मेरे तरीके से कर दिया तो राग, मेरे विपरीत कर दिया तो द्वेष। वह हो गया बंधन, और आप अपने मूल से एकदम हट गए।

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शुरू में, एकदम शुरुआत में, मूल से कैसे हटे?

पहले जरूरत में गए — शरीर की जरूरत के लिए गए और आ गए। यह बचपन की बात है: लोगों से आपको उतना ही मतलब था जितनी आपकी जरूरत थी, उससे ज्यादा नहीं।

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आप कहते हैं इस दुनिया में दोबारा नहीं आना — पर इस दुनिया में आने के लिए शरीर क्यों लेना पड़ता है?

इस दुनिया में आने के लिए इच्छा और अपेक्षा है, तभी आओगे। शरीर तभी मिलेगा जब आपकी इच्छा और अपेक्षा हो — लेनदेन हो।

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जब मैं अपने मूल आनंद में था, तो मुझे ऐसी क्या इच्छा हो गई कि इस बंधन में फंस गया?

लोगों को पता है नशा करना गलत है, फिर भी फंस जाते हैं ना। आनंद में लगा होगा कि हम तो आनंद में हैं ही, जरा देख के आते हैं यह क्या है, कुछ तो हमसे अलग है, इसका भी स्वाद ले लेते हैं — ऐसे हम भटके होंगे; जब उस स्थिति में जाओगे तो पता चल जाएगा। उस स्वाद में हम नशेड़ी हो जाते हैं, बाद में पता चलता है कि इससे तो मेरा पतन हो रहा है, तब छुड़ाने का प्रयास करते हैं, लेकिन आदी हो गए हैं। अभी तक जितना जिए, स्वाद में ही तो जी रहे हो — और स्वाद सबका अपना-अपना है: वही चीज किसी के लिए अच्छी, किसी के लिए बुरी; स्वाद लोगों ने अपने-अपने जैसा बना लिया है, हम स्वाद में फंसे हैं।

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किसके स्वाद में फंसे हैं — क्या जीभ के स्वाद में? स्वाद लेने वाला कौन है?

जीभ तो निमित्त है, स्वाद हम लेते हैं — यह बड़ी कठिन लाइन है। अलग-अलग स्वाद की हमें आदत पड़ गई है; इंद्रियों के द्वारा स्वाद मैं लेता हूं, इंद्रियां स्वाद थोड़ी लेती हैं, इंद्रियों को तो पोषण चाहिए। शरीर को स्वाद चाहिए कि पोषण? पोषण। रूप देखते हो तो उस रूप का स्वाद आंख नहीं ले रही, मैं ले रहा हूं — उपयोग मैं इंद्रियों का कर रहा हूं। बस, हम स्वाद में फंस गए हैं, और यहां सबका अपना-अपना स्वाद है।

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तो अब क्या करें?

बस स्वाद की इच्छा छोड़ दो, अपने शरीर को पोषण दो और अपना आत्मिक कल्याण करो। खाने में स्वाद मिलता है तो वह अपने आप आ रहा है, आप सिर्फ शरीर के पोषण के लिए भोजन करो — स्वाद की कामना छोड़ो। और केवल भोजन का नहीं, शब्दों का भी, हर चीज का स्वाद है; मान का भी अपना एक स्वाद है — सारी गड़बड़ी स्वाद में हुई है।

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व्यक्ति सबसे ज्यादा किसका स्वाद लेता है — किन इंद्रियों पर नियंत्रण से सब पर नियंत्रण हो जाए?

स्वाद का चक्कर बड़ा खतरनाक है, इसीलिए तो हमने अपनी कुटिया में इतने नियम लगाए। व्यक्ति सबसे ज्यादा रूप का और शब्दों का स्वाद लेता है — इसी में पागल है; स्पर्श का स्वाद बहुत कम लेता है, कब तक किसी को सहलाएगा? भोजन का स्वाद भी कम ही लेता है, थोड़ी देर में ही धाप जाता है; लेकिन शब्द — घंटों-घंटों बात करता है, और रूप देखता ही रहता है। तो कोई अपनी इन दोनों इंद्रियों — देखने पर और जुबान पर — कम से कम बोलने पर नियंत्रण करे, तो सब पर नियंत्रण हो जाए।

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यानी कान, जीभ और आंख — ये तीन सबसे ज्यादा रस लेते हैं?

सबसे ज्यादा आंखों से, कानों से, और जीभ से बोलने से। बोलता भी इसलिए है कि बदले में कुछ मिले, नहीं तो बोले भी ना — वह तो बस रस भरी बातें सुनना चाहता है, और जवाब देने वाले के कानों को भी चाहिए। आप कहानी सुनाते हो तो चाहते हो सामने वाला हुंकारी भरे; सुन तो रहा है, हो सकता है बहुत ध्यान से सुन रहा हो, लेकिन हुंकारी न भरे तो सामने वाला गुस्सा हो जाता है — क्योंकि मेरे कान को स्वाद चाहिए, कि मेरी कहानी कोई सुन रहा है।

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यह स्वाद की इच्छा पड़ कहां से गई — इन चीजों में आखिर क्या स्वाद आता है?

इसी में तो भटक रहा है। कह रहे हो क्या स्वाद आता है — अपने तरीके से भोजन न मिले तो थाली पटक देते हो; अपने तरीके से कपड़ा न मिले, अपने तरीके से बिस्तर न मिले — यही तो स्वाद है।

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अगर ये सारे रस हटा दें तो जिंदगी में कोई रस ही नहीं रहेगा — फिर जिंदगी का आधार क्या रहेगा, किसके लिए जिएं?

अपने को समझने के लिए जिएगा, अपने परम आनंद के लिए जिएगा — इस उम्मीद में जिएगा कि यह रस छोड़ने से परम आनंद घटित हो जाएगा। रस छोड़ो, उस परम आनंद का इंतजार करो, और रस छूटने के लिए जितना प्रयास कर सकते हो करो। ऐसे थोड़ी छूट जाएगा — एक-दो-चार दिन जबरदस्ती कर भी लो तो आदमी चिड़चिड़ा, तनावग्रस्त हो जाता है।

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जो आज से थोड़ा-थोड़ा नियंत्रण करके देखना चाहें, वे रोजमर्रा में कैसे शुरू करें?

कोई पूछे क्या बनाऊं — ठीक है, कुछ भी बना दो, शरीर के स्वास्थ्य के लिए ठीक हो; जैसा स्वाद हो, ग्रहण कर लो। नमक कम है, ज्यादा है, छोड़ो; भोजन एक घंटा लेट हो गया तो उसके लिए चिल्लाओ मत। सामने वाला बातचीत कर रहा है, जवाब दे रहा है, तो उसका जवाब सुनो, अपने तरीके से उम्मीद मत करो, सिर्फ अपना काम करो — अहम को पोषण मत दो।

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कान इंद्रिय के नियंत्रण के लिए क्या करें?

वही तो कह रहा हूं — जब आप अपने तरीके से उम्मीद नहीं करोगे कि वह ऐसा बोले, तो कानों का नियंत्रण वहीं हो गया। जबान पर कंट्रोल भी हो ही जाएगा, क्योंकि उम्मीद ही नहीं रहेगी। जब आप रस दोगे ही नहीं, तो सामने वाला भी आपकी बातों में रस नहीं लेगा, आपको झटक देगा — रस वो क्यों देगा?

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क्या जो गूंगे-बहरे हैं, उनकी यात्रा जल्दी हो जाएगी?

गूंगे-बहरे इशारों से खूब बात करते हैं, रस लेते हैं — दूसरी इंद्रियों से वह काम पूरा कर लेते हैं। यह तो ज्ञान के साथ ही घटना घटेगी।

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अगर मैं समझूं कि इंद्रियों का ज्यादा रसपान ही मेरे भटकाव का कारण है, और इन पर नियंत्रण करके बची ऊर्जा खुद को खोजने में लगाऊं — क्या यह सहायक होगा?

बहुत समझ के चलना है भाई, बहुत सोच-बूझ के साथ। मैं बोलता हूं ना, यह आवेश-जज्बात का मार्ग नहीं है, यह समझ का मार्ग है — इसमें समझ के ही आगे बढ़ा जा सकता है।

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इंद्रियों पर नियंत्रण से क्या समझ अपने आप खुल जाती है — समझ खुलती कैसे है?

जैसा बताया गया है, वैसा जब काम करोगे तो उसका परिणाम आएगा ना। जानकारी, जानकारी के बाद काम, काम के बाद परिणाम — और परिणाम के बाद समझ आ गई, समझ विकसित हो गई। उस जानकारी पर काम करोगे, जब परिणाम आएगा, तब समझ विकसित होगी।

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सूझबूझ के साथ चलने का क्या मतलब है, और कहने वाले का बैकग्राउंड क्या मायने रखता है?

खोजी बनो, खोज करो और अपना कल्याण करो — सूझबूझ के साथ, समझकर चलो। सूझबूझ मतलब किसी से सलाह लो कि जो करने जा रहे हैं वह सही है कि नहीं; अनेकों से लो, सबकी बात को मैच करो कि कौन क्या कह रहा है, और कहने वाले की स्थिति क्या है, उसका बैकग्राउंड क्या है। आवरण का बैकग्राउंड नहीं, समझ का बैकग्राउंड। जब उससे बात करोगे तो उसके ज्ञान का पता चलेगा, और बैकग्राउंड का पता तब लगेगा जब उससे मांग करोगे; मांग ही नहीं करोगे तो बैकग्राउंड का थोड़ी पता चलेगा।

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गुरु जी, मैं जामनेर (महाराष्ट्र) से हूं; अपने गुरु जी के परमधाम जाने के बाद सत्संग में रुचि बढ़ी और YouTube से आपका पता मिला — अब आगे क्या करूं, सत्संग में कैसे जियूं?

सत्संग सुनिए और उसमें जियो, शब्दों में जियो — नहीं तो कोई मतलब नहीं। जैसे घर में हम अनाज बहुत इकट्ठा कर लें लेकिन उसे पका के खाएं नहीं तो वह शरीर को पोषण नहीं देगा, वैसे ही सत्संग में जो शब्द हैं उनकी गहराई में जाना चाहिए। सत्संग का मतलब सीधा-सीधा अपने आप को सुधारना। पहले तो पता करना पड़ेगा हम बिगड़े कहां हैं — मशीन बिगड़ी कहां है अगर नहीं खोज पाओगे तो उसे बना नहीं पाओगे। आज पहले से बहुत ज्यादा मेरे पास है, फिर भी जीवन अशांत क्यों? क्योंकि व्यवस्थाएं जुटाने में हम अपने को और अपनों को समय नहीं दे पाए, वस्तुओं को ज्यादा प्रधानता दे दी। पहले स्वीकार करना पड़ेगा कि मैं बिगड़ चुका हूं; सत्संग की शुरुआत ही है मान की इच्छा का त्याग करना। संसाधन अगर आप जुटा रहे हो तो उसमें पूरी ईमानदारी हो, नहीं तो वही संसाधन आपको घुटन देगा। लोग कहते हैं ऊपरी कमाई के बिना चलेगा नहीं — लेकिन वह एक बेईमानी है, आप किसी का हिस्सा ले रहे हो, और जब अनेकों का अभिशाप एक घर में लगेगा तो वह घर शांति में कैसे जिएगा? करोड़ों की कार में शांति नहीं लगी क्योंकि वो बेईमानी का था। इसलिए पहले तो पूरी तरह ईमानदार हो जाइए, अध्यात्म की शुरुआत ही यहीं से है — ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन। आप चाहे किसी विधि से जाओ, सब छोड़ के आखिरी में ईमानदारी पर आना ही पड़ेगा, तभी यात्रा की शुरुआत होगी। अपने आप से पूरी तरह ईमानदारी रखो — अंतरात्मा कहता है यह मत करो, गलत है, लेकिन फिर भी वासनाओं, कामनाओं, लालच और मान के चक्कर में दबा के करते हैं। कैसे भी अपने आप को निर्विकार कराओ: अपने आप में बैठो, अपने आप को जांचो, दृष्टा भाव से देखो कहां-कहां मैं फंसा हूं।

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गुरु जी, हम इंदौर में सत्संग, लंगर और गुरुद्वारे में सेवा करते हैं — हमें आपका आशीर्वाद चाहिए।

बस करते रहिए। आशीर्वाद तो अपने आप है। देखिए, ब्रिज के नीचे आ गए तो वह छाया दे रहा है — उसका स्वभाव है। जिसके पास है वो देगा। आप इसके पास आ गए तो देगा; आप इससे थोड़ा दूर हो जाओ तो कहां से देगा? यही स्वभाव होता है — जिसके पास जो है वो देगा ही देगा, जो है वही देगा। लेन-देन ही तो है संसार में।

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गुरु जी, थोड़ा ध्यान करवाने का समय मिल सकता है?

ध्यान करिए मत, ध्यान में हो जाइए — ध्यान करिएगा नहीं, ध्यान में होइएगा। अभी तक कर रहे थे; होना क्या — अपने आप में होना। क्योंकि ध्यान भी तो मुझसे है, तो मैं ध्यान में क्यों हूं? मुझे ध्यान में नहीं होना, मुझे अपने आप में होना चाहिए। कुछ समय के लिए मोबाइल वगैरह हटा दीजिए। डरना नहीं — करने में तुम होते हो, होने में मिटते हो। कुछ भी करो, करने में अहम भाव आ जाता है, इसलिए करना मत; कुछ देर कुछ भी नहीं, अपने आप को छोड़ दो। अपने आप में चले जाओ, वापस भी आ सकते हैं। ध्यान से अपने आप को छुड़ाना — ध्यान से ही अपने आप को छुड़ा लेना है। ध्यान करना नहीं चाहिए; मुझमें ध्यान घटित हो रहा है, हमें उससे छुड़ा लेना है।

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गुरु जी, शहर लौटकर बीवी-बच्चों के बीच व्यवहारिकता में तो करना ही है — तब क्या करें?

पहले मैं फंसने के लिए कर रहा था, अब निकलने के लिए करूंगा। सारे दायित्व को निभाते हुए, कर्तव्य को निभाते हुए बस करते हुए देखिए। अभी तक आप कर रहे थे, करने में लिप्त थे; अब करते हुए अपने आप को देखिए, अपने आप को अलग रख के करिए। बस उचित करिए, अनुचित ना करिए। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — ये हमारे शरीर की जरूरत है; ये करते हुए अपने आप को देखिए — देखने वाले आप, करने वाला शरीर। बस उचित होना चाहिए, अनुचित नहीं, इतना विशेष ध्यान रखिए, क्योंकि शरीर भोग से आया है, योग से नहीं आया। बस ईमानदारी से देख लो, और देते हुए देखो कहीं त्रुटि तो नहीं हो रही है। ध्यान क्या है? ध्यान से छुड़ाना ध्यान है। छुड़ा लो अपने आप को — यही ध्यान है, यही ज्ञान है, यही योग है, यही भक्ति है: करते हुए देखना, बस उचित-अनुचित का ध्यान।

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गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि जिस चीज का मोह हो उसे इतना कर लो कि मोह अपने आप खत्म हो जाए — क्या यह सही है?

करने में खत्म नहीं होगा, देखने में खत्म होगा; करने में तो लिप्त हो जाओगे। जिसको आप देख रहे हो वो बदल रहा है — अगर वह स्थिर होता तो आप भी स्थिर हो जाते; रुकोगे कैसे, कहां रुकोगे? स्थिर अस्थिर में फंस गया और उससे अपने आप को पूर्ण करना चाहता है — यही उसकी अपूर्णता है; कुछ पाना ही अपूर्णता है। करने में भटकाव है, देख के करने में मुक्ति। उचित है तो करो, अनुचित है तो त्याग करो। क्या आप उम्मीद रखते हो कि कोई आपके साथ बेईमानी करे? तो आप भी मत करो — एक बेईमान भी बेईमान को पसंद नहीं करता। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श शरीर की जरूरत है, ये मुझे किसी न किसी तरीके से देना पड़ेगा — तो ईमानदारी से दो, बेईमानी से मत। अगर आप बेईमानी कर रहे हो और दूसरे भी आपसे कर रहे हैं तो उसे भी स्वीकार करो। बेईमानी में मेरा होता है और ईमानदारी में आप होते हैं; ईमानदारी अपने आप होती है, बेईमानी करना पड़ता है। खूब जियो, खूब खाओ, खूब पियो, लेकिन उसमें ईमानदारी होनी चाहिए — ईमानदारी में आपसे कभी ना कभी मिलना हो जाएगा, बेईमानी में कभी नहीं, क्योंकि बेईमानी मेरा में हो रहा है और मेरा हमेशा बदल रहा है। भोग के आप मुक्त नहीं हो सकते, समझ के मुक्त हो सकते हो, क्योंकि भोग का अंत नहीं है — जिसे भोग रहे हो वह परिवर्तनशील है। बेईमानी माया है, जगत माया थोड़ी है — महापुरुषों ने भी खाया-पिया, धन का उपयोग किया, उसे लोगों में खर्च किया। बस बेईमानी बंधन है, ईमानदारी मुक्ति है — ये पूरा सार है, इसी को पकड़ लो।

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गुरु जी, कर्म तो मुझे देश-काल-परिस्थिति में अपनी जरूरत के लिए या किसी और के लिए करना ही पड़ेगा — तो मैं क्या करूं कि कर्ता का भाव और मेरा का भाव न बंधे?

यह कर्म भूमि है, यहां बिना किए आप रह ही नहीं सकते। मैं इस पिंड में आया, फिर इस पिंड की जरूरत थी। जरूरत में मैं बाहर गया — कभी मां मिली, कभी बाप मिला; जो लोग मेरी जरूरतें पूरा करने लगे वो मेरा बनने लगे। जरूरत तक तो कोई तकलीफ नहीं, ना बेचैनी, ना घुटन, ना किसी से राग, ना द्वेष। फिर जैसे ही समझने लायक हुआ, देखा ये बड़ा आदमी है, ये छोटा; तो इच्छा जगी मैं भी बड़ा बन जाऊं। पहले मेरा बनाया जरूरत के लिए, फिर सुख-स्वाद के चक्कर में। सुख तब मिलता है जब मेरा से मैं लेनदेन करता हूं — किसी ने पूछा भोजन कैसा है, हमने कहा अच्छा, तो उसे भी सुख, मुझे भी; कहा बुरा तो उसे भी दुख, मुझे भी — मैं राग-द्वेष में फंस गया। तो कुछ भी लेनदेन करूं तो ठीक शब्द का प्रयोग करना है। भोजन कैसा बना? ठीक। ठीक में राग-द्वेष दोनों नहीं आएगा, सामने वाले के अहमभाव को कोई पोषण नहीं मिलेगा, और ठीक में कोई बंधन नहीं है, क्योंकि मिलने में बंधन है। "ठीक है" भी मत बोलना, तुम कुछ जोड़ मत देना — जैसा है वैसा स्वीकार करके अपनाओ। दूसरा — किसी ने पूछा ये काम कब तक हो जाएगा, मैं टाइम दे देता हूं; टाइम देना ही बंधन है, क्योंकि काम मेरे शरीर के द्वारा और अनेक साधनों के द्वारा हो रहा है; हो सकता है अगले सेकंड शरीर छोड़ना पड़े, साधन ही धोखा दे दे। संभावना में बात करो, अनुमान मत लगाओ, तुक्का मारना बंद करो। जब परिणाम आ जाए तब बोलो — ये देखो परिणाम है; तब अहमभाव खड़ा ही नहीं होगा, कर्ता का भाव बनेगा ही नहीं। ठीक शब्द का प्रयोग करो, अनुमान लगाना छोड़ दो, संभावना में बात करो, परिणाम आने पर परिणाम बता दो — ये प्रत्यक्ष ज्ञान का मूल मंत्र है। इसे अपनाते ही छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, पाखंड भी नहीं होगा तुमसे — ईमानदारी अपने आप हो गई। फिर धीरे-धीरे सत्कर्म करोगे तो पिछले का नाश होगा और एक दिन उस मूल परम आनंद को उपलब्ध हो जाओगे। फिर हंसना और रोना दोनों चला जाएगा, सिर्फ मुस्कुराहट रह जाएगी — आदमी हंसता-रोता किसी और के लिए है, मुस्कुराता अपने लिए है। लेकिन हां, आप अकेले रह जाओगे; वाहवाही नहीं करोगे तो लोग सिर्फ काम की बात करेंगे।

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गुरु जी, लोग काम के लिए हमसे पूरा भरोसा मांगते हैं और हम भरोसा दिलाकर फंस जाते हैं — क्या हम यह कह सकते हैं कि मैं आपका काम करूंगा, लेकिन यह पक्का नहीं है?

मैं काम करूंगा, समय नहीं दूंगा — काम तो करूंगा ही करूंगा। आप दो घंटा बोल रहे हो, मैं तो चाह रहा हूं एक घंटे में हो जाए; लेकिन समय निर्धारित नहीं करूंगा, क्योंकि समय मेरे हाथ में नहीं है। मेरे हाथ में काम है और जिसके द्वारा कर रहा हूं वो सही है, इसलिए बोल रहा हूं कर पाऊंगा — जब तक ये सही रहेगा। भरोसा देकर आप सामने वाले को भी तो जाल में फंसाते हो, क्योंकि समय का पता तुम्हें थोड़ी है; लग गया तो तुक्का, और तुक्के में दुख है। आप करोगे ये पक्का है, लेकिन जिसके द्वारा कर रहे हो — यह शरीर या कोई साधन — क्या वो पक्का है? अगला क्षण भी पक्का नहीं। इसलिए किसी को झूठा आश्वासन मत दो — झूठ में पूरी जिंदगी जी रहे हैं हम, इसीलिए तो परेशान हैं। संभावना में बात करो: तुम दो बोल रहे हो तो मैं एक में कर दूंगा, लेकिन हो सकता है चार भी लग जाएं, हो सकता है कर भी न पाऊं; मेरा प्रयास सौ में सौ प्रतिशत रहेगा, साधन सही रहा तो कर दूंगा। साधन के बिना इस जगत में मैं कुछ नहीं हूं।

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गुरु जी, जहां तक मैं समझा हूं आप यह कहना चाह रहे हैं कि समझ के आगे बढ़ो, क्योंकि इस मार्ग में सब खत्म हो जाएगा — क्या ऐसा है?

जी, इस मार्ग में सब खत्म हो जाएगा, मैं प्रत्यक्ष उदाहरण हूं। मेरे घर का एक सदस्य मुझसे कभी मिलने नहीं आया, और मुझे उसका अफसोस भी नहीं — मेरा भी भाव नहीं है, सब खत्म हो गया। लेकिन जब खत्म होता है ना तो लगता है कि मौत इससे अच्छी होगी, क्योंकि खत्म होने के बाद आनंद मिलेगा; खत्म होने तक तो जितना हाथ में था सब जा रहा है और आगे का कुछ आता है पता नहीं। तो सूझबूझ के साथ आगे बढ़ना। और नहीं तो फिर धीरे-धीरे आराम से मुक्ति पा — उसका भी रस लेता रह, और धीरे-धीरे रस भी ले और छोड़ने का भी प्रयास कर। मुक्ति-मोक्ष का मतलब सब खत्म; जैसे कोई वस्तु जल जाती है तो सिर्फ राख बचती है। ये कमजोरों का मार्ग नहीं, वीरों का मार्ग है — पहले खूब जांच लो, आवेश-जज्बात में मत निकलना।

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गुरु जी, मेरे अंदर एकांत का भाव रहता है — कहीं जाना हो तो मैं अकेला जाता हूं, ऐसी इच्छा नहीं रखता कि कोई साथ हो। क्या यह ठीक है?

तुझे एकांत क्यों चाहिए पता है? तेरा नेचर किसी से मिलता ही नहीं, किसी से जम ही नहीं रहा; एक भी आदमी नहीं मिल रहा जो तुझे समझ पाए, तो मजबूरी में एकांत जाना पड़ रहा है — तू चाह तो रहा है कि तेरे जैसा कोई मिले। एक पत्नी को धन चाहिए? नहीं, उसे तेरा साथ चाहिए। तू सोच रहा है उसे सब मिला — गहने, सोना-चांदी — पर जो चाहिए था वो मिला ही नहीं; उसे तू चाहिए था और तू कहीं और है। वो कुछ कहना चाहती है, तुझे सुनने का समय ही नहीं; वो तेरे साथ जीना चाह रही थी और तुझे कहीं और जीना था। वो जानवर थोड़ी है कि भूसा डाल दिया, त्यौहार पर रंग दिया — फीलिंग है उसके पास, एहसास है। तो ना तेरा साथ किसी को मिला, ना तूने किसी का साथ दिया — सीधी सी बात। अब देख ले, जिस उद्देश्य से इस धरती पर आया उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है तो बस कर ले — वो तेरे हाथ में है, किसी के हाथ में नहीं, यहां तक कि गुरु के भी हाथ में नहीं। गुरु तो सिर्फ सतमार्ग बता रहा है; माया में फंसो या भवसागर से निकल जाओ, सब तुम्हारे हाथ में है।

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गुरु जी, डॉक्टर होने के नाते मरीज से तो मैं कह देता हूं कि अपनी तरफ से पूरा प्रयास करूंगा, बाकी ईश्वर कृपा। पर घर में बच्चों का आत्मविश्वास न गिरे इसलिए कहना पड़ता है "सब ठीक होगा, हम संभाल लेंगे" — क्या यह भी धोखा देना है?

आप उन्हें संभालने के लिए भरोसा दे रहे हो, उठाने के लिए भरोसा दे रहे हो — उनको यूज़ करने के लिए नहीं। भरोसा उनके लिए उनको दे रहे हो, ना कि उस भरोसे के द्वारा उनको यूज़ करना है; कहीं उनका आत्मविश्वास ना गिर जाए, वो टूट ना जाएं, इसलिए कहना पड़ता है "मैं हूं ना, हो जाएगा"। इससे तुम भी उठोगे, वो भी उठेंगे — ये बेईमानी नहीं है। अपने को पता है कि अपने हाथ में अगली सांस भी नहीं, लेकिन ये बात उन्हें अभी समझ नहीं आई है; तो मैं कह सकता हूं "तू चिंता मत कर, मैं हूं ना" — लेकिन मुझे पता होना चाहिए कि मैं संभावना में बात कर रहा हूं, क्योंकि हो सकता है मैं अगले पल शरीर में ना रहूं। भरोसा इसलिए दीजिए कि सामने वाला गिरे नहीं।

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गुरु जी, ठीक शब्द अपनाने से लोग धीरे-धीरे दूर हो गए, अब अकेलापन सताता है। मन करता है अपने मार्ग के सत्संगियों के साथ बैठकर बातें करूं, जबकि पहुंचा तो कोई भी नहीं है — क्या यह ठीक है?

बातें कर लेना, लेकिन बातें करने में वहां दबाव-संकोच ना हो। अपनी बात कुछ ऐसी है तो रख देना, अगर दोनों एक मार्ग के मार्गी हों; लेकिन अगर कोई बात नहीं समझ रहा है तो समझाने का प्रयास मत करना। जैसे तुमने कोई घटना बताई और उसे लगा मजाक है, क्योंकि उसके साथ नहीं घटी — वहां राग-द्वेष ना हो जाए ये देखना, क्योंकि अभी उसकी भी यात्रा है। उतनी ही बातें करो जितना वो समझे। कुछ अगर आंतरिक घटना घटी है तो वो किसी से मत बोलो, गुरु से कहो, क्योंकि वो प्रश्न कर देगा "ऐसे कैसे, सिद्ध करो", तो तुम राग-द्वेष में फंस जाओगे कि इसने मेरी बात काट दी। इतनी ही बातें करो जितना सिद्ध कर सकते हो।

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गुरु जी, कई बार लगता है बस अपने मन की बात करने के लिए कोई चाहिए जो मुझे समझ ले — किसी से जम ही नहीं रही, लोग कहते हैं सारे संसार में तुझे ही कोई नहीं समझ रहा तो शायद तेरे में ही प्रॉब्लम है। क्या करूं?

ये समस्या आपको इस भवसागर से निकाल भी तो देगी। एक भी ऐसा नहीं मिल रहा जो समझ पाए — वो सिर्फ आप हो और एक गुरु, बस। हां, प्रॉब्लम है ना — क्योंकि मैं निकलना चाहता हूं, यही प्रॉब्लम है। अगर मैं यहां रहना चाहता तो प्रॉब्लम नहीं थी। तुम्हारे ग्रुप से एक आदमी जा रहा है तो तुम्हारा ग्रुप कमजोर होगा — जिसको प्रजनन करना है, प्रॉपर्टी बढ़ानी है, उसके लिए तो मैं प्रॉब्लम ही हूं। आप दुनिया के लिए प्रॉब्लम हो।

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गुरु जी, मैंने कोई काम मना नहीं किया, आज भी काम पर बैठता हूं, बस अंदर से ज्यादा कमाने या आगे बढ़ाने का भाव खत्म हो गया है — पर घर वाले इससे खुश नहीं। ऐसा क्यों?

वो इसमें नहीं जीना चाहते। तुम उन्हें आश्वासन दो कि एक घर खरीदा, दूसरे की तैयारी है — खरीद पाओ या ना पाओ, बोलो तो; क्योंकि दूसरा बोलोगे तभी तो इस धरती पर दोबारा आओगे। वो सोचते हैं ये कोई जीवन है कि आगे की प्लानिंग ही नहीं कर रहा। इसलिए वो आपको छोड़ देंगे; आपसे आपके अलावा कोई बात नहीं करेगा, और आप उम्मीद भी मत रखना। आपकी प्लानिंग उससे भी ज्यादा कहीं और है — जन्म-जन्म के दुखों से मुक्त होने की यात्रा — लेकिन वो ये नहीं देख पा रहा, क्योंकि उसे वो नहीं चाहिए; जैसे छोटे बालक के सामने करोड़ों की गाड़ी और चॉकलेट रख दो तो वो चॉकलेट ही लेगा। रामकृष्ण परमहंस को लोगों ने पागल घोषित कर दिया। जिसकी आगे की प्लानिंग नहीं वो संसार के लिए पागल है; और ये होने वाला है कि आप उनकी आंखों में देखोगे कि आपको देखकर उन्हें घुटन, घिन आ रही है, क्योंकि अब आप उनके काम के नहीं रहे — वो तो कुछ मिल रहा है इसलिए सह रहे हैं। गुरु नानक के साथ, जड़ भरत के साथ परिवार ने क्या किया — भगा दिया। मेरे साथ खुद हुआ है: मैं बहन के यहां रहता था; जब तक पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र करता था, उन्हें लाभ होता था, मैं उनके लिए भगवान था; जैसे ही मैंने सब बंद किया, उनके भाव बदल गए, और 2020 में जब मेरा आखिरी समय चल रहा था, मैंने उनकी आंखों में देखा कि मैं अब उनके लिए बोझ हूं — जबकि मेरी फोटो लगाकर पूजा भी करते थे। संसार तभी तक इज्जत देगा जब तक आप उसके काम के लायक रहोगे। इसके लिए पूरी तैयारी कर लीजिए; ये उम्मीद छोड़ दो कि मुझसे कोई बात करेगा, मुझे कोई इज्जत देगा — तुम ही बचोगे, यही इस मार्ग की सच्चाई है। इसे स्वीकार कर आगे बढ़ो; अस्वीकार करोगे, एक तरफ इधर भी चलोगे और एक तरफ उनसे मिक्स करने के लिए बात भी करोगे, तो कहीं के नहीं रह जाओगे।

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गुरु जी, बुद्ध ने कहा कुछ चीजें बिना भोगे बोध से भी समझ आती हैं। अगर इस मार्ग में सबके साथ यही हो रहा है, तो इससे अच्छा क्या यह नहीं कि संसार की जिम्मेदारी छोड़कर गुरु से ही जूते खा लें?

गुरु जूता मारता नहीं; गुरु तो तुम्हारे लिए जूता खा सकता है, तुम्हें जूतों से मुक्त करेगा। यहां का जूता गिराएगा, वहां का जूता उठाएगा — लेकिन गुरु तुम्हें जूता नहीं मारता। मां तुम्हें ज्यादा भोजन देती है, गुरु कम देता है, क्योंकि मां तुम्हारे शरीर का उपयोग करना चाहती है और गुरु शरीर को छोड़कर तुमको देख रहा है — कि तुम इस शरीर से कैसे छुटकारा पाओ। गुरु के पास अथाह भोजन है, फिर भी वो कम देता है। गुरु कभी जूते नहीं मांगता; गुरु तो तुम्हारे लिए कितने जूते खाकर गुरु बना — गुरु पद ऐसे ही थोड़ी मिलता है। मैं अपनी बीती कहानी इसलिए बता रहा हूं कि तुम्हारे साथ भी होगा — घबराना मत; तरीका अलग होगा।

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गुरु जी, घुटन तो अभी भी है, क्योंकि रहना उन्हीं के साथ है जो इस मार्ग पर नहीं चल रहे — इसी घुटन की वजह से क्या लोग भक्ति मार्ग की तरफ ज्यादा मुड़ जाते हैं?

ये तो शुरुआत है, जैसे-जैसे आप इधर बढ़ोगे ये घुटन बढ़ती जाएगी। हां, उनमें सहने की इतनी हिम्मत नहीं होती तो टूटकर वो भक्ति मार्ग में चले जाते हैं। भक्ति मार्ग, क्रिया मार्ग, योग मार्ग, ध्यान मार्ग — सबसे कम साधक ज्ञान मार्ग में हैं। इसमें तुम्हारे अलावा कोई नहीं है, गुरु भी शब्द रूप में है, शरीर रूप में नहीं। बाकी मार्ग कहते हैं धीरे-धीरे छूट जाएगा, ज्ञान मार्ग कहता है — छोड़ तो आ, नहीं तो मत आ। किसी भी मार्ग से जाओ, आखिर में ज्ञान ही चाहिए; भक्ति में इष्ट के द्वारा भी ज्ञान ही तो चाहिए। ज्ञान मार्ग सबसे तेज तो है, लेकिन खतरनाक भी है — एक झटके में ऊपर ले जाता है तो एक झटके में नीचे भी; जैसे पैदल वाला गिरे तो कम चोट, जहाज वाला गिरे तो पता नहीं बचे कि नहीं। इसलिए जितने शब्द बोल रहे हो उसमें जीना पड़ेगा, उसमें चूकना नहीं। ज्ञान मार्ग में बैकग्राउंड काम नहीं करता, सिर्फ आपसे मतलब है — धोखे से आ भी गए तो टिकोगे नहीं। इससे आप इसी जन्म में निकल सकते हो।

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गुरु जी, आपने कहा था कि इस मार्ग पर एक प्रतिशत ही पहुंच पाते हैं, और यह भी कि बुद्ध के बारे में पहले से पता था कि वे बुद्ध होंगे — तो क्या परमात्मा ही वह एक प्रतिशत लोग भेजता है? फिर सत्कर्म क्या है?

परमात्मा भेजता है — ऐसा नहीं है, सब अपने कर्मों से। अष्टावक्र को गर्भ में ही ज्ञान था, तो वो पीछे का ही था ना; बुद्ध को तो बाद में हुआ, प्रयास के बाद। लक्षण पता चल जाता है, लक्षण भी हमारे कर्म से ही आया है — शरीर पर लक्षण होते हैं वो हमारे कर्म से ही आते हैं। उन्होंने संभावना व्यक्त की कि ये महात्मा बनेंगे; पक्का तो तब हुआ जब वो साधना करके उस स्थिति पर आए। ध्रुव ने छह-सात साल में भगवत प्राप्ति की — शरीर ना देखो, उसने पीछे मेहनत की। इसलिए मुझे कर्म बदलना है; जितना भी कुछ होता है मेरे कर्म से ही होता है। परमात्मा कर्ता से परे है। यह दुनिया अपनी जरूरत में चल रही है, और जरूरत में हम बेईमानी कर रहे हैं तो फंस रहे हैं — जितने लोग जेल में हैं, पैदा होते ही जेल थोड़ी गए, अपने कर्मों से गए। यहां कर्म का परिणाम मिलता है।

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गुरु जी, कृपया कोई ऐसा तरीका बताइए कि शरीर भाव और जीव भाव से परे होकर आपकी तरह अभय जीवन जिया जाए।

इसका जवाब मैंने शुरू में ही दे दिया: जरूरत में जियो, ठीक शब्द का प्रयोग करो, और अनुमान लगाना छोड़ दो। बात को संभावना में रखो; जब कोई काम करो और परिणाम आ जाए तो बताओ। और अपनी योग्यता के अनुसार जियो।

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गुरु जी, मैंने ये अंगूठियां और मोती इसलिए पहने हैं कि इनसे ऊर्जा मिलती है — क्या इनकी जरूरत है?

क्या तुझे पक्का लग रहा है इससे एनर्जी मिल रही होगी? संभावना है — मिल भी सकती है, नहीं भी। शरीर में उतना धारण करो जितनी इस शरीर को जरूरत है; तब जाकर रूप भाव से मुक्त हो पाओगे। आप में अनंत से ऊर्जा है; बाहर की ऊर्जा को छोड़ोगे तब ना — आप तो इस शरीर को अंगूठी से एनर्जी देना चाहते हो। पहले इन सबसे निकलो। कुछ भी ग्रहण कर रहे हो — चाहे शब्द, चाहे रूप, चाहे अंगूठी — देखो आपकी जरूरत है क्या। जरूरत में जीने लगोगे तो रूप के प्रभाव से धीरे-धीरे छुटकारा पाओगे।

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गुरु जी, पहले मैं नौकरी करता था पर वहां हर समय बेईमानी करनी पड़ती थी, तो मैंने छोड़ दी। अब बूढ़ी मां और छोटे भाई की जिम्मेदारी है, कोई काम सेट नहीं हो रहा — जिम्मेदारियों को तो नहीं छोड़ सकते ना?

कौन कह रहा है छोड़ो? किसने कहा जिम्मेदारी छोड़नी है? तू आकर बोलेगा कि मुझे तुरंत मुक्ति-मोक्ष चाहिए, तो मैं बोलूंगा सब छोड़; तू बात रख रहा है कि आराम-आराम से निकलूंगा अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए, तो वैसा मार्ग बताया जाएगा। तो ईमानदारी से कर्म अपना ले, और आराम-आराम से यात्रा कर। कभी कुटिया में या कहीं एक महीने का एकांत भी जाओ — 11 महीने परिवार को दो, एक महीना अपने आप को दो। आराम-आराम से सत्संग सुन, यात्रा कर।

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गुरु जी, हमारे गुरु नित्यानंद जी महाराज की वाणी है "निभाओ तो प्रेम की घाटी निभाओ तो गुजारे" — उन्होंने गुरु पर छोड़ दिया कि आप निभाओ तो गुजारा है, मेरे बस की बात नहीं। उस प्रेम के बारे में बताइए।

प्रेम किसी से नहीं। जैसा गुरु कह रहा है उसमें जी — वही प्रेम है। प्रेम का मतलब है मैं तेरे साथ बह रहा हूं, यही प्रेम है। तो जैसा गुरु कह रहा है वैसा कर, वही प्रेम है।

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गुरु जी, एक दास के क्या लक्षण होते हैं?

दास का लक्षण है कि जिसका वो दास है उसे कभी प्रश्न ना करना; जैसा वो कह रहा है वही करना। अगर उसने बोल दिया आग में कूद जा, तो दास का काम है आग में कूद जाना, ये नहीं पूछेगा क्यों — अगर क्यों पूछ दिया तो दास नहीं। दास-सेवक बनना आसान नहीं; बातें करना बड़ा आसान है कि मैं आपका दास हूं। दास का मतलब — उसका अपना कुछ नहीं है। दास कहना आसान है, बनना नहीं।

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गुरु जी, जैसे शराबी को शराब की और जुआरी को जुए की ऐसी तड़प होती है कि वो परिवार-संसार किसी की तरफ नहीं देखता — वैसी तड़प हमारे अंदर आत्म-कल्याण के लिए क्यों नहीं बन पाती, जबकि आप इतना अच्छा समझाते हो?

देख, चाहे शराबी हो या जुआरी, पहले दिन तड़प नहीं बनी; धीरे-धीरे उसने ग्रहण किया, धीरे-धीरे आदी हुआ, अब इस स्थिति पर आ गया कि छोड़ नहीं सकता। पहले दिन तो उसने एंजॉय किया। वैसे ही धीरे-धीरे सत्संग सुनता रह, समझ में आता रहेगा। जीवात्मा की कहीं-न-कहीं तड़प बनी ही है — चाहे भोग में, चाहे योग में। तो तू धीरे-धीरे इस सत्संग को ग्रहण कर, इसका अनुसरण कर, इस पर चल — एक दिन ऐसा होगा कि आत्मिक कल्याण के बिना रह ही नहीं पाएगा; लेकिन ये तुरंत नहीं बनेगी। कहीं और अपने आप को ना लगाना; जैसे रोज भोजन कर रहा है इस शरीर के लिए, वैसे अपने लिए सत्संग सुनते रह, एक दिन भी छूटे ना — एक समय ऐसी स्थिति आएगी कि आत्मज्ञान के बिना रह नहीं पाओगे।

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गुरु जी, आप कहते हैं साल में कम से कम एक महीना एकांत में जाओ, पर वापस इसी संसार में आना पड़ता है और अभिमन्यु के चक्रव्यूह की तरह फिर फंस जाते हैं — इससे कैसे बचें?

वहां एक महीना रहते हो तो वहां सिखाया जाता है कि किस तरीके से जाकर संसार में फिर से रहना है; वो सीखकर आते हो। फिर दूसरे साल जाना है, क्योंकि मैं रह पाया कि नहीं, कुछ त्रुटि हो गई तो फिर अपने आप को मजबूत करने वहां जाना पड़ता है — जैसे रोज वही भोजन करते हो, पर शरीर को ऊर्जा मिलती है तभी काम कर पाता है। गृहस्थ हो तो साल में कम से कम एक बार एक महीने के लिए जाओगे, क्योंकि वहां सीखकर आओगे कि संसार में कैसे जियूं कि फंसूं नहीं — लिप्त होकर अलिप्त रहूं: शरीर से लिप्त हो रहा हूं, लोग देख रहे हैं, लेकिन मैं अलिप्त। अगर तुम्हारा फंसना बंद हो गया, तो निकलना उसी समय पक्का। यहां हर चीज परिवर्तनशील है — वस्तु का यूज़ करो या ना करो, नाश तो दोनों का होगा; ऐसे ही अगर नए बंधन बांधना बंद कर दिया तो बंधे हुए बंधनों का नाश हो ही जाएगा।

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गुरु जी, आज बारिश हो रही थी तो मन ने आने से रोक दिया, जबकि आप भी 12 साल पैरों में छाले लेकर चलते रहे — मन ऐसा क्यों रोक देता है?

आप मत रुको ना। मन नहीं रोकता, मन तो इंगित करता है। ना आने की इच्छा भी आप ही ने बनाई, आने की भी आपने बनाई; आपने आने पर जोर दिया तो आ गए — मन क्या कर लेगा? आए तो कुछ मिला ना। बस आप फैसला कर लो कि मुझे क्या चाहिए; जो चाहिए वहीं जाओगे। आपने फैसला किया कि चाहिए कुछ और और जाना कहीं और चाहते हो, तो उस तरफ कभी नहीं जा सकते। देखो ना, एक कागज पर जो पता लिख देते हो चिट्ठी वहीं पहुंच जाती है। इतनी ताकत तुम में है, क्योंकि तुम उस पूर्ण से हो, तुम भी पूर्ण हो — अपनी ताकत को पहचानो। आप फैसला करो आपको क्या चाहिए, वही चलेगा; मन का कोई रोल नहीं, रोल सारा आपका है।

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गुरु जी, जब ईश्वर एक है तो सभी महापुरुषों का ज्ञान भिन्न क्यों है — जैसे नाम दान, ब्रह्म ज्ञान, आत्म ज्ञान और सांसों का ध्यान?

बोलने का तरीका अलग-अलग है। जैसे जमीन से पानी आने का तरीका अलग-अलग है, पानी का स्वाद भी अलग-अलग होता है, लेकिन पानी एक जगह से आता है। जिस तरीके से जिसने खोजा है उस तरीके से बोलेगा; बोलने का तरीका अलग है, मतलब एक ही है। जैसे तू जहां रहता है, तुझसे पूछा जाए तो तू अलग तरीके से पता बताएगा, तेरे घर वाले से पूछा जाए तो अलग — पर जाना तो एक ही जगह है।

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गुरु जी, कर्मों का विधान क्या है? शास्त्र तीन कर्म बताते हैं — क्रियमाण, प्रारब्ध और संचित।

मनुष्य जब कुछ भी करेगा तो कर्म तो होगा ही। कर्म अच्छा है तो भी बंधन है, बुरा है तो भी बंधन। तो ठीक में करो — ना अच्छा, ना बुरा; जरूरत में। निष्काम कर्म बंधन नहीं। योग्यता से ज्यादा करने में बंधन है, लेकिन योग्यता में करने में बंधन नहीं — जितनी आपकी सामर्थ्य है उतना करने में राग-द्वेष नहीं, अच्छा-बुरा नहीं, सिर्फ कर्म है, कर्ता का भाव भी नहीं। कर्ता का भाव तब होता है जब सामने वाले को आप आश्वासन देते हो, झूठ बोलते हो।

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गुरु जी, कुछ संतों का कहना है कि आत्म ज्ञान या ब्रह्म ज्ञान 12 साल में प्राप्त हो जाता है — ऐसा क्या है?

उससे कम भी लग सकता है। 12 साल तो उन्होंने वैसे दिया है जैसे किसी शिक्षक से पूछो कि ये डिग्री कितने साल में होगी तो बता देंगे — लेकिन उतने साल में तुम कितनी बार फेल होते हो, ये आपके ऊपर है। लगातार पढ़ना पड़ेगा; एक साल का गैप किया तो एक साल और लगेगा। 12 साल फाइनल है — शुरू से आखिर तक; अगर आप चलोगे तो 12 साल में पक्का। अगर पिछले जन्म में छह साल चल चुके हो तो इसमें छह ही साल लगेंगे; जैसे सातवीं तक पढ़कर दो साल छोड़ दिया तो फिर नाम लिखाओगे तो आठवीं में लिखा जाएगा, शुरू से नहीं पढ़ना पड़ेगा। हो सकता है आठ साल लगा चुके हो तो चार ही साल लगेंगे; कुछ बोल नहीं सकते। जितने लोग पहुंचे हैं उन्होंने बता दिया; अनपढ़ से पूछो कि पीएचडी कितने साल में मिलेगी तो वो नहीं बता पाएगा।

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गुरु जी, लेकिन जो आपकी शरण में आएगा उसको तो आप पार करोगे ना?

तेरे पार करने से पार होगा। अगर ऐसा होता तो इस पसीने में पंखे-एसी लगवा लेते, बोलते चरणों में पड़ो, एक-दो घंटा रो लो और सब पार हो जाओ — ये सब फालतू बात है। मेहनत तो तेरे को करनी होगी। जैसे स्कूल वाले ने पढ़ने की जगह दी, मेहनत विद्यार्थी को करनी पड़ती है; उसे डिग्री देने की परमिशन है, लेकिन योग्य को, अयोग्य को नहीं। अगर उसका अपना बेटा कहे मैं पढ़ूंगा नहीं, डिग्री दे दो, और वो बनाकर दे दे, तो स्कूल भी सील होगा और वो जेल की रोटी भी खाएगा। तो ये झूठा आश्वासन मत ले। मैं तरीका बता रहा हूं, उस तरीके से चलेगा तो पार।

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गुरु जी, कोई हम पर विश्वास करके अपना काम लेकर आता है जो हमसे नहीं, किसी और के द्वारा होना है। स्पष्ट मना करें तो वह टूट जाएगा, इसलिए उसे थोड़ा आश्वासन दे देते हैं — हम तो इसे सत्कर्म समझकर कर रहे हैं, पर काम न हुआ तो क्या हम उसके पाप के भागीदार बनते हैं?

इसे सत्कर्म नहीं कहते, इसे समाज सेवा कहते हैं; सत्कर्म उसे कहते हैं जैसे कोई गिर गया, आपने उठा दिया। जब तू कर ही नहीं सकता तो उसे आश्वासन क्यों दे रहा है? या बोल दे मैं उस लायक नहीं, किसी के द्वारा करवाऊंगा। वो टूटेगा तब जब झूठा आश्वासन मिलेगा। अभी टूट जाए तो अच्छा, बाद में तो टूटेगा ही — क्योंकि तू आश्वासन देगा तो उसके सारे ऑप्शन खत्म हो गए; तू अभी बता देता तो और भी ऑप्शन बचते। सामने कोई भी काम ले आया — अगर मैं कर सकता हूं तो बोलूं मैं उस लायक हूं, होगा नहीं होगा मुझे पक्का नहीं; अगर उस लायक नहीं हूं तो बता दूं कि मैं उस लायक नहीं, लेकिन कोई है उसके द्वारा करवाऊंगा; और अगर कोई ऑप्शन नहीं है तो कहूं, मैं एक बार प्रयास करूंगा, हो गया तो ठीक, नहीं हुआ तो ठीक। तब काम हो या ना हो, वो आशीर्वाद ही देगा कि प्रयास तो किया; लेकिन तूने कहा मैं करवा दूंगा, तो होगा तो आशीर्वाद, नहीं होगा तो श्राप देगा। आश्वासन देने की स्थिति ये है कि आप लायक हो; तब नहीं हुआ तो वो प्राकृतिक है — आप आश्वासन देने में ईमानदार हो, बस।

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गुरु जी, अध्यात्म के रास्ते पर चलते हुए, जब दिन-रात सत्संग ही चल रहा है, तो निर्विचार कैसे हुआ जाए?

निर्विचार कभी नहीं हुआ जा सकता, निर्विकार हुआ जा सकता है। विचार आएंगे; उन विचारों में राग-द्वेष नहीं होगा तो विचारों का प्रभाव आप पर काम नहीं करेगा। जितने लोग उस परम आनंद को उपलब्ध हुए, उन्हें भूख लगी तो भूख का विचार आया, तो भोजन लेने गए; ज्ञान देने का विचार आया कि ये बंधन में फंसा है, तब जाकर ज्ञान दिया — अगर ये विचार नहीं आता तो क्या वो ज्ञान दे पाते? इसलिए निर्विचार नहीं, निर्विकार — इसे पूरी तरह समझ लीजिए।

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गुरु जी, आत्मज्ञान के लिए दृढ़ निश्चय के लक्षण क्या हैं — कि मुझे आत्मज्ञान ही चाहिए?

आप जहां भी समय दोगे, आत्मज्ञान कैसे हो जाए उसके लिए दोगे; और किसी के लिए समय ही नहीं दोगे। अगर और किसी रस के चक्कर में समय दे रहे हो, इसका मतलब आत्मज्ञान पक्का नहीं। मैं ओंकारेश्वर में एक आश्रम में गया; कोठारी ने कहा खा लो, आराम से रहो, महाराज अभी नहीं हैं। मैंने कहा मैं यहां खाने-पीने तो आया नहीं, जब जवाब मिलना ही नहीं तो शरीर के लिए क्यों रुकूं — और रात भर ठंड में नर्मदा तट पर बिना बिस्तर के सोया। अगर उस रात वहां रुक जाता तो मेरे लिए आत्मज्ञान जरूरी नहीं था। एक महात्मा ने कहा तुम्हें पूरे भारत में आत्मज्ञान नहीं मिलेगा — मैंने कहा भारत में तो आप भी हो, और जेब में एक पैसा नहीं था, फिर भी उसी शाम नौ किलोमीटर पैदल चल दिया। आत्मज्ञान पक्का होगा तो जहां आत्मज्ञान की संभावना रहेगी वहीं रहोगे, नहीं तो रुकोगे ही नहीं; और ये स्थिति नहीं है तो आत्मज्ञान के बहाने बहुत कुछ चाहिए। ये स्वयं की चेकिंग है — कहीं मैं ऐसी जगह समय तो नहीं बिता रहा जहां आत्मज्ञान की कोई बात ही नहीं, या किसी और की भूख मिटाने के बहाने अपनी भूख मिटा रहा हूं। अगर आपके खाने-पीने-सोने का समय निश्चित है, सारी व्यवस्था करके रखी है और कहते हो जो मिल जाए हम तो फक्कड़ हैं — ये चालाकी है। 12 साल में आज तक मुझे नहीं पता मैं कब सोऊंगा, कब खाऊंगा, यहां के बाद कहां जाऊंगा। अगर आप समय में जी रहे हो तो आत्मज्ञान कभी नहीं होगा; समय के पार जी रहे हो तो आत्मज्ञान दूर नहीं — जहां मन-बुद्धि नहीं, वहां समय भी नहीं।

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गुरु जी, कहा जाता है कि हम औरत को गुरु नहीं बना सकते — तो आत्मज्ञान में स्त्री और पुरुष का क्या भेद है, क्या दोनों बराबर के भागीदार हैं?

ये तो शरीर है ना — शरीर तक स्त्री-पुरुष है, नर-मादा; शरीर के पार तो बस वो एक ही है, उसका ना नर है ना मादा। जैसे कोई बल्ब लाल जल रहा है, कोई पीला, कोई सफेद, लेकिन उसके पीछे ऊर्जा में कोई भेद है क्या? ऊर्जा तो एक ही जैसी है; बल्ब इधर से उधर कर दो तो इधर सफेद जलने लगेगा, उधर लाल। तो शरीर के पीछे सब एक ही जैसे हैं।

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गुरु जी, कबीर साहब की वाणियां इतनी हैं और कई जगह एक-दूसरे से उलटी लगती हैं — जैसे "पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़" — तो हम किस वाणी को पकड़ें?

कबीर ने कहा पत्थर पूजने से हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़, लेकिन कबीर के गुरु रामानंद मूर्ति पूजक ही थे ना; मीराबाई को पत्थर पूजने से ही गुरु मिला, रामकृष्ण परमहंस को मां काली ही निमित्त बनीं और गुरु तोतापुरी मिले — तो अब किसको झूठ बोलोगे? इनको समझने के लिए इनके स्तर पर होना पड़ेगा। मैं उनकी वाणी की व्याख्या नहीं करूंगा, उसकी व्याख्या करने वाले बैठे हैं। अपनी बात करो, अपना विवेक जगाओ। चाहे कबीर हों चाहे गुरु नानक जी, उन्होंने कहा जीवंत गुरु ढूंढो। मैं तो कह रहा हूं ना मेरे चक्कर में पड़ो, ना कबीर के, ना गुरु नानक के — अपने चक्कर में पड़ो कि मेरा उद्धार कैसे होगा, क्योंकि उनके उद्धार से मेरा उद्धार नहीं होने वाला। इनकी वाणी पकड़ोगे तो उलझकर लड़ जाओगे। ज्ञान को पकड़ो, व्यक्ति विशेष को मत पकड़ो — ज्ञान पहुंचाएगा, व्यक्ति विशेष नहीं; पात्र को ना पकड़कर पानी को पकड़ो, प्यास बुझाओ और निकल जाओ।

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गुरु जी, लोभ-मोह कहीं-कहीं बहुत भारी हो जाता है, परिवार में फंसे हैं — यह कैसे छूटेगा?

वो छूटने का तरीका बता रहा हूं — योग्यता से ज्यादा पाने की उम्मीद का त्याग करो, बात खत्म। ये पूरा सार है, पूरे शास्त्रों का, पूरे महापुरुषों की वाणी का। नर्मदा तट पर एक रिटायर्ड टीचर कई दिन मेरे साथ रहे; उन्होंने कहा एक शब्द में बता दो जिसे लेकर मैं मुक्त हो जाऊं, तो मैंने कहा उम्मीद से मुक्त हो जाओ। परिवार को छोड़ना भी नहीं है, निभाना है। योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करो, तो बेईमानी वगैरह होगी ही नहीं — सब खत्म।

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गुरु जी, बात सब समझ आती है, लेकिन मन फिर उसी तरफ चला जाता है — क्या करें?

तू है, मन नहीं। तू मोबाइल में वीडियो देख रहा है, इधर-उधर उल्टे-सीधे कर रहा है — मजा कौन ले रहा है? तू ले रहा है। मन शरीर के लिए काम करता है; हाथ अलग है, सिर अलग, आंख अलग; इनके द्वारा मजा लेने वाला सिर्फ एक मैं अंदर हूं। इंद्रियों के द्वारा अलग-अलग मजा ले रहा हूं — कहीं छूकर, कहीं देखकर, कहीं सूंघकर, कहीं चखकर, कहीं सुनकर; मजा लेने वाला मैं एक ही हूं और सबको मैं यूज़ कर रहा हूं।

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बाबा जी, आप हमेशा बोलते हो उम्मीद छोड़ दो, लेकिन मुझे फिर उम्मीद हो जाती है — क्या करूं?

सत्संग सुन, धीरे-धीरे छूट जाएगी, सत्संग का सहारा ले — तुझ में अभी इतना बल नहीं है। जैसे कोई बीमार है, काम नहीं कर पा रहा, तो दवा और भोजन का सहारा लेता है, ठीक होकर फिर काम करने लगता है, बल आ जाता है; वैसे ही सत्संग का सहारा ले, धीरे-धीरे बल आएगा और धीरे-धीरे तू उम्मीद से अपने आप को छुड़ा लेगा।

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गुरु जी, आपने कहा शब्द पकड़ो, शब्द वहां तक ले जाएगा — पर शब्द जहां से आएगा वहीं तक ले जाएगा ना? शब्द बुद्धि के तल से, मन के तल से निकल रहा है, तो क्या वह उस निराकार तक ले जाएगा जहां कोई शब्द है ही नहीं?

आत्मा से निकल रहा है तो तुम्हें आखिर तक लेकर जाएगा — कहां तक? तुम तक; और तुम्हारे बाद शब्द खत्म, क्योंकि शब्द किसी और के लिए है। ये शब्द इसलिए निकल रहे हैं कि आप इस संसार से कैसे छूट जाओ; जैसे ही ये शब्द तुम्हें छुड़ा देंगे, ये शब्द खत्म। फिर तुम स्वयं के द्वारा उस परम सत्ता तक पहुंचोगे — धारणा, ध्यान, समाधि। ये शब्द बुद्धि ग्रहण कर रही है; इंद्रियों द्वारा, बुद्धि से समझ रहे हो, और बुद्धि द्वारा अपने आप को बाहर से छुड़ाओगे जहां फंसे हो; फिर बुद्धि का काम खत्म, आप स्व में स्थिर हो गए। स्वयं में स्थिर होने के बाद उस परम सत्ता की यात्रा शुरू होती है — बूंद जान ले कि मैं पानी हूं, उसके बाद यात्रा शुरू। अभी तो हम छूटने की यात्रा कर रहे हैं; जब अपने आप को निकाल लेंगे और स्व में स्थिर हो जाएंगे, फिर प्रयास खत्म, अपने आप यात्रा होगी। प्रयास तभी तक करना पड़ेगा जब तक आप बाहर से छूटे नहीं।

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गुरु जी, ममता को कैसे रोकें — मोह से कैसे बाहर निकलें?

उससे कुछ मिल रहा है, वो लेना छोड़ दे। मोह हमें किससे होता है? जिससे हमें कुछ मिलता है — चाहे शब्द द्वारा, दृश्य द्वारा, गंध द्वारा, रस द्वारा, स्पर्श द्वारा; पांच इंद्रियों द्वारा मुझे कुछ मिलता है, उसके प्रति मोह हो जाता है। ये पांचों पहले मुझे मां से मिलते हैं — स्तनपान, स्पर्श, आवाज, सुगंध, रूप — इसलिए बचपन में मां को हम नहीं छोड़ते। जवानी आई तो पत्नी से मिलता है, पत्नी को पति से; फिर अपने पुत्र से पांचों मिलते हैं — अपना बच्चा संडास भी कर दे तो गंदा नहीं लगता, दूसरे का करे तो नाक दबाएंगे। भोजन में चार मिलते हैं, बाकी में तीन, दो, एक। तो जीव सबसे ज्यादा तीन जगह फंसा है — मां, पत्नी, बच्चे। मुझे कुछ मिलता है, उस मिलने से उससे मोह है, ना कि सीधा उससे मोह है — लालच की वजह से। तो मिलने की इच्छा छोड़ दो तो मोह, मान, ममता खत्म; जब तक मिलने की इच्छा है तब तक आप उसे छोड़ ही नहीं सकते। और ये शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श शरीर तक है — तो समझ के उसको छोड़ो कि भाई अब कुछ नहीं चाहिए, अब तो मेरी बारी आ गई।

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महाराज, बीवी कहती है रोज मंदिर जाओ, पूजा-पाठ करो — वो धक्का देकर भेजती है, पर मेरा मन जाने का नहीं करता। क्या मंदिर न जाने से पाप लगेगा?

तू डर के नाते जा रहा है; ऐसा नहीं कि तू उसका बहुत सम्मान कर रहा है — डर है। ये डर क्यों है? क्योंकि तू कमजोर है; कर्म अच्छे होते तो ताकत होती ना। निठल्ला मत हो, निठल्लों को कोई नहीं पूछता। पहले ताकतवर बन। तुम मंदिर जाओ या ना जाओ, उससे कुछ नहीं होगा — तू क्या कर रहा है, उससे परिणाम आएगा। मंदिर जाना, ना जाना वो तेरी जरूरत है।

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गुरु जी, आप कहते हो अपने तरीके से कुछ करोगे तो द्वेष आएगा — इसका क्या मतलब? अगर कोई हमारे तरीके से काम न करे तो भी तो द्वेष आएगा ना?

जब मैं कोई भी काम कर रहा हूं तो किसी के द्वारा ही कर रहा हूं, अकेले तो कर नहीं सकता; मेरे अपोजिट में कोई है। तो काम को काम के तरीके से करो — ना मेरा तरीका, ना उसका तरीका — तो राग-द्वेष नहीं होगा। अपने तरीके से करोगे तो भी राग-द्वेष होगा, उसके तरीके से करोगे तो भी। दबाव-संकोच पर काम मत करो। आपको कोई भी काम मिला है, आपने कोई काम लिया है, तो काम को काम के तरीके से करो, तो राग-द्वेष नहीं होगा, बंधन नहीं होगा, वही मुक्ति का मार्ग बन जाएगा; और पूरी ईमानदारी से करो, उसमें कुछ मिलावट मत करो। हर कार्य का खुद का तरीका होता है।

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गुरु जी, आप कहते हो सब कुछ हो रहा है — जब सब कुछ हो रहा है तो हम किससे लड़ें और क्यों लड़ें?

क्या सब कुछ होने में मैं हूं — मुझे ये देखना है। तब तो लड़ाई की बात ही नहीं, तब तो आप मुक्त हो, मोक्ष की स्थिति में हो। मैं होने में हूं नहीं, क्योंकि हर काम को मैंने जबरदस्ती प्लानिंग से किया; मेरी अंतरात्मा ने कहा बेईमानी मत कर, लेकिन मैंने बेईमानी से किया। सब कुछ तो अपने आप होता है — भूख अपने आप लगती है, घंटी थोड़ी बजानी पड़ती है। भोजन हमें शरीर के लिए ग्रहण करना है, लेकिन हम ग्रहण करते हैं स्वाद के लिए; और एक जैसा स्वाद कभी बन नहीं सकता — तो आप भोजन में नहीं, अपने तरीके के स्वाद में फंसे हो। कपड़ा तन ढकने के लिए चाहिए, पर हमें कपड़ा लोगों को नीचा दिखाने के लिए चाहिए — कर्म से बड़े बनो, कपड़ों से नहीं। तो मुझे होने में होना है: भोजन करना है तो ध्यान रखना है कि मुझे इससे पोषण चाहिए, ना कि स्वाद; हां, अगर मेरे शरीर को नुकसान करेगा तब नहीं करेंगे। पहले देखो आप होने में हो क्या।

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गुरु जी, आप कहते हो कोई आपके साथ गलत करे तो उसे जवाब दो — पर जब सब हो रहा है तो हम उसे होने क्यों न दें?

अगर मेरे साथ कोई गलत कर रहा है तो मुझे इतना पता चल गया कि वो होने में नहीं है, वो कर रहा है — और गलत काम कर रहा है। मेरे साथ तो कर ही रहा है, तो मुझे उसे जवाब इसलिए देना है कि वो औरों के साथ ना करे। चाहे मैं रहूं चाहे कोई और, अगर वो होने में नहीं है तो उसे रोकना चाहिए।

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गुरु जी, कहते हैं गुरु को मनाना मुश्किल है और भगवान को मनाना आसान — क्या गुरु को मान की इच्छा ज्यादा होती है?

ना तो गुरु को मनाना आसान है, ना भगवान को। यहां कर्म से लोग आप पर प्रसन्न होते हैं। अगर आपका कर्म ही गंदा है तो आप खुद से नफरत करते हो, किसी को बता नहीं पाते। कोई व्यक्ति गंदा कर्म करे और आपको मनाए तो आप मानोगे? लेकिन कोई सत्कर्म करे तो उसके कर्म को देखकर आप उसका साथ दे दोगे। तो यहां कर्म से कोई मानता है — चाहे गुरु हो, चाहे भगवान। मूल आपका कर्म है।

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गुरु जी, आप कहते हो किसी से उम्मीद नहीं रखनी, लेकिन यह भी कहते हो कि हम एक-दूसरे के पूरक हैं — दोनों बातें अलग-अलग लगती हैं।

योग्यता से ज्यादा की उम्मीद मत रखो। हम एक-दूसरे के पूरक हैं — कहने का मतलब, मैं आपसे कुछ लेने आया हूं, लेकिन उसके बदले कुछ दूंगा, तो दबाव नहीं होता; लेकिन आप लेने गए हो और देने के लिए कुछ नहीं है, तब आप उसके दबाव में आ जाओगे। अगर आपको कुछ चाहिए तो आप उसका पे करो — मुझे आपसे ये चाहिए, मैं आपको ये दूंगा; आपकी जरूरत मेरे पास है, मेरी जरूरत आपके पास है।

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गुरु जी, जैसे हम कहीं जॉब करते हैं तो लगता है कि हम उनका काम कर रहे हैं, तो समय आने पर वो भी हमारा काम करेंगे — क्या यह ठीक है?

आप जहां भी काम कर रहे हो, जिस पोस्ट पर हो, जिस पद पर हो, वो उस पद का काम है — ना तो उसका काम है, ना तुम्हारा। भले वो मालिक है, लेकिन उसको भी किसी को जवाब देना है; यहां काम व्यक्तिगत किसी का नहीं है, यहां सब जरूरत के काम कर रहे हैं। तो काम को काम के तरीके से करो। अगर मालिक भी आ जाए तो भी काम के तरीके से करो, मालिक के सामने भी खड़े हो जाओ — क्योंकि मालिक भी कभी-कभी कहता है बेईमानी करो; बोलो हम बेईमानी नहीं करेंगे, हम काम को काम के तरीके से करेंगे, ना कि आपके तरीके से, ना अपने तरीके से। यहां हर पद का काम है, सिस्टम है — तो सिस्टम में चलो।

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गुरु जी, रामचंद्र जी ने सुग्रीव का साथ दिया था — तो उन्होंने भी तो उम्मीद की थी ना कि अब तुम लंका के लिए मेरा साथ देना?

राम ने इसलिए साथ दिया कि तुम मेरा साथ दोगे — राम को उनकी जरूरत थी, और बाली को मार सकें इतनी क्षमता राम में थी। सुग्रीव ने ऐसे थोड़ी विश्वास कर लिया; पहले परीक्षा ली कि जो ताकत तुम बता रहे हो वो तुम में है कि नहीं — राम ने अपनी ताकत सिद्ध की, तब सुग्रीव को विश्वास आया। राम ने कहा मैं तुम्हें राजा इसलिए बना रहा हूं कि मुझे भी तुम्हारी जरूरत है। राज्य मिलने के बाद सुग्रीव मौज-मस्ती में भटक गए, तब राम कहते हैं लक्ष्मण जाओ उसे समझाओ, नहीं तो मैं दिला सकता हूं तो छीन भी सकता हूं। यहां सब एक-दूसरे को यूज़ कर रहे हैं — यूज़ करो, लेकिन सदुपयोग में, दुरुपयोग में नहीं। और राम ने बाली को मारा क्योंकि बाली गलत था — सही का साथ दो।

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गुरु जी, आपने कहा था कमल कीचड़ में खिलता है और यह संसार कीचड़ है — यह मुझे समझ नहीं आया।

कीचड़ का मतलब गंदगी — आप देखोगे तो हर जगह ज्यादा से ज्यादा बुराइयां ही दिख रही हैं। तो मुझे अपने आप को उस लायक बनाना है जैसे नर्मदा जी, गंगा जी हो गईं — इनमें गटर भी बह रहा है, सब गंदा बह रहा है, लेकिन इस पानी में कीड़े नहीं पड़ते। मुझे इसी गंदगी में कर्म भी करना है, क्योंकि मैं इसी में फंसी हूं, तो इसी में कर्म करके निकलूंगी — मुझ पर किसी का प्रभाव ना पड़े, ना अच्छे का ना बुरे का। सबका उपयोग करके आगे बढ़ जाना है: फूल की जगह फूल का उपयोग करो, कांटे की जगह कांटे का — कांटा धंसा है तो कांटा ही कांटे को निकालेगा, फूल नहीं। उपयोग करो, निकल जाओ — यही दुनिया है।

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गुरु जी, अकेले में बोरियत होती है — क्या करें?

इसलिए कि आपने अपने लिए कुछ किया ही नहीं; आपके पास अपने लिए कुछ है नहीं। जब से आप समझने लायक हुए, आपने शरीर को ही महत्व दिया — हर समय कुछ खाते रहते हो, सुनते रहते हो, देखते रहते हो; सबसे ज्यादा आंखों का, फिर कानों का, फिर मुंह का उपयोग करते हैं। तो जब शरीर की सुविधा नहीं मिलती, पांच इंद्रियों को रस नहीं मिलता, तब आप बोरियत महसूस करते हो। अकेले में बोरियत हो रही है, इसका मतलब आपने जीवन में शरीर को ज्यादा महत्व दिया।

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गुरु जी, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए — तो फिर हम अपने हक के लिए क्यों लड़ें?

कुछ नहीं चाहिए — लेकिन क्या नहीं चाहिए? जरूरत के लिए तो चाहिए ना; पशु-पक्षी जरूरत में जीते हैं। कुछ नहीं चाहिए मतलब — जितनी हमें जरूरत नहीं उससे ज्यादा हमने इकट्ठा कर लिया है और उसे मेंटेन करने में परेशान हैं, वो नहीं चाहिए। घर में देखना — बर्तन, कपड़े जरूरत से ज्यादा होंगे और उसी में आप परेशान हो। जितने में मैं जी सकूं उतना ही मुझे चाहिए; तब आप अपने आप को समय दे पाओगे। मेहमान आते ही कपड़े बदलने लगते हो — आपके दो चेहरे हो गए, अपने लिए अलग, समाज के लिए अलग। प्रत्यक्ष में आ जाओ; आवरण को मत बदलो, आवरण का उपयोग करो जरूरत में। इस शरीर को हटा, बता तुझे क्या चाहिए? तू देखेगी तो तुझे कुछ नहीं चाहिए — और कुछ नहीं परमानंद है। इन वस्तुओं के लिए तू कितना गिड़गिड़ाई — मां-बाप, पति, बच्चों, दुकानदार के सामने; अब अपने लिए गिड़गिड़ा, उस परम सत्ता से प्रार्थना कर कि मेरे कल्याण के लिए मुझे क्या करना है — अकेले में उसके लिए आंसू आने चाहिए। रात को सोते समय तू सस्ता कपड़ा पहनकर चैन से सो जाती है; जरूरत से ज्यादा जैसे ही रहा, उसे संभालने में ही जिंदगी नरक हो जाती है। कोई किसी को कभी पूरी तरह खुश नहीं कर सकता — तो यह बनावटी जिंदगी छोड़ो, शरीर को जितनी जरूरत है उतना दो, तब मुक्ति और मोक्ष के रास्ते पर चल पड़ोगे।

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गुरु जी, जीवन में सत्संग भी है, ईमानदारी भी है और आत्मचिंतन भी — इसके अलावा कोई और तप भी करना पड़ेगा, तब उपलब्धि होगी?

तूने ईमानदारी भी पकड़ी, सत्संग भी पकड़ा, आत्मचिंतन भी — लेकिन सत्कर्म को पकड़ा ही नहीं। पहले वो पकड़, कुछ दिन कर, फिर मिल। ये पकड़ेगी तो पक्का होगा, उपलब्धि इसी जन्म में हो जाएगी; जब वाल्मीकि जैसे, अंगुलिमाल जैसे, कालिदास जैसे महामूर्ख को हो सकता है तो तुझे क्यों नहीं होगा? जरूरतमंद की सेवा करना ही तो तप है — अगर हम किसी गिरे हुए जरूरतमंद को उठा रहे हैं, उसे ले जाने में थक जाते हैं, तो उसमें शरीर का बल खर्च हो रहा है, यही तपस्या है। जैसे बीज में वृक्ष छिपा है, फूल में सुगंध छिपी है — तोड़ोगे तो कुछ नहीं मिलेगा — वैसे ही ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग में तप छिपा हुआ है। ये तीन करेगी तो तप हो जाएगा, तप अलग से करना नहीं पड़ता।

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गुरु जी, मैं सोचती हूं यह घर छोड़कर कुटिया चली जाऊं और वहां सत्संग-सेवा करूं; पर वहां अपनी मेहनत का नहीं, दूसरों के दिए अन्न का खाऊंगी और पैरों तले जीव भी मरते हैं — क्या इससे मेरा बंधन बनेगा? आत्म-कल्याण के लिए घर पर रहूं या कुटिया जाऊं?

"अपने घर चल" कहने का मतलब मैं कुटिया के लिए नहीं बोलता, मैं तेरे उस घर की बात करता हूं जहां से तू आई। तू चाहे इस घर में रहकर साधना कर, चाहे वहां। वहां व्यवस्था सत्य के खोजियों के लिए है, और वहां भी बहुत काम है — पेड़ों को पानी देना; अगर पेड़ को पानी दे रही है और भोजन कर रही है तो उसकी भरपाई कर दी ना तूने। जितना खा रहे हो वो प्रकृति करवा लेगी आपसे। कुटिया में रहेगी तो 24 घंटे साधना होगी; घर की रस्सी में साधना करेगी तो 24 घंटे थोड़ी होगी। तो देख ले तुझे कितना जल्दी जाना है — घर में व्यवस्था हो तो घर पर रह; कुटिया में निशुल्क आजीवन व्यवस्था है, वहां लगता है तो वहां चली जा।

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गुरु जी, मैंने गुरु बनाया, उनका स्वरूप घर में रखकर पूजा भी करती हूं, लेकिन पूरा भरोसा नहीं होता — बाहर जाती हूं तो ताला लगाकर जाती हूं, यानी भरोसा ताले पर है। गुरु पर भरोसा कैसे जमे?

वो तो तस्वीर है ना। गुरु शब्द है, गुरु रूप नहीं — शब्दों से कल्याण होगा, रूप से नहीं। तस्वीर क्या करेगी? तस्वीर तो एक प्रतीक है उसको याद करने का; उसको याद करते हैं तो उसकी वाणी याद होती है, और उस वाणी पर हम चल पाते हैं।

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गुरु जी, जरूरतमंद का पता कैसे चले? आज समाज में कोई किसी नाम पर, कोई शादी-ब्याह के नाम पर मांग रहा है — कैसे पता हो कि इसे सच में जरूरत है?

आप पता करके दो ना — पता करना आपका काम है। जरूरत भोजन की भी है, कपड़े की, मकान की, दवा की भी; शरीर अपनी पूर्ति अपने आप करने के लिए मिला है — अगर वो कर लेता है तो ठीक, नहीं कर पा रहा तभी तो मांग रहा है; और मेहनत कर ही नहीं रहा, तो देख लो। जरूरत का मतलब है कि आपको लगे कि इसे जरूरत है, तब करना; दुनिया में किसी का पूरा तो कोई नहीं कर सकता, तो जांचकर देखना आपका काम है। एक महाराज जी ने माचिस मांगने वाले को फट से दे दी; हमने पूछा इसका क्या करोगे, बोला खेत में आग लगाऊंगा — तो हमने माचिस वापस ली, कहा अपने घर से ले आ, क्योंकि उस आग से हजारों-लाखों जीव मरेंगे। जब आप किसी को ताकत दे रहे हो तो पूछ लो; अगर वो सदुपयोग बताकर दुरुपयोग कर रहा है तो उसका परिणाम वो भोगेगा। कोई जांच की मशीन तो है नहीं — जितना पता कर सकते हो, देने से पहले पता कर लो; लग रहा है देने लायक है तो दो, नहीं है तो मत दो — अपनी समझ से फैसला लो।

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गुरु जी, आप कहते हो सत्कर्म करो — तो किसका सत्कर्म करें, किसकी सेवा करें, किसको दें, किसको न दें?

सेवा तो आप ऐसे किसी की भी कर सकते हो, लेकिन सत्कर्म का मौका प्रकृति देगी। जब आपके सामने कोई जरूरतमंद आ जाए — भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, तन के लिए कपड़ा और दवा — जब ऐसा मौका मिल जाए तब करो। सत्कर्म प्लानिंग से नहीं कर सकते; जब वो आपके सामने आएगा, आपको फीलिंग हो, आप समझ पाओ, तब करो।

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गुरु जी, हमारे पहले गुरु जी कहते थे कि गुरु के पास पूरी ताकत है, वो बड़ी से बड़ी बला (सूली को सूई पर) टाल देते हैं; पर आपका ज्ञान कहता है कि आपके सत्कर्म ही बला टालेंगे, गुरु नहीं — इसमें सच क्या है?

गुरु शब्द है, शरीर नहीं। गुरु कुछ करने के लिए बता रहा है; आपने शब्दों के द्वारा समझा और सत्कर्म किया, तो वो सत्कर्म ही बला को हटाएगा। ठेठ भाषा में आप कहोगे गुरु ने ही मेरी बला टाली — तो गुरु शब्द ही है ना। सत्कर्म आपके द्वारा हुआ, लेकिन सत्कर्म करने की प्रेरणा कहां से मिली? शब्द से, गुरु से। मेन आपका कर्म है, पर क्या करूं ये कोई और बताएगा। अगर आपने शब्द को छोड़ दिया तो गुरु भी कुछ नहीं करेगा। जैसे सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट दे दी कि पहन लेना, गोली लगेगी नहीं — लेकिन समय आने पर आपने उसे उतार दिया तो गोली लगेगी ही। गुरु ने शब्द दिया है, उस शब्द में जियो, तब खतरा नहीं आएगा।

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गुरु जी, मैं पुलिस विभाग से चार महीने पहले रिटायर हुआ हूं, बच्चे सेट हैं, पारिवारिक जिम्मेदारियों से फ्री हूं — अब मुझे किस तरफ चलना चाहिए? मार्गदर्शन दीजिए।

मुक्ति-मोक्ष के लिए आपके लिए सबसे अच्छा है पूरी तरह कुटिया, क्योंकि आपकी यहां की जिम्मेदारी खत्म हो गई है। वहां 24 घंटे साधना होगी; यहां कितनी करोगे — दो, चार, आठ घंटे, फिर फंसोगे। वहां का नियम ऐसा है कि व्यावहारिक बातें नहीं कर सकते, मोबाइल स्विच ऑफ, कोई किसी का नाम-पता नहीं पूछता — तो वहां फंसोगे नहीं, तेजी से यात्रा होगी। हर गृहस्थ को मेरा यही कहना है कि 11 महीने परिवार को दो, एक महीना अपने आप को दो — जहां भी एकांत मिले, व्यवहारिक बातें ना हों, मोबाइल बंद, और ईमानदारी का भोजन, ईमानदारी की व्यवस्था हो। आपका पुलिस वाला रुतबा अभी गया नहीं — वहां आकर रहो, सब खत्म हो जाएगा; या तो भाग जाओगे या सध जाओगे, क्योंकि अपनों की कुटिया में बैकग्राउंड काम नहीं करता, सबके लिए एक व्यवस्था है। जब समझ आएगा कि यही रुतबा मुझे गिरा रहा है, पुलिस का तो काम मिला था, वो खत्म हो गया, अब मैं एक सामान्य व्यक्ति हूं — तब वो चला जाएगा; बस वहां से भागना मत। वहां का कोई मालिक नहीं, यहां तक कि मुझसे भी मतलब नहीं — वहां शब्द है और नियम; कुटिया पूरी आग है। अपने लिए जीना चालू करो, शरीर को उतना दो जितने में चल सके। मैंने आत्मिक कल्याण की पूरी व्यवस्था कर दी है — ज्ञान, रहना, भोजन, पूरी पवित्रता के साथ; कोई भी जीव इसी जन्म में अपना आत्मिक कल्याण चाहे तो इसी जन्म में होगा। 100 नहीं, 101 प्रतिशत लग जाओ, कसर मत छोड़ो — आप लग गए तो दुनिया की कोई ताकत आपका आत्मिक कल्याण होने से रोक नहीं सकती।

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गुरु जी, पहले हम मानते थे कि ज्ञान की सेवा सबसे बड़ी है; फिर आपसे सुना "बिना दया के ज्ञान कसाई", तो सेवा-भंडारा करने लगे; भंडारे के बारे में लिखा तो आपने कहा ज्ञान का भंडारा करो — अब मैं कंफ्यूज हूं, क्या करूं?

मेरा कहना था कि जब गोयल जी ने सत्संग कराया तो तुम्हें लाभ हुआ; तो तू सत्संग ही करवा देता तो कई और लोगों को लाभ मिलता — जैसे आज इन्होंने सत्संग कराया तो अनेकों लोग लाभ ले रहे हैं। आप भोजन कराओ, लेकिन जरूरतमंद हो; और उसके साथ देखिए आप और क्या-क्या कर सकते हो, वो भी करो — आपकी क्षमता उसकी भी है, इसकी भी, तो इसके लिए क्यों नहीं सोच रहे? शब्दों से जुड़ो, किसी शरीर से ना जुड़ो; गुरु ज्ञान का प्रतीक है, ज्ञान लो, आगे बढ़ो — ज्ञान कभी धोखा नहीं देता, ज्ञान से ही आपका कल्याण होगा, रूप-रंग-आवरण से नहीं। अपनी पूरी क्षमता लगा दो। किसी को भोजन कराया और उसे बिस्तर की जरूरत है तो बिस्तर भी दो — ऐसा ना हो कि हम तो भोजन ही कराएंगे। देखिए सामने जरूरत क्या है, सूझबूझ के साथ चलना होगा।

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गुरु जी, कुटिया के निर्माण में मैं कुछ-कुछ करता रहता हूं, लेकिन सच कहूं तो थोड़ा शैडो में, छिपकर करना चाहता हूं — खुले में नहीं। क्या यह ठीक है?

जहां से भी करो, करने का परिणाम आएगा। आप किसी को दिखाकर बीज लगा रहे हो तो भी परिणाम वही आएगा, आप छिपकर लगाकर चले गए, किसी को नहीं पता, तो भी परिणाम वही आएगा। तो आप चाहे जैसे करो, लेकिन करो — करने से परिणाम आएगा।

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गुरु जी, आपने कहा था ध्यान करना नहीं है, ध्यान से मुक्त होना है — पर जो चीज पूरी नहीं हुई, ध्यान तो बार-बार उधर ही जाएगा ना?

जहां ध्यान बार-बार जा रहा है तो देखो क्यों जा रहा है, और उस काम को पूरा करो। जैसे भूख लगी तो ध्यान बार-बार भूख पर जाएगा; भूख मिटा, तब ध्यान वहां जाएगा क्या? जो काम पूरा नहीं हो रहा, ध्यान वहीं जा रहा है — उस काम को कर दे; या नहीं हो रहा है तो समझ ले कि आपकी क्षमता नहीं है — उस काम को करके हट जा या समझ के हट जा। ध्यान से भी मुक्त होना है, तब जाकर परम ध्यान घटित होगा। ये बनावटी ध्यान छोड़ो, हर काम को ध्यान से करो, ताकि आप वहां से हट जाओ; क्योंकि जब तक नहीं करोगे ध्यान वहीं जाएगा और आपको डिस्टर्ब करेगा। कारण से ही ध्यान जा रहा है, ऐसे तो जाएगा नहीं — कारण देख लो।

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गुरु जी, मैं समझा हूं कि बीज में वृक्ष की तरह मेरा कल्याण भी ईमानदारी (100%), सत्कर्म और सत्संग से शुरू होगा, फिर ध्यान और समाधि घटित होंगे — तो धारणा-ध्यान-समाधि कैसे होती है, और सत्य और शिव की स्थिति अलग है या एक?

एक ही स्थिति है — सत्य में हो गए, अपने आप में स्थिर हो गए, वही आत्मज्ञान; दोनों एक ही हैं, और वहां से आपकी यात्रा शुरू होती है। धारणा बनानी है — जैसे एक मादा गर्भ को धारण करती है; जब तक धारण नहीं करती, तब तक किसी और की जरूरत है, आप उसे गुरु भी कह सकते हो। एक बार गर्भ धारण कर लिया, फिर उसे उचित तरीके से जीना है, और वो अपने आप मां बनने के करीब जाती है; जब पीड़ा होती है तो ऐसी स्थिति कि उसे कुछ पता नहीं — वो समाधि की स्थिति है, और कुछ समय बाद वो मां बन जाती है। वैसे ही साधक को धारणा बनानी है निर्विकार होने की; अगर निर्विकार होने की धारणा पक्की बना ली, तो अपने आप काम होने लगेगा, अपने आप ध्यान घटित हो जाएगा, फिर समाधि की स्थिति अपने आप आएगी। "धारणा, ध्यान, समाधि, तुम, ब्रह्म" — तुम्हारे द्वारा जो जाना जाएगा वो ब्रह्म; किसी और के द्वारा ब्रह्म को नहीं जाना जा सकता, वो परमात्मा स्वयं के द्वारा ही जाना जा सकता है।

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गुरु जी, आत्मज्ञान तक पहुंचने के बाद क्या मैं उसे (परमात्मा को) जान सकता हूं, या वह मुझे जानने का रास्ता देगा?

दोनों बातें एक ही हैं। जब आप जानने लायक हुए तो वो अपने आप को जनवाने लगता है। जैसे मादा के गर्भ से बच्चे का जन्म होता है — आप ये कह सकते हो कि मां पहले बनी, बाप बाद में? नहीं; दोनों घटना एक ही है, दुनिया के लिए मां अलग है, बाप अलग, पर बच्चे के लिए मां-बाप एक ही हैं। वैसे ही वो मुझे जनवाए, मैं उसे जानूं — ये दोनों अलग नहीं। आप बस वहां पहुंचो, उसमें अंतर भी नहीं है।

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गुरु जी, देर से समझ आया कि यह कर्म भूमि है और पिता-पुत्र, भाई-बहन, रिश्तेदार — हम सब एक-दूसरे का उपयोग कर रहे हैं; मैं उपयोग कर रहा हूं तो मेरा भी उपयोग होना है। क्या यही हमारा संबंध है?

ये सृष्टि ही ऐसी है। उपयोग तो हर व्यक्ति हर व्यक्ति का कर रहा है और करना ही पड़ेगा — उपयोग में सदुपयोग करो, बस। आप शरीर को भोजन ना दो तो शरीर शरीर को खाने लगेगा — एक हफ्ते भोजन ना करो, जिस शरीर के लिए आप भोजन कर रहे थे वही शरीर शरीर को खा जाएगा। यहां सब एक-दूसरे का उपयोग करते हैं; आप सांस ले रहे हो तो पेड़ का उपयोग कर रहे हो — ऐसा हो ही नहीं सकता कि उपयोग ना करो। तो उपयोग में सदुपयोग हो जाए — सदुपयोग करोगे तो निकलोगे, दुरुपयोग करोगे तो फंस जाओगे।

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गुरु जी, कहते हैं नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक ऊर्जा होती है, पर मैं सोचता हूं ऊर्जा तो सिर्फ ऊर्जा है, सात्विक — और जो ऊर्जा मुझे मिली है उसका आधार मेरे कर्म हैं। क्या ऐसा समझूं?

हां, आपके कर्मों से वो पॉजिटिव-नेगेटिव बनती है। जैसे जहर — किसी को विषैले जानवर ने काटा, उसे जहर दिया जाता है और वो ठीक हो जाता है, उसके लिए पॉजिटिव है; पर जिसे नहीं काटा उसे वो जहर दे दो तो नेगेटिव — जहर तो सिर्फ जहर था, आपने कहां और कैसे उपयोग किया। ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा है, पूरा ब्रह्मांड ऊर्जा में है — आप इसमें से कितनी ऊर्जा लेते हो और कहां उपयोग करते हो, यह महत्वपूर्ण है, और उससे ऊर्जा बढ़कर लौटती है। दो आदमी दिन भर कमाए — एक ने जाकर शराब पी ली, उसकी ऊर्जा खत्म, शरीर का नुकसान, सामाजिक स्तर भी गिरा; दूसरे ने राशन लिया, परिवार का भरण-पोषण किया — एक ने ऊर्जा से ऊर्जा बढ़ाई, एक ने अपने आप को गिराया। जैसा बीज लगाओगे वैसा कई गुना फल मिलेगा। ऊर्जा नमक की तरह, पानी की तरह सबमें घुल जाती है — ऊर्जा सात्विक होती है; आपने जैसा उपयोग किया, राजसी या तामसी, उस तरीके से कई गुना रिटर्न मिलता है।

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गुरु जी, संसार में किसी पद पर रहते हुए कर्मचारियों से काम लेना पड़ता है, समझाना-कहना पड़ता है — इसमें राग-द्वेष बनता है और वहां से बददुआ भी आती है; इसके लिए मार्गदर्शन करें।

अपने तरीके से मत करो, काम को काम के तरीके से करो; जिस पद को लिया है, उस पद का कार्य करो। कुछ समझाना चाहो तो उस पद के दायरे को लेकर समझाओ — सीनियर हो तो सीनियर बनकर कहो कि ये आपको करना पड़ेगा, जूनियर हो और सीनियर कुछ गड़बड़ कर रहा है तो मानवता के नाते धीरे से सलाह दो, जबरदस्ती मत करो; माने या ना माने, राग-द्वेष नहीं होना चाहिए। आगे गड्ढा है, मैंने बताया, वो नहीं माना और गिर गया, अब निकालने को चिल्ला रहा है — तो मानवता कभी मत छोड़ो, उसे निकालो। समझने के लिए बोलो, समझाने के लिए नहीं; समझाना मतलब आप दबा रहे हो, टॉर्चर कर रहे हो, पद का दुरुपयोग कर रहे हो। आप किसी को समझने के लिए बोल सकते हो, समझा कभी नहीं सकते — समझने की क्षमता उसके पास है या नहीं, वो तय करेगा, तुम नहीं। पहले शिक्षक मारते थे, बच्चे डर से कह देते "सब समझ आ गया", डिप्रेशन में चले जाते — आपने उस पद का काम ईमानदारी से नहीं किया। जितने महात्मा हुए, समझे, उन्होंने अपने मां-बाप को भी जबरदस्ती नहीं समझाया; बुद्ध ने बात रखी, जिसने समझा उसका उद्धार हुआ। जैसे जानवरों में नस्ल होती है — देसी गाय को कितना भी खिलाओ, 20 लीटर दूध नहीं देगी — वैसे मनुष्यों में भी क्षमता अलग-अलग है; काश हम मानव की नस्ल समझ जाते तो राग-द्वेष नहीं होता। पत्नी से कहते हो तू मुझे समझ — उसकी यात्रा भोग की है, तेरी योग की; तुम उसका साथ दोगे तो भ्रष्ट हो जाओगे, वो तुम्हारा साथ देगी तो घुटन में चली जाएगी। सब अपनी-अपनी यात्रा कर रहे हैं — किसी को जबरदस्ती साथ लेकर मत चलो, कोई साथ आता है तो सहयोग है; नस्ल को पहचानो।

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गुरु जी, कमरे में बैठकर आपका सत्संग सुनता हूं और कोई बीच में बोल पड़े या आपकी बात में टोक दे तो गुस्सा आता है — ये गुस्सा कहां से आता है?

गुस्सा इसलिए आता है कि मैं नहीं चाहता था कि वो टोके और मुझे सुनने में बाधा हुई। तो आप ऐसी जगह सुनो जहां कोई टोक ना पाए — ऐसी अपने लिए व्यवस्था करो। और लय टूटने की बात — जैसे तू गाड़ी चला रहा है और अचानक कुछ सामने आ जाए तो स्पीड कम हो जाती है और उस स्पीड पर दोबारा आने में देर लगती है; वैसे ही ये रटा हुआ ज्ञान नहीं है, आत्मा से निकल रहा होता है, झटके से रोक दो तो मुझे भी नहीं पता चलता कि मैं कहां था, फिर लय बनाना पड़ता है।

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योगी जी, आपने कहा था आत्मज्ञान के लिए ईमानदारी और सत्कर्म दोनों जरूरी हैं और ये दो अलग चीजें हैं — पर सत्कर्म के अंदर तो ईमानदारी होनी ही चाहिए ना? फिर आप दोनों को अलग-अलग क्यों बताते हैं?

ईमानदारी आपके कर्म में है — आप कुछ भी करते हो उसमें ईमानदारी है। आप अपने लिए या अपने परिवार के लिए भोजन-व्यवस्था लाते हो, वो ईमानदारी से ला रहे हो कि बेईमानी से — वो कर्म है, सत्कर्म नहीं। सत्कर्म तब है जब आप जरूरतमंद की सेवा करते हो, और सत्कर्म से आपका उद्धार होगा, क्योंकि सत्कर्म "मेरा" में नहीं होता, "तेरा" में होता है — जब आप सत्कर्म करते हो तो आपको ये भी नहीं पता कि सामने वाला कौन है। तो अगर आप ईमानदारी कर रहे हो, सत्कर्म नहीं कर रहे हो, तो भी उद्धार संभव नहीं; क्योंकि ईमानदारी अपना ली तो आगे बंधन बंधना बंद हो गया, लेकिन पिछला जितना कचरा है वो कैसे जाएगा? सत्कर्म से। जैसे मशीन बिगड़ गई — बिगड़ने वाली जगह तो खोज ली, पर उसका सामान लाने के लिए मूल्य तो लगेगा ना; वैसे ही सत्कर्म में आपको धन, या तन, या अपनी समझ खर्च करनी पड़ेगी — बिना खर्च किए सत्कर्म नहीं होगा। सत्कर्म तो पापियों के द्वारा भी हो जाता है — पापी से रास्ता पूछो तो टेढ़े तरीके से बताता है, पर सत्कर्म उसके द्वारा भी हुआ; प्रकृति सत्कर्म का मौका दे ही देती है, सत्कर्म से ही तो कुछ बचे हो आप। लेकिन पूरी तरह निकलना चाहते हो, आत्मिक कल्याण चाहते हो, तो दोनों चाहिए।

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गुरु जी, मुझे कहां होना चाहिए? और यह कैसे पता चले कि मैं अभी कहां हूं?

पहले आप जहां हो वहां से अपने आप को छुड़ाओ। कैसे पता चले कि मैं कहां हूं? देखिए कि आपके जीवन में कहां से दुख है, कहां से सुख है, कहां से अशांति है, कहां से व्याकुलता, घुटन है — वहीं आप हो। और देखो वहां से खुश हो क्या — खुश हो तब तो निकल नहीं पाओगे, क्योंकि सुख में हम निकलते ही नहीं, जब दुख आएगा तभी पीछा छुड़ाना चाहेंगे। फिर देखो दुखी हूं तो क्यों हूं, उसका जिम्मेदार कौन — सामने वाला या मैं? जैसे एक रबड़ को खींचकर कहीं बांध दिया, तो वहां से छुड़ा दो तो वो अपने मूल में आ जाएगा। मैं इस शरीर के द्वारा कामनाओं-वासनाओं के चक्कर में अनेक पिंडों में, भिन्न-भिन्न रूपों में अपने आप को स्थापित कर दिया हूं — कहीं से शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श मिल रहा है; किसी की भाषा अच्छी लगती है, किसी को देखना। लेकिन मैं अभी भी अपने आप में हूं, वहां से हटा नहीं हूं। आपका किसी व्यक्ति से सीधा मोह नहीं हुआ — आपको कुछ चाहिए था, उसने दिया, आपकी योग्यता नहीं थी तो उससे मोह-आसक्ति हुई। आप उसे सीधा नहीं छोड़ सकते, क्योंकि आपने सीधा पकड़ा भी नहीं है; किसी कारणवश फंसे हो — वो कारण हटाओगे तो उसमें से निकल जाओगे। मैं अपनी जरूरत में गया, फिर मान की इच्छा, बड़ा बनने की इच्छा हो गई — ये इच्छाएं छोड़नी पड़ेंगी, तब आप उसे छोड़ पाओगे।

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गुरु जी, फिर भी — मुझे एक्चुअली कहां होना चाहिए? उदाहरण से समझाइए।

अगर मैं कह दूं कि आपको उस परम आनंद में होना चाहिए, तो इसका कोई मतलब नहीं है। पहले आप जहां हो वहां से हटाओ — हटाने में ही आप जहां होना है हो जाओगे; क्योंकि कहीं होना है तो कर्ता का भाव आ जाएगा — कहीं तो आपने अपने आप को किया ही, उसी से परेशान हो। अब कहां होना है इसके लिए काम ही नहीं करना है। जैसे पानी से बर्फ बना तो उसके पीछे कोई कारण है — उस कारण को हटा दो और सिर्फ इंतजार करो, तो बर्फ का नाश हो जाएगा, पानी मूल में आ जाएगा; पानी बनने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। अगर कारण ना हटाओ और बर्फ के टुकड़े-टुकड़े कर दो, पीस दो, तो भी वो पानी नहीं बनेगा। जैसे मिट्टी से घड़ा बनाया — उसे मिट्टी होने के लिए कुछ नहीं करना, बस घड़े को तोड़ दो; घड़ा टूटेगा नहीं तो मिट्टी में आएगा ही नहीं। आपने अपने आप को बनाया है, उसे तो बिगाड़ना पड़ेगा — छुड़ाने में आपका बनाया हुआ अस्तित्व तो मिटेगा; बिगड़ने का डर है तो कभी मूल में आ ही नहीं सकते। मूल में आने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। इस पर गहरा चिंतन करो, अध्ययन करो।

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गुरु जी, जब हम सब कुछ छोड़ देंगे, तो बाद में क्या करेंगे?

त्याग ही परम सुख है, परम आनंद। त्याग क्या? अपनी बुराइयों का त्याग करना है, अपनी बुरी आदतें छोड़नी हैं — हमें लोगों को नहीं छोड़ना है। लोगों से अपने तरीके से हमने जो उम्मीद बना रखी है, वो तरीका छोड़ना है; मान-सम्मान, बड़ा बनना, छोटा बनना, दिखावा — ये सब छोड़ना है। आप एक बात बताइए, अपने जीवन में बेईमानी के अलावा अलग क्या किया? ईमानदारी तो कर्म में अपने आप होती है, करने की जरूरत नहीं — बस यही छोड़ दो, यही आपका सब कुछ है। चार को हटा दो, आपका बनाया हुआ अस्तित्व मिट जाएगा — मान की इच्छा, दिखावा, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा, और योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा। छोटा बनने की इच्छा भी होती है — जब कोई आपसे छोटा व्यक्ति सही कहता है और आप सिद्ध नहीं कर पाते, तो कहते हो "चलो भैया तुम बड़े, मैं छोटा" — वहां भी छोटे के बहाने अपने को बड़ा बनाना चाहते हो। ये चारों आप छुप-छुप के करते हो, किसी से कह नहीं सकते — घर में भी नहीं बता सकते कि मैं मान के लिए जीता हूं, शर्म आएगी, क्योंकि चारों गंदे हैं। इन चार से ना आपको लाभ, ना समाज को — सिर्फ पीड़ा; घुटन, अशांति, पीड़ा, अज्ञानता का आधार यही है, इसी पर आपका बनाया हुआ अस्तित्व खड़ा है। ये चारों हटा दो, आप उस परम आनंद में हो जाओगे। सब कुछ का मतलब वस्त्र, भोजन, घर छोड़ना नहीं — महापुरुष भी भोजन करते हैं, संसाधन का उपयोग करते हैं; जरूरत में जियो। हमने घर छोड़ा तो अब इतने लोग जुड़ गए कि उनके लिए इस शरीर का उपयोग कर रहे हैं — तो लोगों को क्या छोड़ा? ये चार आपके बस में हैं, इसके लिए कोई साधना-तपस्या नहीं करनी — हटा दो। हां, फिर ना इज्जत मिलेगी, ना अपमान।

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गुरु जी, हमारा मूल स्वरूप परमानंद है और उसे ही पाने के लिए हम ये सब धारण करते हैं, लेकिन उसी से बिगड़ रहे हैं — ऐसा क्यों होता है?

चाहते तो हम वही हैं, लेकिन काम किसके लिए कर रहे हैं? परिणाम काम से आएगा, चाहने से नहीं। अगर उसके लिए काम करते तो पा जाते। जैसे दुकानदार को जिस सामान के लिए पैसा दिया वो सामान देगा — ये प्रकृति एक दुकान की तरह है, आपकी योग्यता के अनुसार यहां सब मिल रहा है। आप चाहते हो परमानंद, क्योंकि सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन काम कर रहे हो वैभव, मान, सम्मान, इज्जत बढ़ाने के लिए — तो जिसके लिए काम करोगे वही बढ़ेगा। परमानंद के लिए काम करने का मतलब है यही बेईमानी छोड़ना — मान की इच्छा, दिखावा, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा और योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा; और इनमें मालिक एक है — योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा; इस पर काम कर दिया तो बाकी तीनों अपने आप खत्म। क्योंकि योग्यता से ज्यादा पाना है तो सामने वाले के आगे दिखावा करना पड़ेगा — उधार लेना है तो बताना पड़ेगा कि मैं बड़ा आदमी हूं, दे दूंगा। तो योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करो, जितनी योग्यता है उसमें जियो; और चाहिए तो योग्य बनो, अपने आप को योग्य बनाने के लिए काम करो।

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गुरु जी, मेरा दुख बहुत कम है — अपनी बेटी, नाती और दूसरे लोगों को देखकर रियलाइज हुआ कि बहुत लोग मुझसे ज्यादा कष्ट में हैं।

बात ये नहीं है कि आपसे ज्यादा दुख लोगों के पास है, इसलिए आपने अपने आप को सांत्वना दे दी — इससे कुछ नहीं होगा। आपको दुख है, अशांति है, पीड़ा है — क्या उसके जिम्मेदार आप हैं? (जी हां।) बस बात इतनी है।

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योगी जी, आप इच्छा छोड़ने की बात करते हैं — अगर सबने इच्छा छोड़ दी तो दुनिया में डेवलपमेंट कैसे होगा?

एक होता है जरूरत, एक होता है इच्छा। जरूरत मतलब जीवन जीने के लिए मुझे जितना चाहिए, अपनी योग्यता के अनुसार — वो जरूरत है। इच्छा क्या है? मेरी योग्यता नहीं है और मैं उसे पाना चाहता हूं — वो इच्छा है; और इच्छा-अपेक्षा ही दुख का कारण है। अपेक्षा क्या है? मैंने किसी के लिए किया, उससे बात नहीं की, पर इस भाव में किया कि समय आने पर ये मेरा करेगा — और जब वो नहीं करता तो बहुत दुख होता है। योग्यता से ज्यादा पाना चाहते हो तो बेईमानी करनी पड़ेगी — दिखावा, छल, कपट, चोरी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — उसमें आदमी गिर जाता है; कुछ चाहिए तो योग्यता बढ़ाओ। और अगर किसी के लिए कुछ करना पड़ रहा है तो उससे बात कर लो कि भाई मैं इसलिए कर रहा हूं कि समय आने पर तुम मेरा साथ दोगे या नहीं — दोगे तो करूं, नहीं तो ना करूं; बात खत्म। अपनी ऊर्जा सही जगह लगा दो — ईमानदारी और सत्कर्म में; पहले संकल्प ले लो कि अब मैं पूरी तरह ईमानदारी से जीवन जिऊंगा। सबसे ज्यादा बेईमानी बोलचाल में होती है, बिना मतलब के — कपड़ा 400 का लाते हैं, बताएंगे 1000 का; 4 ग्राम ज्यादा बताएंगे — इसे साधारण मत समझिए, इससे आप गिर रहे हो। आपका झूठ टिकेगा नहीं, कभी ना कभी उल्टी कर ही दोगे; और जिस दिन कोई ईमानदार आदमी मिल गया कि चलो वजन कराके दिखाओ, आप जिंदगी भर के लिए अपनी नजरों में गिर जाओगे। सच बोलने वाले को लोग ज्यादा पसंद नहीं करते — आप अपने आप को पसंद करते हो या नहीं, वो देखो। चोरी से धन संचय मत करो। एक जहाज में 99 छेद हैं, एक में सिर्फ एक — डूबेंगे दोनों, परिणाम एक ही आएगा। ये कर्म भूमि है, यहां फ्री में कुछ नहीं मिलता — फ्री का धनिया-मिर्च भी लिया तो उसकी भरपाई करनी पड़ेगी; लिया तो देना पड़ा, दिया तो मिलेगा — यही लेन-देन है, यही दुनिया। फ्री में पाने की इच्छा का त्याग करो और अपनी योग्यता के अनुसार आगे बढ़ जाओ।

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गुरु जी, आप जो सात दिन कुटिया में रहने का बता रहे थे — वहां क्या चर्चा होती है, कोई पाठ्यक्रम होता है क्या?

पहले लोग आते थे, एक-दो दिन रहकर चले जाते थे; तो मैंने किया कि सात दिन पक्का रहना है, सात दिन से ज्यादा चाहे आजीवन रहो — आजीवन की व्यवस्था है, सत्य के खोजियों के लिए, जिज्ञासुओं के लिए। वहां मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है, व्यवहारिक बातें नहीं होतीं, नाम भी कोई किसी से नहीं पूछता; अपना भोजन सब मिलकर स्वयं बनाकर खाते हैं और अपने आप में रहते हैं; मैं हूं तो हफ्ते में एक दिन, रविवार को सत्संग हो जाता है। दिन भर क्या होता है? कुछ नहीं — कुछ ना करना ही साधना है। कुछ करके जगत की वस्तुएं मिलती हैं, सुख-दुख मिलता है; कुछ ना करके परमात्मा, परमानंद मिलता है। कुछ ना करना क्या हुआ? जब आपके द्वारा सत्कर्म हो रहा है — किसी व्यक्ति के लिए नहीं, समाज के लिए, धन-तन-ताकत से — कर्ता का भाव नहीं है, तो कुछ हो रहा है लेकिन कुछ ना करना हो रहा है; निष्काम सेवा कुछ ना करने में आती है। वहां कोई जगाता नहीं, पर उठकर स्नान के बाद दिन भर सो नहीं सकते; कुटिया के दायरे में कहीं भी पेड़ के नीचे अपने आप में बैठो; पौधों को पानी देना है तो अपनी मर्जी से दो, नहीं दोगे तो दिलाया जाएगा — पता नहीं उसका फल कौन खाएगा, पर उससे आपको ऊर्जा मिलेगी। जैसे बैंक में मूल पड़ा है तो ब्याज आता रहता है, वैसे ही आपने कोई पेड़ सींचा तो जब तक वो पेड़ रहेगा, समाज उसका उपयोग करेगा, आप चाहे किसी भी शरीर में रहो, आशीर्वाद-ऊर्जा जाती रहेगी। तो ऐसा काम करके इस धरती से जाओ — या मोक्ष पा जाओ, या कोई और शरीर धारण करो तो वो आशीर्वाद और साधन की व्यवस्थाएं मिलती रहें।

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गुरु जी, यहां बसवेश्वर जी की एक कहावत है "कायकवे कैलास" — काम ही कैलाश है, काम ही पूजा है। अगर हम काम ही न करें तो पूजा कैसे होगी?

कौन सा कर्म पूजा है? निष्काम कर्म — ये गीता में भी बोला गया है। आप अपने परिवार के लिए करते हो, उन्होंने आपके लिए किया — ये पूजा नहीं है, एक कर्तव्य है, दायित्व है, जिम्मेदारी है। जब आप जरूरतमंद की सेवा करते हो, जहां बिना इच्छा-अपेक्षा का कार्य होता है, वो कर्म पूजा है — वो आपको उस परम मूल तक लेकर जाता है। यही कुछ देर पहले मैंने बताया; बस बोलने का तरीका सबका अलग-अलग रहता है।

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गुरु जी, आत्म साक्षात्कार क्या है?

जहां "क्या है" है, वहां कोई वस्तु है, रूप है। "क्या है" से मुझे मुक्त होना है, तो मुझे आत्म का साक्षात्कार हो जाएगा — खुद के होने का बोध हो जाएगा, मैं उस पूर्ण मूल में अपने आप में आ जाऊंगा। क्योंकि जब तक आप "क्या है" में हो तब तक रूप में हो, और जब तक रूप में हो तब तक "मेरा" भी है। तो "क्या है" से मुक्त होने के लिए मुझे देखना है कि मैं कहां हूं, और जहां हूं वहां से अपने आप को छुड़ाना है; पूरी तरह मुक्त हो जाऊंगा तब आत्म का साक्षात्कार होगा, नहीं तो वो सिर्फ शब्दों में रहेगा। मैं इस एक रूप के लिए भिन्न-भिन्न रूपों का उपयोग करता हूं — बाहर के रूपों से मुक्त होंगे तो आत्म का साक्षात्कार होगा, जिसे आत्मज्ञान कहते हैं; और जब इस रूप से भी पूरी तरह मुक्त हो जाऊंगा तब ब्रह्मज्ञान होगा। तो पहले आत्मज्ञान के लिए प्रयास करो — और प्रयास है "सब कुछ" छोड़ना, यानी वही छोड़ना जो गड़बड़ है; हमने अर्थ का अनर्थ समझ लिया।

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गुरु जी, आप जो बोलते हो सब सही और अच्छा लगता है, लेकिन बाहर जाते ही सब भूल जाता हूं — क्या करूं?

सुनते रहो। जैसे किसी ने एक बार नाम बताया, याद नहीं हुआ, दोबारा पूछा तो याद हो गया। ये सत्संग रिकॉर्ड हो रहा है, घर पर सुनना; चैनल पर हजारों वीडियो हैं; शास्त्र, वेद, पुराण, वेदांत का अध्ययन करना। आसपास कोई आश्रम हो, वहां जाओ और देखो मेरे लिए कहां बातें हो रही हैं — अगर आश्रम में सिर्फ भंडारा हो रहा है तो शरीर के लिए है, कोई मतलब नहीं; अगर कोई ज्ञान दे रहा है तो उसकी शरण में जाकर बैठो। वृक्ष छोटा हो या बड़ा, हमें तो छांव चाहिए — एक शरीर के लिए छाया छोटा पेड़ भी दे देगा; बड़ा-छोटा मत देखो, बाहर के आवरण से क्या मतलब, जहां जरूरत पूरी हो वहां बैठ जाओ। ज्ञान एक होता है, दो नहीं — जैसे धरती के अंदर से पूरे विश्व में पानी एक ही जगह से आ रहा है, बस स्वाद अलग-अलग हो जाता है, वैसे ही वाणी का स्वाद अलग; मुझे तो प्यास बुझानी है। रूप मत पकड़ो, इस पिंड को मत पकड़ो, ज्ञान पकड़ो, चाहे जहां से मिले। और सबने बोला है जीवंत गुरु चाहिए — विद्यालय का बहुत अच्छा शिक्षक शरीर छोड़ गया तो उसका फोटो रखकर पढ़ाई नहीं हो सकती, पढ़ाई शरीर वाला ही कराएगा; तो अपने आसपास ऐसे लोगों को पकड़ लो।

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गुरु जी, मन बहुत चंचल रहता है, इधर-उधर भागता है — उसे कंट्रोल कैसे करें?

मोबाइल-कंप्यूटर चलाते हो — होम पेज पर रहते हो तो एरो नहीं दिखता, जैसे ही कुछ खोलते हो एरो आ जाता है; लेकिन एरो को जहां-जहां आप ले जाते हो वहीं जाता है — एरो आपको नहीं ले जाता। वैसे ही शरीर के लिए मन काम करता है — भूख लगी तो मन ने इंगित किया कि भूख लगी है, और अतीत में पांच इंद्रियों द्वारा जो ग्रहण किया है उससे बताएगा कि भोजन कहां मिल सकता है। "चाहिए" में मन काम करता है — महापुरुषों का भी मन काम करता था, भूख लगी तो भिक्षा मांगने गए। अगर आप जरूरत में जी रहे हो तो मन परेशान नहीं करेगा; जरूरत से ज्यादा, योग्यता से ज्यादा चाहिए तो मन के द्वारा दुखी हो जाओगे। मन तो स्थिर ही है — मन वहीं तक जाता है जहां तक आपने अतीत में इकट्ठा किया है और जहां तक इंद्रियां अभी महसूस कर पा रही हैं; बाहर से नहीं मिलता तो अंदर जितना है वो दिखाता है। मन ने आपको विचलित नहीं किया, आपकी आदतों ने विचलित किया है — तो अपनी आदतें छोड़िए। मन को छोड़ो, तुम देखो तुम क्या कर रहे हो, तुम्हें क्या चाहिए — बस। हजारों साल से यही बोला गया कि मन को रोको, इसलिए नई बात धीरे-धीरे समझ आएगी।

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गुरु जी, आप कहते हैं जरूरत में जियो, पर हर सिचुएशन में मेरी जरूरत कितनी है — यह ढूंढने में मैं असफल हूं। इसे कैसे पहचानूं?

आपकी जरूरत क्या है — जैसे भोजन; कितना चाहिए और किस तरीके का चाहिए, वो आपको पता है। देखिए क्या उसका मूल्य मेरे पास है? है, तो लेकर खा लो, वो बंधन नहीं है; जब मूल्य नहीं होगा तो पेट भरने के लिए कोई ना कोई नाटक करना पड़ेगा, उसमें फंसोगे। टीशर्ट 1000 की भी है, 1 लाख की भी — योग्यता के अनुसार जरूरत, जरूरत के अनुसार योग्यता; जरूरत बना ली पर योग्यता नहीं, तो भैया नहीं चाहिए — जितना मेरे पास है उतने में जीना है। जरूरत पैदा मत करिए। फोर-व्हीलर का शौक है तो उसके लिए काम करो; उधारी, कर्जे, ब्याज में ले लोगे तो लोन भरते-भरते जिंदगी चली जाएगी — कितनों ने लोन पर घर लिया, कोरोना में आत्महत्या कर ली; 20 साल लोन ही भरोगे तो आध्यात्म में क्या आओगे। आध्यात्म तब समझ आएगा जब आप संपन्न हो जाओगे — संपन्न मतलब समझ गए कि मुझे कितने में जीना है। योग्यता से ज्यादा लोन लिया तो हर महीने पगार चाहिए, कंपनी के दबाव में जीना पड़ेगा, निकाल ना दे का डर, दबकर बात करनी पड़ेगी — पूरी ऊर्जा संकोच-दबाव में लग जाएगी, आप अपने आप में होने के लिए बढ़ ही नहीं पाओगे। बगल में 20,000 का भाड़ा है तो दो किलोमीटर पर 2000 में भी लोग रहते हैं — पहले जुटा लेते फिर लेते, तो कहीं दबते नहीं, खुलकर जीते, आत्मबल नहीं गिरता। तो अपनी जरूरत कम कीजिए, जितनी योग्यता है उतने में जीना चालू करिए, और ज्यादा चाहिए तो उसके लिए काम करिए फिर लीजिए।

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गुरु जी, सपने क्यों आते हैं?

सपने इसलिए आते हैं कि कभी-कभी मैं कुछ जीना चाहता था, जी नहीं पाया — तो जब स्थूल शरीर से नहीं कर पाता, तो सूक्ष्म शरीर से जाकर वो काम करता हूं। इसलिए देखो स्वप्न-दोष का रिजल्ट स्थूल शरीर पर आ जाता है; कभी स्वप्न में डरते हैं तो जागकर भी डरने लगते हैं। बहुत सपने इसलिए आ रहे हैं कि आप स्थूल शरीर से वो पूरा नहीं कर पा रहे हो।

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गुरु जी, भक्ति, ज्ञान और ध्यान — इन तीनों में किसे महत्व देना चाहिए? इनमें क्या डिफरेंस है?

अपनी सामर्थ्य देखो। अगर भक्ति है, कुछ नहीं चाहिए, तो भक्ति द्वारा भी पहुंच जाओगे — रामकृष्ण परमहंस भक्ति द्वारा पहुंचे; स्वामी विवेकानंद ज्ञान मार्ग द्वारा पहुंचे। भक्ति, ज्ञान, ध्यान, योग — किसी से भी पहुंच सकते हो; डिफरेंस कुछ नहीं है, डिफरेंस हमने पैदा किया है। गुरु भक्ति के द्वारा पहुंचा और शिष्य ज्ञान के द्वारा — रामकृष्ण ने भक्ति छोड़ी नहीं, पर देखा कि ये तर्कशील है, ज्ञानमार्गी है, तो विवेकानंद से भक्ति नहीं करवाई। तो देखिए चार में से आपकी सामर्थ्य क्या है; चारों है तब तो आप महान पुरुष हो। देख लो कौन सा आपको अपनाना है।

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गुरु जी, परिवार (कुटुंब) और आध्यात्म — दोनों को साथ लेकर कैसे चलें?

सर्वप्रथम कर्म के प्रति ईमानदार हो जाओ — जहां आप काम कर रहे हो वहां ईमानदार हो जाओ, और उस धन से परिवार की सेवा करो; कुछ धन बचाओ — नहीं बच रहा तो हफ्ते में एक दिन उपवास करो, कपड़े कम कर दो — और उसे जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। इसी से आपका उद्धार हो जाएगा, यही साधना, यही तपस्या है। ऐसा नहीं कि एक रुपया छोड़ना नहीं है और ध्यान, साधना, सत्संग सब सुनना है, परम ज्ञान भी चाहिए, परमात्मा भी चाहिए, महान भी बनना है — लेकिन देंगे कुछ नहीं। दिखावा मत करो, लेकिन समाज के लिए जितना होता है उतना करो।

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गुरु जी, आपके मार्गदर्शन में साधना कैसे करें कि आत्म साक्षात्कार हो जाए?

ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। सत्संग कैसा? अपने आप को सुधारने का सत्संग — कि मैं बिगड़ा हूं, तो मैं कैसे सुधर जाऊं। जहां आपके सुधरने की बात हो, वही सत्संग है।

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गुरु जी, मैंने आपके बारे में कभी सोचा भी नहीं था, फिर भी आप कल मेरे सपने में आ गए — इसके पीछे राज क्या है?

राज यही है कि मेरे बताए मार्ग पर चल जा — ऊपर वाले ने तुझे इस मार्ग पर चलाना है, इसलिए तुझे पहले ही कुछ दिखा दिया। ऐसा नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं — हम बहुत समय से मिल रहे हैं, बस भिन्न-भिन्न शरीर धारण कर रहे हैं; हम आपका उद्धार चाहते हैं और आप भी उद्धार चाहते हो। जन्म-जन्मांतर का हमारा-आपका कुछ लेन-देन होता है तो हम मिलते हैं। हमारा काम है आपको इस जगत से निकालना, आपका काम है जगत में फंसना — हम तुम्हें इस तरफ खींच रहे हैं, तुम उस तरफ जा रहे हो; यही चल रहा है। लेकिन गुरु का भी संकल्प रहता है कि हम तुमको निकालकर ही रहेंगे।

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गुरु जी, मानव जन्म में हम बुरा ही ज्यादा क्यों सोचते हैं, अच्छा क्यों नहीं सोचते?

ऐसा नहीं कि आप बुरा ही सोचते हो — अच्छा भी तो सोचते हो, दोनों सोचते हैं। मानव के अलावा किसी शरीर में कर्ता का अधिकार नहीं है, सब अपने स्वभाव में जीते-खाते हैं। मानव शरीर में तीन प्रवृत्तियां हैं — सात्विक, देव और राक्षस; और इसमें भोग-योग दोनों हैं, बाकी शरीरों में सिर्फ भोग है, योग नहीं। तो हमें अच्छा सोचने का भी मौका है, बुरा भी — दोनों की स्वतंत्रता है: आप राक्षस भी बन सकते हो, देव भी, और एक स्वतंत्रता ये कि उस परम आनंद को उपलब्ध हो सकते हो, बनने से मुक्त हो सकते हो। अन्य जितने भी जीव हैं उनका एक दायरा है, उस शरीर के हिसाब से जिएंगे, उस दायरे को कभी तोड़ नहीं सकते; मनुष्य दायरा बांध भी सकता है, तोड़ भी सकता है, और तोड़कर मूल परम स्थिति को उपलब्ध हो सकता है। हमारी क्षमता पूरी स्वतंत्र है — ज्यादा गिर भी सकते हैं, ज्यादा उठ भी सकते हैं। पशु ना अच्छा सोचते ना बुरा — भूख लगेगी तो छीनकर भी खा लेंगे, भूख नहीं तो मुंह पर रख दो नहीं खाएंगे; इसलिए उन्हें दोष नहीं लगता।

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गुरु जी, अगला शरीर हमारे अभी के कर्मों पर निर्भर होता है, और कहते हैं हम पशु-पक्षी जैसी बहुत सी योनियों से होकर मानव शरीर तक आए — तो पशु से मानव शरीर तक आने के लिए क्या लगता है?

मानव शरीर हमें तब मिलता है जब हम भोग से योग की तरफ बढ़ते हैं। अगर हमारे जीवन में अभी भी योग है — इस शरीर में आत्मिक कल्याण के लिए साधना कर रहे हैं — तो अगला शरीर मानव का ही लूंगा। और अगर भोग ही कर रहा हूं, योग एकदम नहीं, आत्मिक कल्याण से कोई मतलब नहीं, संसार की वस्तुओं का ही महत्व है, तो अगला शरीर पशु का ही मिलेगा — फ्री में खाना, फ्री में रहना। पशु शरीर से मानव शरीर तो अपने आप आ रहा है, उसके लिए उसे कुछ नहीं करना, उसका दायरा फिक्स है। आपको मौका है — पशु शरीर धारण करोगे, अगला मानव शरीर, या शरीर ही धारण नहीं करोगे; देवता बनना है, राक्षस बनना है या महात्मा — पहले ये फैसला करना पड़ेगा कि मुझे चाहिए क्या और मैं बनूंगा क्या; तीनों का कर्म अलग-अलग है, मूल कर्म है।

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गुरु जी, (इनके) भाई-बहन काम के लिए मां को छोड़कर चले गए, बड़े भाई की शादी हुई पर उसका बोझ भी इन पर है; मां इन्हें नहीं छोड़ रही, इसलिए ये कहीं नहीं जा सकते — पर वहीं बैठकर साधना क्या है, आध्यात्म क्या है, यह समझना चाहते हैं और वह भी नहीं हो रहा। इससे कैसे बाहर आएं?

पहले मां से कहिए कि अगर वो बेटे आपको छोड़कर गए तो आपकी जिम्मेदारी मेरी — मैं आपकी सेवा करूंगा, लेकिन जितनी प्रॉपर्टी है सब मुझे चाहिए; उसमें मां का भी पता चलेगा। मां पूरी प्रॉपर्टी दे दे तो मां की सेवा करो, और प्रॉपर्टी बचे तो सत्कर्म में लगा देना — इसी से तेरा उद्धार हो जाएगा। और अगर मां कहे हम नहीं देंगे, तो बोल दो हम भी छोड़कर जा रहे हैं और तुम्हारी प्रॉपर्टी भी नहीं चाहिए — तब तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा। ऐसे छोड़कर नहीं जा सकते, ऐसे जाओगे तो दोष लगेगा, क्योंकि अपने कल्याण के लिए निकल रहे हो, समाज कल्याण का भाव पैदा नहीं हुआ। अगर कुछ है ही नहीं, तो छोड़कर नहीं जा सकते — फिर उनकी सेवा करते हुए अपना कल्याण करो: अगर मां अपने हाथ से भोजन बना लेती हैं, तो 12 महीने में 11 महीने मां को दो और एक महीना किसी आश्रम में रहो जहां एकांत लगे और आत्मिक कल्याण का मार्ग बताया जाए। जैसे टावर के पास मोबाइल का नेटवर्क ज्यादा पकड़ता है, वैसे ही आश्रम, मंदिर, देवस्थान पर आत्मिक कल्याण के भाव से रहोगे — संचय, भोजन, व्यवस्था या आराम के भाव से नहीं — तो आपका नेटवर्क बड़ा तेज पकड़ेगा, साधना में सहायता मिलती है।

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