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प्रश्नोत्तर — भाग 22

योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 6 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

गुरु जी, इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जो जीव शरीर को चला रहा है उसी को निकाल दें, तो शरीर बेकार हो जाएगा, कुछ कर्म नहीं करेगा?

नहीं। क्या महापुरुषों ने कर्म नहीं किए — कृष्ण भगवान ने, राम ने कर्म नहीं किया? कर्ता के भाव से मुक्त होना है, अपने तरीके से करवाना है — उस तरीके का त्याग। कर्म तो जब तक रहना है तब तक करना पड़ेगा — ये कर्म भूमि है, बिना किए रह नहीं सकते; या तो अपने लिए, या दूसरों के लिए, कामनाओं-इच्छाओं में या दूसरों के लिए, करना तो पड़ेगा। महापुरुष जितने भी परमानंद को उपलब्ध हुए, भूख लगती थी तभी रोटी खाते थे, और ज्यादा खिलाओ तो कहते थे बस, अब नहीं — उनकी भूख शांत हो गई। तो करने से नहीं, कर्ता भाव से छूट जाओ — "मैं करता हूं" — जो करने का अहंकार धारण किया है, उस भाव से छूट जाओ।

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गुरु जी, आध्यात्मिक का मतलब क्या है?

जब हम अपने शरीर की जरूरतों के लिए काम करते हैं तो वो भौतिक है, और जब मैं अपने लिए काम करता हूं तो वो आध्यात्मिक है — मुक्ति-मोक्ष, दुखों से छुटकारा; राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, मेरा, कर्ता के भाव से मुक्त होना; छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता से मुक्त होना। ये संसाधन तो शरीर तक हैं, लेकिन मेरा क्या — मैं कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा — जब इन प्रश्नों का जवाब खोजने के लिए मैं निकलता हूं, तो ये आध्यात्म है।

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गुरु जी, मुक्ति गुरु मिलने से ही मिलेगी, या मैं अपने आप को खुद ढूंढ सकता हूं?

अगर आप बंधन में भी गए हो तो कोई मिला — अकेले बंधन भी नहीं बांध सकते। बेईमानी भी आप तभी कर पाओगे जब आपके अपोजिट में कोई खड़ा हो, जब वो निमित्त बने। तो बंधन से छुड़ाने के लिए भी कोई चाहिए — वो गुरु है, ज्ञान का प्रतीक; एक बंधन में ले गया, एक बंधन से निकालने के लिए काम करेगा। आप बंधन में फंसे हो तो उसमें हजारों लोग लगे; अब आपके पास बल नहीं कि अकेले आ जाओ, तो ऐसा बलशाली व्यक्ति चाहिए जिसमें उन सारों का बल हो, तब वो आपको निकाल पाए। आपने बेईमानी कर ली तो ईमानदारी के लिए भी कोई निमित्त चाहिए — मुक्ति के लिए गुरु चाहिए, जो आपको मुक्ति का रास्ता बताए। किसी के द्वारा गए हो तो किसी के द्वारा ही आओगे ना।

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गुरु जी, मुक्ति पाने के लिए हम विष्णु सहस्रनाम और कुछ मंत्र बोलते रहते हैं — क्या उससे हम मुक्ति पाते हैं, ये सही है या नहीं?

आप कोई मंत्र करते हो तो उससे ऊर्जा मिलती है। अगर आप ईमानदारी से, सत्कर्म के साथ जीवन जी रहे हो, तो मंत्रों द्वारा मिली ऊर्जा आपकी सहायक होगी — चाहे मूर्ति पूजा हो, चाहे मंत्र जाप। लेकिन कब? जब आप ईमानदारी और सत्कर्म में लगे रहोगे तब। और अगर मंत्र जाप किया और बेईमानी कर रहे हो, तो मंत्रों से मिली ऊर्जा से आप और तेजी से बेईमानी करोगे, और फंस जाओगे। मुक्ति का रास्ता — सर्वप्रथम ईमानदारी, फिर सत्कर्म, क्योंकि कर्म करके हम बंधन में गए हैं तो कर्म करके ही मुक्ति पाएंगे। पहले ईमानदारी-सत्कर्म, फिर चाहे पूजा करो, पाठ करो, मंत्र करो — सब सहायक हो जाएंगे; ईमानदारी नहीं अपनाई तो सब आपके पतन का कारण बन जाएंगे।

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गुरु जी, शरीर को मरने के बाद जला देते हैं, आत्मा तो निरंतर है। बचपन से हमें डराया गया कि यमराज ले जाएगा — तो यमराज किसको ले जाता है? मुझे लगा कि वो हमारे कर्मों को ले जाता है, भगवान के सामने बताता है, और उसी से अगला जन्म होता है — क्या ये सही है?

एक तो मैं हूं, एक शरीर। शरीर के भी रूप का नाश होता है, तत्व का कभी नाश नहीं हो सकता — वो परिवर्तनशील है; ना शरीर का नाश हुआ, ना मेरा नाश होगा। मैंने इस शरीर को छोड़ा — अगला शरीर तभी धारण करूंगा जब कोई इच्छा-अपेक्षा, कोई कामना होगी। अगर इच्छा-अपेक्षा दोनों नहीं, कोई कामना नहीं, तो मैं अपने मूल की यात्रा करूंगा, जहां से आया हूं; और इच्छा-अपेक्षा रही तो भिन्न-भिन्न शरीर लेता रहूंगा। आप रूप में वशीभूत हो, तत्व में नहीं — शरीर जल जाता है, रूप का जहां नाश हुआ, आप राग छोड़ के चले आते हो; क्या उस राख में वो शरीर नहीं है? है — पंच तत्वों में विलीन हो जाता है। आप इस संसार में तभी तक रहोगे जब तक आपकी कामना है; कुछ नहीं चाहिए तो अगला शरीर धारण नहीं करोगे, जहां से आए हो वहां चले जाओगे।

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गुरु जी, शरीर धारण करने से तो हम लोगों का अच्छा-भला भी कर सकते हैं ना — जैसे आप जो ज्ञान बांट रहे हैं, उससे सबका भला होगा?

भला तो तब कर पाओगे जब अपना कर पाओगे। आपको क्या लगता है — वैभव देना भला है? किसी का रोग ठीक करना भला है? ये ज्ञान तो तभी बांट पाओगे जब आप इच्छा-अपेक्षा से मुक्त होंगे, जब आत्म तत्व में स्थिर हो जाओगे; उसके पहले तो बांट ही नहीं सकते — उसके पहले जितना भी ज्ञान दोगे, शरीर तक रहेगा। आत्म तत्व का ज्ञान तभी दोगे जब आत्म तत्व में स्थिर हो जाओगे, और वो तभी जब कामनाओं से मुक्त होंगे। तो उसके लिए काम करो कि मैं कामनाओं से कैसे मुक्त होऊं।

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