आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

परिवार — 239 प्रश्नोत्तर

वे प्रश्नोत्तर जिनके प्रश्न या उत्तर में “परिवार” शब्द आता है — नए पहले।

मन353 उत्तरध्यान331 उत्तरगुरु2,248 उत्तरकर्म580 उत्तरअहंकार84 उत्तरमृत्यु43 उत्तरपरिवार239 उत्तरसेवा321 उत्तरडर138 उत्तरक्रोध46 उत्तर

P23-0195

गुरु जी, अगर सिर्फ मनुष्य शरीर से ही परोपकार होता है, तो क्या हाथी वगैरह एक-दूसरे की रक्षा करके, अपने बच्चों को संस्कार देकर, या वानर आदि शोर मचाकर हिरणों को शिकार से बचाकर परोपकार नहीं करते? क्या ममता के बिना परोपकार संभव है?

P23-0184

गुरु जी, मुझे सिर्फ एक बात पता करनी है — जो लोग नशा करते हैं, वे इतने दयालु क्यों होते हैं, और जो नशा नहीं करते वे वैसे नहीं होते — ऐसा क्यों?

P23-0180

गुरु जी, होली महापर्व के बारे में कुछ मार्गदर्शन कीजिए।

P23-0165

गुरु जी, अपनों की कुटिया से जाने के बाद साधक की घर में दिनचर्या कैसी होनी चाहिए, और लोगों से व्यवहार कैसा हो?

P23-0154

गुरु जी, क्या संसार और अध्यात्म अलग हैं?

P23-0112

गुरु जी, आपका कहना है कि जरूरत में जियो। लेकिन किसी परिवार में एक व्यक्ति यह बात समझ जाता है और बाकी सदस्य नहीं समझते, उनकी जरूरत ज्यादा है — मेरी क्षमता भी ज्यादा है, पर मैं जरूरत में रहना चाहता हूं, और परिवार उससे ज्यादा में रहना चाहता है, डिमांड करता है; मैं प्रमुख हूं तो उनकी जरूरत पूरी करना मेरा कर्तव्य बनता है — इसमें संघर्ष बना रहता है। तो उनके साथ कैसे बनाकर चलें?

P23-0107

गुरु जी, परिवार से निमंत्रण आता है और हम जानते हैं कि वे ईमानदारी से नहीं कमाते — तो उनके यहां भोजन ग्रहण करना चाहिए या नहीं?

P23-0075

गुरु जी, जरूरत से ज्यादा बनाना-रखना तो प्रगति है ना? इसे प्रगति क्यों ना कहें?

P23-0067

गुरु जी, जैसे आपने कहा कि अपनी इच्छा के अनुसार कोई चीज नहीं मिलती तो हमें गुस्सा आता है। अब एक परिवार में जैसे पांच लोग हैं, उसका जो मुखिया होगा वह तो चाहेगा ही कि मेरे हिसाब से काम हो — जरूरी भी है, क्योंकि कुछ काम उसके हिसाब से ही सही होते हैं। नहीं होगा तो उसे गुस्सा आएगा। इस परिस्थिति में क्या करें?

P23-0049

गुरु जी, एकांत वास कितने समय तक करना चाहिए? और उपलब्धि का मतलब क्या है?

P23-0035

गुरु जी, परिवार के लोग बेईमानी करें तो उनसे कैसे व्यवहार करें?

P23-0028

गुरुदेव, आपका कथन सही है कि व्यक्ति कामनाओं, मोह और उनके बंधनों में फंसा हुआ है। तो जो व्यक्ति दिन भर ईमानदारी से मजदूरी करके अपने परिवार का पेट भरता है, क्या वह मुक्त है, या कुछ और मार्गदर्शन करें?

P23-0019

गुरुदेव, अगर हम देखें तो लगभग 90 प्रतिशत मनुष्य अपना कल्याण ही चाहता है और मुक्त होना चाहता है, लेकिन फिर भी देखने में यह आता है कि अध्यात्म और सच्चाई पर कुछ दूर ही चल पाता है — ऐसा क्यों?

P23-0011

गुरु जी, 'कुछ नहीं चाहिए' के भाव में — जैसे कोई मजदूर है, उसकी रोजी-रोटी, आय — उसमें भाव नहीं होना चाहिए? और परिवार में, घर-गृहस्थी में रहते हुए एकदम 'कुछ नहीं चाहिए' की स्थिति तो नहीं हो सकती।

P23-0004

गुरु जी, थोड़ी देर पहले आपने कहा था कि गुरु बारह बरस तक परीक्षण करते थे और उसके बाद मंत्र देते थे; तो ये आपकी ही बात का खंडन हो गया?

P22-0097

गुरु जी, परिवार में जो बड़ा होता है, वह पत्नी, बच्चे, पोते-पोतियों से प्राणिक रिश्ते से जुड़ा रहता है। बेटा हजार किलोमीटर दूर है, उसकी कोई परेशानी का फोन आता है — मैं जानता हूं मैं वहां कुछ नहीं कर सकता, जो करना है वहां उसी को करना है — फिर भी वह दुख क्यों होता है?

P22-0083

गुरु जी, आपने जीवन जीने के मूल सिद्धांत बताए — ईमानदारी और सत्कर्म, और सत्कर्म में जरूरतमंद की सेवा। लेकिन जरूरतमंद की पहचान कैसे करें? हैदराबाद में एक परिवार ने कहा मालिक ने निकाल दिया, घर जाना है, भूख लगी है — खाना मत खिलाओ, पैसे दे दो। तभी दो लोग आकर बोले इनका रोज का यही काम है, तो हम आगे निकल गए। एक बच्ची ने 5 किलो आटा मांगा तो दुकान वाला बोला यह इसे यहीं बेच आएगी। ऐसे में विश्वास कैसे करें?

P22-0075

गुरु जी, घर-परिवार और समाज अगर तकलीफ दे तो क्या जरूरी है कि सभी बातों का जवाब दूं?

P22-0063

महाराज जी, उम्मीद नहीं करनी चाहिए, देने का भाव होना चाहिए — जिस परिवार की जरूरत की पूर्ति भगवान मुझे निमित्त बनाकर मेरे द्वारा करवा रहा है… क्या सच में भगवान मुझे निमित्त बनाकर करवा रहा है?

P22-0047

गुरु जी, कहते हैं वैराग्य में दमन की प्रधानता है और गृहस्थ लोग विवेक की प्रधानता पर चलते हैं; शंकराचार्य जी कहते हैं इसके बाद भी तितिक्षा चाहिए — प्रकृति द्वारा दिए सुख-दुख को ना चाहते हुए भी सहने का सामर्थ्य। हम अभी दमन पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं — जैसे दर्द हो रहा है तो उसे महत्व नहीं देना, इच्छा को मार देना — यह दमन है?

P22-0023

गुरु जी, मेरे घर में सभी लोगों की भाषा कटु वचन वाली है, जिसके कारण अशांति और क्रोध रहता है — मुझे क्या करना चाहिए?

P21-0190

गुरु जी, मेरे दो प्रश्न हैं — पहला, अहंकार और शरीर ही मेरी पहचान है, तो अपनी असली पहचान समझने का मकसद क्या है? दूसरा, यहां जितने लोग जमा हैं ज्यादातर बुजुर्ग हैं; सबने आज तक घर-परिवार चलाया, पर परिवार के सदस्य अपनी मनमानी करके चले गए — तो ऐसे लोगों को पालने का क्या मतलब?

P21-0189

गुरु जी, एक विद्यार्थी इंजीनियरिंग या डॉक्टरी में नहीं जाना चाहता, साधारण BA करना चाहता है; लेकिन घर में सब इंजीनियर हैं, दबाव है — घर वाले इज्जत नहीं देंगे, कंपेयर करेंगे — तो वो दबाव में झूठ बोल देता है कि मैं भी करूंगा। उसे क्या करना चाहिए?

P21-0185

गुरु जी, और इच्छा, अपेक्षा और मेरा — इनका मतलब क्या है?

P21-0173

गुरु जी, मेरे घर में परमिशन नहीं है — मेरी मां और मेरे हस्बैंड अपनों की कुटिया आने की परमिशन नहीं देते। मैं क्या करूं?

P21-0172

गुरु जी, आप कहते हैं परिवार नहीं समझते; हमारे परिवार में, खासकर महिलाओं के लिए, अभी भी परिस्थिति ऐसी है कि सब छोड़ के जाना वो नहीं मानते — पुरुषों के लिए अलग है। आपका परिवार नहीं है, हमारा परिवार है ना — उसको छोड़ के कैसे चलना है?

P21-0171

गुरु जी, ईमानदारी में बहुत बार हमें दूसरों को झेलना पड़ता है — उस प्रेशर को हम कैसे हैंडल करें?

P21-0164

गुरु जी, एक प्रोफेसर बहुत सत्कर्म करते थे, 30 साल तक बिस्तर पर पड़े अपने परिवार-जन की सेवा भी की, लेकिन उन्होंने 30 साल तक इतने कष्ट झेले और उनका देहांत हो गया। इससे मुझे लग रहा है कि भगवान है या नहीं? क्या सत्कर्म करने वालों की ये परीक्षा है? मैं बहुत कंफ्यूज हूं।

P21-0150

गुरु जी, दुनिया में बहुत दिखावा है। मैं सिंपल मैरिज करना चाहता हूं, बर्थडे मनाना भी नहीं चाहता, लेकिन घर में ऐसा वातावरण और दबाव है कि रजिस्टर मैरिज नहीं, धूमधाम से ही करना है, लोन लेना पड़े तो भी परवाह नहीं। योग तो वैयक्तिक मार्ग है, पर घर वाले कहते हैं वैयक्तिक निर्णय नहीं लेना, हमारे कंट्रोल में रहो। इस वक्त हम कैसे बर्ताव करें?

P21-0138

गुरु जी, मेरा परिवार है, विवाह कर लिया है, उनकी जिम्मेदारी है — मैं परिवार और घर में रह के साधना करना चाहता हूं, तो कैसे करूं?

P21-0129

गुरु जी, परिवार (कुटुंब) और आध्यात्म — दोनों को साथ लेकर कैसे चलें?

P21-0122

गुरु जी, यहां बसवेश्वर जी की एक कहावत है "कायकवे कैलास" — काम ही कैलाश है, काम ही पूजा है। अगर हम काम ही न करें तो पूजा कैसे होगी?

P21-0114

योगी जी, आपने कहा था आत्मज्ञान के लिए ईमानदारी और सत्कर्म दोनों जरूरी हैं और ये दो अलग चीजें हैं — पर सत्कर्म के अंदर तो ईमानदारी होनी ही चाहिए ना? फिर आप दोनों को अलग-अलग क्यों बताते हैं?

P21-0111

गुरु जी, कहते हैं नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक ऊर्जा होती है, पर मैं सोचता हूं ऊर्जा तो सिर्फ ऊर्जा है, सात्विक — और जो ऊर्जा मुझे मिली है उसका आधार मेरे कर्म हैं। क्या ऐसा समझूं?

P21-0104

गुरु जी, मैं पुलिस विभाग से चार महीने पहले रिटायर हुआ हूं, बच्चे सेट हैं, पारिवारिक जिम्मेदारियों से फ्री हूं — अब मुझे किस तरफ चलना चाहिए? मार्गदर्शन दीजिए।

P21-0082

गुरु जी, लोभ-मोह कहीं-कहीं बहुत भारी हो जाता है, परिवार में फंसे हैं — यह कैसे छूटेगा?

P21-0070

गुरु जी, जैसे शराबी को शराब की और जुआरी को जुए की ऐसी तड़प होती है कि वो परिवार-संसार किसी की तरफ नहीं देखता — वैसी तड़प हमारे अंदर आत्म-कल्याण के लिए क्यों नहीं बन पाती, जबकि आप इतना अच्छा समझाते हो?

P21-0067

गुरु जी, पहले मैं नौकरी करता था पर वहां हर समय बेईमानी करनी पड़ती थी, तो मैंने छोड़ दी। अब बूढ़ी मां और छोटे भाई की जिम्मेदारी है, कोई काम सेट नहीं हो रहा — जिम्मेदारियों को तो नहीं छोड़ सकते ना?

P21-0061

गुरु जी, मैंने कोई काम मना नहीं किया, आज भी काम पर बैठता हूं, बस अंदर से ज्यादा कमाने या आगे बढ़ाने का भाव खत्म हो गया है — पर घर वाले इससे खुश नहीं। ऐसा क्यों?

P20-0197

सुख और दुख कहां से आते हैं?

P20-0173

मेरी भावना होती है कि किसी का नुकसान न हो, पर सामने वाले की अपेक्षा गलत हो जाती है; अपने हिसाब से जीने लगी तो परिवार से कनेक्शन टूट गया और तकलीफ हुई — इसे कैसे समझें?

P20-0145

"सारा काम छोड़कर भोजन, और भोजन भी छोड़कर आत्मिक कल्याण" — इसका क्या अर्थ है?

P20-0143

आप कहते हैं किसी से उम्मीद मत रखो — परिवार में रहते हुए बिना उम्मीद के कैसे रहें?

P20-0112

संसारी चाहता है परिवार, नौकरी, सुविधाएं सब वैसे ही रहें और आनंद भी मिल जाए — क्या दोनों का तालमेल हो सकता है?

P20-0076

गुरु जी, परिवार में कोई बार-बार समझाने पर भी न समझे तो हमारा कर्तव्य क्या है, और कब उसका त्याग कर देना चाहिए?

P20-0075

गुरु जी, परिवार में साझी जमीन-जायदाद का लेन-देन करना हो तो कैसे करें?

P20-0071

गुरु जी, परिवार या स्कूल में कोई बच्चा या सदस्य बार-बार समझाने पर भी न समझे तो क्या करें?

P20-0062

गुरु जी, कोई परिवार और जिम्मेदारी छोड़कर आपके पास आए और घर वाले परेशान हों तो क्या करना चाहिए?

P20-0052

गुरु जी, क्या केवल भजन करने से या ईश्वर के भरोसे बैठे रहने से मैं अपने परिवार का पेट भर सकता हूं?

P20-0049

गुरु जी, पश्चिम केवल कर्म करके अमीर है पर वहां परिवार और शांति नहीं, और यहां केवल नाम-जप में गरीबी आ रही है — बीच का रास्ता क्या है?

P20-0036

गुरु जी, सरकारी नीलामी और शराब से आया पैसा ईमानदारी का कहलाता है या बेईमानी का?

P19-0195

गुरु जी, ईमानदारी के साथ चलते हुए क्या परिवार में आपस में एक-दूसरे के विकार बता सकते हैं?

P19-0178

गुरु जी, ध्यान में मन प्रभु की तरफ नहीं लगता, दैनिक कार्यों की तरफ चला जाता है; घर-परिवार में रहते हुए गहरा ध्यान कैसे करें?

P19-0070

गुरु जी, परिवार/भावनाओं वाले यात्रा कैसे रोकते हैं — कैसे निकलें?

P19-0062

गुरु जी, मौका मिला है — कैसे लाभ लें? कल दरवाजे पर नहीं मिल पाएंगे?

P18-0116

गुरु जी, स्वभाव का मतलब क्या स्वयं को जानने की जिज्ञासा है? और जिन पर जिम्मेदारियां हैं, वे क्या करें — जिम्मेदारी निभाने में ही अड़चन आती है?

P18-0111

गुरु जी, जब हम खोजी बनकर आध्यात्मिक मार्ग पर निकल जाते हैं, तो पत्नी-बच्चे जैसे अपने प्रेम वाले लोगों को दर्द होता है — क्या यह स्वार्थ (सेल्फिशनेस) नहीं है? क्या कोई और तरीका है?

P18-0074

गुरु जी, मेरा बच्चा अकेलेपन से परेशान है — उसे अकेलेपन से कैसे बचाएं?

P18-0038

गुरु जी, क्या आपने घर-परिवार छोड़ दिया? परमात्मा की खोज और सामने वाले व्यक्ति में आप किसे प्राथमिकता देते थे?

P18-0030

गुरु जी, अंतर्मन से भाव यही रहता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, फिर भी परिवार और समाज के दायित्व में वे सब चीजें आकर खड़ी हो जाती हैं और अवरोध उत्पन्न करती हैं — क्या करें?

P18-0028

गुरु जी, जो गृहस्थ है और समाज में रह रहा है, संन्यासी नहीं — क्या उसके लिए यह मार्ग बहुत कठिन नहीं हो जाता?

P18-0023

गुरु जी, समाज और परिवार के जो दायित्व मिले हैं, उनसे हटना तो आसान है — घर छोड़कर भाग जाओ, एकांत में बैठ जाओ। पर क्या इससे दायित्व से परे हो जाते हैं?

P17-0179

गुरु जी, परिवार में बच्चों का पालन-पोषण अच्छे मूल्यों और ईमानदारी के ढंग से कैसे करें?

P17-0137

गुरु जी, हमें लगता है कि घर-परिवार वाले हमारे बिना नहीं रह पाएंगे — क्या यह सही है?

P17-0116

गुरु जी, घर-परिवार से निकल नहीं पा रहा, कुछ ना कुछ बाधा आ ही जाती है — क्या इंसान का समय भी नियति के अधीन है?

P17-0108

गुरु जी, हमारा भी भक्ति करने का बहुत मन होता है, लेकिन परिवार है — क्या करें?

P17-0066

गुरु जी, सबको अलग-अलग धन, शरीर, रूप और बुद्धि का स्तर क्यों मिला है?

P17-0060

गुरु जी, (परिवार में किसी को) पैरालिसिस की बीमारी है — क्या करें?

P17-0043

गुरु जी, कोई कट लग जाए, एक्सीडेंट हो जाए, तो जो दर्द होता है वो किसको होता है?

P16-0154

पांच तत्वों का जुड़ाव कौन करता है? और पहले ऋषि-मुनियों के आशीर्वाद से भी संतानें होती थीं, जो योग से होती थीं — उसमें और भोग से होने वाली संतान में क्या अंतर है?

P16-0141

गुरु जी, आज हमें ऊर्जा के बारे में बताइए — एनर्जी, ऊर्जा कैसे काम करती है?

P16-0130

जो व्यक्ति दुष्कर्म करता है, क्या वह प्रकृति के गुण होते हैं या मनुष्य का चुनाव होता है? अगर चुनाव मनुष्य का नहीं, तो मनुष्य दुख क्यों भोगता है?

P16-0116

गुरु जी, हमने एक पुस्तक पढ़ी थी, उसमें भगवान शिव कह रहे हैं कि जो आंखों से देखा जाए वह ब्रह्म नहीं है, आंख जिससे देखती है वह ब्रह्म है; जो कानों से सुना जाए वह ब्रह्म नहीं, कान भी जिससे सुनते हैं वह ब्रह्म है — इंद्रियां भी जिससे चलती हैं, वह ब्रह्म है। तो वह दिखाई क्यों नहीं देता?

P15-0165

गुरु जी, क्या मंदिर में पैसा चढ़ाने पर पाप तो नहीं लगता?

P15-0160

गुरु जी, क्या डर से मुक्त होने के लिए जिस काम से डर लगता है, वो काम बार-बार करना चाहिए?

P15-0118

गुरुदेव, कर्तव्य छोटा भी हो सकता है, बड़ा भी? लोग कहते हैं मेरा कर्तव्य है कि उसके लिए इतना करना है, और फिर बहुत कोशिश करनी पड़ती है।

P15-0117

गुरुदेव, फिर कर्तव्य क्या है? जैसे परिवार का कर्तव्य — बेटी है, पत्नी है, माता-पिता हैं — हम कर्तव्य कैसे निभाएं?

P14-0155

गुरु जी, आप सबको अपने पास क्यों बुला रहे हो? सबका परिवार छुड़ा रहे हो क्या?

P14-0079

गुरु जी, अद्वैत को 'दो नहीं' कह कर छोड़ दिया गया, पर फिर भी दो के ही दर्शन हो रहे हैं — यह बात सही कैसे हो सकती है?

P14-0071

गुरु जी, जहां सारी बातें प्रैक्टिकल करके समझाई जाती हैं, ऐसी जगह भीड़ कम क्यों रहती है? आखिर लोगों को क्या डर है?

P14-0061

गुरु जी, मुक्ति भी कुछ होती है? लोग मर जाते हैं तो परिवार वाले उन्हें मुक्त करवाते हैं — ये क्या है? और क्या कोई विशेष मुक्ति होती है?

P14-0057

गुरु जी, राजा जनक राजपाट करते हुए भी, संसार में रहते हुए भी संसार से परे थे, विदेह कहलाए — ये विद्या बड़ी मुश्किल लगती है?

P14-0048

गुरु जी, परमात्मा को पाने की राह में निकलें तो जो घर-गृहस्थी खड़ी कर दी है, उसे छोड़ के निकलना चाहिए, जंगलों में जाना चाहिए, या उसे साथ रख के चलना चाहिए?

P14-0039

गुरु जी, आप जो ज्ञान मार्ग बता रहे हो वह बिल्कुल सच्चा है, फिर हमसे छूट क्यों नहीं रहा?

P14-0033

गुरु जी, क्या गर्मी-सर्दी से बचने का उपाय भी नहीं करना चाहिए?

P14-0031

गुरु जी, जीवन में तप का महत्व क्या है? ज्यादातर हम तप, उपवास, व्रत से भागते हैं कि इसकी क्या जरूरत है।

P13-0185

गुरु जी, जिससे हमारा कोई संबंध नहीं, उसकी सेवा या मदद करते हैं और उससे कुछ नहीं चाहिए, तो वो भी प्रेम हुआ। लेकिन जो हमारे रिश्तेदार और परिवार हैं, उनसे तो अपेक्षा रहती है। अनजान आदमी के लिए करना निष्काम सेवा है?

P13-0165

महाराज जी, मैं सबके प्रति पॉजिटिव रहती हूं, परंतु परिवार में कुछ लोग मेरे प्रति नेगेटिव क्यों हैं, जबकि मैं निष्काम भाव से सेवा करती हूं?

P13-0163

महाराज, आप कह रहे हो कि इसी में ढूंढ लो परमात्मा को, पर हमें तो उसकी जरूरत ही नहीं लगती — हम तो पैसे, गाड़ियां, बंगले ढूंढेंगे। और शरीर व आजीविका चलाने के लिए संसार में दूसरों से व्यवहार भी तो करना है। तो परमात्मा को क्यों ढूंढें?

P13-0139

गुरु जी, कभी-कभी घर-परिवार में रहने पर बंधन लगता है।

P13-0103

गुरु जी, जब से समझ का स्तर बढ़ा है, मैं उन लोगों से दूर हो गया हूं जो मुझे मानसिक रूप से तोड़ते हैं, लेकिन वे फिर भी परेशान कर रहे हैं। क्या यह हमारा कर्म है? हिसाब कैसे पूरा करें?

P13-0093

जब भी कुछ कर रहे हैं तो करने से पहले एक भाव बनता है और करने के बाद एक भाव — दोनों भाव को कैसे देखें? भाव नहीं पकड़ पा रहा।

P13-0074

खाना खाने में, नहाने में, घर के रोजमर्रा के काम करने में — एक-एक छोटे कर्म पर मेरा क्या भाव होना चाहिए, ताकि मैं बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की तरफ आऊं? और घर वालों के बीच बैठी हूं, तब क्या भाव बनाऊं?

P13-0068

(एक साधक, परिवार के साथ) गुरु जी, मैं सत्संग भी समझता हूं, और गुटखा का सेवन भी करता हूं — यही चूक हो रही है। (पत्नी:) हम दो-तीन साल से बोल रहे थे पर बात नहीं सुनते थे; ज्यादा बोला तो गुस्सा करते थे, इसलिए छह महीने से यह टॉपिक ही बंद कर दिया।

P13-0042

गुरु जी, कई बार विचार आता है कि कोई बात नहीं, धीरे-धीरे पार उतर जाएंगे। पूरी ईमानदारी से जीवन जीने में घर-परिवार का भरण-पोषण भी मुश्किल से होगा, दुनियावी तकलीफें सहनी पड़ेंगी, तो मन पीछे हो जाता है कि एक-दो-चार जन्म और लग जाएंगे; ज्ञान तो आ ही गया, ईमानदारी-सत्कर्म-सत्संग पर चलते रहेंगे, धीरे-धीरे कल्याण हो जाएगा।

P13-0033

(एक बुजुर्ग माता जी के परिवार ने पूछा) माता जी ने 40 साल से भी ऊपर नाम रटा, माला फेरी, फिर भी कहती हैं मेरी भक्ति पूरी नहीं हुई। क्या नाम लेने से पार उतर जाएंगी?

P13-0021

गुरु जी, आपने बोला था कि अगर आप सत्संग का लाभ लेते हो तो आपको मूल्य देना होगा, नहीं तो लाभ लेना बंद कर दो। लेकिन मैं अभी पढ़ाई कर रहा हूं, तो मुझे क्या करना चाहिए?

P13-0019

गुरु जी, परिवार, संबंध और साथी अपनी ओर खींचते हैं।

P13-0015

क्या हर जगह ऊर्जा अलग-अलग होती है? क्या वह किसी के द्वारा दी जाती है?

P12-0147

आज के समाज में बहुत से सिद्ध साधु-संत अपने शिष्यों को आशीर्वाद देते हैं कि आपकी मनोकामनाएं और जरूरतें पूरी हों — तो क्या वो पूरी होती हैं? क्या उनके आशीर्वाद से वास्तव में साधक का कल्याण होता है?

P12-0137

हम चाह रहे हैं कि हमारी यात्रा सुपरफास्ट हो जाए, हम और तेज जाना चाहते हैं — तो उसके लायक कैसे बनें?

P12-0127

घर-परिवार में बचपन से मां-बाप डालते हैं कि तूने फर्स्ट आना है, मेरी नाक की लाज रखनी है — अपनी अधूरी इच्छाएं बच्चों से पूरी करवाना चाहते हैं। तो अगर मैं गार्डियन के लिए ये प्रश्न रखूं — क्या वो अपने बच्चों से ऐसी इच्छा ना रखें? फिर वो क्या करें?

P12-0104

मैं गृहस्थ हूं; बरसों से सत्संग सुनता हूं — रोज चार-पांच घंटे रामकृष्ण परमहंस जी को और एक घंटा आपको — इतना ज्ञान भर गया है, पर भीतर की अनुभूति के लिए एकांत चाहिए, जो घर-गृहस्थी में हो ही नहीं पाता। एकांत के लिए जाना चाहता हूं तो पत्नी और परिवार रोक लेते हैं, उन्हें डर रहता है कि कहीं गृहस्थी ना छोड़ दूं। क्या करूं?

P12-0099

यदि परिवार में एक व्यक्ति घुटन में है, तो उसकी घुटन का सामना परिवार के सभी सदस्यों को क्यों करना पड़ता है?

P12-0077

जो पैसे हम कमाते हैं, क्या उसमें "मेरा" का भाव नहीं आना चाहिए? वह मैं कैसे दूर करूं?

P12-0066

घर पर सत्कर्म कैसे करें?

P12-0025

क्या माता-पिता के कर्म का फल उनके परिवार पर भी असर डालता है?

P11-0184

अध्यात्म की ओर आना चाहता हूं, लेकिन 40 साल की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी पूरी करना जरूरी समझता हूं; बच्चों को छोड़ नहीं सकता। क्या करूं?

P11-0170

यहां रुकता हूं तो 8-9 दिन में ठीक हो जाता हूं, पर वहां पहुंचकर फिर वही दिक्कत। मैं सोच रहा हूं सब समेट के यहीं आ जाऊं।

P11-0086

घर-परिवार या ग्रुप में किसी को बार-बार बोलते हैं, वह समझता नहीं, और उसे हटा भी नहीं सकते। बहुत गुस्सा आता है। क्या करें?

P11-0062

डॉक्टर या शिक्षक को अपने काम का कुछ मूल्य मिलता है। गुरु को तो कुछ नहीं चाहिए, फिर वह दिन-रात एक पागल की तरह इतनी मेहनत क्यों करता है? उसे क्या मिलता है?

P11-0051

अगर घर-परिवार छोड़कर यहां आ जाएं, तो कितने साल में (आत्मज्ञान) होगा ही होगा?

P11-0009

मेरे साथ बहुत शोषण भी हुआ है। मान लो सत्य को बहुत कूट-कूट के पीटा गया।

P10-0168

(एक साधक की ओर से) सत्संग समझ में आ जाने के बाद अब घर पर मन नहीं लगता। क्या करें?

P10-0158

गुरु जी, हम सामान्य व्यक्ति हैं, हमें कुछ ना कुछ लालसा होती है। आपको भी लगता है कि आपकी बढ़िया कुटिया हो। तो हमारी और आपकी लालसा में क्या अंतर है?

P10-0025

समाज इंसान से बनता है। हर इंसान अपना-अपना कर्तव्य निभाए।

P10-0023

योगी जी, वैवाहिक स्त्रियां चाहकर भी अपने लिए वक्त नहीं निकाल पातीं। उनके लिए इस मार्ग में टिके रहने के लिए क्या-क्या जरूरी है?

P9-0190

गुरु जी, क्या ज्यादा रिश्ते और बड़ा परिवार बंधन का कारण बनते हैं?

P9-0171

महाराज जी, जब से ज्ञान समझा हूं तब से अंदर तकलीफ और दर्द तेज हो रहा है। संसार में जो मदद करता है वह फिर वसूलने लगता है। ऐसा क्यों है? परिवार में भी ऐसा ही होता है?

P9-0162

महाराज, जब से भक्ति मार्ग पर पड़ा हूं, तब से मैं अपने परिवार के साथ बैठ नहीं पाता। अंदर से काटने लगता है। क्या यह ऊर्जा का टकराव है?

P9-0138

निकलने के प्रयास से पहले जो वादे हमने अपने परिवार से किए थे, उन्हें निभाना जरूरी समझते हैं। तो इस बंधन से कैसे निकलें?

P9-0060

मेरे मन में हमेशा यह प्रश्न आता है कि मैं कौन हूं। मुझे लगने लगा है कि मैं चुनी हुई आत्मा हूं, और जिन्हें परमात्मा चुनता है उनका जन्म टॉक्सिक परिवार में होता है। क्या यह सही है?

P9-0026

एक परिवार में पिता बेईमान है। वह सिर्फ पैसों से प्यार करता है, और पावर से घर वालों को अपने तरीके से चलाता है। घर में सब कुछ उसकी मर्जी से होना चाहिए। ऐसे पिता के सामने क्या करें?

P9-0014

जिसके साथ मैं हूं, उसके अंदर मुझे संभालने का डर है। मैं उस पर इतना आश्रित हूं कि वह जीवन में कुछ नहीं कर पाता। गुलामी से मैं कैसे मुक्त होऊं?

P9-0010

आत्मज्ञान की खोज की जरूरत क्यों पड़ी? कृपया इस विरोधाभास को स्पष्ट करें।

P8-0053

अचेतन मन में जो डर के विचार हैं, उनसे कैसे ठीक हों? और यह डर के विचार उसमें कैसे बैठे?

P8-0018

बाबूलाल को घर-परिवार की याद आ रही है। विचार तो चलते रहते हैं। कुछ यादें खींचती हैं, प्रभावित करती हैं। जब उन विचारों के साथ होता हूं तो बहुत भारी दुख होता है। क्या करूं?

P8-0006

परिवार भी छूट जाएगा फिर तो?

P8-0001

कुंडली शक्ति योगी पूछते हैं, मेरा निकलना पूर्ण रूप से गृहस्थ आश्रम से जीते जी कैसे होगा? मार्गदर्शन करें।

P7-0192

प्रवीण कुमारी ने पूछा, एक जीव आध्यात्मिक यात्रा कैसे शुरू करता है?

P7-0189

इस वक्त इस दुनिया में सबसे कठिन कार्य क्या है?

P7-0150

कीटनाशक दवाओं से कीट मारे जाते हैं, और वही अन्न हम भी खाते हैं, उनका परिवार भी उसी पर चलता है। कीट मारने का दोष हमें भी लगता है क्या?

P7-0148

ईमानदारी की बात तब कठिन हो जाती है, जब स्थिति आती है। मान लो एक सरकारी विभाग है। सिस्टम चलाने के लिए कहीं ना कहीं बेईमानी में शामिल होना पड़ जाता है। परिवार भी चलाना है, आदमी उसी नौकरी पर निर्भर है। सरकार तो तय तनख्वाह दे रही है, पर आदमी सिस्टम के बीच में पिस जाता है। तब क्या करे?

P7-0147

गुरबानी कहती है कि अगर परमात्मा बीच में खड़ा है, तो सेवक का कुछ नहीं होने देगा, चाहे दुनिया कुछ भी करे। तो क्या विरोध की जरूरत नहीं? गुरु अर्जुन देव जी को जहांगीर ने तवे पर बिठा दिया, ऊपर से रेत डाली गई, उन्होंने विरोध नहीं किया। संत को प्रेम से रहना चाहिए, या गलत का विरोध करना चाहिए? और जो मिस्त्री था, वह नशे में भी था।

P7-0141

आठ तारीख को जाऊँगा। जो यहाँ तीस दिन में जिया हूँ, उसे अपने जीवन में लगातार जारी रखना चाहता हूँ, पूरी तरह, कोई भूल चूक न हो। जैसे काढ़ा पीते समय चाय कॉफी नहीं ले सकते। बाहर जाकर क्या हम खुद चाय कॉफी पी सकते हैं, होटल में खा सकते हैं?

P7-0139

सुनते सुनते लगभग एक साल से प्रेरणा हुई, तभी आ पाया। परिवार के दलदल में ऐसा फँसा हूँ कि चार महीने से आना हो नहीं पा रहा था। एक बार गौतम बुद्ध की तरह बिना बताए चल जाने का मन हुआ, पर आपके वचनों से बिना बताए जाना उचित नहीं लगा। दो बच्चों की शादी करनी है, इसलिए बताकर आया। बड़ा बेटा सपोर्ट कर रहा है, बाकी पत्नी और बच्चे सब खींच रहे हैं। निकलना बहुत कठिन लग रहा था। अब क्या करूँ?

P7-0106

लक्ष्मण पूछते हैं, गुरु जी, माया से कैसे निकलें?

P7-0100

पत्नी घर के कामधंधे में लगी रहती हैं। मैं कहता हूं अब छोड़ दो, मैं चुपचाप पुस्तक पढ़ना चाहता हूं, अध्यात्म में लगना चाहता हूं, पर काम नहीं छूट रहा। सुबह सबको उठा देती हैं, पांच बजे जगाकर कपड़े धोने में लगा देती हैं। कई बार कहा, दो तीन घंटे पुस्तक पढ़ो या वीडियो सुनो, नहीं सुनतीं। रिटायर हो गए, फिर भी काम करवाती हैं। बाहर गईं तो काम वाली से काम करवा लेना कह जाती हैं। क्या यह ठीक है?

P7-0098

आप कहते हो, सुनो, समझो, और समझ कर उन शब्दों में जीना चालू करो। कोशिश कर रहे हैं, पर पूरा लागू नहीं हो पा रहा। राग द्वेष अभी छूट नहीं पा रहा। रुकावट कहां है? हमारे लिए तो यह आसान होना चाहिए।

P7-0097

हम दोनों सेंट्रल गवर्नमेंट से रिटायर हैं, दोनों सक्षम हैं। अब क्या करें? परिवार के लिए कितना ईंट पत्थर जोड़ें? पति कहते हैं कहीं अच्छा कार्य में लगा न दूं, सब लुटा दूंगी। कोई भी गेरुआ वस्त्र पहन के आ जाए तो देने का डर है। गेरुआ वाले को कैसे समझें, जरूरत कैसे देखें?

P7-0096

आत्मिक कल्याण की जिज्ञासा प्रबल नहीं थी, शादी परिवार वालों ने कर दी। क्या यह जबरदस्ती नहीं थी?

P7-0093

शरीर को कैसे स्वस्थ रखें, ताकि जहां धन नहीं, शारीरिक बल चाहिए, वहां सेवा कर सकें? दिनचर्या और खानपान कैसा हो? जोड़ों का दर्द उम्र के साथ हो रहा है। और कहीं सहयोग दें तो क्या देखें? पारदर्शिता कहां हो?

P7-0092

हम सरकारी नौकरी से अभी रिटायर हुए हैं। अब उस पैसे का क्या करना चाहिए? मैं उसे सत्कर्म में लगाना चाहती हूं, पर घर के दूसरे प्राणी सहमत न हों तो क्या करें? उस पैसे पर मेरा हक है या उनका? जरूरतमंद पात्र है या नहीं, यह कैसे पता चले? कई संस्थाएं सेवार्थ में लगी रहती हैं, क्या उनके माध्यम से भी यह कार्य हो सकता है? वृद्धाश्रम में जो गलत देखा, उसे बताना चाहिए या नहीं?

P7-0089

अगर गुरु गलत हो, जैसे राजा बल के गुरु गलत थे, तो क्या करें? और अगर कोई भी, परिवार का हो या रिश्तेदार, भटकाने वाला या गिराने वाला काम करा रहा हो, तो क्या करें?

P7-0083

अपनी जिंदगी की क्लैरिटी क्यों नहीं हो पा रही? अंदर गुणों की ताकत नहीं है, शारीरिक बल नहीं है, अधूरापन है, कमियां हैं। जिन पर काम नहीं करना चाहता, उन्हें ढक रहा हूं। भाई कवर कर ले, इधर से कुछ मिल जाए। जहां कमी है, वहां पचहत्तर बार नमस्ते करूंगा, घरवालों की चापलूसी करनी पड़ती है। आज परिवार के साथ, कल पति-पत्नी के साथ, फिर बच्चों के साथ, दादा-दादी बनने तक वही कमजोरी रह जाएगी। जन्म-जन्म डर-डर कर क्यों जी रहे हैं? मैं आपसे डर रही हूं, आप मुझसे डर रहे हो, बात ही नहीं हो रही। कोई किसी को डरा क्यों रहा है?

P7-0082

त्याग की क्षमता हर इंसान में नहीं होती। कोई इतना फंसा होता है कि उसे लगता है अब जीने का फायदा नहीं, और वो अपने आप को सही जगह इस्तेमाल होने के लिए तैयार ही नहीं कर पाता। समाज भी दबाव डालता है कि कुछ भी हो, वो तुम्हारा भाई है, मां-बाप हैं, चाचा हैं, परिवार है। मां-बाप और भाई भी गलत हो सकते हैं। जरूरत पड़े तो माफी मांग लेते हैं, वरना कहते हैं पुरानी बात छोड़ो। व्यक्ति उस दबाव को नहीं झेल पाता। भीड़ में जहां धोखा मिला, वहीं चला गया। अपनी जिंदगी का फैसला नहीं किया, अपने आप से प्यार नहीं किया। परिवार को कर्तव्य कहकर संभालें, तो जब परिवार ही गलत चल रहा हो, तब क्या करें?

P7-0081

इस मानव शरीर में आए हैं, तो कुछ न कुछ कर्म करना ही है। वो मजबूरी नहीं, जरूरत है। कर्म करते हुए अपनी समझ से देखना है कि समाज के लिए, हमारे लिए, और परिवार के लिए क्या हित है, वही करना है। इस जीवन को लगाना कहां है, और सदुपयोग कैसे हो?

P7-0080

अच्छा कर्म करना है, ऐसा कहा गया। कर्म भी अच्छा और बुरा होता है, ये बात समझ में आ रही है। लेकिन धर्म और अधर्म क्या होता है? रास्ते में किसी को खाना दे दिया, तो धर्म लग रहा है। अनदेखा कर दिया, तो अधर्म। अगर उसे अच्छा या बुरा मान लिया, तो अटैचमेंट हो जाएगा, फिर मोह हो जाएगा। क्या उसे अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए, न अच्छा मानें न बुरा, ताकि फंसें नहीं? भाव ये है कि अच्छा-अच्छा कहते हुए मैं भोग में न फंस जाऊं। मुझे मुक्ति का मार्ग चाहिए, बंधन नहीं। मैं मानवता और कर्तव्य से काम करूं, पर अच्छा कहकर वहीं न अटक जाऊं।

P7-0078

समाज और परिवार के लिए व्यक्ति सब कुछ करता है। खाना हो तो पहले परिवार खाए, कपड़ा हो तो पहले परिवार पहने, और फिर भी सहना उसे खुद पड़ता है। उस समय गुस्सा आता है, उसे पीना और कंट्रोल करना पड़ता है। क्या ये गुस्सा हमारा स्वभाव है? गुस्सा क्यों आता है, जब हम कुछ कर रहे होते हैं और परिणाम नहीं आ रहा? परिवार को सौ प्रतिशत देते हैं, हमसे अच्छा खाने और पहनने को देते हैं, पर कहते हैं वो काम मत करना जो बहुत दुखाता है। तब गुस्सा होता है, नाराजगी होती है। कितनी बार कोई ये सहेगा? एक दिन टूट जाएगा, रोते हुए कहेगा, जैसे जीना है जियो। न अलग हो सकता है, न हिला सकता है। अगर समझाने के बाद भी कोई छत से कूदने की बात करता है, जानकर खतरा मोल लेता है, तो उस स्थिति में क्या करना चाहिए?

P7-0075

सुधारक अपनी पूरी जिंदगी पहले तप में लगाता है, फिर समाज के कल्याण में। जैसे वृक्ष जितना ऊंचा होता है, जड़ें उतनी गहरी होती हैं। बीज का आवरण टूटे बिना पौधा नहीं बनता, और वो टूटना हमें सहन नहीं होता, क्योंकि आगे क्या होगा, पता नहीं। हम उसी आदत में जीते रहते हैं और भीड़ का अनुसरण करते हैं। भीड़ सुंदरता का या किसी और चीज का पैमाना रख दे, तो कमी छुपा ली जाती है, जैसे टोपी लगा ली। छुपाकर न हम जिंदगी जी पाते हैं, न सच में खड़े हो पाते हैं। भीड़ का अनुसरण क्यों करते हैं? क्या मेरे अंदर कमजोरी है या खालीपन है? आवरण आखिर क्या चीज है, और हमारे अंदर ये कमजोरी क्यों है कि हम दूसरे की नजर में अपने आप को भरना चाहते हैं?

P7-0014

आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी और सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है?

P6-0170

शिवाजी पूछते हैं, जीवन में सफल होने के लिए ध्यान करें या नाम स्मरण?

P6-0167

विद्वान कहते हैं, एक करोड़ गाय दान कर दो और एक मछली खा लो, तो दान का फल अलग मिलेगा और मछली का फल अलग। एक दूसरे से कटेगा नहीं। क्या यह ठीक है? फिर सत्कर्म से पुरानी बददुआ की भरपाई कैसे होगी? धंधे में झूठ बोलना पड़ता है, घर वाले सच बोलने पर विरोध करते हैं।

P6-0160

अनीता यादव पूछती हैं, सौभाग्य और दुर्भाग्य में क्या अंतर है?

P6-0159

रिश्तेदार हमेशा हमारे परिवार की बर्बादी की सोचते हैं। मैं तेईस साल का हूँ। उनकी नकारात्मकता से कैसे बचकर रहूँ? क्या योग और ध्यान काफी है?

P6-0147

बिना गुरु के नाम जप सफल होगा कि नहीं? गुरु किया नहीं है, तो पहले यह समझना है कि गुरु आखिर है कौन। मैं गृहस्थ जीवन में हूँ। क्या स्त्री को गुरु दीक्षा और मंत्र की जरूरत है? गुरु किए बिना मंत्र कौन सा लूँ? कृष्ण को जगतगुरु मानती हूँ। क्या ऐसा भी है कि जब कुछ नहीं चाहिए, तभी गुरु मिलता है?

P6-0106

साधना में पहले लगा कि कोई बहुत ऊपर ले जा रहा है। फिर दो दिन एक साया दिखा। फिर ईसा मसीह स्पष्ट दिखे और देर तक प्रकाश देते रहे। असीम शांति हुई। सनातन, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब पढ़े हैं, ईसाई धर्म इस जन्म में नहीं पढ़ा। ईसा मसीह कैसे दर्शन दे गए? परिवार का कोई आ जाए तो क्या करूं?

P6-0105

नागपुर से आई मां कहती हैं, धन, गहना और बेटा-बेटी से लगाव छूट गया लगता है। पति की जंजीर थी, उसे छोड़कर आई हूं। मौन मिल गया, काम भी छोड़ दिया। परिवार वापस बुलाता है। इक्कीस दिन का टारगेट है। क्या मैं मुक्त हो गई? जाऊं या यहीं रहूं? आखिरी इच्छा और बेड़ी का क्या संबंध है? गुरु क्यों चाहिए?

P6-0101

हरियाणा से आई बहन साधना में लगातार बैठने से पैर और शरीर के दर्द में बहुत परेशान थी। कहा गया था, या तो बैठो या चली जाओ, उसके बाद दर्द चला गया। साधना में दर्द और पीड़ा को कैसे देखें? गुरु कठोर क्यों होता है? शरीर, धन और समझ की ताकत को संचित करें या कहां लगाएं?

P6-0099

गृहस्थ और सामाजिक रहते हुए क्या आत्मज्ञान संभव है? आसान है या कठिन?

P6-0085

क्या हमारे हाथ में सच में पावर है? परिवार में अपने को मालिक कहते हैं, पर बात नहीं मानी जाती और अपने ही पैसे पर गुलाम हो जाते हैं। क्या यही गुलामी है, और फिर क्या करना चाहिए?

P6-0083

सात्विक, राजसी और तामसी, तीनों गुणों में रहते हुए हर जगह युद्ध क्यों बना रहता है? परिवार में रोज इल्जाम लगते हों, तो साधक को क्या करना चाहिए?

P6-0079

अगर एक व्यक्ति केवल फोटो लगाकर माला जपे और दूसरा काम में हाथ बंटाए, तो प्रसन्नता किस पर होगी? शरीर मिल जाने से ही क्या मनुष्य हो गए? मानव और जानवर में क्या अंतर है, और बेईमानी से फंसे हुए को छुटकारा कैसे मिलता है?

P6-0077

जो परिवार छोड़कर केवल ध्यान लगाता है, आकाशवृत्ति से रहता है, धन नहीं जोड़ता, उसे गाली और मार भी मिलती है। उसका क्या होता है? कृष्ण ने अर्जुन को आत्मभाव में टिकने के लिए भी कहा था, तो कर्म का सिद्धांत क्यों बताया? अर्जुन आत्म तत्व में कैसे स्थिर हुए? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं कहना भी एक विधि है, जिससे कल्याण नहीं होता?

P6-0073

मैं घर से कुछ औषधियां आपके लिए लाई हूं। क्या आप ले लेंगे? सेवा में लगना चाहती हूं। पौधों की सेवा में क्या करूं, थोड़ा मार्ग बता दें।

P6-0065

साधक आत्मिक रास्ते पर यह कैसे समझे कि वह सही रास्ते पर जा रहा है? कैसे पता चले कि हम अध्यात्म में हैं या नहीं? आए हुए सात दिन हुए हैं। बोलने से मना था, फिर भी बोल दिया। नियम पूरी तरह नहीं निभा।

P6-0061

एक संसारी को फिलहाल एक ही कारण नजर आ रहा है कि मैं इसी से दुखी हूं, प्रपंच नजर नहीं आता। जैसे पड़ोसी पसंद नहीं और मन में आता है कि यह मर जाए, आज यह मर जाए, कल वो मर जाए। उस कारण तक चला भी जाऊं तो अपने स्वभाव को कैसे सुधारूं? वह भाव गंदी आदत लगता ही नहीं, मैं यही जानना चाहता हूं। अगर अपनी स्थिति बुरी लगती ही नहीं तो कैसे चेक करूं? परिवार से जानकारी मिली कि उनसे रंजिश है, दुश्मनी है, उन्होंने हमारे किसी को मारा, मैंने खुद नहीं देखा, फिर भी भाव बन गया कि यह मर जाना चाहिए, मैं ही उड़ा दूं, जबकि वो भी योजना बना रहे होंगे। गली में रेड़ी वाले का रेट ना भाए तो बद्दुआ, गाली और अपमान तक निकल आता है। मैं खुद परेशान हूं और वो अड़चन भी डाल रहे हैं। ऐसे में अपनी स्थिति कैसे जानूं, यह भाव क्यों उठ रहा है, और मैं इसमें क्यों लिप्त हो रहा हूं?

P6-0055

नमन योगी जी। मैं अपनी स्थिति का जायजा कैसे लूं? अगर गहराई से जानना हो और जीवंत गुरु न मिले तो क्या करूं? महिलाएं ऐसा भ्रमण कैसे करेंगी? अगर मैं अपनी स्थिति घर पर ही जांचना चाहूं और कोई ऐसा गुरु न हो कि आज पहले अपने आप को समझूं, तो थोड़ा भी कैसे समझूं? क्या स्त्री शरीर या डर निकलने में बाधा बनता है?

P6-0041

जीवात्मा का नाम इसलिए पड़ गया कि आत्मा ने जीव शरीर ग्रहण किया। कोई हृदय चक्र को आत्मा का निवास कहता है, कोई और जगह ध्यान करवाता है, कोई कपाल में बताता है। एक योगी का प्रैक्टिकल यह था कि आत्मा का शरीर में निवास स्थान नहीं है, सूरज की किरण की तरह केवल एक किरण पड़ रही है और शरीर क्रिया कर रहा है, आत्मा शरीर में है ही नहीं। इतनी बातें सुनकर उथल पुथल मचती है। असल में आत्मा कहां है? जब नाम ही नहीं दिया जा सकता तो मान लो क्यों कहा जाता है? मानना और जानना में मैं किस प्रक्रिया में हूं? मानने की अवधि कितनी है, और मांग के हिसाब से समय कितना लगता है?

P6-0036

दूसरे के प्रश्न में टोकना / कमजोर समझना सही?

P6-0021

पूर्ण ईमानदारी नौकरी-बोलचाल में कैसे रखें जब शब्दों में घोल हो जाए?

P5-0189

सत्कर्म करने पर सिकुड़ना बनाम फैलना — कैसे समझें?

P5-0186

ईमानदार हो गए तो कम कमाने क्यों लग जाते हैं? स्किल तो अंदर ही है — ईमानदारी के साथ ज्यादा कमाकर सत्कर्म क्यों न करें?

P5-0169

आत्मज्ञान की राह पर मित्र-परिवार-समाज छूटने लगता है — समाज में कैसे रहें?

P5-0121

परिवार/लोग विवश-परेशान करें तो क्या? बंधन कैसे बनता है? उकसाने पर क्रोध क्यों?

P5-0118

मन पर नियंत्रण कैसे हो?

P5-0094

यहां व्यवस्था में क्या कमी है? एडजस्ट करना पड़ता है क्या?

P5-0093

साधक के लिए सबसे जरूरी बात क्या है? अपनों की कुटिया में रहने के नियम क्या हैं?

P5-0084

(गुरुद्वारा सेवक) अरदास में बीमारी-शादी आदि के लिए प्रार्थना करनी पड़ती है — ड्यूटी है। क्या करें?

P5-0059

परिवार में रहकर पहले ईमानदार कैसे बनूं? ईमानदारी का परिणाम नुकसान भी हो सकता है तो क्या करें?

P5-0055

यहाँ क्या करें — साधना या विश्राम? लोगों को आराम की जरूरत क्यों?

P5-0040

(लाइव/कुटिया) आत्मज्ञान के बाद प्रश्न हट गए — फिर भी कुछ पूछना रहता है? इस जन्म में हर कोई प्रयास कर सकता है?

P5-0036

(संदर्भ: कुटिया निर्माण) इतने जीव मरते हुए दिख रहे थे फिर भी कुटिया क्यों बनाई?

P5-0030

हमें कैसे पता लगेगा कि हमें आत्मज्ञान हो गया है?

P5-0027

(कुटिया में साधक) हम अपने आप पर विश्वास कैसे करें — जो कर रहे हैं सही है या गलत? अध्यात्म / आत्मचिंतन कैसे शुरू करें? चिड़िया-गिलहरी को अपना खाना डालना सत्कर्म है?

P5-0009

(वही साधिका) बहुत से थॉट्स आते हैं — कुछ बनना है, कुछ करना है — तो फैमिली का थॉट आता है कि इन्हें छोड़कर जाएंगे तो पीछे इनका ध्यान कौन रखेगा; बाहर निकल भी जाते हैं तो लगता है वहां ठीक नहीं चल रहा, और टारगेट रुक-रुक जाता है। मदर का केयर करना मेरी प्रायोरिटी है, पर फिर आवाज आती है कि आत्मा की भूख का क्या हुआ। जिम्मेदारी लेना चाहते हैं पर हैंड-ओवर नहीं की जा रही, और जो (परिवार का) शिप चला रहा है वो अच्छे से नहीं चला रहा — तो क्या किया जाए?

P4-0200

(वही साधिका) मैं अब जिस तरीके से बात करती हूं, मेरी मम्मी से बात ही नहीं हो पाती, वो सुनना भी नहीं चाहतीं। तो क्या बात ना करूं? अगर लगता है कि वो दुख में हैं, तो क्या उन्हें निकालने की कोशिश न करूं?

P4-0194

(कुटिया में एक और साधिका, जिनका भी बाल विवाह हुआ; पति बहुत परिवार-प्रेमी हैं, अब फिजिकल रिलेशन भी नहीं चाहते, पर कहते हैं कहीं भी जाओ, बस वापस घर आ जाना) — उन्हें क्या कहूं?

P4-0161

(वही साधिका) 2011 में आपका यह क्वेश्चन था — तो 2010 से पहले यह क्वेश्चन आपने कहां से उठा लिया था? हम तो इतनी साधना किए नहीं, तो 'आत्मज्ञान चाहिए' कहना हमें बकवास जैसा लगता है।

P4-0155

(कुटिया में साधिका) योगी जी, आप कहते हो कि सारी समस्या उम्मीद पर टिकी है, उम्मीद छोड़ दो। लेकिन मुझे तो किसी से कोई उम्मीद दिखाई ही नहीं देती, बचपन से मैंने अपने बलबूते पे किया है। मेरा भय यह है कि कभी शरीर में कोई बड़ी बीमारी आ जाए, बुद्धि काम ना करे, या प्रारब्ध इतना तगड़ा हो कि मेरी यात्रा ही ना हो पाए। तो मेरी सूक्ष्म से सूक्ष्म उम्मीद मुझे कैसे पता चले? मुझे तुरंत वाला मार्ग बता दो (वाल्मीकि की तरह बैठ जाऊं), ताकि जब तक मैं स्वस्थ हूं, समय बर्बाद ना हो।

P4-0145

(लाइव) गुरु जी नमन। अपनों की कुटिया में कोई सेवा नहीं है, तो सुबह साधक को अपनी शुरुआत कैसे करनी चाहिए? और वहां सत्कर्म क्या होगा?

P4-0140

(कुटिया में सन्यासी महाराज जी) गुरु जी, कल आप सिद्धेश्वर गए, वीडियो में देखा। आपने कहा था कि आपकी खोज की आखिरी जगह वहां थी — क्या उपलब्धि उस स्थान पर हुई? क्या वह स्थान उस पल का साक्षी है?

P4-0138

(लाइव) गुरु जी नमन। कैसे पता करें कि कौन सा कर्म ठीक है और कौन सा गलत? किसी को कुछ सही लगता है तो किसी को कुछ और।

P4-0132

(कुटिया में साधक, पेंशनर) मैं जहां रहता था वहां धन से सेवा करता था — खाने-पीने के अलावा बाकी पैसे मैं रखता नहीं था, सेवा-सत्संग में लगा देता था। परिवार से विवाद हुआ तो निकल गया, आठ महीने बागेश्वर में रहा, वहीं आपका वीडियो मिला और तुरंत सब समझ में आ गया। अब यहां आ गया तो मेरा पैसा किसी काम में नहीं आ रहा; परिवार वाले उसे खा जाएंगे। मैं चाहता हूं कि वह पैसा यहां सेवा में लगा दूं — किसको, कैसे दूं?

P4-0114

(लाइव) प्रणाम गुरु जी। समर्थ परिवार में जिज्ञासु का माता-पिता के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए?

P4-0067

(कुटिया में, एक शिक्षक साधक) आप (किसी शहर में) तीन दिन — रोज दो घंटा — सत्संग के लिए आ सकते हैं? (गोयल जी ने 6 लाख देकर सत्संग कराया था।) मन तो है कि मैं भी करवाऊं, लेकिन इतनी ताकत नहीं — 1 लाख पगार है, पर साथ में 10 लाख का कर्जा है। और हम (घर-परिवार से) अलग में हैं, इसलिए भगवान का भाग निकालना समझ में आता है।

P4-0061

(कुटिया में साधक) आज का युवा — जो यूपीएससी या कोई बड़ी तैयारी कर रहा है, या कॉर्पोरेट में जॉब कर रहा है — उसमें एक ट्रेंड देख रहा हूं कि अपने कर्तव्यों को छोड़कर कहीं एकांत में, या किसी की शरण में भाग जाता है; और जानने-समझने के बाद भी वापस नहीं आता। अगर किसान खेती छोड़ दे, सब ऐसे अकर्मण्य हो जाएं, तो व्यवस्था कैसे चलेगी? वे भटक रहे हैं; आप उन्हें कुछ मार्गदर्शन देंगे?

P4-0057

(लाइव) योगी जी, क्या आत्मज्ञान के लिए परिवार को छोड़ना जरूरी है?

P4-0015

(लाइव) नर्मदे हर गुरु जी। क्या अपनी कमाई का 10% अपनों की कुटिया में दे सकते हैं? मेरी प्राइवेट नौकरी है, सैलरी लिमिट में है, लेकिन इच्छा है कि मेरे द्वारा कुछ सत्कर्म हो।

P3-0177

(कुटिया में, तीसरी बार आए साधक) यहां के सिवा वहां कुछ नहीं है; मजबूरी में घर जा रहा हूं क्योंकि परिवार है, लड़का 12 साल का है — आपने बताया कि बच्चों की शादी तक जवाबदारी निभानी है। पर वहां अपने जैसे लोग और माहौल नहीं मिलता, जाने में बहुत तकलीफ होती है; यह मजबूरी बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, वहां के लोगों के साथ रहने में बहुत दिक्कत होती है।

P3-0134

गुरुदेव, मां-बाप की करोड़ों की स्टेट बच्चों को मिलती है — उसका क्या? और समझ तो अभी आई है, बदलाव अभी कर रहे हैं, पर परिवार ने पहले के हिसाब से इच्छाएं पाल ली हैं और कहते हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता — तो क्या करें?

P3-0132

परिवार कहता है — हमने तुम्हारे लिए किया, तुमने माल खाया है तो भरपाई करो। इस हिसाब का क्या करें? भरपाई करने का सही तरीका क्या है?

P3-0122

(लाइव) गुरु जी, यह मार्ग तो बहुत पीड़ादायक है, सबकी हिम्मत नहीं होती इस पर चलने की। मैं भी सत्य को खोजना चाहता हूं, लेकिन जब मैं अध्यात्म की बात करता हूं तो पूरा परिवार और समाज मेरे विरुद्ध खड़ा हो जाता है।

P3-0119

(लाइव) एक कथावाचक कह रहे हैं कि जो कुंभ (भगदड़) में मर गया उसको मोक्ष हो गया। गुरु जी, मोक्ष की परिभाषा बता दीजिए — क्या कुंभ में मरने से मोक्ष होता है?

P3-0118

(लाइव) गुरु जी, हमारे परिवार में तो कोई नहीं समझता कि आध्यात्मिक क्या होता है।

P3-0113

गुरुदेव, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए, और फिर यह भी बोलते हैं कि यहां 200-300 करोड़ का काम होगा, 100 रूम बनेंगे — तो क्या यह चाहने में नहीं आ गया? लोक कल्याण भी तो एक चाहत हुई?

P3-0101

(उसी प्रसंग में) दूसरे का बालक संन्यासी हो तो कहते हैं सात पीढ़ी तार दी, अपना हो तो कहते हैं बिगड़ गया। गुरु जी, क्या संसार में भी अच्छे और अध्यात्म में भी अच्छे, आध्यात्मिक मां-बाप मिलना बहुत कम है?

P3-0098

कर्म योनि और भोग योनि क्या है? मानव शरीर और अन्य जीवों के शरीर में क्या अंतर है?

P3-0097

एक माता जी: मैं कई बार सोचकर पछताती हूं कि यह सब — सही-गलत क्या है, मैं कहां हूं — हमें हमारे परिवार ने क्यों नहीं बताया? किसी को कुछ पता हो तो बताना तो चाहिए।

P3-0092

वह जो विष्णु जी दिखे, वे क्या थे? क्या वे शक्तियां मेरे पास रुकेंगी?

P3-0088

गृहस्थी में बैलेंस कैसे बनाएं — संन्यासी वाली सीधी बात पर हम एकदम नहीं आ सकते। क्या रिश्तों की बुनियाद में मुझे यह देखना पड़ेगा कि वहां मेरी जिम्मेदारी है या वह व्यक्ति मेरा पैसा यूज़ करके कुछ और कर रहा है? अगर जिम्मेदारी बनती है तो क्या पैसा न देखकर, अपने से बचाकर भी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए? (उदाहरण: किसी का टिकट कराया — क्या उससे स्तर उठता है?)

P3-0081

परिवार पहचान पर दर्द — अपना-पराया क्या? मार्गदर्शन?

P3-0064

हर कोई गुरु सानिध्य में नहीं रह सकता — जिम्मेवारियां। क्या शब्द/ज्ञान से दूर रहकर चलें? एक महीना?

P3-0057

दूसरे में इच्छाशक्ति/आत्मबल पसंद आता है पर खुद उस मार्ग पर क्यों नहीं चल पाती? असफल होकर पछतावा — आंसू किस अर्थ के?

P3-0053

अध्यात्म में फेल/अटैचमेंट कैसे जांचें? रोने में भी रस?

P3-0049

समझ आती है पर दृढ़ता/स्ट्रॉन्ग पावर नहीं — परिवार बैकग्राउंड आध्यात्मिक नहीं। क्या करें? गिरने का डर?

P3-0042

मां-बाप बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा कैसे दें? मैरिज से पहले तैयारी?

P3-0040

अटैचमेंट तोड़ना दर्दनाक लगता है — परिवार छोड़ो कैसे? उपलब्धि के लिए अटैचमेंट कितना टूटे?

P3-0020

कृपा किसको, किस पर करनी है? परिवार-समाज में ईमानदारी से सब देकर भी जब टूटता हूं तो करुणानिधि से कृपा मांगता हूं; भाव कुछ दिन ठहरता है फिर वैराग्य ढीला पड़ जाता है और वही रूटीन। भाव स्थिर रखने के लिए कृपा उन पर बरसे या मुझे खुद पर कृपा करनी है?

P3-0008

समझ गया कि समझ कर ही फंसा हूं और पिछले राग-बंधन छोड़ेंगे नहीं क्योंकि मैंने उनका उपयोग किया। क्या अब सिर्फ समझ से पीछा छुड़ा सकता हूं?

P3-0006

पार्टनर या परिवार वाले अध्यात्म में रुचि नहीं रखते; लालच-कहानी-जबरदस्ती से पढ़ाने का प्रयास करते हैं। सीमा दीदी जैसी भाव से सेवा करती हैं पर अध्यात्म से मतलब नहीं। क्या हमें उन्हें खींचना चाहिए या अपनी ऊर्जा बचाकर अपनी यात्रा पर फोकस करें?

P3-0002

गृहस्थ मुखिया को दिन में वैराग्य की लहर आती है — कोलू का बैल बन गया, भागने का मन; फिर जिम्मेदारी और रोटी-छत की चिंता से लहर ठंडी पड़ जाती है। वैराग्य की गर्मी बनाए रखते हुए जिम्मेवारियां निभाते हुए अध्यात्म में रोज कदम कैसे बढ़ाएं?

P2-0198

महानगरों में रहने वाले लोग, जो आपसे जुड़े हैं, अब समझ रहे हैं कि नौकरी में ईमानदार तो रहे, पर सत्कर्म नहीं किया — मुंह लक्ष्य की ओर रहा, पर कदम नहीं बढ़े। पर महानगरों में पक्षियों-चींटियों को दाना डालने की जगह या सच्चे जरूरतमंद ढूंढना मुश्किल है; भिखारी भी ₹1 दो तो ऐसे देखते हैं जैसे अपमान कर दिया। वहां हम क्या सत्कर्म कर सकते हैं?

P2-0188

गैर-जिम्मेदार व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारी पर कहता है — मैं इतना ही कर पा रहा हूं, इस स्तर का काम मैं नहीं करूंगा, मेरी भी सेल्फ-रिस्पेक्ट है, मुझे टॉर्चर मत करो; यह मेरी आत्मरक्षा है। क्या यह आत्मरक्षा है?

P2-0184

ज्ञान होने तक तो ये घाव बार-बार हरे हो जाते हैं; याद आते ही मन घृणा से भर जाता है और न चाहते हुए भी उनके लिए बद्दुआएं निकल जाती हैं। फिर डर लगता है कि इस द्वेष से मैंने फिर कर्म-बंधन बांध लिया। अगर ज्ञान से पहले शरीर छूट गया, तो क्या इस द्वेष के कारण मैं फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द, उनके परिवार में पैदा हो जाऊंगा — वही चक्र, जिसे मैं तोड़ना चाहता हूं?

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कई गृहस्थ माताएं-बहनें हैं जिनके बच्चे और पति उन्हें पूरी आजादी देते हैं, काम के लिए नौकर भी रख देते हैं, कि आप पूरी तरह अध्यात्म में रहो; फिर भी वे आधा समय वैराग्य और भगवान की बातें करती हैं और आधा समय घर के हर काम में दखल देती हैं — बहू क्या कर रही है, रसोई में तेल-घी ज्यादा क्यों। घर वाले भी दुखी हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अगर मेरे परिवार में हो, तो हम उसके लिए क्या कर सकते हैं?

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(जया बहन का पत्र:) गुरु जी, न मैं मीरा हूं जो घर में रहकर भजन करूं और गलियों में निकल पड़ूं, न शबरी जो एक जगह कुटिया बनाकर इंतजार करूं। आपका बताया सत्संग, ईमानदारी और सत्कर्म कर रही हूं। जिम्मेदारियों ने घेर लिया है — न अपनों की कुटिया में आ पाती हूं, न घर पर रह पाती हूं; जीना बहुत मुश्किल हो गया है। कर्तव्य कैसे पूरे करूं, कब निकलकर हमेशा के लिए आपके चरणों में आ सकूं? मैं क्या करूं?

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बहुत लोग सच्ची जिज्ञासा होते हुए भी आसान रास्ता खोजते हैं — रातभर कीर्तन, भजन, परिक्रमा — और जहां भीड़ दिखी, वहीं चले जाते हैं। इतनी दुकानें, इतनी किताबें हैं कि आदमी भटकता है: कहीं ध्यान सीखा, ऊर्जा तीसरे नेत्र पर अटक गई, सिरदर्द हो गया, अवसाद आ गया; न घर के रहे न घाट के, कोई कहता है मुझे आत्मज्ञान हो गया। ऐसा व्यक्ति कैसे जल्दी पहचाने कि दिशा गलत पकड़ ली है, वह कल्पना में जा रहा है?

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गुरु जी, जीवन में सब अच्छा लगता है, फिर भी आत्मज्ञान की प्यास है। दो बच्चों की जिम्मेदारी भी है, पर आपके साथ हर पल शरीर सहित रहना चाहती हूं। क्या करूं?

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गुरु जी, अगर कोई 30 दिनों में 30 रुपये कमाता है और आपके सत्संग व ऊर्जा का लाभ लेता है, तो उसे उसमें से आपको कितना सहयोग करना चाहिए?

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जब हमने अपनी मर्जी से शादी की है, तो मृत्यु तक अपने परिवार को न छोड़ना हमारी जिम्मेदारी है ना?

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तो क्या गृहस्थ आश्रम में अपने परिवार के प्रति हमारी संपूर्ण जिम्मेदारी है?

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गुरु जी, कोई नाम लेकर बता रहा है कि आपके परिवार पर टोना-टोटका हुआ है। ऐसी चीजें होती हैं या नहीं?

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(जो व्यक्ति किसी की बात नहीं मान रहा और खुद को फंसाता जा रहा है) क्या उसके ज्यादा पीछे नहीं पड़ना चाहिए?

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गुरु जी, यह तो विरोधाभासी हो जाएगा — क्या कोई संत घर-परिवार में रहकर भी सिद्धि प्राप्त कर सकता है?

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गुरुदेव, आप घर क्यों छुड़वा रहे हैं? परिवार वाले कहां जाएंगे? क्या अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहिए?

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मैं अपने दो बच्चों को अकेले संभालती हूं; परिवार वाले कोई साथ नहीं देते। क्या करूं?

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परिवार में रहकर आत्मचिंतन कैसे करें?

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सत्संग सुनने के बाद समझदारी तो बहुत बढ़ गई, लेकिन समाज और परिवार से कनेक्ट होना मुश्किल हो रहा है।