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प्रश्नोत्तर — भाग 3

योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 200 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

जिज्ञासु किसे कहते हैं — क्या वही जिसको बहुत हो गया और मूल में स्थिर होना चाहता है? वैराग्य कोई सत्संग दिला सकता है या वैराग्य स्वतः आता है? क्या आप किसी को याद दिला सकते हो?

उसे याद आएगा तो मैं वहां पहुंचने में सहायता कर दूंगा। वैराग्य कोई किसी को दिला नहीं सकता। जैसे आपको अपना गांव याद आ जाए लेकिन रास्ता नहीं मालूम — रास्ते की हेल्प मैं कर सकता हूं, गांव का नहीं। गांव याद है, रास्ता नहीं — तब कोई भी मदद कर सकता है जिसे पता हो। गांव नहीं याद तो मतलब आपको जाना नहीं, आप जहां हो। वैराग्य कैसे लगता है? जहां जिओगे, आपकी समझ से ही लगेगा। जिंदगी जी रहे हो वहां समझ में आएगा कि मेरी जिंदगी का उद्देश्य ये नहीं — रोज वही खाना-कमाना, एक-दो बंगला-गाड़ी; इससे क्या होगा? देख पाओगे — मशीन बन गए, ये जिंदगी नहीं चाहिए। शुरुआत भी पता है, अंत भी; समाज में आनंद में जिए लोगों को भी देखा।

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गृहस्थ मुखिया को दिन में वैराग्य की लहर आती है — कोलू का बैल बन गया, भागने का मन; फिर जिम्मेदारी और रोटी-छत की चिंता से लहर ठंडी पड़ जाती है। वैराग्य की गर्मी बनाए रखते हुए जिम्मेवारियां निभाते हुए अध्यात्म में रोज कदम कैसे बढ़ाएं?

मान लीजिए आपके पास मशीन बिगड़ जाए — क्या हिमालय जाकर बैठे रहोगे, बन जाएगा? नहीं। बनाने वाला चाहिए; आपको तो नहीं आता, प्रयोग में बिगड़ी। तो हमें शास्त्र पढ़ने चाहिए, महात्मा-संतों की वाणी पढ़नी चाहिए, और गुरु की खोज करनी चाहिए। गुरु कैसा होता है, वाक्य कैसे, रहन-सहन कैसे — जानकारी लो। गुरु शब्द है, ज्ञान का प्रतीक। जो मार्ग बताए, बात समझ में आए, राग-द्वेष-मोह-शक्ति-इच्छा-अपेक्षा और कर्ताभाव छूटने लगें — वो गुरु है। कहा गया गुरु के प्रति तन-मन-धन समर्पित करो — शरीर के प्रति नहीं, शब्द के प्रति। जो ज्ञान मिल रहा है उसमें जीना शुरू करो; वही समर्पण है। शब्दों में जिओगे तो जीने का तरीका अलग होगा; शरीर का उपयोग सत्कर्म-ईमानदारी में होगा। लोग भावार्थ व्यक्ति-विशेष के शरीर को समझ लेते हैं; गुरु तत्व है — आत्म तत्व में स्थिर, उसकी अंतरात्मा से शब्द, उन शब्दों में जीना। शास्त्रों, संतों, महात्माओं की वाणी का सहारा लो और गुरु की खोज करो। बारह महीने में एक महीना भ्रमण भी दो — कब तक? जब तक गुरु न मिल जाए। गुरु मिल जाए तो उसके सानिध्य में; गृहस्थ हो तो परिवार को ग्यारह महीना, एक महीना गुरु का — अगर अपना कल्याण चाहते हो।

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गृहस्थ में काम-धंधा भी देखना होता है; आजकल किताबें-पत्रिकाएं-सोशल मीडिया में नकली-असली का भ्रम बहुत है। प्रयाग में नागा साधु पैसे मांगते देखे, आईटीन बाबा आदि — फक्कड़-दिगंबर पहचान नहीं आती। गुरु की खोज और शास्त्र कैसे चुनूं कि वैराग्य धूमिल न हो, कोई बेवकूफ न बना दे, और नब्बे साल घूमते रहकर भी न पहुंचूं जैसी हालत न हो? गृहस्थ में वैराग्य की प्रचंडता कैसे बनी रहे?

गुरु ज्ञान का प्रतीक है। पीछे संत महापुरुष हुए — रमण महर्षि, रामकृष्ण परमहंस, नरसिंह मेहता, मीराबाई, बुद्ध, महावीर, संत रविदास जी — अनेक। उनके बारे में पढ़िए, जीवन चरित्र पढ़िए। उपलब्धि के बाद मत पढ़िए; उपलब्धि के पहले पढ़िए — कैसे साधनाएं कीं, कैसे आगे बढ़े। गीता पढ़िए। फिर एक महीने भ्रमण के लिए निकलिए। जैसे छोटे बच्चे — मां उंगली पकड़ती है, गिरते हैं, चोट लगती है, फिर धीरे-धीरे चलने-दौड़ने लगते हैं। खोज में ये सब होगा — नकली मिलेंगे, असली मिलेंगे। पहले नकली ही मिलेंगे, क्योंकि असली का सामना अभी नहीं कर पाओगे; इसलिए भी कि तुम्हें भी नकली जिंदगी चाहिए, असली के लायक अभी हो ही नहीं। जब नकली पहचान लोगे तो असली मिल जाएगा — नकली के पीछे ही असली खड़ा है। सीधा असली मिल जाए तो आपकी जिंदगी वैसी है ही नहीं; पारखी नजर अभी नहीं। शुरुआत में अध्ययन करो, एक महीना भ्रमण करो; गुरु मिल जाए तो शरण में। गृहस्थ हो, दायित्व निभाना है तो कम से कम उसके सानिध्य में एक महीना। ठोकरे तो खानी पड़ेंगी — इतिहास देखो, बुद्ध, महावीर, मीरा, कबीर, नानक, ज्ञानेश्वर, विवेकानंद — कितने नकली का सामना; नकली छोड़ते गए तो असली मिला।

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ईमानदारी और सत्कर्म में प्रयासरत हूं — क्या इसी को गाइडलाइन मानूं कि अपूर्णता से पूर्णता की तरफ बढ़ रहा हूं? प्रमाण क्या है?

बढ़ रहे हो। धीरे-धीरे अशांति, घुटन, व्याकुलता कम होगी — ये भी प्रमाण। जैसे दवा ली तो आध घंटे बाद आराम; चोट पर मलहम तो दूसरे दिन राहत। जैसे ही समझ में आएगा, समझने में ही राहत मिलने लगेगी। खुद का अनुभव; दूसरा प्रमाण आवश्यक नहीं। सत्संग समझोगे, गुरु द्वारा ज्ञान मिलेगा — समझने में ही राहत।

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वैराग और वैराग्य में क्या अंतर है? शास्त्र कब समझ में आएंगे?

वैराग जगा मतलब समझ में आ गया — कुछ है नहीं, कहां परेशान हूं, कैसी जिंदगी: पैदा हो, कमाओ, शादी करो, बच्चे पैदा करो, मर जाओ; कीड़े-मकोड़ों की तरह नहीं मरना। ये वैराग है। तब क्या? इससे निकलना है — निकल के कहां? इससे निकलना है; इसको कहते हैं वैराग्य। ‘ये वाली जिंदगी मुझे अब नहीं चाहिए’ — अभी समझ में आई; नहीं चाहिए की बात नहीं, समझ में आ गया कि जो जिंदगी जी रहा हूं अब नहीं चाहिए — सिर्फ समझा है; इसे वैराग बोलेंगे। फिर अगला — कैसे चाहिए — ये वैराग्य। सारा खेल राग और द्वेष में है। वैराग से वैराग्य जगेगा तब शास्त्रों में जाओगे। वैराग-वैराग्य जब जगेगा तब शास्त्र समझ में आने लगेंगे, इस मार्ग वाले लोग समझ में आने लगेंगे। अगर नहीं जगा तो चार वेद, अठारह पुराण, छह शास्त्र, सारे महापुरुषों की वाणी सुना दो — कुछ नहीं होगा, क्योंकि जगह ही नहीं। चोट लगी ही नहीं तो पूरी दुनिया की दवा किस काम की?

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पार्टनर या परिवार वाले अध्यात्म में रुचि नहीं रखते; लालच-कहानी-जबरदस्ती से पढ़ाने का प्रयास करते हैं। सीमा दीदी जैसी भाव से सेवा करती हैं पर अध्यात्म से मतलब नहीं। क्या हमें उन्हें खींचना चाहिए या अपनी ऊर्जा बचाकर अपनी यात्रा पर फोकस करें?

मेरे समझ से अपनी यात्रा करनी चाहिए। एक-दो बार बोल दिया — बहुत है। जिससे वर्षों आध्यात्म चर्चा की, क्या उसने कभी सामने से कहा ‘कुछ बताओ’? जिसको कहानी सुननी हो आधी सुना दो तो पूछेगा बाकी कब — इंटरेस्ट रहता है। आपने वर्षों चर्चा की और उसने कभी खुद न पूछा — मतलब जिज्ञासा नहीं थी। बच्चों को बचपन से शिक्षा दो, अबोध हैं; लेकिन विवाह के बाद एक-दो बार बोलो, इच्छा नहीं तो छोड़ दो। ठोकर मारेगा समय तो खुद खोज लेगा। पीछे समय बर्बाद नहीं करना। साल में एक बार सत्संग हो — मैं बहुत बोल चुका; अब भाव ये कि जिज्ञासु सामने हो तब सत्संग। पहले पकड़-पकड़ वीडियो बनाता था ताकि ज्ञान निकले; अब वीडियो वाली इच्छा गई, प्रबल जिज्ञासु चाहिए। ज्ञान कुएं जैसा — जितना निकालो उतना आता है; पूछोगे तभी निकलेगा। प्रत्यक्ष ज्ञान लोगों के लिए खोजा; लोग न रहें तो निकलता ही नहीं।

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जब साधना में कुछ प्रत्यक्ष होने लगे — तंत्र, मंत्र, परिणाम — तो लालच आता है और दौड़ कई गुना बढ़ जाती है। वो गति कैसे बनाए रखें?

ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग — और जहां हो वहां समझो। जैसे-जैसे वहां से समझोगे, अटैचमेंट कम होगा; ऊर्जा जो अटैचमेंट में लगी थी बचेगी और दूसरी तरफ लगेगी। जीव आत्मा: आत्मा जीव बनकर या माया में रहेगी या आत्म तत्व में स्थिर ब्रह्म में। जैसे-जैसे समझोगे और मानसिक छूटोगे, जीव धीरे-धीरे खत्म होने लगेगा। रहना नहीं चाहता लेकिन हटेगा कैसे? समझ-समझ कर — क्योंकि समझ कर पकड़ा है। कामनाओं-रस में समझ कर घुसे हो; समझ के ही निकल सकते हो।

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समझ गया कि समझ कर ही फंसा हूं और पिछले राग-बंधन छोड़ेंगे नहीं क्योंकि मैंने उनका उपयोग किया। क्या अब सिर्फ समझ से पीछा छुड़ा सकता हूं?

ईमानदारी करोगे, सत्कर्म करोगे; सत्कर्म से आशीर्वाद मिलेगा; आशीर्वाद से कोई समझ देने वाला मिलेगा कि कैसे निकलो — तब निकल पाओगे। ऐसे प्रयास करोगे नहीं निकल पाओगे, और फस जाओगे। झटके से छोड़ देते हैं तो अगले पकड़ ले जाते हैं, पहले से ज्यादा तकलीफ। अगर संभालने वाला मिल गया तो उनकी ऊर्जा काम नहीं करेगी। जैसे बाबूलाल का परिवार विचलित हुआ — खुद सुधार नहीं पा रहा था; मैं व्यक्तिगत बात किया, शब्दों में समझ दिया कि कैसे निकले; मेरे शब्दों ने उनकी ऊर्जा हटा दी। मणिपुर से फोन — ईमानदारी-सत्कर्म बचपन से जानता था, नया नहीं; लेकिन जीवंत ऊर्जावान शब्द मिले तो अमृत लग गया। चेक था साइन नहीं थी; साइन वाला मिला तो काम बना। असली मिल जाए तो सौभागग्यशाली। अब बाहरी सामान्य प्रश्न मत पूछो — वीडियो इतने हैं; अपनी स्थिति से पूछो, अंतरात्मा से पूछो।

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लाइव पर गृहस्थ सुन रहे हैं जिनके पार्टनर को इंटरेस्ट नहीं; लालच देकर सुनाने की कोशिश करते हैं। पार्टनर के साथ कितनी मेहनत करें?

एक-दो बार बता देना चाहिए। आपने जहां वो जी रहा था वहां से यहां लाया — उसको यहां आना नहीं था, जबरदस्ती आया; गया वहीं, लेकिन अब वहां भी पूरी तरह लिप्त नहीं, आपके दबाव-संकोच से घुटन में। काश उसी तेजी से बढ़ता तो ठोकर मिलती तो बड़ी तेजी से आता। एक-दो बार बोल दो; इंटरेस्ट-जरूरत होगी तो आएगा। पहले परीक्षा लो — ‘तुम जहां हो ठीक हो’। सामने से कब बात करे; पहले अवॉइड करके देखो सच में आया है या नहीं। पहले अपना साथ दो, अपने ऊपर मेहनत करो — नहीं तो उसकी चिंता सताएगी, फिर कहीं के नहीं रहोगे। वो जहां है मस्त है, वैभव बढ़ाना उसकी मंजिल; विचलित आप हो। मेहनत करनी ही नहीं — आप खुद सीख रहे हो, मेहनत तब जब आता हो। मोहवश साथ ले रहे हो तो उसकी यात्रा भी आपकी भी रुकती है। खुद पे मेहनत करो। मैंने किसी को अध्यात्म के लिए प्रयास नहीं किया — बोल दिया, प्रयास नहीं; जिज्ञासुओं को समय दो। जिज्ञासा जगाने का प्रयास आपके लिए ज्यादा निरर्थक भार है।

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सत्संग सुनते हुए समझ आती है, गिरने पर भी महसूस होता है; फिर भी समझ छोटी अवधि की लगती है और ऑटोमेटिक गिरना पक्का हो चुका है। समझ को कैसे पक्का करूं कि मार्ग से न भटकूं — उठना भी गिरने जितना पक्का हो जाए?

समझ तो है ही है। पक्का यह करना है — हां या ना। अगर ना, तो अब मुझे वहां से निकलना है; निकलने के लिए और कहीं जाना होगा। किसी वस्तु को एक जगह से उठाओगे तो रखने के लिए दूसरा खाली स्थान चाहिए। जीने का आधार-बेस चाहिए; नहीं तो पागल जैसे हो जाएंगे। अगर पक्का नहीं कर पा रहा कि लक्ष्य तक पहुंचना है या नहीं — मतलब लक्ष्य पक्का नहीं, या पीछे से पूरी तरह नहीं आए हो। पीछे ऑप्शन खड़ा है; आगे लक्ष्य मात्र कल्पना है। लक्ष्य खोज नहीं पा रहा — पीछे विकल्प भी है कि छोड़ो यार।

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कल्पना में अध्यात्म शुरू किया हो, पीछे आसक्ति-मोह कैंची से नहीं कटती, सुरक्षित महसूस किया था — तो क्या कल्पना में चलते-चलते भी परम स्थिति पक्की हो सकती है? आपके व्यवहार में करुणा-कृपा देखकर क्या मेरा भी वहां पहुंचना हो सकता है, चाहे शुरुआत कल्पना से हो?

हो सकता है — तब हो जाएगा जब आप अपने तरीके से पाने की इच्छा का त्याग करोगे। जैसे वो व्यक्ति मिला तो बदलना चाह रहा था; अंदर डर था, पश्चाताप है; मेरा काम है तुम बदल जाओ, कल्याण हो जाए — तब तैयार है। आप भी चाहो तो परम स्थिति में आ सकते हो; ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं। आपके चाहने से ही होगा। जैसे मोबाइल — नेटवर्क तेज हो, फ्लाइट मोड में स्वीकार न करो तो नेटवर्क नहीं आएगा; फ्लाइट मोड हटाओ तो दूर का भी पकड़ लेगा। स्वीकार करना पड़ेगा। परम स्थिति में पहुंचना चाहती हो तो प्रकृति मदद करेगी; फ्लाइट मोड डाल रखा तो कौन मदद करेगा? प्रकृति = जो सामने दिख रहा, महसूस हो रहा। अनेक रूप में आकर मदद करती है। कांटे से कांटा निकाल भी सकते हो, और चुभा भी सकते हो — प्रकृति को लेना-देना नहीं। 200 कमाए — दूध पिओ या शराब; जैसी ऊर्जा, वैसी प्रकृति वैश्य भेजती है। जहां खर्च करोगे वैसा बन जाओगे। प्रकृति के लिए ना अच्छा ना बुरा। शरीर भी प्रकृति है — नकार कैसे? ऊर्जा जितनी है उतना देती है। ऊर्जा ईमानदारी से इकट्ठी या बेईमानी से — धन, तन, समझ। ईमानदारी से आत्मिक स्तर उठेगा; बेईमानी से गिरेगा। खर्च कहां कर रहे हो — पूरी जांच करो; जहां खर्च करूंगा उससे मिलेगा।

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प्रारब्ध से आजीविका मिल रही हो, ऐशोआराम या संचय में खर्च करे, सत्कर्म न करे — परिणाम क्या? ऊर्जा सत्कर्म में कैसे लगाएं?

जैसे एक को अनाज मिल रहा — एक खा रहा बो नहीं रहा, एक रख रहा: एक सड़ेगा, एक खाके शरीर खत्म। दोनों खत्म। अगर बीज कहीं डालता तो कई गुना — उसी को सत्कर्म कहते हैं। बिना किए सुख मिल रहा हो तो आगे बढ़ोतरी करो; कुएं का मेंढक मत बनो। ऊर्जा जितनी है सत्कर्म में जांच के बाद लगाओ — कई गुना बढ़ेगी। बीज कहां डाल रहे हो — पत्थर या मिट्टी? पानी-व्यवस्था? पांच तत्व चाहिए; एक भी कम तो वृक्ष नहीं। ऊर्जा कहां खर्च — जरूरत है क्या, स्पेस है क्या? जरूरत कैसी — दारू की तो नहीं? इससे आत्मिक स्तर उठेगा? जरूरतमंद कौन — आवरण से नहीं; पक्का जरूरत है क्या?

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एक साल साधकों को बहुत समय दिया; अब स्पेस कहां — ज्ञान रूपी बीज कहां बोएं कि दरख्त बने? हम अंदर स्पेस/प्रबल जिज्ञासा कैसे बनाएं?

जिज्ञासा प्रबल उतनी स्पेस। शब्दों में ‘मैं जिज्ञासु हूं’ से नहीं। पंजाब वाले को कहा — पैसे की कमी नहीं तो 21000 क्यों, 21 लाख क्यों नहीं — बोलने से नहीं, करने से होगा। जिज्ञासा है तो सत्संग कराओ नहीं तो मत कराओ; मैं भी थक चुका। शरीर थकता है; जिज्ञासु ज्यादा रहेंगे तो जिज्ञासु से बात नहीं कर पाऊंगा। जिज्ञासु हो तो कराना, नहीं तो मत करा। जरूरत हो तो आओ सत्संग-साधना; वीडियो से बदलाव आ रहा हो तो सुनो नहीं तो अनसब्सक्राइब। समय बर्बाद मत करो। आपकी जरूरत अब मुझे नहीं — आपके लिए कर रहा हूं; लाभ ले रहे हो तो सहयोग करो। जरूरत है तो रुको नहीं जाओ; परेशान मत करो।

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संशय भरे जीवन में ‘चमड़ी जाए दमड़ी न जाए’ — दमड़ी बचाकर रखी, उसी से घुटन। क्या करें?

दमड़ी से ही घुटन है। अलग तरीके से कमाया है इसलिए घुटन दे रही है। लक्ष्य पे पहुंचना है तो ताकत भी बचा लो — धोखा न हो जाए। संशय भरे जीवन में पड़े हो।

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यादें परेशान करें तो क्या मतलब? राग-द्वेष कैसे पहचानें?

यादें परेशान कर रही हों तो उस व्यक्ति से कुछ लेना-देना है। व्यक्ति विशेष की यादें परेशान करें तो राग या द्वेष पक्का — दो में से एक। राग: उससे रस मिला। अध्यात्म में आने के बाद भी याद आए और तकलीफ दे तो अभी भी बंधन है।

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आपने प्लास्टिक कुटिया से शुरू करके अब बहुत बड़ा प्रोजेक्ट — जमीन, निर्माण, साधकों की व्यवस्था — दिन-रात मेहनत; क्या आपको थकान नहीं होती?

थकान तब होती जब मैं दायरे में काम करता — व्यक्तिगत अपने लिए तो थकान रहती। जब आप दायरे से पार होते हो, सबके लिए, थकान हो ही नहीं सकती। थकान दायरे में होती है। अनंत में कभी थकान नहीं होती। तो हम काम अनंत के लिए करते हैं।

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परमहंस जी और आपने काली मां को इष्ट बनाकर प्रकट अनुभव किया; मेरी मंदिरों में श्रद्धा कम (भीड़), कभी इष्ट नहीं बनाया — हनुमान चालीसा लिखा फिर छूट गया। क्या आत्मज्ञान/अपने घर मुड़ने की यात्रा में इष्ट अनिवार्य है, या बिना इष्ट भी संभव? भाव न आए तो बनाएं कैसे?

ऐसा नहीं कि क्रॉस किया — आपका वो हो गया। जैसे स्कूल टैलेंट देखकर क्लास स्किप कर देता — आपको इष्ट की जरूरत नहीं। इष्ट के बाद भी गुरु चाहिए। कबीर इष्ट नहीं बनाए, गुरु के इष्ट थे — कबीर को सीधा गुरु मिले। वाल्मीकि, अंगुलिमाल — सीधा गुरु। बुद्ध बहुत भटके। भाव आ रहा हो तो वो क्लास पढ़ रहे — इष्ट द्वारा गुरु मिलेगा। पार कर गए उन्हें सीधा गुरु। मूल गुरु चाहिए — ज्ञान का प्रतीक। इष्ट से भी मुक्त होना पड़ेगा तभी उपलब्धि। इष्ट निमित्त गुरु तक पहुंचाने में; आपको सीधा गुरु मिल गया। गुरु व्यक्ति विशेष नहीं — मार्ग बताए, संशय निवारण, हर प्रश्न का प्रत्यक्ष उत्तर, भ्रम मिटाए। हनुमान चालीसा से सहारा लिया — तरीका अपना। मूल ज्ञान चाहिए, प्रश्नों के उत्तर — उत्तर मिलेंगे तभी खाली। गुरु खाली करता है, प्रश्न का बोझ निकालता है; प्रश्न निकालना आपकी मेहनत। व्याकुल-तड़प पर सहायता; जिज्ञासा रखो। सूक्ष्म प्रश्न निकालने को सत्संग सहारा — जीवन में सबसे जरूरी सत्संग।

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गुरु हजारों किलोमीटर दूर हो तो कछुए की तरह मानसिक सेता है — शिष्य भाव कब? गुरु उपस्थिति कैसे फील करें?

अगर शिष्य है — सत्संग सुन रहा, मार्ग पर चल रहा — तो कनेक्टेड। शिष्य = बताए मार्ग पर चलना। जिज्ञासा-आत्मिक कल्याण की तत्परता। जरूरत पड़ी तो गुरु स्थूल या सूक्ष्म शरीर में पहुंच जाएगा।

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इष्ट/मां से आशा कि आत्मज्ञान करा दें — आशा टूटी तब क्या? स्पीड कैसे बढ़ाएं? आपकी तत्परता कैसे थी?

आशा कि मां आत्मज्ञान करा देगी — खत्म हुई तब मुझे करना है। प्रार्थना: ऐसा मार्ग दो प्रत्यक्ष लोग सीधा पहुंचें। आत्मज्ञान चाहिए और मार्ग भी। जगत कल्याण भाव वालों को मार्ग मिलता है। सतत प्रयास — काली मां भक्ति वर्षों; फीलिंग बाद में। उम्मीद टूटी तो चाल तेज।

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कृपा किसको, किस पर करनी है? परिवार-समाज में ईमानदारी से सब देकर भी जब टूटता हूं तो करुणानिधि से कृपा मांगता हूं; भाव कुछ दिन ठहरता है फिर वैराग्य ढीला पड़ जाता है और वही रूटीन। भाव स्थिर रखने के लिए कृपा उन पर बरसे या मुझे खुद पर कृपा करनी है?

पहले कृपा को समझो। कैदी को सजा फिक्स है। कृपा कब? अच्छे आचरण से सजा कम — पश्चाताप, सेवा, अच्छा बर्ताव। गंदा आचरण वाला आवेदन दे, अच्छे वाले ने सिर्फ अच्छा आचरण किया — कृपा आवेदन वाले पर नहीं, आचरण वाले पर। गलतियों पर पश्चाताप करो, समाज में ईमानदारी-सत्कर्म से जियो — कृपा होगी, मांगना नहीं पड़ेगा। सफर में परोसने वाले को कभी 20, बड़वानी में कहा 100 दो — गुड बिहेवियर, सच्चाई, मानवता; उसने 100 मांगे नहीं। कृपा मांगनी नहीं पड़ती; मेहनत-ईमानदारी-सत्कर्म से कृपा बरसती है — नहीं लोगे तो भी जबरदस्ती देगा। गंदा आचरण वाला कितना आवेदन करे सजा माफ नहीं; सज्जन बोले भी न बोले जेलर खुद पहुंच जाएगा। कृपा प्रयास-कर्म से, मांगने से नहीं।

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अपने आप में होने की यात्रा में अटैचमेंट याद आकर सताने लगा — पहले नहीं सताता था। विचारों में दुख, उपलब्धि के बाद भी विचार रहेंगे क्या?

विचार उपलब्धि के बाद भी रहेंगे — भूख का विचार न आए तो सामने वाला भोजन कैसे मांगे? विचारों में दुख नहीं होगा; विचार होंगे लेकिन लिप्तता नहीं। अभी विचारों में लिप्त हो जाते हो — अटैचमेंट। जैसे-जैसे अपने आप में होने की यात्रा, अटैचमेंट याद आकर सताएगा। छूट रहा है — छूटने का अपार दुख-पीड़ा। पहले इसलिए नहीं सता रहा था कि अपने आप में आ नहीं पा रहे थे, समझने में बाहर थे। अब अपने में होना चाहते हो तो अटैचमेंट तुरंत याद — फिर लिप्त। यात्रा हो रही है। अटैचमेंट मत ढूंढो; अपने आप में होने के लिए काम करो — अटैचमेंट पता चल जाएगा।

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बाहरी काम ढंग से नहीं हो पाता क्योंकि उसमें हो नहीं पाता — क्या करें? भरोसा/भाव कम न हो बस यही प्रार्थना।

बस ये भरोसा ही कम न हो। भाव ही कम न हो। जब तक शरीर में प्राण रहें ये भाव रहे — तेरा दर न छूटे; प्राण छूटें तो छूटें।

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जन्म से तुलना-ट्रेनिंग मिलती है, बाहरी चीजें बराबर फिर भी खालीपन-उदासी-बोरियत रहती है — बता भी नहीं पाते क्या है। बाहर से गाड़ी-बंगला-कपड़े भर लेते हैं फिर भी काटता है। ये खालीपन क्या है, किससे भरे कि संतुष्टि आए?

जैसे बालक मां से खो जाए — जरूरत में कुछ ले लेगा, जरूरत पूरी होते ही मां के लिए छटपटाहट। व्याकुलता तभी पूरी जब मां से मिले। संसार के सारे सुख दो — फिर भी मां खोजेगा। कुछ समय पहले यहां नहीं थे, बाद में नहीं रहेंगे — पक्का। जहां से अस्तित्व है वहां मिलने पर पूर्ति। जरूरत में बाहर से भरना चाहते हो — शरीर की जरूरत थी; मूल जहां अस्तित्व था वहां पहुंचना था। मान-लालच में नया अस्तित्व बना लिया; निर्माण में पछतावा-अशांति। समझ भी गई जरूरत और है लेकिन लिप्त छोड़ नहीं पा रहे। संयोग है तो वियोग — बाहर संसाधन कुछ समय सुख जैसे खिलौना; आखिर मां के अलावा कुछ नहीं चाहिए। पहले बाहर से भरना बंद करो। शरीर की जरूरत पूरी करते थे तो मस्त थे; मान सम्मान में बेईमानी-चापलूसी — अब वो भी घुटन। अपूर्णता भाव छोड़ो — स्वयं पूर्ण हो; बाहर से भरना चाहते हो। मन जानत है मन मानत नहीं। अटैचमेंट-मोह दुख देगा समझते हुए भी फैलाते जा रहे। सुख लोगे तो दुख तैयार; सुख न लो तो दुख नहीं। जरूरत में जीना चालू करो — योग्यता और जरूरत दोनों समझो।

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सामर्थ्यवान परिचय नहीं बनाता; कमजोर बनाता है। सेवा में उम्मीद? सत्संग निशुल्क बनाम खर्च?

मैंने कभी सामने से परिचय बनाने का प्रयास नहीं किया; किसी ने बनाया तो हेल्प की। सामर्थ्यवान अपना काम करता है, परिचय नहीं बनाता। कमजोर हो तो परिचय न बनाओगे तो मर जाओगे — कमजोरी दूर करने के लिए बनाया। शिक्षक भी कभी विद्यार्थी था। सेवा कर रहे हो तो जिसका काम है वो जाने। मैं किसी को उम्मीद नहीं देता; पैसा भी देते हुए सोचने का मौका देता हूं। सामर्थ्य नहीं तो निशुल्क कुटिया में रहो; सत्संग कहीं करवाना हो तो आने-जाने का खर्च रखो। लाभ ले रहे हो तो सहयोग-योगदान सोचो — यही सत्कर्म। सुना-समझा रुक गए तो गिरते चले जाओगे। किया क्या — उससे स्तर उठेगा; सुनने-समझने से नहीं।

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अटैचमेंट छोड़े बिना अंदर नहीं जा पाते — अनुभव: देखना छोड़ो, चुप रहो, शांति; फिर भी डीप अटैचमेंट।

अटैचमेंट छोड़े बिना कुछ नहीं। अपेक्षा से भी बाहर होना। सत्संग सुनते रहो, समझ विकसित करो, कल्याण करो।

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संसार में संघर्ष-कंपटीशन से पहुंचे; अध्यात्म में कंपटीशन नहीं पर कर्मबंधन उलझे यादें ताजा। ज्ञान ने काबिल बनाया देखने को — मटेरियल अभी भी वर्क करता है, रोष आता है। बारीकी से कैसे चलें कि रोष कम हो?

जब से समझ लायक हुए रसपान में जिए — शब्द गंध रस स्पर्श। इस मार्ग में रसपान नहीं मिलता, धीरे छूटते। वहां चापलूसी-बनावटी प्यार; अध्यात्म में नहीं मिलता — आदत पड़ गई थी पाने की। अटैचमेंट से हटते, अपने में होते। सच्चाई बताने वाले पसंद नहीं, झूठी तारीफ खोजते — अध्यात्म में ऐसे नहीं। रोष-गुस्सा आता है। गुस्सा पानी की तरह — कमजोर पर या प्रेम करने वाले पर बहता (जवाब नहीं मिलेगा)। गुस्सा ताकत-बल है; ज्यादातर निकाल देते। गुस्से में लाखों बर्बाद, वस्तु तोड़ — बल अच्छे काम में लग सकता था। गुस्सा किसी को गिराने में न लगे। सालों मेहनत की वस्तु एक झटके में — वैसा अध्यात्म में आगे जाकर झटके में गिरना न हो। सूझबूझ से सचेत जीवन। चौराहे पर जिज्ञासा — सही मार्ग आपकी तरफ बढ़ता है। सजगता हटे तो मूर्छित। 7 बजे के अंदर बंधे हो तो उपलब्धि नहीं।

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सत्संग बुलाने का खर्च / डिपॉजिट — सहयोग कैसे?

बुलाना चाहे तो डिपॉजिट; आने-जाने प्लस आश्रम खर्च। साधन का खर्च है। जिज्ञासु हो तो जुड़ो — सरल मार्ग, समझना है प्रयास कुछ नहीं के बराबर जब सही राह।

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अमेरिका में ट्रक चलाते हुए होमलेस जरूरतमंदों को रेस्टोरेंट में ले जाकर जो मांगे वो ऑर्डर करवाता हूं — वे नॉनवेज-सोडा लेते हैं; कभी खुद वेज दे देता हूं। क्या ये सत्कर्म है? उनकी मर्जी से नॉनवेज कराना चाहिए या अपनी मर्जी से शाकाहारी देना?

जब दे रहे हो तो सदुपयोग के लिए दो, अपने तरीके से — उनके तरीके से नहीं। जरूरतमंद की जरूरत देखकर दो; नहीं लेते तो जरूरत नहीं। जरूरतमंद शोक नहीं भूख देखेगा, आदेश नहीं करेगा। शुद्ध शाकाहारी कराओ; और व्यंजन मांगे तो बोलो कमा के खाओ — जरूरतमंद हो ही नहीं। जरूरतमंद सिर्फ जरूरत बताता है, आदेश नहीं देता। ताकत का उपयोग करते समय देखो सामने वाला सदुपयोग करे। डर के सत्कर्म मत करो। खुद ऑर्डर कर रहा है मतलब जरूरत नहीं — कल भी वेट करेगा। जरूरतमंद भोजन ग्रहण कर लेगा नहीं तो कमाएगा। नॉनवेज देना ही नहीं — भागीदार न बनो; शाकाहारी दो, करे तो ठीक नहीं तो कोई बात नहीं। नाटक वही करेगा जिसे जरूरत नहीं।

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मंदिर-होटल के बाहर फिक्स भीख मांगने वाले / थाली वाला धंधा — क्या उन्हें खिलाना सत्कर्म है?

ऐसी जगह सत्कर्म नहीं — जरूरत नहीं, व्यापार बना लिया। दिन भर व्यक्ति कितना खाएगा। जरूरतमंद की जरूरत पूर्ति सत्कर्म है। दोनों को दिया तो आशीर्वाद सच में जरूरतमंद की अंतरात्मा से निकलेगा; धंधे वाले से नहीं।

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जरूरतमंद इशारा न करे तो पूछें या नहीं? आप मांगते नहीं थे — ऐसे व्यक्ति के साथ क्या करें?

एहसास हो रहा हो जरूरत है तो मानवता के नाते पूछ लो। पहचान-महसूस हो ही जाता है। माता जी ने पूछा कि भोजन किया — हमने कहा बोलते नहीं; उसने कहा बोलते तो बना देती — रात भूखे सोए। पूछने से परीक्षा भी होती है।

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NGO/संस्थाओं को कंबल-डोनेशन — भाव शुद्ध था फिर देखा बेच देते हैं। पता चलने के बाद भी दें तो? देने से पहले/बाद जांच?

पता नहीं था और सोचा सत्कर्म हो रहा — डायरेक्ट नहीं जा सकते थे, वाया गए — तब सत्कर्म; उपयोग चाहे जैसे करे, भाव में सत्कर्म हो गया। पता चलने के बाद भी करोगे तो सत्कर्म नहीं। ताकत से जांच लो सामने वाला जरूरतमंद सेवा कर रहा है या नहीं; नहीं भी करेगा तो पहले वाले को परिणाम मिलेगा। देने के बाद भी ताकत हो तो जांचो — कार्य हो रहा कि नहीं; नहीं तो आगे मत दो। गलत आदमी ताकतवर बनेगा तो गलत काम — जिम्मेदार आप। ताकत देने से पहले जांचो।

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स्वास्थ्य बिगाड़ने वाला खाना (शुगर वाले को मीठा) — जिम्मेदारी? डर कि नेगलेक्ट कर दिया?

वैसी वस्तु दो जिससे स्वास्थ्य न बिगड़े — जिम्मेदारी है। देश-काल-स्थिति देखकर सूझबूझ से निर्णय। सत्कर्म करो डरो मत। भूखा बना घूम रहा था, भूखा नहीं — दाल-रोटी-नमक भी खा लेता। शौक पूरा कर रहा था। अपनी समझ से करो, किसी और की समझ से नहीं।

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असली-नकली जरूरतमंद पहचान मुश्किल; धर्म का डर — दान न करूं तो भगवान नाराज / करूं तो फंसूं। डर कैसे निकाले?

डरने की जरूरत नहीं — जानबूझकर नहीं किया, खुद संशय में हो। जरूरतमंद आ जाए तो कर्तव्य है जरूरत पूरी करना — शौक नहीं। नहीं करोगे बद्दुआ भी लग सकती है। मानव शरीर सहयोग के लिए मिला। जरूरतमंद पक्का समझकर छोड़ो तो बद्दुआ; देख लिया एक-दूसरे को तो अंदर से निकलती है। समझ न बना कि जरूरत है तब नहीं। सूझबूझ के साथ नहीं कर रहे तो गिर रहे।

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भिखारी बच्चों / गोद में बच्चा लेकर मांगने वालों को दें? पेन बेचने वाली चाल?

बच्चों को भीख कभी नहीं दो। बिस्किट फाड़ के दे दो, पैसे मत दो — तो सामने वाला हाथ-पैर काटकर नहीं छोड़ेगा। समाज पक्का कर ले बच्चों को भीख नहीं — करने वाले बंद होंगे। बच्चों को देना ही गलत पैटर्न बनाता है।

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साधक गुरु के प्रेम-ज्ञान से भरकर कुछ अर्पण करना चाहे — कंबल आदि वस्तु या भाव — तो गुरु को क्या दे कि वह भाव पूजा बन जाए? व्यक्तिगत गुरु को क्या चाहिए?

आज मेरे पास अगर कुछ है तो ज्ञान; ज्ञान इसलिए दे रहा हूं कि इस ज्ञान द्वारा वो अपना आत्मिक कल्याण करे। अगर कुछ देना है तो इस ज्ञान के द्वारा अपना आत्मिक कल्याण कर ले और इस कार्य में सहयोग करे — जिस लायक है, जैसी जरूरत है। दो बातें: जैसी क्षमता, जैसी सामने जरूरत। समय निकालो, वहां की जरूरत देखो। व्यक्तिगत मुझसे पूछोगे — मुझे कुछ नहीं चाहिए। घर से भी कोई उम्मीद नहीं; मेहनत से भरण-पोषण। धन-तन-ज्ञान समाज के लिए खर्च। कपड़े भी कम खर्च। काम में लोगों के लिए व्यवस्था चाहिए — जरूरत देखते हुए सहयोग करो; जरूरत न हो तो वस्तु का काम नहीं आएगा। ज्ञान का लाभ लेकर आत्मिक कल्याण — यही देना होता है। व्यक्तिगत कुछ नहीं चाहिए।

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हमें आत्मज्ञान चाहिए पर कामना भी है — बैलेंस कैसे करें? आत्मज्ञान कब होगा जब कुछ चाहिए?

आत्मज्ञान चाहिए इसका मतलब कुछ नहीं चाहिए — तब आत्मज्ञान होगा। ज्ञान कहां छिपा है? आत्म में। आत्मज्ञान कब होगा? कुछ चाहिए से मुक्त होना है तब। आत्म तत्व में तभी स्थिर हो पाओगे जब पूरी तरह बाहर से छूट पाओगे। किसी भी तरीके से बाहरी अटैचमेंट से मुक्त होना है — यही मार्ग है।

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रियली कौन आत्मज्ञानी है, कौन सिद्धियों से काम कर रहा — हम जांच नहीं सकते। आत्मज्ञानी कैसे पहचाने? जांच की जरूरत?

जांचने की जरूरत नहीं — यही गलती। सिर्फ अपने प्रश्न रखो। अगर प्रत्यक्ष उत्तर मिल रहे हैं, सारे संशय का निवारण हो रहा है — वही आत्मज्ञानी। गुरु/आत्मज्ञानी के पास सिर्फ आत्मिक कल्याण के लिए जाओ; और प्रश्न ले गए तो गड़बड़ हम ही, गड़बड़ लोग मिलेंगे। आत्मिक कल्याण का मार्ग पूछोगे तो सामने आत्मज्ञानी ही टिकेगा। कामना वाला प्रश्न — बच्चे IAS, रोग ठीक, गाड़ी-बंगला — तो आत्मज्ञानी मिलेगा ही नहीं। जैसी क्वालिटी वैसे लोग जुड़ते हैं। अच्छे शिक्षक की पहचान — अच्छे से पढ़ा दे। आत्मज्ञानी की पहचान — सारे संशय हट जाएं, प्रश्नों के प्रत्यक्ष उत्तर, मार्ग बता दे कि आगे कर्मबंधन न बंधे। बाह्य तौर से कोई नाप नहीं; नापने की जरूरत भी नहीं। अहम भाव में नापना छोड़ो — सवाल के जवाब चाहिए। काम करने के बाद पता चलता है स्थिति। जिज्ञासा शांत करे, संशय मिटाए, मार्ग बताए — सीधी बात। आत्मज्ञानी प्रमाण नहीं देता, आश्वासन/बहाना नहीं, बैसाखी नहीं — प्रत्यक्ष बात, पैरों में बल। सारथी भी गुरु बन सकता है — बाहरी आवरण मत देखो, ज्ञान का प्रतीक देखो।

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आत्मज्ञानी के सामने बैठने के लिए योग्यता/तैयारी क्या? बिना तैयारी बैठ सकते हैं?

जिज्ञासा ही बैठने देगी — जैसे ट्रेन में टिकट। टिकट नहीं तो उठा दिए जाओगे। आत्मज्ञानी के पास जिज्ञासा रहेगी तभी बैठ पाओगे; नहीं तो भाग जाओगे क्योंकि घुमा-फिरा आत्मिक कल्याण ही बोलेगा। कामनाओं की बात नहीं — कामनाओं से मुक्त होने की। कामना में हो तो टिक नहीं सकते। बिना तैयारी बैठ ही नहीं सकते। बाहरी डिग्री जैसे 15–20 साल — यहां भी तरीका अपनाना पड़ेगा।

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गुरु मार्ग बताए — क्या गुरु हमें पहुंचा भी देगा? उपलब्धि गुरु के हाथ में?

मार्ग बताना गुरु का काम; चलना आपको। मानसिक बंधन आपको ही छुड़ाना। जैसी जिज्ञासा वैसी जगह। यहां हो तो जिम्मेदार सिर्फ आप। आत्मज्ञानी हर तरीके से मदद-सहायता करेगा — आंतरिक-बाहरी — जब आप प्रयास करोगे; प्रयास नहीं तो कुछ नहीं। मेहनत करते-थकते जब अटैचमेंट न पकड़ पाओ तब ज्ञान द्वारा मदद। शरीर से ज्ञान दे रहा — बोलने में ऊर्जा। अदृश्य ऊर्जा जब बहुत थक जाओ। गुरु को देना — जिस मार्ग पर बता रहा उस पर चलो; आत्मिक कल्याण सबसे बड़ा देना। जरूरत देखकर सहयोग — सत्कर्म में जाएगा।

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अटैचमेंट तोड़ना दर्दनाक लगता है — परिवार छोड़ो कैसे? उपलब्धि के लिए अटैचमेंट कितना टूटे?

फाइनल: पूरी तरह अटैचमेंट टूटे तभी उपलब्धि; एक जगह भी वस्तु-जीव-व्यक्ति में रह गया तो आत्मज्ञान नहीं। जिम्मेदारी-दायित्व न हो तो शरीर से तुरंत निकल आओ। कर्तव्य हो तो जरूरत में ईमानदारी-सत्कर्म से जीते हुए दायित्व निभ जाए तब एकांत। मानसिक बंधन टूटना चाहिए — शरीर से चले जाना काफी नहीं। एकांत से पता चलता है अटैचमेंट कितना गहरा। सबसे ज्यादा अटैचमेंट: पहले मां (पांच इंद्रियां), फिर स्त्री/पुरुष, फिर बच्चे, फिर नाम-मान-पैसे-समाज। गुरु सानिध्य सर्वश्रेष्ठ — सब छूटकर शरीर में भी फंस गए तो कभी न कभी उपलब्धि। अटैचमेंट पूरी तरह टूटेगा तभी — फाइनल।

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हम परमात्मा से डिस्कनेक्ट कैसे हुए? फिर कनेक्ट कैसे?

कहीं और से जुड़ गए — अपवित्रता से। पवित्र ऊर्जा थी; अपवित्र से जुड़े तो अपवित्र। अटैचमेंट है। यहां से हटाओ — डिस्कनेक्ट हुए — वहां कनेक्ट। एनर्जी बीच में हैंग नहीं — या इधर या उधर। जैसे ही मानसिक अटैचमेंट छोड़ते हो, ऊर्जा में आती है, इससे कनेक्ट।

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मां-बाप बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा कैसे दें? मैरिज से पहले तैयारी?

बचपन से गीता, उपनिषद, वेदांत, वेद — परिवार को देना चाहिए। हर मां-बाप का कर्तव्य: आत्मिक कल्याण की शिक्षा जब समझने लायक हो (~सात साल) — अध्यात्म क्या, संस्कार। बचपन से दे पाओ तो अच्छा; लोग कहां देते हैं।

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अध्यात्म में 100% लगाने पर भी बाहर कुछ नहीं हो रहा — उदासी, बोरियत, बेचैनी; गुरु कहे खुद जांचो तो असहाय। ये स्थितियां बनती हैं? सलाह?

अध्यात्म मतलब अपनी (बाहरी) समझ से मुक्त होना; स्व में स्थिर। स्थितियां बनती नहीं — छूटती हैं। मोह-आसक्ति-इच्छा-अपेक्षा-कर्ता से मुक्त। यहां कुछ मिलेगा नहीं; रस खत्म। जैसे-जैसे अपने में रहोगे उदास-घुटन-बेचैनी — पिछला जीवन खींचता। हर प्रश्न का उत्तर मिल रहा तो स्तर बढ़ रहा; मिलना भटकाव, मिलने से मुक्त होना। बोरियत = कहीं कुछ चाहिए। आनंद सीधा नहीं बढ़ेगा — कभी आनंद कभी घुटन; मूल में पहुंचने पर टिकेगा।

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एकांत साधना में उदासी-बोरियत-रोना — प्लस है या मानसिक रोग? कैसे जांचें यात्रा हो रही?

जहां जीने की आदत, न मिले तो बेचैनी। देखो आगे कर्मबंधन नहीं बन रहा — मतलब पिछला मानसिक छूट रहा; अपने को बनाए रखो। और व्याकुलता-घुटन-चिल्लाना-रोना आएगा — इससे भयानक भी; पीछे मत जाना। जांचो तो स्तर उठेगा। एकांत में बैठो — देखना ही जांचना। यहां कुछ नहीं होगा तभी मूल में; कुछ होगा तो बाहर। बेचैनी-उदासी = बहुत छूट रहा, मूल तरफ यात्रा — शुभ लक्षण। जीव को प्रपंच-रस नहीं मिल रहा तो पगलाता — जितनी बेचैनी स्तर उठ रहा। कुछ नहीं चाहिए मार्ग; सब खत्म तब मूल।

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इतनी उदासी में मन बैक जाए तो गुरु/ऊर्जा रोक सकती? ज्यादातर क्या करते हैं?

जाना ही मत — स्वतंत्रता; खुद जाना चाहोगे तो कौन रोके। कुछ नहीं चाहिए: मिलेगा तो भटकोगे, ऊर्जा मिले तो उसमें। छूटने में तकलीफ। नहीं हो रहा तो यात्रा नहीं / नई दुनिया बसा ली। रियल चले तो होगा ही। ज्यादातर: पीछे भागते या नए रिश्ते बना लेते। स्वभाव वाले पड़े रहते। कुछ नहीं चाहिए पर डटे रहो; सिद्धियों-ऊर्जाओं में मत फंसो।

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गुरु अनुभव — इतनी बेचैनी कैसे झेली? कैसे पता ठीक हो रहा? हम घबराएं तो?

पता उपलब्धि बाद चला; तब पक्का था पीछे नहीं जाना। विकल्प खत्म। चिल्ला-चिल्ला रोया — पीछे नहीं। कुछ नहीं चाहिए पक्का। ज्यादातर पीछे/नए रिश्ते/नशा। पड़े रहो; सब छूटेगा तब होगा। फैसला अपना — खोज के या खोज में मरूंगा। घबराओ मत; बने रहो, फैसले पे टिके। कुछ नहीं चाहिए में आओ। प्रश्न 'कुछ नहीं हो रहा' गिराओ नहीं तो भगा देगा। पीछे मत, आगे बंधन मत। प्रश्न के साथ खड़े रहो — उत्तर लेके जाऊंगा। ईमानदारी-सत्कर्म; नया राग-द्वेष न बने।

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ज्ञान मार्ग कठिन क्यों? आश्वासन क्यों नहीं? प्रश्न क्यों जरूरी?

ज्ञान मार्ग सर्वश्रेष्ठ — काल्पनिक/आश्वासन नहीं, प्रत्यक्ष; संख्या कम। उंगली पकड़ने वाला गड्ढे में गिराए — आश्रित। खुद अथा प्रयास। प्रश्न अपनी स्थिति से — उधार मत; उत्तर से स्तर। बिना उत्तर पीछे मत; उत्तर मिल जाए तो पीछे जा नहीं सकते। कुछ चाहिए में मत आना — भटकोगे।

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संसार में जिम्मेवारियां निभाते हुए पूरा जीवन अध्यात्म कैसे बने — अंतिम क्षण तक?

जहां हो कुछ कर रहे हो — ईमानदारी से हो; स्तर उठाना है तो सत्कर्म। जिम्मेदारी निभाओ। पूरी तरह अध्यात्म में चलना है और जिम्मेदारी नहीं — तो छोड़कर एकांतवास या जीवंत गुरु शरण खोजो। जो मार्ग में नहीं चलते उनके पास क्यों रहना? मार्गी लोगों के साथ रहो।

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समझ आती है पर दृढ़ता/स्ट्रॉन्ग पावर नहीं — परिवार बैकग्राउंड आध्यात्मिक नहीं। क्या करें? गिरने का डर?

पूरी तरह आ जाओ — क्षमता है। फैसला आपको लेना; जीवन पर अधिकार। मार्ग बता सकते, चलना आपको। शब्दों में जीओ तब कल्याण; बातों से नहीं। कर्म ले जाता है; चाहने से नहीं। नहीं चाहती तो वहां क्यों? कथनी-करनी अंतर। स्ट्रॉन्ग पावर कोई खिलाए नहीं — फैसला तुम्हारे हाथ। जहां मजा आएगा बहाने चलेंगे। उठी कहां कि गिर गई — गिरने वाला काम कर रही हो तभी मुंह से निकलेगा।

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समाज छोड़ अकेले खड़ी — अध्यात्म में पूरी तरह आने में डर कि फिर कलंक लगे। सुरक्षा?

अध्यात्म में किसी को मत देखो — अपने जीवन देखो, मेरे द्वारा क्या। जीवन पर अधिकार; समाज को अधिकार क्यों दें? आत्मिक कल्याण के लिए पूरी तरह निकल जाओ। असुरक्षा की यात्रा — सुरक्षा घर पर; यहां गारंटी नहीं, रिस्क पूरा। झूठा आश्वासन देने वाला। स्व तक असुरक्षा-अव्यवस्था। शरीर से छोड़ा मानसिक नहीं — पूरा मानसिक छूटे तब उपलब्धि। विपरीत में याद आए = अटैचमेंट। अवधूत: कुछ नहीं चाहिए, खोज भी खत्म — तब उपलब्धि।

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जिम्मेदारी नहीं कहते फिर भी तुरंत गुरु संग न चल पाएं — सिर्फ जानकारी?

जिज्ञासा सिर्फ जानकारी/टाइमपास। चलने वाले ऑन द स्पॉट फैसला। बातों वाले बातों से उपलब्धि चाहते; करना नहीं। जहां हो वहीं से चलो; मत कहो चलना चाहते पर नहीं पा रहे। जिज्ञासुओं के लिए समय; बातों वालों को दो लाइन। दृढ़ संकल्प अनिवार्य।

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उपलब्धि क्यों नहीं? अटैचमेंट कैसे टूटे? जबरदस्ती तोड़ना?

उपलब्धि नहीं = कहीं अटैचमेंट। जबरदस्ती मत तोड़ो — इधर काम करो उधर टूटेगा। जिज्ञासा छुड़ाती। एक वस्तु/व्यक्ति में भी अटैचमेंट तो उपलब्धि नहीं। ईमानदारी-सत्कर्म से चलो; अटैचमेंट वाले दायरे में मत जाओ। ब्लेम मत — दोनों हाथ से बंधन।

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अध्यात्म में फेल/अटैचमेंट कैसे जांचें? रोने में भी रस?

एग्जाम एकांत में — एक महीना संपर्क मत, नया व्यवहार/रस मत। तब परिवार-समाज अटैचमेंट पता। उनके पास रहकर नहीं। नाम भी मत पूछो; व्यवस्थापक से मिलो; सेवा ठीक तो करो। भोजन चॉइस मत। रोने में भी उनके साथ रस छिपा।

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ब्रह्म मुहूर्त में क्या अच्छा काम? बाकी समय?

अच्छा काम हर वक्त — ब्रह्म मुहूर्त में क्यों सीमित? जरूरतमंद सेवा/सहयोग; जरूरत पूर्ति से स्तर उठे। प्राणायाम-योग स्वास्थ्य के लिए ठीक। जागने से सोने तक सहयोग भाव। मुहूर्त मत देखो — जरूरत देखो। बुरा काम में मुहूर्त नहीं देखते; अच्छे में क्यों? भावना में मत बहो।

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ईमानदारी गहराई से? बच्चे की गाली पर क्या?

सच्चे रहो; धोखा मत। लात-जूते खाना thrईमानदारी नहीं। छोटे को उचित जवाब/समझाओ; न माने तो अनुशासन या अभिभावक। शब्दों में अटक मत — जिसमें जी सको उतने शब्द।

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स्टेशन आदि पर मांगने वालों को पैसे दें?

पैसे मत दो। समय हो तो खाने खिला दो या बिस्किट फाड़ के दे दो।

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दूसरे में इच्छाशक्ति/आत्मबल पसंद आता है पर खुद उस मार्ग पर क्यों नहीं चल पाती? असफल होकर पछतावा — आंसू किस अर्थ के?

इच्छाशक्ति-आत्मविश्वास है या नहीं — करने पर पता चलेगा। समय ही नहीं दिया तो सफलता-असफलता का प्रश्न नहीं; युद्ध लड़ा ही नहीं तो हार-जीत कहां। समय जितना दोगे उतना फल। नकली आंसू — पूरी मेहनत परिवार-दायित्व निभाते आध्यात्म में समर्पित होकर असफल होते तो पछतावे का अर्थ। पहले तय करो क्या चाहिए, कहां जाना है — तब काम।

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गुरुदेव की कृपा / 'कृपा मत करना' — गुरु से प्रार्थना कैसे? कृपा और दाता में अंतर?

कृपा की बात परम सत्ता/अवधूत अंतिम यात्रा वाली थी; गुरु सत्संग-ज्ञान देता — देना उसका काम (नल-पानी)। कृपा पकड़ोगे तो दाता नहीं मिलेगा; उपहार न लेकर दाता मांगो तो मिलेगा। कृपा में आदमी मेहनत बंद, आलसी। गुरु शब्द/ज्ञान — शब्दों में जियो; वही कृपा। मार्ग पर चलो, जुड़ाव बना रहेगा; हटोगे तो कटा। गुरु से कहो — मुझसे अलग न होना, हर शब्द मानूंगा। सब तुम्हारा कर्म।

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अज्ञान में फोटो पूजा सालों — पाप/कर्म से गुरु मिलेगा? अपराध के बाद गुरु मिलेगा? गुरु क्या करेगा?

कर्म और जिज्ञासा से मिलता है। लायक नहीं तो नहीं मिलेगा; अपराध बोध आया तो बोझ मत ढोओ — हो गया। सुधारना चाहो तो सुधारने वाला मिलेगा; बिगाड़ना चाहो तो बिगाड़ने वाला — कल्पवृक्ष, क्या चाहते हो। गुरु दुनिया की तरह अपराध नहीं देखेगा; प्रकृति अलग दंड देगी। गुरु बताएगा दंड कैसे सहें, मार्ग, नए कर्म का ज्ञान ताकि आगे बंधन न बने — उसके तरीके से, तुम्हारे नहीं। जिज्ञासा रखो, उसके ढंग में समर्पित। वहीं से उठाएगा। मां जैसे गंदे न देखे — धोए; गुरु भी।

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ऑफिस में काम करवाने के लिए थोड़ा झूठ (सीनियर ने कहा urgent) — गलत? नौकरी छूटने का डर?

झूठ मत बोलो। काम में जितना समय लगे वही कहो; झूठा आश्वासन मत। झूठ तुम्हारे खाते। बोलो — मैं झूठ नहीं बोल सकता। सीनियर ने जो कहा verbatim फॉरवर्ड करो; अपना मोड़ मत जोड़ो। बाजार/छोटे झूठ में भी फंसते हो — झूठ गिराता, क्षणिक सुख फिर पछतावा। ईमानदारी-सत्कर्म से जियो, अपना कल्याण।

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साधना में आप ऊपर वाले से कहते थे — मुझ पर कृपा मत करना, खुद खोज लूंगा। हम छोटी चीजों पर भी भगवान कृपा कर कहते भिखारी क्यों हैं? मार्गदर्शन करें।

कहीं पूरी मेहनत उसी तरफ नहीं लगा रहे; मेहनत कहीं और। उनके लिए पूरी तरह चले हो तो कृपा क्यों चाहिए? कृपा करें तो सब पे कर दे — अकेले मुझ पर क्यों? व्यक्तिगत कृपा करे तो परमात्मा नहीं हो सकता। कर्म से हुआ तो कृपा कहां? कृपा मांगना मतलब पूरी तरह कर्म/मेहनत नहीं कर रहे। पूरी मेहनत करो तो कृपा मांगते ही नहीं — कर्म पहुंचा देगा। अकेले कृपा और लायक काम न हो तो समझ से परमात्मा भी नहीं। उसके हाथ में होता तो कोई अज्ञानी/दुखी होता ही नहीं। हाथ में नहीं तो परेशान क्यों करें? माता-पिता से पास करवा दो जैसे — विवश करना, वो करवा भी नहीं सकते। कृपा मांगने की जरूरत नहीं।

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महापुरुषों की कहानियां अच्छी लगती हैं पर वैसा दृढ़ संकल्प क्यों नहीं बनता? सांसारिक पकड़ इतनी जबरदस्त — कैसे तोड़ें आगे बढ़ें?

इच्छा ही वैसी नहीं। संसार का काम पहले — बाद में चिंता; घबराहट। पकड़ आपकी है — छोड़ दो। पकड़ छोड़ने का फैसला आपको; सहायता और कोई, फैसला आप। शरीर वहां रखो जहां कल्याण — गुरु सानिध्य; मानसिक भले कहीं। गुरु सत्संग ज्ञान की तलवार देता है — धीरे मानसिक बंधन काटोगे। सानिध्य आपके बस में।

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अदृश्य/पुराने गुरु की फोटो-मूर्ति से पूजा — क्या काफ़ी? जीवंत गुरु क्यों चाहिए?

जीवंत गुरु चाहिए; कल्पना में मत जियो। राम-कृष्ण आए — जीवंत ही चाहिए। छांव के लिए जीवंत पेड़; सूखा विशाल क्या देगा। तालाब सूखे तो छोटे में पानी लो। फार्मूला/किताब से सवाल हल आ जाए? शिक्षक फोटो सिर पर — पढ़ाई नहीं। सामग्री से भोजन नहीं अगर सीखा नहीं। चार वेद — पांचवां जीवंत सद्गुरु; किताबों में तरीका नहीं। गाइड में उत्तर हो तो भी शिक्षक तरीका देता — स्तर उठता। फोटो लगाने से कुछ नहीं; जीवंत गुरु सानिध्य में तरीका सिखाएगा। आज का गुरु — देश-काल-स्थिति अलग; मेरी समस्या का हल। शरीर गुरु के पास रहना तभी सीखोगे।

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हर कोई गुरु सानिध्य में नहीं रह सकता — जिम्मेवारियां। क्या शब्द/ज्ञान से दूर रहकर चलें? एक महीना?

12 महीने लगातार न ले सको तो साल में एक महीना लो; नहीं तो दलदल में पड़े रहो। शब्द उपयोग की क्षमता चाहिए — ईमानदारी-सत्कर्म प्रैक्टिस। सबसे तेज गुरु सानिध्य में उठते; दूर रहोगे धीरे। प्राइवेट से अच्छा कुछ करना; रेगुलर ज्यादा। 11 महीना परिवार, एक महीना अपने को — निकालो ही अगर कल्याण चाहते हो। हफ्ते-हफ्ते जैसे रूटीन बैठे। जीवंत गुरु मिल जाए तो रहो; नहीं तो खोजो। जिज्ञासा ढूंढती है।

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लोगों की बढ़ाई-निंदा की चर्चा क्यों न करें? समय कैसे लगाएं?

किसी के बारे में बात में ऊर्जा-समय जाता; मिलता कुछ नहीं। बढ़ाई या निंदा — दोनों में अपना मैं खड़ा; गिर रहे हो। बिना मतलब चर्चा मत। सत्संग में प्रश्न पैदा करो — कैसे कल्याण। बातों से अच्छा काम की बातें, अपना कल्याण। अभी समय-ताकत है — चिड़िया चुग गई तब पछताना मत।

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पड़े रहना क्या साधना है? भगवान हमारे कर्म देख रहे? गलतियां कैसे स्वीकारें?

पड़े रहना — ना सोना ना जागना; साक्षी भी वहां नहीं जब कुछ करोगे। मूर्ति आंखों वाली — काल्पनिक; मनुष्य बनाता। ऐसा कर्म नहीं कि भगवान देखे। दुनिया में कोई दूध का धुला नहीं। गिरे कर्म से — कर्म से उठ भी सकते। पहले स्वीकार: गिरी हूं, गलतियां-अपराध; पश्चाताप। किसी से मत बताओ — हंसी के पात्र; गुरु के अलावा। गुरु आंतरिक दाग देखता जैसे मां शरीर के दाग — शुद्ध करता, छिपाता। इसलिए सर्वश्रेष्ठ गुरु सानिध्य। मां-पिता शरीर/संसार लायक; गुरु परम सत्ता लायक।

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दूर बैठे साधक गलतियां कैसे स्वीकारें जब गुरु पास न हों? बंधन क्या?

खुद स्वीकार करो — बहुत गलतियां; नहीं होती तो उस स्थिति में होते। सत्संग से धीरे कल्याण; समय मिले एक महीना पक्का। स्वीकार नहीं तो आगे नहीं। बंधन पकड़ो — राग-द्वेष-मोह-आसक्ति-इच्छा-अपेक्षा-कर्ता; लेन-देन; आश्वासन। आवेश में वादा — मैं को खड़ा करने दम कामनाओं में लगाया। अभी से पूरी तरह आओ — उम्र लंबी हो तो भी।

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सुधरने गए पर डांट लगे तो दिल दुखे — अहंकार से कैसे बाहर? आवेश आने पर क्या करें?

सुधरने गए हो — गलती को डांटते, तुम्हें नहीं। आवेश होने दो; होते हुए देखो। बाहर मत निकालो। सुधार करो। मना किया था फिर किया तो डांट सही।

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गुरु न होने पर भी इतना संघर्ष — गुरु/प्रकृति परीक्षा कैसे लेती? मदद?

चैलेंज आते ही हैं जहां रहोगे। परीक्षा की तैयारी — पीछे मत जाना; भावनाओं को ठेस पहुंचे तो डटे रहना। पूरी ताकत लगाओ — बाहरी-आंतरिक मदद होगी।

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सेवा करते अहंकार/प्रतिस्पर्धा — 'मैं सेवा कर रहा' भाव; सुविधा नहीं ज्ञान/समाज निमित्त चाहिए?

सेवा सोच-समझकर नहीं — निमित्त वो लेगा; अपना करो। सुविधा मत चाहो। लाइन में अहंकार मत — हटोगे तो पीछे नहीं दिखती। गुरु दर छूटे न — ध्यान रखो।

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चीजें छूटने/जमीन आदि की चिंता — जो होना है?

जो होना है होगा; जो रहना है रहेगा। चाहकर सुरक्षा भी न बचे जो जाना है। ज्ञान से समझो — टेंशन व्यर्थ।

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संसार में रिजल्ट अपने फैसलों से आए — अध्यात्म में भी क्या हम ही खींचते/आश्वासन देते?

फैक्ट: हम ही आश्वासन देके रखते; प्रभाव में लेते या क्लियर नहीं। अध्यात्म निकले तो देखो — डिसीजन-वाइब्स अपने। जहां मजा वहीं मत अटको।

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आध्यात्मिक मार्ग पर कैसे जियें? शादी से पहले क्या बताएं?

ईमानदारी-सत्कर्म से जियो; जरूरतमंद सेवा; सत्संग सुनो — आराम से कल्याण। शादी से पहले बता दो कामनाओं से मुक्त होना चाहता हूं — भेदभाव न हो।

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जिसके लिए निकले वो पूरी तरह न कर पाएं तो?

जिसके निकले वो पूरी तरह करो। जहां होता ठीक; नहीं तो वहां से निकल लो। सीधी बात।

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वस्तु देकर प्रेम कैसे प्रकट करें? गुरु/सेवा में वस्तु कब माध्यम?

वस्तु माध्यम तब जब जरूरत हो। जरूरत समझ में आए, स्तर बढ़े — तब। जरूरत नहीं और ला रहे हो तो वस्तुओं से खुश करना। जरूरत देखो। मैंने जरूरत में काम किया — पहले दवा-सेवा शरीर तक; आगे जन्म-जन्म दुख से मुक्ति के लिए अपने अस्तित्व मिटाने तक खोज।

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अध्यात्म मार्ग पर सिर्फ अपना देखना — कुतर्क/दूसरों में फंसना कैसे छोड़ें? दूर बैठे साधक गुरु से कैसे जुड़े?

जिसके लिए निकले वही करो; हर क्षण आत्मिक कल्याण के अलावा बात न करो। जुगाड़/जबरदस्ती मत — आंतरिक भाव। कुछ होना भटकाव; कुछ न होने में पहुंचना — द्वैत/अद्वैत। शब्दों में जियो जो दे रहा हूं तो साथ हूं; पास रहकर शब्दों में न जियो तो पास भी दूर। ईमानदारी-सत्कर्म; योग्यता से ज्यादा मत मांगो।

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अविवाहित युवक — मां-बाप सक्षम/स्वस्थ, बहनों की शादी; आध्यात्म में पूरी तरह जा सकता है या दायित्व पहले?

माता-पिता सक्षम, शादी कर सकते, आय है — तो पूरी तरह अध्यात्म में जा सकते हो। सक्षम न होते, अपाहिज — तब दायित्व निभाकर आगे। सक्षम हैं तो निकल लो पूरी तरह अध्यात्म।

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शरीर/मान-सम्मान में फंसकर आत्मिक कल्याण क्यों नहीं सोचते?

चेहरा जाना है फिर भी छोड़ नहीं रहे मान। अपनी बात करो — आत्मिक कल्याण।

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वैराग और वैराग्य? घर छोड़ना काफी?

सब हमने डाला — छुड़ाने वैराग्य/विरक्त चाहिए। घर छोड़ोगे और घर बना लोगे। वैराग = बंधनों से भागना समझ; वैराग्य = निकलना-मुक्त होना। इच्छा/राग-द्वेष से मुक्त होने का काम।

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कोई कहे मेरा हो जाएगा बिना काम — भरपाई कैसे?

बिना काम आशीर्वाद बोझ। आत्मिक कल्याण ज्ञान/ईमानदारी-सत्कर्म से; खाली वचन नहीं।

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परिवार पहचान पर दर्द — अपना-पराया क्या? मार्गदर्शन?

रक्त से अपने नहीं। जो भावनाएं समझे वो अपना। बता दिया अपने हैं चाहे जैसा व्यवहार — भ्रम। गलत: रिश्तों को अपना मान लिया। परम सुखी — शरीर के रिश्ते नहीं; परायापन नहीं लगता जिसे समझा।

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गुरु पास आकर भी क्यों नहीं रुकते? रामकृष्ण के पास नौ?

अपने आप समझने आए रुकते; भावना/प्रभाव/मांग में आए नहीं रुक पाते। स्वभाव में अपने को समझना — समय दो। और इच्छा-प्रभाव तो चले जाओगे।

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बाहरी दिखावा बनाम ईमानदारी — कैसे पहचानें?

आंख देखो — अंदर का झरोखा। ईमानदार वही बोल सकता। ईमानदारी सत्य तक ले जाएगी।

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बच्चों/दूसरों पर ज्ञान-फैसला थोपें? अपना-पराया खुलकर?

पराया कभी अपना नहीं — खुल मत रहो। सहयोग चाहो तो करो नहीं तो मत। कैसे खाऊं-जीऊं फैसला मेरा। ज्ञान लो आगे बढ़ो; थोप नहीं सकते। विवाह आदि खुद तय।

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आप दुकान पर कांटा-तौल नहीं देखते, सामान भी नहीं गिनते। हम संसारियों के लिए प्रश्न — अगर दुकानदार 50-100 ग्राम कम तौल रहा है और हम भी आपकी तरह न देखें, तो क्या हम उसकी बेईमानी को बढ़ावा नहीं दे रहे, उसे गिराने में सहायक नहीं बन रहे? ऑनलाइन सामान में भी हेराफेरी होती है और आम आदमी कोर्ट भी नहीं जा सकता — तो हम किस तरीके से अपने आप को निकालें?

मैं तो निकल गया हूं, इसलिए नहीं देख रहा हूं। लेकिन आप देखो — बस अपने अधिकार का लो। आप बढ़ावा मत दो। पहले आप अपने अधिकार में तो आओ; अभी तो आप अधिकार पार करके हो। अधिकार में आओगे तो एक दिन यहां भी चले आओगे। अभी आप डायरेक्ट यहां नहीं आ सकते, क्योंकि नहीं देखोगे तो घुटन होगी, रात-दिन बेचैन हो जाओगे। अभी तक आपने क्या किया? एक-दो पॉइंट अपनी तरफ लिया। अब एक-दो पॉइंट कम ही लो। या तो एकदम बराबर एक ही तौल, या दुकानदार से कह दो — भाई मुझे ज्यादा मत देना, कुछ कम दे देना चलेगा, ज्यादा मत देना। अगर वह फिर भी एक-दो पॉइंट ज्यादा दे तो उसकी मर्जी। कुछ चीजें ऐसी हैं कि वह काट नहीं सकता — तो कह दो, भाई तू मेरी तरफ कर रहा है, तो एक निकाल दे ताकि कांटा तेरी तरफ हो जाए; या तू पैसे एक्स्ट्रा ले ले। अगर निकलना है तो इस तरीके से जीना पड़ेगा। मुझे निकलना है, तो मुझे ये सब देखना पड़ेगा। सबसे ज्यादा चक्कर यही है कि कांटा मेरी तरफ ही होना चाहिए — हर बात में, हर जगह। उसकी तरफ क्यों नहीं? जब तुमने अपनी तरफ का भाव बनाया तो उसकी तरफ का भी देखो। व्यवहार में भी ऐसे ही करते हैं — तेरी गलती ज्यादा है, मेरी कम। मजबूत लोग ही कमजोर लोगों को बेईमान बनाते हैं। धनिया-मिर्चा फ्री में चाहिए तो वह कहां से देगा? अंदर बटखरा लगाएगा, चुंबक लगाएगा, कांटा मारेगा। चोरी आप उसे सिखा रहे हो, बेईमानी आप उसे सिखा रहे हो — उसका भी पेट है, उसके भी बच्चे हैं। मजबूत आदमी हमेशा बेईमान पैदा करता है; अगर मजबूत आदमी सुधर जाए तो कमजोर भी सुधर जाएगा। आपको लगता है एक-दो पॉइंट है, लेकिन उस एक-दो पॉइंट ने तुम्हें कितना गिरा दिया — ऐसे-ऐसे हम बहुत गिर जाते हैं।

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दुकान वाली बात तो ठीक, पर हम गृहस्थ में परिवारजनों के बीच रहते हैं, जहां तन-मन-धन तीनों तरह से लेनदेन चलता ही है। अगर हम उन्हें धन से सपोर्ट करते हैं तो उम्मीद रहती है कि वे लौटाएं, पर मांगते नहीं बनता और घुटन होती है। ऐसे हिसाब-किताब से कैसे निकलें?

देने से पहले बात कर लो कि वापस कब दोगे। अगर रिश्ता ऐसा है कि बोल नहीं सकते, तो इतना दो जितना वापस न मिले तो भी कोई बात नहीं। आप व्यवहार कर क्यों रहे हो — इसलिए कि जरूरत पड़ने पर वह भी मेरे काम आएगा, या बस उसके लिए कर रहे हो? अगर उसके लिए कर रहे हो तो उतना ही करो कि वापस न दे तो कोई बात नहीं — न मिलने के लिए दो। और अगर ज्यादा दे रहे हो तो देने से पहले बोल दो कि कब दोगे। कुछ न कुछ तो उम्मीद है। अनजान को तो उतना ही दोगे — लौटे न लौटे कोई बात नहीं, न लौटने के लिए दोगे। लेकिन जहां आपका रिश्ता है, उस रिश्ते को बनाए रखने के लिए दे रहे हो, तो उतना दो जितने में रिश्ता बना रहे। थोड़ा भी ज्यादा जाता है तो तकलीफ होने लगती है — तो फिर मत दो। अब देखो रिश्ता ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पैसा। दो में से एक कम होगा आपके पास। अगर सामने वाला ऐसा है कि पैसा देंगे तो वापस नहीं आएगा, तो आप पैसा रखकर खुश होगे कि रिश्ता बनाकर? रिश्ता बनाए रखना है तो पैसा जाने दो, क्योंकि उस रिश्ते से कहीं न कहीं वह कुछ दे तो रहा है आपको। और अगर रिश्ता रहे या न रहे कोई फर्क नहीं पड़ता, तो उतना दो जितने में चल जाए। रिश्ते में देना सत्कर्म नहीं है। सत्कर्म जरूरतमंद के लिए होता है — जहां यह भी न पता चले कि इसका उपयोग कौन करेगा। जैसे यहां पेड़ लगाए जा रहे हैं, व्यवस्था बन रही है — कौन उपयोग करेगा, कितने दिन करेगा, कोई बता सकता है? यह सत्कर्म है। अगर काम के पहले मुझे चेहरा पता है कि कौन इसका उपयोग करेगा, तो वह सत्कर्म नहीं — वहां मान-सम्मान की बात है। भोजन बनाने के पहले पता है कौन खाएगा, तो वह सत्कर्म नहीं। व्यवहार में रहकर लेनदेन तो करना पड़ेगा। तो देखो आपके लिए जरूरी क्या है। अगर व्यक्ति ऐसा है कि लेता है देता नहीं, उसकी आदत ही ऐसी है, और वह रिश्ता बनाए रखना है, तो देते रहो — क्योंकि वह पैसे पर ही टिका हुआ है; रिश्ते की बुनियाद पैसा है। पैसा देना बंद तो वह चला जाएगा, फिर आप उसके बिना रह न पाओ, घुटन हो, बेचैनी हो। आखिरी में तुम ही बचने वाले हो — यहां सब खत्म हो जाएगा, चाहे रिश्ते हों, नाते हों, वैभव हो, तुम्हारी ताकत हो। तुम ही बचोगे; वही बोध है, वही ज्ञान है। तुम्हारे पास कोई भी ताकत है तो उस ताकत का एक दायरा है; जिसका दायरा है वह अपूर्ण है, परिवर्तनशील है। अगर आप किसी ताकत में लिप्त हो तो उपलब्धि नहीं है; उपलब्धि तभी होगी जब आपके पास आपके अलावा कुछ नहीं होगा। इसीलिए मैं कहता हूं सत्कर्म में लग जाओ — सब कुछ देकर ही सब कुछ मिलता है। और सब कुछ का कोई दायरा नहीं होता; हो सकता है किसी के पास एक ही हो तो उसके लिए वही सब कुछ है — तुलना मत करना, सबकी सामर्थ्य शरीर की, वैभव की, समझ की अलग-अलग है। अब देखो आपके लिए जरूरी क्या है — रिश्ता, पैसा या दोनों। अगर दोनों जरूरी हैं और सामने वाले का व्यवहार ऐसा है कि लेता है देता नहीं, तो धीरे-धीरे वह आपको बेईमान बना देगा; बनना ही पड़ेगा, क्योंकि उसकी मांग इतनी है कि आप देना नहीं चाहते और उसे अपने पास रखना भी चाहते हो। इससे अच्छा तो खुलकर जियो — रिश्ता रहे चाहे न रहे। रिश्ते को बनाए रखने के लिए बेईमान मत बनो।

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(वही प्रश्न दोबारा, क्योंकि बहुत लोगों का ऐसा प्रश्न रहता है) रिश्ते-व्यवहार में सामने वाला मुझसे पैसे की इच्छा रखता है; मैं कह नहीं सकती कि पैसा लौटा देना या मैं मदद नहीं कर सकती — भावनात्मक बात हो जाती है। बदले में वह पैसा तो नहीं लौटाता, पर मेरे लिए गिफ्ट लाता है, ज्यादा केयर करता है, जबकि मुझे उसकी जरूरत नहीं (मेरे पास कपड़े बहुत हैं, फिर भी वह कपड़े लाए जा रहा है)। लगता है यह रिश्ता लेने-देने की बुनियाद पर टिका है। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?

देखिए आपके लिए सबसे जरूरी क्या है। यह चीज कभी न कभी तो टूटेगी। अगर आप उसका गिफ्ट लेना बंद करोगे तो भी उसे बुरा लगेगा, और फिर आप दोषी हो जाओगे — वह कहीं भी बोल सकता है कि पहले ले रहे थे, बाद में नहीं लिया, इसलिए हमारा रिश्ता टूटा; फिर वह अहंकारी भी हो जाएगा। आपका अधिकार आप पर है, आपकी ताकत पर है। तो आप देना बंद करो — गिफ्ट उसके द्वारा आपके दिए हुए से ही तो आ रहा है — तो गिफ्ट भी बंद हो जाएगा और आप पर दोष भी नहीं लगेगा। डायरेक्ट ही जीना पड़ेगा; इनडायरेक्ट यहां काम ही नहीं है। रिश्ते को महत्व दो — पैसे को क्यों दे रहे हो? देखना है कि रिश्ते की बुनियाद कहां से है, रिश्ते की शुरुआत कहां से हुई — कुछ दे रहे थे इसलिए हुई, या सीधा रिश्ता है। आपके पास एक बालक भी आता है तो कुछ लेने ही आता है; अगर नहीं चाहिए तो आएगा ही नहीं। रिश्ते की बुनियाद हमेशा लेनदेन पर ही टिकी होती है। लेनदेन हटा दिया जाए तो रिश्ता ही नहीं; रिश्ते का मतलब ही है कुछ देना-लेना। यहां भी हम बैठे हैं तो लेने-देने के लिए — लेनदेन न हो तो यहां भी आप क्यों बैठोगे? पूरे संसार का सार यही है — लेन और देन; हम एक दूसरे के पूरक हैं। लेनदेन खत्म तो तुम कहां और मैं कहां, न तुमसे मतलब न मुझसे। आध्यात्मिकता में कोई रिश्ता नहीं बचेगा। मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा — मैं इस जंगल में हूं, आज तक मुझसे कोई मिलने नहीं आया। आप भी एक दिन यहीं आओगे, तो आपका सारा रिश्ता खत्म हो जाएगा।

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गृहस्थी में बैलेंस कैसे बनाएं — संन्यासी वाली सीधी बात पर हम एकदम नहीं आ सकते। क्या रिश्तों की बुनियाद में मुझे यह देखना पड़ेगा कि वहां मेरी जिम्मेदारी है या वह व्यक्ति मेरा पैसा यूज़ करके कुछ और कर रहा है? अगर जिम्मेदारी बनती है तो क्या पैसा न देखकर, अपने से बचाकर भी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए? (उदाहरण: किसी का टिकट कराया — क्या उससे स्तर उठता है?)

गृहस्थी में मुझे यह देखना चाहिए कि अगर वह मुझसे कोई ताकत ले रहा है — चाहे वैभव हो, चाहे मेरी समझ, चाहे मेरे शरीर की ताकत — तो उसका उपयोग कहां कर रहा है। क्या अपनी जरूरत में कर रहा है, या ताकत लेकर वह गिर रहा है? अगर ताकत लेकर गिर रहा है तो चाहे खुश हो चाहे नाराज, उसे देना बंद कर दो। अगर ताकत लेकर उसका स्तर उठ रहा है तब उसकी सहायता करो। मुझे यह भी देखना है कि मैं किसी से ले रहा हूं तो उसका उपयोग किस तरीके से कर रहा हूं — दुरुपयोग या सदुपयोग। और सामने वाला कुछ ले रहा है, तो देने से पहले मुझे पता लगाना है कि वह इस ताकत का उपयोग करके गिरेगा कि उठेगा। उठेगा तो दो, गिरेगा तो मत दो — यही जिम्मेदारी है, यही कर्तव्य है। टिकट कराने में भी देखना है कि वह जा कहां रहा है, और क्या उसकी सामर्थ्य नहीं थी। सामर्थ्य थी तो आपने क्यों कटाया? यह देखना है। प्रत्यक्ष उदाहरण है — इनका बेटा पुलिस में है, काश्तकार भी हैं, कोई कमी नहीं; फिर भी टिकट मैंने कराया और मुझे वापस भी नहीं लेना। क्यों कराया? क्योंकि जब मैं इनके यहां था तो ये मेरी अच्छे तरीके से सेवा करते थे, देखभाल करते थे। ये दें भी तो मैं न लूं — ये सक्षम हैं, परिवार भी सक्षम है। तो मैंने कराया, क्योंकि उसके पीछे मुझे भी कुछ मिला था; नहीं मिला होता तो मैं क्यों बोलता कि तुम आओ, आते तो अपने टिकट से आते। जब मैं कुछ करता हूं तो देखता हूं — मैं क्यों कर रहा हूं? क्या उसके पास नहीं है? है तो फिर क्यों? कहीं मैं अपने मान के चक्कर में तो नहीं कर रहा कि मुझे बड़ा बनना है, गांव जाएं तो लोग बोलें कि देखो इसने भेजा? इनको चित्रकूट कार से घुमाया — क्यों? हमारे परिवार में भी लोग थे, उन्हें क्यों नहीं घुमाया, इन्हें क्यों? अगर इन्होंने मेरे लिए कुछ किया तो मैं जिस लायक हूं, मैंने इनके लिए किया — लेनदेन तो है। हमारे भाई लोग आने को बोलते हैं तो मैं बोल देता हूं — आना तो, नियम मेरा, नहीं तो भगा देंगे। और इनको मैंने कोई नियम नहीं बताया — बस तुम चले आओ, नियम में हम तुम्हें रखेंगे, नियम तुम्हें नहीं बताएंगे। यह प्रेम है, क्योंकि मुझे मालूम है यहां आने से तुम्हारा स्तर उठेगा। मैं इनके घर पर था; इनके बच्चे मुझसे बड़े हैं, फिर भी इन्होंने इतने सम्मान और इज्जत से रखा, पूरा परिवार मेरे पीछे लगा रहता, गाड़ी में पेट्रोल भरा देते। कोई उम्मीद नहीं रखते थे — आंख से पता चलता है। अगर आपके जीवन में किसी ने आपके लिए कुछ किया है और आप आगे बढ़ो, तो जिंदगी जब मौका दे, आप उसके लिए करो — वह न बोले तो भी करना। तब दायरा, तुलना, पैसा, ताकत मत देखना; मूल्य मत देखना; और सबसे अच्छा करो, जिस लायक आप हो। मैंने टिकट फर्स्ट क्लास में कराया, जहाज का भी खोज रहा था — यह मेरा शौक था कि ये जहाज से आएं-जाएं। यही लेनदेन है, हम एक दूसरे के पूरक हैं। एक बार मुझे कोई मेरठ ले गया। लौटते वक्त मैंने कहा फ्लाइट का देख लो; उसने ट्रेन का देखा, और उसमें भी थ्री-टायर — जबकि उसकी पेंशन अच्छी है, करोड़पति है, रेलवे में था। मैंने कहा — तू मुझे लाया और थर्ड क्लास में भेज रहा है, तो जिंदगी ने मुझे मौका दिया तो तेरे लिए भी थर्ड क्लास ही चुनूंगा। अगर वह गरीब होता तो मैं ये बातें नहीं कहता — जब सामर्थ्य ही नहीं है तो क्या करेगा। लेकिन जब आप किसी को ले गए तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही भेजना चाहिए। बदले में हमेशा आदमी ज्यादा ही करता है — तुम जितना देते हो, सामने वाला ज्यादा देता है; बुरा किए हो तो बुरे में भी ज्यादा देगा — एक थप्पड़ का दो थप्पड़। यह प्रकृति का नियम है। तो अगर किसी ने आपके लिए किया है और जिंदगी मौका दे तो जरूर उसके लिए करना, वह न कहे तो भी करना — बस यह देख लेना कि उसके हित का है, इससे वह आगे बढ़ेगा।

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एक साधिका: मैंने चार दिन तक दृश्य देखा कि विष्णु जी बाहर निकल रहे हैं और उनका सुदर्शन चक्र बहुत तीव्र गति से चल रहा है; मैंने कहा मुझे अपने अंदर कर लो, तो उनका दायरा बढ़ गया और चक्र से मेरी गर्दन कटकर अलग हो गई, मुझे डर लगा। फिर ऊपर बहुत ऊंचाई पर ओम दिखा और तीव्र किरणें निकलीं। इसका अर्थ क्या है? मैंने सोचा कि क्या अंतर्मन में कोई सूक्ष्म विकार — शायद पूर्व जन्म का — था जिसे उन्होंने सुदर्शन चक्र से काट दिया? क्या यह चिंतन सही है?

और आगे बढ़िए, और आगे भी बस देखते जाइए। आप इस पर विचार करिए कि जब गर्दन अलग हुआ तब क्या हुआ — उस स्थिति पर चिंतन करना, और फिर आगे देखना, बस आगे बढ़ते जाओ। कोई भी दृश्य का यह भाव नहीं बनाना कि मुझे फिर दिख जाए; बस देखते रहना है। फिर कटे, ऐसा भाव नहीं लाना है। मैंने कहा ना, हर वक्त आप या तो उठ रहे हो या गिर रहे हो; या तो विकार भर रहा है या विकार खत्म हो रहा है। जितने भी जन्म हमने लिए हैं, सबका तो पड़ा है। जब तक विकार है तभी तक स्थिति नहीं है; विकार हटते ही अवधूत की स्थिति आएगी, उसके बाद ज्ञान हो जाएगा। अगर हम उस परम आनंद में नहीं हैं तो इसका मतलब कहीं न कहीं विकार है — अगर पानी पूरी तरह निर्मल, साफ नहीं दिख रहा तो इसका मतलब कोई न कोई कचरा है। इस जन्म का ध्यान नहीं, तो कोई बात नहीं; लेकिन कहीं न कहीं बहुत कुछ हुआ है। उस समय आपकी स्थिति क्या थी, कैसा भाव बना — इस पर चिंतन करोगे तो उसमें जाओगे। आप डर गईं — तो डर क्यों? डर के पीछे का कारण क्या? जब मिटना ही है तो डर क्यों?

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(उसी प्रसंग में) अगर इस जन्म में मुझे ऐसा कोई विकार ध्यान में नहीं, तो फिर विकार कहां से आया — हमें पता ही नहीं चलता?

कभी-कभी हमें पता नहीं होता, लेकिन हम इतना प्रोफेशनल जीते हैं कि सामने वाले निर्दोष का अपमान कर देते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। लेकिन कहीं न कहीं उसकी बद्दुआ तो लगी, उसे पीड़ा तो हुई। प्रोफेशनल आप हो, वह नहीं था; समझ आपके पास थी, उसके पास नहीं थी। मुझे पता है, उसे नहीं पता, उससे गलती हो गई और उस गलती पर मैं उसे डांट रहा हूं — तो उसकी अंतरात्मा से आपके लिए बद्दुआ निकलेगी ही निकलेगी। आपको अपनी जगह सही लग रहा है, लेकिन हो नहीं, क्योंकि उसे तो पता भी नहीं था कि ऐसा हो जाएगा। जैसे उस बालक का भाव थोड़े ही था कि मैं इनका बैग नहीं लूंगा। अगर बनाया हुआ भाव होता तो कहने के बाद कोई भी बहाना मार देता कि मेरे पैरों में झुनझुनी चढ़ी है — झुनझुनी को चेक भी नहीं किया जा सकता, उसकी कोई मशीन नहीं। वह बच भी सकता था; पर उसने स्वीकार किया, तो वह सच में आगे बढ़ना चाह रहा है। उसकी प्लानिंग थोड़े थी। ऐसे ही हमारी समझदारी, हमारे प्रोफेशनल होने ने बहुत कुछ करवा दिया। हमने बहुत निर्दोष लोगों को बहुत कुछ कह दिया, लगा कि मैं सही हूं, लेकिन उसे हम समझ नहीं पाए। यही तो समझदारी है, बुद्धिमानी है — सामने वाले की स्थिति देखकर बात करो, क्योंकि ऊपर आप हो, वह नहीं। पढ़े-लिखे ज्यादा कर बैठते हैं — कहेंगे गंवारों से बात नहीं करना, लेकिन स्टेशन पर जाकर गंवार से ही रास्ता पूछते हैं। एक गंवार जिसे आप समझते हो, वह समाज की ज्यादा हेल्प करता है, रास्ता ज्यादा बताता है — उसके पास टाइम है और बताने में उसका स्तर उठ रहा है। प्रोफेशनल आदमी के पास टाइम ही नहीं, कार से जा रहा है; साइकिल वाला देख रहा है कि भाई कहां जाना है। मेरी क्लास की घटना — अंग्रेजी के शिक्षक कॉपी चेक कर रहे थे, मैं बीमार था इसलिए एक लेसन नहीं लिख पाया, सच बोला, फिर भी उन्होंने मार दिया। घंटी के बाद पेड़ के पास मुझे खूब उल्टियां हुईं और मैंने उन्हें खूब गाली दी, और फिर उनका लेसन कभी नहीं लिखा। जिम्मेदार कौन? वह शिक्षक — उसे जांचना चाहिए था; मुझ पर विश्वास नहीं था तो गार्डियन को बुलाकर पता करता, फिर देखता कि मैं दंड का अधिकारी हूं कि नहीं। एक सच्चा बालक इतना कठोर बन गया। एक निर्दोष बालक से उसके लिए कितना श्राप निकला होगा! आप अपनी ताकत के बल पर दंड दे रहे हो — पूरी इंक्वायरी करो, बच्चे की क्या स्थिति है, मनोदशा, मानसिक स्थिति क्या है। कभी-कभी हम पावर का दुरुपयोग कर देते हैं। ऐसी बहुत गलतियां हो जाती हैं जिनकी हमें बहुत बद्दुआ मिलती है और हम समझ नहीं पाते।

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(उसी साधिका का प्रश्न) परम सत्ता तक कब पहुंचेंगे — मंजिल कितनी दूर है?

चले हैं तो पहुंचेंगे जरूर। मंजिल न तो पास है न दूर है। यह ऐसी मंजिल है — आत्मज्ञान की — जैसे ही आप विकारों से मुक्त होंगे, उपलब्ध हो जाएगी। मंजिल दूर तो मोक्ष की हो सकती है कि भैया लेनदेन पूरा होगा तो मोक्ष होगा; लेकिन आत्मज्ञान न पास है न दूर। इसीलिए कहा गया है कि आप तेजी से प्रयास करो। यह कभी भी, कहीं भी — जैसे ही राग-द्वेष की प्रतिक्रिया होना बंद हुई और पीछे का मोह खत्म हुआ, उपलब्धि हुई। मेरा आखिरी द्वेष वही था जब उन महाराज जी ने मुझे मारा था — मुझे लगा मैं मारूंगा तो बुढ़ापे में हड्डियां नहीं बचेंगी। वह मेरा आखिरी द्वेष, आखिरी क्रोध था, लेकिन मैंने शरीर से प्रतिक्रिया नहीं दी, मैंने उसे देखा। राग, लगाव, मोह पहले खत्म हो गया था; द्वेष वही बचा था, वह खत्म हुआ और कुछ ही समय बाद ज्ञान हो गया। जैसे ही राग और द्वेष बनना बंद होगा — यह विपरीत परिस्थितियों में पता चलेगा, अनुकूल में नहीं; विपरीत परिस्थितियां पैदा होंगी, उसकी जांच होगी — और जांच में अगर आप पास हो गए तो उसके बाद ही अवधूत स्थिति होती है, और उसके कुछ ही समय बाद आत्मा का बोध हो जाएगा जिसे आत्मज्ञान कहते हैं। मंजिल तुम्हारे अंदर है, तो दूरियां कहां हैं? पिछले मोह से, राग-द्वेष से ही विकार है; राग-द्वेष का बनना बंद हुआ और पिछला खत्म हुआ, तो अवधूत स्थिति आ जाएगी। अगर बाहर होती तो मैं पास या दूर कह देता; मंजिल तो मुझ में ही है, इसलिए यह न पास है न दूर है।

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वह जो विष्णु जी दिखे, वे क्या थे? क्या वे शक्तियां मेरे पास रुकेंगी?

ये तो आपको एक-एक रूप दिखेंगे; अनेक शक्तियां ऐसी दिखेंगी। अनेक शक्तियां सूक्ष्म रूप से आकर आपकी मदद करेंगी। जैसे प्राइम मिनिस्टर जाता है तो उसकी रखवाली कितने लोग करते हैं, उसे भी नहीं पता — क्योंकि वह उस पद पर है। वैसे ही जैसे ही आप इस मार्ग में चलेंगे, अनेक सूक्ष्म शक्तियां आपकी मदद करेंगी जिसका पता आपको भी नहीं होगा — आएंगी, करेंगी, चली जाएंगी। घर पर थे तो पता था कौन भोजन बनाता है, चटाई-कपड़ा किसने लाया, घर किसने बनाया। यहां कैसे व्यवस्था होती है, कोई बता सकता है कि यह कौर, यह चटाई किसने दी, यह किसने बनवाया? यह भी तो एक शक्ति है जो सूक्ष्म रूप से आपकी व्यवस्था में लगी है। ऐसी शक्तियां इस मार्ग में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से हेल्प करती हैं। वे आपके पास रुकेंगी नहीं — उनकी ड्यूटी है; जैसे प्राइम मिनिस्टर का रखवाला उस क्षेत्र में रखवाली करेगा, वह गया तो वह गया। नर्मदा मां को मोक्षदायिनी कहा गया है। मैं 12 साल घूमा हूं — 12 ज्योतिर्लिंग, चारधाम, गंगासागर, ज्यादा से ज्यादा पवित्र नदियों के तट। हर जगह यही हाल है कि पहले आप व्यवस्था करो, बाद में भजन होगा; या चमत्कार दिखाओ, आशीर्वाद दो, तब वे रोटी लाएंगे। पूरे नर्मदा तट पर ऐसा नहीं — पहले व्यवस्था, बाद में भजन। आप भजन करने बैठ गए तो कोई न कोई आकर भोजन देगा, झोपड़ी बना देगा, कहेगा करो साधना। बस नर्मदे हर बोल दो — जैसे पासवर्ड है — 3600-3800 किलोमीटर में किसी गांव में चले जाओ, घर में परिवार के साथ रखेंगे, खाना खिलाएंगे, गाड़ी से छोड़ देंगे। मां का इतना प्रभाव है कि हर स्त्री को, छोटी बालिका को भी, मां की तरह देखते हैं, पांव छूते हैं; रात 2 बजे भी तट पर आप सुरक्षित हो, पिया हुआ भी माता-माता कहकर जगह पर पहुंचा देगा। यह मैं प्रत्यक्ष देखकर बोल रहा हूं। तो अनेक शक्तियां अपना-अपना काम कर रही हैं, जैसे समाज में अनेक पद पर लोग। जैसे ही आप इस मार्ग पर चलते हो, जितनी भी सात्विक शक्तियां हैं, आपकी सहायता करने लगती हैं। एक आदमी प्रत्यक्ष रूप से आपकी व्यवस्था में लगा है, आपका नाम भी नहीं जानता — किसलिए? क्योंकि आप इस मार्ग पर हो। आप इस मार्ग से हट जाओ, वह तुरंत हट जाएगा, कहेगा माता जी घर जाओ। जैसे सुरक्षाकर्मी को नहीं पता कि कुर्सी पर कौन बैठेगा, उसका काम कुर्सी पर बैठे की सुरक्षा है। हमें उसका लाभ लेकर आगे बढ़ना चाहिए।

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(उसी साधिका का प्रश्न) गर्दन कटते समय मुझे जो डर लगा, वह कहां से था? मुझे लगता है इस जन्म में तो कोई विकार हुआ नहीं, तो सूक्ष्म रूप में विकार कब हुआ?

विकार की बात ही छोड़ो; चलो विकार भी कुछ नहीं है, तो गर्दन कटने पर डर क्यों? अब यह ढूंढना है कि डर के पीछे का रीजन क्या है, कारण क्या है। क्या मेरी जीने की इच्छा? तो जीने की इच्छा क्यों? डर है तो कुछ तो पॉइंट है; डर ऐसे ही नहीं होता। इस अंग में प्राण है तभी तक दर्द है। अगर उंगली कटकर अलग हो जाए और आपके सामने उसके टुकड़े-टुकड़े करे, तो 1% भी दर्द नहीं होगा। जैसे यह उंगली जुड़ी है तभी तक इसमें दर्द है। तो अगर आपको डर हुआ, इसका मतलब आप कहीं न कहीं से जुड़े हो। अब देखिए कहां से जुड़ाव है, कहां से मोह है — यह आपको पकड़ना है। घटना गई, वे विष्णु गए, चक्र गया, गर्दन कटा, जुड़ गया; पर उस समय आपके लिए प्रत्यक्ष था। जिसको काम करना था, काम किया और गया। अब इस पॉइंट पर देखना है — मैं डरी क्यों? गर्दन कटा मतलब सब कुछ खत्म; जब सब कुछ खत्म हो रहा था तो मैं डरी क्यों? इसका मतलब कहीं न कहीं कुछ था। कौन सा ऐसा माल छुपाया है जिसमें आसक्ति है — रिश्तों का माल है, वैभव का माल है, कहीं साइन करके नहीं आई हो — क्या बात थी, यह आपको ढूंढना है। इसमें कोई आपकी मदद नहीं करेगा, क्योंकि आपने कहां-कहां गठरियां बांधी हैं यह आप ही को पता है। डर ने रोक लिया ना। अगर मैं जंगल में फंस गया तो दो ही डर हो सकते हैं — या तो मेरे पास माल है, कोई छीन लेगा; या प्राण का डर। तो देखो दो में से क्या है — रिश्ते का डर, या वैभव को सही जगह नहीं दे पाई उसका डर, या किसी को कोई वैभव दी है जो किसी को मालूम नहीं। सब कुछ खत्म करने को तो मैं तैयार थी, तो जब खत्म हो रहा था तो डरी क्यों? कहीं मोह था, आसक्ति थी, बंधन था जो हमने बांधकर रखा है। 'मैं खत्म हो जाऊंगी' उसका डर क्यों? इसका मतलब कोई और है हमारे अलावा जिसे मैं चाहती हूं। अगर ऐसा कुछ नहीं है तो डर भी नहीं होना चाहिए। खत्म ही तो होना है। अब इस पर चिंतन करना है कि वह डर कहां से आया, इस पर काम करना है और वहां से निकालना पड़ेगा।

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आपने बताया कि प्रोफेशनल काम करते हुए हमसे जाने-अनजाने ऐसी चीजें हो जाती हैं (जैसे आपके शिक्षक वाली बात) जिनसे लोगों की बद्दुआ, अभिशाप निकल जाता होगा। अब वह अभिशाप मेरे लिए वरदान में कैसे सिद्ध हो, या वह जल्दी कैसे कटेगा?

वह ऐसे कटेगा — जब आप भी बिना मतलब के किसी को खुश कर दोगे, जरूरतमंद की सेवा कर दोगे, तो उसकी अंतरात्मा से आपके लिए आशीर्वाद निकलेगा, और वह आशीर्वाद आपके श्राप को काट देगा। क्योंकि आपने बेमतलब उसको सताया था — उसकी उतनी समझ ही नहीं थी, उसे तो लगा ही। अब आप जरूरतमंद की सेवा करोगे तो उसकी अंतरात्मा से आशीर्वाद निकलेगा। जैसे अभी की घटना — वह बैग नहीं ले गया तो आपने तुरंत निकलकर बोला कि माता जी का बैग ले लो; माता जी ने बात सुनी तो उनके अंदर से आपके लिए जरूर आशीर्वाद निकला होगा — अपने आप निकलता है। माता जी यहां आपको आशीर्वाद देने थोड़े ही आई थीं, आशीर्वाद लेने आई थीं; लेकिन दिया ना। तो यह आशीर्वाद आपके श्राप को काटेगा।

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सत्संग में सुना कि हमसे जो गलत कर्म हुए उनका फल अलग मिलेगा और अच्छे कर्मों का अलग — अच्छा कर्म बुरे को काटता नहीं। तो फिर सेवा से मिला आशीर्वाद श्राप को कैसे काटेगा? और यह पूरी तरह खत्म कब होगा? किसी ने बड़ा अभिशाप दिया हो जो हमें पता भी नहीं, तो क्या करें?

मैं ऐसे काटना बता रहा हूं। जब हम पाप और पुण्य में जीते हैं तो हमारे पाप का फल और पुण्य का फल बराबर मिलता है। लेकिन जब हम सत्कर्म करने लगते हैं — जैसे एक कैदी को सजा हो जाए; वह अपना खाए-पिए, किसी से झगड़ा न करे, न कोई सेवा करे, तो उसकी जितनी सजा है उसे भोगनी पड़ेगी। और अगर वह जेल में सेवा करने लगे, सत्कर्म करने लगे, सबका ख्याल रखना चालू करे, तो जेलर को इतनी परमिशन है कि वह आगे फाइल बनाकर भेजेगा, कुछ लोग चेक करेंगे और कुछ सजा माफ कर दी जाएगी। अब आप उनके लिए सेवा कर रहे हो जिन्हें आप जानते भी नहीं — यह सत्कर्म हो गया, न पाप रहा न पुण्य। तो आपका कुछ कम हो जाएगा। पूरा तो हो ही नहीं सकता; भोगने में ही कुछ कम होगा। पहले दिन ही कोई बोले मैं बहुत सत्कर्मी हूं, मुझे छोड़ दो — तो थोड़े ही छोड़ेंगे; उसके कर्म को देखकर कुछ कम होगा। फाइनल खत्म तब होगा जब हर तरीके से सजा भोग लोगे, या कुछ छूट मिलेगी — और छूट सत्कर्म से मिलेगी। तो जितना ज्यादा हो सके सत्कर्म करो, उतनी छूट की संभावना है। किसी ने बड़ा अभिशाप दिया होगा जो हमें पता नहीं — तो बस एक ही रास्ता है: छोटे-छोटे सत्कर्म बढ़ते-बढ़ते उस बड़े को भी काट देंगे, सबको काट देंगे। आप बस सत्कर्म में लग जाओ, भारी छूट है। भोग तो भोग ही रहे हो — जब से समझने लायक हुए, देखो तो भोग ही रहे थे; हर समय अपने आप को लोगों के लिए बनाने में ही लगे रहे, कितने परेशान रहे। सुख का एक भी दिन नहीं — मशीन की तरह, जैसे कोई भगा ही रहा है; रात को सो रहे हो तो भी लग रहा है भाग ही रहे हो। हमें बहुत समझकर जीना है। और अगर हमने किसी को परेशान किया है तो कोई हमें परेशान करे, उसको हम झेल लें — वहां भी कट जाएगा, ऐसे भी हो सकता है।

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एक माता जी: मैं दिल्ली-गुड़गांव में अपने यहां भी आपका सत्संग कराना चाहती हूं — उसके लिए क्या व्यवस्था और कितना खर्च लगता है (साउंड, टेंट आदि)? और आप सत्संग के छह लाख क्यों लेते हैं?

आप जैसा रखना चाहो रखो — कम्युनिटी सेंटर में, कहीं भी रख सकते हो। जितने लोग YouTube पर मुझे सुनते हैं, वे आते हैं। जहां भी रखा जाता है, व्यवस्थापक अपनी व्यवस्था करता है, तीन दिन का रखा जाता है; पता चैनल की पोस्ट में आ जाएगा, आप डायरेक्ट आ जाना, वहां भी अपने प्रश्न कर सकते हो। हम सत्संग तो निशुल्क करते हैं — यहां देखो रहना-खाना सब फ्री, आजीवन रहो। छह लाख सत्संग का थोड़े ही है, वह खर्चे का है — गाड़ी, आश्रम, अपना आगे का खर्च सब चलाना पड़ता है। पहले हम फ्री में ही जाते थे, तो लोगों ने क्या किया — हमारे घर आओ, हमारे घर आओ — हम परेशान हो जाते थे। जैसे दवा भी पहले फ्री में बांटता था, तो लोग भैंस के लिए, चाची के लिए, माई के लिए मांगने लगे, फिर पैसा लगाया। तो पहले दो लाख रखा और आने-जाने का किराया; फिर छह रख दिया — जितना मेरा आने-जाने का खर्च होता है उतना दो। मुझे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन जब मुझे काम करना है तो उसके लिए तो चाहिए ही चाहिए, तो उसके लिए जरूर लूंगा। बताना जरूरी है और कराना भी चाहिए। पैसा है, लेकिन निकलना भी तो चाहिए — बीमारी हो जाए तो आदमी खेत बेचकर बीसों लाख निकालता है, सब कुछ निकालने को तैयार होता है। बात यह है कि मैं कितना निकाल सकता हूं, कितना दे सकता हूं; कंजूसी है तो नहीं निकालेगा। अगर आपकी क्षमता है तो सत्संग कराना चाहिए, ज्ञान का प्रचार करना चाहिए। आज बुद्ध का ज्ञान फैला है तो धन से ही फैला है — जिस व्यक्ति ने उन्हें चौमासे के लिए जमीन दी, उसने वह जमीन स्वर्ण मुद्राओं से बिछा दी। चाहे बुद्ध का हो, चाहे कबीर का, जिसका भी ज्ञान हम तक किताबों आदि द्वारा आ रहा है, उसमें पैसा ही खर्च हुआ है।

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एक माता जी: मैं कई बार सोचकर पछताती हूं कि यह सब — सही-गलत क्या है, मैं कहां हूं — हमें हमारे परिवार ने क्यों नहीं बताया? किसी को कुछ पता हो तो बताना तो चाहिए।

अगर बता दें — जैसे राम का नाम सत्य है, यह बता दें — तो फिर आप उनके काम नहीं आओगे, यूज़ कैसे होगी? यहां एक दूसरे को यूज़ कर रहे हैं। दूसरे का बेटा अगर महात्मा बने तो प्रणाम करते हैं और कहते हैं सात पीढ़ी तार दिया; लेकिन खुद का बेटा उस तरफ जाए तो कहेंगे भूत पकड़ लिया, विवाह कर, शादी कर। लोग इसलिए नहीं बताते — यूज़ करने के लिए। लास्ट में बताते हैं, जब आप यूज़ के लायक नहीं रहतीं, जब कंधे पर आ जाती हो, बोझ हो गईं — तब कहते हैं राम नाम सत्य है, सबकी यही गति है। जब आप इस शरीर से निकल गए और आपने कहा कि यह मैंने क्या कर दिया, फंस गए — तब ऊपर से वह जीवात्मा कहता है, पहले क्यों नहीं बताया, यह बात तो मुझे बचपन में बताने वाली थी। लेकिन बचपन में बता देते तो आप उनके उपयोग में नहीं आते। अपने बच्चों को लोग इसलिए नहीं बताते कि कहीं वैराग्य न हो जाए, शादी न करे, चला न जाए। लेकिन यह कितनी बड़ी बेईमानी है। एक मां-बाप अपने बच्चों से कम से कम बता तो दें कि बेटा इस संसार में मैं तो उद्धार नहीं कर पाई, लेकिन तू अपना उद्धार कर ले — भले वह बाद में विवाह करे, लेकिन बता तो दो। नहीं बताते — बहुत बेईमान हैं; माता-पिता बेईमान होते हैं, तभी नहीं बताए। कोई चले या न चले, पता तो चल ही जाता है। आज गुरु नानक को सब प्रणाम कर रहे हैं, लेकिन वही गुरु नानक अपने माता-पिता के लिए आखिर तक निठल्ले ही रहे, क्योंकि वे उनके यूज़ नहीं हो पाए — पर दुनिया के लिए महान हो गए। आपको इसीलिए नहीं बताते कि पता चल जाएगा तो आप उपयोग नहीं होंगे, बचकर निकल जाओगे। रोकना नहीं है — शादी करना बच्चों की मर्जी है — लेकिन सलाह तो देना चाहिए कि बेटा मैं करके फंस गई, तू मत कर।

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कर्म योनि और भोग योनि क्या है? मानव शरीर और अन्य जीवों के शरीर में क्या अंतर है?

मानव शरीर के अलावा जितने हैं वे भोग योनि हैं। उन्हें भोग और भोजन — वह भी प्राकृतिक। उनका भोग का समय होता है, वे जब चाहें तब भोग नहीं कर सकते; और भोजन भूख लगने पर अपना खाते हैं। वह भोग योनि है। मानव शरीर कर्म योनि है। मानव शरीर में तीन प्रवृत्तियां दी गई हैं — सात्विक, तामसी, राजसी। बाकी जितने अन्य जीव हैं, उन्हें अपने स्वभाव से ही शरीर मिलता है — शाकाहारी है तो शाकाहारी, मांसाहारी है तो मांसाहारी; उनमें सात्विक-तामसी-राजसी गुण नहीं हैं, वे न पाप करते हैं न पुण्य, न अच्छे हैं न बुरे। हर मानव के अंदर समझ है — अबोध की बात मैं नहीं कर रहा — और यह कर्म का शरीर है, इसमें कर्ता का अधिकार है। इसमें भोग, भोजन और योग है; योग हर शरीर में नहीं, इसी शरीर में योग करके अपने आप को साधना है। मानव शरीर को स्वतंत्रता दी गई है कि वह जब चाहे भोग कर सकता है, उसे प्रकृति के हिसाब से नहीं चलना — बारिश हो, ठंड हो, जैसा माहौल हो; और भोजन जब चाहे कर सकता है। शरीर को पूरी छूट दी गई है, लेकिन जब तक योग बाकी है तभी तक आप इस शरीर में हो। जिस दिन योग खत्म हो जाएगा, आपको भोग योनि मिल जाएगी। अगर आपने इस शरीर का सिर्फ भोग-भोजन में उपयोग किया — जितने भी अन्य जीव हैं वे भी हर साल बच्चों को जन्म देते हैं, घोंसला बनाते हैं, पालते-पोसते हैं, बड़ा करते हैं, छोड़ देते हैं — अगर इतना ही काम आपने किया तो आपने पशुओं की तरह जीवन जिया। तो जब आपका योग का समय खत्म हो जाएगा, वह आपसे छीन लिया जाएगा और आपको भोग शरीर मिल जाएगा — क्योंकि आपको भोग-भोजन ही करना था, तो फ्री में करिए। मानव शरीर में ही व्यक्ति पैदा करके खाता है, बाकी जीव पैदा नहीं करते। योग बाकी रहा तो अगला शरीर मानव का मिलेगा; योग खत्म हो गया तो अगला शरीर भोग-भोजन का मिल जाएगा — मानव शरीर लेकर करोगे क्या, जब योग करना ही नहीं है? आप मानव नहीं हो, यह बात समझ लेना। वही विद्युत पंखे में गई तो पंखा नाच रहा है, वही बल्ब में गई तो उजाला दे रही है; जगह बदल दो तो वह नाचने लगेगी, वह उजाला देगी। हम जिस शरीर में जाएंगे वैसा बर्ताव करने लगेंगे। अभी मानव शरीर मिला है, समझ भी है — सौभाग्यशाली हो। मैं दुनिया का सौभाग्यशाली उन्हें समझता हूं जो अध्यात्म समझते हैं, और दुर्भाग्यशाली उसे जो समझने के बाद भी यात्रा नहीं कर रहे। दुनिया में ऐसे समझ वाले हैं जिन्हें अध्यात्म समझ में ही नहीं आता — हो सकता है परिवार-रिश्तेदार में हों, मां-बाप ही हों। कितने महापुरुष हुए, उनके मां-बाप अध्यात्म को नहीं समझे; उपलब्धि के बाद भी बोले — आओ, अभी भी राज संभाल लो।

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दूसरी योनि में (जैसे जानवर) जो कर्म किया जाता है उसका क्या? और 84 लाख योनियों में घूमकर वापस मनुष्य जन्म किस कर्म की वजह से मिलता है — क्या पूरी 84 लाख योनियां घूमनी पड़ती हैं?

उसमें पाप-पुण्य है ही नहीं, उसमें बस भोग है — क्योंकि आपको भोग की इच्छा थी। इस जीवात्मा के पीछे पूर्ण आत्मा है; आपको जैसा चाहिए वैसा मिलता जाता है। यह प्रकृति कल्पवृक्ष की तरह है — जो आप मांग करते हो, आप यहां घूमने आए हो, प्रकृति का काम है आपको देना, जैसा आपको चाहिए और जिस लायक आप रहते हो। जरूरी नहीं कि 84 मिलें। हो सकता है एक शरीर आपको पशु-पक्षी का मिल जाए, दूसरा फिर मानव का — कुछ बोल नहीं सकते। हो सकता है आपने सपना देखा 'काश मैं चिड़ियों की तरह आसमान में उड़ता', तो शरीर छूटे, आप चिड़िया बनें और फिर मानव में आ जाएं — क्योंकि आपने इतना तक ही मांगा था। हर इच्छा वह पूरी कर देता है; आप जैसी-जैसी मांग करते हो, वैसी-वैसी चीजें आपकी तरफ आने लगती हैं। अगर घूमकर आते तो सब एक जैसे पैदा होते — घूमकर नहीं आते। शेर बनना देखा है तो हो सकता है शेर बनकर, शेर की जिंदगी जीकर वापस आ जाओ। जैसे नाटक में आप कहते हो मुझे यह पात्र चाहिए, तो वह पात्र मिलता है, रोल करके फिर अपनी दुनिया में आ जाते हो। अपने को राजा-रानी को नहीं पकड़ना, राजा-रानी से कुछ समझना है। एक ने कहा कहानी सुनाओ — एक था राजा, एक थी रानी, बच्चे हुए, राजपाट भोगा, बच्चों की शादी हुई, उनके बच्चे हुए — फिर क्या हुआ? बेटा, फिर वही होगा। जब तक शादी करेंगे, बच्चे होंगे, यह चलता जाएगा। जिस दिन यह समझ में आ जाएगा कि हम तो कुछ और करने आए थे, तब वह होगा।

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गुरु जी, इस रंगमंच का आनंद कौन ले रहा है — इसका प्रेक्षक कौन है? क्या रोल हम खुद चुनते हैं?

एक तो आप, और एक श्रोता आपको बनना है। वे बोलते हैं — आपने क्या काम किया, वाह, इनको माला लाओ; मास्टर साहब, डॉक्टर साहब, क्या काम किया, लाओ पुरस्कार — यही रंगमंच है। असली रंगमंच, नकली रंगमंच — अगर देखा जाए, समझ लोगे तो यह भी नकली है। आप रोल की चॉइस करते हो, और फिर जांचा जाता है कि आप उस रोल के लायक हो कि नहीं; ऐसे ही रोल नहीं मिलेगा। आप सोचें — मैं जा रहा हूं; परमात्मा पूछे क्या बनेगा तू; मैं भिखारी बनूंगा। यहां आए तो बोले भिखारी ठीक नहीं, बड़ी बेइज्जती होती है — वहां से तो तुम भिखारी बनकर आए थे, लेकिन यहां मान के चक्कर में पड़ गए; अब भिखारी का रोल नहीं करना चाह रहे, राजा बनना चाह रहे हो, और उस राजा बनने में अनेक तरह की बेईमानियां कर दीं, और फिर रोल करके जा नहीं पा रहे। वहां से बड़ी खुशी से आए थे कि यह रोल लूंगा। इस पिंड में आते ही सब भूल जाओगे — ऐसी शर्त भी है कि तू इस पिंड में जाएगा तो मुझे भूल जाएगा। जीव कहता है — मैं याद रखूंगा, मैं तुझसे हूं, कैसे भूल जाऊंगा। ठीक है बेटा, जा। तब जब समझ जाता है कि यार फंस गया, तब पागल की तरह गुरु ढूंढता है, चिल्लाता है गुरु-गुरु। तब वह किसी गुरु को भेज देता है — जा, इसे मेरा पता बता, इसको बोल तेरे अंदर ही पता है। गुरु बस इतना ही बताने आता है कि बेटा तेरे अंदर उसका पता है, यह सब छोड़ दे। गुरु आपको याद दिलाता है जितना आप भूल गए हो, आपका बंधन याद दिलाएगा; बंधन से छुड़ाने की शक्ति आपके पास है ही; इधर-उधर हुआ तो वह आंतरिक ऊर्जा देता है। जैसे ही आपने छुड़ाया, अपने आप में हुए, एकाकार — बात ही खत्म। हर रोल कर-करके थक गए, इसीलिए यहां बैठे हो — भोग करके, भोजन करके, रोल करके थक गए। पहले अपना रोल अस्वीकार किया, बेईमानी की, अब अपने रोल में फंस गए और फंसकर निकलना चाहते हो; अब समझ में आ गया कि यह बनाया हुआ अस्तित्व है, नहीं रहेगा, मैं क्यों परेशान हो रहा हूं। जब उसका बालक थक जाता है तो वह किसी न किसी को भेजता है। इसीलिए कहा गया — गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वर, गुरु साक्षात परब्रह्म — 'पर' मतलब पार कराने वाला, परब्रह्म का स्वरूप; वह अपना ही स्वरूप भेज देता है कि जा उसे बता। अब वह आपके लिए रोल करने आया है — आपको छुड़ाने के लिए उसे रोल लेना पड़ा, क्योंकि उसके अलावा आपको निकालेगा कौन? यहां जितने हैं, फंसाने वाले हैं। मां-बाप को पता है आखिरी क्या होगा, फिर भी कह रहे हैं तू भी आ, मेरा वंश बढ़ा; सबको पता है पैसा भी यहीं रह जाएगा — भाई हम अपने घर जाना चाहते हैं — नहीं, तू जा घर, लेकिन वंश तो बढ़ा जा।

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(उसी प्रसंग में) दूसरे का बालक संन्यासी हो तो कहते हैं सात पीढ़ी तार दी, अपना हो तो कहते हैं बिगड़ गया। गुरु जी, क्या संसार में भी अच्छे और अध्यात्म में भी अच्छे, आध्यात्मिक मां-बाप मिलना बहुत कम है?

दूसरे का कोई संन्यासी हो गया तो बोले बेटा तुमने सात पीढ़ी तार दीं। मैं कहता हूं — माता जी, तुम्हारे बेटों की शादी हुई कि नहीं? उनका भी चलो लाइन में लगाओ। बोले नहीं बेटा, उनकी शादी करनी है। तो झूठी वाहवाही मत करना — अपने बेटे के लिए शादी, और मुझे कह दिया सात पीढ़ी तार दीं। कितने झूठे लोग हैं — दूसरे का बालक संन्यासी होगा तो कहेंगे सात पीढ़ी तार दीं, और खुद का होगा तो कहेंगे बिगाड़ दिया। मैं लोगों को डांट देता हूं — अपने बेटों को भी बनाओ। महाराष्ट्र में बोलते हैं, शिवाजी दूसरे के घर में हों, अपने घर में नहीं। दूसरे का बालक हुआ तो पांव छूते हो, आशीर्वाद मांगते हो; अपना बालक हुआ तब तो और खुश होना चाहिए। ऐसे मां-बाप बहुत कम हैं, लेकिन हैं — रेयर, बहुत-बहुत कम, लीस्ट से लीस्ट; नहीं तो सब वही — धन चाहिए, यह चाहिए, वह चाहिए। जिनके मात-पिता, भाई-बहन, पूरा परिवार आध्यात्मिक है — बढ़िया है, सौभाग्यशाली हो।

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हमारी गुरु माता (घर की) बहुत धार्मिक हैं — घर में गलती से प्याज-लहसुन पहुंच जाए तो बाहर फेंक दिया जाता है, बाल्टी अलग कर दी जाती है। क्या ऐसे नियमों में भी राग पैदा होता है?

नियम में भी फंस जाते हैं आप।

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जैसे कहते हैं कि वह खुद तर गया तो सात पीढ़ी को तार दिया — मां-बाप का भाव रहता है कि हमने तुम्हारे लिए किया, अब तुम्हारी बारी आई तो तुम मुक्ति की तरफ जा रहे हो, यहां रुको। ऐसे में क्या करें?

मैंने नहीं बोला। सबके माता-पिता यही बोलते हैं — 7, 21, 108, कितना भी बोल दो, क्या जाता है। माता-पिता का यह भाव रहता है कि हमने तुम्हारे लिए किया, तुम्हारी बारी आई तो तुम मुक्ति की तरफ जा रहे हो, अब हमारी करने की बारी है, यहां रुको, फंसो। वे भी सही कह रहे हैं — उनकी सेवा करते-करते भी कर सकते हो; आप क्यों फंस रहे हो? आप माता-पिता से बोलिए — आपको क्या जरूरत है? आप उनकी सेवा करिए, बस। हम आपकी सेवा करेंगे, बोलो जरूरत क्या है। हम साधना कहीं भी करें, जब भी जरूरत हो मुझे फोन कर देना, हम आ जाएंगे — लेकिन आपकी जरूरत के लिए आएंगे, किसी और के लिए नहीं। आपको क्या चाहिए, बोलिए — अगर हमारा कोई कर्तव्य-दायित्व बनता है तो। और अगर कोई और सेवा करने वाला है और फिर भी जबरदस्ती कह रहे हैं, तो यह भी गड़बड़ है।

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आपने बताया मानव के पास योग है — योग क्या है?

योग का मतलब अपने आप को साधना। योग का मतलब होता है जुड़ाव; योग के द्वारा उस जुड़ाव को छोड़ देना, खत्म कर देना — समझने के लिए यह भी व्याख्या कर सकते हैं। हमें योग इसलिए करना है कि हम जिनसे योग में गए हैं, जिनसे जुड़ गए हैं, उनसे अपने आप को छुड़ा लें — बस यही है योग। अब यह कैसे होगा — देख लो, आपके पास शुद्ध जल होना चाहिए, कोई भी साबुन ले लो, कपड़े धो लो; ब्रांड के चक्कर में क्यों पड़ते हो? जैसी आपकी क्षमता, वैसा साबुन ले लो; कोई न मिले तो पीली मिट्टी में भिगो दो, कपड़े धुल जाते हैं। प्रकृति स्वयं गुरु है, आप खोजी तो बनो। खोजी बनना जरूरी है। मुझे पक्का पता है कि अगर आप खोजी हो तो पहुंचना पक्का, दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती; और अगर आप खोजी नहीं हो तो दुनिया की कोई ताकत आपको पहुंचा नहीं सकती। इस दुनिया में एक योगी है, एक चोर है, एक भोगी है, एक रोगी है — इनमें सफल योगी होता है, क्योंकि वह स्वयं की खोज के लिए निकला था। चोर किसी का पॉकेट मारने, धन के लिए निकला था; भोगी भोग करने के लिए; रोगी अपना रोग ठीक करने के लिए। मिलता सबको है, लेकिन सफल एक ही होता है — योगी।

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एक साधक (एक महीने से आश्रम में): पहले बिजनेस-जॉब की छोटी-छोटी बातों में बहुत व्यस्त रहता, बहुत सोचता था; यहां आकर विचार शांत हो गए, अंदर पवित्रता का एहसास हो रहा है। बेईमानी आदि का खाने-पीने पर कितना असर पड़ता है? आपने तीन गुण बताए — वे कर्म से होते हैं या खाने से?

इस शरीर में तीन गुण हैं — सात्विक, तामसी, राजसी — ये शरीर के गुण हैं। कौन सा गुण अपनाओ, इसके मालिक आप हो। कर्म के बाद ही तो भोजन मिलता है; भोजन ऐसे फ्री में नहीं मिलता — भिखारी बनना पड़ता है, फिर आखिरी में कोई भोजन ऐसे ही दे दे। कोई भोजन देगा तो कुछ समझेगा तभी देगा। जानवर को जानवर समझकर भोजन देगा, उसे पता है मैं किसको भोजन दे रहा हूं; ऐसे ही आपको भी पता करेगा कि मैं किसको भोजन दे रहा हूं। एक ही घर में सब खा रहे हैं, लेकिन खिलाने वाले का भाव सबके लिए अलग-अलग — किसी के लिए गर्म, किसी के लिए ठंडा। भोजन आपके कर्म से मिलता है, ऐसे सीधा नहीं मिलेगा। अब आप देख लो उस भोजन के लिए आपने काम किया है या नहीं। साधक हो, साधना कर रहे हो, तो तुम्हारा पूरी तरह अधिकार है।

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जैसे अभी वृद्ध लोग आश्रम में आएंगे, जैसे अपने प्रोफेसर साहब — धीरे-धीरे उम्र और बढ़ेगी और ये यहीं रुकेंगे, तो फिर उनकी सेवा कौन करेगा?

क्या फर्क पड़ता है, उनको तो मिटना है। भोजन करते-करते अगर कोई रहा तो सेवा करेगा, नहीं तो तड़पकर निकल लेंगे, या वही शरीर सड़ जाएगा तो निकल लेंगे। मैं आपको बताऊं — मेरा अगर शरीर अभी खराब हो जाए तो मुझे एक गिलास पानी देने वाला कोई नहीं है; कोई आ जाए वह बात अलग है। समझना इस बात को — आप लोग कितने दिन दोगे, एक महीना, दो महीना? क्योंकि आपके पीछे भी तो कोई है। आपके लिए पक्का व्यक्ति है — आपका बेटा, आपकी पत्नी — वे पूरी जिंदगी देंगे, चाहे मान से दें, चाहे सम्मान से, चाहे अपमान से। लेकिन इस व्यक्ति के लिए पक्का कोई नहीं; आप कितने दिन दोगे? तो जब हमने अपनी फिक्र नहीं की, तो प्रोफेसर साहब की फिक्र क्या करूं? हमारे पीछे तो कुछ भी न था, न है, न होगा — हम तो सिर्फ हम ही हैं।

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एक साधक ने अनुभव बताया: दीपावली पर पूजा के लिए रखी नए नोटों की गड्डी सत्संग सुनकर निकाली और एक जरूरतमंद को नया नोट दिया, तो देने और लेने दोनों में भाव बहुत पवित्र हुए। फिर प्रश्न — घर या आश्रम में जाकर दान लिखवा आते हैं, तो वह सत्कर्म में आता है या किस कर्म में? (हमारा किराने का बिजनेस है, ज्यादातर ऐसी जगह अनाज भेज देते हैं।)

अगर आप लिखवाकर आ गए तब तो वह सेवा में आता है। अगर आपने अपने हाथों से जरूरतमंद को दिया, वह सत्कर्म में आता है — उसके लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी, जरूरत का ध्यान रखना है कि उसने उसका उपयोग किया। सेवा भी ठीक है, मिला-जुलाकर सेवा भी करो। अगर आप सेवा करोगे और आपकी इच्छा है अपने आप तक पहुंचने की, सत्कर्म की, तो ऊपर वाला मौका देगा, और जो भी धन-वैभव आएगा उसे आप लोगों में लगाओगे। करते रहो — बुरा करने से अच्छा है अच्छा करना। कुछ न कुछ तो तुम करोगे ही, यह खोपड़ी कुछ न कुछ करने को चाहिए, इसलिए इसे सही जगह लगाकर रखो। सारा खेल भाव का नहीं, सारा खेल 'चाहिए' का है — 'चाहिए' में भाव पैदा होता है; 'चाहिए' नहीं तो भाव खत्म। जैसे इन्होंने नोट वाली बात बताई — बीस का पुराना नोट भी चलेगा, लेकिन नया दिया तो सामने वाला खुश हो रहा था; कोई भी नए को देखकर खुश होगा, मूल्य अंदर वही है पर आपको सड़ा नोट अजीब लगेगा। हर शरीर के पीछे वही तो है, लेकिन आप रूप में फंस गए हो, स्वाद में फंस गए हो — चावल ठीक नहीं लग रहा, पुलाव ठीक लग रहा है; पुलाव के पीछे भी तो चावल है। और सिर्फ चावल में ही नहीं, चावल के पीछे वाले में भी फंसे हो — चावल वह दे जिससे आप प्रेम करते हो और पुलाव वह दे जिससे नफरत करते हो, तो खाने में कौन जमेगा? जिससे प्रेम है उसका चावल; पुलाव में घुटन होगी।

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(उसी प्रसंग में) तो रूप, स्वाद और वस्तु के पीछे वाले के प्रति इस अच्छे-बुरे के फंसाव से छूटें कैसे?

कुछ नहीं चाहिए — एक फार्मूला है, बस पकड़ लो, बात खत्म हो गई। शून्य भी कुछ है। मान लीजिए दो आदमी बैठ गए — एक ने कहा कुछ नहीं चाहिए, एक ने कहा मैं शून्य में बैठा हूं। किसी ने शून्य वाले के आगे एक लगा दिया, तो शून्य वाला पगला जाएगा — यह तो दस हो गया; दो लगाए तो बोलेगा मेरे पास तो बीस हो गए, हमें पता भी नहीं चला। और 'कुछ नहीं चाहिए' वाले के आगे एक मारे चाहे दो, वह हंस देगा — ले जा अपना एक-दो — क्योंकि जितना मार रहा है उतना ही रहता है, बढ़ नहीं रहा; वह बोलेगा यार मैं तो कुछ नहीं हूं, यह कुछ होने वाला तुम्हारा नहीं, निकल लो। वहां द्वैत नहीं आ पाता। शून्य में द्वैत आ जाता है, क्योंकि शून्य भी कुछ है; कुछ है तभी शून्य होगा। इसलिए मेरा कहना है, तुम शून्य को भी छोड़ दो। द्वैत का मतलब — दूसरा; हम ज्यादा वह कम, या वह ज्यादा मैं कम — बस यही द्वैत है, तुलना। जब तक आपके जीवन में तुलना है, तब तक आप द्वैत में हो। तो मेरा कहना है — बस कुछ नहीं चाहिए, बात ही खत्म कर दो; कोई भी आए, कुछ नहीं चाहिए। लेकिन वह आंतरिक होना चाहिए, कहने से नहीं — नहीं तो वह बोलेगा, यह कह रहा है कुछ नहीं चाहिए, तो इसे भोजन दे दो।

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आप जो ईमानदारी, सत्कर्म और 'कुछ नहीं चाहिए' की बात बोल रहे हैं — इसके लिए भी तो कुछ चाहिए; ईमानदारी और अच्छा कर्म भी कुछ चाहिए इसलिए कर रहे हैं? निष्काम भाव से करें तो क्या फर्क पड़ता है?

हां, फंसने के लिए इतना चाहिए कि 'कुछ नहीं चाहिए' — तभी ये फंसे। वही तो — 'कुछ नहीं चाहिए' के लिए करो ना, उसके लिए करो। 'बहुत चाहिए' में कर लिया, अब करो तो उसके लिए करो। जरूरतमंद की करो। निष्काम भाव से आप कर नहीं पाओगे। निष्काम भाव तब होगा जब सामने जरूरत रहेगी; अगर सामने वाले की जरूरत नहीं है तो कितना भी निष्काम भाव पैदा करो, होगा ही नहीं। निष्काम भाव से सेवा करना आपके बस में नहीं है, आपके बस में कुछ नहीं है। आप बस समझ लो — कुछ नहीं, और निकल लो। क्योंकि कुछ अगर समझे तो कितना समझोगे? यहां जो भी समझा जा रहा है, आप समझते-समझते वह बदल गया; आप किसी को बताने गए तो पता नहीं कितना बदल गया; आप जो देखकर गए थे वह रहा ही नहीं। इसलिए उपयोग करो और निकलो; सिद्ध मत करो कि यह है, वह है — जैसे सिद्ध किया, बदल गया; वह नाश की तरफ जा रहा है, उसके रूप का नाश हो जाएगा, परिवर्तन होगा। बुद्धिमान व्यक्ति उपयोग करता है और निकल लेता है; भटकने वाला व्यक्ति सिद्ध करता है। इस संसार में जिसकी भी आपने कीमत रखी — कुछ समय पहले जमीन इतने में बिक रही थी, आज इतने में हो गई — कम-ज्यादा होता रहता है। यह परिवर्तनशील संसार है, इसलिए उपयोग करो, निकलो — सीधी सी बात।

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गुरु जी, छूटने के लिए तो समझना पड़ेगा?

छूटने के लिए समझना पड़ेगा, और समझने के लिए छूटना पड़ेगा — यही तो बात है, यही तो रहस्य है। तुम एक जगह खड़ा होना चाहते हो — क्यों? जहां खड़े हो रहे हो वह बदल जा रहा है, जिसके द्वारा खड़े हो रहे हो वह बदल रहा है; समझने वाला भी बदल रहा है, समझाने वाला भी; हर वक्त आपकी समझ बदल रही है; हर क्षण, हर पल आप बदल रहे हो, आपका शरीर बदल रहा है, जहां खड़े हो वहां सब बदल रहा है। तो आप क्यों एक जगह खड़ा होना चाहते हो? सब परिवर्तन हो रहा है — बस बात खत्म। जिंदगी को हंसकर जियो, खुलकर जियो और अभी जियो। आप कहोगे कुछ करना चाहता हूं तो लोग आपसे बात करेंगे; लेकिन जब कहोगे मुझे कुछ नहीं करना है, तो बात ही खत्म — दूसरा बोल ही नहीं पाएगा। अगर आप पक्का डटे हो तो दूसरा जन्म ही नहीं ले पाएगा; दूसरा तब जन्म लेता है जब तुम कुछ करते हो, तब वह बताता है ऐसे नहीं ऐसे करो। तो दूसरे को पैदा मत होने दो — 'अदर इज हेल', दूसरे का अर्थ ही नर्क है; दूसरा जरूरत में ही पैदा होता है।

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अर्जुन के पास तो कृष्ण जैसे सद्गुरु बचपन से थे (बुआ के लड़के, रिश्तेदार) — तब उन्हें उपलब्धि क्यों नहीं हुई? कृष्ण ने गीता का ज्ञान युद्ध के समय ही क्यों दिया, पहले क्यों नहीं? क्या यह पात्रता की बात है?

अपने आप में कब आओगे? जब आपको कुछ नहीं चाहिए; जब तक कुछ चाहिए, नहीं आ सकते। तो मैं कह रहा हूं कि इतनी मेहनत करके आने से अच्छा है आप सीधा चले आओ — आना तो यहीं है, यह फिक्स है। कोई भी साधना करो, कोई भी विधि करो, आपको आना यहीं है। कृष्ण जब अर्जुन को ज्ञान दे रहे थे, अर्जुन कहीं गए क्या? लेकिन उन्होंने योग मार्ग, ध्यान मार्ग, क्रिया मार्ग, भक्ति मार्ग, योगी का, वैरागी का मार्ग बताया; उदासी, संन्यासी, महात्मा, चार वर्ण — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। अर्जुन बस वैसे ही खड़े रहे और उपलब्धि हुई। सद्गुरु तो पहले से था, तब क्यों नहीं हुआ? क्योंकि अर्जुन जब 'कुछ नहीं चाहिए' में आए, तब। इस दुनिया में कोई भी साधक कर-करके थक जाता है और जब वह 'कुछ नहीं चाहिए' में आ जाता है, तो सामने वाला सद्गुरु हो जाता है, होना पड़ता है; आपके सामने सद्गुरु ही टिकेगा, कोई सामान्य टिक ही नहीं पाएगा। 'कुछ नहीं चाहिए' में आए — यही पात्रता है; जब पात्र हुए तब उन्होंने दिया। फिर परीक्षा भी ली — हे अर्जुन, युद्ध करो — कि यह सच में 'कुछ नहीं चाहिए' में है या नहीं। अकेले अर्जुन ने बोला कि मुझे दर्द दिख रहा है, मैं अपनों को नहीं मार सकता, अपने लोगों को मारकर मुझे मिलता है तो मुझे नहीं चाहिए; बाकी सब तैयार थे। युधिष्ठिर को सत्यवादी बोला जाता है, लेकिन उनके अंदर झूठ था — जीतने के लिए, राजा बनने के लिए उन्होंने झूठ बोला; कृष्ण के कहने से नहीं बोला, क्योंकि कहने से मानते तो परम भक्त तो अर्जुन थे, वे फिर युद्ध करते। युधिष्ठिर के अंदर झूठ था, समय आने पर निकल गया। सद्गुरु पहले परीक्षा लेता है कि सच में कुछ नहीं चाहिए; जब देख लेता है कि पक्का इसे कुछ नहीं चाहिए, तब कहता है ठीक है। इस पृथ्वी पर कोई भी विधियां, साधना कर-करके थक जाता है; खोजते-खोजते जब खोजने के लिए कुछ नहीं बचता, अनुभव करते-करते अनुभव करने को कुछ नहीं बचता, तो शेष बचता है खोजी, अनुभव करने वाला। फिर कुछ देर बाद खोजी भी नहीं रहता — खोजी खोज के सहारे, अनुभवकर्ता अनुभव के सहारे टिका था। जैसे लाइट गई या तार काट दो, तो कुछ देर बाद फ्रीजर में ही बर्फ पानी हो जाएगी, निकालने की आवश्यकता नहीं, कनेक्शन काटना है। 'कुछ नहीं चाहिए' मतलब आपने अपने बनाए हुए संसार से कनेक्शन काट दिया; अब इंतजार करो। उस स्थिति में आओगे तो तुम खत्म हो जाओगे, शेष बचेगा सत्य। और आप क्या कर रहे हो — फ्रीजर को कम-ज्यादा कर रहे हो; कनेक्शन पूरी तरह कटेगा तभी पानी होगा। फिर सोचोगे बर्फ कहां गई, कहां से आई थी — वह कनेक्शन की वजह से थी। जितने लोगों को आज तक उपलब्धि हुई, वे 'कुछ नहीं चाहिए' में आए तब हुई; वहीं से उपलब्धि के लायक होते हैं। मां एक बार बच्चे को जन्म देती है, लेकिन गुरु आत्मा को जन्म देता है — बाकी सारा छुड़ाता है, सारे बंधन काटता है।

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आपने कहा कि उसके अंदर था इसलिए वह बाहर आया (जैसे उस दिन रोटी वाली घटना में भी कहा)। तब से दिमाग में यही चल रहा है — जो अंदर है वह बाहर आता है, तो इससे कैसे छूटेंगे?

करो ही मत। कोई इच्छा में वह अंदर था और बाहर आया — कोई आपकी इच्छा है। इससे कैसे मुक्त होंगे? बस इच्छा का त्याग कर दो — क्यों इच्छा बनाकर रखी है? मान की इच्छा, मानवता की इच्छा — मानवता की इच्छा मानवता नहीं है। आप देख नहीं रहे कि आपकी मानवता की वजह से कोई गिर रहा है; यह भी तो देखो — आपकी मानवता से कोई उठे, तब आपकी मानवता है। कोई रो रहा है, आपने उसे पैसे दे दिए कि मेरे अंदर मानवता है, जबकि आपको पता था कि वह शराब के लिए रो रहा है — तो यह मानवता थोड़े ही है, यह कौन सी मानवता है? यह तो बेईमानी है। आपका बेटा रोता तो देते?

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गुरुदेव, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए, और फिर यह भी बोलते हैं कि यहां 200-300 करोड़ का काम होगा, 100 रूम बनेंगे — तो क्या यह चाहने में नहीं आ गया? लोक कल्याण भी तो एक चाहत हुई?

यह चाहने में कैसे आ गया? अपने लिए थोड़े ही मांग कर रहे हैं — विश्व कल्याण के लिए, और देखने के लिए भी नहीं रुकने वाले। इस चाहत में बंधन नहीं है — हो तो ठीक, न हो तो ठीक। चाहत में बंधन नहीं, क्योंकि वह उसके लिए मांग रहा है जिसे वह जानता नहीं। जानने वाले के लिए तो लोग मांगते ही हैं — आप लोग वही कर रहे हो, अपनी पीढ़ी के लिए। जो जिसे जानता नहीं उसके लिए मांग रहा है, वह मांग अलग हो गई। वह उन लोगों की व्यवस्था में पागल की तरह लगा हुआ है जिन्हें वह जानता तक नहीं; मांग ही नहीं रहा, उनके लिए रात-दिन काम कर रहा है। हम अपने परिवार के लिए काम कर रहे हैं; वह बनाकर छोड़कर आगे निकल जाएगा, उसे नहीं पता कौन उपयोग करेगा, कितने लोगों का कल्याण होगा। इस मांग में बंधन नहीं — इच्छा होकर भी इच्छा नहीं है, उम्मीद होकर भी उम्मीद नहीं है। यह जो मांग है, वह सारी संसारी मांगों से अलग करती है। उसके पास जितना है — धन, तन, ज्ञान — लेकर खड़ा है और अपने आप को भी इसी में खत्म कर रहा है। और मांगकर भी लोगों से नहीं मांग रहा; यहां किसी से एक बार भी नहीं कहा कि आप कुछ सहयोग या सहायता दें। ऑनलाइन मैंने इतना ही बोला कि ईमानदारी का हो तो सहयोग देना, बेईमानी का हो तो मत देना, और जांचकर देना — क्योंकि आप काम को दे रहे हो, मुझे नहीं; जांचने के जिम्मेदार आप होंगे, फॉल्ट लग रहा हो तो मत देना। मांगकर भी मांगता नहीं, बोलकर भी बोलता नहीं, कहकर भी कहता नहीं, करके भी करता नहीं। यह मांग बंधन से परे है, लोक कल्याण के लिए है — कौन आने वाला है, मालूम नहीं। बंधन तब होता है जब आपको पता है कि किसके लिए मांग रहे हो — 'मैं मेरे बच्चे के लिए कर रहा हूं', वह बंधन है। जिसे जानता नहीं उसके लिए कर रहा है, वह बंधन हो ही नहीं सकता।

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संजय को भी तो दिव्य दृष्टि दी गई थी और उसने पूरी गीता धृतराष्ट्र को सुनाई — फिर संजय को ज्ञान क्यों नहीं हुआ, केवल अर्जुन को क्यों? (गीता में एक अध्याय 'संजय उवाच' क्यों?)

संजय को युद्ध देखने के लिए दृष्टि दी गई थी। अर्जुन को अलग से दिव्य दृष्टि दी थी; वह दृष्टि संजय को नहीं दी थी — देखने वाला सिर्फ अर्जुन था। अभी भी तो लोग गीता बांचकर बता रहे हैं — क्या उन्होंने यह देखा है, क्या वे उस स्तर पर हैं? पढ़कर बता दे रहे हैं। अगर ऐसा होता तो संजय को भी ज्ञान हो जाता। संजय तो 'कुछ चाहिए' में थे — युद्ध को देखकर बताना है। संजय तीन में खड़े थे; अर्जुन तीसरे से छूटकर दो में आ गए थे — एक कृष्ण और एक अर्जुन। बस परमिशन कृष्ण से लेनी थी, और फैसला सुना दिया था — नहीं करूंगा, बात खत्म; फैसला कृष्ण के बस में नहीं था। जब कोई भी फैसला कर देता है कि कुछ नहीं चाहिए, फिर वह एक हो जाता है। अर्जुन ने कृष्ण से पूछा नहीं, रख दिया। अर्जुन ने वहां अपने अलावा किसी की बात भी नहीं रखी — राम उनके पहले थे, अर्जुन ने राम की बात भी नहीं रखी; दो की बात होगी तभी उपलब्धि होगी। इसलिए मैं कहता हूं, तीसरे को हटा दो। जब अर्जुन लायक हो गए, 'कुछ नहीं चाहिए' में आ गए, तब कृष्ण बताने लगे, और बताते-बताते उस स्थिति में भी जा रहे थे।

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कर्म का राजा आत्मा है या बुद्धि? हम जो भी कर रहे हैं उसके पीछे कौन है?

यहां आप कुछ भी कर रहे हैं, उसके पीछे आत्मा ही है। जैसे मोबाइल में आप कुछ भी कर रहे हैं — वीडियो देखो, कॉल करो — उसके पीछे नंबर है; नंबर को हटा दो तो बात खत्म। सिम सहायक है। सिम को तुम जला सकते हो, नंबर को नहीं; नंबर का कुछ नहीं कर सकते — फिर उसी नंबर का दूसरा सिम आ जाएगा, बस आईडी दिखाना पड़ेगा। वैसे ही आपके कर्म से आपको अगला शरीर मिल जाएगा। सिम में नंबर कहां है, खोज नहीं सकते — ऊपर टाइप भी हो और उसे घिस दो तो भी चलेगा; सिम के टुकड़े कर दो तो भी नंबर नहीं मिलेगा; मोबाइल में डालो तो बस उसकी प्रतिक्रिया दिखती है — प्रतिक्रिया देख सकते हो, उसे नहीं देख सकते। यह स्थूल शरीर मोबाइल है, उसके पीछे सिम — सिम कारण शरीर है, और उस कारण शरीर के पीछे आत्मा। कारण शरीर है तो जीवात्मा है। सात शरीर भी बोलते हो, छोड़ दो; वर्तमान में हम जितना समझ पा रहे हैं — एक कारण शरीर, एक स्थूल शरीर — बस इतना समझो। कारण में जी रहे हो इसलिए सूक्ष्म शरीर भी है; स्वप्न में जब जाता है, जैसे स्वप्नदोष वहां होता है और यहां पता चलता है, आंख खुल जाती है, और आप सोचते हो कुछ देर और रुक गया होता। भोग में लोग घड़ी देखते हैं कि कैसे बढ़ेगा; दवाओं का उपयोग करते हैं, अपने शरीर का शोषण करते हैं। कर्मेंद्रियां सेवा करती हैं — आत्मा का कुछ नहीं किया जा सकता; आप जीवात्मा हो गए हो, अपने लिए उपयोग कर रहे हो, रसपान कर रहे हो। जैसे आत्मा को जलाया नहीं जा सकता, वैसे नंबर का भी कुछ नहीं किया जा सकता — वहां से हटो, छुड़ाओ। जब इच्छा-अपेक्षा है तो अगला शरीर मिलेगा। जैसे आईडी दिखाओगे तो कांटेक्ट नंबर तो नहीं आएंगे, लेकिन बैलेंस आ जाएगा — वैसे ही हमारे शरीर की ताकत, धन और ज्ञान अगले शरीर में मिल जाता है; बैलेंस के लिए रिक्वेस्ट नहीं करनी पड़ेगी, जैसा आपका प्लान है वैसा सामने आ जाएगा। आत्मा का कुछ नहीं कर सकते, वह अपने आप में है। जब कुछ गड़बड़ करोगे, गलत फोन लगा दोगे, तो कहा जाएगा इस नंबर वाले आदमी को पकड़ो — नंबर को कोई दंड नहीं दिया जाएगा। मोबाइल-कंप्यूटर में एरो है — आप खोलते कुछ और हो, चला कुछ और जाता है। तो क्या एरो ने दिखाया? नहीं, आपने देखा; एरो का दोष नहीं, गलत चीज आप स्किप कर सकते हो। एरो न अच्छे में जाता है न बुरे में; और एरो बंद हो जाए तो चल भी नहीं पाएगा। तो मन न अच्छा है न बुरा। मोबाइल में सबकी जगह है, लेकिन एरो की कोई जगह नहीं — कहां से आता है, कहां जाता है, पता नहीं; एरो पर आपका सीधा कंट्रोल नहीं, आप माउस घुमाते हो तो एरो जाता है, वह सहायक है। एरो बंद हो जाए तो कंप्यूटर हैंग; मन रुक जाए तो तुम खत्म। मन शरीर के लिए सहायक है। जैसा वीडियो आप देखते हो, फिर कहोगे इसमें एरो का दोष है — मलाई आप खा रहे हो।

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आपको आत्मज्ञान (उपलब्धि) कब हुआ — क्या उसकी कोई तारीख है? उससे पहले क्या स्थिति थी?

जब मैं सीखने के लिए निकला था तो मैंने कभी भी सिखाने की बात नहीं की। लोगों ने कहा भी कि आपको ज्ञान है — मैं कहता नहीं, ये किसी के शब्द हैं, मैंने किताब पढ़ी है, यह किताबी ज्ञान है, किसी और का है; जब मुझे होगा तब मैं आऊंगा। एक गांव में दिसंबर से 1 जनवरी तक कई दिन रहा, रात एक-दो बजे तक बात होती थी; लोगों ने पहले तय किया कोई चरवाहा है, फिर सुनने लगे तो बोले आपको ज्ञान हो गया है। मैंने कहा नहीं हुआ, लेकिन यह पता है कि होने वाला है, मैं आखिरी में पहुंच गया हूं; और अगर मुझे हुआ तो इस गांव में फिर आऊंगा। कौन सी डेट को हुआ, नहीं पता। जनवरी में कुछ हुआ, क्योंकि खोजते-खोजते खोजने के लिए कुछ नहीं बचा था, वह खत्म हो गया था। मैं ऐसे ही नर्मदा तट पर घूम रहा था, जाने के लिए कोई स्थान नहीं था — कहां जाऊं? 12 ज्योतिर्लिंग, चारधाम, गंगासागर, अनेक शक्तिपीठ, श्मशान, नदियां — जा-जाकर थक गया था। उसी जनवरी 2020 में मेरी आखिरी उम्मीद टूट गई — आत्मज्ञान की भी उम्मीद टूट गई; निराश, हताश, थक गया। एक जन ने कहा था मैं बताऊंगा, उन्हीं के साथ जा रहा था; आगे जाकर उन्होंने मना कर दिया। थक तो पहले भी गया था, लेकिन उनके आश्वासन से एक और उम्मीद बन गई थी कि कोई तो मिला; उन्होंने मना किया तो वह उम्मीद भी टूट गई। मेरी तरफ से फाइनल हो गया। उसके बाद प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए — कब हो गया, मुझे नहीं पता। याद की बात ही नहीं; याद नहीं कहूं तो इसका मतलब कभी पता था — कभी पता नहीं था। और मैंने जब भी पूछा, उसी व्यक्ति से पूछा, कभी तीसरे को नहीं लाया, और लाने भी नहीं देता था — हम तुम हैं, दो बहुत हैं, दो में ही कुछ हो सकता है। लोग कहते थे जन्म-जन्म लगते हैं; मैं कहता, कोई तो जन्म आखिरी होगा — मैंने तय कर लिया यह जन्म आखिरी है, मुझे कुछ मिले या न मिले, चाहे कुछ भी हो जाए; मार्ग हो तो बताओ, नहीं तो आगे निकलूं। आशीर्वाद या श्राप का — मैंने तो इस दुनिया में दुख का चुनाव किया। 2019 तक इस क्षेत्र में घूमा, मेरा न कोई भक्त हुआ न चेला; झोपड़ी से लेकर अरबपति तक आते हैं, मुझे मतलब नहीं तुम कौन हो — इंसान हो, सत्संग की जरूरत है तो आओ। इस दुनिया में मैंने दो को देखा — एक सीखने वाला, एक सिखाने वाला; तीसरे को तो मैंने नहीं देखा।

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आपने कहा 'अंदर था इसलिए बाहर आ गया' — मैं अभी उसी में फंसा हुआ हूं। इससे कैसे निकलूं?

समझ कर निकल जाओ। समझ लोगे तो निकल जाओगे, और निकल लोगे तो समझ जाओगे। इसीलिए कुटिया के बोर्ड पर लिखा है — बेमतलब आना नहीं, मतलब है तो आना नहीं। समझना और निकलना — इसीलिए लिखा गया है। जैसे तुम समझ गए कि यह रिश्ता किसी काम का नहीं, तो तुम वहां रुकोगे नहीं। फिर से बोल रहा हूं, इसे बहुत गहराई से समझना — इस पॉइंट को समझ लो, निकल जाओगे; निकल लोगे तो समझ जाओगे। बिना समझे निकलोगे कैसे, और बिना निकले समझोगे कैसे? तो समझो — समझोगे तभी निकलोगे; इसलिए पूछना तो पड़ेगा।

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(लाइव) गुरु जी, हमारे परिवार में तो कोई नहीं समझता कि आध्यात्मिक क्या होता है।

चलिए, उस परिवार में आप तो समझते हैं। इतना कम है क्या?

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(लाइव) एक कथावाचक कह रहे हैं कि जो कुंभ (भगदड़) में मर गया उसको मोक्ष हो गया। गुरु जी, मोक्ष की परिभाषा बता दीजिए — क्या कुंभ में मरने से मोक्ष होता है?

अगर किसी को पता है कि मोक्ष की प्राप्ति कैसे की जाती है, वह उस विधि को जानता है, तो वह अपने परिवार को भी ले जाए और खुद चला जाए। अगर ऐसा होता है, तो जो लोग ऐसा कह रहे हैं वे अपने परिवार को भी वहां ले जाकर कुदा दें — एक भी बचना नहीं चाहिए, तपस्या करने की जरूरत क्या? जरा उन परिवार वालों से पूछिए — बोलने से पहले उनसे मिलो — कितनों के पति, कितनों के बाप गए, कितनों की जिंदगी नर्क हो गई। एक जन के मरने से कितना परिवार बर्बाद होता है, और आप बड़ी आसानी से लोगों को सांत्वना दे रहे हो कि मोक्ष हो गया। ऐसा न करो। मोक्ष तो 'कुछ नहीं चाहिए' में होगा, इसी पिंड में होगा। जिस स्थिति में कोई भी जाता है, अगला शरीर उसे उसी स्थिति में मिलता है — यह बात समझ लेना। जिसे चाहते हो वह मिलता है।

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गुरु जी, अगर हम अगले महीने आएं और आपसे सत्संग करना हो, तो कैसे मिल सकते हैं?

आ सकते हो। मई के बाद जहां रहेंगे — अगर शरीर रहा — वहां आ जाना। लाइव चलेगा, लाइव में लिख दिया जाएगा कि आज इस गांव में, इस जिले में, इस प्रांत में सत्संग है। उस गांव के आसपास आ जाओगे तो मिल ही जाएगा; एक दिन पहले भी पता लगा तो पहुंच सकते हो। जब तूफान चलेगा तो बहुत दूर से ही पता चल जाएगा कि तूफान जा रहा है।

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(लाइव) गुरु जी, महाकुंभ में जाना चाहिए कि नहीं? इस पर थोड़ा प्रकाश डालें।

यह आपके ऊपर है। अगर वहां ज्ञान हो रहा है और आप ज्ञान के लिए, सत्संग के लिए जा रहे हो, तो जा सकते हो — ज्ञान मिल रहा हो, तभी।

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(लाइव) गुरु जी, यह मार्ग तो बहुत पीड़ादायक है, सबकी हिम्मत नहीं होती इस पर चलने की। मैं भी सत्य को खोजना चाहता हूं, लेकिन जब मैं अध्यात्म की बात करता हूं तो पूरा परिवार और समाज मेरे विरुद्ध खड़ा हो जाता है।

मेरी समझ से संसार में सबसे पीड़ादायक अगर कुछ है तो बेईमानी का मार्ग है, और सबसे सुकून देता है ईमानदारी का मार्ग — क्योंकि उसमें जहां भी होते हो, तुम होते हो; और बेईमानी में तुम हिमालय में भी चले जाओ, तुम्हारे साथ भीड़ है। जितनी भी घुटन, अशांति, तकलीफ है, बेईमानी में है। यह मार्ग तो एकदम फूलों की सेज है। ओंकारेश्वर में एक व्यक्ति जनवरी के महीने में शाम को नहाकर शिवलिंग के सामने कांप भी रहा है, सो भी रहा है, देखते-देखते सो जा रहा है, जग जा रहा है, रात बीत जा रही है ठंड में। उस व्यक्ति की योग्यता भी है कि वह चद्दर-कंबल खरीद सकता है, लेकिन उसे कांपना देखना है — कांप कौन रहा है। इस एरिया में जब मैं घूम रहा था तो ठंड में ही पड़ा रहता था, काया को जान रहा था, रात भर कई जगह बदलता था। 2019 से नर्मदा तट पर हूं; उसके पहले भारत, नेपाल, कश्मीर भ्रमण कर रहा था। मैंने देखा कि जहां अपने आप में कुछ सुकून है — कुछ तो है आप में, लेकिन वह 'है' को छोड़कर पता चलेगा। तो यह मार्ग — इसके सामने फूलों की सेज भी कम है, यह मेरा अनुभव है। मैंने अपना एक वीडियो देखा — अमरकंटक में एक व्यक्ति खड़ा है, जेब में हाथ डाले, शौचालय के सामने, चिथड़े वस्त्र — उसे कुछ नहीं चाहिए। आज के समय में भिखारी भी वैसे कपड़े नहीं पहनेगा, और वह अपने आप में खुश है — यह कोई मामूली बात है? दो मिनट के वीडियो में उस व्यक्ति ने सब कुछ कह दिया। इस मार्ग की तुलना मैं संसार में किसी से कर नहीं सकता — ऐसी कोई वस्तु ही नहीं जिससे तुलना करूं।

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प्याज-लहसुन के बारे में क्या है? (दो-तीन वीडियो में आपको इसके बारे में बोलते सुना पर मिला नहीं।) जैन लोग और कई परंपराएं इसे तामसिक या राक्षसों का मल कहकर नहीं खातीं — क्या इसे खाना चाहिए?

प्याज-लहसुन सात्विक भोजन है। जैसे आलू पैदा होता है, जैसे मूंगफली का दाना, जैसे चुकंदर, मूली, गाजर, अदरक — वैसे ही प्याज-लहसुन पैदा होता है। लहसुन संबंध करके तो पैदा नहीं करता; जैसे आप मूंगफली बो देते हो, वैसे ही लहसुन का एक दाना बोते हो और लहसुन निकलता है; आलू को काटकर बोते हो, वैसे ही। तो इसमें क्या है? कर्म से आप तामसी, राजसी, सात्विक बन सकते हो, खाने-पीने से नहीं। शेर भी खाता है, तो वह कैसे तामसी? खान-पान का ध्यान रखना — ईमानदारी का भोजन हो, बस। बेईमानी का भोजन है तो आप तामसी बन जाओगे। और हमें उन जीवों को नहीं खाना चाहिए जो संबंध करके बच्चों को जन्म देते हैं — वहां हत्या है; उसमें काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह सब रहता है। जिसमें काम भाव है वह नहीं खाना चाहिए; जिसमें काम भाव नहीं है, वह खा सकते हो — वही मानव के लिए बना है। एक पेड़ इधर है, एक उधर — क्या वह एक-दूसरे से संबंध करके फल देता है? लोग बोलते हैं यह राक्षसों का मल है। ठीक है भाई, अगर ऐसा है तो यह भी बता दो कि काजू, बादाम, किशमिश, छुहारा, मुनक्का, गन्ना, मूली, गाजर, मूंगफली — जो व्रत में खाते हो — ये किस देवता का मल हैं? उस देवता को कम से कम धन्यवाद तो दो। हम तो कुछ भी खाएं, एक ही कलर का निकलता है; उसने काजू इतना सफेद कैसे किया, चुकंदर लाल कैसे किया? परंपरा को पकड़ लेते हैं। अगर पकड़े होते तो मुझसे नहीं पूछते — कहीं न कहीं पकड़कर भी नहीं पकड़े थे। खाते हो और घुटन होती है? समझ लो, यह सब खाने के लिए बने हैं। नियमों में भी राग-द्वेष उठ रहा है। अगर नियम थोपा हुआ है तो; अगर समझकर नियम अपना रहे हो तो नहीं। कौन सा नियम सही है, कौन सा गलत — वह आपको देखना पड़ेगा, जांचना पड़ेगा, समझदारी आप में होनी चाहिए। (एक साधक ने बताया कि तीन महीने प्याज-लहसुन और तेज मसाले छोड़कर दाल-सब्जी का असली स्वाद आने लगा और पैकेट फूड छूट गया।) आपकी मानसिकता बता रहा हूं — घर में बोलोगे मैं बासी नहीं खाऊंगा, लेकिन बाजार का महीनों पहले बना, एक्सपायरी डेट वाला बिस्किट-नमकीन खाते हो, उसे सड़ा हुआ नहीं कहते। मैं तो तीन-चार दिन तक सब्जी गर्म करके खाता रहता हूं।

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(उसी प्रसंग में) यहां आपके हाथ का काढ़ा भी पिया, सब्जी भी खाई — आपका यहां भाव क्या है?

बस ऐसे ही — प्यार है, मोहब्बत है, यहां और कुछ नहीं है। मेरा तो भाव बस इतना है — जब से मैं समझने लायक हुआ, बस इसमें जिया। प्यार से इतना प्यार कर लो कि किसी और से प्यार करने के लायक न रहो। हमारे पास वही तो है — एक प्यार, और कुछ भी नहीं।

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(लाइव) गुरु जी, क्या प्रेत योनि भी है? इसके बारे में थोड़ा विस्तार से बताइए।

यह तो प्रेत बताएगा। हमसे क्या फर्क पड़ता है — दुनिया है, सबका रहने का अधिकार है, रहने दो।

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(लाइव) खोजी कैसे बनें? क्या चाहिए?

देख लो — 'चाहिए' में खोजी है, 'कुछ नहीं चाहिए' में खत्म। कहे कबीर — यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान; शीश दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान। अगर सर काटने के बाद भी सद्गुरु पुरुष मिले, तो भी यह सौदा बहुत सस्ता है।

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(लाइव) गुरुदेव, मैंने आत्मज्ञान की स्थिति को आज ऐसे समझा — जैसे कोई व्यक्ति बहुत समय से किसी नशे का आदी हो, और जब वह छोड़ देता है तो फिर उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता। क्या यह सत्य है, या इससे भी अधिक कुछ है?

आत्मज्ञान को 'कुछ चाहिए' में नहीं समझा जा सकता। जैसे एक कुंवारी लड़की मां बनने के बारे में कितना भी पढ़ ले, डॉक्टर हो जाए, लेकिन वह ममत्व को — कितना भी बोले — उसे एक अधूरापन रहेगा; वह मां बनने के बाद ही उस फीलिंग को जानेगी।

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(लाइव) हर पल, हर क्षण यही माहौल चाहिए — इसके लिए क्या करें? कृपया बताइए।

कुछ नहीं।

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एक धारणा है जिसका आप जवाब दें — सद्गुरु या गुरु कर लिया तो हमारी पाप की गठरी सब सद्गुरु धो देगा, उठा लेगा। क्या यह समझ सही है?

नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं। आपके कर्मों का परिणाम आपको ही भोगना पड़ेगा, और कोई नहीं। जैसे राम का जन्म दशरथ से हुआ; दशरथ ने बाण मारा, श्रवण मर गए, उनके पिता ने श्राप दिया कि जैसे मैं पुत्र के वियोग में मर रहा हूं वैसे तुम भी मरोगे — राम अपने पिता को नहीं बचा पाए, पुत्र वियोग में ही प्राण गए। कृष्ण भगवान के सामने अभिमन्यु मारा गया, उनका भांजा था, कुछ नहीं कर पाए। अपने कर्मों का हिसाब-किताब आपको ही करना पड़ेगा; कोई कुछ नहीं कर सकता। सद्गुरु बस धोने का तरीका बता सकता है, धो नहीं सकता; और आगे होने वाले पाप कर्म बंद हो सकते हैं। धोने का तरीका क्या है? ईमानदारी, सत्कर्म — बस यही मेन है, और सबसे तेज यही है, क्योंकि जरूरतमंद अंतरात्मा से आपको आशीर्वाद देता है। जब किसी की जरूरत पर आप काम आते हो, आप उसके लिए भगवान होते हो। अगर ईमानदारी-सत्कर्म जीवन में अपना लिए तो पहुंच भी सकते हो — आगे का बनेगा नहीं, पिछला खत्म होगा। पापी भी कहीं न कहीं सत्कर्म कर ही देता है — कितना भी दुष्ट हो, कोई पता पूछे तो बता ही देता है।

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(लाइव) गुरु जी, आज घर पर दो जने भंडारे के लिए चंदा मांगने आए; घरवाली ने कहा हम चंदा नहीं देते, तुम झूठ बोलकर लेते हो, पता नहीं कहां लगा देते हो। फिर उन्होंने 20 रुपए दे दिए, मगर गुस्से के भाव में। मैंने कहा — या तो खुश होकर दिया करो या मना कर दिया करो। क्या यह गलत है?

अच्छा है भाई। डटे रहो, डटे रहो, अपना भाव मत छोड़ो। अच्छा, कम से कम बीवी मालकिन है, दे तो रही है।

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(लाइव) आपने कहा प्रकृति आपकी हर बात समझती-सुनती है (जैसे चिड़िया बनने की इच्छा)। तो जो पूरा ईमानदार नहीं है, अभी भी अपने जाल में व्यस्त है और कई इच्छाएं व्यक्त कर रहा है — क्या प्रकृति उसकी इच्छाओं को भी मान्यता देगी?

आप अच्छे हो या बुरे, प्रकृति को इससे मतलब नहीं है। प्रकृति का काम है तुम्हें देना, बस बात खत्म — वह ईमानदार है या बेईमान, उससे कोई मतलब नहीं। आप उस लायक हो गए, लो — योग्य होना है; योग्य होगे तभी मिलेगा। जैसे फूल वाले का काम है फूल बेच देना — पैसा दे दिया, फिर आप फूल चाहे मय्यत पर ले जाओ, चाहे भगवान के चरणों में, चाहे प्रेमी-प्रेमिका को दो, चाहे गटर में फेंक दो — उसे कोई मतलब नहीं। फूल प्रकृति से आया, प्रकृति में मिल जाएगा। बीच में हमने फालतू अपना भाव डाला — तुम अच्छे-बुरे में फंसे हो; प्रकृति के लिए न अच्छा है न बुरा। तुम लायक हुए, तुम्हें दे दिया। जैसे तुम्हारी योग्यता देखकर गवर्नमेंट ने बंदूक दे दी; आपने गलत उपयोग किया तो छीन ली जाएगी — पावर का मिसयूज करते हो तो छीन लिया जाता है। प्रकृति ऐसे ही काम करती है। योग्यता से ज्यादा जब भी इतिहास में किसी को कुछ मिला है, उसने अपने आप को बर्बाद किया है। योग्यता नहीं और आपको ऑफिसर बना दिया, तलवार-बंदूक दे दी, चलाना नहीं आता और युद्ध के मैदान में कूद गए — फिर क्या होगा? सामने वाला यह थोड़े पूछेगा कि तुम्हें चलाना आता है कि नहीं। इसलिए भैया, योग्यता से ज्यादा जब भी मिले तो ना कह दो — हमें नहीं चाहिए, बर्बाद हो जाएंगे; जरूरत भी देख लो। हमें लोग कपड़े देते हैं, मैं कहता हूं — बाबा, हम नए कपड़े संभाल नहीं पाएंगे, रखो अपने पास, हम इसी के लायक हैं। पहले जब घूमता था तो लोग पैसे देते थे कि धर्म पर खर्च करना — मैंने कहा ना बाबा, हमसे नहीं होगा; पहले भूख मुझे लगी तो मैं खाऊंगा कि किसी और को खिलाऊंगा? मैं तो खोज में निकला हूं, भूखा थोड़े ढूंढ रहा हूं; मुझे जितना चाहिए मिल जाता है, आप धर्म में खर्च कर देना। मैं सब खा गया, तभी यहां पहुंचा — मेरे पास कुछ होता तो मैं यहां थोड़े होता। तभी लोगों ने मुझे छोड़ दिया — मुझे किसी को छोड़ना नहीं पड़ा; जिसके पास कुछ नहीं, उसे कौन पूछेगा? काम के रहोगे तब तक पूछेंगे। लेकिन आप अपने आप से बहुत प्रामाणिक, ईमानदार रहो — यह ढूंढना है।

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परिवार कहता है — हमने तुम्हारे लिए किया, तुमने माल खाया है तो भरपाई करो। इस हिसाब का क्या करें? भरपाई करने का सही तरीका क्या है?

मैंने किसी को नहीं छोड़ा, लोगों ने मुझे छोड़ दिया, क्योंकि मैं अपनी खोज में निकल गया। हमने माल नहीं खाया, विवाह नहीं किया; तुमने माल खाया है, मलाई खाई है — सब जगह से माल खाया है, तो उसको चुकाना भी तो पड़ेगा; उन्हें भी परावर्तित करो, आध्यात्मिक बनाओ। जब तक कुछ करने लायक हो, वे भरपाई की इच्छा रखेंगे; जब देखेंगे कि अभी रखने के लायक भी नहीं है, तो खुद छोड़ देंगे। अभी तुम उन्हें लायक लग रहे हो, इसलिए तुमसे वसूलेंगे। जैसे नोटबंदी में — जब तक नोट चल रहा था, लक्ष्मी थी, माथे से लगाते थे; जैसे ही बंद हुआ, लोगों ने फेंकना चालू किया। काम के नहीं रहोगे तो तुम्हें फेंक दिया जाएगा; लोग तभी तक आशा रखते हैं जब तक आप काम के दिख रहे हो। जो हिसाब बताया जाता है कि हमने तुम्हारे लिए किया — तो किया है तो भरो, खाया है तो भरो। हमें बताया जाता था तो हम बोल देते थे — तुम्हारे मां-बाप ने नहीं किया था क्या? तुम्हारे लिए भी तो किसी ने किया था; तुमने किया तो कौन सा नया काम किया? ठीक है, हमसे क्या चाहिए, बोलो — आपको सेवा चाहिए, बताओ; लेकिन यह मत कहो कि हम तुम्हारे लिए... हमें पीढ़ी नहीं बढ़ानी — इतनी बहुएं, इतने नाती-पोते कम हैं क्या? हम वंश नहीं बढ़ाएंगे, सीधी सी बात। आपने किया, ठीक है; आपको क्या चाहिए बोलो, मैं आपके लिए करूंगा। इन सब में हम बेईमानी नहीं करेंगे — आप स्पष्ट बोलो।

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गुरु जी, जरूरत में शादी भी की, बच्चे भी पैदा किए, लेकिन अब सत्कर्म और ईमान के मार्ग पर चल रहे हैं। हम सबको साथ लेकर चलने की पूरी भावना रखते हैं, लेकिन सामने वाला चलने को ही तैयार नहीं — वह कहता है हम तो लिप्त हैं। तब क्या करें?

कोई बात नहीं, आप तो चलो — बस खत्म। आते रहो, जाते रहो, ऐसे ही।

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गुरुदेव, मां-बाप की करोड़ों की स्टेट बच्चों को मिलती है — उसका क्या? और समझ तो अभी आई है, बदलाव अभी कर रहे हैं, पर परिवार ने पहले के हिसाब से इच्छाएं पाल ली हैं और कहते हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता — तो क्या करें?

अगर योग्यता से ज्यादा हो गई तो पतन कर देगा, गंवा देगा; अगर योग्यता में रहा, संभालने की योग्यता रही, तो संभाल लेगा, नहीं तो पतन कर देगा। वे कहेंगे — पहले तो तुम ऐसे नहीं थे; ऐसा ही था तो पहले बता देते। ठीक है, आप पहले नहीं बता पाए, अब तो बता रहे हो। वे बोलेंगे अब हमने तो उस हिसाब से इच्छा पाल ली थी — कोई बात नहीं, तो जरूरत में देना चालू करो, सिर्फ जरूरत में। वे कहें ऐसा तो हो ही नहीं सकता, तो ऐसा भी नहीं हो सकता — जाओ। जवानी में शादी के समय प्रॉमिस बहुत दिए जाते हैं, लेकिन सभी को थोड़े ही पालना होता है। मैं ऐसा हूं, और मैं इतना कर सकता हूं — सीधी, साफ-सुथरी बात। आज तक मैंने अपने जीवन में कभी किसी को रोका नहीं; समय ने मिलाया, कुछ लेनदेन था, हिसाब हुआ, जाओ। मेरे पास यह है — पसंद है तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं; आपको यह दे सकता हूं, चाहिए तो ठीक, नहीं तो जाओ। हम आपके लिए बेईमानी क्यों करें? नहीं करेंगे। तुम मेरे साथ रहो चाहे छोड़ो, लेकिन मैं अपने आप को नहीं छोड़ूंगा; मेरे साथ रहना है तो मैं ईमानदारी में रहूंगा। जरूरत में जियो। तुम्हारी जरूरत है भोजन, कपड़ा, मकान — उससे ज्यादा सोसाइटी मेंटेन नहीं करूंगा। हमारी कमाई इतनी है तो हम उसी में, झोपड़ी में चलकर रहेंगे; चलना है तो चलो, नहीं तो ठीक है। उन्होंने भी तो प्रॉमिस दिया था कि तुम जहां चलोगे वे तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगी — वह भी तो याद दिलाओ; सात वचन अकेले तुमने ही थोड़े लिए थे, सात जन्म का ठेका उनका भी था।

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अगर मैं अपने दोस्तों-रिश्तेदारों में किसी की मदद करता हूं जिसे उसके कर्म की वजह से तकलीफ हो रही है, तो कर्म तो उसे सजा देता रहेगा — क्या कर्म मेरी तरफ भी देखेगा कि मैं (उसकी सजा में दखल देकर) गलत कर रहा हूं?

तुम्हारी ताकत कितनी है उसको सपोर्ट करने की? उसके कर्म की वजह से ही आप मदद करने के लिए मिले हो — इसमें भी उसका कर्म है। कर्म में इतना भी लिखा है कि आप उसकी मदद करो; यह भी लिखा है। आप तो सिर्फ निमित्त बने। यहां कोई करने वाला नहीं है, सब जरूरत करवा रही है; करना ही तो भ्रम है।

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आपने कहा लेनदेन का हिसाब खत्म होगा तभी मोक्ष होगा। तो अगर ज्यादा पुण्य कर लिए तो भी पार नहीं हो पाएंगे? यह कम-ज्यादा मैं कैसे समझूं?

हां, यह भी बात है — उसका भी भोगना पड़ेगा, उसको भोगने के लिए आना पड़ेगा। लेकिन आत्मज्ञान उसके पहले हो जाएगा, मोक्ष के पहले; वह आप कभी भी कर सकते हो। तो जरूरतमंद के लिए करो, बस। ज्यादा मत करो — मान के लिए मत करो, सम्मान के लिए मत करो, जिनको जरूरत नहीं उनके लिए मत करो।

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(लाइव) क्या मंदिर जाना, घर पर पूजा करना या हनुमान चालीसा पढ़ना — ये सब कर्म करने से जीवन में कुछ घटित होगा?

हां, कुछ तो होगा, या तो कुछ नहीं होगा।

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(लाइव) क्या गंगा आदि नदियों में स्नान करने से पूर्व में किए हुए पाप-दुष्कर्म नष्ट होते हैं? स्नान के लिए इतनी भीड़ होती है। अगर ऐसा होता तो भीष्म पितामह को इतने जन्मों का पाप क्यों भोगना पड़ा — वे तो गंगा पुत्र थे, उनका पाप क्यों नहीं धुला?

गंगा, नर्मदा मां हैं — इनसे हमें सीखना है। यह जहां से निकली हैं, अनेकों को लेते हुए गंगासागर, समुद्र में मिल गई हैं। इसे ध्यान से समझना — इनमें या तो गटर मिला या कोई नदियां मिलीं, सबको एक जैसा दर्जा देकर, पवित्र करते हुए निकल गईं। ऐसे ही हमारी जिंदगी में कोई अच्छा मिले चाहे बुरा मिले, मुझे दोनों में नहीं जाना है, मुझे अपना काम करते हुए निकल जाना है। यह है गंगा, यमुना या नर्मदा नहाने का मतलब — कि मुझे न अच्छे में जाना, न बुरे में जाना; मुझे काम को काम के तरीके से करके, अपने आप में रहते हुए निकल लेना है। यह बिल्कुल ईमानदारी से सीखना। अगर आप अच्छे या बुरे में नहीं गए तो आप ईमानदार हो ही। जिंदगी मिली है जीने के लिए, आप क्यों अच्छे-बुरे में जाते हो?

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गुरु जी, इसमें नियम बीच में आ रहे हैं — जो नियम हम पर थोपे गए, बांध दिए गए थे, उनका क्या करें? और पाप-पुण्य से कैसे निकलें?

अरे भाई, नियम बोलना तुम्हारी स्वतंत्रता है, नहीं लेना मेरी — नहीं लूंगा, क्या करोगे? मैं नियम के परे हूं। नियम किसके लिए है — मेरे लिए ना? मैं वही नहीं हूं। जब मैं हूं ही नहीं तो नियम कैसे पालन करूं? पाप-पुण्य लगेगा — जब मैं हूं ही नहीं तो किसको पाप-पुण्य लगेगा? वह तो नियम लेने वाले को लगेगा। पाप-पुण्य कब चालू हुआ, उससे मुझे मतलब नहीं; मैं इसमें हूं, इससे मतलब है — इससे निकल जाऊं। जानकर क्या करोगे? पीछे जाओ ही मत — पीछे तुम जीकर आ रहे हो; क्या दोबारा जीना है? समय बर्बाद मत करो, निकल लो। पाप-पुण्य से निकलें कैसे? 'कुछ न करने' में आ जाओ, बस खत्म। करने वाले को पाप-पुण्य लगता है। जरूरतमंद की सेवा करो, ईमानदारी-सत्कर्म करो, निकल लो — न पाप, न पुण्य; न इच्छा, न अपेक्षा, न राग, न द्वेष, न मोह, न आसक्ति। अब तुम्हारे अंदर जो था, उससे कैसे छूटेंगे? इस मार्ग में जा रहे हो, पता चलेगा तुम्हारे अंदर क्या-क्या है, किसमें फंसते हो — लोग आश्वासन देंगे तब पता चल जाएगा। छूटेंगे कैसे? छोड़ने से — जैसे पकड़ा, वैसे छोड़ो। पकड़ रखा है और पूछते हो छूटूं कैसे? मैं कहूंगा बेटा, याद करो पकड़ा कैसे था — जैसे पकड़ा, वैसे छूटेगा।

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(लाइव) आप तीन-चार घंटों तक कैसे बैठ सकते हो, शरीर कैसे साथ देता है? मेरा शरीर 30-40 मिनट स्थिर बैठने पर ही जवाब देने लगता है, एक-एक अंग दुखने लगता है। कोई उपाय बताइए।

इसलिए कि मैं आपके लिए बैठा हूं। अगर अपने लिए बैठा होता तो मैं भी थक जाता — इतनी देर बैठता भी नहीं, निकल जाता।

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(लाइव) गुरुदेव, कोई रास्ता बताइए आत्मज्ञान का — क्या आत्मज्ञान का कोई तरीका है?

नहीं है। उम्मीद छोड़ दो।

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(लाइव) ध्यान में सूक्ष्म शरीर का पता चलता है, यह पता चला कि मैं शरीर नहीं हूं। अब आत्म साक्षात्कार के लिए क्या करूं, गुरु जी?

उम्मीद छोड़ दो।

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(लाइव) सत्कर्म से आत्मज्ञान कैसे पॉसिबल है?

इसलिए पॉसिबल है — समझिए। सर्वप्रथम ईमानदारी, उसके बाद सत्कर्म। जैसे आपने ईमानदारी पकड़ी, तो बंधन बंधना बंद हो गया। अब जितना आपने किया है, वह किसी और के साथ ही किया है — किसी जीव, किसी व्यक्ति के साथ; कहीं न कहीं उसे सताया है, तभी तो बंधन बंधा। अब सत्कर्म किसके साथ करोगे? जरूरतमंद के साथ — पता नहीं कौन मिलेगा। तो उसकी अंतरात्मा से आपके लिए आशीर्वाद निकलता है, तो पिछला बहुत तेजी से खत्म होता है। इसलिए सर्वप्रथम ईमानदारी, उसके बाद सत्कर्म — सबसे तेज है। सोचो जरा, आपको आशीर्वाद कौन दे रहा है? उस समय जरूरतमंद व्यक्ति कामनाओं में नहीं रहता, इच्छा-अपेक्षा से परे रहता है, अपने आप में होकर आपको आशीर्वाद दे रहा है। उस समय के लिए आप उसके लिए भगवान हो, और वह अंतरात्मा से आपको आशीर्वाद दे रहा है। भगवान को आशीर्वाद देने वाला कौन है? परमात्मा। इसीलिए मेरा कहना है कि ईमानदारी-सत्कर्म सबसे तेज है — कोई साधना करो चाहे न करो, सीधा परमात्मा आपको आशीर्वाद दे रहा है। सत्कर्म फल की तरह होता है और सेवा बीज की तरह। फल को आप खा भी सकते हो, लगा भी सकते हो, अनेक लोग सालों-साल खाएंगे; अनाज को या तो खा सकते हो या लगा सकते हो, दोनों नहीं। तुमने अगर सत्कर्म कर दिया तो आने वाली पीढ़ी भी उसका उपयोग करती है — इसका बंधन ही नहीं है। (एक साधक ने कोरोना में रोज भोजन बांटने का अनुभव बताया — जिस दिन नहीं गए, जरूरतमंद राह देख रहा था।) ईमानदारी — सीधा परमात्मा आपको आशीर्वाद दे रहा है। जरूरतमंद तक लेकर जाओ — इतनी तो समझ है। अब कौन सी साधना करोगे? इसीलिए मेरा कहना है — ईमानदारी, सत्कर्म।

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पुण्य क्या है और पुण्य किस हिसाब से करना चाहिए? क्या पुण्य करने से भी बंधन में बंधते हैं?

बंधन में नहीं बंधते, लेकिन पुण्य से आपको वैभव मिलता है — उसका आप किस तरीके से उपयोग करते हैं। बंधन तो समाज में अगर कुछ है तो दुष्कर्म है। दुष्कर्म करने से अच्छा है सेवा करो; फिर सेवा सत्कर्म तक लेकर जाएगी, ईमानदारी तक लेकर जाएगी — शुरुआत करो। स्वतंत्रता स्वाभाविक है, ऐसे ही ईमानदारी भी स्वाभाविक है, सहज है। और ईमानदारी भी तब तक है जब तक आपको कुछ चाहिए; कुछ नहीं चाहिए तो ईमानदारी भी गई।

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(लाइव) अभी आपने कहा कि अच्छे कर्मों का फल भी भोगने आना पड़ेगा, मगर उसके पहले आत्मज्ञान हो जाएगा। तो क्या आत्मज्ञान के बाद भी फिर जन्म लेकर भोगना पड़ेगा? कृपया समझा दीजिए।

अगर लेनदेन नहीं खत्म हुआ तो हो सकता है। जैसे अष्टावक्र को गर्भ में ही ज्ञान था, तो उनका लास्ट लेनदेन वहीं मिट गया — पिताजी ने लात मारी, उन्होंने श्राप दिया।

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गुरु जी, क्या हमारे लड़के (संतान) भी हमारे कर्म के फल हैं?

सबका एक-दूसरे से लेना-देना है। उनका कुछ निपटाना बाकी था, इसलिए वे आपके पास आए — लेनदेन बाकी था। हम यहां बैठे हैं, तो यह भी सब लेनदेन कर रहे हैं। हम आपको कब से कह रहे हैं — निकल लो; लेकिन क्या करें, तुम निकल नहीं रहे हो। हम काम कर रहे हैं निकालने का, तुम काम कर रहे हो फंसने का। हमारा काम है तुम्हें निकालना — हमें निकालने के लिए भेजा गया — अब तुम ही निकलने के लिए तैयार नहीं होते। आप कहते हो अब तो मिले — ठीक है भैया, आगे न मिलना, अब निकल लो। बात करते हो निकलने की और फिर कहते हो मुझे वापस वहां जाना है।

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(लाइव) क्या गुरु के शरीर त्यागने के बाद भी गुरु के वचनों पर चलने से नया साधक आत्मज्ञान को प्राप्त हो सकता है?

आखिरी गुरु प्रकृति होती है। अगर आप खोजी हो तो कभी न कभी उपलब्धि हो जाएगी। कैसे उपलब्धि होती है, यह कोई बता नहीं सकता। अगर कोई कहे कि इनके द्वारा उनको उपलब्धि हुई — उसी समय अनेक शिष्य थे, सभी शिष्यों को क्यों नहीं हुई? यह एक रहस्य है — तुम्हारे कर्मों के ऊपर निर्भर।

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(लाइव) आज का नजारा इतना भव्य है, ऐसा तो महाकुंभ में भी नहीं होगा। कुंभ मेले का असली मतलब क्या है?

मिल जाते हैं, जब आप देने लायक हो जाते हो। कुंभ मेला का मतलब था आदान-प्रदान — ज्ञान का आदान-प्रदान, जो जन्म-मरण से मुक्त करा दे। कहा गया है कि वहां अमृत की वर्षा हुई — चारों जगह जहां कुंभ लगता है, एक-एक बूंद एक-एक जगह गिरी। तो वह अमृत क्या है? ज्ञान, बस। कुंभ जाने का मतलब तब है।

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(लाइव) बाबा जी, टूट चुका हूं, कोई सहारा नहीं मिल पा रहा है।

कोई बात नहीं, आप सहारा बन जाओ।

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(लाइव) गुरुदेव, क्या आत्मज्ञान के आगे भी कुछ है?

आत्मज्ञान के ही आगे ही कुछ है — वहां से रास्ता चालू है।

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(लाइव) जब इंसान के अंदर कोई क्वेश्चन न रहे, तो हम अपने आप को क्या समझें?

कुछ भी समझ सकते हैं। समझने के लिए तो क्वेश्चन है — आप अपने आप को कुछ समझना चाहते हो, इसका मतलब क्वेश्चन अभी है। 'अपने आप को क्या समझें' — इसका मतलब अभी प्रश्न है।

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गुरु जी, दो-तीन महीने साधना से लग रहा है कि मैं काम-क्रोध से दूर जा रहा हूं; अकेले में लगता है मैं कंट्रोल कर सकता हूं, लेकिन जैसे ही उस परिस्थिति के बीच आते हैं, कंट्रोल नहीं रहता, हम उसके वश में चले जाते हैं — अपने आप कुछ घटित हो जाता है। उस समय क्या करें? मन (माइंड) को कैसे कंट्रोल करें, और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से कैसे छूटें?

बंद कमरे में मुझे लगता है कि मैं मौन हूं — यह तो भीड़ में पता चलेगा कि तुम मौन हो या नहीं। जब सामने एहसास करने के लिए कुछ है ही नहीं, तो कंट्रोल तो है ही; पता तो तब चले जब तुम्हारे सामने भोजन आ जाए, तब पता चले तुम्हारा कंट्रोल क्या है। शरीर की जरूरत पर कंट्रोल करके क्या करोगे? आप इस एक बाल पर कंट्रोल करो कि हिले ना — कर सकते हो? प्राकृतिक हिल रहा है, हिलने दो; आपको क्या करना है, वह देखो। बाल हिल रहा है, तुम तो नहीं हिल रहे हो ना। माइंड के पीछे कोई है; माइंड तो जानकारी का आदान-प्रदान करता है। इस आंख के पीछे कोई देखने वाला है — इस आंख को बंद करने से देखने का भाव खत्म नहीं होगा। आंख के पीछे कौन है, उसे समझने का प्रयास करो — वह क्या देखना चाहता है, देखकर क्या करेगा। समझो, कंट्रोल आप कुछ नहीं कर सकते, कंट्रोल छोड़ दो; आपके हाथ में कुछ नहीं है, आपका हाथ भी नहीं है। कंट्रोल का भ्रम है — काहे को कंट्रोल कर रहे हो, काहे को अपने आप को अशांत कर रहे हो, उलझा रहे हो? कंट्रोल छोड़ दो, ईमानदारी से जिंदगी को जियो — है तो उपयोग करो, नहीं तो छोड़ दो। काम एक ऐसा शब्द है जिसमें कर्म से लेकर काम भाव तक सब आता है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से कैसे छूटो, वह मैं बता रहा हूं। काम में आपका कर्म आ गया — क्योंकि 'चाहिए' में कर रहे हो; काम भाव भी आया — शरीर को जरूरत है, ठीक है। कोई भी काम करके समय का इंतजार करो, समय से मिल जाएगा। आप जल्दबाजी करते हो — जल्दबाजी में जब परिणाम अपने तरीके से चाहते हो, तो उसमें बेईमानी करनी पड़ती है। काम करो, इंतजार करो, तब काम आपको पीड़ा नहीं देगा। क्रोध तब आता है जब सामने वाला मेरे तरीके से नहीं करता। देख लीजिए उसकी स्थिति-परिस्थिति क्या है — सबकी शरीर की क्षमता, ज्ञान की क्षमता, धन की क्षमता अलग-अलग है। आपने उससे क्या मांग किया है — वह जानकर कर रहा है या उसकी स्थिति ऐसी है? जांच लोगे तो क्रोध नहीं आएगा; या तो आप खुद कर लो। मद से अहंकार आता है। मद किसका होता है — एक रूप का, एक मेरे लोगों का, वैभव का। उसको क्या करो — सत्कर्म में लगा दो, जरूरतमंद में लगा दो। जब भी किसी को नीचा दिखाने के लिए, बड़ा बनने के लिए भाव करते हो, तब यह अहम भाव आता है और आपको गिराकर जाता है। मद, अहंकार, अहम भाव — सब एक ही है। लोभ कब होता है? आप अपनी गाड़ी से फर्स्ट क्लास जा रहे थे, कोई तकलीफ नहीं, एकदम मस्त; लेकिन आपके आगे आपसे बड़ी एक गाड़ी गई, फिर लोभ आ जाएगा — और जब तक आपसे छोटी गाड़ियां जा रही थीं, तब तक तकलीफ नहीं हुई। एक काम करो भाई — देख लो आपकी योग्यता है या नहीं; है तो लाओ, नहीं है तो छोड़ दो। मोह किससे होता है? जिससे मुझे मेरे तरीके से मिलता है, उससे मुझे मोह होता है। तो लेने का भाव छोड़कर देने का भाव करो, बस।

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जब सब तुम में ही है तो क्या चाहिए? अगर मैं सीधा अपने आप में आ सकता हूं तो इतनी विधियां क्यों? और एक व्यक्ति रोज दो घंटे ध्यान-पूजा-पाठ करता है, दूसरा ईमानदारी से कर्म करते हुए वे दो घंटे जरूरतमंद की सेवा में लगाता है — दोनों ईमानदार हैं, तो पहले कौन पहुंचेगा?

कुछ नहीं चाहिए। अगर मैं सीधा अपने आप में हो सकता हूं, यह मेरी क्षमता है, तो मुझे विधियों की जरूरत नहीं है — यह आपको देखना है। आना तो आपको यहीं है; विधियां भी छूटेंगी। मैं आपको कह रहा हूं, आप यह ध्यान कर रहे हो, यह भी छूटेगा, तभी उपलब्धि होगी — चाहे ध्यान हो, चाहे भक्ति, चाहे योग, चाहे ज्ञान — ये सब छूटेगा तभी उपलब्धि होगी। और आना यही है — ईमानदारी-सत्कर्म में आखिर में पकता है। तो सीधा पक जाओ, धीरे-धीरे क्यों? अगर हमें सीधा पकने का उपाय मिल गया है तो हम सीधा क्यों न पक जाएं? मान लीजिए कहीं जाना है — वहां पैदल भी जा सकते हैं, टैक्सी से भी, खुद की गाड़ी से भी, फ्लाइट से भी, और मैं सामर्थ्यवान हूं, तो मैं फ्लाइट का ही चुनाव करूंगा। तो अगर आपको सीधा मिल गया कि उम्मीद छोड़ दो — बस, तो उम्मीद छोड़ने के लिए काम करो; कहां उम्मीद लगी है, उसे छोड़ो; ईमानदारी-सत्कर्म अपना लो, बात खत्म। अपनी सामर्थ्य देख लो। हमने तो आपको बता दिया कि आप किसी भी मार्ग से जा सकते हो, सहायक हो जाएगा — ईमानदारी-सत्कर्म जरूर अपना लेना; मैंने तो आपको मेन टिकट दे दिया। जैसे ट्रेन का एक सुपरफास्ट टिकट होता है जिससे किसी भी ट्रेन में चढ़ सकते हो — हम तो आपको ऐसा टिकट दे रहे हैं जो दुनिया में जितने साधन बने हैं, सब में चलेगा, प्लेन में भी — नेशनल परमिट, यूनिवर्सल। और अगर यह टिकट आपने नहीं लिया तो हर गाड़ी से उतार दिए जाओगे। वही परमिट दिलाने आया हूं — ले लो, निकल लो। और यह तो सीधा आपके हाथ में है। एक व्यक्ति एक-दो घंटे ध्यान, पूजा या पाठ करता है, और एक व्यक्ति ईमानदारी से कर्म करते हुए जो एक-दो घंटे का समय मिलता है, उसे जरूरतमंद की सेवा में लगाता है — आप बताइए कौन पहुंचेगा? सेवा करने वाला। ऐसा नहीं कि ध्यान करने वाला नहीं पहुंचेगा, वह भी पहुंचेगा, लेकिन सेवा करने वाला जल्दी पहुंच जाएगा। इसलिए कहता हूं समय नहीं है — समय के पार की यात्रा है, निकल लो, विलंब मत करो; यह टिकट लो, जहां जाना है बैठ जाओ।

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(लाइव) आत्मज्ञान के बाद जो है, वह क्या है?

पहुंचो।

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(लाइव) नाम जाप का क्या महत्व है, गुरु जी?

जीवन में ईमानदारी-सत्कर्म अपनाकर करो, उससे ऊर्जा कुछ न कुछ मिलती ही है।

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(लाइव) गुरु जी, कैसे पता चले कि सामने वाला जरूरतमंद है? वह झूठ भी तो बोल सकता है।

कोई बात नहीं, समझ से देखते जाओ — झूठ बोलेगा तो पता भी चलता है। मान लीजिए वह जरूरतमंद नहीं है और बोल रहा है मुझे भूख लगी है, भोजन दो — ठीक है, भोजन ले और मेरे सामने खा, बस हो गया; इतना समय दो। आदमी (झूठ) बोलने से कतराता है; कतराता है तो भी समझ जाता है।

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(लाइव) अगर ईमानदार और बेईमान के बीच कोई डील होती है, तो क्या उस बेईमान के पैसे का ईमानदारी के पैसों पर कोई गलत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा?

कर्म मूल है।

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(लाइव) क्या घर में रहते आत्मज्ञान नहीं हो सकता?

कहीं भी हो सकता है — क्या घर, क्या बाहर। कितने लोगों को घर में हुआ, कितने लोगों को हिमालय में नहीं हुआ; कितने लोगों को हिमालय में हुआ, कितनों को घर में नहीं — कुछ बोल नहीं सकते।

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(लाइव) गुरु जी, कोई भोजन के लिए पैसा मांगता है, तो उसे भोजन कराना है, पैसा देना है या मना करना है?

हो सके तो भोजन करा दो — सामने बैठाकर, अगर समय हो तो। वह सबसे अच्छा।

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(लाइव) अपने आप को बिना किसी विचार के अनुभव करना — क्या इसको आत्मज्ञान कहते हैं, गुरु जी?

आत्मज्ञान किसी को कहते नहीं हैं।

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(लाइव) गुरु जी, आप जहां बैठे हैं, कितनी सुंदर जगह है। अगर हमें इससे प्रेम हो जाता है, तो क्या हम इसमें भी फंस सकते हैं?

नहीं, ऐसा नहीं। प्रेम में व्यक्ति फंसता नहीं है।

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(लाइव) क्या देवी-देवता होते हैं, गुरु जी?

जितना कुछ बोला गया है, उसके पीछे कुछ न कुछ है, तभी बोला गया है। देखना यह है कि लोग हैं, लेकिन मैं भी हूं — और मेरा कल्याण कैसे होगा, उसके लिए हमें काम करना है।

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(लाइव) गुरु जी, अगर माता-पिता में कमी या दोष दिखाई दे और यह महसूस हो, तो क्या करें?

कोई बात नहीं, समझने का प्रयास करें।

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(लाइव) किसी सिचुएशन से कैसे बाहर आएं, जब कुछ ठीक न लग रहा हो?

देखिए क्या ठीक नहीं लग रहा है, वह ठीक क्यों नहीं लग रहा है — इसकी जांच करो।

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(लाइव) अगर काम वासना से मनुष्य इतना परेशान है, तो ईश्वर ने यह दी क्यों है?

मनुष्य परेशान है अपनी बेईमानी से, काम भाव से नहीं। वह रूप के चक्कर में फंस गया है, स्वाद के चक्कर में फंस गया है।

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(लाइव) मैं भी निर्विकार होना चाहता हूं। और क्या पुनर्जन्म होता है?

हो जाओ। पुनर्जन्म — कोई बात नहीं; होता है तो भी ठीक, नहीं होता है तो भी ठीक — मुझे काम करके निकल लेना है।

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(लाइव) गुरु जी, क्या अपने आप को साधना भी सत्कर्म कह सकते हैं?

हां — अपने आप को सुधारना।

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(लाइव) गुरु जी, जब आप चुप हो जाते हो और एक तरफ देखते ही रहते हो, तब आप क्या देख रहे होते हो?

क्या देखना है — दिख रहा है।

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(लाइव) मेडिटेशन और नाम जाप — दोनों में कौन सा (अच्छा) है, या दोनों सेम हैं?

कुछ भी कर सकते हैं — ईमानदारी-सत्कर्म में रहिए।

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(लाइव) आत्मज्ञान पाने की इच्छा की धारणा — क्या यह मतलबी (स्वार्थ) नहीं है?

नहीं — हम छूटना चाहते हैं। पकड़ना इच्छा है।

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(लाइव) योगी जी, हम आपको इतना याद करते हैं। और अगर हम आपके ही बताए गए वचनों पर चल रहे हैं, घर पर वही काम करते हुए अपने आप को उसमें ढाल रहे हैं और आपको याद करते हैं — तो क्या आप भी हमें याद करते हो?

तो अब देखना यह है कि आप याद तो करते हो, क्या चरित्र भी अपनाते हो? जितने शब्द हमने दिए हैं, क्या उसमें आप जीते हो? तब तो याद का कोई मतलब है। लेकिन आप याद करते हो और जीते अपने तरीके से हो, तो याद का कोई मतलब नहीं है। आप उस जगह हो, आप कह सकते हो; हम नहीं कह सकते कि हम याद करते हैं या नहीं करते हैं — कैसे सिद्ध होगा? जब हमने आपके लिए ही जीवन लगा दिया है, तो याद तो बहुत छोटी बात है। याद तो — हम रास्ते में किसी से मिल जाते हैं तो जीव-जंतुओं की भी याद आती है कि वो घोड़ा बड़ा सुंदर था, वो हाथी बड़ा सुंदर था। एक व्यक्ति ने तो आपके लिए जीवन ही लगा दिया और आप उससे पूछ रहे हो कि क्या आप मुझे याद करते हो — तो बड़ी हंसी की बात हो जाएगी। क्या आपको मेरी याद आती है?

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(लाइव) गुरुदेव प्रणाम। भाव को शुद्ध कैसे किया जाए?

भाव को शुद्ध करने के लिए कर्म को शुद्ध करना पड़ेगा। आप जैसा कर्म करते हो, वैसे आपके विचार आते हैं और वैसे भाव बनने लगते हैं। तो भाव को शुद्ध करने के लिए, पवित्र करने के लिए आपको वैसा कर्म करना पड़ेगा। जैसा कर्म, वैसे विचार; जैसे विचार, वैसे भाव। जैसी इच्छा, वैसे विचार। मूल कर्म है। कर्म से ही आप अपवित्र हुए।

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(लाइव) गुरुदेव नमन। मैं होली के दिन ही आपसे मिला था और तीन दिन के बाद ईमानदारी, सत्कर्म और जरूरत में जीने का गुरु मंत्र लेकर वापस चला। अब घर पर ही आपका सत्संग देखता हूं और इस मार्ग पर चलने की कोशिश करता हूं।

कोशिश क्यों कर रहे हो? चल देना चाहिए। देखिए, कोशिश में ही जिंदगी ना चली जाए। कोशिश क्यों करते हो? चलो। कोशिश ही मत करते रहो भाई। जैसे रास्ता मिल गया, फिर भी आप कह रहे हो कि नहीं, मैं कोशिश कर रहा हूं — अभी मैं उस रास्ते पर चला नहीं हूं, कोशिश कर रहा हूं। इसका मतलब आप चल नहीं पा रहे हो। तो मेरा कहना है — कोशिश मत (करो, चलो)।

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(कुटिया में, इंदौर से आए 75 वर्षीय साधक) मैं पहले भी अध्यात्म में बहुत चला — साधना करो, यज्ञ-हवन करो, साधना से प्रकाश आएगा, भगवान का दर्शन होगा — पर समझ नहीं आया। 13 दिन से आपके वीडियो दिन-रात सुनकर समझ आया कि प्रत्यक्ष ज्ञान में चार-पांच ही बातें हैं; मैं करूंगा तभी होगा, किसी और के करने से नहीं; मैं ही हूं, कहां जाऊं। इसलिए घर से रोटी बांधकर सीधा चला आया। अंतिम इच्छा यही है कि आप रखो तो यहीं रह जाऊं। गुरुदेव, इससे आगे क्या है?

अब समझ में आ गया तो अपना कल्याण कर लो। ऐसा ना हो कि प्रयास में ही जिंदगी चली जाए। अब वो रास्ता मिल गया — तो क्या थोड़ा प्रयास करके रास्ता और ढूंढेंगे, कल देखेंगे? इसके आगे क्या है — आगे नहीं जाना है, तो बस वापस अपने में आ जाना है। कहीं नहीं जाना; अपने आप में स्थिर होना है। कोई भी कामना रखेंगे तो कहीं ना कहीं हम बाहर ही हैं। और जब तक हम प्रकाश की इच्छा रखेंगे, तो प्रकाश जहां से होगा वो अलग है, प्रकाश अलग है, मैं अलग हूं — ऐसे भ्रमित रहोगे। बस कैसे भी अपना कल्याण करो। सात दिन तो रुकना ही अनिवार्य है। 7 दिन के बाद भी अब फैसला करो कि कहां रहना उचित है — यहां कि वहां; मेरा कल्याण कहां होगा। व्यवस्था को मत देखो, मुंह को मत देखो, लोगों को मत देखना। अब यह देखो कि मेरा कल्याण कहां से होगा। तो बस जहां से कल्याण हो जाए, वहीं रुक जाओ।

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(कुटिया में, राजस्थान बारां से आए साधक) मेरी एक आदत है — मैं स्वाद में पड़ा हुआ हूं; पेट भर जाने के बाद भी किचन में जाकर और खा लेता हूं, तृप्ति नहीं होती। छोड़ना चाहता हूं पर छोड़ नहीं पा रहा। यहां की व्यवस्था में स्वाद नहीं मिलेगा, इसलिए आया हूं कि सात दिन में यह आदत छूट जाए; पर रुकना नहीं हो रहा, मैं सुबह ही वापस जा रहा था।

स्वाद में फंसे हुए — क्या उस स्वाद को पाने के लिए सबको परेशान करते हो? क्या उस स्वाद को पाने के लिए बेईमानी करते हो? मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि आप कोई भी भोजन करते हो, स्वाद अपने आप आता है। तो अब आप कोई भी स्वाद बेईमानी से मत लो और किसी को तकलीफ मत दो उस स्वाद के लिए। जैसे मान लीजिए आपने भोजन बनवाया और भोजन आपके तरीके का ना बन पाया (तो किसी को तकलीफ मत दो)। ऐसा नहीं कि सात दिन ही रुको। सात दिन तो पक्का मैंने रखा, क्योंकि लोग एक-एक दिन में चले जाते थे। सात दिन के ऊपर भी रहो। (सुबह जाने की) ऐसी गलती मत करना, क्योंकि एक बार गए तो दोबारा नहीं आ पाओगे। रोको अपने आप को। आप अपने आप को रोको, अपने पर अनुशासन करो। बस जाने मत दो — बाकी काम मेरा। बस अपने आप को जाने मत दो; एकदम रोक कर रखो — नहीं जाना तो नहीं जाना। सात दिन तो अनिवार्य रहना। अगर इससे भी ज्यादा रह सकते हो आप लोग, तो आजीवन रहो; लेकिन सात दिन तो पक्का, क्योंकि लोग एक-एक, दो-दो दिन में भाग जाते थे, इसलिए हमने सात दिन रखा। एक-दो दिन में भाग जाते थे तो कोई मतलब नहीं रहता था। अगर सात दिन नहीं रखा होता तो आज आप भाग ही जाते। जितने दिन हो सके ज्यादा से ज्यादा रुकना है, लेकिन सात दिन नहीं पूरा करोगे तो फिर आ नहीं पाओगे। आप इस नियम को पहले पढ़ो — अगर आप छह दिन में, पांच दिन में, चार दिन में, दो दिन में, एक दिन में भाग गए, तो दोबारा यहां एंट्री नहीं है। फिर आप आओगे तो आने ही नहीं दिया जाएगा, तो आप क्या करोगे? तो ऐसी गलती आप लोग मत करना। नहीं बीत रहा है तो सात दिन तो बिता ही लेना कैसे भी, ताकि जीवन में फिर ये रास्ता खुला रहे आने के लिए। सात दिन से भी ज्यादा रहना है तो रहो; सात दिन तो पक्का रहो।

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(कुटिया में साधक भावुक होकर रोने लगा) बाबा, यह क्यों रोती है?

आत्मा है ना जो रोती है — अपना जीव रोता है अपने आप को छुड़ाने के लिए, कि मैं कैसे भवसागर से छूट जाऊं। वो समझ गया कि यहां कुछ नहीं है — ये बात समझ में आ गई। एक स्थिति में हंसता है, जब उसके तरीके से हो जाता है। एक स्थिति में रोता है, जब उसके तरीके से नहीं होता। एक स्थिति में रोता है कि अब समझ गया यहां कुछ नहीं है। और एक स्थिति में हंसता है जब वह छूट जाता है — वो आखिरी हंसी है। लेकिन वो तब तक रोता रहता है जब तक वो छूट नहीं पाता; और जब वो छूट जाएगा तब हंसेगा। हंसेगा इसलिए कि पकड़ने के लिए कुछ नहीं था और मैं पकड़ के बैठा था। हंसी तब आती है कि मैं जिसे छोड़ रहा था, उसे तो मैंने पकड़ा ही नहीं था; पकड़ा भी मैं किसी और के लिए था, किसी और के चक्कर में पकड़ा था। तो वो देख पाएगा कि मैंने तो कुछ पकड़ा ही नहीं था, और मैंने छोड़ने के लिए कितना प्रयास किया और पकड़ने के लिए भी कितना प्रयास किया — और पकड़ने के लिए कुछ था ही नहीं।

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(कुटिया में, तीसरी बार आए साधक) यहां के सिवा वहां कुछ नहीं है; मजबूरी में घर जा रहा हूं क्योंकि परिवार है, लड़का 12 साल का है — आपने बताया कि बच्चों की शादी तक जवाबदारी निभानी है। पर वहां अपने जैसे लोग और माहौल नहीं मिलता, जाने में बहुत तकलीफ होती है; यह मजबूरी बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, वहां के लोगों के साथ रहने में बहुत दिक्कत होती है।

उसे मजबूरी ना समझो, उसे जिम्मेदारी समझो, और उसे ईमानदारी से हंसते हुए निभा दो। (वहां के लोगों के साथ दिक्कत) वो तो होने वाली ही है।

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(कुटिया में, 62 वर्षीय साधक) 30-40 साल पूजा-पाठ किया — रोज हनुमान चालीसा, दुर्गा सप्तशती, काली स्तोत्र, चारों धाम घूमा — पर कुछ नहीं मिला। तांत्रिक लाखों रुपए खा गए, कोई झगड़े नहीं सुलझा पाया; 15-20 लाख का कर्जा है, केस चल रहे हैं, बहुओं वाले झगड़ों से घर बिखर गया। हमने जीवन में किसी का बुरा नहीं किया, किसी को परेशान नहीं किया — फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ? पत्नी ने ही धक्का देकर यहां भेजा है।

अब जितना भी जीवन बचा है — बात भी समझ में आ गई है — अब अपना कल्याण कर लो। अब लग जाओ अपने कल्याण में; जितना जीवन बचा है, जितना समय बचा है, अपने कल्याण में लगा दो। अगर मेरे साथ कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार मैं हूं। बहुत दुख है — पता नहीं, उस दुख के पीछे कहीं ना कहीं मैं ही हूं। तो आप बस अपने कल्याण में अब लग जाओ। उस दुख के पीछे, चाहे उस सुख के पीछे, मैं ही था; उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं हूं। और जितना कर सकते हो आप करो, और निकाल लो अपने आप को। अगर मेरे साथ कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार एक ही व्यक्ति है — वो सिर्फ मैं हूं, चाहे वो सुख हो चाहे दुख हो। मेरे किए गए कर्मों का परिणाम है, और वो मेरे द्वारा ही मिला है। स्वीकार भाव रखते हुए जितना कर सकते हो करो; निकालो अपने आप को। इस भवसागर से निकालना ही बुद्धिमानी है। और कोई भी ऑप्शन अपनाओगे तो फंस जाओगे। सीधा स्वीकार करो कि मेरे साथ कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार एक ही व्यक्ति है, वो मैं हूं, और मैं अब निकलना चाहता हूं। बस, इसके आगे जरा सा भी आप बुद्धि लगाओ तो तुम फिर फंसे, क्योंकि बदले का भाव आएगा कि मैंने नहीं किया, इसने किया; इसने क्यों किया, मैंने तो नहीं किया। तो बदले का भाव आ जाएगा, और वो बदला — पता नहीं वो कौन सा शरीर धारण करेगा, तुम कौन सा करोगे। इसलिए बुद्धिमानी यही है, समझदारी यही है कि अगर मेरे साथ कुछ हो रहा है, और आगे भी कुछ होगा, तो इसका जिम्मेदार मैं हूं; मैं इसे स्वीकार करता हूं, और मेरा भाव बस इतना है कि मैं अब निकलना चाहता हूं। इस पर प्रबल इच्छा बना लो कि बस एक ही बात है — मुझे निकलना है। यहां कोई दोषी नहीं है। अगर कोई दोषी है भी — चाहे वो सही हो चाहे गलत — यह देखने का अधिकार जिसकी दुनिया है वह जाने। मेरी दुनिया तो नहीं है, मेरी बनाई हुई दुनिया नहीं है। वो चाहे अच्छा हो चाहे बुरा, दोनों को उसने स्वीकार किया है, तभी तो दोनों मौजूद हैं। तो मैं अस्वीकार करने वाला कौन होता हूं? मैं अगर अपने आप को देखूं तो मैं एक सामान्य नागरिक हूं और मैं निकलना चाहता हूं। ना मैं उस पद पर हूं कि मैं उसे सुधारूं, मेरा अधिकार भी नहीं है। तो मैं सुधार तो नहीं सकता, लेकिन उसमें दोष क्यों देखूं? मैं बदल भी तो नहीं सकता — तो मैं दोष देख के फंसूं क्यों? जब मैं कुछ कर ही नहीं सकता, तो मुझे कुछ बोलने का भी अधिकार नहीं है; जब मैं बदल ही नहीं सकता, और यह अधिकार मुझे कहीं से नहीं मिला है। अगर मैं अपने आप को एक जगह खड़ा कर दूं और देखूं कि मेरा अधिकार कहां रहता है, तो मैं अधिकार से ज्यादा जाऊं ही क्यों? तो अगर हम देखेंगे तो मेरा अधिकार बस इतना है — जितना जीवन बचा है, अपने आप को निकालने में लगा दो। और जितना आपके साथ हुआ, आप ये स्वीकार करो कि कहीं ना कहीं तो आपने किया था। अगर मेरे साथ कहीं कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार मैं हूं, और उसके लिए कभी ना कभी मैंने काम किया था, तभी हो रहा है; नहीं तो हो ही नहीं सकता। मैंने आज नहीं किया है, बीते हुए कल का याद नहीं आ रहा है, लेकिन कहीं ना कहीं तो मैंने किया है, नहीं तो हो ही नहीं सकता। और अब मुझे निकलना है, तो बदले का भाव छोड़ो। नहीं तो बदले का भाव रखोगे — कि मैंने तो नहीं किया, यह क्यों हुआ — इसका मतलब अब आप आगे की तैयारी कर रहे हो, उस व्यक्ति से आगे भी मिलना है। अभी वो आपके जीवन में नहीं है, पता नहीं वो कहां है, लेकिन आगे मिलने की तैयारी कर रहे हो। इसीलिए स्वीकार करो और बस निकलने के लिए तैयार हो जाओ कि बस समझ में आ गया, कुछ नहीं है; बस मैं किसी तरीके से अपने आप को निकाल लूं।

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(वही साधक) मेरी पत्नी अनपढ़ है, कुछ समझती नहीं; लोग उसका अपमान करते हैं कि अनपढ़ है।

कभी अगर उनको आना हो तो उनको भी लाना। अनपढ़ — पढ़ाई तो एक समाज में पद के लिए चाहिए, जीने के लिए थोड़ी चाहिए।

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(कुटिया में साधक) जैसे आप हमारे साथ बोलते हो, वैसे प्रभु या भगवान — अगर कोई होगा — तो मुझसे ऐसे ही बोलेगा ना, तभी तो होगा? क्या वह देहधारी बनकर मुझसे बोलेगा? वैसे तो हर प्राणी में, अलग-अलग रूप में वह हमारी मदद करता ही है, किसी ना किसी के रूप में मिल जाता है — जानवर में, गुरु में, मां में।

हां, मेरे से बात करेगा तभी तो होगा। अगर मेरे से बात नहीं कर रहा है, मैं उसे महसूस नहीं कर पा रहा हूं, तो मेरे लिए थोड़ी ना है वो। मेरे लिए तो तब होगा जब वो मुझसे बात करेगा। बात करने का तरीका अलग होगा, बैठने का हो सकता है तरीका अलग हो, लेकिन होगा तो मुझसे बोलेगा तभी तो होगा। अगर मुझसे बातचीत नहीं हुई तो उसके होने से क्या होगा — मेरा कोई मतलब ही नहीं, तो मेरे लिए तो नहीं है ना। अगर वो किसी के लिए है भी, लेकिन मुझसे नहीं मिला, तो फिर वो उसके लिए है, मेरे लिए थोड़ी ना है, और उससे (मेरा) कुछ होगा भी नहीं। देहधारी क्यों? मैंने एक ही बात कहा — अपना तरीका छोड़ो। वो कैसे बोलेगा, वो देखेगा ना। आप क्यों तय कर रहे हो कि देह लेके बोले? आप उसे बंधन में क्यों बांधना चाहते हो? यही तो हमारी कमी है; हमारे अंदर एक ही कमी है कि हम किसी को बंधन में लाना चाहते हैं। जब प्रह्लाद से हिरण्यकश्यप ने पूछा — तेरा भगवान कहां है? बोले — हर जगह विराजमान है। तो बोले — क्या इस खंबे में है? उसने रूप की कल्पना थोड़ी ना की थी। आप रूप की कल्पना मत करिए, बस मिलने की कल्पना करिए। मिलने की इच्छा रखिए, और उससे मिलने के लिए किस स्थिति पर आना है, उस स्थिति पर आने के लिए काम करिए। कौन उससे मिल सकता है, किस स्थिति में मिला जा सकता है — उस स्थिति में आने के लिए काम करिए। जब आप उस स्थिति में आ जाओगे तो वो आपसे मिल लेगा। लेकिन आप यह कामना मत करो कि वो किस देह को ले आए — यह भी एक इच्छा है। मैं वही तो कह रहा हूं — अगर आप देखो तो इस दुनिया में जो भी उस लायक हुए, उसे मिला। तो आपको तो मिलना है, तो आप देखिए कि क्या आप मिलने लायक हो। आप यह देखिए, क्योंकि वह किससे मिलता है? आपने इतिहास पढ़ा ना — किस स्थिति पर होने के बाद वह मिलता है। आपने किसी पद की इच्छा रख ली, तो आपको देखना है क्या उस पद के लायक आप हो; तभी तो पद मिलेगा। आपने इच्छा तो रख ली। जैसे आप कोई पद ले लीजिए — आप शिक्षक हो। अब कोई व्यक्ति शिक्षक की इच्छा रख ले, तो वो शिक्षक का पद उसे कब मिलेगा? जब वो शिक्षक के लायक हो जाएगा। इच्छा से तो लायक नहीं हो सकता; वो गुण-धर्म होना चाहिए ना उसके अंदर। तो आप देखो कि उस परम सत्ता से मिला कौन। (आप कहते हो) जानवर में देखा, गुरु में देखा, मां में देखा, कोई आकर मदद कर दिया तो हमें (लगा) भगवान आ गए — ऐसे समाधान नहीं है। मैं फिर से कह रहा हूं — मेरी बातों पे गौर करो। अपनी बातें छोड़ दो, किसने क्या कहा छोड़ दो; मैं क्या कहना चाहता हूं वो सुनो, समझो। जिन लोगों ने उस परम सत्ता के बारे में बताया — उस स्थिति में पहुंचने के बाद ही मिलना होगा ना। तो उस स्थिति तक पहुंचने के लिए काम करो, अपने आप को उस लायक बनाओ। पद की इच्छा रखने से कोई पद थोड़ी मिल जाएगा। कोई इच्छा रख दे कि मैं इस पद पे आना चाहता हूं, तो क्या उसे पद दे दिया जाएगा? उस पद के लिए उसे परीक्षा देनी पड़ेगी; जब उस परीक्षा में पास हो जाएगा तो वो पद (मिलेगा)। तो आप देखिए कि जिस पद के लिए आपने इच्छा रखी, (वह योग्यता) अंदर क्यों नहीं है। ये आप देखो ना — ये सवाल आपका है, दूसरा नहीं है इसमें। यह सवाल आपसे ही आपका है, जवाब भी आपसे आपका है। किसी और के जवाब का कोई मतलब ही नहीं है।

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(कुटिया में साधक) आप तो भगवान के पद को प्राप्त हुए; आपने वीडियो में बताया कि उस स्थिति में आने के लिए आपने कितनी मेहनत की। बाकी सबने वेदों के पठन आदि से ज्ञान लिया, पर आपके यहां तो खाली प्रत्यक्ष ज्ञान का मूल — ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग — है। क्या इतने से हो जाएगा, और जीवन में गुरु की कितनी जरूरत है?

ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग — सत्संग हमारे जीवन में भी मिला है। हमने घटनाएं बताई हैं ना — तीन जगह। तो हमें भी सत्संग मिला है, लेकिन कुछ ही समय मिला है, क्योंकि हमें उतने की ही जरूरत थी। पहला मिला था बद्रीनाथ में — बताया था मैंने घटना; उन्होंने आखिरी में कहा, तुम बहुत अच्छे संत हो, और मैं नीचे मिलूंगा। फिर कुछ सत्संग उनसे मिला। फिर इसके बाद चित्रकूट में मिला — उन्होंने कहा कि जल्दबाजी मत करो। तो फिर आखिरी में नर्मदा तट पर मिला कि तुम्हें कोई भारत में भी आत्मज्ञान नहीं करा पाएगा। ये सत्संग हमें कुछ ही क्षण का मिला। हमें भी सत्संग मिला, क्योंकि सत्संग नहीं मिलेगा तो छुड़ा ही नहीं पाओगे अपने आप को। छुड़ाओगे कैसे? आपको तो बांधना आता है ना। जैसे एक बालक का जन्म होता है, तो उसको क्या आता है? खाना। मल साफ करना थोड़ी ना आता है। तो जीव को फंसाना आता है, निकालना नहीं आता; निकालना वो भूल गया है। जैसे बच्चे को मां मल को साफ करना सिखाती है — पहले वह खुद करती है, और वो धीरे-धीरे सीख लेता है; फिर देखो, अब भी आप मल करते हो, एकदम साफ-सुथरे हो — वैसे ही गुरु इस जगत में कैसे जियो कि आपको विकार छू भी ना पाए, वो सिखाता है, और पिछले विकार को कैसे धोना है, वो सिखाता है। हर जीव खा लेता है, लेकिन मल साफ करना बच्चे को नहीं आता; खाना आता है, उठा के खा लेगा, लेकिन धोना नहीं सीखा। तो हम जीव अपने आप को फंसाना सीख गए हैं, लेकिन निकालना हमें नहीं आता। अब निकालने के लिए कोई गुरु चाहिए। ईमानदारी, सत्कर्म और गुरु का सत्संग — ये तीनों चाहिए जीवन में, तभी आप निकल (पाओगे)। समझ गए तो इसका अनुसरण करो। कल्पनाओं में मत जाओ। जब हमारे जीवन में प्रत्यक्ष आ जाए, बात करे, तब ठीक है। मैं कह रहा हूं — हो तो पीछे से बात क्या कर रहा है, आगे आ जा, पर्दा ही उठा। कल्पना में मत जाओ। जिस दिन आपकी मुलाकात प्रत्यक्ष हो, तब (उसका) कोई मतलब है। परमात्मा सृष्टि को चला रहा है — यह सब कल्पना है। परमात्मा इस सृष्टि को चलाता तो इतनी गंदी दुनिया हो जाती? कल्पनाओं में लोग भगवान बन के बैठे हैं। हम पहले सेवा करते थे, लोगों को दवा देते थे, तो लोग कहते थे — कैसे खाना है बाबा जी? तो बोले — श्रद्धा से, विश्वास से? मैंने बोला — हर दवा पे मुझे एक गाली देना। दवा (काम) करेगी; श्रद्धा-विश्वास की बात क्या है इसमें? एक माताजी आईं, तो मुझे प्रणाम करने की भीड़ खूब लगी थी; बोलीं — माताजी। मैंने बोला — ना भैया, कहो तो मैं कपड़े निकाल दूं, मैं लड़का हूं। ये दुनिया भगवान बना देती है। भगवान कभी मत बनना। लोगों के लिए कभी भगवान मत बनना; बनना तो अपने लिए। भगवान कौन? जिसने जन्म-मरण से, इच्छा-अपेक्षा, राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, मेरा के भाव से अपने आप को छुड़ा लिया — वो भगवान है। तो भगवान बनना तो अपने लिए बनना है; गलती मत कर देना। ये दुनिया वाले तुरंत बना देंगे — बैठा के माला पहना दो बाबा को, लोग विभूति देने लगे। भगवान बनना बड़ा आसान है, समाज आपको बना देगा। भगवान कभी लोगों के लिए मत बनना, ये गलती मत करना। लोगों के लिए कुछ ना बनना। लोगों के लिए ही तुम बन के भटक गए हो। आज अगर आप फंसे हो, तो अपने चक्कर में नहीं फंसे हो — अपने चक्कर में फंस ही नहीं सकते, संभावना ही नहीं है। तुम हमेशा दूसरों के चक्कर में फंसे हो। तुम जब भी फंसे हो, तुलना में फंसे हो। जब तुम्हारे जीवन में तुलना की एंट्री हुई, तुलना को आपने स्वीकार किया, तब आप फंसने लगे। तुलना मतलब कोई और है तुम्हारे अलावा। जब उससे आपने अपनी तुलना की और अपने आप को कम पाया, उसे ज्यादा पाया, तब आप उससे ज्यादा होने के लिए बेईमानियां करने लगे कि मैं इससे ज्यादा हो जाऊं। तो मेरा यही कहना है कि कभी लोगों के लिए कुछ बनने का प्रयास मत करना, यह गलती ना करना। मैं जब से निकला, मुझे तो 2010 से ही गुरु बना रहे थे, पहले से ही आश्रम दे रहे थे। 2011 से ही हम कहे — ना बाबा, अपने को ये सब नहीं बनना है। मठाधीश, महंत — हम तो कब का बन जाते। 2011 में ही हम कहे — ना ना, ये गलती नहीं करूंगा। मुझे जब तक आत्म का बोध नहीं होगा, आत्म का ज्ञान नहीं होगा, तब तक मैं अपने लिए इस पृथ्वी पर एक कुटिया भी नहीं बनाऊंगा; पक्का, मेरी जिंदगी ऐसे खुले आसमान में रहेगी। मैं अब निकल गया तो निकल गया — जिसके लिए मैं निकला हूं (वो होने तक)। मैंने देखा ना कि समाज में गुरु बनना, भगवान बनना बहुत आसान है — इस समय तो खूब आसान है। अपने आप को निकालना सबसे कठिन है। तो मेरे तो जीवन में ईमानदारी, सत्कर्म और फिर सत्संग। अगर ईमानदारी नहीं है तो फिर सत्संग का भी मतलब नहीं; तुम वहां रुक ही नहीं सकते। अगर गुरु मिल भी जाए, तो तुम टिकोगे थोड़ी ना। ईमानदारी-सत्कर्म जब आप अपनाने का प्रयास करोगे, भाव रखोगे कि नहीं, मैं ईमानदारी अपनाना चाहता हूं, मुझे बेईमानी से घिन आ गई है, और मैं समाज सेवा करना चाहता हूं, मैं लोगों की मदद करना चाहता हूं — तब गुरु का तुम्हारे जीवन में आगमन होगा, और वह फिर तुम्हें धीरे-धीरे निकालने के लिए मार्ग (दिखाएगा); तभी आप इस भवसागर से निकल सकते हो। तुम्हें सिर्फ अभी बांधना आता है, निकालना थोड़ी ना आता है। जैसे कोई पैदा हुआ, उसे कुछ नहीं पता है, खाना सीख गया है — यहां तक कि वो जानवर भी उठा के खा रहा है — उसे खाना आता है, अपने मल को धोना नहीं आता। वैसे ही जीव को (निकालना नहीं आता); इसलिए जीवन में जीवंत गुरु चाहिए, जैसे जीवन में जीवंत मां चाहिए। अगर किसी बच्चे का जन्म हो जाए और मां ना हो, कोई मां का रोल ना करे, तो बच्चे की क्या हालत होगी? अपना कुछ ना कुछ ढूंढ के खाता रहेगा, पूरा मैला अपने शरीर पर लपेटे घूमेगा; उसे मैले का पता भी नहीं है, दूसरे को घिन आएगी। इसलिए आपको आपकी बेईमानी से घिन नहीं आ रही है, दूसरों को आ रही है। हर आदमी दूसरों को ईमानदार चाहता है, खुद बेईमानी कर रहा है। तब गुरु आता है; इसीलिए गुरु को दर्पण कहा गया है। तब वो दिखाता है कि यार, तू कितना गंदा हो गया — तू देख कितना गंदा हो गया। पहले वह गंदगी बताता है; फिर (जब) वह कहता है कि मैं अब इससे साफ कैसे हो जाऊं, तो वह साफ होने का मार्ग बताता है। इसीलिए इतिहास में कहा गया कि भाई, जीवंत गुरु बहुत जरूरी है। बहुत अच्छी मां थी, लेकिन फोटो में आ गई, तो वो थोड़ी ना बच्चे के लिए मायने रखती है; जीवंत मां चाहिए। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में हर तरीके से, अलग-अलग तरीके से लोग फंसते हैं, इसलिए जीवंत गुरु चाहिए, अभी का गुरु चाहिए, क्योंकि अभी की बेईमानी करने का तरीका अलग हो गया; 100 साल पहले अलग था। पहले लोग रिश्वत लेते थे, पकड़े जाते थे तो मुंह छुपा के चलते थे; अब तो सीधा कहते हैं — ऊपर से कितना कमाते हो। बदल दिया तरीका।

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(कुटिया में साधक) आज भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन रहा है, (बेईमानों को) पुरस्कार मिल रहे हैं; ईमानदारी से पुलिस की नौकरी करना बहुत तकलीफ में आ रहा है, हम शिक्षकों को भी बहुत तकलीफ हो रही है — हमें दिखाना पड़ता है कि हम ईमानदार हैं। समूह ज्यादा है, बड़े अफसर कहते हैं नीचे से ऊपर तक की व्यवस्था ऐसे ही चलनी चाहिए। ऐसे में क्या करें?

नहीं तो मत करो ना। देखो, सबके पास एक ऑप्शन है — इस्तीफा। आप दे दो। या तो जिस पद पे हो, उस पद का काम करो — उस पद का काम बताया गया है, उस पद में बेईमानी नहीं है — तो आप (बेईमानी) मत करो ना। और अगर आपको करने नहीं दिया जा रहा है, उनका समूह ज्यादा है, तो एक ऑप्शन है — इस्तीफा, कारण बता के दे दो। (वे बात) खुल के कहां बोलते हैं? अगर परिचय हो, अपना प्रेम का हो, तो आपसे बात करेंगे; खुल के थोड़ी ना बोलते हैं। जब वो लेटर पढ़ते हैं तो क्या उसमें (यह) लिखा रहता है? आपस में मिलकर बात करते हो, लेकिन समाज के सामने खुल के थोड़ी (बोलते)। आप देखो कि आप किस पद पे हो। ज्यादा बात करने से अच्छा है — आप जिस पद पे हो, वो पद वाला काम करो, बस, बात खत्म। क्योंकि मुझे निकलना है। अगर कोई (बेईमानी) कर रहा है तो वह जाने, और जिसकी दुनिया है वह जाने। लेकिन इस दुनिया में, इन लोगों के बीच में मैंने एक फैसला किया है कि मुझे निकलना है, और निकलने के लिए ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। और ये मुझे मिल गया, क्योंकि ईमानदारी मेरे बस में है — ऐसा नहीं कि मैं किसी पर निर्भर हूं; सत्कर्म मेरे बस में है। और यह जीवन में आ गया, तो फिर गुरु का भी महत्व है। और यह दोनों नहीं हैं, तो गुरु मिल भी जाए तो तुम खुद उसे लात मार के चले जाओगे। रामकृष्ण परमहंस को एक पंडित जी थे, पुरोहित थे — वो लात मार दिए, क्योंकि उनको गुरु का मतलब ही समझ में नहीं आ रहा था। तो कहने का मतलब है कि अगर ईमानदारी-सत्कर्म जीवन में नहीं है, तो फिर आप गुरु को भी लात मार दोगे। अर्जुन ने अपना कल्याण कर लिया; दुर्योधन ने लात मार दिया — और दुर्योधन को सामने से जाकर समझा रहे थे। तो भैया, मैं आपसे एक ही बात कहना चाहता हूं — तुम अपनी जवाबदारी लो। ज्यादा उछल-कूद मत करो मेंढक की तरह; कुछ नहीं होने वाला है। ज्यादा टर-टर करोगे तो सांप आएगा, निगल लेगा। पूरी दुनिया बदलने के लिए ज्यादा टर-टर करोगे, तो एक समय आएगा, काल आएगा और निगल लेगा — टांय-टांय फिस्स हो जाओगे। क्योंकि ज्यादा आवाज मारोगे तो अगल-बगल में सांप भी हैं; ज्यादा लोगों को अगर तुम सुधारना चाहोगे, तो सब मिलकर तुमको ही बर्बाद कर देंगे, क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है। और अगर तुम उनको नहीं छेड़ोगे तो वह तुम्हें नहीं छेड़ेंगे। एक बात याद रखना — ईमानदार व्यक्ति को बेईमान नहीं छेड़ता; उससे क्या मतलब? अपने कल्याण में लगो। बुद्धिमान व्यक्ति अपने कल्याण में लगता है, और मूर्ख व्यक्ति — खुद का कुछ नहीं हुआ, बस मुझे यह करना है, मुझे दुनिया बदलनी है, मुझे सब पाखंडी लगते हैं। तुमने क्या किया? अगर तुमसे पूछा जाए कि तुमने क्या किया, तो — बस हमने तो जीवन भर निंदा ही किया, टीका-टिप्पणी करी बस। और ये टीका-टिप्पणी करने वाले कहीं पहुंचते नहीं हैं; इनका पतन हो जाता है। अगर आप अपने आप को पूरी तरह देखो, तो कहोगे यार, मेरा तो अस्तित्व कहीं है ही नहीं। तुम्हें (जरूरी होने का) ऐसा लगता है, क्योंकि तुमने जबरदस्ती अपने अस्तित्व को तैयार किया है। अगर तुम देखोगे तो कहोगे — यार, समाज को तो मेरी जरूरत ही नहीं है। चलो, तुम चले जाओ एक-दो साल के लिए कहीं एकांत में, तो देखो — तुम्हें यह भ्रम हो गया है; इस भ्रम को तोड़ो। समाज को तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है; हां, समाज की तुम्हें जरूरत है — यह याद रखना। अब जरूरत क्यों है? क्योंकि समाज में ही तुमने बेईमानी किया, अब समाज में ही ईमानदारी-सत्कर्म करके निकलोगे। इस भ्रम से हट जाओ। आप जहां से हटोगे, पता कर लो — वो हंसते हुए (मिलेंगे)। वो कह रहा है कि मैं आपके लिए रो रहा हूं — ना ना, वो बस क्षणिक है। जैसे ही तुम गए, वो अपनी लाइफ का हर एंजॉय कर रहे हैं। अगर तुम्हारी याद में इतना परेशान होते तो पागल की तरह रोते ही रहते, उनके जीवन में कुछ नहीं होता। वो एंजॉय भी कर रहे हैं, घूम भी रहे हैं, खा-पी भी रहे हैं; जब मौका आता है तो कह रहे — हम तुम्हारे बिना रह भी नहीं पा रहे हैं। मैं आपको बताऊं — मैं जैसे अपनी बहन के यहां रहा, जहां भी रहा, मैं हटा तो मैंने उन्हें हंसते हुए पाया, और अच्छे से; क्योंकि मैं था तो कुछ जगह लिया था, बाद में गया तो उस जगह पे बेड हो गया, वो लोग और अच्छे से रहने लगे। ये मुझे भ्रम है, और ये भ्रम सामने वाला दे भी देता है — जितना तुम्हें भ्रम है ना, उतना वो देता भी है कि यार, तुम्हारी याद बहुत आ रही है, हम तुम्हारे बिना रह नहीं पाएंगे। अगर आप देखो तो — तुम उससे कितना दूर हो, कितने महीने, कितने साल हो गए; उसने लाइफ का एंजॉय किया, खूब खाया, खूब पिया, खूब रहा; जब तुमसे बात हुई तो रो दिया। अगर इतनी तुम्हारी याद थी, तो वो तुम्हारी याद के अलावा कुछ करता ही नहीं, किसी से बातचीत भी नहीं करता। अगर इतना तुम्हारा वियोग है कि बर्दाश्त नहीं कर पा रहा, तो उसके जीवन में कोई काम ही नहीं होता। और आप देखो तो उसके जीवन में हर कार्य हो रहा है; लेकिन वो तुम्हारे भ्रम को मजबूत करके रखा है — तुम्हारी याद बहुत आती है, बहुत सताती है, हम तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे; बेचैन हैं, लेकिन मस्ती खूब करते हैं। टेंशन मत लेना — एंजॉय खूब कर रहे हैं, लाइफ को बढ़िया से जीते हैं, खा-पी के जी रहे हैं, सारे काम हो रहे हैं, व्यवस्था भी चल रही है, सब चलेगी। इस बात को नोट कर लो आप लोग। तुम एकदम अगर देखा जाए तो ज्यादा तकलीफ दे रहे हो उनको। तुम निकलो उनकी जिंदगी से, एकदम निकल के देखो — यह मेरा व्यक्तिगत जीवन का अनुभव है। तुम तो उनके लिए कांटा थे; डर के रहना पड़ता था, अनुशासन में रहना पड़ता था। वो अनुशासन में रहना नहीं चाह रहे थे, वो जंजीर तोड़ना चाह रहे थे; तुम उन्हें जंजीर से बांध के रखे थे। अनुभव लेना है तो तुम निकल कर देखो — एक साल के बाद अपने घर जाओ, सब बदला हुआ पाओगे। या कोई ईमानदार व्यक्ति लगाओ कि बस आपको वहां की जानकारी देता रहे — कहेगा, यार सब मजे से हैं; लेकिन जब तुमसे बात होगी (तो रोएंगे)। अगर कोई किसी का वियोग बर्दाश्त नहीं कर सकता, तो उसके बिना वो कोई काम नहीं करेगा, किसी से बातचीत ही नहीं करेगा, पड़ा रहेगा जिंदा लाश की तरह — तब लगता है कि हां यार, इसको मेरी जरूरत थी। और तुम सारे काम मजे से कर रहे हो और कह रहे हो कि यार, तुम्हारे बिना तो रह ही नहीं पाते। तो मैं यही कहूंगा कि तुम अपने आप को निकाल लो। ज्यादा मेंढक की तरह उछल-कूद मत करो, नहीं तो वही काल आएगा और गप से ले लेगा; कहोगे — यार, मैं कहां आ गया; चलो, मौत आ गई, चल दो, बदल गई दुनिया। जरूरत-योग्यता में जी के अपने आप को निकालो।

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(कुटिया में साधक) जैसे आप बोलते हैं कि जन्म-मृत्यु के चक्कर से निकलना है — तो अगर काम करते-करते निकल गए, तो फिर कहां जाएंगे?

निकालोगे तब ना जाओगे। पहले निकालो भाई। जन्म-मृत्यु के चक्कर मतलब कि आप जिस दुख में हो — जैसे आप अभी जहां हो, जैसी आपकी जिंदगी है — क्या आप खुश हो? वहां से पहले निकालो। जब एक वस्तु उठाओगे, तो क्या आप चाहते हो कि उठाने के पहले कहां-कहां रखना है, पता लगा लो? उतनी ताकत आपकी नहीं है। तो आप क्या करो — यहां से उठा लो; उठाने की ताकत तो है ही। उठा लो, और फिर उठाने के बाद वो अपनी जगह पे चला जाएगा। आप पहले उठाओ। आप जहां हो, वहां से अपने आप को छुड़ाओ पहले — अगर आप दुखी हो, परेशान हो। और नहीं हो, तो फिर अभी मजा ले लो। अगर आप जहां हो वहां खुश हो, प्रसन्न हो, तो कोई बात ही नहीं है यार; तब तो कोई निकालेगा तो भी नहीं हटोगे। (हटोगे) तब, जब आप दुखी रहोगे। आप जहां खुश हो, प्रसन्न हो, और वहां से आपको कोई निकाले, तो आप उसे गालियां दोगे। तो वही तो कह रहा हूं — आप जहां हो, अगर आपको लग रहा है कि मैं दुखी हूं, तो (वहां से निकालो)।

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(कुटिया में साधक) आप आत्मज्ञान, आत्मचिंतन, आत्मबोध, आत्मा और जीव की बात करते हैं — ये ज्यादा समझ में नहीं आते। आत्मा हम तो हैं, यह समझ में आता है, लेकिन ये आत्मा कहां पर है? इन्हें थोड़ा क्लियर कर दीजिए। क्या मैं ही सब कुछ हूं? और क्या हमें फिर से बच्चे जैसा (सारी जानकारी से खाली) हो जाना है?

अब जैसे मान लीजिए मोबाइल का सिम कार्ड है। अब नंबर कहां है? अगर पूछा जाए इस पूरे सिम कार्ड में नंबर कहां है, तो क्या कोई जगह फिक्स है? लेकिन है उस सिम कार्ड में ही — पक्का है कि नहीं? लेकिन क्या कोई विशेष जगह बता सकते हो? पूरे सिम कार्ड में बोल सकते हो। तो मेरा कहने का मतलब है कि आप अपने आप को कोई भी नाम दे दो — चाहे आप उसे आत्मा कहो, चाहे मैं कहो, चाहे आत्मबोध कहो — आप कोई भी नाम दे दो। मैं ही सब कुछ हूं — नहीं; मैं ही सब कुछ हूं, तो भ्रम हो जाएगा आपको। मैं हूं, बस। क्योंकि मैं ही सब कुछ हूं, तो फिर ये सब कुछ तो यह है — तो कहोगे यार, मैं सब कुछ हूं; और जब आपके विरोध में कोई खड़ा होगा, तो फिर आप उसके साथ अलग बर्ताव करोगे। तो मैं हूं — इतना तो ठीक है, लेकिन मैं सब कुछ हूं, ये मान लेना मतलब आप भ्रमित हो गए। तो मैं हूं — बस इतना बहुत है। अगर मैं (अपने आप में स्थिर) हो जाता, तो कोई बात ही नहीं होती ना भाई। तो मैं हूं — अब देखना है कि मैं कहां हूं। मैं हूं, ये ठीक; मैं कहां हूं — तो क्या मैं जहां हूं, क्या मैं वहां रहना चाहता हूं? क्योंकि मैं कहीं हूं ना। तो क्या मैं वहां रहना चाहता हूं — हां या ना? अगर हां, तो ठीक है, फिर रहो, कोई बात नहीं। और अगर नहीं, तो फिर वहां से मैं कैसे निकलूं, उसके लिए काम करो। क्योंकि आप कहीं स्थिर हो गए हो — क्या आप परिवर्तनशील में स्थिर होना चाहते हो? उसे रोकना चाह रहे हो, लेकिन वो रुक नहीं रहा है। तो मेरा यह कहना है कि बहुत समझदारी से यात्रा करो। शब्द मकड़ी के जाल की तरह हैं; कोई भी शब्द सोच-समझ कर, सूझबूझ के बोलिए, बस इतना ही। दिमाग में भी — आप जरा समझो — हमने पांच इंद्रियों द्वारा जितना घुसाया है, वही है। विचार में अगर देखा जाए, तो पांच इंद्रियों से जितना घुसा है, उसको छोड़ दो, तो उसके अलावा क्या है? अगर एक बार आपकी जानकारी को हटा दिया जाए, तो फिर आपके पास क्या है? मैं एक ही बात कहता हूं कि तुम जहां हो, वहां से बात करो। छोड़ो बचपना को। आप बच्चों का उदाहरण देके अपनी तुलना उससे क्यों कर रहे हो? वहां नहीं हो ना। क्या कभी बच्चे थे तो तुम्हें ज्ञान था? नहीं था। आप (वह) बात ही मत करो। अगर सच में आपको निकलना हो, तो जहां हो वहां की बात करो। तुलना तो आप किसी से मत करो; तुलना हमें गिरा देती है। अब कहा जाता है कि हमें बच्चे जैसा हो जाना है — तो क्या जितने बच्चे हैं, सब (ज्ञानी) हैं? आप भी तो कभी (बच्चे) थे; वो तो अबोधता है, कुछ पता ही नहीं है। तो क्या उस स्थिति में जाना चाहते हो? उस स्थिति से तो आए ही हो। अगर वो स्थिति आनंद की होती, तो थोड़ी छोड़ते आप। वो तो कुछ पता ही नहीं था, अबोधता थी। तो आप जहां हो, वहां से बात करो। मैं तो एक ही बात कहना चाहता हूं आप लोगों से — तुलना करना छोड़ो। तुलना हमें गिरा देती है, और तुलना हमें कहीं नहीं ले जाती, सिर्फ परेशान करती है। तो मैं हूं, और मैं कहां हूं — बस यही बात है, इतनी सी बात है। तो क्या मैं जहां हूं, ठीक हूं? तब तो ठीक है, कोई बात नहीं। अगर मैं वहां ठीक नहीं हूं, अब ये देखना है कि मैं यहां से कैसे निकलूं। अगर मैं अपने आप को वहां से नहीं निकाल पा रहा हूं, तो मैं किसी का सहयोग ढूंढूं। जैसे मैं रास्ते में बोझा उठा रहा था, नहीं उठ रहा था, तो मैंने कहा — ये भाई, जरा मदद कर दो; या उसने आपको उठाते देखा, आप नहीं उठा पा रहे हो, तो वो आपकी हेल्प कर देता है, और आप आराम से बोझा ले अपने घर तक पहुंच जाते हो। वही बोझा आपसे उठ नहीं रहा था, लेकिन वही बोझा सर पर आने के बाद आप आराम से ले चले जाते हो। तो ऐसे ही — मैं हूं, मैं कहां हूं। अगर मैं जहां हूं ठीक हूं, तब तो कोई बात ही नहीं है। अगर मैं ठीक नहीं हूं, तो मैं वहां से अपने आप को कैसे निकालूं। (और) होना कहां चाहता हूं, ये भी तो डिसाइड करना पड़ेगा ना। जहां हूं वहां ठीक नहीं हूं, तो अब होना कहां चाहता हूं — मैं कहां ठीक रहूंगा — यह भी जानना बड़ा जरूरी है, नहीं तो निकालने का भाव ही नहीं होगा। एक रस्सी के सहारे मैं खड़ा हूं, तो दूसरी रस्सी नहीं दिखेगी तो हम पकड़ भी नहीं सकते। इस पॉइंट को बहुत गहराई से समझना, इसलिए मैं रिपीट कर रहा हूं — मैं हूं, और मैं कहां हूं। और देखूंगा तो मैं हूं, और मैं यहां परेशान हूं; तो मैं कहां हो जाऊंगा तो मैं एकदम आनंद से भर जाऊंगा — तो मैं अब अपने आप को यहां से निकाल लूं, बस बात खत्म। अगर मैं नहीं निकाल पा रहा हूं, तो मैं किसी की सहायता लूं। मुझे सहायता लेनी ही पड़ेगी, क्योंकि मैं यहां था, और यहां होने में अनेकों लोगों का बल मिला है; मैं अकेले थोड़ी ना यहां पे आ पाया — यहां पर आने के लिए अनेक लोगों का बल है। अब एक व्यक्ति मुझे ऐसा चाहिए — कि जितने लोगों का हाथ मेरी जिंदगी में यहां तक लाने के लिए लगा है — उन सबसे (ज्यादा बल वाला), और उसी को गुरु कहा गया है। उसमें इतना बल रहता है कि अगर आप तैयार हो तो आपको निकालने में मदद कर देगा।

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(कुटिया में साधिका) आप कहते हैं कि मुझे यहां तक लाने में अनेक लोगों का बल लगा है। पर मुझे लगता है कि मैं अपनी इच्छा-वासनाओं के कारण खुद ही उनमें घुसी हूं — वे लोग तो सिर्फ उपकरण थे, किसी ने मुझे जबरदस्ती नहीं फंसाया। अगर मैं यह कहूं कि इन लोगों ने मुझे फंसाया, तो मेरी लायबिलिटी कम हो जाती है; अगर पूरी लायबिलिटी खुद पर लूं तो मैं अपने ऊपर ज्यादा काम कर पाऊंगी। और घुसने में मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी, अब मैं निष्क्रिय हो गई हूं, मुझमें दमखम नहीं — अब निकलूं कैसे? क्या यह सोच सही नहीं है?

अगर वो एंट्री नहीं देते तो आप नहीं घुस पाते। उसको मेरे से कुछ चाहिए और मुझे उससे कुछ चाहिए — तो यह कॉन्ट्रैक्ट तो उसी टाइम पक्का हो जाता है। आप यहां हो, अनेक लोगों में हो, तो अनेक लोग मिले हैं ना। शुरुआत मुझसे हुई, लेकिन सहयोग मुझे सामने से मिला। अगर सहयोग सामने से नहीं मिलेगा तो आप फंस ही नहीं सकते। तो फंसने को बहुत ईमानदारी से स्वीकार करना पड़ेगा। अगर आपने सीधा ये भी स्वीकार कर लिया कि नहीं, मेरे फंसाने में सिर्फ मेरा हाथ था और किसी का नहीं था — तो इसमें अहम भाव आ जाएगा, फिर निकालने के लिए (सहायता) नहीं ढूंढोगे। आप इसे बहुत गहराई से समझो — जब होगा कि मैंने ही फंसाया है, यह पूरी तरह पक्का है, (तो सोचोगे) फिर मैं (खुद ही) निकाल लूंगा। (ताकत खत्म हो गई —) ऐसा हो ही नहीं सकता; ये आप कह रहे हो ना, ऐसा है ही नहीं। अगर मैं फंसा, तो इच्छा मेरी जागृत हुई; बेईमानी करने के लिए मैं तैयार हुआ, तब मुझे बेईमानी कराने वाले लोग मिले। अगर मैं तैयार भी हो जाता और लोग नहीं मिलते, तो मैं कर ही नहीं पाता। कोई ना कोई हमारे कार्य में निमित्त बना — इसे भी स्वीकार करना पड़ेगा। मुझे पता है कि इससे मेरी इच्छा पूरी होगी, तो उसको भी तो पता है कि मेरे से उसकी इच्छा पूरी होगी, तभी तो कॉन्ट्रैक्ट बनता है। तो इसे स्वीकार करना पड़ेगा कि हम एक-दूसरे के पूरक हैं। हम जहां भी हैं, किसी के सहयोग से ही हैं; और हम वहां से निकल सकते हैं तो उसमें भी किसी का सहयोग लेना पड़ेगा। इच्छा हमारी, सहयोग किसी और का। अगर सहयोग मुझे नहीं मिलता तो मैं वहां नहीं पहुंच पाता; अगर मैं इच्छा भी रखता और सहयोग ही ना मिलता, तो हमारी इच्छा ही रह जाती। यही तो कहा जा रहा है कि हमारे फंसने में भी किसी का सहयोग है। मेरी इच्छा का सहयोग भी हो जाए, और कोई मुझे सामने से स्वीकार ना करे, तो मैं नहीं फंस सकता। (एआई से बनी बॉडी से भी लोग इच्छाएं पूरी कर रहे हैं —) नकली का यूज़ इसलिए होता है कि असली भी मौजूद है; असली के बारे में उसे जानकारी है, तभी वो नकली को यूज़ कर पा रहा है। मेरा यही कहना है कि अगर मैं फंसा, तो शुरुआत मुझसे हुई, लेकिन सहयोग बहुत लोगों का है; तो अब मैं अकेला चाहूं तो नहीं निकल सकता, क्योंकि सहयोग बहुत लोगों का है, बहुत बल लगा है। फंसने में भी हाथ लगा है; अगर फंसने में हाथ ना लगे तो फंस ही नहीं सकते — उसको क्यों नहीं समझ रहे हो? आप फंसने के लिए तैयार हो और दूसरा फंसने के लिए तैयार ना हो, तो क्या आप फंस सकते हो? और आपकी इच्छा ऐसे हो ही नहीं सकती। आपने कुछ देखा, तभी इच्छा जागृत हुई। बिना उस जानकारी के इच्छा जागृत ही नहीं हो सकती; आपको जानकारी दी गई। जहां आप फंसने जा रहे हो, उस फंसने के पहले ही उसके बारे में पूरी जानकारी है, तभी तो इच्छा जगी। अगर जानकारी का अभाव होता तो इच्छा भी नहीं जगती; आप उसे देखते रहते कि क्या है। यह कहीं से पता चला, तब जाकर लगा कि चलो, ले लें। इच्छा आपसे नहीं — शुरुआत बाहर से है।

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(वही साधिका) तो आपका कहना है कि मेरी इच्छाएं बाहर की जानकारी से बनी हैं? पर कोई बंदा जंगल में पला-बढ़ा हो, उसके हार्मोन हों, उसे कोई जानकारी नहीं दे रहा — पशुओं को भी कोई जानकारी नहीं देता — तो क्या बिना जानकारी के वह फंसेगा ही नहीं, इच्छा पैदा ही नहीं होगी? और हम आज के युवाओं को ज्यादा से ज्यादा जानकारी के लिए प्रेरित करते हैं — तो हमें कितनी जानकारी लेनी-देनी चाहिए?

नहीं होगी (इच्छा), और वो फंस नहीं पाएगा। अगर वो करेगा भी, तो फंस नहीं पाएगा, क्योंकि वो शरीर के लिए करेगा और हट जाएगा; फंसेगा नहीं। जैसे आज तक हमने मानव के अलावा किसी भी जीव को नहीं कहा कि फंसे। समझना इस बात को — मानव के अलावा किसी को कहा गया कि रेप किया? वो स्वाभाविक करते हैं; उनको कभी बेईमान नहीं कहा गया। फंसेगा कैसे? जैसे वो पैदा हुआ, तो खाना पता है? शरीर की जैसे भूख लगती है, वह खा लेता है; वह भूख को महसूस कर पा रहा है। तो जैसे हार्मोन भी होंगे, तो वो हार्मोन जहां निकलना होगा निकल जाएगा, लेकिन बेईमानी नहीं करेगा, फंसेगा कभी नहीं। इच्छा समझिए ना — पहले इच्छा को समझिए। जरूरत को इच्छा नहीं बोला जाता। मान की इच्छा, बड़ा बनने की इच्छा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा — ये इच्छा है। बस ये दो-तीन इच्छाएं, इसी में तो सब आ गया। (जरूरत पूरी हो गई, उसके बाद जो कर रहे हो) वो इच्छा है, और वो गिराती है। हां, जानकारियां ही इच्छा को जन्म देती हैं। अगर आप बड़ा बनना चाहते हो, तो बड़े-छोटे की आपको जानकारी दी गई है; अगर बड़े-छोटे की जानकारी नहीं दी जाती, तो आप बड़ा (नहीं बनना चाहते)। इसीलिए देखो, जिस क्षेत्र में कोई रहता है, जैसी भाषा उसे सिखाई जाती है, उसी भाषा का ज्ञान होता है। (सत्संग सुनकर अध्यात्म की इच्छा जागृत हुई —) हां, नहीं तो नहीं होती। अब आपको समझ में आ गया कि मैं जहां हूं, वहां ठीक नहीं है — चाहे वो मान की इच्छा हो, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा हो। बात समझ में आ गई, अब आप उससे छुटकारा पाना चाहते हो। (कितनी जानकारी —) जितने में मैं जी सकूं, जितने में मैं इस शरीर में रह सकूं, उतनी जानकारी। जैसे बड़ा बनने की जानकारी मां-बाप को बच्चों को नहीं देनी चाहिए कि तुम्हें बड़ा बनना है। बड़े-छोटे की जानकारी नहीं देनी चाहिए — आवरण से कि यह बड़ा है, यह छोटा है — यह नहीं देना चाहिए। तुलना नहीं करनी चाहिए, तुलना की जानकारी नहीं देनी चाहिए, क्योंकि बड़े-छोटे में मान आता है; और मान — बड़ा-छोटा बनना — एक तरह से गलत जानकारी है। ये गलत जानकारी हमारे अंदर घुसा दी जाती है, और इस जानकारी की वजह से हम अपने जीवन को बर्बाद कर देते हैं। समाज की कुछ ऐसी जानकारियां हैं कि हमें ग्रसित करके रखी हैं। जैसे जातिवाद की जानकारियां समाज में दी गईं कि यह जात से छोटा है, तुम बड़े हो; वो तुमसे बड़ा है, बुजुर्ग है, लेकिन तुम अगर इस घर में पैदा हुए तो वो नीचे बैठेगा, तुम ऊपर बैठोगे। तो ऐसी जानकारियां हमें कितना गिरा देती हैं; और ये जानकारी हमारे अंदर एकदम कूट-कूट के भरी जाती है, और इससे हमारा जीवन ग्रसित है। इच्छा क्या है? जरूरत से ज्यादा पाना इच्छा है। आप एक बात बताइए — आपने कभी किसी पशु को कहा कि इसकी कोई इच्छा है? (उसे) जानकारी नहीं होगी, तो फिर आप वहां जाओगे कैसे? अपने ऊपर काम करो। जानकारी ही इच्छा को जन्म देती है; लेकिन इच्छा को समझ लेना कि इच्छा क्या है। यही तो जानकारी हमें परेशान करके रखी है, इसी में तो हम ग्रसित हैं; और यह जानकारी हमारे अंदर कूट-कूट के भरी गई है, हमारे लोगों ने ही भरी है, और इसी के चक्कर में तो बेईमानी हुई हमसे। आप इस पे बैठकर चिंतन करो।

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(वही साधिका) क्या इच्छा हमारे लिए हेल्पफुल भी नहीं है — उठने में? हम भी तो एक इच्छा लेकर यहां बैठे हैं; कोई घर से (यहां के लिए) चला, तो वह भी इच्छा लेकर चला ना। इसे क्या कहेंगे?

आप इच्छा छोड़ने के लिए बैठे हैं। आप इच्छा को छोड़ना चाहते हो, अपने मूल में आना चाहते हो। मूल में आना कोई इच्छा नहीं है। राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, मेरा, कर्ता — यह आप छोड़ना चाहते हो, क्योंकि आपने इसे पकड़ा है और इससे आप परेशान हो, ग्रसित हो। आप यहां इच्छा लेकर नहीं बैठे हो। वही तो कह रहा हूं — मैं मूल में आना चाहता हूं; (इसमें) इच्छा है ही नहीं। मैं तो अपने आप में स्थिर होना चाहता हूं। अगर मुझे इसके बाहर कुछ चाहिए होता, मेरे अलावा मुझे कुछ चाहिए होता, तो इच्छा होती। मैं तो अपने आप में स्थिर होने आया हूं कि मैं अपने आप में कैसे हो जाऊं। तो आप यहां इच्छा से मुक्त होने आए हो, इच्छा से अपने आप को छुड़ाने आए हो। और इच्छा क्या है — राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, मेरा, कर्ता; योग्यता से ज्यादा पाने में सब होता है। आप इससे छूटने आए हो। आप इच्छा लेके नहीं आए हो, इच्छाओं से मुक्त होने के लिए आए हो। आप अपने आप में स्थिर होना चाहते हो — ये कोई थोड़ी इच्छा है। इस शब्द को हम इच्छा नहीं बोल सकते। मैं कह सकता हूं कि यहां शब्द खत्म हो गया, यह निःशब्द हो गया। इसी को कहा जाता है कि तुम उस जगह आकर खड़े हो जाओगे जहां आपके लिए कोई शब्द ही नहीं होगा, सिर्फ आप होगे। तो आप यहां पर अब कहोगे कि यह क्या है — तो यह बात खत्म हो गई; यहीं पर बात खत्म हो जाती है। और यहीं के बाद ही परमानंद घटित होता है — जब आप इससे छूट जाते हो। इसके बाद शब्द खत्म — यह क्या है, कुछ नहीं, कुछ बोल ही नहीं सकते। क्योंकि बोला तब जाएगा जब कुछ बाहर का होगा, जब आपसे कोई भिन्न हो, उसके बारे में आपसे बताया जाएगा। लेकिन आप ही हो, तो फिर आपके लिए आपको क्या बोलना? तो यहीं पर परम आनंद घटित होता है, यहां व्यक्ति निःशब्द हो जाता है — ये क्या है, कुछ नहीं, बात खत्म हो जाती है। तो अब मेरी कोई इच्छा नहीं है, और जितना पीछे का है, भैया, हम उससे मुक्त होना चाहते हैं। अब मेरी कोई इच्छा नहीं है, मेरी कोई कामना नहीं है। अगर आपके अलावा और कोई कामना होती, तो आप यहां नहीं आते; और धोखे से आ जाते तो चले जाते — और आपने ऐसे लोगों को देखा भी। जैसे अभी मैं आपको बोल दूं — आप यूएसए में रहते हैं। अब जितना भारत में जातिवाद का खेल है, वहां है क्या? वहां क्यों नहीं है, यहां क्यों है? पृथ्वी तो एक ही है। वहां ऐसा है कि यह जात वाले ऊपर बैठेंगे, ये नीचे बैठेंगे? वहां क्यों नहीं? क्योंकि वहां के बच्चों को ऐसी जानकारी नहीं दी गई, तो वो लोग इससे ग्रसित नहीं हैं; लेकिन हम लोग इससे ग्रसित हैं। वो भी तो इसी पृथ्वी पर रह रहे हैं। सबके पास सेम गाड़ियां हैं, सेम घर; जातपात का ऐसा कोई नियम नहीं कि ये समाज के लोग ऊपर बैठेंगे, ये समाज के लोग इनको प्रणाम करेंगे, इनसे झुकेंगे। अब भारत में कूट-कूट के भरा है — क्यों भरा है? वहां क्यों नहीं? क्योंकि वहां के बच्चों को ये सब जानकारी नहीं दी जा रही।

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(वही साधिका) जातिवाद जैसी जानकारियां समाज के लेवल पर ठीक है, लेकिन मैं इंटरनल जर्नी — अंदरूनी, मानसिक यात्रा — की बात कर रही हूं। मेरी अंदरूनी कामनाएं ही तो बाहरी रूप लेती हैं। जैसे मेरी जीभ का आकर्षण या देखने का आकर्षण — उसकी किसी ने जानकारी नहीं दी, वो अंदरूनी है। एक ही घर में पले बच्चों में भी किसी को घर का स्वाद, घर के लोग पसंद नहीं आते, पड़ोस की चीजें आकर्षित करती हैं — तो वह आकर्षण तो मेरे भीतर ही हुआ ना? क्या बाहर वाली जानकारियां ही मेरी इच्छा पैदा करती हैं?

बाहर में ही तो हम फंसे हैं। अगर देखा जाए तो हम अंदरूनी थोड़ी फंसे हैं — कहां अंदरूनी फंसे? बाहर में ही दुखते हैं। पहले तो (आप कहते हो) अंदरूनी कामना है — कामनाएं आईं कहां से? मान की कामना आपके अंदर कहां से आई, ये बताइए। बड़ा बनने की कामना कहां से आई? क्या आपके द्वारा आई? कामना का जन्म और बड़ा बनने का जन्म क्या आपसे हुआ? क्या इसके जन्मदाता आप हो? (स्वाद का चक्कर —) अंदरूनी तब हुआ जब आपको बाहर से स्वाद मिले; वैसा-वैसा भोजन अलग-अलग तरीके का दिया गया। स्वाद अपना-अपना है, लेकिन आपको अलग-अलग तरीके से मिला, तब आप स्वाद में फंसे ना। तुरंत आप स्वाद में थोड़ी फंस गए; फंसे कब? पहले तो आपको जरूरत में भोजन दिया गया। अब स्वाद आपको अलग-अलग तरीके से आपके मां-बाप ने, समाज के लोगों ने खिलाना चालू किया, तो आपने किसी स्वाद को पकड़ लिया। लेकिन स्वाद ही नहीं खिलाया होता, तो आप पकड़ पाते क्या? अगर स्वाद बना के भोजन बनाना कोई सिखाता ही नहीं, तो आप स्वाद थोड़ी पकड़ पाते। अगर (बच्चे ने बाहर) आंखों से देखा, तो किसी ने उसे बनाया ना; अगर कोई बनाता नहीं, तो आंखों से देखता कैसे? मैं यही कह रहा हूं कि आपके पास जितना भी है — अगर आप परेशान हो, तो सिर्फ बाहर की चीजों से ही परेशान हो। यही तो कहा जाता है कि आप अपने आप में हो जाओ, परम आनंद में हो जाओगे। आपके अंदर इच्छा वो पैदा नहीं होती है; आपके लिए तो सिर्फ एक भूख है — चाहे जैसे मिट जाए। जब आपके सामने कई ऑप्शन आ जाते हैं, और कई ऑप्शन को जब टेस्ट करने लगते हो, तब आप चुनाव करते हो — ये ठीक है, ये ठीक नहीं है। लेकिन कई ऑप्शन आए तब ना; अगर कई ऑप्शन ना आते, एक ही आता, तब आप फंसते ही नहीं। (एक ही घर में पला बच्चा —) ऐसा हो ही नहीं सकता; जंगल में थोड़ी बोल रहे हो। आसपास-पड़ोस के लोगों को देख के सीखता है। मैं वही कहना चाहता हूं कि हमारे साथ समाज भी है; हम अपने घर का आचरण नहीं अपनाते, लेकिन बगल वाले का देख के अपना लेते हैं। ऑप्शन तो वो अवेलेबल ही था; ऑप्शन ही ना मिलता तो (आकर्षण कैसे होता)? आपके अंदर जितना भी भरा है, बाहर से ही भरा है — इसी बात को समझो। आपके अंदर, आप में, परम आनंद के अलावा कुछ नहीं है। एकदम — बाहर वाली ही जानकारियां हमारी इच्छा पैदा करती हैं। और इच्छा क्या है, वो भी आप समझ गए। अब इस पे काम करो; बस इस पे चिंतन करो।

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(लाइव) गुरु जी, क्या जातिवाद (हमारे फंसने का) सबसे बड़ा कारण नहीं है?

नहीं, सब है ना — देखिए, मिलाजुला के सब है। जैसे जाति पर मैं बोलता हूं, मैंने लोगों को बता दिया कि जात ऐसी चीज नहीं है, हमने पकड़ ली है। जैसे इस पृथ्वी पर कोई भी जीव अपने बच्चों को जन्म देता है, तो उसके मल को साफ करता है — मुंह से चाहे हाथ से; उस समय वह शूद्र होता है। फिर उसके बाद उसके भोजन की व्यवस्था करता है; उस समय वह वैश्य होता है। उसके बाद समाज से उसकी रक्षा करता है; उस समय वह क्षत्रिय होता है। उसके बाद वह उसको ज्ञान देकर छोड़ देता है; उस समय वह ब्राह्मण होता है। अब वह जीव जीवन जीने की शुरुआत जब ज्ञान से करता है, तो वह ब्राह्मण होता है; जब समाज से अपनी रक्षा करता है, तो वो क्षत्रिय होता है; जब अपने भोजन की व्यवस्था करता है, तो वह वैश्य होता है; और उसके बाद अपने मल-मूत्र को साफ करता है, तो वह शूद्र होता है। तो चार वर्ण पृथ्वी के हर जीव में हैं — यही है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। अब ये चार तो तुम अपने लिए अपनाते हो; बिना अपनाए आप रह ही नहीं सकते, ये चार आपको अपनाना ही पड़ेगा। अब ये चारों अगर समाज के लिए अपना लिए, तो आप महात्मा हो गए; आप निकल जाओगे, इस भवसागर को पार कर जाओगे। और अगर आप चार में से एक भी अपनाए हो, तो आप सामान्य नागरिक हो; लेकिन एक को पकड़ के तीन से द्वेष कर रहे हो, तो आप फंस गए। चारों तो आपको अपने लिए अपनाना ही पड़ रहा है। अब ब्राह्मण का क्या काम है? लोगों को मार्ग बताना — अब कौन सा मार्ग? जिस मार्ग का पता हो। क्षत्रिय का काम क्या है? रक्षा करना। तो अपनी तो कर ही रहे हो ना; अपने को सही जगह ही ले जाते हो, तो ऐसे ही दूसरों को भी सही रास्ता बताओ, और दूसरों की भी रक्षा करो। और इसके बाद ईमानदारी से आपकी भोजन की व्यवस्था हो — तो अपने लिए तो कर रहे हो, तो दूसरों के लिए भी करो। और उसके बाद सेवा — अपना मल-मूत्र साफ करो, जरूरत पड़ने पर किसी और का भी कर दो। तो चारों वर्ण अगर आपने अपना लिए, तो आप महात्मा हो गए। इसलिए महात्मा चारों को अपना लेता है — महान आत्मा हो गए; मतलब आप अब उस परम सत्ता से मिल लोगे। तो ये वर्ण व्यवस्था है; ये चारों हर जीव में हैं, सिर्फ मानव में ही नहीं; चार को अपनाना ही पड़ेगा। अब आपको समझाने के लिए ज्ञान देने वाले को ब्राह्मण का नाम दे दिया गया, रक्षा करने वाले को क्षत्रिय का नाम दे दिया गया, भोजन की व्यवस्था करने वाले को वैश्य का नाम दिया गया, सेवा करने वाले को शूद्र का नाम दे दिया गया; क्योंकि अगर हम आपस में बात करेंगे तो कोई तो शब्द देना पड़ेगा, तभी तो हम-आप एक-दूसरे की बात को समझेंगे। तो यह है वर्ण।

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(कुटिया में साधक) गुरु जी, कल के सत्संग में आपने बताया कि जो समय चल रहा है, उस समय से पीछे आना है — एक सेकंड, आधा सेकंड पीछे। उसके बारे में थोड़ा बताइए। क्या कुछ नहीं चाहिए में आएंगे तभी होगा, या इसमें कुछ रहस्य है?

तभी आ सकते हो जब आपको कुछ नहीं चाहिए; क्योंकि कुछ चाहिए में बाहर रहोगे, बाहर की घड़ी में रहोगे; और कुछ नहीं चाहिए में बाहर की घड़ी से मुक्त हो जाओगे। तो यही समय के पार की यात्रा है। और यही तो रहस्यमय है। बातें रहस्यमय ही हैं — अगर देखा जाए तो एक-एक शब्द रहस्य है।

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(वही साधक) आपने बताया कि धारणा को भी तोड़ना है, ध्यान से भी मुक्त होना है — धारणा, ध्यान, फिर समाधि, फिर तुम, फिर ब्रह्म। तो समाधि वाली स्थिति में कैसे पहुंचा जा सकता है, वो कब आती है? कितने दिन बाद आती है, कितनी देर रहती है? आत्मज्ञान का अनुभव और समाधि का अनुभव — दोनों अलग होते हैं या एक ही? और समाधि में शरीर का भान रहता है या नहीं?

हां, पहले तो एक धारणा तोड़ने के लिए दूसरी धारणा बनानी पड़ेगी ना। तो धारणा, ध्यान, फिर ध्यान के बाद समाधि, फिर तुम, और फिर ब्रह्म — यही यात्रा है। (समाधि) तब आती है जब आपको कुछ नहीं चाहिए; वो तभी आएगी। क्योंकि कुछ चाहिए में तो ध्यान घटित होगा; अब कुछ नहीं चाहिए तो ध्यान किस पे करोगे? तो जब कुछ नहीं चाहिए, तो समाधि की स्थिति आएगी। वो कभी भी हो सकती है, कहीं भी हो सकती है। जैसे कोई मां बनने वाली हो, तो कहीं भी बन सकती है; ऐसा थोड़ी ना है कि कोई बाथरूम में नहा रहा है तो मां नहीं बन सकती — हो सकता है बाथरूम में नहाते-नहाते मां बन जाए; ट्रेन में सफर करते, कितने लोग प्लेन में मां बन गए। लेकिन उसके लिए गर्भधारण हुआ है, तभी; अब गर्भधारण नहीं हुआ, तो थोड़ी प्लेन में कोई मां बन जाएगा। लेकिन गर्भधारण हो गया, तो मां कभी भी बन जाएगी। (कितने दिन बाद —) कुछ बोला नहीं जा सकता। जैसे कोई मादा है, तो दर्द उठता है, मां बन जाती है; किसी-किसी को घंटों होता है, किसी को दो दिन हो, किसी को महीना हो। कोई दो-चार महीने समाधि में रहे; लेकिन आप यह मत समझना कि आंख बंद करके ऐसे बैठा है — चलता-फिरता, बोलता (है), अलग सा ही अनुभव है। (आत्मज्ञान और समाधि —) अलग ही होता है। समाधि में वो कुछ नहीं चाहिए में आ जाता है, लेकिन उसको ज्ञान नहीं रहता। जैसे एक स्त्री ने गर्भ को धारण कर लिया, लेकिन दूध कब आएगा? जब बच्चे का जन्म होगा; जन्म होते ही स्तन से दूध आ जाएगा; जन्म के एक दिन पहले भी दूध निकालो तो नहीं निकलेगा। (जबरदस्ती निकालो तो जो आता है) वो पूर्ण दूध नहीं है, समाज के किसी काम का नहीं है; उसको दूध भी नहीं बोल सकते — मैं पूर्णता की बात कर रहा हूं। तो ऐसे ही, जब हम पूरी तरह निर्विकार हो जाएंगे, तब समाधि में हो जाएंगे; और आत्मज्ञान हो जाएगा तो फिर उसके बाद वही ज्ञान निकलेगा। दोनों का अनुभव अलग-अलग है। समाधि में ये होता है कि अब कुछ नहीं चाहिए में आ जाता है, लेकिन ज्ञान नहीं रहता, उसे अभी ज्ञान नहीं हुआ है — अब वो चाहे एक दिन लग जाए, चाहे कई दिन लग जाएं। मैं कई महीने तक था — अगर मैं अपने आप को देखता हूं तो (जनवरी तक)। उसको करने के लिए अब बाहर कुछ नहीं; यहां तक कि आत्मज्ञान की भी इच्छा हट जाती है। वो अपने आप में हो जाता है; उसकी कोई इच्छा नहीं है कि भ्रमण करो। आत्मज्ञान की भी इच्छा खत्म हो जाती है — वो इसलिए कि भैया, मैंने अपने करने से सब कुछ कर लिया। मैं आखिरी स्थिति अपनी बता रहा हूं — वो इतना थक जाता है कि अब किसके पास जाऊं, वो भी खत्म हो गया है, और मेरी ताकत भी खत्म हो गई है; ना करने को कुछ बकाया है, और मैं करने लायक भी नहीं हूं। ना तो कुछ करने के लिए बाहर है, और ना तो मैं उस लायक हूं — दोनों स्थिति नहीं है। उसको पता चल गया, तभी तो वो खत्म होता है, तभी तो खोजी खत्म होता है। क्योंकि खोजी पैदा कैसे हुआ? कुछ करने में, कुछ जानने में, कुछ समझने में खोजी का जन्म हुआ। तो जैसे ही उसे समझ में आता है कि यार, अब समझने के लिए तो कुछ नहीं है, जितना समझना था मैंने प्रयास कर लिया, अब मेरे करने में कुछ नहीं होगा, करने से जितना होना था हो गया, कुछ नहीं हुआ, इतने सालों से कर रहा हूं — तो पहले खोज खत्म होती है, फिर खोजी खत्म होता है, और फिर जो शेष बचता है वो समाधि में चला जाता है। (समाधि पांच मिनट, दस मिनट या महीनों —) कुछ बोल नहीं सकते, उसका कोई टाइम मैं नहीं दे सकता आपको। जैसे एक आदमी कोमा में चला जाए, तो क्या डॉक्टर टाइम दे सकता है कि कब निकलेगा? हो सकता है अगले मिनट निकल जाए, हो सकता है कई साल ना निकले। समाधि का कुछ बोल नहीं सकते कि समाधि लगने के बाद आप कब निकलोगे, कब आत्मज्ञान होगा; लेकिन समाधि के बाद हो जाता है। लेकिन समाधि भी कोई ऐसे ना सोचे कि भैया, लग गई मेरी। जब तक इच्छाएं हैं, या करने लायक आप कुछ हो, तो (वह) समाधि नहीं है। ये तो नहीं कि थक के बैठ जाए और बोले भैया, समाधि में हूं; ऐसा नहीं है — बेवकूफ बना के बैठ जाए कि यार, मैं करने लायक नहीं — नहीं चलेगा। (शरीर का भान —) रहता है; वो खाता भी है। अगर शरीर का भान नहीं होता तो भोजन कैसे ग्रहण करता? किताबों से निकलिए जरा। जैसे दारू पीने वाले को कहते हैं कि दारू पी लिया, अब इसको कुछ (पता नहीं) — अरे, उसे सब पता है। उसे मारो तो तुम्हें मारता है; उसे पता है ना कि मुझे चोट लग रही है। अगर उसे कुछ नहीं पता है, तो दर्द भी नहीं होता, सामने वाला मारता है तो वो अपने आप में ही रहता। अगर वो शरीर से कोई विरोध कर रहा है, तो इसका मतलब पता है; पता नहीं होता तो विरोध नहीं करता। जब कोई भी विरोध करे, तो समझ लेना इसे पता है — विरोधी तब पैदा हुआ जब उसके अनुसार नहीं हो रहा, इसलिए वो विरोध कर रहा है। समाधि पे वीडियो भी बनाई है, उसे देखना।

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(कुटिया में साधक) गुरु जी, आप परसों बोल रहे थे कि जब ये शरीर छोड़ के जाओगे तो कहां जाओगे, वो सोचो। मान लो मैं समझ लूं कि मैं परमात्मा के पास जाना चाहता हूं?

ये प्रश्न लेके बैठा करो — कहां से आए हो, कहां जाना है; जाना तो पक्का है, यार मैं जाऊंगा कहां? समझो मत। पहले तो प्रश्न ये है कि जाऊंगा कहां — ये मत समझो कि मैं परमात्मा के पास जाऊंगा। अरे भाई, परमात्मा का कोई अता-पता हो तो ना जाऊंगा। पहले तो यह प्रश्न खड़ा होगा कि शरीर छोड़ने के बाद जाऊंगा कहां। (कहोगे) मैंने ये पता कर लिया कि परमात्मा के पास जाना है — तो क्या मैं पता करने से परमात्मा तक पहुंच जाऊंगा? मैंने प्रधानमंत्री का पता लगा लिया, तो पता लगाने से थोड़ी ना (पहुंच गए); यात्रा करनी पड़ेगी ना; तब उसे कारण बताना पड़ेगा ना कि तुम उस लायक हो कि नहीं हो। पता लगाने से थोड़ी ना पहुंच जाओगे — और तभी तो (यह) काल्पनिक है। आप तो जब जाओगे, तब ना पता चलेगा। तो पहले तो प्रश्न ले बैठो कि मैं जाऊंगा कहां, और मैं यहां से निकलूं कैसे। अभी तो आप इस जगह खड़े हो कि मैं यहां से कैसे निकलूं। राग-द्वेष, जितने विचार सता रहे हैं, पहले वहां से निकलोगे, तब ना प्रश्न खड़ा होगा कि मैं जाऊंगा कहां। पहले तो आत्मिक चिंतन करो कि मैं अपने आप को पहले छुड़ाऊं; जब मैं छुड़ा लूंगा, तब प्रश्न खड़ा होता है कि अब मैं जाऊं कहां। (मैं कौन हूं, कहां से आया, कहां जाना है —) वो घुमाते रहो। (रात को विद्वेष के सपने आते हैं —) कोई बात नहीं, आने दो विचार। लेके बैठ जाया करो।

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(लाइव) समाधि मनुष्य के साथ एक ही बार घटती है या हमेशा घट सकती है — जैसे छह महीने-एक साल बाद फिर घट जाए?

एक बार घट जाए पहले! अरे, एक बार तो घट जाए, हमेशा क्यों घटेगी? ऐसा नहीं — एक बार घट गई तो घट गई। समाधि के बाद ज्ञान हो जाता है, बात खत्म हो जाती है।

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(कुटिया में साधक) अगर समाधि अवस्था में ही प्राण निकल जाएं, तो क्या होगा?

तो ज्ञान थोड़ी ना हो जाएगा। (अगर) समाधि में ही शरीर जाएगा, तो उसी से — समाधि में ही — (आगे) जन्म होगा।

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(कुटिया में साधक) मुझे लगता है जीवन की यात्रा अनंत से अनंत है और जीरो उसका सेंटर पॉइंट है (जिसे शांति या समाधि कहते हैं)। अच्छे कर्म करने वाला प्लस साइड — अच्छी जगह, अच्छी विचारधारा के लोगों में — जन्म लेता है; बुरे कर्म वाला माइनस साइड — दूसरी योनियों या वैसी विचारधारा के लोगों में — जाता है; ऐसे ही सर्कल घूमता रहता है। यह सर्कल टूटे कैसे? मुक्त हो गए तो फिर हम कहां होंगे — आत्मा कहीं तो होल्ड करेगी? और धरती पर 9-10 हजार करोड़ लोग जन्म ले चुके, अभी 900 करोड़ जिंदा हैं — बाकी की आत्माएं कहां गईं?

आप ये समझ रहे हो कि हम एक सर्कल में घूम रहे हैं; लेकिन इस सर्कल को तोड़ना अध्यात्म है। हमारा जन्म किसमें होता है? चाहिए में होता है। अगर मैं किसी के पास गया, तो चाहिए में गया — इतनी बात समझ में आती है? अगर चाहिए नहीं, तो क्यों जाओगे? तो ये सर्कल तभी टूटेगा जब चाहिए से आप मुक्त हो जाओगे। (फिर कहां होंगे —) तो आप मूल जगह होंगे ना फिर। अभी चाहिए में आप इस संसार में हो; तो कुछ नहीं चाहिए में (भी) आप कहीं तो रहोगे। छोड़ो-छोड़ो, परमात्मा छोड़ो, आत्मा (छोड़ो) — आप अपना कल्याण करो। हमें क्या मतलब परमात्मा से। अगर आप (चक्र) तोड़ना चाहते हो, तो टूट जाएगा। चाहिए में (संसार में) जाते हो, और कुछ नहीं चाहिए में टूट जाएगा। (कुछ ना चाहिए में, निर्विकार-निर्विचार अवस्था में देह छूटे तो) उसे शरीर नहीं मिलेगा; वो मूल जगह होगा। (मूल तो सर्वव्यापी है —) जब मूल हर जगह है, तो फिर आप चाहिए से क्यों मुक्त होना चाहते हो? मैं वही कह रहा हूं — आप सुनते हो, उससे क्या होगा? (बाकी आत्माएं कहां गईं —) आपको ये बात पता है कि अगर आप एक मिट्टी का ढेला उठा लो, तो उसमें करोड़ों-अरबों जीव हैं? आप एक बार सांस लेते हो, एक बार करवट बदलते हो, तो लाखों जीव मर जाते हैं — पता है? तो वो भी तो जीवात्मा हैं; उनकी आत्मा कहां होल्ड होती है? अब बोलोगे कि हम तो दिन में (कितनी) सांस ले रहे, वो आत्माएं कहां हैं? मैं वही तो कह रहा हूं — इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है। भैया, देखो, ये सब छोड़ो, ये सब बातों में दम नहीं है। मैं कहां हूं, और मुझे कहां पहुंचना है — बस, बात इतने में खत्म हो जाती है। आप जीवात्माओं की गिनती नहीं कर सकते, और अपने को कोई फैक्ट्री तो लगानी नहीं है — समझना इस बात को। और फिर जानकारियां ही जब सिर दर्द कर रही हैं, तो (इनमें पड़कर) हम अपने आप को फंसा लेंगे; कोई मतलब नहीं है।

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(कुटिया में साधक) आपने एक सत्संग में बोला था कि अध्यात्म में नर्क मांग लो — नर्क की लाइन में लग गए तो धुलना शुरू हो जाओगे। इसका अर्थ समझाइए।

नर्क का मतलब दुख। हम नर्क किसे समझते हैं? दुख ही ना? चाहे वह सुख हो चाहे दुख हो — सुख हम पाना चाहते हैं, दुख नहीं। तो अगर आज तक देखा जाए तो हमने सुख ही भोगने की इच्छा रखी है, दुख कभी नहीं भोगा है। तो ये दुख कौन भोगेगा? अगर आपने सुख भोगने की इच्छा रखी है और दुख भोग ही नहीं रहे हो, तो आप कभी छूट नहीं पाओगे। जब से समझने लायक हुए, सुख ही भोगे। अब एक काम करो — दुख अपना भोगो; कहो, मेरे किए गए कर्मों का परिणाम मुझे दो। क्योंकि दुख को आपने हमेशा अपनी बुद्धिमानी से हटाया है, दबाने का प्रयास किया है। तो दुख मतलब नर्क। और दुख में आप (अपने साथ) होते हो; सुख में भिन्न-भिन्न लोग होते हैं, दुख में सब साथ छोड़ भी देते हैं, दुख अकेले झेलना पड़ता है। और दुख में अपने आप को पाते हो। वो वीडियो फिर से देखो; जब तक समझ में ना आए, तब तक आप देखते रहो।

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(लाइव) नर्मदे हर गुरु जी। अपने आप में होने के लिए साधना कैसे करें? मार्गदर्शन करें।

बस, मैंने कहा ना — ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग।

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(लाइव) गुरु जी प्रणाम। मेरे घर में चोरी की कमाई और मांस-मदिरा का माहौल है। मैं खुद मेहनत की कमाई खाता हूं और इन सबसे दूर रहता हूं, पर रहना उसी घर में पड़ता है। क्या ऐसे माहौल में मेरी और मेरी पत्नी की भक्ति बच पाएगी?

माहौल का भी फर्क तो पड़ेगा ही पड़ेगा। भाई, जब तक पौधा तैयार नहीं हुआ है, तब तक पशुओं से बचाना है। और पौधा अगर तैयार हो गया, वृक्ष बन गया, तो वही पशु-पक्षी (उसकी) छांव लेंगे। शुरुआत में उन्हीं से बचाना है। तो शुरुआत में जिज्ञासु साधकों को माहौल का फर्क होता है।

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(लाइव, यूएसए से भारतीय नागरिक) काम-वासना पर विजय कैसे प्राप्त हो? बहुत कोशिश करने पर भी कुछ महीनों से स्वप्न दोष का शिकार हो रहा हूं।

अगर आप वैवाहिक जीवन में हैं, तो आप ईमानदारी से करें।

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(लाइव) गुरु जी प्रणाम। अहंकार नहीं छूटता। किसी भी काम को करते हैं तो ‘मैंने किया’ — यह भाव बना रहता है। कृपया मार्गदर्शन करें।

बस, किसी को नीचा दिखाने का भाव — (यह) अहंकार है।

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