आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रवचन PV02-0018 · भाग 2

मन्नत नहीं, चरित्र अपनाओ — सूरत नहीं सीरत, और शील क्या है

15 जून 2026 · हर मोड़ पर बदलाव है, वही तो ज़िंदगी है

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मुख्य बातें

मन्नत की बातें फालतू हैं

प्रैक्टिकल में आओ, थ्योरी लेके मत घूमो। मैं आपको एक बात बता जाता हूं। मैं सुनता था कि इस मंदिर जाने से ये मन्नत पूरी होती है। तो मैं बोला — अगर कोई मन्नत पूरी होती है, तो मैं अगर जाके मंदिर में कुछ मांगूंगा, तो बोल दूंगा कि पूरे विश्व का सम्राट बना दे। इससे कम क्या मांगना? है तेरी ताकत? नहीं, कुछ नहीं। फालतू है, एक नंबर की फालतू बात है। चाहे कोई भी जगह हो, अगर कोई कहता है कि यहां जाके मन्नत पूरी होती है, तो मैं तो कह रहा हूं — पूरे विश्व का सम्राट; इससे कम क्या मांगना?

भिखारी की तरह क्या गाजर मांगे, मूली मांगे, नौकरी मांगे? अरे, तू चौराहे पर मांग ले, मंदिर में क्या जा रहा है? मंडी पे खड़ा हो जा — भाई, मूली दे दो — कोई ना कोई तेरे हाथ पे रख ही देगा। मैं ये कहना चाहता हूं कि ऐसा कुछ नहीं है, फालतू बातें हैं ये सब।

मंदिर शांति का केंद्र था, व्यापार का अड्डा नहीं

मंदिर शांति का केंद्र है, लेकिन लोग उसका अलग उपयोग करने लगे। मंदिर एक ऐसी जगह है कि गांव के बाहर बनाया जाएगा। किसी एक के घर पे सब नहीं जा सकते, क्योंकि मंदिर एक ऐसी जगह रहेगी जहां सब जाके बैठ के आपस में ज्ञान चर्चा कर सकते हैं, अपनी समझ के अनुसार, और शांति से बैठ सकते हैं; कोई किसी को रोकेगा-टोकेगा नहीं। लेकिन आज व्यापार का अड्डा बना दिया। हमारे पूर्वजों ने बनाया था तो उसके पीछे कुछ उद्देश्य था, लेकिन लोगों ने उसको बदल दिया, व्यापार का अड्डा बना दिया।

और ऐसा ही होता है। जैसे बुद्ध ने मूर्ति का विरोध किया, लेकिन बुद्ध की ही मूर्ति बन गई, बुद्ध के कई मंदिर हैं। अब बुद्ध की दया-करुणा को लोग नहीं अपना रहे हैं। बात करेंगे बुद्ध की, ध्यान की, लेकिन लोगों से गालियों से बात करेंगे। क्या बुद्ध को आपने समझा? बुद्ध के नाम से धंधा करो, बुद्ध के नाम से व्यापार करो, बुद्ध के नाम से लोगों को गालियां दो! बुद्ध ने तो अंगुलिमाल को भी अपनाया, जो तलवार ले खड़ा हो गया था। उन्होंने तो कहा — दया-करुणा में जियो, प्रेम में जियो।

सूरत नहीं, सीरत अपनाओ

तो ज्यादातर यह देखने को मिला है कि लोग आवरण पकड़ लेते हैं, उनकी बातें छोड़ देते हैं। तो किसी की सूरत नहीं, सीरत — चरित्र — अपनाओ। अपने इष्ट की बस सूरत को मत अपनाओ; सूरत के पीछे चरित्र है। उस सूरत का सम्मान उस चरित्र की वजह से किया जा रहा है, ना कि उस सूरत का। राम की सूरत के पीछे, कृष्ण की सूरत के पीछे, ये जितने भी — बुद्ध, महावीर, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, मीराबाई, नरसिंह मेहता, कबीर, गुरु नानक — इनके पीछे चरित्र है। चरित्र खूबसूरत है, इसी वजह से वो खूबसूरत हैं।

अब आप क्या करते हो? शरीर को पकड़ लेते हो, चरित्र को पकड़ते ही नहीं, क्योंकि कष्ट उठाना पड़ता है। चरित्र अगर आप अपनाओगे, तो उसमें फिर जीना पड़ेगा। तो चलो यार, सूरत अपना लेते हैं — इससे मान खड़ा होगा कि मैं इनका भक्त हूं। अब उनके भक्त बोल के अपने अहंकार को खड़ा कर रहे हो और उस झुंड में चले जा रहे हो। अपने में बदलाव लाना भी एक बड़ा काम है।

सबसे सरल और सबसे कठिन

इस दुनिया में सबसे सरल क्या है, पता है? खा-पीकर जीना। इस संसार में सबसे सरल है जीना — खाना-पीना है, तो जलील होने से क्या मतलब; तुम जूते मारो, भोजन दो। आपके आमने-सामने लोग नहीं रहते क्या, जो परिवार में ऐसे जूते खा रहे हैं, पड़े हैं? और सबसे जटिल, सबसे कठिन है समाज हित के लिए कुछ कार्य करना, क्योंकि करने के लिए योग्य बनना पड़ेगा। और सबसे सरल है खा-पी के जीना।

समाज में आप ऐसे लोगों को देख रहे हो — दुत्कारते हैं, बेटे भगा रहे हैं, लात-जूते मार रहे हैं, तो भी वो खा-पी के पड़े हैं। मैं ये कह रहा हूं कि सबसे सरल यही है। आपको मुश्किल इसलिए लग रहा है कि आप करने वाले हो।

मजबूरी को शील का नाम मत दो

ये कौन सा शील है, कौन सा संतोष — भोजन के लिए तू जूते खा रहा है? कुछ करने के लिए अगर तू जूते खाता, समर्थवान होने के बाद भी, जैसे महापुरुष लोग खाए, तब उसको शील कहते हैं। तू अपनी मजबूरी को, लाचारी को शील कह रहा है। महात्मा बुद्ध एक बार भिक्षा लेने गए थे, तो एक माई गुस्से में थी और उसने उनके मुंह पे थूक दिया। उन्होंने कुछ भी नहीं कहा, और ऐसे पोंछ के सहज में निकल गए — उसको शील कहते हैं।

भैया, अपनी मजबूरी को, लाचारी को शील का नाम मत दे देना। आप रोटी के लिए जूते खा रहे हो, कपड़े के लिए जूते खा रहे हो, व्यवस्था के लिए जूते खा रहे हो। अरे, आप जूते खा रहे हो समाज में कुछ करने के लिए, और फिर भी नहीं बोले, और आपकी सामर्थ्य भी है — तब क्या बात है! अगर आप समर्थवान नहीं हो, तो फिर आपके जूते खाने का कोई मतलब नहीं है।

शब्दों में आप जूता मत पकड़ लो; कहने का मतलब है — अपमान का घूंट पीते हुए आप काम कर रहे हो, कि अगर मैं इनको जवाब दूं तो मेरी ऊर्जा यहां लग जाएगी। जो व्यक्ति अपमान का घूंट पीते हुए, अपने आप को बचाते हुए काम करता है, उसे महान व्यक्ति कहा जाता है, उसे शील कह सकते हो।

विष मतलब अपमान का घूंट

जैसे आदि देवताओं में ब्रह्मा, विष्णु, महेश में सबसे श्रेष्ठ किसे माना गया? शंकर को। कहा जाता है कि जब मंथन हुआ तो उसमें से विष निकला; सबने अस्वीकार किया, उन्होंने विष को पिया। विष का मतलब होता है अपमान का घूंट, जहर नहीं। ये संसार अगर किसी को अस्वीकार करता है, तो क्या है — अपमान। जिसने अपमान सहते हुए भी समाज में कार्य किया, अपनी ऊर्जा को सही जगह लगाया, उसे श्रेष्ठ कहा जाता है — लेकिन सामर्थ्य होने के बाद।