प्रवचन PV02-0020 · भाग 2
पड़े रहो — पर मजबूर बनके नहीं, संपन्न होकर; पड़े रहने में ही दिखेगा कहां-कहां अटके हो
27 मई 2026 · अंतर्मुखी कैसे हो? अंतर्मुखी होने का रहस्य
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मुख्य बातें
- पड़े रहो — कुछ ना करने में; लेकिन मजबूर बनके नहीं, सामर्थ्यवान और संपन्न होकर, नहीं तो चिंता और लाचारी खाएगी।
- 20-30 साल और बाहर दोगे तो बस एक बंगले से दो, करोड़ से दो करोड़ होंगे; एक दिन जिंदा या मुर्दा काम छूटना ही है — तो जितना करना था कर लिया, अब पड़े रहो।
- कुछ करना सबसे सरल है, चुपचाप पड़े रहना सबसे कठिन — क्योंकि पड़े रहने में आप होते हो और सारी यादों का सामना करना पड़ता है।
- पड़े रहोगे तभी पता चलेगा कि किससे कितना राग-द्वेष, मोह-आसक्ति है — मशीन कहां बिगड़ी है, यह खोजे बिना उसे बना नहीं सकते।
- प्रतिक्रिया मत दो, किसी को टाइम-डेट-वादा मत दो; भाव ऊपर-नीचे होगा, टिकेगा नहीं — पर लक्ष्य पर डटे रहो। पहले आत्मिक कल्याण, फिर पूरी जिंदगी काम ही करेंगे।
पड़े रहिए — सामर्थ्यवान बनकर
बहिर्मुखी में है क्या? घुमा-फिरा के वही काम, वही लाभ — और वो लाभ कहां तक? शरीर तक। अगर लगता है कि शरीर की जरूरत के लिए कुछ करना है, तो करिए। लेकिन लिप्त कहीं मत होइए। पड़े रहिए अपने आप — कुछ ना करने में पड़े रहिए। चाहे लेटे रहो, चाहे बैठे रहो, आपके ऊपर है; कोई आसन नहीं है।
मजबूर बनके मत पड़े रहिए, सामर्थ्यवान बनकर पड़े रहिए। मजबूर बनके पड़े रहेंगे तो चिंता खाएगी, लाचारी खाएगी, उदास रहेंगे। संपन्न होकर पड़े रहिए। एक आदमी ज्यादा से ज्यादा कितना सोएगा? सोते-सोते थक जाएगा, बैठे-बैठे थक जाएगा — अपने आप को थका दो। बाहरी कामों में अपने आप को मत उलझाइए; उलझे रहेंगे तो अपने को देख ही नहीं पाएंगे, काम को देखेंगे, लोग वाहवाही करेंगे और उस वाहवाही में आप बह जाएंगे। करके तो देख लिया ना — उसका परिणाम शुरुआत से आखिर तक पता है; अब पड़े रहके देख लो।
एक दिन काम छूटना ही है
आपने 20 साल, 30 साल दिए; 20 साल और दोगे, 30 साल और दोगे, तो क्या होगा? वही होगा — एक बंगला से दो बंगले हो जाएंगे, चार हो जाएंगे, 10-20 गाड़ियां हो जाएंगी, बैंक बैलेंस करोड़ से 2 करोड़ हो जाएगा। बीमारियां, टेंशन भी आएंगी — वो तो सबको पता है; मैं पॉजिटिव में बात कर रहा हूं। बस बाहरी चीजें बढ़ जाएंगी।
एक ना एक दिन आपका काम छूटेगा — या जिंदा या मुर्दा; क्योंकि शरीर एक ऐसी अवस्था में आएगा कि आप काम करने लायक ही नहीं रहेंगे। तो आप देख लीजिए कि मुझे जितना करना था कर लिया, अब चलो पड़े रहते हैं। पड़े रहोगे तो अपने आप में होगे। पुरानी यादें तो अभी भी आपके अंदर हैं; अपने आप को कहीं लिप्त किया है इसलिए दबी हैं। उनका सामना कभी ना कभी करना पड़ेगा — तो अभी करो ना, अभी तो मजबूती है। जितना भरना था भर लिया, अब आगे से भरना बंद करो; जो भर चुका है उसी पर काम करो।
पड़े रहने में अपने आप यात्रा होगी
पड़े रहो, बस; मानसिक यात्रा अपने आप होगी। ज्ञान तो आप सत्संग के द्वारा समझ ही रहे हो — तो पड़े रहो, सत्संग सुनो, पड़े रहो। अब आपके साथ एक नींद है; कितनी आएगी? मैं महीनों-महीनों ऐसे कमरे में पड़ा रहता था। बाहरी भारी मेहनत करते हैं, तब अच्छी नींद आती है; भारी काम ही नहीं होगा, तो नींद भी कम आएगी, और अपने साथ रहने का ज्यादा टाइम मिल जाएगा।
आखिर साधना आप किस लिए करते हो? अपने साथ, अपने स्व में स्थिर होने के लिए ना? तो पड़े-पड़े रहने में ही स्व में स्थिर हो जाओगे। जब पड़े रहोगे, तब आपको पता चलेगा कि मेरा अटैचमेंट कितना है, राग-द्वेष कितना है, मोह-आसक्ति कितनी है, इच्छा-अपेक्षा कितनी है। अपने आप को हमेशा बाहर उलझा के रखोगे, तो कैसे पता चलेगा?
सबसे कठिन है चुपचाप पड़े रहना
लोग समझते हैं पड़ा रहना सबसे सरल है; नहीं, सबसे सरल है कुछ करना — सबसे कठिन है पड़े रहना, सामर्थ्यवान होने के बाद। मैं आलसियों की, मजबूर लोगों की बात नहीं कर रहा। संपन्न होने के बाद पड़े रहना आसान नहीं है, क्योंकि पड़े रहने में आप होते हो, और आपकी पूरी यादें होती हैं; उनका सामना करना पड़ता है। पड़े रहने में मानसिक यात्रा होती है। चुपचाप पड़े रहना — ये सबसे कठिन है।
जब आप शरीर से करना बंद करते हो, तो खाली हो जाते हो, और जितना आपने पांच इंद्रियों के द्वारा संचित किया है, उन यादों में मानसिक रूप से जाने लगते हो। राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, किससे कितना अटैचमेंट है — सब आने लगता है।
पहले खोजो, मशीन बिगड़ी कहां है
क्या वो चीज अपने आप छूटेगी? अपने आप नहीं छूटेगी; उसके लिए काम भी होगा। पहले आप समझेंगी, तब ना छुड़ाएंगी। एक मशीन बिगड़ गई — क्या अपने आप ठीक हो जाएगी? नहीं, आपको ठीक करना पड़ेगा। और सीधा ठीक कर सकते हो? नहीं, पहले खोजना पड़ेगा कि बिगड़ी कहां है। मान लो आपको बनाना भी आता है, सारा सामान आपके पास है, टैलेंट है — लेकिन आप ये नहीं खोज पाए कि मशीन कहां बिगड़ी है, तो कभी बना सकते हो?
पड़े रहने में सब पता चलेगा — किससे कितना अटैचमेंट है, क्यों है; मैंने उसके लिए क्या किया, उसने मेरे लिए क्या किया, क्यों किया; किस स्थिति में मेरे साथ कैसा व्यवहार किया, क्यों किया — सब समझ में आएगा। कब? जब आप अपने आप को खाली छोड़ोगे। लेकिन आप हमेशा अपने आप को बिजी रखते हो।
बहिर्मुखी यात्रा ही अंतर्मुखी की निमित्त है। जिस दिन सब छूट गया — बहिर्मुखी खत्म, अंतर्मुखी यात्रा भी खत्म — बचे आप, स्व; उसके बाद ही ज्ञान होता है। ये यात्रा आपको कभी ना कभी करनी ही है; चाहे आप जप करो, आप ही को करनी पड़ेगी।
प्रतिक्रिया नहीं, किसी को वादा नहीं
कोई प्रतिक्रिया ही नहीं देनी है, क्योंकि प्रतिक्रिया देंगे तो लिप्त हो जाएंगे। सहयोग की भावना रखिए, मानवता की भावना रखिए; जरूरत लग रही है तो सहयोग कर दीजिए — लेकिन फिक्स मत करिए, उसे अपने पर निर्भर मत कर दीजिए, नहीं तो फिर आप अंतर्मुखी नहीं रह पाएंगे। आप किसी को टाइम दे दो कि कल हम इतने बजे मिलेंगे — क्या आपको लगता है कि आप अपने आप में हो पाएंगे? हो ही नहीं पाएंगे। ये समय के पार की यात्रा है; किसी को वादा मत दीजिए, टाइम मत दीजिए, डेट मत दीजिए। तभी आप अंतर्मुखी हो पाएंगे।
भाव नहीं टिकेगा, पर डटे रहना है
भाव तो देश-काल-स्थिति पर बदलेगा; एक जैसा भाव कभी रहा क्या? बहिर्मुखी नहीं रहा, तो अंतर्मुखी भी नहीं रहेगा — अंतर्मुखी भी तो एक यात्रा है। उसका अभ्यास ही करना है। उतार होगा, चढ़ाव होगा — कभी निराशा, कभी खुशी, कभी प्रसन्नता, कभी आनंद की झलक, कभी एकदम घुटन, कभी बेचैनी; उनकी यादें तड़पा देंगी। लेकिन हमें डटे रहना है, हर स्थिति-परिस्थिति में अपने आप को रखना है।
भाव कभी नहीं टिक सकता। भाव से भी आप मुक्त होंगे, तभी तो स्वभाव में आएंगे। जब तक भाव है, इसका मतलब आप कहीं ना कहीं हैं — चाहे शरीर के द्वारा, चाहे मानसिक। भाव के लिए एक आधार चाहिए — कोई दूसरा मौजूद है, तभी तो भाव है; बिना आधार के भाव पैदा नहीं हो सकता। भाव छूटेगा, तभी ज्ञान होगा।
तो चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए, अपने आप को बनाए रखना है — मैं जब तक लक्ष्य तक नहीं पहुंचूंगी, तब तक रुकने वाली नहीं; मुझे अपने आप को कहीं लिप्त नहीं करना है। मेरा एक ही काम है — पहले आत्मज्ञान, आत्मिक कल्याण; उसके बाद पूरी जिंदगी बची रहेगी, काम ही करेंगे। जब मेरी उपलब्धि हो जाएगी, उसके बाद मैं काम ही करूंगा।