आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रवचन PV02-0019 · भाग 2

अंतर्मुखी कैसे हों — कहीं लिप्त मत होइए, कोई फिक्स सेवा मत लीजिए, समय में मत बंधिए

27 मई 2026 · अंतर्मुखी कैसे हो? अंतर्मुखी होने का रहस्य

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मुख्य बातें

बहिर्मुखी यात्रा में क्या मिला

जीवन में बहिर्मुखी यात्रा की, तो आपको बहुत कुछ मिला — मोह, आसक्ति, बंधन, राग-द्वेष, इच्छा-अपेक्षा, अटैचमेंट, स्नेह, प्यार। इसके पीछे उनको आपसे कुछ मिल रहा था, आपको उनसे कुछ मिल रहा था। उस मिलने में बहुत कुछ मिला, और उसके पीछे हर तरीके से दुख भी — क्योंकि जब आप किसी के लिए कुछ करोगे, तो हमेशा वही स्थिति तो नहीं रहेगी। जीवन में उतार आएगा, चढ़ाव आएगा।

जब चढ़ाव आया, हमने ज्यादा किया, तो वाहवाहियां मिलीं; और जब हम कम करने लगे, तो जो लोग प्यार करते थे, स्नेह करते थे, वही झकझोरने लगे। जब उनकी कामनाएं मेरे द्वारा पूरी हुईं, तो हम उन्हें बड़े प्यारे लगे — मेरे जैसा उनके जीवन में कोई नहीं। लेकिन स्थिति कभी ना कभी बदलेगी — चाहे मानसिक बदले, चाहे शरीर से। जब मैं थकूंगी, तो जरूर उन लोगों से दूर होकर एकांत में जाकर कुछ चिंतन होगा; और जब यह स्थिति आती है, तो वो लोग झकझोरने लगते हैं।

जो सहायक थे, वही खींचते हैं

अब आप अंतर्मुखी होना तो चाह रहे हो, लेकिन वो लोग नहीं जाने दे रहे। बहिर्मुखी में वही लोग सहायक थे, लेकिन अंतर्मुखी में वही लोग आपको खींच रहे हैं — दुखदाई है आपके लिए। वो बर्दाश्त नहीं कर पा रहे, क्योंकि जब आप अंतर्मुखी जाएंगे, तो आपसे उन्हें जो मिल रहा था वो मिलना बंद होने लगेगा; और आपसे अच्छा ऑप्शन उनके पास नहीं है। अगर आपसे अच्छा ऑप्शन होता, तो वो खुद आपको छोड़ देते। ये प्रकृति ऐसी ही है।

यहां लोग ऑप्शन ढूंढते हैं। हर व्यक्ति, हर जीव आगे ही भागना चाहता है — चाहे कुछ भी हो, बस मैं आगे पहुंच जाऊं। जानवरों को भी देख लो — चारा डालो, टूट पड़ेंगे; सबसे पहले मैं खाऊं। तो अंतर्मुखी अगर आप होना चाहते हो, तो देखो कि बहिर्मुखी में आपने अपने आप को बहुत उलझा दिया है, और अब लोग आपको किसी ना किसी तरीके से — मानसिक या शारीरिक — खींच रहे हैं।

बिना पूछे लिप्त होना

हमारी आदत हो गई है — जब से हम समझने लायक हुए, जीवन में एक ही बात है: काम करना, उचित तरीके से, जल्दी से जल्दी करके लोगों को बता देना। उससे लगता है कि मैं कुछ हूं। एक व्यक्ति 2 दिन में काम कर रहा है, मैं उसे एक दिन में करवा दूं, तो लगता है — यार, मैं कुछ हूं। दो दिन में होता तो क्या चला जाता? बहिर्मुखी में मिल गया, लेकिन अंतर्मुखी को क्या मिला?

वो व्यक्ति आपसे सलाह भी नहीं मांग रहा, तो भी आप उसे सलाह दे रहे हो। हम अंतर्मुखी होने वाली जगह — आश्रम हो चाहे कुटिया — वहां भी जाते हैं, तो वहां भी काम में अपने आप को लिप्त कर देते हैं; बहुत तेजी से काम करना चाहते हैं। तो अंतर्मुखी अगर आप रहना चाहते हो, तो कुछ ना करने में रहो। और जब कोई काम के बारे में सलाह ले, तो अपना परिचय बता दीजिए कि मुझे इतनी-इतनी काम की जानकारी है; अगर कभी मेरी जरूरत लगे, तो मैं मौजूद हूं।

गड़बड़ी ये हो रही है कि हम जबरदस्ती लिप्त होना चाहते हैं। दो लोग कुछ काम की बातें करते हैं, हमें लगता है ये भी गलत है, वो भी गलत है, और हम बिना पूछे उसमें घुस जाते हैं। वो लोग स्वीकार कर लें, तो हमारे अंदर राग हो जाता है कि दोनों नासमझ थे, हमने समझा दिया; और ना मानें, तो द्वेष हो जाता है। काश वो लोग सहयोग मांगते, तब आप करते — तब वो बहुत अच्छे तरीके से समझते, आपको धन्यवाद भी देते, और आपके अंदर कर्ता का भाव भी प्रकट नहीं होता; एक सहयोग का भाव प्रकट होता, क्योंकि उनके मांगने के बाद आपने दिया है। कोई नदी में गिर गया और आपको तैरना आता है, तो बचाना चाहिए — वो मानवता की बात अलग है। लेकिन जब आप कहीं साधना करने जाते हो, तो वहां एक दायरा होता है।

कोई फिक्स सेवा मत लो

जिस लायक आप हो, सेवा के लायक, वो वहां बता दीजिए कि भाई, मेरी जरूरत हो तो आप बोलना; हम अंतर्मुखी होना चाहते हैं। किसी भी काम में अपने आप को लिप्त मत करो, कोई फिक्स सेवा मत लो। जरूरत आएगी तो हम कर देंगे, लेकिन हमारे ऊपर आप निर्भर मत रहना।

इसीलिए मैं यहां किसी को व्यक्तिगत सेवा में उलझाता नहीं हूं। मिलकर बनाओ, खाओ; मैं अपना बनाता-खाता हूं, आप लोग अपना बनाओ-खाओ। अगर फिक्स सेवा दे देंगे, तो लोग उस आदमी पर निर्भर हो जाएंगे, और उस आदमी को टेंशन हो जाएगी कि मुझे इतने बजे उठना है। रात में जब वो अपने आप में होने का समय था, उसे सोने के पहले ही टेंशन है कि इतने बजे उठ के वो काम करना है। मैं इसीलिए किसी को काम नहीं देता कि आप फ्री रहो।

जब आप कोई काम पकड़ लेते हो, तो मानसिक रूप से आप उसी में रहते हो। अगर सुबह 7 बजे का कोई काम पकड़ लिया, तो 24 घंटे आप 7 बजे में ही रहोगे; कभी अपने आप में नहीं हो पाओगे। दिन में एक घंटा भी सेवा का बांध लिया, तो बाकी 23 घंटे भी आप अपने आप में कभी नहीं रह सकते, क्योंकि वो एक घंटा परेशान करेगा। माइंड में जब तक कुछ फिक्स है कि मुझे इतने समय में ये करना है, वो कभी अंतर्मुखी हो ही नहीं सकता — चाहे जिंदगी में एक मिनट का भी काम क्यों ना ले। और सामने वाले को सलाह चाहिए तो दो, नहीं मांगे तो जाने दो। वो क्या कर रहा है? बहिर्मुखी का ही काम कर रहा है। बिगड़ ही जाएगा तो क्या होगा? बन ही जाएगा तो कौन सा उससे आत्मिक कल्याण हो जाएगा?

समय के पार की यात्रा

अंतर्मुखी होना है तो अपने आप को समय में मत रखिए, क्योंकि ये समय के पार की यात्रा है। आत्मिक कल्याण के लिए काम तभी कर पाओगे, जब अपने आप को समय में नहीं बांधोगे। इसलिए आज तक मैंने सत्संग का भी समय नहीं बांधा — शाम को करेंगे; शाम कभी 6 बजे होती है, कभी 7 बजे, कभी 8 बजे। आपको इंतजार करना है तो करो, नहीं तो जाओ। जरूरत होगी तो रुकोगे; नहीं रुके तो जरूरत नहीं है — और जरूरत ही नहीं, तो लेके भी क्या करोगे? उसका उपयोग ही नहीं कर पाओगे।

जिज्ञासा है तो आदमी सालों पड़ा रहेगा; और जिज्ञासा नहीं है, तो उसके लिए एक बहाना है कि मैं गया था, नहीं मिला — उसको चाहिए ही नहीं था। आदमी एक प्रश्न के उत्तर के लिए जिंदगी भर खड़ा हो सकता है।

जो सबसे महत्वपूर्ण है, उसके लिए छुट्टी मिल जाती है

किसी का बालक बीमार हो जाए, तो वो सारा काम छोड़ के अपने बच्चे का इलाज कराता है। पहले बोलता था छुट्टी नहीं मिल रही; अब उसे छुट्टी ही छुट्टी है, अस्पताल में पड़ा रहता है। कहां से मिल गई छुट्टी? क्योंकि उसके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण उसका बेटा है — बेटा ही नहीं, तो सब करके क्या करेगा?

अगर मेरे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण आत्मिक कल्याण होगा, तो मैं कहीं और जाऊंगी ही नहीं। अगर कहीं जा रही हूं, तो इसका मतलब ये ऑप्शन है, अभी मुझे पक्का नहीं हुआ है। अंतर्मुखी आप तभी हो पाएंगे जब आत्मिक कल्याण के अलावा कोई काम नहीं। कोई काम आ गया और मुझे उसका अनुभव है, तो मैं जरूर सामने वाले की सहायता कर दूंगी; सहयोग की भावना बनी रहे कि जब भी मेरी जरूरत है, मैं तैयार — लेकिन अब मुझे कुछ नहीं करना है, मुझे निकलना है; मुझे जितना करना था, मैंने कर दिया। अंतर्मुखी तभी हो पाओगे जब आप कुछ ना करने में रहो।