सत्संग PV03-0027 · भाग 3
ज्ञान क्या है? — किसी और का ज्ञान आपके लिए जानकारी है, अनुभव को ज्ञान बोलते हैं
11 अक्टूबर 2026 · ज्ञान क्या है ? #प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान
चैनल: आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान साधना
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मुख्य बातें
- किसी और का ज्ञान किसी और के लिए जानकारी होता है।
- अनुभव को ज्ञान बोलते हैं — स्वयं के अनुभव को।
- आत्मज्ञान तब होगा जब आप निर्विकार होगे — पूरी तरह ईमानदारी अपना के बेईमानी का त्याग करोगे।
- जो असफल व्यक्ति होते हैं दूसरों में कमियां देखते हैं; जो सफल व्यक्ति होते हैं वो अपनी कमियों को देख के उसे दूर करने का प्रयास करते हैं।
- तीन तरह से सेवा होती है — धन सेवा, तन सेवा, मन सेवा मतलब ज्ञान सेवा; सेवा करने के लिए योग्यता भी तो होनी चाहिए।
- पक्का कर लीजिए कि मैं सीखने वाला हूं कि सिखाने वाला हूं — यह पक्का कर लो तो आप भटकने से बच जाओगे।
जानकारी और ज्ञान
देखिए, जो भी हमें जानकारियां मिलती हैं, समाज से मिलती है। समाज मतलब लोग — मेरे से जो अलग लोग हैं, जो मेरा में है, वहां से मुझे जानकारियां मिलती हैं। इतिहास में लोगों ने अलग-अलग तरीके से अनुभव किया है और अलग-अलग तरीके से ज्ञान को बोला है। बातें वही बता रहे हैं, लेकिन जो तरीका था, अपना-अपना अनुभव — अलग-अलग तरीके से अनुभव किए, अलग-अलग तरीके से उन्होंने लिखा। तो उनके लिए तो ज्ञान हुआ।
वह भी कहीं से जानकारी लिए। समाज से जो महापुरुष हुए, उन्होंने कहीं समाज से जानकारी लिया और उस जानकारी के द्वारा उस स्तर पर पहुंचने के बाद उन्होंने अपने तरीके से समाज को ज्ञान दिया। लेकिन वो ज्ञान आपके लिए ज्ञान नहीं है। वो ज्ञान आपके लिए जानकारी है। किसी और का ज्ञान किसी और के लिए जानकारी होता है।
पते पर जाओगे तब ज्ञान होगा
जैसे मान लीजिए आप कहीं से जाकर आए और आपने वहां का पता लोगों को दिया, तो आपके लिए तो ज्ञान है, लेकिन लोगों के लिए तो अभी जानकारी है। अब उस पते पर जो यात्रा कर ले, उसके लिए ज्ञान हो जाएगा। और वह जब किसी को और पता देगा तो कुछ और तरीके से देगा। एक व्यक्ति को बोलो कि कहीं जाके और वहां के बारे में आकर लिखे, तो वो लिखेगा। फिर कोई और व्यक्ति जाएगा, वो आएगा तो कुछ और लिखेगा। मतलब एक ही बताने वाले हैं, लेकिन अपने-अपने तरीके से बताएंगे। तो आप किसी के ज्ञान को अपना ज्ञान मत समझो।
जैसे किसी ने कह दिया यह चीज ऐसा है, मगर आपने जब तक उपयोग नहीं किया, कैसे समझ पाओगे कि वह चीज ऐसा है या वो वस्तु ऐसा है? जैसे किसी ने कह दिया मिर्ची तीखी है, लेकिन आपने कभी तोड़ के खाया नहीं, तो कैसे पता चले पक्का है कि तीखी है? कोई कह दिया कि नहीं, खट्टी होती है; कोई कह दिया मीठी होती है — तो क्या करोगे?
ज्ञान कहने का मतलब अनुभव — खुद का अनुभव। अगर किसी ने आपको पता बताया और उसका ज्ञान लेना है, तो उस पते पर आपको खुद जाना पड़ेगा और उस पूरे माहौल को समझना पड़ेगा — क्या-क्या जो इसमें लिखा है, क्या-क्या इसमें सही है, क्या-क्या गलत है। गलत भी हो सकता है, सही भी हो सकता है, कुछ भी हो सकता है; यह तो जाने के बाद पता चलेगा। कहने का मतलब यह है, अनुभव को ज्ञान बोलते हैं — स्वयं के अनुभव को ज्ञान बोलते हैं।
आत्मज्ञान कब होगा
तो एक समाज का ज्ञान है, जो जानकारी है, वह कभी न कभी बदलता रहता है — जैसे किसी का पद, आज इस पद पर कोई और बैठा है तो कल कोई और बैठेगा; परिवर्तन होता रहता है। लेकिन एक ज्ञान है आत्मज्ञान — आत्म ज्ञान, खुद का ज्ञान, जिसे कहते हैं तत्व ज्ञान।
वो कब होगा? वो जब आप निर्विकार होगे। पूरी तरह अपने आप को निर्विकार कर लोगे, पूरी तरह ईमानदारी अपना के बेईमानी का त्याग करोगे। किसी भी लालच के चक्कर में आकर बेईमानी नहीं करोगे। पूरी तरह लालच का त्याग करोगे, दिखावा का त्याग करोगे, मान का त्याग करोगे, लोभ का त्याग करोगे। लोगों का अपमान करने का जो भाव है, उसका त्याग करोगे। बड़ा बनने का त्याग करोगे, छोटा बनने का त्याग करोगे, कुछ बनने का त्याग करोगे।
कुछ करना है, कुछ बनना नहीं है। करने में बन जाते हो, वह बात अलग है, लेकिन कुछ करने का भाव अपनाओ — कि मुझे समाज में कुछ करना है, चाहे धन सेवा, चाहे तन सेवा, चाहे मन सेवा मतलब ज्ञान सेवा।
बिना अनुभव के जानकारी से अज्ञानता फैल रही है
तो कहने का मतलब है, ज्ञान उसे कहते हैं जो आपका व्यक्तिगत उस पर अनुभव हो। ज्यादातर क्या होता है कि हम दूसरे की बताई हुई बातों को एक दूसरे तक पहुंचाते हैं। उस व्यक्ति के बारे में हम खुद नहीं जानते। किसी ने बोला और उस व्यक्ति के बताए हुए बात पर हम लोगों को उसके बारे में बताने लगे — चाहे वो बड़ाई हो, चाहे बुराई हो। क्या पक्का है? हो सकता है वो व्यक्ति उसके बारे में गलत आपको जानकारी दिया हो और आप समाज में पहुंचा रहे हो।
तो ज्यादातर यही होता है हमारे समाज में — और हम भी उस समाज से हैं, समाज हमसे है — हम लोग बिना सोचे-समझे, बिना अनुभव किए एक दूसरे को बस जानकारियां दे रहे हैं। और इससे क्या होता है? अज्ञानता फैल रहा है। आप उस जगह पर पहुंचे नहीं और उस जगह के बारे में आप विवरण देने लगे।
भोजन किया हो तो अलग-अलग तरीके से लिखेगा
आप समझिएगा कि अगर कई लोग भोजन करें और सबको बोलो भोजन के बारे में लिखें, तो क्या सब एक ही जैसे लिखेंगे? नहीं। भोजन एक ही है, करने वाले अनेक हैं, लेकिन अनेक तरह से लिखेंगे; लेकिन मतलब वही बताएंगे। लेकिन जिसने उस भोजन को किया नहीं, अगर उसको बोलोगे लिखने के लिए तो क्या करेगा? वो अनेक लोगों में से किसी का नकल ले लेगा। वो नकल से बताएगा, और एक जैसा लिखेगा; इधर-उधर वो नहीं लिख सकता।
जो खाया होगा, वो जितनी बार लिखेगा, अलग-अलग तरीके से लिख देगा। लेकिन जो नकल होता है, वो एक ही जैसा बोला जाता है। जब कोई जानकारी उठा के जानकारी बोलता है तो उसका दायरा होता है। जब आत्मज्ञान से कोई बोलता है, तो जब भी बोलेगा, बोलने का तरीका बदलता रहता है; वो एक जैसा नहीं बोल पाता। तो ज्ञान मतलब खुद का ज्ञान। एक ज्ञान है समाज का, जो परिवर्तन है; और एक ज्ञान है स्वयं आपका — परम ज्ञान, आत्मज्ञान, तत्व ज्ञान।
पांच तरह से हम बाहर उलझे हुए हैं
अब वह ज्ञान कैसे होगा? हम पांच तरह से बाहर उलझे हुए हैं — शब्द से, दृश्य से, गंध से, रस से, स्पर्श से। पांच इंद्रियों के द्वारा हम राग-द्वेष में अपने तरीके से सुख ढूंढ रहे हैं — कभी वस्तुओं में, कभी किसी जीव में। कभी किसी से मिलता है उम्मीद से ज्यादा तो हम उसका सम्मान करते हैं; नहीं मिलता तो अपमान करते हैं। योग्यता से ज्यादा हमने उम्मीद बना के रख दी है। अधिकार से ज्यादा हम काम करना चाहते हैं। जिसका हमारे जीवन में कोई जरूरत ही नहीं है, वो हम जुटा रहे हैं — बस मान के लिए, सम्मान पाने के लिए, बड़ा बनने के लिए।
कहीं ना कहीं हमें बड़ा बनने का नशा चढ़ गया है कि मुझे बड़ा बनना है, और उस बड़ा बनने के लिए कईयों का अपमान कर रहे हैं। और उस अपमान का, उनके द्वारा हमें बद्दुआ मिलेगा, उसका भी दंड हमें भोगना पड़ेगा।
अगर आप ज्ञान को समझना चाहते हैं, उस स्तर पर पहुंचना चाहते हैं, तो आप कैसे भी जो शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श अपने तरीके से पाने का इच्छा कर रहे हैं, उसका त्याग कर दीजिए। जो जैसा है उसका सदुपयोग करिए और जीवन में आगे बढ़िए। उम्मीद का त्याग कर दीजिए — योग्यता से ज्यादा पाने की उम्मीद। जीवन जीने के लिए तो वस्तुओं की जरूरत है, भोजन की जरूरत है, कपड़ा की जरूरत है, मकान की जरूरत है; लेकिन जो मान के लिए आप कर रहे हो, उसका त्याग करिए। तब आपको समझ में आने लगेगा।
दूसरों की कमियां नहीं, अपनी कमियां देखो
पहले आप देखिए कि मैं क्या कर रहा हूं समाज में, और मैं उस परम स्थिति तक पहुंचा क्या? जो मैं शिकायत कर रहा हूं, जो मुझे समाज में कमी दिख रही है, उस कमी को दूर करने के लिए मैंने क्या काम किया? मेरा भी तो दायित्व है। समाज में कोई कमी है, उस कमी को मैं कैसे दूर करूं — कि बस कमियां बताता रहूं, कमियां गिनाता रहूं? हमारा भी तो कर्तव्य है। हमें भी तो संसार में मौका मिला है।
अधिकतर लोग अपनी कमियों को कौन देखते? लोग दूसरे की कमियों को देखते हैं। अब देखना है कि उसमें मैं क्या करता हूं — मैं भी तो यही कर रहा हूं: अपनी कमियों को छुपाता हूं, दूसरों की कमियां देखता हूं। जो असफल व्यक्ति होते हैं, दूसरों में कमियां देखते हैं, अपनी कमियों को छुपाते हैं और जीवन भर निंदा में लगे रहते हैं। जो सफल व्यक्ति होते हैं, वो अपनी कमियों को देख के उसे दूर करने का प्रयास करते हैं; जो जैसा है उसका सदुपयोग करके आगे बढ़ते हैं। देखना यह है कि मैं क्या कर रहा हूं — खुद को देखना है।
सेवा के लिए योग्यता
अपने आप को साधना है। जब आप उस योग्य बन जाओगे, तब ना समाज में काम करोगे। देखिए, तीन तरह से सेवा होती है — धन सेवा, तन सेवा, मन सेवा मतलब ज्ञान सेवा। तो अगर आपको करना है तो उस उपलब्धि पर हो जाओगे तब ना सेवा करोगे। सेवा करने के लिए आप में योग्यता भी तो होनी चाहिए।
अगर आप शास्त्रों से या कहीं से पढ़ के, वही किसी और का ज्ञान किसी और को दे रहे हो, तो उस ज्ञान का कोई मतलब थोड़ी ना है। जो ज्ञान था, उनका था; आपके लिए जानकारी थी। उस जानकारी के द्वारा, जिस लिए वो लिखा गया है, उस स्तर पर पहुंचे क्या? जब आप उस स्तर पर पहुंच गए, तब आपको देने का अधिकार है।
जैसे मान लीजिए कोई शिक्षक है — अगर शिक्षा लेके उस स्तर पर पहुंच गया, शिक्षक के स्तर पर, तब वो पढ़ा सकता है; और जब वो पढ़ाएगा तो ऐसा नहीं वो पुरानी किताबों का प्रमाण देगा, वो अपने तरीके से पढ़ाएगा। कोई डॉक्टरी ना पढ़ा और डॉक्टरी का किताब लेकर लोगों को पढ़ाए, तो कोई डॉक्टरी सीख पाएगा? नहीं सीख पाएगा। पहले उन किताबों के द्वारा जो डॉक्टर की डिग्री है, उस स्तर पर पहुंचेगा, और फिर जब वो समाज में काम करेगा तो उस समय उसे किताबों की जरूरत नहीं रहेगी; वो सीधा अपना काम करेगा।
शास्त्र उठाकर बांटने से कुछ होने वाला नहीं
जो शास्त्रों को उठा के बस लोगों को बांट रहे हैं, इससे क्या हो रहा है? वह जानकारी को जानकारी पहुंचा रहे हैं; उससे कुछ होने वाला नहीं है। और ज्यादातर यही हो रहा है। शास्त्रों का अनुसरण करके अपना आत्मिक कल्याण करके फिर लोगों को ज्ञान देना था। अब ज्यादातर यही हो रहा है — या तो शास्त्र का अध्ययन करके लोग पैसा कमा रहे हैं, या तो शास्त्र का अध्ययन करके लोगों को अपमानित कर रहे हैं कि देखो, मुझे मालूम है, तुम्हें नहीं मालूम है; मैंने पढ़ा है, तुमने नहीं पढ़ा है। कुछ ज्यादा श्लोक याद कर लेते हैं और लोगों को श्लोक बोल के लज्जित करते हैं। लेकिन इसका कोई मतलब नहीं है। वो भी भटक रहे हैं, लोगों को भी भटका रहे हैं।
अगर सच में आप अपना कल्याण करना चाहते हो और सच में ज्ञान को समझना चाहते हो, तो आप शास्त्रों का अनुसरण, महापुरुषों के वाणी का अनुसरण करके उस स्थिति पर जाइए। अगर आप पता कहीं का ले लिए, तो उस पते पे यात्रा करिए, और फिर जब यात्रा करके आएंगे, तब आप लोगों को मार्ग बताएंगे — तब अपने तरीके से बताएंगे। खुद का ज्ञान, आत्मज्ञान — उस स्थिति पर पहुंचने के बाद किसी को मार्ग बताओ; वो सच्चा ज्ञान है।
किसी ने आपको पता बताया, आप खुद नहीं गए, कैसे पक्का कर सकते हैं कि उसका पता सही है या गलत है? जाओगे तब ना पता चलेगा। और मान लो गलत रहा, तो आपने अनेकों लोगों को भटका दिया।
किसी के साथ धोखा मत करिए
अनुभव करके — खुद का अनुभव होना चाहिए, व्यक्तिगत अनुभव होना चाहिए। अगर आप किसी को मार्ग बता रहे हैं, तो सच में उस मार्ग के बारे में आपको पूरी तरह जानकारी और ज्ञान होना चाहिए कि यह मार्ग पक्का सही है; अगर यह व्यक्ति हमारे द्वारा बताए गए पते पर जाएगा तो पक्का उस जगह पर पहुंचेगा। किसी के साथ धोखा मत करिए। अगर आपको नहीं मालूम है, तो किसी और के ज्ञान पर आप लड़ाई मत करिए। ज्यादातर यही होता है — लिखी-लिखाई बातों पर हम लोगों से लड़ाईयां कर रहे हैं और लोगों को नीचा दिखा रहे हैं।
ना तो ना में जाइए, ना तो हां में जाइए; किसी का खंडन मत करिए। पहले तो पक्का कर लीजिए — जीवन में मुझे चाहिए क्या? जाना कहां है? ज्यादातर यही होता है, जाना कहीं और है, पता कहीं और का पूछते हैं, जाते कहीं और हैं। पक्का कर लीजिए मुझे जाना कहां है और मैं समाज में क्या करना चाहता हूं।
आप धन सेवा करना चाहते हैं तो ईमानदारी से धन कमाइए, धन सेवा करिए — धन से वस्तुएं लीजिए, लोगों का सेवा करिए। आप तन सेवा करना चाहते हैं तो अच्छा सात्विक भोजन करके लोगों को शरीर से मदद करिए — किसी कमजोर, असहाय, पीड़ित की आप सेवा करिए। और अगर आप ज्ञान सेवा करना चाहते हैं, तो बाहर से जानकारी लेके — शास्त्रों द्वारा, महापुरुषों के वाणी द्वारा — उस परम स्थिति को उपलब्ध होकर, आत्मज्ञान तक पहुंच के लोगों को ज्ञान दो; उनके आत्मिक कल्याण के लिए मार्ग बताओ। लेकिन खुद का होना चाहिए।
सीखने वाला हूं कि सिखाने वाला
यह है ज्ञान — खुद का ज्ञान। और ऐसा नहीं कि वो जो जानकारी है, ज्ञान नहीं है; वो किसी और का ज्ञान है, लेकिन अभी आपके लिए पक्का नहीं। उन्होंने इसलिए ज्ञान दिया लोगों को कि आप भी उस स्तर पर पहुंच के समाज कल्याण के लिए मार्ग बताओ।
जो शिक्षक पढ़ा रहे हैं, वह कभी विद्यार्थी थे। उन्होंने किसी शिक्षक के द्वारा पढ़ाई किया और शिक्षक बने; अब विद्यार्थी को पढ़ा रहे हैं। ये संसार में सीखना और सिखाना यही चल रहा है। तो आप पक्का कर लीजिए कि मैं सीखने वाला हूं कि सिखाने वाला हूं। सीखने वाले हो तो सिखाने की बात मत करो; सिखाने वाले हो तो सीखने की बात मत करो। यह पक्का कर लो तो आप भटकने से बच जाओगे, और आप ज्ञान को समझ पाओगे जीवन में।