सत्संग PV03-0026 · भाग 3
आत्म को ज्ञान प्राप्त नहीं करना है, जितना प्राप्त किया वो छोड़ना है — धारणा, विचार, ठीक शब्द और प्रभु की माया
26 मई 2026 · धारणा से आत्मज्ञान तक – जानिए सही समय, स्थान और विधि
चैनल: आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान सेवा
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मुख्य बातें
- आत्म को तो पहले से ज्ञान है; हमें अज्ञानता को छोड़ने के लिए ज्ञान की जरूरत है — जैसे एक कांटा धसा तो दूसरा कांटा उसे निकालने के लिए चाहिए।
- धारणा ये करिए — बेईमानी दुष्कर्म नहीं करना है, कुछ भी हो जाए; ईमानदारी तो आप कर्म करोगे, अपने आप होगी।
- विचार आपके बस में नहीं हैं, आते हैं जाते हैं; जिस पे आपने काम किया, उसके जिम्मेदार आप हो।
- अनुमान लगाना छोड़ दो, ठीक शब्द का प्रयोग करो — मेरा और कर्ता के भाव से मुक्त हो जाएंगे।
- जब तक भाव है, आप कहीं ना कहीं हो; भाव से तभी मुक्त हो पाएंगे जब आपको कुछ नहीं चाहिए — उम्मीद छोड़ दो, दृष्टा हो गए।
- प्रभु की माया में आनंद है, ठगनी माया में अशांति है; ठगनी माया आपने बनाई है, ठग-ठग के।
आत्म को ज्ञान प्राप्त नहीं करना है
आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए — मतलब आत्म को तो पहले से ज्ञान है। आत्म को ज्ञान प्राप्त नहीं करना है; जितना प्राप्त किया है, वो छोड़ना है। इसे बहुत गहराई से समझिए। हमें अज्ञानता को छोड़ने के लिए ज्ञान की जरूरत है। जैसे एक कांटा धसा, तो दूसरा कांटा इसलिए चाहिए कि उस कांटे को निकालने के लिए। लेकिन निकालने के बाद हम दोनों कांटे फेंक देंगे; हमारे किसी काम का नहीं रह जाएगा। तो ऐसे ही अज्ञानता से मुक्त होने के लिए मुझे ज्ञान चाहिए। आत्म को तो पहले से ज्ञान मौजूद है।
अब अज्ञानता क्या है? हमने बुराइयों को समझ के धारण किया है। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता के भाव को हमने धारण किया है — ये अज्ञानता है। कर्म करते हुए छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड कर रहा हूं — ये अज्ञानता है। बेईमानी, दुष्कर्म कर रहा हूं — ये अज्ञानता है। इसे हमें छोड़ना है; विकार इससे आते हैं, इसे हमें त्याग करना है।
हम भटके क्यों हैं? हम वो कर दिए जो हमें नहीं करना चाहिए था। अब एक काम करें — अब बंद कर दीजिए और ईमानदारी अपना लीजिए, तो आगे का बंधन बढ़ेगा नहीं। सत्कर्म के द्वारा पिछले का नाश होगा, मतलब भोग लेंगे। नाश का मतलब ये मत सोचो खत्म हो जाएगा; भोगना पड़ेगा।
धारणा क्या करें
धारणा तो पहले यह पक्का कर लीजिए कि बेईमानी, दुष्कर्म अब नहीं करूंगा। मान की इच्छा नहीं करूंगा। योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा नहीं करूंगा। दिखावा नहीं करूंगा। बड़ा-छोटा बनने की इच्छा नहीं करूंगा। अपने आप को निर्विकार कराऊंगा। यह धारणा बना लीजिए।
और निर्विकार मैं कैसे हो जाऊं? उसके लिए आपको काम करना है। पहले तो विकार आना बंद करना पड़ेगा। विकार आना तब बंद होगा जब आप पूर्णतः ईमानदार हो जाएंगे, और विकारों से मुक्ति तब मिलेगी जब आप सत्कर्म करेंगे। बेईमानी, दुष्कर्म एकदम नहीं करना है, कुछ भी हो जाए। यह धारणा पक्की कर लीजिए — नहीं करूंगा तो नहीं करूंगा। बस बात खत्म। यही धारणा है।
कैसे करेंगे? बस सीधा पक्का कर लेना, नहीं करना है, बात खत्म। जैसे भोजन हमें नहीं करना है, तो नहीं करना है; ये तो मेरे ऊपर है करूं या ना करूं। तो बेईमानी-दुष्कर्म करूं या ना करूं, ये तो मेरे ऊपर है ना, किसी और के ऊपर थोड़ी ना है। तो मत करिए, बात खत्म।
ईमानदारी करने की धारणा मत करिए। ईमानदारी तो आपके काम में होगी। आपको धारणा ये बनानी है — बेईमानी-दुष्कर्म नहीं करना है, कुछ भी हो जाए; इस धारणा पे टिके रहना है। ईमानदारी तो आप कर्म करोगे, अपने आप होगी; उसके लिए कोई प्रयास नहीं करना है। बेईमानी-दुष्कर्म के लिए प्रयास कर रहे थे, वो बंद कर दीजिए, बस बात खत्म हो जाएगी। विकार भी इसी में आ गया, सब इसी में आ गया — क्योंकि एक ये आपने अगर बंद कर दिया, तो आगे विकार आएगा ही नहीं। पिछला ईमानदारी से, धर्म के द्वारा खत्म हो जाएगा।
विचारों में उलझना नहीं है
विचार आने दो। देखना, ना देखना आपके बस में ही नहीं है। आप झाड़ू मारिए — कितना भी विचार में कुछ आए, नीचे गंदगी साफ हो रही है। बात खत्म। विचारों में उलझना नहीं है; आए और चाहे जाए। आपको क्या करना है, वो फैसला ले लीजिए। विचार आते हैं देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में — जैसा आपके सामने दृश्य, शब्द, सुगंध, दुर्गंध, रस, स्पर्श आता है, वैसे विचार आ जाते हैं। आप बड़े बढ़िया विचार में थे, कोई गाना बजा दिया, तो आपका विचार किस में गया? उस गाने में। गाना पसंद है तो राग, नहीं पसंद है तो द्वेष। आप आंख बंद करके बढ़िया से अपने आप में बैठे हैं, और कोई ला के सड़ा हुआ सामान आपके सामने रख दिया — अब आपका विचार कहां का कहां गया? विचार आपके बस में थोड़ी ना है। आने दो, जाने दो; आपको क्या करना है, देख लो।
आप अपने लक्ष्य की तरफ जा रहे हो, तो रास्ते में अनेक कचरा आए, गटर आया; आप पार करके अपने लक्ष्य तक पहुंच गए। अब कहोगे, नहीं, पूरे गटर की सफाई करूंगा — जिंदगी भर वही लग जाएगा। विचारों के चक्कर में कतई मत पड़िए। आपके शरीर में नौ दरवाजे गंदगी के हैं — क्या हटा दोगे? तो विचार आते हैं, जाते हैं; अच्छे भी हैं, बुरे भी हैं। आप विचारों में ना फंसकर अपना काम करिए।
विचार का बिल नहीं भरना पड़ता
देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में विचार आते हैं, जाते हैं; उसके जिम्मेदार आप नहीं हो। जिस पे आपने काम किया, उसके जिम्मेदार आप हो। जैसे आप बाजार गए थे, विचार आया कि बड़ा अच्छा समोसा है, काश खरीद लेता — लेकिन आप खरीदे नहीं, विचार करते रहे और फिर निकल गए। क्या बिल भरना पड़ेगा? नहीं ना। और सामने जाके दुकान वाले से कह भी दो कि भैया, हमने विचार से आपके आठ-दस समोसे खा लिए, बिल बताओ — तो मुस्कुराएगा, कहेगा भैया आप जाओ।
विचारों में मत उलझिए। विचार आपके बस में नहीं हैं, आते हैं, जाते हैं। हवा आती है, जाती है — कहां से आई, कहां गई, बताओ? विचार आया कि गटर साफ कर दो, तो क्या गटर साफ हो जाएगा? जाके करना पड़ेगा ना। विचार आया कि घर गंदा है, चलो साफ कर देती हूं, और सोई रहो — विचार से घर की सफाई हो जाएगी? करना पड़ेगा।
जैसा आपको दिखेगा, जैसी आपको जानकारियां होंगी, वैसे विचार आएंगे। अगर उस वस्तु की जानकारी नहीं है, तो वस्तु दिखेगी, वस्तु का विचार आएगा, लेकिन वह वस्तु कैसी है, कैसे उपयोग करना है, ये विचार नहीं आएगा। जैसे आपको पढ़ना नहीं आता है, तो यह विचार आ जाएगा कि कुछ लिखा है, लेकिन क्या लिखा है पता नहीं। पढ़ना आता है, तो देखते ही तुरंत पढ़ भी लोगे।
विचार तो ऑप्शन है। आप बाजार गईं, आपको क्या सामान लेना है, देख लो। दुकान पे आपने बहुत सामान देखा, लेकिन जितना लेंगी, उसका बिल भरना पड़ेगा। विचारों से कुछ नहीं होगा। फिर कहते हैं ना, विचार शून्य होना चाहिए — विचार आपके बस में है क्या? बैल को बधिया करा देते हैं, तो क्या उसमें काम भाव नहीं उठता? उठता है, वो नहीं गया; बात यहां अंदर की है। कहने का मतलब है, विचार आते हैं, जाते हैं, वो आपके बस में नहीं है; आपको क्या करना है, देख लो।
अनुमान लगाना छोड़ दो
जिस काम के बारे में आपको पता नहीं है — जैसे कोई काम आपने किया, परिणाम नहीं आया, और आपने लोगों को बता दिया ये परिणाम आएगा — वहां कर्ता भाव पैदा हो जाएगा। जैसा कहा था वैसा हो गया, तो आप लोगों को खोजोगे कॉलर टाइट करने के लिए; और नहीं हुआ, तो लोग आपको खोजेंगे।
जैसे किसान ने फसल बोई। अब लोगों ने पूछा, कितना क्विंटल होगा? क्या उस किसान को मात्रा का पता है? उसने अनुमान लगा लिया इतना क्विंटल होगा। अब फसल उतनी आई, तब तो वो कॉलर टाइट करके लोगों को खोजेगा कि देखो, हमने बोला था ना। लेकिन क्या उसे पता था? नहीं, उसका अहम भाव जाग गया कि मुझे देखो, मालूम था। लेकिन मालूम नहीं था, एक तुक्का था, एक अनुमान था। और अगर नहीं हुआ, तो गांव वाले उसको खोजेंगे, उसका कॉलर ढीला। यही हम करते हैं। अनुमान लगाना छोड़ दो। परिणाम आने के बाद परिणाम बताओ; उसमें कर्ता का भाव प्रकट नहीं होता है।
ठीक शब्द का प्रयोग करो
ठीक शब्द का प्रयोग करोगे, तो मेरा का भाव छूट जाएगा। आपने कुछ लेन-देन किया, कैसा है? अच्छा — अच्छे में राग, बुरे में द्वेष। ठीक में आप। भोजन कैसा है? ठीक। फिर व्यक्ति पूछेगा कैसा बना? ठीक — उसे कोई रस नहीं मिला। अगर ठीक-ठीक कहने लगे, तो आपसे कोई पूछेगा भी नहीं। और आपने कहा अच्छा, तब उसे रस मिला; और आपने कह दिया बुरा, तो उसे द्वेष हो गया आपसे। भले भोजन बुरा बना हो, लेकिन वो स्वीकार नहीं करेगा। और खराब भी भोजन बना, उसे पता है, लेकिन आपने कह दिया अच्छा, तो उसका राग पैदा हो जाएगा।
तो ठीक शब्द का प्रयोग करें, अनुमान लगाना छोड़ दें — मेरा और कर्ता के भाव से मुक्त हो जाएंगे आप। अनुमान लगाना छोड़ देंगे, तो कर्ता का भाव पैदा भी करोगे तो नहीं होगा। ये मैं आपको पूरा गीता का सार बता दे रहा हूं। पूरी गीता किस पे बोली गई है? मेरा-कर्ता से मुक्त हो जाओ। तो ठीक शब्द का प्रयोग करो, अनुमान लगाना छोड़ दो — कर्ता का भाव पैदा भी नहीं होगा और मेरा का भाव बनेगा नहीं। बस बात खत्म हो गई। इसको लेकर निकल लो; देख लो आपको क्या करना है।
दृष्टा भाव — भाव से भी मुक्त होना है
दृष्टा अलग है, भाव अलग है। भाव है, इसका मतलब अभी भी बाहर हो। तो दृष्टा भाव का मतलब — शुद्धता से जांचते रहिए, कोई गलती ना हो। भाव भी आखिरी में छूट जाएगा, बचोगे आप। क्योंकि जब तक भाव है, इसका मतलब किसी में हो। भाव से भी मुक्त होना है, और भाव से तभी मुक्त हो पाएंगे जब आपको कुछ नहीं चाहिए; तब वहां भाव भी नहीं रहेगा। भाव भी तभी तक है जब तक कुछ चाहिए। तो दृष्टा हो जाना है, भाव को भी छोड़ देना है। दृष्टा कैसे होगा? बस, कुछ नहीं चाहिए में आ जाओ। उम्मीद छोड़ दो — दृष्टा हो गए।
अगर कुछ भाव है आपका, तो इसका मतलब कहीं ना कहीं बाहर हो आप — राग में भी हो सकते हो, द्वेष में भी हो सकते हो, प्रेम में भी हो सकते हो। लेकिन प्रेम में बंधन नहीं है; राग-द्वेष में हो तो बंधन। लेकिन जब तक भाव है, तब तक कहीं ना कहीं हो। ज्ञान के बाद अगर आपका भाव बनेगा, तो फिर आप फंसोगे नहीं। कुछ करोगे तो भाव बनेगा ही, स्वाभाविक है, लेकिन फिर बंधन नहीं। एक समय ऐसा आएगा कि आपको भाव से भी मुक्त होना है — कुछ नहीं चाहिए में आना है।
पहले लक्ष्य, फिर मार्ग
पहले मुझे निर्विकार होना है — फिर उसके लिए रास्ता मिलेगा। पहले आप किसी को लक्ष्य बताओगे, तब वो आपको मार्ग बताएगा। आप जाके बोलो कि मुझे मार्ग बताओ, वो बोलेगा कहां जाना है? बोले अभी ये पक्का नहीं किया हूं, लेकिन मुझे मार्ग बता दो — बता पाएगा? आपको पूरी दुनिया का पता मालूम हो, तो भी आप उसे पता नहीं बता सकते। तो आप निर्विकार होने के लिए — बेईमानी-दुष्कर्म अब नहीं करूंगा — यह धारणा बना लोगे, तो आगे का मार्ग मिलता जाएगा।
प्रभु की माया और ठगनी माया
माया दो प्रकार की होती है। एक माया है प्रभु की माया, एक माया है ठगनी माया। प्रभु की माया में आनंद है, ठगनी माया में अशांति है। ठगनी माया आपने बनाई है — ठग-ठग के, बेईमानी-दुष्कर्म से। यहां सब बैठे हैं, सबकी अलग-अलग दुनिया है, और अपनी दुनिया में परेशान हैं। इस दुनिया में कोई परेशानी नहीं है। इस दुनिया में मुर्दा जा रहा है, हंस के कह रहे हैं इनकी आत्मा को शांति मिले; श्मशान में जाके भेल खा रहे हैं, एक आदमी सामने जल रहा है, उन्हें 1% भी तकलीफ नहीं है। मस्त बढ़िया सिंगदाना खा रहे हो; लेकिन पता चला कि यार, तुम्हारे घर का है, तब देखो सिंगदाना गिरा और तुम रोने लगे तुरंत। तो आपकी दुनिया में तकलीफ है, प्रभु की दुनिया में नहीं।
आपकी माया का निर्माण ठग-ठग के हुआ है; ठगा है लोगों को, उसी से तैयार हुई है, नहीं तो आपको कोई तकलीफ ही नहीं होती। हमने लोगों को ठगा है किसी न किसी तरीके से — भावनाओं से, चाहे जैसे भी — इसलिए आज हमारा जीवन अशांत है।
आंख बंद करके जो दिखाई देता है, वो माया भी नहीं है; वो तो कल्पना है, वो आती है, जाती है, उससे कोई मतलब नहीं है। आप आंख बंद करके भोजन कर लो, पेट नहीं भरेगा। प्यास लगी, आपने आंख बंद किया और कल्पना करके पानी पी लिया, तो क्या पानी पी लोगे? स्वप्न में आपने पकवान खाया, उठे तो क्या पेट भरा रहेगा? तब इसमें मत जाइए। प्रत्यक्ष में जीइए।
प्रभु की माया में कैसे जाएंगे? अपनी माया छोड़ दो। उसका तरीका — मेरा और कर्ता के भाव से मुक्त हो जाओ; मेरा-कर्ता में आपकी माया का निर्माण हुआ है। कैसे छूटेगा? मैंने बता दिया — ठीक शब्द का उपयोग करो, अनुमान लगाना छोड़ दो, तो फिर कर्ता का भाव बनेगा नहीं, मेरा का भाव बनेगा नहीं। पिछला जितना आपने किया, ईमानदारी-सत्कर्म के द्वारा हट जाएगा, और एक समय ऐसा आएगा, आपकी दुनिया से आप मुक्त हो जाएंगे, प्रभु की दुनिया में आ जाएंगे, और आनंद ही आनंद।