आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P24-0065 · भाग 24

गुरुजी, आपने ईमानदारी के लिए कठोर शब्द बोले कि वही व्यक्ति जिंदा है जो ईमानदार है, बाकी सब बेईमान मृत हैं — इससे उनको क्या फर्क पड़ेगा?

जो बेईमानी करता है, वो मरा ही हुआ है ना — उसकी आत्मा मरी हुई है। मैं तो कह रहा हूं अपने आप को निकाल लो। जिसको जैसा करना है वैसा करे, उसको फर्क क्या पड़ेगा — मुझे अपने आप को निकालना है, बस बात खत्म। मुझे इतनी बात समझ में आ गई कि इस जीवन में ईमानदारी-सत्कर्म करते हुए निकल लो; जितना आपसे हो सके कर दो और निकल लो। घुमा-फिरा के वही हाल है रोज — दिन भर खाओ, फिर धो, फिर खाओ — क्षणिक सुख के लिए। यहां मैंने देखा, समझा — कोई किसी को नहीं मानता, सब अपनी जरूरत को मानते हैं और कहते हैं कि हम तुम्हें बहुत मानते हैं। क्या सच में आप उससे गले मिल रहे हो, उससे बातें कर रहे हो, या उसके पीछे कुछ चाहिए? मैंने अपने आप को पूरी तरह जांचा और पाया कि यहां सब एक-दूसरे की जरूरत है। तो जरूरत पूरा करो और निकलो — धन सेवा, तन सेवा, ज्ञान सेवा, जो आपके पास है करके निकल लो। ऐसी दुनिया में जीने के दो ही ऑप्शन हैं — एक बेईमानी-दुष्कर्म के साथ, एक ईमानदारी-सत्कर्म के साथ। मेरे लिए ईमानदारी बेस्ट है, और इससे उसका मिलना भी पक्का। आज तक इतिहास में जो ईमानदारी-सत्कर्म में लगे रहे, वो पवित्र हुए और उन्हें वो मिला — चाहे हिंदू में जाओ, मुस्लिम में, सिख में, ईसाई में। सांस पर ध्यान से लोग रिलैक्स हो जाते हैं, लेकिन क्या हमेशा के लिए? दो दिन छोड़ दो, फिर वही आ गए। मूल पर काम करो और मूल तक पहुंचो।

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वीडियो: इस प्रकृति में पूर्ण कौन और अपूर्ण कौन है ? #प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-06