प्रश्नोत्तर P25-0007 · भाग 25
गुरु जी, डर यह भी तो हो सकता है कि किसी को खोने का डर हो?
किसी को खोने का डर क्यों है? क्योंकि उससे मुझे कुछ मिल रहा है। डर कहां है? जहां से कुछ मिलता है, वो खो ना जाए। अच्छा, उससे ज्यादा मिले तो खो जाए — क्या फर्क पड़ता है? नुकसान का अगर डबल मिल जाए ना, तो हम तैयार हैं। रोड में घर आ गया — 2 लाख का घर, 1 करोड़ मिलेगा — तो बड़े खुश हो जाते हैं कि अब माल अच्छा मिलेगा। हमें बस ज्यादा मिल जाए। अगर आप देखोगे ना, तो आपको किसी से मोह-बंधन नहीं है। मोह सिर्फ अपनी इच्छाओं से है, अपनी कामनाओं से है, अपनी अपेक्षाओं से है — किसी व्यक्ति से नहीं। बात बस ज्यादा की है। और यह तब तक रहेगा जब तक उस परम स्थिति को उपलब्ध नहीं होगे, क्योंकि पूर्णता में नहीं आओगे तब तक जीवात्मा सोच रहा है कि मैं अपना अधूरापन पूरा कर लूं। और जिससे वो पूरा करना चाहता है, वो भी सोच रहा है कि मैं इससे पूरा कर लूं। आप उसे कुछ दे रहे हो ज्यादा लेने के चक्कर में, वो आपको कुछ दे रहा है ज्यादा लेने के चक्कर में — एक-दूसरे को एक तरीके से नोच रहे हैं। और जब नोच लेते हैं तो लगता है हम तो और ज्यादा खाली हो गए। इसी का नाम संसार है — जितना वह देगा, उससे ज्यादा लेने का प्रयास करेगा। इसी में होती है तकलीफ, इसी में होता है राग-द्वेष। लास्ट में ना ये शरीर, ना धन-प्रॉपर्टी, ना रिश्ते-नाते — सिर्फ तुम और तुम्हारा कर्म, और कर्म के हिसाब से आगे की यात्रा। अगर इच्छा-अपेक्षा है तो वैसे ही लोग आपको मिलेंगे; और अगर इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो गए, तो आगे की यात्रा होगी उस परम सत्ता की। दो में से एक होने वाला है। अब तुम कहां जी रहे हो, यह सिर्फ जीने वाले को पता है।
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