प्रश्नोत्तर — भाग 25
योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 11 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।
गुरु जी, मैं फंसी हुई हूं क्योंकि मैं यह सोचती हूं कि लोग क्या कहेंगे। इस समाज में लड़कियों की स्थिति आज भी खराब है, और मां-बाप भी अच्छे नहीं हैं। क्या करूं?
देखो, ना कोई अच्छा है ना कोई बुरा है। कमी कहीं ना कहीं आप में है — आप कहीं ना कहीं सामर्थ्यवान नहीं हो। जब आपकी कमजोरी है तो आपको कोई स्वीकार नहीं करता। आप देखो, हमेशा मजबूत चीजों को ढूंढते हो, मजबूत को स्वीकार करते हो, कमजोर को अस्वीकार करते हो। कोई वस्तु भी लेने गए हो तो अपनी योग्यता के अनुसार मजबूत चीज खोजते हो, कमजोर को हटा देते हो। तो चाहे मां-बाप हैं, चाहे भाई-बहन हैं, समाज का कोई व्यक्ति है — अगर आपको स्वीकार नहीं कर रहा है तो इसका मतलब कहीं ना कहीं आप कमजोर हो। यह कहने से ज्यादा अच्छा है कि आप अपनी स्थिति को बदलो। यह मत कहो कि ये बुरे हैं, मेरे मां-बाप ठीक नहीं हैं। सब ठीक हैं, तुम ठीक नहीं हो — गड़बड़ी अपने अंदर है। पानी में पानी मिला दो, स्वीकार कर लेता है; पानी में तेल मिलाओ, स्वीकार नहीं करता, क्योंकि दोनों विपरीत हो गए। तो आपको यह देखना है कि मुझे स्वीकार क्यों नहीं किया जा रहा है — क्या मेरे कर्म ऐसे हैं? अगर अच्छे कर्म इतने हैं कि बुरे लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे, तो उस जगह को छोड़ दो, अपनी अच्छाई जहां स्वीकार करें वहां फैलाओ। और अगर लोग अच्छे हैं और आप बुरा काम कर रहे हो, तो अपनी बुराई छोड़ के अच्छाई अपना लो। आप अपने आप को कब देखोगे? बस दुनिया को देखते हो — ये बुरा, ये अच्छा। अपनी स्थिति देखो कि आपके द्वारा क्या हो रहा है, आपके जीवन में कैसे बदलाव आएगा — उसके लिए काम करना पड़ेगा। अगर आप चाहते हो कि कोई स्वीकार करे, तो वह जैसा चाहता है वैसा आपको होना पड़ेगा। इस बात को गहराई से समझो, अपने आप को सामर्थ्यवान बनाओ और अपने जीवन में आगे बढ़ो।
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गुरु जी, मोक्ष मार्ग पर 99% साधक क्यों फेल होते हैं?
कोई कहीं फेल नहीं हो रहा है, यही तो बात है। अगर कोई फेल हुआ तो फेल के लायक ही था — जहां वह गया था उस लायक वह नहीं था। फेल तो वो चलने के पहले था। काश इतनी क्षमता होती कि अपनी योग्यता को जांच पाता; परीक्षा में जांच हुई तो फेल हो गया। जैसे कोई विषय में फेल होता है तो उस विषय में ज्यादा मेहनत करता है और दूसरे साल निकाल लेता है — काश यह बात पहले ही पता कर लेता कि मैं किस विषय में कमजोर हूं। एक जगह होती है सीखने की, एक जगह होती है परीक्षा की। जब कोई शिक्षक या गुरु सिखा रहा है, उसी समय पूरी तरह तैयार रहिए, उसके एक-एक शब्द को पकड़िए — फिर आप फेल नहीं होंगे, क्योंकि परीक्षा में ज्यादा समय नहीं लगता, कुछ ही क्षण में फैसला हो जाता है। आप यह मत समझो कि वह ऐसे ही कर रहा है — कोई घटना के द्वारा, कोई पढ़ा के, कोई समझा कर आपको कुछ दिखाना चाह रहा है। सीखने गए हो तो बस सीखने की बात करते रहो। अपने ज्ञान को रख दो; अगर उस ज्ञान में मिलावट करोगे — वो सिखा रहा है और तुम उसे कुछ और बताओगे — तो सही तरीके से सीख नहीं पाओगे। जितना उसने सिखाया उतना मैंने सीखा, तब तो परीक्षा में पास हो जाओगे; और अपनी समझ से उसका विरोध कर रहे हो तो परीक्षा में फेल ही समझो।
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गुरु जी, सामर्थ्यवान आदमी यदि मोक्ष मार्ग पर चलना चाहता है, तो निर्विकार होने में कितने साल लग जाएंगे?
12 साल के अंदर। जैसे कोई डिग्री लेने वाले विद्यार्थी से नया विद्यार्थी पूछे कि डिग्री में कितने साल लगते हैं, तो वह पूछेगा कौन सी डिग्री लेना चाहते हो। यहां आत्मज्ञान की डिग्री है — कंटिन्यू करोगे तो लगेंगे; बीच में एक साल पढ़ाई बंद कर दी या फेल हो गए, तो एक साल और बढ़ा लो। ऐसे ही अध्यात्म में भी है कि कम से कम 12 साल लगेंगे; अब आपने आगे कितनी यात्रा कर ली है, उसके ऊपर 12 साल के अंदर हो जाएगा। इतिहास को देखते हुए, सारी चीजों को देखते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा, और मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा कि 12 साल फाइनल है — 12 साल के अंदर ही आपको आत्मज्ञान हो जाएगा। ब्रह्म ज्ञान का मैं कुछ बोल नहीं सकता कि उसमें कितना समय लगेगा, किन स्थितियों में होगा। लेकिन आत्मज्ञान के लिए इतना कह सकता हूं कि अगर आप पूरी तरह लग गए — 100 में 101% — तो कंफर्म 12 साल के अंदर हो जाएगा, इससे ऊपर एक दिन भी नहीं लगेगा।
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बाबा, मैंने बहुत बेईमानी कर ली है और संसारी लक्ष्य के साथ मैं अभी फंसा हुआ हूं। क्या करूं?
बेईमानी कर ली है, ठीक है — तो उसे आप छोड़ दो ना। अब ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो, और वह आपको धीरे-धीरे निकालेगा।
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गुरु जी, क्या सेवा और साधना ही मार्ग है? 12 साल वही करना है?
हां, निष्काम सेवा। आपके जीवन में हर वक्त निष्काम सेवा हो और हर वक्त आप साधना में जाने चाहिए, तब 12 साल के अंदर होगा। मतलब आपका सोना, उठना, जागना, बैठना — सब कुछ निष्काम सेवा में जाना चाहिए, पूरा समय। और आपकी साधना, आपका उठना-बैठना अपने आत्मिक कल्याण के लिए हो, आत्मज्ञान के लिए हो — तो 12 साल के अंदर हो जाएगा।
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गुरु जी, गृहस्थ को आत्मज्ञान कैसे होगा?
गृहस्थ ईमानदारी, सत्कर्म, जरूरतमंद की सेवा करेगा; सत्संग सुनेगा; साल में कम से कम एक महीने एकांत में जाएगा — एक महीने तक सब कुछ छोड़कर 24 घंटे अपने आत्मिक चिंतन में लगा रहेगा। और उसके बाद जब उसकी जिम्मेदारी, उसका दायित्व पूरी तरह पूरा हो जाए, वह निकल जाए — तब उसे आत्मज्ञान होगा।
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गुरु जी, डर यह भी तो हो सकता है कि किसी को खोने का डर हो?
किसी को खोने का डर क्यों है? क्योंकि उससे मुझे कुछ मिल रहा है। डर कहां है? जहां से कुछ मिलता है, वो खो ना जाए। अच्छा, उससे ज्यादा मिले तो खो जाए — क्या फर्क पड़ता है? नुकसान का अगर डबल मिल जाए ना, तो हम तैयार हैं। रोड में घर आ गया — 2 लाख का घर, 1 करोड़ मिलेगा — तो बड़े खुश हो जाते हैं कि अब माल अच्छा मिलेगा। हमें बस ज्यादा मिल जाए। अगर आप देखोगे ना, तो आपको किसी से मोह-बंधन नहीं है। मोह सिर्फ अपनी इच्छाओं से है, अपनी कामनाओं से है, अपनी अपेक्षाओं से है — किसी व्यक्ति से नहीं। बात बस ज्यादा की है। और यह तब तक रहेगा जब तक उस परम स्थिति को उपलब्ध नहीं होगे, क्योंकि पूर्णता में नहीं आओगे तब तक जीवात्मा सोच रहा है कि मैं अपना अधूरापन पूरा कर लूं। और जिससे वो पूरा करना चाहता है, वो भी सोच रहा है कि मैं इससे पूरा कर लूं। आप उसे कुछ दे रहे हो ज्यादा लेने के चक्कर में, वो आपको कुछ दे रहा है ज्यादा लेने के चक्कर में — एक-दूसरे को एक तरीके से नोच रहे हैं। और जब नोच लेते हैं तो लगता है हम तो और ज्यादा खाली हो गए। इसी का नाम संसार है — जितना वह देगा, उससे ज्यादा लेने का प्रयास करेगा। इसी में होती है तकलीफ, इसी में होता है राग-द्वेष। लास्ट में ना ये शरीर, ना धन-प्रॉपर्टी, ना रिश्ते-नाते — सिर्फ तुम और तुम्हारा कर्म, और कर्म के हिसाब से आगे की यात्रा। अगर इच्छा-अपेक्षा है तो वैसे ही लोग आपको मिलेंगे; और अगर इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो गए, तो आगे की यात्रा होगी उस परम सत्ता की। दो में से एक होने वाला है। अब तुम कहां जी रहे हो, यह सिर्फ जीने वाले को पता है।
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गुरु जी, 'ॐ नमः शिवाय' का जाप बिना गुरु के कर सकते हैं या नहीं? बिना गुरु के यह मंत्र कहीं अपराध तो नहीं?
जाप कर सकते हैं, लेकिन ईमानदारी के साथ। आप कोई भी मंत्र कर रहे हैं, तो मंत्र करने का भाव क्या है, क्यों करना चाहते हैं? एक बात और — क्या आप ईमानदार हैं? अगर ईमानदार हैं तो मंत्र जपें, अन्यथा छोड़ दें, नहीं तो उस मंत्र से आप बर्बाद हो जाएंगे। मंत्र का जाप तो रावण ने भी किया था, कंस ने भी किया था, विभीषण ने भी किया था, कुंभकरण ने भी किया था। लेकिन आप किस उद्देश्य से करते हो, किस भाव से करते हो — वह मायने रखता है। ईमानदार होकर मंत्र करते हो तब तो सहायक है; अगर बेईमान होकर मंत्र करते हो तो आपका पतन हो जाएगा। यह आपको देखना है।
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गुरु जी, यहां नियमों के साथ रहना पड़ता है — मोबाइल बंद, व्यवहारिक बातें नहीं — तो कभी-कभी घुटन सी होती है। क्या ये नियम हैं?
मैं आप लोगों से पूछ रहा हूं कि क्या ये नियम है? आप यहां आए हो अपने आत्मिक कल्याण के लिए, आत्मिक चिंतन के लिए, साधना के लिए — तो मोबाइल स्विच ऑफ और व्यवहारिक बातें नहीं, ये नियम ही नहीं है। अब कोई क्लास में टीचर लेक्चर दे रहा है और बच्चे मोबाइल से बात करें, तो फिर लेक्चर देने का क्या मतलब? टीचर कहे फोन स्विच ऑफ कर दो, तो बच्चे बोलें ये तो नियम है — नियम कहां है? आप कुछ ले रहे हो, कुछ भर रहे हो। एक जगह से भरोगे तो पूरी तरह भर पाओगे; इधर से भर रहे हो और उधर से भरने लगे तो इधर का छूट जाएगा, फिर आने का क्या मतलब? जहां पे भी गए हो, जिस उद्देश्य से गए हो उसको तो पूरा करना पड़ेगा। मिलिट्री की भर्ती में जाकर कहो हम दौड़ नहीं पाते, तो भर्ती होगी? हर विभाग का एक सिस्टम बनाया गया है कि ऐसे-ऐसे करोगे तो इस पद पर आ सकते हो; कोई कहे ऐसे नहीं करूंगा, सीधा पद पर बैठा दो, तो उसे भगा दिया जाएगा, क्योंकि लाइन लगी है। जहां कुछ लेने जा रहे हो वहां का एक सिस्टम है, उस सिस्टम को पार करना ही पड़ेगा, तभी तो वह पाओगे। आप कहो ये सिस्टम बदलो, तो सिस्टम तुम्हारे लिए थोड़ी ना बदलेगा, क्योंकि सिस्टम ऐसे नहीं बन जाता — सिस्टम बनाने के लिए उस योग्यता, उस काबिलियत को हासिल करना पड़ता है। और समझ के अपनाओ तो उसमें आनंद मिलेगा।
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गुरु जी, क्या सत्कर्म और दान एक ही हैं?
नहीं, अलग-अलग हैं। सत्कर्म मतलब जरूरतमंद। अब दान — आप किसे दान दे रहे हो, किस भाव में दे रहे हो? मान के चक्कर में, वहां दे रहे हो जहां जरूरत ही नहीं? आप देखो कहां दे रहे हो।
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गुरु जी, 'लोग क्या कहेंगे' — यह डर कैसे दूर करूं?
यह डर है कि लोग क्या कहेंगे, इसका मतलब जिन लोगों के बीच में आप रह रहे हो, कहीं ना कहीं उनसे कमजोर हो और उनसे इज्जत-बेइज्जत की उम्मीद रखे हो। तो कम से कम अपनी कमजोरी को दूर करने के लिए काम करो — चाहे धन से कमजोर हो, तन से कमजोर हो, समझ से कमजोर हो। कमजोर व्यक्ति ही सोचता है कि समाज क्या कहेगा, और मजबूत व्यक्ति काम कर लेता है। ज्यादातर यह मिडिल क्लास वाले सोचते हैं — इज्जत, मान, प्रतिष्ठा। नीचे वाला झोपड़ी में मस्त है, उसके लिए जीना मायने है, उसे कल की चिंता नहीं; हाई क्लास वाले को किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना। मिडिल क्लास हमेशा इज्जत के चक्कर में इसलिए पड़ा रहता है कि वो हमेशा हाथ फैलाए रखता है कि मेरे समय में ये काम आएंगे — व्यवहार बिगड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि आगे मांगना है। यह डर कब तक रहेगा? जब तक आप किसी से अपेक्षा रखे हो। तो मैं आपसे यही कहूंगा कि आप अपने आप को सामर्थ्यवान बनाएं — बात खत्म।
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