आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0132 · भाग 25

गुरु जी, क्या चालाक, राक्षसी लोगों के साथ भी ईमानदार रहना चाहिए?

अपने आप को ईमानदारी से वहां से कैसे भी निकाल लो। अगर किसी ने अधर्म की शुरुआत की, तो आप तो धर्म से चलो; लेकिन अधर्म करना पड़ रहा है, तो अधर्म के साथ निकल जाओ। तब आप अधार्मिक नहीं हुए, क्योंकि गलत की शुरुआत उसने की थी, आपने नहीं। हो सकता है सही से शुरुआत करके आप ना निकल पाओ, तो गलत का उपयोग करके निकल जाओ, क्योंकि आप तो गलत नहीं हो; आप रहोगे तभी तो कुछ कर पाओगे। जैसे मल्ल युद्ध में कृष्ण भगवान ने इशारा किया कि दुर्योधन की जंघा पे मारो, नहीं तो कुछ कर नहीं पाओगे। पूछा गया कि आपने इशारा क्यों किया, ये तो अधर्म है — तो बोले अधर्म की शुरुआत तो उन्होंने की थी, अभिमन्यु को मारा। तुम धार्मिक व्यक्ति हो; अगर वो व्यक्ति अधर्म से तुम्हें पराजित करना चाह रहा है, तो तुम अधर्म से भी उससे जीत जाओ, क्योंकि तुम सही व्यक्ति हो, समाज के लिए कुछ कर सकते हो; वो तो समाज को दूषित करेगा। अगर तुम सोचोगे कि हम धर्म से ही लड़ेंगे, तो तुम मारे जाओगे और अधर्म बढ़ता जाएगा। जहां जिसकी जरूरत हो, वह करके निकलो — यही ज्ञान है। अधर्मी अधर्म से मांग रहा है तो उसको अधर्म में ही बताओ; वहां आपका धर्म काम नहीं करेगा। कोई तलवार से तुम्हें काटने आए और तुम गुलाब का फूल लेकर खड़े हो जाओ तो क्या होगा?

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