आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0162 · भाग 25

गुरु जी, आप बेईमानी का पैसा लेने से क्यों मना करते हो? आपको बहुत से लोग पैसे देने आते हैं, फिर भी आप पूछते हैं कि यह पैसा बेईमानी का तो नहीं है।

हां, नहीं लेता मैं। ईमानदारी का है तो दो, बेईमानी का है तो मत दो। क्योंकि आप मुझे तो दे नहीं रहे हो, मेरे इस काम को दे रहे हो — और इस काम का उपयोग समाज कर रहा है। ईमानदारी का पैसा होगा तो समाज को लाभ होगा, उसे भी एहसास होगा, उसकी भी आत्मिक स्थिति ऊपर उठेगी। देने वाले का भी है, जहां उपयोग हो रहा है उनका भी है — सबका है; सोसाइटी का ट्रांसफॉर्मेशन करना है, तो हमें पूछना जरूरी है। आप इतनी दूर से हम पर भरोसा करके आए हो, तो मेरा कर्तव्य है कि आप तक जो भी वस्तु पहुंचाऊं — चटाई हो, कंबल हो, भोजन हो — वो शुद्ध हो। यहां की व्यवस्था ईमानदारी से हो और आप तक पहुंचे तो उससे आपका आत्मिक कल्याण बहुत तेजी से होगा, ऊर्जा मिलेगी, बल मिलेगा। जैसे घर में गार्डियन का काम है बच्चों की परवरिश, वैसे ही ये काम मेरा है। इसलिए मैं सामने वाले को बोल देता हूं — बेईमानी का पैसा हो तो ना दे, ईमानदारी का हो तो दे। उसने कह दिया ईमानदारी का है, तो बात खत्म — वो जाने, उसका कर्म जाने; मेरे तक आते-आते वो ईमानदारी का पैसा हो गया। सबको अपने कर्मों का हिसाब मिलेगा, इसलिए पूछना बहुत जरूरी है।

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वीडियो: समय बीत जाने के बाद समझ क्यों आती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान · 2026-06-15