आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

सत्संग PV03-0024 · भाग 3

हो रहा है कहकर टालो मत — उचित को पकड़ो, और देखो मांग कहां से पैदा हो रही है

15 मई 2026 · बदलाव हो रहा है या कोई कर रहा है ?|Is Change Happening, or is Someone Making it Happen?

चैनल: आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान सेवा

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मुख्य बातें

जो भी होता है आपके कर्म से होता है

जो भी होता है, आपके कर्म से होता है। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में देखना पड़ेगा कि हो रहा है या कोई कर रहा है। जैसे एक बालक गलती कर रहा है, तो वहां यह नहीं देखना कि यह हो रहा है; उस समय उसे रोकना है। उसकी नासमझी हो सकती है; उसके पास इतनी समझ नहीं है। एक बालक आग में गिरने जा रहा है — अब आप वहां यह मत देखिए कि हो रहा है। नहीं, वहां आपको रोकना पड़ेगा। कोई गिर गया, आप बोलोगे ये तो हो रहा है? नहीं, आपको उठाना पड़ेगा।

जरूरत देखिए; जरूरत में आपको जीना पड़ेगा। आपको जो चाहिए, उसके लिए काम करना पड़ेगा। अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित — अनुचित को छोड़ना है, उचित को पकड़ना है और निकल जाना है। एक समय ऐसा होगा, आपके सामने ना गलत होगा और ना फिर सही भी होगा, सिर्फ आप होंगे। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में आप में निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए कि मेरे सामने कौन है और वो क्या कहना चाहता है — वो करने में है कि कहने में है। जरूरी नहीं कि जो हमारे सामने आसपास हो रहा है, हम मान लें हो रहा है। नहीं, उचित-अनुचित देखिए — सामने वाला यह कर रहा है तो उसे पता है कि नहीं?

आगे रास्ता बंद है तो तुरंत मना करो

एक आदमी मार्ग से जा रहा है और हमें पता है कि आगे का रास्ता बंद है, तो हमारा कर्तव्य है कि उसे तुरंत मना कर देना कि आप आगे ना जाइए, आगे रास्ता नहीं है। अब यह नहीं कि हो रहा है, और वहां जाके लौटेगा। उतना समय आप उसका बचा सकते थे, लेकिन आपने होने में टाल दिया।

आपके पास अच्छा है, बुरा है; उचित है, अनुचित है। उचित को पकड़ना पड़ेगा, अनुचित से मुक्त होने के लिए। उचित भी छूट जाएगा। एक समय ऐसा आएगा, आपके लिए ना अनुचित रहेगा, ना उचित रहेगा; आप रहोगे। लेकिन उस स्थिति तक पहुंचने के लिए आपको उचित का सहारा लेना पड़ेगा, क्योंकि अनुचित में आप फंस चुके हो।

पूछा है तो जवाब देना कर्तव्य है

जैसे आपने कुछ बोला और किसी ने कुछ पूछा — जरूरी नहीं कि उन्होंने बचपने में पूछा या जवानी में पूछा या वृद्धावस्था में पूछा। उन्होंने पूछा, आपका काम है जवाब देना। वो किस स्थिति में बोला है, उससे हमें मतलब नहीं है। और जब एज होती ही नहीं, तो बचपना कहां से आ गया? बचपना आया, इसका मतलब जवानी को आपने पकड़ा है, कुमार अवस्था को भी पकड़ा है, वृद्ध को भी पकड़ा है। कोई तो मापदंड है आपके पास। अगर आपने कहा कि आपने इस स्थिति में पूछा, मतलब आप स्थिति देखे, तो मतलब आप दायरे में भी जी रहे हो। इसे ध्यान से समझिएगा।

उसने चाहे जिस स्थिति में पूछा, उसने पूछा है — आपके पास जवाब है या नहीं? सीधा-सीधा हां या ना। अगर है, तो सीधा आप दे दीजिए; वो किस स्थिति में पूछा, वो छोड़ दीजिए। अगर मैं कुछ कह रहा हूं और उसमें कोई कुछ पूछ रहा है, तो मेरे पास जवाब होने चाहिए। वह किस स्थिति में पूछ रहा है — आवेश में पूछ रहा है कि जज्बात में पूछ रहा है, कि जिज्ञासु है, मेरा मजाक बना रहा है — यह मुझे नहीं देखना है। अगर उसने पूछा है, तो मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं उसे जवाब दूं। बस बात खत्म। यह मेरा दायित्व है, कर्तव्य है। या तो मुझे पता है, या तो नहीं पता है, या तो जिस तरीके से पता है, मैंने आपको बता दिया। बात खत्म।

बोल कोई नहीं रहा, जरूरतें बुलवा रही हैं

आपके शब्दों को सुनके उनका बचपना जगा। तो ठीक है, उनका बचपना जगा, तो आप भी कुछ अपने अंदर जगाकर उनको जवाब दो। बोल तो कोई भी नहीं रहा है; जरूरतें बुलवा रही हैं। बोल तो कोई भी नहीं रहा है — ना तुम, ना मैं। हम सब एक निमित्त हैं। सब जरूरतों में बोल रहे हैं आपस में। अगर देखा जाए, जिसे आप समझ रहे हो कि यह बोल रहा है, वह बोल नहीं रहा है। कोई नहीं बोल रहा है, कोई कर नहीं रहा है; स्थितियां-परिस्थितियां करवा रही हैं।

इसलिए अगर बातचीत करो, तो आपके पास जवाब होने चाहिए। उसने पूछा ना, बस बात खत्म। कम से कम पूछने में तो खड़ा है, और आप बताने में खड़े हो; आपके पास तो जवाब होने चाहिए।

पहले जरूरत, बाद में मांग

पूजा-पाठ में मांग होती है, माला फेरने में मांग होती है — तो मांग को खत्म करना है। मांग किस लिए हो रही है? क्या सीधा मांग खत्म कर सकते हो? मांग तो जरूरतों में हो रही है ना। जरूरतें कम करो, नहीं तो मांग तुम और कहीं कर बैठोगे। मांग किसी के लिए हो रही है ना। अगर भोजन की मांग है, तो जरूर कोई भूखा है — आप हो, चाहे कोई और है; उसकी भूख किसी तरीके से आपको मिटानी पड़ेगी। मांग कहां से हो रही है, वो देखो पहले। क्या सीधा आप मांगते हो? नहीं, पहले जरूरत, बाद में मांग।

अब देखना है कि जरूरत कहां से बनी है — जरूरत शरीर की है, जरूरत स्वाद की है, वह देखना है कि जरूरत पैदा कहां से हुई। क्या मेरे जीवन में उसकी आवश्यकता है? या मेरे जीवन में जरूरत तो नहीं है, लेकिन स्वाद की जरूरत है, मान की जरूरत है? मुझे घर बड़ा चाहिए, मुझे गाड़ी चाहिए, मुझे कपड़े चाहिए — मेरी जरूरत नहीं है, लेकिन क्या करूं? मेरे सामने कुछ लोग ऐसे हैं कि उनसे मुझे बड़ा बनना है, इसलिए मुझे गाड़ियां चाहिए, इसलिए मुझे मकान चाहिए, बड़े बंगले चाहिए।

स्वाद अलग-अलग, भोजन सबको चाहिए

स्वाद किसी भी स्थिति में सही नहीं है। स्वाद अगर आ रहा है तो ठीक है; अगर आप ले रहे हो अपने तरीके से, तो गड़बड़ है, क्योंकि आप उसमें कई लोगों को परेशान करोगे फिर। क्योंकि हर व्यक्ति का स्वाद अलग है। यहीं इतने लोग बैठे हैं — अगर सबसे आप अभी नोटबुक ले लो और लिखो कि दाल, रोटी, सब्जी बनाने जा रहा हूं, बताइए उसमें क्या-क्या डालना है, तो सब अलग-अलग बताएंगे। एक परिवार में ही ले लो — कोई कहेगा मिर्ची डाल देना, लेकिन मीडियम; कोई बोलेगा हम खूब तीखा खाते हैं; उसी घर में कोई बोलेगा नहीं, हम तो फीका खाते हैं; कोई कहेगा मिर्ची तो डालना ही मत भाई, मैं तो नहीं खाऊंगा। स्वाद अलग-अलग बताएंगे, लेकिन भोजन सबको चाहिए। सबका तरीका अलग होगा।

इसलिए उचित तरीका अपना के जीवन को जियो और अपना आत्मिक कल्याण करो। और हम अनुचित में फंसे हैं। मांग ऐसे ही नहीं खत्म होगी। मांग कहां से पैदा हो रही है, वह देखो। तुम यहां नहीं मांगोगे, और कहीं मांगोगे; मांगने का तरीका बदल दोगे। आपने जरूरत को बढ़ा के रखी है, तो मांगना तो पड़ेगा। जरूरत क्या सही है, क्या गलत — यह आपको देखना पड़ेगा। यह आपको देखना पड़ेगा कि आप जिंदगी को जीते हो कि जिंदगी को मान के लिए जीते हो।

जरूरत किसकी है

जरूरत आपकी है, कि जरूरत किसी और के लिए आपने पैदा की है — यह आपको देखना पड़ेगा। जरूरतें हम एक दूसरे को देख के पैदा किए हैं, कि सच में जरूरत मेरी है, मुझे चाहिए? देखिए किस स्थिति में आप हो। देखा जाए तो बहुत सारी चीजों की जरूरत है ही नहीं, फिर भी उनका वजन ले चल रहे हैं, व्यवस्था बना के चल रहे हैं।

यहां बिना जरूरत का कुछ नहीं होता है। या तो जरूरत आपके लिए है, या तो जरूरत आपने किसी के द्वारा पैदा किया हुआ है। आपकी जरूरत नहीं है, किसी और की है — मान की है, सम्मान की है; कहीं ना कहीं तो है। बिना जरूरत का आप अपने शरीर को भी नहीं सहलाओगे — आपका ही शरीर है; जरूरत में ही आप अपने शरीर को छूते हो। अब देखना है कि जरूरत पैदा कहां से हुआ है — जरूरत आपकी है या जरूरत किसी और की है। ज्यादातर जरूरतें आपके जीवन में किसी और की हैं, और वो है मान की इच्छा।