सत्संग PV03-0025 · भाग 3
बुद्धि स्तर पर समझ तो गए, अब उसमें जीना पड़ेगा — आत्मिक कल्याण के लिए समय दो
24 मई 2026 · ज्ञान का लाभ कैसे लें|ज्ञान लाभ|ज्ञान की प्राप्ति #yogijikasatsang #प्रत्यक्षज्ञान #aadhyatmikgyan
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मुख्य बातें
- सर्वप्रथम हमने सबसे आगे रखा है कामनाओं को — क्षणिक सुख के मारे इसे छोड़ नहीं पा रहा हूं, क्योंकि इसका परिणाम तुरंत है।
- किसी भी साधक को साल में कम से कम एक-आध महीना तो निकालना ही चाहिए कि एकांत जगह पर जाके पूरा समय अपने आप को दे, उसमें जिए।
- जीवन में हर बात आप बुद्धि स्तर से ही समझते हो, लेकिन जब करने लगते हो तब आपको अनुभव होने लगता है।
- लोग आगे तो बढ़ना चाहते हैं लेकिन समय नहीं देते; जितना देर सुनने में लगा, उससे कई गुना ज्यादा समय आपको पकाने में लगेगा।
- पुनर्जन्म नहीं होता तो सब एक जैसे पैदा होते — उस अबोध बालक ने क्या गलती की है?
- आप व्यवस्थाओं से तुलना मत करिए; मान का चक्कर छोड़ दोगे तो आपके लिए ना कोई बड़ा होगा ना छोटा।
कामनाओं को हमने सबसे आगे रखा है
सर्वप्रथम, हमने सबसे आगे रखा है कामनाओं को। लग तो रहा है कि इसे छोड़ के मेरा आत्मिक कल्याण होगा और मैं आनंद में रहूंगा; समझ में भी आता है, लेकिन क्षणिक सुख के मारे मैं इसे छोड़ नहीं पा रहा हूं — क्योंकि कामनाओं का परिणाम तुरंत है, चाहे क्षणिक ही सही। लेकिन आत्मिक कल्याण का परिणाम तो आखिरी में मिलता है। एहसास तो होने लगता है, जब आप इस पर चलते हो तो सुकून तो मिलने लगता है, लेकिन वो आत्मिक सुकून होता है।
अब क्या होता है कि आप जिस देश, काल, परिस्थिति में रहते हैं, वहां ज्यादा संख्या कामनाओं वालों की है। हमारे इर्द-गिर्द उनकी संख्या ज्यादा है; हमारे मार्ग के मार्गी बहुत कम हैं। आपके जीवन में गिने-चुने लोग आपसे आध्यात्मिक बातें करते होंगे, और व्यवहारिक जगत की बातें करने वालों की संख्या आप गिन नहीं पाओगे।
मूल बात क्या है? बुद्धि स्तर पर हम समझ तो गए, उदाहरण मेरे पास है, फार्मूला मेरे पास है, लेकिन मैं जीवंत होके उसमें जी नहीं पा रहा हूं।
साल में कुछ समय एकांत में
इसलिए किसी भी साधक को साल में कुछ समय — कम से कम एक-आध महीना तो निकालना ही चाहिए — कि एकांत जगह पर जाके पूरा समय अपने आप को दे, उसमें जिए; जहां पे बस उसके आत्मिक कल्याण की बात हो, उस मार्ग के मार्गी हों। ऐसे लोगों के साथ कुछ समय रहे जहां पर आत्मिक कल्याण के अलावा कोई बात ही ना हो, व्यवहारिक बातें ना हों। ये हम नहीं कर पाते हैं।
देखिए, आपके जीवन में उन्नति वहीं होती है जहां आपने काम किया है। व्यापारी व्यापार की बातें खूब करे, लेकिन व्यापार करे ना, तो लाभ होगा? नहीं। बेसिक जानकारी हो जाएगी, नॉलेज हो जाएगा, लेकिन जब व्यापार ही नहीं करेंगे, तो आपको मिलेगा क्या? बस शब्दों में रह जाएंगे। फसल की जानकारी ले लो — कैसे पैदा होता है, सब फार्मूला ले लिया, सब समझ में भी आ गया, लेकिन मैंने फसल नहीं बोई। तो बात वही हो रही है कि हम बुद्धि स्तर पर समझ तो ले रहे हैं, लेकिन उसके लिए काम नहीं कर रहे हैं।
जीवन में हर बात आप बुद्धि स्तर से ही समझते हो, लेकिन बाद में जब करने लगते हो, तब आपको अनुभव होने लगता है — आत्मिक अनुभव होने लगता है। पहले सिर्फ जानकारी थी, लेकिन जब आप करने लगे तो आपको आत्मिक अनुभव होने लगा। तो कहने का तात्पर्य है, उसमें आपको जीना पड़ेगा।
गाड़ी की सब जानकारी, पर चलाना?
संसार की कुछ भी ले लो — गाड़ी ले लो। आप उसे कभी बैठ के चलाओ मत और सब जानकारी ले लो — यहां ब्रेक है, यहां गियर है, एक्सीलेटर है, रिवर्स गियर है, आगे का गियर है, हॉर्न है। कोई भी पूछेगा ब्रेक कहां है, तो सब बता दोगे। लेकिन क्या इससे गाड़ी चलाना आ जाएगा? नहीं आएगा; चलानी पड़ेगी। चलाने के लिए आपको उस गद्दी पे बैठ के चाबी मारना पड़ेगा, और फिर एक रिस्क लेना पड़ेगा, और उसमें सिर्फ आप होंगे। बगल वाला कोई सपोर्ट दे सकता है — कि तुम चलाओ, मैं हूं — लेकिन एक ही गद्दी पर दो लोग तो नहीं बैठ सकते।
आप गाड़ी सीखे होंगे तो ऐसे ही सीखे होंगे। पहले देख के ब्रेक मारते थे — ब्रेक कहां है? लेकिन आज हाथ छोड़ के भी चला लेते हैं; बात भी कर रहे हो, गाने भी सुन रहे हो, और गाड़ी चल रही है। पहले उसी के लिए बहुत ध्यान देना पड़ता था। तो कहने का तात्पर्य है कि आपको समझने के बाद उसमें जीना पड़ेगा। जब जिओगे तभी कुछ समझ में आएगा। तो गलती हमसे यही हो जा रही है — हम शब्दों से खूब समझ ले रहे हैं, लेकिन उसके लिए हम समय नहीं दे रहे, समय नहीं निकाल रहे।
जहां भी आगे बढ़ना है, समय देना पड़ेगा
अगर इसमें आगे बढ़ना है — जहां भी आपको आगे बढ़ना है — समय देना पड़ेगा। आज जो भी आप सीख गए, आपने उसके लिए समय दिया। मोबाइल चलाना सीखा, इसके लिए समय दिया; पढ़ाई की, इसके लिए समय दिया। आपके पास जो भी आज नॉलेज है, जानकारी है, उसके लिए समय दिया। जब आप पढ़े, तब आपको नॉलेज था, जानकारी थी; जब करने लगे, तो अलग हुआ ना — जैसे-जैसे आप करते गए, वैसे-वैसे आपका डर हटता गया। पहले भी आपको जानकारी थी, लेकिन प्रैक्टिकल नहीं थी; थ्योरी थी, उदाहरण था। शुरुआत में जब आप काम करना स्टार्ट किए होंगे, तो एक भय लगा होगा, एक संकोच — सही होगा कि नहीं होगा। लेकिन जब करने लगे, तब तो आप कहीं से भी बैठे बता दे रहे हो कि ऐसे नहीं, ऐसे करो। तो आपको जीवंत होके जीना पड़ेगा; अपने आप को समझने के लिए समय देना पड़ेगा।
बारह महीने होते हैं — क्या एक महीना भी नहीं दे सकते? एक हफ्ता भी नहीं दे सकते पूरी तरह? मैं कह रहा हूं, तीन-तीन महीने में एक हफ्ता तो दे सकते हो। एक हफ्ते के लिए काम से बाहर जाना हो, तो आराम से चले नहीं जाते हो क्या? तो तीन-तीन महीने पे एक-एक हफ्ता दो ना — कहीं एकांत जगह, जहां लगे आपको शांति है, जहां पे व्यवहारिक बातें नहीं हो रही हैं, बस आत्मिक कल्याण के लिए आध्यात्मिक बातें हो रही हैं। आप जाके वहां ज्यादा नहीं, एक हफ्ता रहो, तब समझ में आने लगेगा। उसमें आपको जीना पड़ेगा, तब कुछ होगा; नहीं तो बस ऊपरी-ऊपरी जानकारी रह जाएगी, और फिर आखिरी में जानकारी भी काम आने वाली नहीं।
अगर आपको गाड़ी चलाना आ जाए और कुछ सालों तक छोड़ दो, तो जब पहली बार बैठते हो तो हाथ डगमगा जाते हैं — यार, बहुत साल हो गया छोड़ दिया; आता तो है, चला तो लेते हैं, लेकिन पहली बार बैठते हैं तो डगमगा जाते हैं। तो कहने का तात्पर्य है, आप समय दीजिए अपने आप को।
परिवार को भी इस लाइन पे लाओ
परिवार छोड़ो नहीं — परिवार को भी इस लाइन पे लाओ। चलो, एक हफ्ता हम मोबाइल वगैरह बंद करके अपने लिए देंगे पूरी तरह। परिवार तैयार हो, तो उस परिवार के साथ जाओ, कि एक हफ्ते तक हम आपस में व्यवहारिक बातें नहीं करेंगे; जब भी कोई बोलेगा, आत्मिक कल्याण के लिए बोलेगा। एक हफ्ते कहीं भी जाके रहेंगे, जहां पर ऐसा माहौल मिले, दुनिया में कहीं भी, और एक हफ्ते तक हमारी चर्चा बस ज्ञान चर्चा होगी, आत्मिक कल्याण के लिए; नहीं तो नहीं होगी। तब देखिए, कैसे आपका ग्रोथ होता है, कैसे उन्नति होती है।
परिवार तैयार है तो परिवार को ले जाइए, और नहीं तैयार है तो बोलिए मुझे एक हफ्ते का समय दो; एक हफ्ते के लिए कोई भी परिवार रोकेगा नहीं, आराम से निकाला जा सकता है। और देखो ना, हमारे घर पे कुछ हो जाए — कोई विवाह हो जाए, शादी हो जाए, कोई बीमार हो जाए — तो हम छुट्टी नहीं लेते हैं क्या? तो अपने आत्मिक कल्याण के लिए समय दो। समय दोगे तभी कुछ होगा।
सुनने से कई गुना ज्यादा समय करने में
मैंने यही जीवन में समझा कि लोग आगे तो बढ़ना चाहते हैं, लेकिन समय नहीं देते। शब्दों का ज्ञान खूब है, क्योंकि व्यवस्थाएं ऐसी हो गई हैं, सोशल मीडिया हो गया, कि आप तक वो चीजें पहुंच जा रही हैं — लाइव भी पहुंच जा रहा है, वीडियो भी पहुंच जा रहे हैं, किताब भी है। लोगों की बातें लोगों तक पहुंच पा रही हैं। लेकिन बातों के बाद काम भी तो होगा।
आपने वीडियो में सुन लिया कि भोजन ऐसे-ऐसे पकाया जाता है, लेकिन भोजन बनाने के लिए घंटों लगेंगे। जितना देर सुनने में लगा, उससे कई गुना ज्यादा समय आपको पकाने में लगेगा। आपने पढ़ लिया कि चावल को ऐसे धो के ऐसे रख देने से इतने समय में पक जाता है — पढ़ने में कुछ ही मिनट लगे, लेकिन बनाने में घंटों। तो कहने का मतलब यह है कि आपको उसमें जीना पड़ेगा और आपको करना पड़ेगा, तभी कुछ होगा।
पुनर्जन्म होता है या नहीं
शास्त्रों के हिसाब से मानें तो भी पुनर्जन्म होता है। अब मान लीजिए पुनर्जन्म नहीं होता, तो जितने लोगों का जन्म होता है, सब एक जैसे होते। कोई राजा के यहां, कोई रंक; कोई गरीब, कोई अमीर; कोई अपाहिज, कोई स्वस्थ; कोई दुखी, कोई सुखी। पैदा होते ही किसी को हर व्यवस्था मिल गई, किसी को दूध भी टाइम पे नहीं मिल रहा है। कोई काला, कोई गोरा। तो कुछ तो बात होगी, नहीं तो एक जैसे पैदा होते। उस अबोध बालक ने क्या गलती की है, बताइए? उसे तो यह भी नहीं पता कि कर्म क्या होता है; अबोध है। तो जरूर अगला-पिछला होता ही होगा। इतना तो हम अपनी समझ से समझ सकते हैं।
अगर अगला-पिछला नहीं होता, फिर किस बेस पे वो लंगड़ा है? वो राजा के यहां पैदा हुआ, वो गरीब के यहां पैदा हुआ — आधार क्या है? तो होता तो है; नहीं तो सब एक जैसे पैदा होते, और जब कर्म करने के लायक होते, तब जैसा वो कर्म करते, वैसा उन्हें परिणाम मिलता।
व्यवस्थाओं से तुलना मत करिए
और देखिए, जितने भी महात्मा हुए — ज्यादा से ज्यादा गरीबी में पले, या राजा के यहां जन्म हुआ फिर भी भिक्षुक बन गए। बाहर से उनके पास कुछ भी नहीं था, लेकिन अंदर से वो इतने ऊपर थे कि सम्राट भी जाके हाथ जोड़ते थे — जिसके पास बाहर की सब व्यवस्था थी — और कहता था, कोई मार्ग बताओ। बताइए, उनके पास क्या था? वो खुद थे, और कुछ भी नहीं था।
खुद की ताकत को पहचानो। आप अपनी तुलना बाहर के आवरण से कर रहे हो — यही गड़बड़ हो जा रहा है। हम अपने आप को व्यवस्थाओं से जोड़ रहे हैं; हमने व्यवस्थाओं को लक्ष्य बना लिया। संसाधन सिर्फ जरूरत है। अगर बाहर से देखेंगे तो ये बड़ा है, वो छोटा है; लेकिन अंदर से देखेंगे तो ये छोटा है, वो बड़ा है — तभी तो हाथ जोड़ रहा है। तो आप व्यवस्थाओं से तुलना मत करिए; यह तो व्यवस्थाएं हैं। जैसा जिसने कर्म किया है, वैसा मिला है। हो सकता है सम्राट सुखी नहीं है और एक गरीब सुखी है।
धन-दौलत हमारे पास हमारी जरूरत से ज्यादा है, लेकिन मान-तुलना के चक्कर में हम फंस गए हैं। तो मान का चक्कर छोड़ो। मान का चक्कर छोड़ दोगे ना, तो आपके लिए ना कोई बड़ा होगा, ना छोटा होगा। ये मान के चक्कर ने आपको परेशान किया है। आप देखोगे तो आपको जरूरत से ज्यादा आपके पास है, लेकिन फिर भी ज्यादा चाहिए। क्यों चाहिए? क्या करोगे लेके? बस यह बताने के लिए कि मैं कुछ हूं, वैभव से। आप अपनी ताकत पहचानो। यह सब व्यवस्थाएं हैं, यह सब संसाधन हैं; एक दिन छोड़ के जाना भी पड़ेगा। उसके पहले, जाने के पहले, अपने आप को साध लो — इनका सदुपयोग करो और अपने आत्मिक कल्याण में लग जाओ।