आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0027 · भाग 25

प्रभु, मैंने आपसे जो भी प्रश्न किए, उनमें मुझसे जो भी गलती हुई हो, आप और सुनने वाले सभी साधक मुझे माफ करने की कृपा करें।

ऐसी कोई बात ही नहीं। जैसे मां का दूध पीते हुए बच्चे कई बार मां के ही स्तन को काट लेते हैं — गाय का भी देखा होगा, भैंस का भी — लेकिन उनका काटने का भाव नहीं रहता। मां फिर मारती भी है, लेकिन फिर दूध भी पिलाती है। कहने का मतलब, आप लोग जिस जगह बैठे हैं वहां त्रुटि होगी ही होगी, वो कोई नई बात नहीं है, क्योंकि आपके ऊपर अहम है, वो काम कर रहा है। उस स्थिति में आप प्रश्न पूछेंगे ही पूछेंगे; अब उसका जवाब मुझे कैसे देना है, आपके अहम को गिराना है — वह मेरा काम है। आप गलतियां करेंगे ही करेंगे, आप नहीं चाहोगे तो भी होंगी, क्योंकि आप उस जगह खड़े हो। बस आप अपने आप को बदलो। उसमें माफी की कोई जरूरत नहीं है। माफी तो उससे मांगी जाती है जो मुझसे अलग हो। जो तुमसे अलग है ही नहीं, उससे क्या माफी मांगोगे? कौन किसको माफ करेगा? किसी भी आत्मज्ञानी के लिए सब एक जैसे हैं — उसको आप कुछ भी बोल दो, कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वो जानता है आप उस जगह खड़े हो, इसमें आपका दोष भी नहीं है। उसे पता है आप कामनाओं में घूम रहे हो, अहम आप पे राज कर रहा है, आपकी सत्ता आप पे है ही नहीं; कामनाओं की वजह से अहम हावी हो गया है। इसलिए वह किसी में दोष नहीं देख पाता। इसलिए लोग मुझे गाली देते हैं तो मैं हंसता हूं कि उनकी भी गलती नहीं — वो क्या करें, राक्षस प्रवृत्ति ही उन पर इतनी हावी हो गई है। चलो, कम से कम सुन तो रहे हैं; कभी ना कभी अपनी स्थिति में आएंगे। वो तो मुझे जानते भी नहीं, कभी मिले ही नहीं, मेरा नाम भी पता नहीं — वो मुझे गाली क्यों देंगे? अपना गुस्सा उतार रहे हैं, कहीं मौका मिला तो उतार दिया। मैं तो कहता हूं आप अच्छी जगह दे रहे हो — कम से कम बंधन नहीं बन रहा, कोई प्रतिक्रिया इधर से वापस नहीं जा रही। कहीं और देते और उसका जवाब आता तो बंधन बंधने लगता।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: मोह और प्रेम गलत है या सही ? #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान #साधना · 2026-06-16