प्रश्नोत्तर P25-0053 · भाग 25
गुरु जी, बच्चा जब पैदा होता है तो अबोध होता है, उसमें कोई वासना नहीं होती। फिर जो वासनाएं आती हैं, क्या वे प्रकृति की हैं — क्या प्रकृति ने हमें ऐसा बनाया कि वासनाएं हों और फिर हम उनसे मुक्त हों?
नहीं नहीं, ऐसा नहीं है। हम वासनाएं धारण करते हैं। पहले तो जरूरत में जीते हैं; धीरे-धीरे जब हम समझने लायक होते हैं तो मान के चक्कर में आ जाते हैं — सम्मान के चक्कर में, बड़ा बनने के चक्कर में। उसमें हम बेईमानी करके वासनाएं धारण करने लगते हैं। हार्मोन तो शरीर में आता है — शरीर भोग से आया है, योग से तो आया नहीं; शरीर के अंदर तो सब है ही, वो अपने समय पे जागृत होता है। अब आपको कैसे उपयोग करना है, वो देखो। बेईमानी तो शरीर में थोड़ी ना है, बेईमानी तो आपने किया। आप संबंध बनाने को वासना ना समझो — संबंध को गलत तरीके से बनाना वासना है। ये शरीर की जरूरत है; ये अपनी जरूरत पूरा करता है — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — पांच इंद्रियों द्वारा। इसकी सबसे मुख्य जरूरत है भोजन और सांस, वो तो आपको देना ही पड़ेगा, आप चाहो या ना चाहो। बाकी जरूरत है तो दो, नहीं तो मत दो। अगर इसको भी आपने ईमानदारी से दिया तो मुक्ति से मोक्ष तक; बेईमानी से दिया तो बंधन। आपको चाहिए योग, इसे चाहिए भोग — लड़ाई ये है। रास्ता यही है कि अपने तरीके का त्याग कर दो, धीरे-धीरे रस खत्म हो जाएगा, तुम ही बचोगे। जो है उसमें ईमानदारी से जियो।
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वीडियो: मोह और प्रेम गलत है या सही ? #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान #साधना · 2026-06-16