प्रश्नोत्तर P25-0054 · भाग 25
गुरु जी, बात समझ में तो आ गई, पर व्यवहार में एकदम नहीं आती। मान लो मैंने सोच लिया कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन शरीर को भूख लगेगी, भोग की और काम की भी इच्छा होगी — तो क्या करें?
"मुझे कुछ नहीं चाहिए" — उस भाव को रखते हुए भोग करोगे तो धीरे-धीरे निकल लोगे ना। पहले तो "चाहिए" में भोग कर रहे थे, अपने तरीके से। अब मुझे नहीं चाहिए, तो मैं विवश होके भोग कर रहा हूं। अब मैं देख पा रहा हूं कि यह मेरा शरीर कर रहा है, मेरी वासनाएं करवा रही हैं, मैं तो कर नहीं रहा हूं। तो धीरे-धीरे आप हट जाओगे, क्योंकि आप ये देख पाओगे कि मैं तो ये कर ही नहीं रहा हूं, मुझसे करवाया जा रहा है — मेरी वासनाएं करवा रही हैं, कामनाएं करवा रही हैं; मुझे तो करना ही नहीं है। आपको तो कुछ करना ही नहीं है, हो रहा है वासना की वजह से — तो धीरे-धीरे निकल जाओगे, क्योंकि इतना ध्यान रहेगा कि मुझे तो चाहिए नहीं।
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वीडियो: मोह और प्रेम गलत है या सही ? #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान #साधना · 2026-06-16