आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0056 · भाग 25

गुरु जी, अभी मैं इस स्थिति में नहीं कि आश्रम बनाने में आर्थिक रूप से कुछ सहयोग दे पाऊं, लेकिन दो-चार दिन के लिए ही सही, शारीरिक श्रम देना चाहता हूं।

देखिए, मूल यह है कि आप आत्मिक कल्याण का काम करें और अपना आत्मिक कल्याण करें — वही सेवा है। बाकी धन सेवा, तन सेवा देने के लिए लोग हैं ही, इसकी कोई कमी नहीं है। कहने का मतलब है, आप लोग अपना आत्मिक कल्याण करें, बाकी सब हो जाएगा — यही सेवा है। कोई कितना भी दे दे, कोई मतलब नहीं है, क्योंकि जो बनेगा वह बिगड़ेगा भी, बस उपयोग होगा। बनेगा-बिगड़ेगा, यही चलता रहता है। तो कम से कम जो था, है और रहेगा — उसकी यात्रा करनी है। बाकी तो ये सब काम होते रहते हैं। हम तो इसी को सेवा समझते हैं — अगर आपने अपना आत्मिक कल्याण करने की यात्रा कर ली, यही सेवा है मेरे लिए।

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वीडियो: मोह और प्रेम गलत है या सही ? #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान #साधना · 2026-06-16