आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0076 · भाग 25

गुरु जी, कभी-कभी जो लोग साथ में होते हैं उनसे ईर्ष्या होती है। क्या करूं?

आपने उनसे वाहवाही की उम्मीद रखी थी कि मैं इनसे ज्यादा हूं; समाज में कहीं यह दिखाने का प्रयास किया होगा। वे आगे निकल गए तो आपको तकलीफ हो रही है। हम किसी को दिखाने के लिए क्यों जीते हैं? मैं स्वयं के लिए, अपने काम को ले के क्यों नहीं जीता? कोई ना आगे है ना कोई पीछे है। आप उसकी तरफ देख रहे हो, इसलिए पीछे हो। बस तुम्हें मुड़ने की जरूरत है। मुड़ने का मतलब है उसके जीवन में मत झांको कि वह क्या कर रहा है; तुम देखो तुम कहां हो। तुम्हारे करने से कुछ होगा, देखने से नहीं। सबकी अपनी-अपनी समझ, विवेक और क्षमता है। हाथी को बहुत भोजन चाहिए, चींटी का इतने में पेट भर जाएगा — पेट तो दोनों का भरा। चींटी हाथी का भोजन खाए तो उसी में दब के खत्म हो जाएगी, और हाथी चींटी वाला भोजन करे तो वह भी मर जाएगा। आपकी क्षमता अनुसार ही आपको समझ, धन का बल और तन का बल दिया गया है; आप उसमें जियो। अगर और ज्यादा चाहिए तो अपनी समझ और अपनी ताकत को विकसित करो — देखो आपको क्या चाहिए, कैसे मिलेगा, और उसके लिए क्या काम करना है। धन का बल बढ़ाना है तो धनवान के साथ काम करो, शरीर का बल बढ़ाना है तो पहलवान के साथ रहो, और समझ विकसित करनी है तो जिसकी समझ विकसित हो गई उसके साथ रहो। लेकिन तीनों में समय लगेगा। पहलवान ने दो-दो पीस मेवा बताया और तुम एक ही दिन में चार किलो खा लो, तो बीमार हो जाओगे — जिससे ताकतवर बन रहे थे वही कमजोर कर देगा। इसीलिए धीरे-धीरे अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ो।

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