प्रश्नोत्तर P25-0078 · भाग 25
गुरु जी, शरीर तो साधन मात्र है — तो इसे कौन चलाता है? हम ध्यान में बैठने जाते हैं तो कौन बैठा हुआ है?
इस समय तो तुम चला रही हो। मूल तो आत्मा है। दो मैं हैं — एक अहम मैं, एक परम सत्य। तुम हाथ को ऐसे कर रही हो तो हाथ ऐसे हो रहा है; तुम नहीं कर रही हो तो नहीं हो रहा है। बैठ आप रहे हो, लेकिन आपकी जरूरतें बैठा रही हैं — हम जहां भी हैं, अपनी जरूरत पूर्ति कर रहे हैं। खाने-पीने, उठने-बैठने, ईमानदारी हो चाहे बेईमानी, हर काम में शरीर ही साधन बन रहा है, लेकिन जिम्मेदार आप हो, शरीर नहीं। जब एक्सीडेंट होता है तो गाड़ी नहीं पकड़ी जाती, ड्राइवर पकड़ा जाता है। ड्राइवर कहे कि ब्रेक पहले से फेल था, तो बनवाया क्यों नहीं? ढलान पे गाड़ी अपने आप चल गई, तो हैंड ब्रेक क्यों नहीं लगाया? गाड़ी निर्दोष है; हम इसको कहां ले जा रहे हैं, उसके जिम्मेदार हम हैं। यह शरीर गाड़ी है और इसमें तुम बैठी हो। तो इस गाड़ी का उपयोग सही जगह करो, नहीं तो पकड़े जाओगे और सजा भोगोगे। और कोई भी प्रश्न उठे तो पूछा करो — प्रश्न ना छोटा होता है ना बड़ा; बिना उत्तर के प्रश्न खत्म नहीं होगा।
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