आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0123 · भाग 25

गुरु जी, जब हम साधना में बैठते हैं तो जो विचार आते हैं, हम फिर उनकी जड़ में जाते हैं कि उसके पीछे राग है या द्वेष है या और कोई दोष है — क्या उसका ऐसे पता लगाना पड़ता है?

जब विचार आते हैं, या किसी व्यक्ति का भी विचार आएगा कि उसने कुछ कर्म किया है, तो उसी समय पता चल जाएगा कि सामने वाले से द्वेष है कि राग है। अब यह देखना है कि राग-द्वेष है क्यों — दो में से एक ही होगा, या राग होगा या द्वेष। तो देखना है कि उसके प्रति द्वेष क्यों बना, उसका कारण क्या है। जब तुम आखिरी में पहुंच जाओगे कि उसका कारण कौन था — मैं था कि वो था। अगर वो था, तो फिर मेरे कर्म का प्रारब्ध था; भोग लो, खत्म करो, छोड़ो। और मैं था, तो मैं क्षमा मांगता हूं। अगर वो जिंदा है तो जाकर क्षमा मांग लो, और नहीं रहा तो तस्वीरें होंगी — क्षमा मांग लो कि मैं जाने-अनजाने में समझ नहीं पाया, मेरी समझ कम थी, या मान के चक्कर में, बड़ाई के चक्कर में, वाहवाही के चक्कर में आकर मैंने तुम्हारा अपमान किया। आज तुम नहीं हो, जहां भी तुम हो वहां से मुझे क्षमा करो — क्योंकि तुम कहीं तो हो। और जब आप सच में क्षमा मांगोगे ना, तो आपको आंसू आएंगे, ये समझ लेना। बस ऐसा करो।

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