आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0124 · भाग 25

गुरु जी, कल आपने "मैं आत्मा" और "आत्मा" बोला था — इसमें अंतर बताइए। दर्द किसको होता है?

दर्द मेरा को होता है। जैसे मान लीजिए तेरे पास कोई वस्तु है, तूने अपने उपयोग के लिए खरीदी है; अगर टूट जाए तो तुझे दर्द होगा ना। लेकिन उसकी कीमत मिल गई हो और तेरे सामने ही टूट जाए, तो तू कहेगी अच्छा हुआ, मैं बच गई। तो दर्द किसमें था — उस वस्तु में था या मेरा के भाव में? लोग गाय-भैंस पालते हैं; अगर वो जवान है, दूध देती है और मर जाए, तो तुझे दुख होगा। लेकिन तूने उसका सौदा कर दिया और सौदा होते ही तेरे सामने मर जाए, तो दुख नहीं होगा, अंदर-अंदर बचने की हंसी आएगी कि मेरा नुकसान बच गया। तो दुख कहां था? मेरा में — मेरा शरीर, मेरी चीजें, मेरे लोग। और दुख किससे होता है? जिससे मुझे कुछ मिलता रहता है। पहला दुख मां-बाप से होता है; स्त्री पति के यहां जाती है तो पति से ज्यादा हो जाता है, मां से थोड़ा कम; आदमी को पत्नी से और अपने बच्चों से ज्यादा हो जाता है। अगर दर्द मां के लिए था तो वह हमेशा बना रहना चाहिए था ना? 20-30 साल के बाद एक अनजान आदमी मिलता है, उसके लिए सब कुछ हो जाता है, वही मेरा हो जाता है; भाई-बहन बीमार हो जाए तो सक्षम होने पर भी कह देंगे मेरे पास नहीं है, लेकिन घर में पति, पत्नी या बेटे को कुछ हो जाए तो सब कुछ बेच देंगे। लगाव धीरे-धीरे कम क्यों होता है? क्योंकि जो मेरी जरूरतों को पूरा करता है, वो मेरे लिए सबसे प्रिय है। मेरा बना सुख-स्वाद के चक्कर में — पांच इंद्रियों द्वारा शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से मैंने उससे सुख लिया, इसलिए उसे कुछ होता है तो दुख होता है। हम गुरु से भी शब्द लेते हैं, तो गुरु को भी कुछ होगा तो पीड़ा होगी — लेकिन यह पीड़ा तेरा उद्धार कर देगी, क्योंकि तू मुक्त पुरुष से जुड़ गई। जैसे आनंद ने बुद्ध से पूछा कि मुझे उपलब्धि कब होगी, तो बोले तुम सब जगह से छूट चुके हो, मुझ में फंस गए हो; और उनका शरीर छूटने के बाद आनंद की उपलब्धि हुई। तो जहां-जहां मेरा का भाव जकड़ा होगा, उसे कुछ भी होगा तो पीड़ा तुझे होगी।

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