आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0152 · भाग 25

गुरु जी, कर्म का जो सिद्धांत है, जो लेन-देन हो रहा है — आत्मज्ञानी जब देखता है कि शरीर भोग रहा है, तो वो कर्म किसका रहता है, उसका या शरीर का? कर्म तो उसका ही है ना?

समझ में आ जाएगा — एक हिसाब से शरीर ही भोगेगा, उसको भोगना हुआ ही नहीं; वो तो दूसरे के जैसा देख रहा है। जैसे मान लीजिए आपकी शादी हुई; अब एक-दूसरे को कुछ भी हो रहा है तो दोनों को पीड़ा हो रही है। लेकिन तलाक हो गया, अब एक-दूसरे को कुछ भी हो रहा है तो पीड़ा कहां गई? जब तक मेरा था तभी तक पीड़ा थी — तेरा में पीड़ा नहीं होती, पीड़ा मेरा में होती है। शरीर से अलग होने के बाद ये भाव छूट जाता है। उम्मीद छूटेगी तभी आप शरीर से अलग हो पाओगे; जब तक उम्मीद है, नहीं हो पाओगे — क्योंकि शरीर के द्वारा ही तो आप उम्मीद में हो। बाहर के रूप से मुक्त होंगे, स्वरूप में आएंगे, तो इस शरीर का अलगाव देख पाएंगे; उस रूप में फंसे हैं तो अपने आप को शरीर ही मानेंगे। "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाएंगे तो स्वरूप में आ जाएंगे, आत्मा का बोध होगा, आत्मज्ञान होगा; और इस रूप से मुक्त होंगे तब ब्रह्म ज्ञान होगा — ये यात्रा है।

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वीडियो: समय बीत जाने के बाद समझ क्यों आती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान · 2026-06-15