आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0191 · भाग 25

जब मन विरक्त हो गया और मैं सबसे हट गया हूं, तो प्रश्न यह खड़ा होता है कि मेरी उपलब्धि क्यों नहीं? मैं उस परमानंद में क्यों नहीं, आत्म-साक्षात्कार क्यों नहीं?

तो इस पे आत्मिक चिंतन करो। बस अपने को यह देखना है कि आखिर जब सब कुछ हो ही चुका है — राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता के भाव से मैं छूट चुका हूं — तो फिर मैं उस परम स्थिति को उपलब्ध क्यों नहीं हूं? इसका मतलब कहीं ना कहीं कुछ है, मैं देख नहीं पा रहा हूं, मैं समझ नहीं पा रहा हूं। कुछ तो है, नहीं तो मैं उस स्थिति में होता, उस परम आनंद में होता। अगर अप-डाउन चल रहा है, इसका मतलब अप-डाउन में मैं कहीं हूं — कहीं तो राग-द्वेष है, कुछ तो मान की इच्छा है, कुछ तो बढ़ाई की इच्छा है। कोई ना कोई मेरी सूक्ष्म इच्छा बाकी है। अगर उपलब्धि नहीं है तो इसका मतलब कोई ना कोई कामना है। और बहुत आसानी से ढूंढ सकते हो, अगर आप स्वीकार करो। कभी-कभी हम अपनी कमियों को स्वीकार नहीं कर पाते — कमी दिखती भी है, लेकिन उस कमी को अपना टैलेंट, अपनी योग्यता समझते हैं। तो आप कमी को ढूंढो कि कौन सी ऐसी कमी है जो मुझे अपने स्व में स्थिर नहीं होने दे रही, सत्य तक पहुंचने नहीं दे रही, परम आनंद को उपलब्ध नहीं होने दे रही। मैं कहां उलझा हूं? कहां फंसा हूं? कुछ तो है, कोई तो बात है। इसे खोजिए।

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