सत्संग PV03-0029 · भाग 3
आखिर में क्या बचेगा? जीरो — परिक्रमा मतलब परिवर्तन, शब्द बीज है
27 अक्टूबर 2026 · आखरी में क्या बचेगा? जीरो | योगी गुरु जी का सत्संग
चैनल: आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान मार्ग
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मुख्य बातें
- परिक्रमा का मतलब है परिवर्तन लाओ — अपनी बुद्धि में, अपने आचरण में; कुछ हो के चले थे, कुछ नहीं में पहुंचे।
- अपनी तुलना ऊंचे से करोगे तो आचरण नहीं बदल पाओगे; इससे अहंकार बढ़ता है।
- शब्द बीज है — आप जैसा बोलते हो, वैसा करते हो, वैसा बनते चले जाते हो; इसलिए सोच समझ के बोलो।
- तपोभूमि अस्पताल जैसी है — यहां हम सुधरने आए हैं, और सुधारने वाले अनेक भेष में मिलेंगे।
- राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और कर्ता के भाव से मुक्त होकर अपने स्व में स्थिर होना है।
- अंक हटाने हैं; आखिर में जीरो बचेगा, और परमानंद में जीरो भी छूट जाएगा — लक्ष्य पे पहुंचोगे तो मार्ग छूट जाएगा।
परिक्रमा मतलब परिवर्तन
परिक्रमा का मतलब यह नहीं कि अपन घूम के घर बैठ गए। परिक्रमा का मतलब यह है कि परिवर्तन लाओ — अपनी बुद्धि में, अपने आचरण में, अपने आप में। कुछ हो के चले थे, कुछ नहीं में पहुंचे — तो परिक्रमा मतलब चरित्रवान होना।
मेरा भेष भी मत देखो। मैं 2019 से इस तट पे घूमता हूं; मैं एक-एक कपड़े में ही भ्रमण करता था।
तुलना से अहंकार बढ़ता है
मैं इसलिए आपको सलाह दे रहा हूं कि अगर अपने आचरण को बदलना है, तो अपनी तुलना ऊंचे से नहीं करनी चाहिए कि मैं ऐसा हूं — आचरण नहीं बदल पाओगे। इससे अहंकार बढ़ता है।
नर्मदा परिक्रमा मतलब नर के मद को हरने वाली मां नर्मदा की परिक्रमा। ये इसलिए की जाती है कि राग और द्वेष से मुक्त हो जाएं। यहां तो हमारा अपना व्यक्तिगत परिचय भी छोड़ना है।
शब्द बीज है
ये तपोभूमि है; आपको क्षण-क्षण सचेत रहना पड़ेगा, नहीं तो हमारी भूल ही तो हमें गिराती है। आज अगर हम परमानंद से भटके हैं और सुख-दुख में, राग-द्वेष में गोते खा रहे हैं, तो कहीं ना कहीं हमने बहुत कुछ खो दिया है।
शब्द ही हमें ब्रह्म तक ले जाता है। शब्द मकड़ी के जाल की तरह है — आप जैसा बोलते हो, वैसा करते हो, वैसा बनते चले जाते हो। तो हमें बहुत सोच समझ के शब्दों का उच्चारण करना चाहिए। शब्द बीज है। आप ये मत सोचो कि कुछ भी बोलें — आपने एक बीज बोया, और आप वैसे बनते चले जाओगे।
तपोभूमि: सुधरने की जगह
ये अपने आप को सुधारने की जगह है। अगर हम सुधरे होते तो हमारे लिए यह जगह नहीं है। हॉस्पिटल में एक बीमार आदमी और एक डॉक्टर की जरूरत है, स्वस्थ आदमी की जरूरत थोड़ी ना है। तो यहां हम सब बिगड़े हैं, तभी तो यहां घूम रहे हैं। हमें अपने आप को सुधारना है।
जैसे हॉस्पिटल में जाओगे तो डॉक्टर मिलेंगे, वैसे ही इस तपोभूमि पे आपको ऐसे संत मिलेंगे। यहां दो तरह के लोग होते हैं — एक सुधरने वाले और एक सुधारने वाले। सुधारने वाले आपको अनेक भेष में मिलेंगे; आप जैसे ही गलती करोगे, तुरंत आपको टोकेंगे।
परिक्रमा किसलिए
जन्म-मृत्यु के गोते खा रहा हूं, उससे मुझे मुक्त होना है। सुख-दुख से मुक्त होना है। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा-मेरा, कर्ता के भाव से मुझे मुक्त होना है। समभाव, समदृष्टि में आना है। अपने स्व में स्थिर होना है — मैं इसलिए परिक्रमा कर रहा हूं।
इसलिए आपको हर समय सचेत रहना पड़ेगा और शब्दों को बहुत सोच समझ के बोलना पड़ेगा।
आखिर में क्या बचेगा? जीरो
आप जहां से चले थे, वहीं पहुंचोगे तो क्या होगा? शून्य। शून्य को हम कहते हैं कुछ नहीं। तो आपको कुछ नहीं में आना पड़ेगा, तब परिक्रमा का जीवन में मतलब होगा।
अभी क्या है? आप हो, जीरो है, उसके आगे कई अंक हैं। वो अंक हटाना है। और आखिर में क्या बचेगा? जीरो। जीरो के पीछे तुम, और तुम में आनंद। जीरो कब होगा? जब अनेक लोगों से छुटकारा पाओगे। और जीरो में जैसे ही आओगे, अपने आप में आ जाओगे — परमानंद में जीरो भी छूट जाएगा। लक्ष्य पे पहुंचोगे तो मार्ग छूट जाएगा।
लाखों लोग परिक्रमा कर रहे हैं, तो लाखों में से एक-आध लोगों की ही परिक्रमा सफल हो पाती है — जिसने अपने आप को बदलने के लिए किया हो।