आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

सत्संग PV04-0031 · भाग 4

जीवन में सार्थक क्या है और निरर्थक क्या है — सोच समझ के जीना ही साधना है

29 अक्टूबर 2026 · जीवन में सार्थक क्या है और निरर्थक क्या है ?

चैनल: आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान साधना

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मुख्य बातें

सार्थक और निरर्थक

सार्थक और निरर्थक — जिससे अपना आत्मिक कल्याण हो जाए वो सार्थक है, और जिससे हम बंधन में बंध जाएं वो निरर्थक है। ये सीधी बात है। जीवन में कुछ भी हम कर रहे हैं, आत्मदर्शन हो जाए वो करने से, तो वह सार्थक है। और फिर हम अगर बाहर भटक गए, बंधनों में बंध गए, वो हमारे लिए निरर्थक है, व्यर्थ।

अब आप देखो कि क्या-क्या आपके जीवन में सार्थक है और क्या-क्या निरर्थक है। यह आपको देखना है, क्योंकि निरर्थक और सार्थक में आप ही उलझे हुए हो। निरर्थक में फंस गए हो, इसलिए सार्थक की जरूरत है। अज्ञान में अपने आप को फंसाए हो, इसलिए ज्ञान की जरूरत है। नहीं तो ज्ञान की भी जरूरत नहीं है। आत्म को तो पहले से ज्ञान मौजूद है।

साबुन, मैल और कपड़ा

बाहर के जाल में, बंधन में हम फंस गए हैं, उससे अपने आप को निकालने के लिए ज्ञान चाहिए। बाद में अज्ञान भी नहीं रहेगा, ज्ञान भी नहीं रहेगा। कपड़ा धोने के लिए साबुन चाहिए — उस पर जो मैल लग गया है ना, वो धोने के लिए। कपड़ा अभी भी साफ ही है।

जब आप कपड़ा धोते हो, पानी लेते हो, साबुन लेते हो और धुलाई करते हो, तो साबुन भी बह जाता है, मैल भी बह जाता है और पानी भी बह जाता है। बचता क्या है? कपड़ा। तो ज्ञान भी चला जाएगा, अज्ञान भी चला जाएगा, और जिसमें फंसे हो वो भी चला जाएगा। बचोगे आप।

छोड़ना तो सब है

ऐसा नहीं है कि कुछ बचा रहेगा। सब चला जाएगा। छोड़ तो सब जाने वाला है। अगर समझ के छोड़ दिया, छूटने की स्थिति में आ गए, तो मुक्ति से मोक्ष तक। और छीना जा रहा है आपसे और फिर भी चाहिए, तब बंधन है। जाना तो आपको हर हाल में है छोड़ के; लेकिन अभी भी उससे कुछ चाहिए, तब बंधन में जाओगे और फिर एक नया शरीर धारण करोगे उस इच्छा को पूरी करने के लिए।

स्वाद का चक्कर

अगर आपको मुंह ही साफ करना है तो सीधे तरीके से मुंह साफ करो ना — मंजन, दातून, नमक, कुछ भी कर लो। मुखवास वो एक बहाना है, स्वाद का चक्कर है। अलग-अलग तरीके से हम स्वाद में उलझे हुए हैं। एक बार भर पेट खा ही लिया, तो क्या जरूरत है मुखवास की?

वो सब मान के लिए है, वो सब सोसाइटी के लिए है, वो जीवन जीने के लिए नहीं है। वो अपने बड़ा 'मैं कुछ हूं' — इसे खड़ा करने के लिए है। खाओ, खूब खाओ, लेकिन बहाने से नहीं। सीधा कहो हम खा रहे हैं।

ना मांगूंगा, ना छोडूंगा

शरीर को जितनी जरूरत है, उतना लो। खा तो बहुत लिए, अब जरूरत में जियो ना। गाड़ी का एवरेज निकाल लिए, मोबाइल का एवरेज निकाल लिए, लेकिन अपना एवरेज नहीं निकाल रहे कि मैं कितना खाऊंगा।

वो व्यक्ति कितनी मेहनत से, कहां-कहां से व्यवस्था करके आप लोगों को खिला रहा है, और आप लोग इतना ले रहे हो कि फेंक रहे हो। अगर आपको देना है तो अलग से निकाल के रखो। लेकिन इतना ध्यान रखिए कि एक बार थाली में लीजिए और पक्का कर लीजिए — ना तो मांगूंगा, ना छोडूंगा। और अगर एक बार छोड़ना पड़े, तो दूसरे दिन आधे पेट से कम खाना — आज दंड दूंगा।

महान व्यक्ति वो होता है जो स्वयं पे अनुशासन करता है; कमजोर व्यक्ति वो होता है जो दूसरों पे अनुशासन करना चाहता है।

सोच समझ के जीना ही साधना है

सोच समझ के जीवन को जीना ही साधना है। साधना कुछ अलग से नहीं है। बोलचाल, खान-पान, उठने-बैठने से लेकर इसका विशेष ध्यान रखना कि कहीं गलती ना हो — यही साधना है।

जब भी आपके साथ कुछ हो रहा है, आप कर रहे हो या कोई आपके साथ कर रहा है, तो देखो आपका उसमें भाव क्या है, और यह कर रहा हूं तो इसका परिणाम क्या आएगा। इसे देखना है, समझना है।

यह पूरा शरीर का सिस्टम सबका एक ही है। फिर हमने क्यों बंटवारा कर दिया कि ये बड़ा, ये छोटा? स्थिति-परिस्थिति में हम कर्म करके अलग-अलग हो गए हैं। तो ठीक है — हमारे द्वारा अगर बुरा कर्म हुआ, तो हम अच्छा करना चालू करेंगे। जब तक मेरे पास समझ नहीं थी, तब तक बेईमानी की; अब नहीं करूंगा। ईमानदारी अपना के, सत्कर्म करके अपना आत्मिक कल्याण करूंगा, अपने आप को पवित्र करूंगा।

रहना तो है, पवित्र होकर रहो

मैं आत्मा हूं तो भी रहूंगा, मैं शरीर हूं तो भी रहूंगा। रूप का नाश होगा। जब बिखरना ही है, परमात्मा के पास जाना ही है, तो शुद्ध होके जाओ, पवित्र होके जाओ।

कम से कम मैं जहां भी जाऊं, अगर किसी के पास जाऊं, तो उसका जीवन सुकून से हो, शांति का एहसास हो। इतना पवित्र तो मैं अपने आप को कर लूं कि अगर आने वाले इतिहास में कोई मुझे छू दे, तो उसे परम शांति का एहसास हो — वहां से वो हटना भी ना चाहे।

आप थे, हो और रहोगे। तो जब रहना ही है, तो पवित्रता से रहने में क्या जाता है?

यही साधना है — ईमानदारी और सत्कर्म

ध्यानपूर्वक जीवन को जियो, कोई गलती ना हो — इसी को साधना कहते हैं। बस इतना ध्यान रखना है कि कोई गलती ना हो, किसी की भावनाओं को ठेस ना पहुंचे, कर्म करते हुए छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड ना हो। कुछ भी मैं करूं तो उसमें मान की इच्छा ना हो, दिखावा ना हो, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा ना हो, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा ना हो। लेने-देने में राग-द्वेष ना हो।

ईमानदारी और सत्कर्म करना है — यही साधना है। और ये नहीं किए तो कुछ भी कर डालो, कुछ नहीं होगा। एक बेईमान आदमी कितनी भी साधना करे, उसका कुछ होगा? कुछ नहीं होगा।

जब आप सत्कर्म करोगे, जरूरतमंदों की सेवा करोगे, तो उनके रोम-रोम से आपके लिए आशीर्वाद निकलेगा। उससे आपको ऊर्जा मिलेगी और निर्विकार होने में सहायता मिलेगी। कोई कांप रहा है, जाके उसे कंबल दो — वो रोम-रोम से आशीर्वाद देगा। पेट भरा है, उसे कोई भोजन दे, तो वो ले भी लेगा, लेकिन उससे आशीर्वाद नहीं निकलेगा।

उस परम सत्ता से मिलने का सीधा-सीधा मार्ग है — ईमानदारी और सत्कर्म। यही रास्ता है।