आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0014 · भाग 25

गुरु जी, आत्मा का मूल क्या है?

आत्मा का मूल आत्मा है, आत्मा ही है। एक कण का मूल एक कण है, एक पत्ते का मूल एक पत्ता है। आत्मा कहीं से है — इसीलिए तो आत्मा किसी को खोज रहा है, कुछ पाना चाहता है। अब संसार से पाना चाह रहा है तो फंस गया। पहले वो आगे गया कि मैं इस संसार में पा जाऊंगा, पूर्ण हो जाऊंगा — वह नहीं हो पा रहा है। तो आत्मा समझ गया कि इस संसार में मैं पूर्ण नहीं हो पाऊंगा। तो फिर संसार को छोड़कर अपने आत्म तत्व में स्थिर होना चाहता है, अब वो पीछे जाना चाहता है — जहां से मेरा अस्तित्व है। जब हम उससे मिलेंगे तभी हम पूर्ण हो पाएंगे। पहले तो सीधा संत से नहीं मिला — पहले संसार से अपने आप को भरना चाहा: विवाह-शादी, पढ़ाई-लिखाई, धन-दौलत, गाड़ी-बंगला। इससे भर नहीं पाया, तो ये बात समझ गया। जो लोग नहीं समझे हैं वो अभी संसार में ही लगे हैं, भरना चाह रहे हैं। जिसने वहां जी लिया और देखा कि यहां का आखिरी परिणाम मौत है, मौत के बाद फिर शरीर मिलेगा, फिर वही — जन्म-मरण, बीच में बच्चे, परिवार, दुख, कलह, परेशानी; और जिसके लिए करो वह भी छोड़ दो — तो जिसके समझ में यह बात आ गई, उसने कहा नहीं भाई, इससे तो मुझे निकलना है। यह कब समझ में आएगा, कोई फिक्स नहीं — जैसे व्यक्ति कोमा में गया तो एक दिन में भी बाहर आ सकता है, 20 साल भी लग सकते हैं। जब यह बात समझ में आ जाएगी तो आप वापस आने लगोगे। घुमा-फिराकर संसार में दुख के अलावा कुछ नहीं है — जिससे मिल रहे हो उससे बिछड़ोगे भी, चाहे वैभव हो चाहे कोई रिश्ता, और बिछड़ने में अपार कष्ट होता है। तो जीवात्मा समझ जाता है कि इनमें कष्ट है, तो ये बनाना बंद करो — अगर सुख नहीं लोगे तो दुख नहीं आएगा। नए रिश्ते बनाना बंद करो, और जितना बना है उससे धीरे-धीरे निकलो। इसीलिए मैं कहता हूं यहां व्यवहारिक बातें मत करना, नाम भी मत पूछो किसी से — जैसे ही पूछा, रिश्ता बन गया। मूल तक पहुंचने का एकदम सरल मार्ग है — नया बनाना बंद कर दो। संसार परिवर्तनशील है; ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग अपना लिए तो पुराने का नाश होता जाएगा, नया तुम पैदा नहीं कर रहे हो, तो एक समय ऐसा आएगा कि मूल में आ जाओगे। जिस घर की रिपेयरिंग नहीं होती, एक दिन वह खत्म हो जाता है।

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