प्रश्नोत्तर P25-0125 · भाग 25
गुरु जी, आपने बताया था कि एक मैं अहम में होता है और एक परम सत्य में। तो हम परम सत्य में कैसे जाएंगे?
एक मैं होता है अहम में — मैं ये हूं, वैभव के द्वारा, लोगों के द्वारा — और एक होता है परम सत्य में। अहम वाला मैं छोड़कर उस परम सत्य में स्थिर होना है। सबसे खतरनाक है अहम मैं; यही हमें घुमा रहा है। मैं हर जगह सिद्ध करना चाहता हूं कि मैं कुछ हूं, बाहर अपने अस्तित्व को सिद्ध करना चाहता हूं — जब तक बाहर अपने अस्तित्व को सिद्ध करोगे, तब तक तुम फंसे हो। परम सत्य में तब जाओगे जब अहम मैं का नाश होगा, और अहम मैं का नाश तब होगा जब तुम कुछ बनने से मुक्त हो जाओगे, उम्मीद से परे उठ जाओगे, हर तरह की उम्मीद छूट जाएगी। तब जाकर परम सत्य में आप स्थिर हो जाओगे। अहम मैं कैसे बना, इसे समझ लेना जरूरी है: पहले मेरी जरूरत ऐसे ही पूरी हो जाती थी, ना अहंकार था, ना कुछ — छोटा बच्चा सोने का बिस्किट छोड़ देगा और खाने वाला बिस्किट उठा लेगा, अभी उसमें मेरा-तेरा आया नहीं है। मेरा पहले जरूरत में बना। फिर मान का चक्कर देखा — सम्मान चाहिए, पद चाहिए, प्रतिष्ठा चाहिए, लोग मेरी इज्जत करें। तो पहले मैं मेरा का उपयोग अपनी जरूरत में करता था, अब उसका दुरुपयोग करने लगा — वैभव की ताकत, शरीर की ताकत, मेरे लोगों की ताकत का — और जितना दुरुपयोग करता गया, उतना अहम मैं तैयार होता गया और परम सत्य वाला मैं दबता चला गया, क्योंकि आप जिस पे काम करोगे वही बढ़ेगा। अब ये स्थिति हो गई है कि अहम मैं आपको जीने नहीं दे रहा; शांति ढूंढ रहा है, एकांत ढूंढ रहा है। जब तक इसका नाश नहीं होगा, तब तक तुम परम सत्य में पहुंच ही नहीं पाओगे, कहीं भी चले जाओ। इसका नाश कैसे हो? उस पे काम करना पड़ेगा। नदी-नाले, हिमालय पे जाने से कुछ नहीं होगा।
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