प्रश्नोत्तर P25-0140 · भाग 25
गुरु जी, जब इंद्रियां काम करना बंद कर दें, तब कोई सरेंडर कर दे — क्या इसमें भी चालाकी है?
वही तो — बंदूक की गोली खत्म हो गई और कह रहा है मैंने हाथ उठा दिया। जैसे ही खटखट दबाया और उनको पता चल गया कि गोली नहीं है, अब तुम्हारे हाथ उठाने का मतलब नहीं है। अगर बंदूक में गोली होती तब कहते कि ठीक है भाई, तेरे समर्पण का मतलब है। जब समझ गए कि अब पकड़ा जाऊंगा और कहा ये लो बंदूक, उठा दिए हाथ — इस समर्पण का कोई मतलब नहीं है। समर्पण नहीं हुआ, ये तो मजबूरी हुई। अब हाथ-पैर काम ही नहीं कर रहे, तो चालाकी से सोच रहा है मैं यहां से निकल जाऊं। जब तक कर सकते थे तो किया नहीं — ऐसा नहीं कि समझ नहीं थी, समझ तब भी थी। अपराधी पकड़ा जाने के बाद कहे मुझे छोड़ दो, मैंने अपराध स्वीकार किया — तो छोड़ दोगे? नहीं। अगर पहले आकर समर्पण कर दिया होता तो कुछ इधर-उधर किया जाता; सारी इंक्वायरी के बाद, सबको परेशान करने के बाद जब पकड़ा गया तब बोला मैं समर्पण करता हूं — अब समर्पण के लायक तुम रहे कहां?
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वीडियो: समय बीत जाने के बाद समझ क्यों आती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान · 2026-06-15