आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P25-0193 · भाग 25

किसी आश्रम में साधना के लिए बड़ा योगदान (शुल्क) देना पड़ता है और हम उतना नहीं दे पाएं, तो क्या करें?

अगर नहीं दे पाओगे — देखो, जैसे यहां पे मैंने कहा निशुल्क, तो यहां पे रहो, कोई दबाव नहीं। लेकिन अगर वहां व्यक्ति होटल को दे रहा है और लोगों को खर्च दे रहा है, तो वह कहां से भरेगा? उतना है तो ही जाओ, नहीं तो मत जाओ, क्योंकि उस पे भी तो दबाव होगा। अगर वो समाज की व्यवस्था लेके आपको साधना करवा रहा है और उसका किराया दे रहा है — चाहे वस्तु है, सामान है, जगह है — तो उस व्यक्ति को दबाव मत दो। आप मदद नहीं कर सकते, तो कम से कम जितनी तुम्हारी फीस है उतना तो उसे दो। और अगर कोई निशुल्क कर रहा है, तो हमें अपनी क्षमता अनुसार सहयोग देना चाहिए कि भाई यह निशुल्क कर रहा है, यह इसकी महानता है। यह कर्मभूमि है — इस पृथ्वी पर निशुल्क कुछ है? कोई कीमत चुकानी पड़ती है। अगर कोई निशुल्क दे रहा है तो उसने कहीं कीमत चुकाई है, मेहनत किया है। तो मैं जिस लायक हूं, उस लायक सहयोग दूं। अगर मैं और लोगों के लिए नहीं दे सकता तो कम से कम अपना तो दूं, और अपना नहीं दे सकता तो शरीर से मेहनत कर दूं। धन की भरपाई कोई और कर देगा, लेकिन तन का भी सेवा होता है, तो मैं वो कर दूं। किसी न किसी तरीके से मैं भरपाई करूं। अगर मुझमें लेने की ताकत है, इसका मतलब देने की ताकत है।

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