प्रश्नोत्तर P27-0011 · भाग 27
गुरु जी, "कुछ नहीं चाहिए" की इस समझ में यहां के वातावरण में जीना आसान लगता है; लेकिन जब हम वापस घर और ऑफिस जाएंगे, तो उस चुनौती भरे वातावरण में यही समझ रखकर कैसे जीना है?
पहले तो "कुछ नहीं चाहिए" को समझना है। जीवन जीने के लिए भोजन भी चाहिए, कपड़ा भी चाहिए — यह शरीर की जरूरत है। कुछ नहीं चाहिए का मतलब है जरूरत में जीना, और यह आप कहीं भी जी सकते हैं। उसमें मान की इच्छा का त्याग, बड़ा बनने की इच्छा का त्याग, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग और दिखावे का त्याग — इन चार से ही आप परेशान हो; ये चार हटा दो। जिंदगी जीने के लिए मिली है, मान के लिए नहीं; तो जरूरत में जियो, बात खत्म। जीते-जीते समझ में आएगा कि मेरी तो कोई जरूरत ही नहीं — जरूरत तो शरीर की है। शरीर की जरूरतों को हमने अपनी जरूरत समझ बैठा। शरीर तो साधन है, एक चेतन मशीन है, जैसे आपके पास मोटरसाइकिल है; उस परम तक पहुंचने का साधन था, हमने इसका दुरुपयोग कर लिया और अपना परिचय बनाने में बेईमानी-दुष्कर्म कर बैठे, अशांति और घुटन जमा कर ली। अब जरूरत में जीना चालू करिए; एक समय आएगा जब पता चल जाएगा कि मेरी जरूरत कुछ नहीं है, और उस दिन आप पूरी तरह "कुछ नहीं चाहिए" में स्थिर हो जाओगे।
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वीडियो: कुछ नहीं चाहिए मैं कैसे आए ? #livesatsangyogijika #pratyakshjyan #aadhyatmikgyan · 2025-03-12