आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर — भाग 26

योगी रविकांत जी (योगी गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 18 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

गुरु जी, मैं 9:00 बजे खाना खा लेता हूं। उसके बाद मैं साधना नहीं कर पाता, मुझे तुरंत नींद आ जाती है। क्या करूं — खाना खाऊं या नहीं?

ठीक है। उसके पहले खा लो, या उसके पहले साधना कर लो, फिर भोजन करो।

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महाराज जी, भगवान का एक चित ध्यान का अभ्यास कैसे करें? कृपया मार्गदर्शन करें।

देखो, आप अपने आप को ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म में लगाओ। ठीक है? सत्कर्म ही आपका कल्याण करेगा — ईमानदारी और सत्संग के साथ।

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गुरु जी, मैं ईमानदारी से घर चलाती हूं, पर मुझे बदले में बेईमानी मिलती है। इससे मैं कैसे बाहर निकलूं?

आप ईमानदारी से जियो। बस बात खत्म।

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जब हमें ठेस पहुंचती है, तो उस समय क्या करें?

जब आपको ठेस पहुंचती है, तो मुझे यह देखना है कि जिसके द्वारा मुझे ठेस पहुंची, उस व्यक्ति का मेरे लिए भाव क्या था? वह क्या करना चाहता था? ठेस क्यों पहुंची? क्या मुझे सुधारना चाहता था? मुझे बदलना चाहता था? मुझे ठेस पर ध्यान नहीं देना है। ठेस तो लगेगी ही, क्योंकि आपकी धारणाएं हैं। आपकी धारणाएं जब टूटेंगी, तभी कुछ होगा। तो धारणाएं जब टूटेंगी, तो बहुत ठेस पहुंचने वाली है।

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क्या बिना गुरु के परमात्मा मिल सकते हैं? बताएं गुरु जी।

नहीं। कैसे मिलेंगे? गुरु ज्ञान का प्रतीक है, और आप अज्ञान के भवसागर में पूरी तरह फंस गए हो। जब तक ज्ञान नहीं मिलेगा, मार्ग नहीं मिलेगा, तब तक आप आगे कैसे जा सकते हो? सीधी सी बात है।

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गुरुदेव, अभी भी हमारे संशय पूर्ण रूप से गिरे नहीं। कभी-कभी ऐसा होता है।

हां, जब तक आपकी उपलब्धि नहीं होगी — उपलब्धि हो जाएगी, संशय तभी मिटेगा, और जब तक उपलब्धि नहीं होगी, संशय बना रहेगा। लेकिन हमें अपने विवेक, अपनी समझदारी से समझना है। हमें भ्रमित नहीं होना है। ठीक है? हमें समझकर ज्ञान के द्वारा आगे बढ़ना है। मुझे किसी कामना में, किसी अनुभव में नहीं फंसना है। मुझे सिर्फ निकल जाना है।

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गुरुदेव, आपने बोला था "एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब जाए" — इसका क्या मतलब है?

एक मतलब अपने को साधना है। एक ही साधे सब सधे — एक को सुधारना है, और वो भी कर्म के द्वारा। तो बस अपने को साध लिए, तो बात खत्म हो जाएगी।

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एक वीडियो में आपने कहा है कि परमात्मा को पाने के लिए गुरु की आवश्यकता नहीं होती है — इसे समझाइए।

आप उस वीडियो को फिर से देखिएगा और बात समझिएगा। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु कोई व्यक्ति विशेष या शरीर नहीं है। लेकिन जिस शरीर के द्वारा मुझे ज्ञान मिल रहा है, उस शरीर को हमें प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उस शरीर द्वारा ही खोजा है। तो गुरु के द्वारा अपने स्व तक पहुंचना है, आत्मज्ञान तक। और आत्मज्ञान के बाद ब्रह्म ज्ञान में किसी की जरूरत नहीं है। ठीक है? आपकी यात्रा ऐसे ही हो जाएगी।

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गुरु जी, कुछ नहीं चाहिए — क्या गुरु को अर्पण, सेवा के उद्देश्य से जाप कर सकते हैं?

जाप कर सकते हैं, लेकिन जाप के पहले पूरी तरह ईमानदार हो जाइए।

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आत्मचिंतन के दौरान विचारों के प्रति प्रतिक्रिया ना देने पर अंदर से खालीपन का एहसास होता है, डर भी लगता है और घबराहट भी होती है — तो क्या करें?

तो सिर्फ उसे देखें। ठीक है? प्रतिक्रिया ना दें। देखें।

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गुरु जी, अपने आप को साधने के लिए जो कर सकते हैं वह करें — चाहे अपनों को या सबको छोड़ दें?

सिर्फ, देखो, बुराइयां छोड़नी हैं। हमें हमारे आचरण को बदलना है।

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गुरुदेव, आपने कहा था कि जो चले गए, उनके साथ हमने क्या किया — अब हमें हमारी गलतियां नजर आती हैं। तो क्या करें?

ठीक है, अगर वह मिल जाएं तो उनसे क्षमा मांगो। अगर इस दुनिया में नहीं मिल पा रहे हैं, तो आंतरिक रूप से क्षमा मांग लीजिए, और किसी के साथ ऐसा ना करना।

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गुरु जी, एक बार फिर से स्वभाव, कुभाव, अभाव को समझा दीजिए।

स्वभाव मतलब आप समझ के निकले हो कि मुझे अपना आत्मिक कल्याण करना है, सूझबूझ के साथ — तो ऐसे साधक वापस कभी नहीं जाते, सिर्फ अपना आत्मिक कल्याण करते हैं। कुभाव मतलब आप जहां पर हो, वहां झगड़ा हुआ, झंझट हुआ, आपके विरोध में हुआ, विपरीत हुआ, दुख हुआ — फिर आप निकल रहे हो। और अभाव का मतलब कोई कमी के कारण निकल रहे हो — कोई वैभव की कमी है, ऐसी कोई बात है। फिर ऐसे साधक ज्यादातर भटकते रहते हैं।

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सच्चे और ढोंगी गुरु की पहचान कैसे करें?

सबसे पहले आप देखिए — क्या आप ईमानदार हैं? आप जीवन में पूरी तरह ईमानदार हैं, सत्कर्मी हैं? क्या सच में ज्ञान की खोज में निकले हैं? तभी आप सच्चे गुरु की पहचान कर पाएंगे। और सच्चे गुरु की यही पहचान है कि आप उसके पास जब तक रहेंगे, घुमा-फिरा के वह आपके कल्याण की ही बात करेगा। आपके कल्याण के लिए वह हर वक्त काम करेगा। यही असली गुरु की पहचान है।

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गुरु जी, जीवन का उद्देश्य कैसे फिक्स करें?

लक्ष्य को समझें कि जीवन में मुझे क्या चाहिए? मैं कहां जाना चाहता हूं? और जब परिणाम आएगा, तो उस परिणाम का क्या होगा?

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योगी जी, जब तक आपका सत्संग चल रहा है तब तक आनंद की वर्षा हो रही है, सत्संग खत्म होते ही आनंद खत्म हो जाता है — क्या करें?

तो शब्दों में जीने का प्रयास करिए।

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गुरुदेव, मैं अपनी सामर्थ्य से इस मार्ग पर हूं, परंतु फिर भी यदि मैं निकल लिया (शरीर छूट गया) और आत्मज्ञान नहीं हुआ, तो क्या होगा?

हां, जैसे आप सफर पर निकल गए, तो रात को जहां आपने विश्राम किया, सुबह वहीं से यात्रा की शुरुआत होगी। जब भी आप चलोगे, तो यात्रा की शुरुआत वहीं से होगी। तो अब देखना है कि जैसी मति वैसी गति। अगर आखिरी में आप वापस जाते हुए शरीर छूटा है — ऐसा तो नहीं कि लक्ष्य से आप भाग गए, तब शरीर छूटा है — तब तो बहुत दुविधा में आपका जन्म होगा। और अगर आपने लक्ष्य की तरफ ही मुंह करके शरीर को छोड़ा है, लक्ष्य को पाने में ही शरीर छोड़ा है, तो आपका जन्म होगा और जब आप समझने लायक होंगे, तो वहीं से यात्रा की शुरुआत हो जाएगी।

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गुरु जी के प्रति पूर्ण शरणागति कैसे लें? सेवा भाव कैसे जागे? सेवा कब मिलेगी?

सेवा करोगे तो सेवा मिलेगी। देखिए, जैसे आप सत्कर्म का भाव रखते हो, पहले कुछ-कुछ मिलता है आपके जीवन में, और जैसे ही गुरु के सानिध्य में जाते हो, आपको 24 घंटे मिलने लगता है। तो सत्कर्म ही करो, क्योंकि जितनी तेजी से आप सत्कर्म करोगे, उतनी तेजी से यात्रा होगी।

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