पूरे परिवार में कितने लोग हैं और शराबी कितने? पचास में से तीन शराबी तुम्हें दिख रहे हैं, सैंतालीस अच्छे नहीं दिख रहे। जिसको नहीं सुधरना है उसे कोई नहीं सुधार सकता; जिसको सुधरना है उसे सुधारा जा सकता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी आ जाएं, जिसे नहीं सुधरना वो नहीं सुधरेगा — कृष्ण भगवान ने दुर्योधन के लिए कितना प्रयास किया, उसने कहा मुझे धर्म भी समझ में आता है पर अधर्म करना अच्छा लगता है; सुई की नोक भर जमीन भी देने को तैयार नहीं हुआ। अगर आप बदलाव चाहते हो तो आप किस लायक हो — धन से, तन से, ज्ञान से? सहानुभूति से बीमार ठीक नहीं होता, दवा में सहयोग क्या करोगे वो बताओ। अगर चाहते हो वो परिवार सुखी रहे तो जवाबदारी लो, जैसे अपने बच्चों को पाल रहे हो वैसे उनके बच्चों को भी पालो। और जब तुम खुद एक जर्दा नहीं छोड़ पा रहे हो तो उन्हें बोल भी नहीं सकते — फंसे तुम भी हो, फंसे वो भी हैं। पहले अपनी कमी दूर करो, तब सामने वाले को समझाओगे तो वो मानेगा।
अपने लिए किया है, किसी और के लिए नहीं। भोजन वगैरह अगर अकेले के लिए कुछ करना है तो उस तरीके से नहीं करते, लेकिन किसी और के लिए करना है तो फटाफट कर लेते हैं। उसे आलस्य नहीं बोल सकते, क्योंकि हम अपने जीवन में आलसी नहीं रहे — हमने जरूरत नहीं समझी। अगर उसी समय किसी की आवाज आ जाए तो, जो मैं अपने लिए नहीं उठ पा रहा था, उसके लिए रात भर वो काम कर दूं।
कुछ बोल नहीं सकते। मजबूत को धक्का मारो, तुरंत जवाब मिलेगा; कमजोर को मारोगे तो बाद में मिलेगा, लेकिन कई गुना मिलेगा — जितना विलंब होगा उतना बढ़ता जाएगा।
माया में फंसे नहीं — यही तो बात है। जब एक बार आत्मज्ञान हो जाता है तो व्यक्ति माया में फंसता नहीं है। पुत्र-मोह में आकर उन्होंने कृष्ण को बोला था, पर ग्रसित नहीं हुए थे; कृष्ण भगवान ने उन्हें पुत्र-मोह से हटाया। देखिए, पिता का आखिरी समय था तो बुद्ध मिलने गए थे ना — कहीं न कहीं पिता से अपनापन था। आदि गुरु शंकराचार्य अपनी मां के लिए गए कि नहीं? तो अपनापन रहता है; कभी-कभी आ जाता है, लेकिन वो टिकता नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान के सामने वो टिकेगा नहीं।
अर्थ — ईमानदारी से वैभव हो। धर्म — जब आपके द्वारा परोपकार होता है तो वहां धर्म घटित होता है, वह आपको धार्मिक बनाता है; जब आप किसी कमजोर को सताते हो तो वह आपको अधार्मिक बनाता है — यह धर्म की परिभाषा है। काम — जब भी आपके द्वारा कार्य हो तो निष्काम कार्य हो, बिना इच्छा-अपेक्षा के, और परिणाम की इच्छा अपने तरीके से ना करें। मोक्ष — अगर ये सब आपने अपना लिए तो आप मोक्ष की स्थिति में पहुंच जाओगे। एकदम सीधा-सीधा है।
सुमिरन मतलब प्रार्थना। इसके आगे हमें नहीं पता है और हम कभी जानने का प्रयास भी नहीं करते। अनहद नाद के बारे में न तो हमें जानकारी है, न हम इसके बारे में जानना चाहते हैं। भैया, हम सीधा-सीधा अपने चक्कर में पड़े — न चक्र के चक्कर में पड़े, न नाद के चक्कर में; सीधा अपने चक्कर में पड़े कि हमारा कैसे कल्याण हो। साफ-साफ बात।
आपको बहुत भूख लगी थी; मुझसे मिलने के बाद भूख मिट गई, तो हमने जरूर आपको भोजन करा दिया — अदृश्य में, आप नहीं देख पाए। बात खत्म। आपकी भूख मिट गई ना, तो आपको खुशी होनी चाहिए।
पहले तो "कुछ नहीं चाहिए" को समझना है। जीवन जीने के लिए भोजन भी चाहिए, कपड़ा भी चाहिए — यह शरीर की जरूरत है। कुछ नहीं चाहिए का मतलब है जरूरत में जीना, और यह आप कहीं भी जी सकते हैं। उसमें मान की इच्छा का त्याग, बड़ा बनने की इच्छा का त्याग, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग और दिखावे का त्याग — इन चार से ही आप परेशान हो; ये चार हटा दो। जिंदगी जीने के लिए मिली है, मान के लिए नहीं; तो जरूरत में जियो, बात खत्म। जीते-जीते समझ में आएगा कि मेरी तो कोई जरूरत ही नहीं — जरूरत तो शरीर की है। शरीर की जरूरतों को हमने अपनी जरूरत समझ बैठा। शरीर तो साधन है, एक चेतन मशीन है, जैसे आपके पास मोटरसाइकिल है; उस परम तक पहुंचने का साधन था, हमने इसका दुरुपयोग कर लिया और अपना परिचय बनाने में बेईमानी-दुष्कर्म कर बैठे, अशांति और घुटन जमा कर ली। अब जरूरत में जीना चालू करिए; एक समय आएगा जब पता चल जाएगा कि मेरी जरूरत कुछ नहीं है, और उस दिन आप पूरी तरह "कुछ नहीं चाहिए" में स्थिर हो जाओगे।
प्रकृति आपसे बात थोड़ी करती है। कोई ऐसा जीवंत मार्ग बताने वाला चाहिए कि आप उसकी बात समझ पाएं और वह आपकी बात समझ पाए। ईमानदारी और सत्कर्म करो, मार्ग बताने वाला गुरु आपको मिल जाएगा। प्रकृति आखिरी गुरु है, जब कोई शरीरधारी गुरु नहीं मिलता है।
मेरे समझ में जितना आया, ज्योतिष एक मैथ है; उसके द्वारा कुछ देखा और समझा जा सकता है, बदला नहीं जा सकता। जहां तक मैंने समझा, पूरा मैथ है — देखने का हां, बदलने का नहीं।
जरूरत में जियो ना। जरूरत में जीना ही "कुछ नहीं चाहिए" में जीना है — आप इस बात को समझिए। भोजन कर रहे हैं तो शरीर के लिए, स्वाद के लिए नहीं; कपड़े पहनना तन ढकने के लिए, मान के लिए नहीं; घर बनाना रहने के लिए, मान के लिए नहीं; गाड़ी लेना जरूरत के लिए, मान के लिए नहीं; मोबाइल लेना, चप्पल-जूते खरीदना जरूरत में, मान के लिए नहीं — यह ध्यान रखना।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। शब्द तो चाहिए ना — भक्ति करने के लिए भी शब्द चाहिए। शब्द कहां से लोगे? तुम्हारे पास एक शब्द है क्या? कहीं न कहीं से तो लेना पड़ेगा। गुरु शब्द है; जब शब्द ही नहीं रहेगा तो भक्ति कैसे करोगे? गुरु ज्ञान का प्रतीक है — ज्ञान लो, आगे बढ़ो, इस शरीर के चक्कर में मत पड़ना।
ईमानदारी और सत्कर्म करो। मैंने तो जीवन में यही समझा है — सत्पात्र होना सीख जाओ और किसी का उपयोग मत करो। अगर किसी का सदुपयोग हो भी, तो किसी और के लिए हो, तुम्हारे लिए नहीं। अगर किसी से सहयोग भी ले रहे हो तो किसी और के सहयोग के लिए लेना, अपने लिए मत लेना — बस इतना ध्यान रखो।
अपने आप में स्थिर हो जाएगा, आत्मज्ञान तक पहुंच जाएगा — इस मार्ग से पहुंच जाओगे। और आत्मज्ञान के बाद कुछ जरूरत नहीं है, सब अपने आप होता है; आत्मज्ञान तक आपको प्रयास करना पड़ेगा।
कभी भी कर सकते हैं। जैसे भूख लगने पर भोजन कभी भी कर सकते हैं। अब बाथरूम लग गई तो मुहूर्त देखोगे? ये सब में क्यों नहीं देखते आप लोग? अरे भैया, जब जरूरत हो कर लो।
सो जाओ, जब तक नींद पूरी ना हो उठो मत। और जब आप खाने बैठो तो जब तक पेट ना भर जाए तब तक उठो मत। और जब नींद एकदम गिरने लगे, तब सो जाओ। ऐसा ये जिंदगी जियो।
अगर आपका कोई अपमान करता है तो आप में ताकत होनी चाहिए सिद्ध करने की कि यह आदमी गलत है और मैं सही हूं — तभी जवाब दो, नहीं तो चुप रहना चाहिए। अपने आप को मजबूत बनाना है; उस अपमान के घूंट को पी लेना भी ताकतवर बनाता है। अगर आपने जवाब दिया और पता चला कि आपकी भी गलती है और वह सही सिद्ध हो गया, तो आप और गिर जाओगे। जवाब नहीं दोगे तो लोग कहेंगे — देखो कितना अच्छा आदमी है, जवाब नहीं दिया। तो समझ-बूझ के बोलिए। और गलती पता चल जाए तो गलती मान लो; बहाने बनाना, मशीनों का या दूसरे आदमी का दोष देना — यह नहीं करना।
शरीर पिता के शरीर से निकलता है, मां पालती है। आपने ध्यान दिया है कि सिम कार्ड में नंबर तभी आता है जब उस पर एक आईडी लगी हो? आईडी ना लगी हो तो नंबर नहीं आएगा; यह एक सिस्टम की व्यवस्था है। नंबर पहले से मौजूद है, लेकिन चालू तभी होता है जब आईडी लगी हो। तो आत्मा नहीं, जीवात्मा आती है — शरीर में आने के लिए उसे भी वह आईडी देनी पड़ती है। मतलब आप किसी काम से ही यहां आए; पहले काम था, फिर बाद में शरीर मिला, और इस शरीर के द्वारा आपको वह काम करना है। लेकिन आए तो मान के चक्कर में आकर और कुछ करने लगे — यही गलती हो रही है। बेईमानी, छल, कपट, चोरी, पाखंड, मान की इच्छा, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा, दिखावे की इच्छा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा — ये सब भटकाव है, क्योंकि ये हमारा स्वभाव नहीं है; इसे हमने धारण किया है।
तुरंत — एक घड़ी, आधी घड़ी, एक सेकंड के चौथे भाग में। किसी को एक साल में गर्भ ठहरा, किसी को कई साल में, लेकिन ठहरने में समय कितना लगा? एक पल ही। जितना पहले वाले को लगा था, कई साल वाले को भी उतना ही लगा। तो आत्मज्ञान जब भी होता है, एक क्षण में ही होता है; लेकिन उसकी योग्यता आने के बाद ही होता है। योग्यता लाने में ही प्रयास करिए। बिना योग्यता के तो जर्दा भी नहीं मिलता।
इसलिए कि आप काम करते हुए, आराम से ईमानदारी से जीवन जीते हुए, सत्कर्म अपनाते हुए अपने परिवार के साथ रहकर आत्मज्ञान तक उपलब्ध हो सकते हैं। एक संन्यासी के लिए यह इतना जटिल है — वह काम नहीं कर सकता क्योंकि उसे जल्दी आत्मज्ञान चाहिए; एक वक्त की रोटी कोई खिलाए तो उसके बदले उसे उपाय बताने पड़ते हैं — कमर में पीड़ा है, लड़की का ब्याह नहीं हो रहा — और कोई नहीं पूछता कि जिसके लिए निकले थे वह उपलब्धि हुई या नहीं। और जहां व्यवस्था है वहां साधना के लिए एकांत नहीं मिलता। यह मेरा व्यक्तिगत भुक्त-भोगी अनुभव है। इसलिए साधक का जीवन बहुत जटिल है, और गृहस्थ में रहकर मैं आपको बता दूं — बहुत आसान है। प्रत्यक्ष ज्ञान के माध्यम से अब तो मार्ग एकदम आसान है।
कहने का मतलब, पहले अपने आप को जानो। सबको जानो चाहे ना जानो — क्या करोगे जान के? अपने आप को जानो, अपने आप को पहचानो, बात खत्म। और अपनी पहचान तो वर्तमान में पता ही है कि तुम क्या हो; मूल में जाओ।
मैं अगर बोलूं तो अब मेरे लिए दूसरे भी नहीं रह गए। मैं आपको साफ-साफ बताऊं तो मैं अब किसी को दूसरा समझता भी नहीं। यह भी मत सोचना कि अपना समझता हूं — नहीं, अपना भी नहीं समझता। ना दूसरा समझता हूं ना अपना; जो है सो है। आप कुछ नहीं के लिए आए हो, इसलिए मैं आपको कुछ नहीं समझता।
नए से भी अपना सकते हो, आप में क्षमता होनी चाहिए। या खोदा हुआ पानी पियो या खुद खोद के पियो — ताकत होनी चाहिए भुजाओं में। किसी का बोरिंग आ रहा है तो पानी पियो, या तो बोरिंग लगवाने की ताकत हो।
प्रेम की परिभाषा क्या है? कुछ नहीं चाहिए — प्रेम है। तो क्या कुछ नहीं चाहिए में किसी से प्रेम हुआ? अगर सामने वाले से कुछ नहीं चाहिए और लग रहा है प्रेम है, तब तो प्रेम है। प्रेम है बिना इच्छा-अपेक्षा के। जो दुकान से जर्दा लिए, खाए — प्रेम था; और थूक दिए। फिर उठा के खाओ तो प्रेम है! जरूरत पूरी हो गई तो थूक दिया। ऐसे ही होता है; किसी से प्रेम नहीं है भैया, सब अपने मतलब में जी रहे हैं। मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं।
सरल होना तो एकदम सरल है। जब अपने तरीके से नहीं चाहिए तो आप सरल हो; अपने तरीके से चाहिए तो आप जटिल हो। बस कितनी सीधी बात है। मुश्किल तो आपने बना दिया है — अपने तरीके से चाहिए में। जैसा आप हो वैसा आपको मिल रहा है, स्वीकार क्यों नहीं कर रहे हो? यहां तो किसी का तरीका ही नहीं चलता, किसी का बैकग्राउंड काम नहीं करता — जो सही है वो चलेगा। प्रकृति का नियम भी यही है, भगवान का नियम भी वही है: जो सही है वही चलेगा, तेरा-मेरा नहीं चलेगा।
हां, दुख-सुख से मुक्त हो जाता है। यह आप मुक्ति पा के खुद देख लो, क्योंकि बताने का कोई मतलब नहीं। लखीमल-करोड़ीमल का पाठ आपने पढ़ा है — दोनों दोस्त दुकान-दुकान भाव पूछते रहे, लस्सी का, छाछ का, मिठाई का; शाम हो गई, बोले सब मिला-जुला के तो पानी से ही बना, और नदी किनारे अंजुरी से पानी पीकर खुश होकर घर चले गए। वैसे ही आप लोग सब शब्दों से ही जानना चाहोगे — आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, आत्मज्ञान के बाद क्या होता है। अरे, पहले आत्मज्ञान की यात्रा तो करो! पूछ-पूछ के करने का जोश भी खत्म हो जाता है। पहले आगे तो बढ़िए; आत्मज्ञान के बाद क्या होगा वो देख लेना।
कोई बात नहीं। आप समझो और आगे बढ़ो। आपने प्रयास किया, यह बहुत बड़ी बात है। लेकिन यह प्रयास मत करिए कि वह समझे ही — यह कभी प्रयास मत करना, नहीं तो दुख होगा। आपने प्रयास किया, बात खत्म, आपका काम खत्म हो गया।
सेवा किस स्थिति में ले रहा है? क्या देने की स्थिति में नहीं है? कम से कम मीठा बोल तो सकता है, अंतरात्मा से। किसी लायक तो है ही — स्नेह-प्यार भरे शब्द तो दे सकता है। इतने कंजूस ना बनो; कम से कम किसी को कुछ शब्द तो दे सकते हो, एक मुस्कान तो दे सकते हो।
बस ईमानदारी से जीवन जिएं, सत्कर्म करें, और कर्म करते हुए छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड ना करें। इसके बाद दिखावा ना करें, मान की इच्छा ना करें, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा ना करें, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा ना करें। आंतरिक ईमानदारी, मेहनत, और मेरे कर्म से किसी को तकलीफ ना हो — इतना ध्यान रखते हुए निकल जाइए।
देखिए, पता मुझे चलता है; बस हम देखते रहते हैं। 13 साल के ऊपर हो गए यही देखते — ठंड मुझे लग रही है कि शरीर को? शरीर को लग रही है तो कोई बात नहीं, लगने दो, हम अपना काम करें। बस यही देख रहे हैं, और देखते-देखते 13 साल के ऊपर गुजर गए।
जैसे देखो, मुंह के अंदर थूक है तो उसे क्या कहते हैं? लार। और यह मुंह से बाहर आ गया, इतना दूर आ गया तो क्या कहोगे? तब कैसे बदल गया — एक ही है कि दो? एक ही है; जगह बदलते ही नाम बदल गया। इस बात को समझो — उसमें जरा सा बदलाव नहीं हुआ, जगह का बदलाव हुआ है, मिलावट कुछ नहीं हुई। गेहूं पिसा लिए तो आटा हो गया — है तो एक ही, आकार बदल लिया। अब कोई कहे नहीं गेहूं है — अरे भाई गेहूं था, अब नाम बदल गया। इतनी समझ होनी चाहिए।
देखिए, एक से सब है, तो आप आराम से अपने आप को निकाल सकते हो। आप शुद्ध थे, शुद्ध हो, शुद्ध रहोगे; अशुद्धता आपने धारण की है, तो अशुद्धता को छोड़ दो। बस बात खत्म, इतनी सी बात है।
जो साधारण-असाधारण से मुक्त होकर अपने आप को समझे, वह महान है; और जो कुछ पाने में घूम रहा है, वह साधारण-असाधारण में है — मिल गया तो असाधारण, नहीं मिला तो साधारण, ऐसे ही घूम रहा है। साधारण-असाधारण से परे उठो। और मैं आपको इतना बता दूं — जब वाल्मीकि जैसे रत्नाकर डाकू का कल्याण हो सकता है, अंगुलिमाल जैसे का कल्याण हो सकता है, जिन्होंने आदमियों को काटकर उंगलियों की माला पहन रखी थी, तो आपका क्यों नहीं हो सकता? मेरे समझ से इस जन्म में आपने उनसे ज्यादा अपराध नहीं किया है। बस वो जब समझे तो पूरी तरह लग गए — आप भी लग जाओ।
बेईमानी छोड़ दो — बेईमानी वासना है। काम भाव वासना नहीं है; काम भाव को बेईमानी से करना वासना है, यह ध्यान रखना। लोगों ने काम भाव को वासना बता दिया। आपकी पत्नी भी है और उसकी सहमति नहीं है, और आप काम भाव में आकर उसके साथ काम कर रहे हैं, तो वह वासना है। मतलब दोनों की सहमति होनी चाहिए। दुनिया में कोई भी काम करो, दोनों की सहमति होनी चाहिए; अगर दबाव या संकोच में किया जा रहा है तो वह वासना का रूप है, वहां बेईमानी होगी, और उस बेईमानी का परिणाम भोगना पड़ेगा। यही रहस्य है, इस रहस्य को समझिए।
अपने तरीके से करवाने की इच्छा का त्याग करें, उचित तरीका अपनाएं, और लोगों से जो करवाना चाहती हैं वह खुद करना सीखें — अपनी आत्मरक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए।
रख सकते हैं, आपके ऊपर है। पिंजरे में नहीं रखना चाहिए — जैसे पक्षियों को कैद करके नहीं रखना चाहिए, मछलियों को कैद करके नहीं रखना चाहिए; उन्हें छोड़ देना चाहिए, स्वतंत्रता।
2011 में निकला, 2019-20 में प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। कब हो गए पता नहीं, कैसे हो गए पता नहीं — इसका जवाब मैं नहीं दे सकता। प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए, बस।
कौन बोला? कांदा-लहसुन दवा का काम करता है; लहसुन खून को पतला करता है, गैस को सही रखता है। जैसे आलू, मूली, गाजर पैदा होते हैं, वैसे ही यह भी पैदा हो रहा है; यह इंसान के खाने के लिए ही बना है। मैं एक ही बात कहता हूं — किसी की जेब मत काटो, चाहे संन्यासी हो चाहे गृहस्थ। ऊपरी कमाई लाकर किसी का शोषण कर रहे हो, बेईमानी, किसी का अपमान, किसी की निंदा, किसी की बुराई — यह तामसीपन आपको नहीं दिख रहा? इससे बड़ा गुनाह यह नहीं दिख रहा, प्याज खाना-लहसुन खाना दिख रहा है! प्याज छोड़ दिया तो क्या बदला जीवन में? भगत बन गए और दिन भर बेईमानी नहीं छोड़ी। सात्विक भोजन का मतलब — जो भोजन ईमानदारी के पैसे का हो, बिना किसी को तकलीफ दिए भोजन कर रहे हो, वही सात्विक भोजन है। प्याज-लहसुन काम को जागृत करता है, इसलिए उसे तामसिक में डाल दिया; लेकिन जिसकी हार्मोन की ऊर्जा कम हो, उसके लिए तो वह दवा है। आप लिमिट में प्याज-लहसुन खा सकते हो, वह दवा का काम करता है। आचरण में सुधार नहीं, और प्याज-लहसुन छोड़कर मन रोकने में लगे रहो — इससे कुछ लाभ नहीं होगा, यह मानव शरीर इन्हीं चीजों में निकल जाएगा।
इसी में होगी, क्योंकि इस शरीर से कर्म कर सकते हो — इसलिए सिस्टम वाले ने यह शरीर बनाया है। इस शरीर में जो भी जाएगा वो मोक्ष तक पहुंच सकता है। आप मनुष्य थोड़ी ना हो, मनुष्य शरीर मिला है; यह शरीर आपको उपयोग करने के लिए मिला है। इसके अंदर और कोई क्वालिटी ऐसी नहीं, बस कर्म वाली है — कर्म का अधिकार और किसी शरीर में नहीं। मानव के अलावा कोई जीव पैदा करके नहीं खाता; बाकी सब जीव सीधा भोग और भोजन ढूंढते हैं। यह बल्ब उजाला दे रहा है; वहीं पंखा लगा दो तो नाचने लगेगा — ऊर्जा वही है। तो हमारे शरीर के पीछे जो ऊर्जा है, जानवर के पीछे भी वही ऊर्जा है; बस हमें कर्म करने का अधिकार मिला है।
अपने आप को समझना है, मन को नहीं; मन निमित्त बनता है। अपने आप को समझो, निकल जाओ। यह बात समझने में आपको जोर लगाना पड़ेगा, क्योंकि ज्यादातर यही कहा गया — मन रोको, विचार रोको, मन सबसे तेज है। और मैं कह रहा हूं, मन कहीं जाता ही नहीं। जहां तक इंद्रियों द्वारा सुन सकता है, देख सकता है, सूंघ सकता है, स्वाद ले सकता है, स्पर्श कर सकता है, वहां जाता है; या अचेतन मन में जितना जमा हुआ है वहां जाता है — और कहीं नहीं जाता। मन सहयोगी है। वाणियां कुछ और इंगित करती हैं और हम कुछ और अर्थ निकाल लेते हैं। जैसे "सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार" — लोग मतलब निकालते हैं कि सब छोड़कर गंगा सागर नहा लो, पार हो गए। ऐसा नहीं है: सारे तीरथ बार-बार तब तक करो जब तक अहम का नाश ना हो जाए; और गंगा सागर एक ही बार जाना, फिर वापस मत आना। क्योंकि गंगा सागर में जो नदियां गईं, वहां उनका अस्तित्व मिट गया — तो गंगा सागर में तब नहाना जब अस्तित्व को मिटाना हो।
गुरु बिना तो ज्ञान नहीं — लेकिन गुरु शब्द है। अच्छे पानी में भी वही जल है, गंदे पानी में भी वही जल; गंदा किसने किया? इंसान ने। बच्चों को सब कुछ सिखाओ, लेकिन गाली किसी को सिखानी नहीं पड़ती — फिर भी गालियों का कंपटीशन करें तो रात से सुबह हो जाए। शब्द गंदे नहीं हैं; वही शब्द भजन में लगते हैं, वही गालियों में भी। तो गुरु बिना कुछ नहीं हो सकता — गुरु बिना आप भटके भी नहीं हो, बस वो गंदा गुरु है; और गुरु बिना वापस भी नहीं आ सकते। तो गंदे गुरु से दूर हट जाओ, जो आपको गंदी बातें सिखाए। गुरु शब्द है, शरीर नहीं। ध्यान से समझ लेना।
हां, गुरु ऐसा मिल गया। अगर आपने गटर का पानी पीना चालू कर दिया तो मानसिक या शारीरिक बीमारी तो हो जाएगी ना; तो अगर आपने गंदा गुरु बना लिया और वह आपको गंदगी दे रहा है, तो मानसिक बीमारी तो हो ही जाएगी। इसलिए शुद्ध जल पियो — "पानी पियो छान के, गुरु करो जान के।" यह भी बोला गया है कि जब तक सच्चा गुरु ना मिले, दस-पांच गुरु करो — इसको क्यों नहीं पकड़ा? लोग कहते हैं एक गुरु के अलावा दूसरा करोगे तो पाप; ऐसा नहीं है। जब तक आप अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच रहे, तो जो लक्ष्य तक पहुंचा दे, वो गुरु सही।
जरूरत क्या है? मुझे काम करना है, मुझे विचार की जरूरत है, नहीं तो जवाब नहीं मिल पाएंगे। कुटिया बनानी है, साधकों की व्यवस्था करनी है, सत्संग सुनाना है, सामान-वस्तु मंगानी है — जब विचार रुक जाएंगे तो हम काम कैसे करेंगे?
पांचों इंद्रियों से कोई मांग ना करना — यह मौन साधना है; पांचों इंद्रियों से कोई कामना ना उठे। मुंह बंद कर लिया दिन भर — यह कोई मौन साधना नहीं है; इससे तो और लोगों को तकलीफ दे रहे हो, लिख-लिख के बता रहे हो। सीधा-सादा मार्ग है: ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन; बेमतलब से आना नहीं, मतलब है तो आना नहीं — यहां से शुरुआत कर दो, और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाओगे।
मेहनत करो, और जिस फील्ड में सफल होना चाहते हो उस फील्ड की पूरी जानकारी होनी चाहिए; उसके बाद अपनी योग्यता के अनुसार काम करो। सुख प्राप्ति के लिए आपके पास संसाधन होने चाहिए; और सफल होने के लिए मेहनत, आपकी योग्यता और आपका बैकग्राउंड।
माने बिना तो आप जान ही नहीं सकते। और एक बात — अपने आप को जाने बिना ईश्वर को नहीं जान सकते। पहले अपने आप को जानो, उसके बाद ईश्वर की बात करो। जैसे कोई पूछे मां बनकर गर्भ धारण करूं या गर्भ धारण करके मां बनूं — गर्भ धारण करो, मां बनो।
दर्शन भी इसलिए करना है कि दर्शन से मुक्त होना है। जब तक दर्शन की इच्छा है तब तक आप रूप में लिप्त हो, और यह रूप नहीं रहेगा; तो दर्शन से भी मुक्त होना है। दर्शन से मुक्त होंगे तभी आप अपने आप में स्थिर हो पाएंगे; जब तक दर्शन की इच्छा है तब तक आप भटकते रहोगे। अभी तक हमने किसका दर्शन किया? जो लोग कामनाओं में थे — हम भी कामनाओं में, वो भी कामनाओं में। अब हमें ऐसे लोगों का दर्शन करना है जिसकी कोई इच्छा नहीं है; जब हम ऐसे लोगों के पास जाएंगे तो हमारा भी भाव उस तरीके से बनने लगेगा। जिसे कुछ नहीं चाहिए ऐसे लोगों का दर्शन करोगे तो एक समय ऐसा आएगा कि आप दर्शन से मुक्त हो जाओगे, और उसी समय आपकी उपलब्धि होगी।
मैं तो कह रहा हूं, ईमानदार हो जाए। ईमानदारी में अगर आप ब्रह्मचर्य हो गए, तो एक समय ऐसा आएगा कि शरीर से भी आप ब्रह्मचर्य हो जाओगे; लेकिन पहले आपको ब्रह्मचारी होना पड़ेगा। नहीं तो क्या होगा — शारीरिक संबंध नहीं करोगे और तुम ब्रह्मचारी नहीं हो, तो ऊर्जा निकालने के और-और तरीके हैं। बात समझो।
खा सकते हैं, ऐसा कुछ नहीं है। जरूरत में जियो। हम आइसक्रीम भी मंगाते हैं, बोलते हैं सबसे बढ़िया भेजना। बढ़िया खाओ, पियो, रहो, लेकिन ईमानदारी-सत्कर्म के द्वारा। और आप जब खा रहे हैं तो आसपास देख लीजिए — निगाह उठाकर जहां तक जाए, जहां तक आपकी समझ हो; अगर कोई भूखा है तो बांट के खाओ। यह ध्यान रखना, जहां भी रहना।
उम्मीद छोड़ दो। उम्मीद में आप बाहर हो; उम्मीद छोड़ोगे तो अपने आप में स्थिर होगे, और उसके बाद उसकी यात्रा शुरू होगी। जब तक उम्मीद है तब तक तो कामनाओं की यात्रा है; उसकी यात्रा कामनाओं में नहीं होगी। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से आप परे होंगे, फिर वहां से उसकी यात्रा शुरू होती है। विषयों से परे है वो, और आप विषय में उसे खोज रहे हो।
कर्म करते हुए छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड करना बेईमानी है। जहां मान की इच्छा हो, दिखावा हो, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा हो, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा हो — वहां बेईमानी होगी।
हो सकता है उनकी जरूरत हो; कोई न कोई तो साधन लेना था, ले लिया। किसी ने जरूरत के लिए साधन लिया, किसी ने शौक के लिए लिया — बस फर्क इतना है। उसका पैसा था, चाहे जहां लगाए। आप जिसके लिए गए हो वो करो ना — आप गुरु के बैकग्राउंड को चेक करोगे? आप गए हो ज्ञान के लिए, ज्ञान की बात करो, निकल लो। एक फॉर्च्यूनर से घूम रहा है, उसके पास ज्ञान है; एक साइकिल से घूम रहा है, उसके पास नहीं है — तो आपको किसके पास जाना चाहिए? जिसके पास ज्ञान है। आप विद्यालय गए हो पढ़ने; शिक्षक चाहे फोर-व्हीलर से आए, चाहे साइकिल से आए — मूल आपकी पढ़ाई है। आपका कल्याण उसकी पढ़ाई से होगा, उसकी गाड़ी से, उसकी साइकिल से नहीं। लोग बस बाहर का आवरण देखते हैं; इससे निकलिए, अपने मूल की बातें करिए।
जीवंत गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलना चाहिए। और जीवंत गुरु होगा तो आरती करवाएगा नहीं — सीधी सी बात। आरती से कौन सा लाभ होगा? उसके बताए हुए शब्दों को लेकर उस पर चलो, उससे कुछ होगा।
आओ, कुछ दिन यहां रहो, हम छुड़वा देंगे। यहां तो आने वाले समय में और कठिन नियम करूंगा — इधर-उधर भी ऐसे नहीं घूमना है, अपने आप में रहना है पूरी तरह। बस इंद्रियां जरूरत में उपयोग कीं और अपने आप में हो गए।
मैं आपको बता दूं — गुरु कभी ज्ञान देने का पैसा नहीं लेगा, जैसे मां अपने बच्चे को दूध पिलाने का पैसा नहीं लेगी; अगर ले रही है तो वह मां नहीं हो सकती। गुरु कभी ज्ञान देने का पैसा नहीं ले सकता; अगर ऐसा कर रहा है तो वह आत्मज्ञानी नहीं है, वो जानकार गुरु है — किताबों से रटी-रटाई बातें बोल रहा है। गुरु और मां कभी सृष्टि में बिकते नहीं; इन्हें आप खरीद नहीं सकते, और खरीद लिए तो समझ लेना कि गुरु नहीं है। क्योंकि बिकने से मुक्त हो गया, तब तो गुरु पद में पहुंचा। जिसे कुछ नहीं चाहिए वो कैसे बिकेगा? बिक रहा है, इसका मतलब कुछ चाहिए; "कुछ नहीं चाहिए" सिर्फ एक नाटक था, और नाटक ज्यादा दिन चलता नहीं।
सुनिए, साधु-संन्यासी का मैं परिचय बता रहा हूं — ईमानदार, सत्कर्मी और चरित्रवान; बस यही उसका परिचय है। वो साधु से संत बन जाता है। स से साधना, धू से धूल — जिसने साधना करके अपनी धूल को साफ कर दिया, वह साधु; फिर बन जाता है संत। यही है साधु की परिभाषा: ईमानदारी, सत्कर्म और चरित्रवान। अगर आप में ये तीनों गुण हैं तो आप भी साधु, और एक समय ऐसा आएगा कि आप संत स्थिति में हो जाओगे। लेकिन तीनों लाना इतना आसान नहीं।
स्टूडेंट की पढ़ाई — मां-बाप जिसके लिए आप पर पैसा खर्च कर रहे हैं — अगर आप पूरी पढ़ाई में लगे हो तो आप ईमानदार हो; और अगर उसमें नहीं लगे हो, तो आप बेईमान हो।
नहीं। तुम्हारा न जन्म है, न मृत्यु। क्योंकि देखिए, आप कहते हो मैं बचपन में भी था, कुमार में भी था, युवा में भी, वृद्ध में भी; पहले मेरा बुरा वक्त था, अब अच्छा वक्त हो गया; पहले मैं नासमझ था — मतलब नासमझ में भी तुम थे, और अब समझ हो गई तो समझ में भी तुम। हर जगह तुम हो; यह ध्यान रखना, "तुम" कभी बदलता नहीं। भूख लगी — तुम, पेट भर गया — तुम; हर जगह तुम ही तुम, यही सत्य है। और इसमें तभी आप स्थिर हो पाएंगे जब आपको कुछ नहीं चाहिए; जब तक कुछ चाहिए, ऐसे ही घूमते रहोगे।
बस यही तरीका तो बता रहा हूं। ये देखिए जीवों को — अभी हमने दाना डाला, पका हुआ भोजन, चावल डाला। बस इन्हें खिलाते हुए इन्हें देखिए; क्योंकि जब जीवंत को खिलाओगे और उन्हें देखोगे, तो आप जीवंत हो पाओगे। आप जी तो रहे हो, लेकिन मुर्दे की तरह जी रहे हो; मानव होने के बाद भी पशुओं की तरह जी रहे हो — पहले अपने अच्छा खाते हो, बाद में बचा हुआ दूसरे को देते हो।
कर्म अच्छा कर रहा है, लेकिन कई जन्मों के कर्म का परिणाम है ना; एक जन्म का तो है नहीं। अगर एक ही जन्म का होता, तो एक जैसे बच्चे पैदा होते। कोई राजा के यहां, कोई अपाहिज, कोई करोड़पति, कोई झोपड़ी में; कोई सोने के चम्मच से दूध पी रहा है, किसी के घर दूध नहीं, पानी मिलाकर दूध पिलाया जा रहा है — तो उसके कर्म से ही है ना। आप अभी जो कर रहे हो, जो किए हो, वह अभी मिल रहा है; ध्यान से समझिए, इसे पकड़िए।
एक-दो घंटे साधना करके अपने आप को शांति तक लाना चाहते हो, लेकिन ज्यादा समय तो वहां दे रहे हो; तो ग्रोथ किसका होगा? अशांति का ग्रोथ ज्यादा होगा, शांति का तो कम होगा — इसलिए आप छूट नहीं पा रहे हो। आप जीवन ही साधना बना लो; ऐसा जीवन जियो कि जीवन ही साधना बन जाए, तभी आप आत्मिक कल्याण कर पाओगे। एक-दो घंटे में आत्मिक कल्याण नहीं होगा। आठ घंटे सोए, दो घंटे नहाने-धोने में, तो दस घंटे क्या करोगे? दस घंटे आपने अशांति में दे दिए, दो घंटे ही साधना किया — तो उन्नति कहां होगी? जहां ज्यादा समय दोगे। और प्लस-माइनस के चक्कर में मत पड़ो — इतना पाप कर दो, इतना पुण्य करके इसे खत्म करो — नहीं; पाप का परिणाम पाप में भोगना पड़ेगा, पुण्य का परिणाम पुण्य में।