आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P26-0075 · भाग 26

गुरु जी, बुरे कर्मों का फल तो किसी भी साधक या मनुष्य के लिए भोगना जरूरी है, वरना प्राप्ति में दूरी हो सकती है? सोच यह भी रहती है कि माला जपेंगे, पूजा-पाठ करेंगे तो जो जोर का पड़ने वाला है वह धीमा पड़ेगा।

जरूर, एकदम। तो मांग यह होनी चाहिए कि मेरे कर्मों के सारे परिणाम मुझे मिल जाएं, मैं भोग लूं — मैं पूरी तरह तैयार हूं, क्योंकि एक भी कर्म बचा तो मैं वंचित रह जाऊंगा। धीमे के चक्कर में आध्यात्मिक यात्रा रुक जाती है; फायदा-नुकसान में हम लग गए, वहीं गड़बड़ हो गया। जैसे देखिए, रामकृष्ण परमहंस कैंसर का भोग भोग के गए; माता उन्हें बचा पाईं? नहीं — बोलीं अगर हम बचा लेते हैं तो इनका मोक्ष रुक जाएगा। तो माला जपनी है तो प्रार्थना करो कि प्रभु जल्दी से जल्दी दो, हम जल्दी से जल्दी भोगें और आप तक पहुंचें। ईमानदारी इसलिए करो, सत्कर्म इसलिए करो कि जल्दी से जल्दी दो, क्योंकि आपसे मिलने की व्याकुलता हो गई है, यह दूरियां मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रहा हूं। जितनी जल्दी भोगेंगे, उतनी जल्दी मिलेंगे; जितना लेट भोगेंगे, उतना लेट होगा। मैं तो परमात्मा से यही कहता हूं — प्रभु इतनी कृपा करना मुझ पर कि कभी कृपा ना करना। जितने मैंने कर्म किए, सबका भोग मुझे भोग लेने देना। इस स्थिति से जीवन-मरण से मुक्ति हो जाती है, क्योंकि सब आप भोग लेते हो तो बचता क्या है? इच्छा-अपेक्षा का जन्म और मृत्यु होता है। आप किसी होटल में कमरा लेकर बिल चुकाकर निकल लिए, तो फिर उस कमरे की तरफ नहीं जाओगे; लेकिन कोई सामान छूट गया, या पेमेंट नहीं चुकाया, तो आना पड़ेगा। लेन-देन से मुक्त तभी होगे जब अपने कर्मों का हिसाब-किताब पूरा भोग लोगे।

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वीडियो: अपनों की कुटिया में रहने के नियम साधक के लिए सबसे जरूरी बात क्या है ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-12-31