आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P27-0067 · भाग 27

गुरु जी, आनंद में बने रहना आत्मा का मूल स्वभाव है; उस आनंद-सुख को इस संसार में ढूंढने, बनाने और बनाए रखने का काम यह मन करता है। संसार नश्वर है, सुख मिलता नहीं, अंत में दुख में बदल जाता है — तो मन को समझना तो पड़ेगा?

अपने आप को समझना है, मन को नहीं; मन निमित्त बनता है। अपने आप को समझो, निकल जाओ। यह बात समझने में आपको जोर लगाना पड़ेगा, क्योंकि ज्यादातर यही कहा गया — मन रोको, विचार रोको, मन सबसे तेज है। और मैं कह रहा हूं, मन कहीं जाता ही नहीं। जहां तक इंद्रियों द्वारा सुन सकता है, देख सकता है, सूंघ सकता है, स्वाद ले सकता है, स्पर्श कर सकता है, वहां जाता है; या अचेतन मन में जितना जमा हुआ है वहां जाता है — और कहीं नहीं जाता। मन सहयोगी है। वाणियां कुछ और इंगित करती हैं और हम कुछ और अर्थ निकाल लेते हैं। जैसे "सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार" — लोग मतलब निकालते हैं कि सब छोड़कर गंगा सागर नहा लो, पार हो गए। ऐसा नहीं है: सारे तीरथ बार-बार तब तक करो जब तक अहम का नाश ना हो जाए; और गंगा सागर एक ही बार जाना, फिर वापस मत आना। क्योंकि गंगा सागर में जो नदियां गईं, वहां उनका अस्तित्व मिट गया — तो गंगा सागर में तब नहाना जब अस्तित्व को मिटाना हो।

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वीडियो: विचार कहां से आते हैं क्या हम विचारों को कंट्रोल कर सकते हैं #योगीजी_का_सत्संग #विचार #कंट्रोल · 2024-09-05