आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P27-0155 · भाग 27

गुरु जी, जो व्यक्ति अपने घर-बार, हर चीज का त्याग करके अपना आध्यात्मिक जीवन शुरू करता है, अध्यात्म में उसका क्या स्थान है? पश्चिम में लोग ज्यादा से ज्यादा सामान अर्जित करने में लगे हैं, पर लगता है कि जिनके पास जितनी कम चीजें हैं, वे उतने ज्यादा खुश हैं।

देखना यह है कि खोज करने वाला किस स्थिति में निकला है — स्वभाव में, कुभाव में कि अभाव में। अगर कुभाव में निकला है तो भी दुखी रहेगा, अभाव में निकला है तो भी दुखी रहेगा — मिल गया तो सुखी, नहीं तो दुखी; वह सुख-दुख में ही जी रहा है। स्वभाव में जो निकलता है, वह खोजी है। तो आप किस स्थिति में घर से निकलते हो? क्या पूरी तरह संपन्न होकर, आंतरिक शौक से खोज करने निकले हो कि इस खोज के द्वारा जगत को कल्याण का मार्ग बताऊंगा, जिससे लोग दुख और सुख से मुक्त हो सकें? या इसलिए निकले हो कि आपको कमी हुई और वहां भरपाई नहीं कर पाए, तो भरपाई करने निकल गए? या झगड़ा कर लिया, वहां कमजोर पड़ गए, तो ताकतवर बनने निकले? तीन में से आप कौन हो, देख लो। अगर अभाव में हो तो मत निकलो, पहले उस अभाव को वहीं दूर करो; कुभाव में हो तो भी मत निकलो, कुभाव को वहीं दूर करो — नहीं तो नाम, शोहरत, पैसे के चक्कर में पड़ जाओगे। अभाव वाला और कुभाव वाला तंत्र विद्या में चला जाएगा — लोगों को डराएगा, धमकाएगा, गालियां देगा। स्वभाव वाला आत्मज्ञान की खोज में निकला है — वह अपने स्व तक पहुंचकर ही रुकेगा।

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वीडियो: जीवन में आध्यात्म की जरूरत क्यों पड़ती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-05-30