परमात्मा मतलब परम ब्रह्म — सब कुछ उसी से है। हम जिसे पा लेंगे, वह मुझसे छोटा होगा; मुट्ठी के अंदर वही आएगा जो मुट्ठी से छोटा होगा। जब परमात्मा मेरे से बड़ा है तो उसको मैं कैसे पा सकता हूं? वह मुझे पा सकता है। जैसे छोटा चुंबक बड़े चुंबक के पास धीरे-धीरे हो जाए तो बड़ा चुंबक उसे खट से खींच लेगा। तो परमात्मा पाने का विषय नहीं है। हमें परमात्मा नहीं चाहिए, हमें कुछ चाहिए — अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा चाहिए। परमात्मा का मिलना जीवन में तब होगा जब कुछ नहीं चाहिए। और मोक्ष से पहले मुक्ति — जैसे किसी को मां बनना है तो पहले गर्भ धारण करना पड़ता है, फिर मां बनने के लिए अलग से कुछ नहीं करना पड़ता; वैसे ही पहले मुक्ति पाओ, मोक्ष अपने आप होगा। मुक्ति यह है कि राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड से मुक्त हो जाओ। योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग कर दो, जो चाहिए उसके लिए काम करो, योग्य बनो। जीवात्मा जब इच्छा-अपेक्षा में है तब तक जीव है; इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो गया तो आत्मा — जैसे पानी फ्रिज में गया तो बर्फ, बाहर निकाला तो फिर पानी; बर्फ के पीछे भी पानी ही था। तो पहले अपने आप को इच्छा-अपेक्षा से छुड़ाओ, तब आपको सब समझ में आएगा।
नाम जाप जिसका भी कर रहे हो, उसका चरित्र भी अपनाओ। नाम जाप करिए, जो करना है करिए, लेकिन उसके साथ उसका चरित्र भी अपनाओ, आचरण भी बदलो, तब फायदा करेगा। जैसे आप दवा खाते हो तो परहेज भी बताया गया है; परहेज करते हो तब दवा काम करती है, परहेज न करो तो नहीं करेगी। वैसे ही आप कुछ भी अध्ययन कर रहे हो, मंत्र कर रहे हो, उसके साथ सत्कर्म भी करो। किसी को दिखावा मत करो, मान की इच्छा का त्याग कर दो, इज्जत पाने की इच्छा का त्याग कर दो, किसी को जलील करने या नीचा दिखाने की इच्छा का त्याग कर दो, बड़ा-छोटा का त्याग कर दो — सब एक जैसे हैं। जैसे लकड़ी, कॉपी, किताब, पेड़-पौधे सबको जला दो तो सब राख हो जाते हैं — अहंकार मिट गया तो सब एक हो गए। कुछ होना ही भटकाव है। अहम भाव को हटा दो, कुछ नहीं में हो जाओ और बिना इच्छा-अपेक्षा के सत्कर्म में लग जाओ।
आप जहां उसे काम पर लगा रहे हैं, देखिए कि उसको भी जरूरत है या नहीं, और उसको साफ-साफ बोल दीजिए कि आपकी जरूरत के लिए एक आदमी भेज रहा हूं, आप अपने तरीके से जांच लेना — काम के लायक हो तो रखना, नहीं तो मत रखना। अगर आपकी अपनी कंपनी है, तो आप जिस पद पर हो, जांच के रखो; जांचने की क्षमता आप में होनी चाहिए, और नहीं जांच पा रहे हो तो उस पद को छोड़ दो। काम को काम के तरीके से करने वाला कोई हो तो उसे रखिए; सिर्फ मदद करने के लिए रख रहे हो तो आप गलत कर रहे हो। अगर वह काम को बिगाड़ेगा तो उसकी भरपाई उसे करनी पड़ेगी, और फिर आपको भी करनी पड़ेगी, क्योंकि जवाबदार आप हुए — आप पर उसने भरोसा किया और आपको पता था कि यह आदमी काम के लायक नहीं है, फिर भी रख दिया। जिसको काम नहीं आता था वह तो निकल लिया, फंसे आप — सेटिंग कराने वाले। तो कभी सेटिंग मत कराइए, सेटिंग वाली जगह पर मत रहिए।
मैं कह रहा हूं, बिस्किट का पैकेट रखा करें, बिस्किट दे दिया करो। खाना और जल सबसे बढ़िया है, क्योंकि कोई भूखा होगा तभी खाएगा, प्यास लगी होगी तभी पिएगा। कोई बेच देगा, ऐसा लगे तो पैकेट जरा खोल देना — फटा हुआ दुकानदार लेगा नहीं, और कोई न कोई खाएगा। यह एकदम सही तरीका है।
अगर उस बिजनेस से समाज का हित हो रहा है, समाज को लाभ हो रहा है, और मैं वही दे रहा हूं जो मैं बोल रहा हूं — वही प्रोडक्ट तैयार कर रहा हूं जो लोगों को बता रहा हूं — तब आप ईमानदार बिजनेस में हो। और पता चला कि बाहर कुछ और, पैकिंग में कुछ और, मिलावट है, तो फिर आपको परिणाम भोगना पड़ेगा। देखिए कि समाज को उसकी जरूरत है या नहीं, और उसमें समाज का हित है या नहीं — मेरा भी, समाज का भी, परिवार का भी। जब आप व्यापार करते हो तो आप भी वहां खड़े हो, परिवार भी और समाज भी — तीनों का देखना है। सिर्फ समाज का देखोगे तो आप ही बर्बाद हो जाओगे, फिर आगे कैसे करोगे? तो सर्वप्रथम अपने आप को ताकतवर बना के रखो — धन, तन और ज्ञान, यह बल आपके पास होना चाहिए, तभी कर पाओगे; नहीं तो बस बातें रह जाएंगी। कोई गिर गया तो वहां पैसा काम नहीं करेगा, उसे गोद में उठाना होगा; किसी को भूख लगी तो वहां सत्संग काम नहीं करेगा — पहले रोटी दो, बाद में सत्संग सुनाओ। धर्म तभी समझ में आता है जब पेट में रोटी होती है।
देखिए, एक होता है मैं खुद करूं, और एक होता है कोई कर रहा है तो उसमें सहायता करूं — धन से, तन से, ज्ञान से। वहां क्या जरूरत है, देख लो, समझ लो, तब सहयोग दो। और पहले देख लो कि अगर मैं यह ताकत दे रहा हूं तो उसका सदुपयोग हो रहा है या दुरुपयोग। उस व्यक्ति को ताकतवर बनाइए जो सत्कर्मी हो; दुष्कर्मी है तो ताकतवर मत बनाओ, क्योंकि सपोर्ट करने का मतलब है आप अपनी ताकत दे रहे हो। चाहे धन हो, तन हो या ज्ञान, वह आपको आपके कर्म से मिला है, तो उसका सदुपयोग होना चाहिए। सहयोग करने से पहले पूरी तरह जांच लो कि वह जो बता रहा है, कर भी रहा है या नहीं। और जरूरत देखिए कि सच में उसका उपयोग होगा या नहीं — मैं दे दूं और उसका दुरुपयोग हो, तो उसका जिम्मेदार मैं भी रहूंगा।
जहां कुछ नहीं, वहीं प्रेम। जब कुछ नहीं चाहिए, तब आपमें प्रेम पैदा हो जाएगा — कुछ नहीं चाहिए में प्रेम है। जैसे यहां प्रेम है — न मुझे आपसे कुछ चाहिए, और आप भी कुछ नहीं चाहिए के लिए बात कर रहे हो। यहां लेन-देन नहीं है।
ताड़न का मतलब पीटना नहीं, ताड़न मतलब सुधारना। शूद्र कौन है? जिसके अंदर छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड है, वह शूद्र। गंवार कौन है? जो सत्कर्म और दुष्कर्म को समझने के बाद भी, परिणाम का पता होते हुए भी दुष्कर्म करता है। ढोल शरीर को बोला गया है — ढोल को जितना सही तरीके से बजाओगे, उतना उसमें से ताल, लय, संगीत निकलता है, लेकिन बजाना आना चाहिए। पशु — ऐसे लोगों का जीवन, जो मानव तन पाने के बाद भी पशुओं की तरह जी रहे हैं। नारी — जिसे चाहिए वह नारी है, देने वाला पुरुष है; प्रकृति पुरुष है और जिसे चाहिए वह नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी हैं — अगर ऐसा अवगुण आपके अंदर है तो अपने आप को सुधारिए। जब तक आपको चाहिए, तब तक प्रकृति पुरुष है; जब आपको कुछ नहीं चाहिए, तब वही प्रकृति मां बन जाती है।
इसलिए कि अंगुलिमाल परिवर्तन के लिए तैयार हो गया और देवदत्त तैयार नहीं हुआ, बस। महाभारत में भी कृष्ण भगवान दुर्योधन को कितना समझाने गए। जब आप तैयार नहीं होगे, तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी आकर आपको कुछ नहीं कर सकते; और आप तैयार हो तो आपको कोई भी सिखा देगा। परिवर्तन के लिए बुद्ध निमित्त बने — परिवर्तन करने के लिए वह तैयार हुआ।
आत्मज्ञान तक आपको पहुंचना है, और ब्रह्मज्ञान खुद परमात्मा करवाता है — जब आप कुछ नहीं हो जाते, उसके बाद वह अपने आप को जनवाता है; उसे आप नहीं जान सकते, अब आप उस लायक हो गए। आत्मज्ञान के बाद पाने की इच्छा से मुक्त हो जाता है और प्रयास खत्म हो जाता है। जैसे गर्भधारण के बाद मां बनने का कोई प्रयास रहता है? बस इंतजार रहता है; प्रयास गर्भधारण के लिए रहता है।
गुरु शब्द है, शरीर नहीं है — शब्दों को लेकर आगे बढ़ो। कर्म करते हुए इतना ध्यान रखो कि कोई गलती न हो, यही ध्यान है। गुरु की जरूरत तो हर जगह है, जब तक आप मुक्ति तक नहीं पहुंच पाते; जब तक आत्मज्ञान तक नहीं पहुंच पाते, तब तक आपको गुरु की जरूरत है।
मोक्ष तो आपके पाप-पुण्य का नाश होगा तभी होगा, लेकिन आत्मज्ञान तो तुरंत हो सकता है — बस आप उम्मीद छोड़ दीजिए, बात खत्म। आत्मज्ञान तक आपका प्रयास है; बाकी जब पाप-पुण्य पूरी तरह भोग लेंगे, तब मोक्ष होगा, और वह आत्मज्ञान के बाद होगा। आत्मज्ञान के बाद नया बंधन नहीं बंधेगा; अभी तो आप राग-द्वेष में बंधन बांध ही रहे हैं।
हां, यही काम सबसे उच्च कोटि का है, इसीलिए तो समय दे रहा हूं, इसीलिए तो भूख भी नहीं लगती। भोजन तो मैं कभी भी कर लूंगा; पता नहीं इनमें से कल कोई हो न हो, पर जिसलिए वह आया था, वह उसे मिले। मैं अपने कर्म के प्रति बहुत ईमानदार और जवाबदार रहा — अगर मैंने कुछ बोला तो किया, नहीं तो बोला नहीं। मैं लोगों को कहता हूं, आप जवाबदार इंसान बनिए: अगर आप किसी से कुछ कहते हैं तो आपने उसके अंदर एक उम्मीद जगाई; उस उम्मीद को ईमानदारी से पूरा करना आपका कर्तव्य, आपका दायित्व है। सेहत का ध्यान जिसको रखवाना होगा, वह रख रहा है — सेहत एकदम सही है। मैं इसलिए थकता नहीं, क्योंकि आपके लिए बोल रहा हूं; अपने लिए बोलता तो कब का थक जाता। थकता वह है जो अपने लिए जीता है, दायरे में जीता है, क्योंकि उसको दायरे से ऊर्जा है; जो दायरे से मुक्त होकर लोगों के लिए जीता है, उसके ऊपर अनंत से सीधा ऊर्जा है — उसे कोई थका नहीं सकता। बहुत होगा तो शरीर गिर जाएगा, लेकिन वह नहीं थकेगा।
अगर इच्छा-अपेक्षा में हो तो अगला शरीर धारण करोगे; इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो गए तो आप आगे निकल जाओगे यात्रा में। यह शरीर — इसे आखिरी का पता है, क्योंकि पृथ्वी पर जब से नर-मादा आया है, इसकी चेतनता गई नहीं; चेतन चेतन को चेतन करता है, मुर्दे से बच्चे पैदा नहीं होते। यह आपको आखिरी जगह ले जाकर खड़ा कर देगा, जहां आपको शरीर की जरूरत नहीं होगी, जहां से आपकी यात्रा होगी। इसलिए इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो जाओ, तभी आप आखिरी में खड़े हो जाओगे। और अगर सोचो कि मैं शरीर हूं, तो भी आप रहोगे — मैं था, हूं और रहूंगा, हर स्थिति-परिस्थिति में।
क्यों पाने की इच्छा आ गई? क्यों पाना चाहते हो? क्या करोगे भगवान को? जिसको देखो, उसे परमात्मा चाहिए — चलिए, वह आ गया, तो क्या करोगे लेके? मैंने ज्यादातर देखा कि परमात्मा नहीं, परमात्मा से कुछ चाहिए — कुछ के लिए परमात्मा चाहिए। और कुछ नहीं चाहिए, तो परमात्मा लेके क्या करोगे?
समझ को बढ़ाइए, विवेकवान बनिए — जिस फील्ड में आप जाना चाहते हैं, उसकी जानकारी से समझ को विकसित करिए। वैराग्य मतलब राग-द्वेष से मुक्त होना — तो राग-द्वेष से मुक्त होने के लिए काम करिए।
समाज में आप किस स्थिति पर होकर उतरते हो और क्या करते हो — अगर आप आत्मज्ञान पर होकर उतरे, तब तो आप कभी गिर ही नहीं सकते; और अगर आप लोगों की कामनाएं पूरी कर रहे हो, तब तो गिरे ही गिरे हो। कौन सा ऐसा फील्ड है जिसमें यह सब न हुआ हो? मां-बाप, शिक्षक — हर रिश्ते में गलत हुआ है; तो क्या लोग रिश्ते बनाना, पढ़ाना, बच्चे पैदा करना बंद कर दें? किसी के गंदे काम करने से कोई अपना काम थोड़ी छोड़ देगा। और आपने उन्हें खुद जांचा था क्या कि वे शुद्ध थे? जब तक आपको योग्यता से ज्यादा चाहिए और फ्री में चाहिए, आप ऐसे ही भटकते रहोगे और ऐसे लोग तैयार होते रहेंगे — कोई साधु-महात्मा आसमान से नहीं टपकता, वह इसी दुनिया का, आपके ही झुंड में से निकला एक आदमी है। अगर आप उसके पास जाकर मूल पर बात करते — निर्विकार होने के लिए, आत्मज्ञान के लिए — तब ऐसी घटनाएं नहीं होतीं; आप खुद कामनाओं में जाते हो। जब आप ₹1000 देकर लाख का आश्वासन लेने जाते हो, तो लुटोगे ही। इसके जिम्मेदार समाज है, और मैं भी समाज से अलग नहीं हूं। इसलिए तुलना मत करो, तुलना करोगे तो फंस जाओगे — आपको क्या करना है, वह देखो, करके निकल लो। जैसा जो करेगा, वैसा परिणाम खुद भोगेगा।
मुक्ति के अलावा कोई दूसरी अवस्था परमानेंट नहीं है, स्थिर नहीं है। मुक्ति ही एक ऐसी अवस्था है जो पाई नहीं जाती — हम अपने मूल में पहुंचे, अवस्था नहीं पाई, पाई हुई अवस्थाओं से मुक्त हुए। और आत्मज्ञान के बाद वह आपके ऊपर है।
जैसे आप चौराहे पर खड़े होकर चिल्लाओ "मैं प्यासा हूं, प्यासा हूं", तो कोई पानी लेकर आ जाएगा। तो चिल्लाओ — "मैं निर्विकार होना चाहता हूं, निर्विकार होना चाहता हूं" — प्रकृति गुरु मिला देगी। लेकिन चौराहे पर चिल्लाना पड़ेगा, आवाज लोगों तक जाएगी, तभी उनमें से एक गुरु आएगा और कहेगा "चल, मैं कराता हूं, निर्विकार हो जा"। आइसक्रीम बेचने वाला भी चिल्लाता है, तभी लोग घर से निकलते हैं — आपके पास क्या है, वह भी चिल्लाना पड़ेगा, और आपको क्या चाहिए, वह भी। और वहां उतरना पड़ेगा, उसके साथ रहना पड़ेगा, जीना पड़ेगा, तब बात समझ में आएगी।
तीनों से मुक्त होने के बाद आत्मज्ञान होता है — न सतोगुण रह जाता है, न रजोगुण, न तमोगुण। ये शरीर के स्वभाव हैं, और वह शरीर से ऊपर उठ गया। बाकी अन्य शरीरों में ये गुण नहीं हैं, वे अपने मूल स्वभाव में जीते हैं; बस मानव शरीर में ये तीन गुण हैं — सात्विक, तामसी, राजसी। ये तीन गुण इसलिए दिए गए हैं कि आप सात्विक गुण अपना के स्व तक पहुंच जाओ, और फिर तीनों से मुक्त हो जाओ — तभी आत्मज्ञान होगा।
जब आपके द्वारा बिना इच्छा-अपेक्षा की निष्काम सेवा होती है, वहां परोपकार होता है, और जहां परोपकार होता है वहां धर्म घटित होता है — वह आपको धार्मिक बनाता है। और जब किसी कमजोर को आप सताते हो, तो वहां अधर्म घटित होता है — वह आपको अधार्मिक बनाता है। यही धर्म और अधर्म की परिभाषा है।
अगर वही समाचार उसके बारे में आए जिससे आपका कोई लेना-देना नहीं, तो क्या ध्यान जाएगा? ध्यान इसलिए जा रहा है कि उससे कोई रस मिल रहा था — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श; और व्याकुल तब होंगे जब पांचों से रस मिल रहा होगा — चाहे पत्नी की बात हो, पुत्र की या नाती की, क्योंकि इनसे पांचों इंद्रियों से आप सुख लेते हो। भोग और भोजन में आदमी सबसे ज्यादा फंसा है। इससे छुटकारा — बस रसपान करना बंद कर दो, मतलब अपने तरीके से उनसे कुछ पाना चाहते हो, उसका त्याग करो। आप किसी को नहीं संभालते, अपनी जरूरत को संभालते हो — जैसे यह कपड़ा, जिसे धो के बढ़िया से रख रहे हो, एक दिन जब काम का नहीं रहेगा तो आप ही उसे सबसे गंदी जगह फेंकोगे। जहां से हमें मिलता है, हम उसे संभालने लगते हैं।
भय आपकी कमजोरी है। जगह वही है, आप भी वही हो — टॉर्च भी थमा दी जाए, तो भी डर क्यों? क्योंकि जीना है, मिटने का भय है, कुछ खतरा न हो जाए। कई लोग साथ हों तो नहीं लगता, क्योंकि आपके साथ ताकत होगी। तो भय से मुक्त होने के लिए अपने आप को मजबूत बनाइए, सामर्थ्यवान बनाइए। जहां डर लग रहा है, वहां जाओ — लेकिन परिणाम भी आपको ही भोगना है, यह संभालना।
इससे पहले अपने आप को मुक्त कराओ, आत्मज्ञान तक पहुंचो। और पाप-पुण्य पूरी तरह भोग लेंगे — लेन-देन जब आपके जीवन से खत्म हो जाता है — तब जाकर मोक्ष होता है।
अहंकार किस स्थिति में आता है? जब आप किसी को नीचा दिखाना चाहते हो, कुछ बनना चाहते हो। तो नीचा दिखाने का त्याग करो, कुछ बनने का त्याग करो, कुछ करना सीखो — बस, अहंकार काम नहीं करेगा।
सत्य बोला नहीं जा सकता; सत्य तक पहुंचने का मार्ग बताया जा सकता है। क्या बोलोगे कि सत्य क्या है? जो भी बोलोगे, वह बदलेगा — वह सच होगा या झूठ होगा, सत्य नहीं। सत्य तक पहुंचने के लिए मार्ग बताया जाता है।
नींद तो सबको आती है — शरीर की थकावट की वजह से आपको नींद आती है, यह प्राकृतिक व्यवस्था है। स्वप्न क्या है, स्वप्न में जाके पूछो। इसके बारे में ज्यादा जानना है तो जाकर रिसर्च करो, उसके विशेषज्ञ को पकड़ो — हम उस पर खोज करने थोड़ी निकले हैं, हम आत्मज्ञान के लिए निकले हैं और उसका मार्ग बता रहे हैं।
मैं इसलिए नहीं बनवाना चाहता, क्योंकि यहां एक सिखाने वाला है और लोग सीखने वाले हैं, तो मैं इन लोगों का समय अपने लिए बर्बाद नहीं करना चाहता — ये मेरे लिए बनाएंगे तो इनको एक-दो रोटी बढ़ानी पड़ेगी। मेरा भाव है कि ये लोग अपना समय अपने आप में दें; ये साधक अपने आप को समझने के लिए आए हैं। शरीर काम कर रहा है तो अपना काम कर लेता हूं। इसलिए मैं यहां किसी से एक गिलास पानी भी नहीं मांगता, अपना सारा काम खुद करता हूं।
जब तक इस शरीर में रहना होगा, जब तक शरीर काम करेगा। अपना कल्याण तो पशु भी कर लेता है; अगर हम अकेले उस स्थिति में जाएं तो मेरे जाने का क्या मतलब होगा — अनेकों जाएं। बचपन में मैं स्वर्ग-नर्क के बारे में सुनता था, तो मैंने कहा कि अगर मुझे कुछ मिले तो नर्क मिले, क्योंकि वहां सब दुखी रहेंगे, वहां सेवा करूंगा; स्वर्ग नहीं चाहिए। मैंने दुख का चुनाव किया — दुख नहीं चाहता, लेकिन संसार में जो भी करोगे उसका आखिरी परिणाम दुख है, तो मैंने आखिरी परिणाम को स्वीकार किया, क्योंकि मुझे आखिरी तक पहुंचना है। सुख में कोई और रहेगा, दुख में बस मैं रहूंगा, क्योंकि दुख में और कोई आना नहीं चाहता — इस भाव से मैं जीवन जीता हूं।
भाव — जब आप कुछ करते हो, करने में भाव बनता है। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में जैसी स्थिति रहती है वैसा भाव बनता है। जैसे आपके सामने भोजन आया, आपने कहा भोजन बहुत अच्छा बना है, खुश हो गए — राग हो गया। दूसरे दिन भोजन करते समय उसमें बाल आ गया, भाव बदल गया, द्वेष हो गया। जैसी घटना आपके सामने घटती है, वैसा आपका भाव बदलता रहता है। गुण — पहले यह बताओ, किसका गुण पूछ रहे हो? सबका अपना-अपना गुण है: कांटे का गुण है चुभना, तलवार का गुण है काटना, फूल का गुण है सुगंध देना। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण — ये मानव शरीर के गुण हैं, मानव के नहीं, और जीव का अपना स्वभाव है। आम कच्चा है तो खट्टा, पक गया तो मीठा — आम वही है, पर गुण बदल गया। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में गुण भी बदलते हैं; आप कुछ फिक्स नहीं कर सकते, समझ के निकल सकते हो। लक्षण — सबके अपने-अपने लक्षण हैं; लक्षण मतलब रूप — गाल पर तिल है, सांवला है, गोरा है, लंबा है। लक्षण शरीर के होते हैं, बाहर से तय किए जाते हैं, लेकिन लक्षण टिकेंगे नहीं।
सत्य बोला नहीं जा सकता, यहीं पे गलत हो गया। सत्य उसे कहा जाता है जो कभी बदलता नहीं। कोई पूछे फलाने यहां से गए, आप कहो हां गए — वो सच है, सत्य नहीं है; सच और झूठ हमेशा बदलते रहते हैं। ये पेड़ आप देख रहे हो, पहले नहीं था और बाद में नहीं रहेगा — तो ये ना सच है ना झूठ, इसका उपयोग करो और निकलो; इसी के लिए माया बोला गया। सत्कर्म और ईमानदारी कर्म में आते हैं, करने वाला बदल रहा है, इसे सत्य नहीं कह सकते — पर सत्कर्म, ईमानदारी करके वो सत्य तक पहुंचेगा। सत्य तो एक ही है, दो नहीं; वो कभी बोला नहीं जा सकता। ये सब सत्य तक पहुंचने का मार्ग है। ज्यादातर हम सच या झूठ को सिद्ध करने में लगे हैं — सिद्ध करने के चक्कर में पड़े तो भ्रष्ट हुए, क्योंकि यहां ना सच है ना झूठ। सुबह एक आदमी कहता है रास्ते में बड़ा गड्ढा है, शाम को दूसरा कहता है नहीं है — बीच में दोपहर को कोई तीसरा आकर गड्ढा पाट गया। एक तुम हो, एक सामने है जो तुम्हारे कर्म में निमित्त बन रहा है, और इन तीनों के पीछे एक और है जो तीनों नहीं जानते — उसको पकड़ो। उसको पकड़ते ही आप मुस्कुरा दोगे, तुरंत राग-द्वेष से मुक्त हो जाओगे: यार सब सही थे, हम ही गलत समझ लिए।
पहले जरूरत होती है। और जब आपको अपने तरीके से चाहिए और आप उसमें बेईमानी करते हो, तो वही जरूरत वासना का रूप ले लेती है — उसके जिम्मेदार आप हो। जब आप किसी के साथ कुछ करते हो और वो नहीं चाहता, आप जबरदस्ती करते हो और आपको पता है कि गलत है — ये वासना आपको गिराती है, चाहे भोजन हो, देखना हो, सुनना हो, शब्द हो, दृश्य हो, सुगंध हो, स्वाद हो या स्पर्श हो। जैसे यात्राओं में भीड़ का बहाना देकर कोई किसी को स्पर्श कर लेता है — ये बेईमानी है, और इसका परिणाम आपको भोगना पड़ेगा, बचोगे नहीं, क्योंकि सामने वाला चुप रहा पर उसके रोम-रोम से आपके लिए श्राप निकला। उस जगह आपकी मां या बहन होती तो क्या उस व्यक्ति को छोड़ देते? उसकी सजा प्रकृति देती है; प्रकृति का हिसाब-किताब बड़ा भयानक है। जिसे तुम गलती नहीं समझ रहे हो, वो बहुत बड़ी गलती है, बहुत बड़ा अपराध है। इसलिए कहा गया है — किसी को इतना ना दुखाओ कि वो अंदर से श्राप दे।
जब वो जुदा ही नहीं है तो खोज किसकी? जब वो जुदा ही नहीं है तो खोज क्यों कर रहे हो, क्यों पहचानना चाहते हो? पहचानना तो उसे है जो भूल गया हो और जुदा हो गया हो। अब आप कह रहे हो जुदा भी नहीं है — तो पहचानने की क्या जरूरत है भैया?
मैंने तो विश्व में सबको बोल दिया है कि जिस किसी साधक को रहने की या कोई भी तकलीफ है, कोई प्रश्न-उत्तर है, और वो अपने आत्मिक कल्याण के लिए साधना करना चाहता है, तो ये व्यवस्था उसी के लिए तैयार की जा रही है। हमारे आदेश की अब जरूरत ही नहीं है। ये मेरी कुटिया थोड़ी ना है, ये कुटिया अपनों की है — तो आदेश देने वाला मैं कौन हूं? आप अधिकार से यहां आकर अपनों की तरह रह सकते हैं; अपनों की कुटिया में जितना सिस्टम बनाया गया है, उस सिस्टम में आप स्वतंत्रता से रह सकते हैं।
पहली सीढ़ी है कि यहां पे आओ। परमात्मा चाहिए और कुछ नहीं चाहिए, तो दो-तीन दिन यहीं पड़े रहो — बिना बिस्तर के, बिना खाए, दिसंबर में तट पे सोओ; खाना-पीना, नाश्ता नहीं चाहिए, बस परमात्मा चाहिए, तो आ जाओ। परमात्मा कोई वस्तु थोड़ी ना है भैया कि कोई दे देगा। आप ही हो जो उससे अपने आप को मिला सकते हो, और कोई भी नहीं मिला सकता, क्योंकि आपके अंदर ही उसका पता है।
उन्हें गुरु बोल सकते हैं; अर्जुन ने स्वयं को शिष्य कहा है — मैं शिष्य हूं, आपने मेरा मोह दूर किया। गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है, तो वो उनके गुरु हुए, इष्ट कैसे हुए? मुझे बताओ, इस दुनिया में कौन सा इष्ट है जिसने अपने भक्त को ज्ञान दिया है? एक नाम बता दीजिए — कोई नहीं है। ज्ञान कराने के लिए गुरु चाहिए; वो गुरु थे — "कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्", कृष्ण भगवान को गुरु कहा। समझिए, गुरु और भगवान में भेद नहीं होता, एक ही होते हैं।
यह हमें समझना पड़ेगा कि हमारे माता-पिता एक उम्मीद में हमारे लिए करते हैं। वो चाहे हमें पढ़ाएं, चाहे लिखाएं, उसके पीछे उनकी एक उम्मीद बनी हुई है कि यह मेरा नाम रोशन करेगा, मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा, मेरे खानदान का नाम रोशन करेगा। लेकिन गुरु के यहां ऐसी कोई बात नहीं है — तू दूसरी बार आया है, पर तेरा नाम भी मुझे पता नहीं है। गुरु तो मुक्त हो गया, तो वो जितना भी करता है आपके लिए करता है, और उसकी एक ही इच्छा रहती है कि तुम्हारा उद्धार हो जाए। इसलिए इस पृथ्वी पर गुरु को सर्वश्रेष्ठ बोला गया है — वो बस यही चाहता है कि आपका आत्मिक उद्धार कैसे हो जाए, आप इस दुख भरे भवसागर से कैसे पार हो जाओ, उस परम सत्ता से कैसे मिलना हो जाए, उस परम आनंद को कैसे उपलब्ध हो जाओ। और उतनी व्यवस्था वो देता है कि तू अपना उद्धार कर ले — अब तेरे ऊपर है कि तू क्या कर रहा है।
इसमें भी सावधान होकर चलना है। अब यह देखना है कि भोजन मैं कर रहा हूं तो जैसा मिल गया वैसा कर रहा हूं, या मैं विरोध कर रहा हूं, बनाने वाले को डांट रहा हूं — तो बाधक बन जाएगा।
पछतावे की आग में जल रही हो, इसका मतलब आपने कुछ ऐसा काम किया है। तो आप सत्कर्म करना शुरू करिए; पश्चाताप की आग तो लग ही चुकी है, और धीरे-धीरे वो पश्चाताप होगा। अपनी गलतियों को महसूस करिए। अगर वो सामने वाला व्यक्ति मौजूद है तो उससे क्षमा याचना कर लीजिए; अगर इस दुनिया में नहीं है तो आत्मिक क्षमा मांगिए। तो धीरे-धीरे आप उससे निकल जाओगे।
यही तो बात है — वो सामर्थ्यवान थे। और उन्होंने क्या छोड़ा? राजगद्दी तो उन्हें प्राप्त हुई ही नहीं थी, वो तो भरत को मिली; उन्हें 14 वर्ष का वनवास मिला और वो जंगल गए। तो छोड़ने की बात ही यहां नहीं आती। राजगद्दी मिल रही थी तो उसका भी विरोध नहीं किया, स्वीकार किया; और जब वनवास मिला तो वनवास भी स्वीकार किया। सब बोलते हैं सब छोड़-छाड़ के जंगल गए — कुछ नहीं छोड़ा; जो मिला वो स्वीकार किया और उसमें काम किया। इसीलिए वो श्रेष्ठ हैं, क्योंकि उन्होंने विरोध नहीं किया। वहां भी गए तो अपना काम किया, राक्षसों का संहार किया — सामर्थ्यवान थे तभी तो काम किया। सामर्थ्यवान नहीं हो तो जहां जाओगे भटकोगे, लोगों को तकलीफ दोगे। इसलिए सामर्थ्यवान रहो — धन से, तन से और अपनी समझ से — तब जहां भी जाओगे, उस जगह का उपयोग भी करोगे और उस जगह के लिए, लोगों के लिए कुछ कर भी पाओगे। इसीलिए कहा गया है, जीवंत गुरु की शरण में जाकर शास्त्रों का अध्ययन करो; वो आपकी धारणा को तोड़ेगा और आपको प्रत्यक्ष अनुभव कराएगा।
अगर मान लीजिए तुम गुरु में फंस गए, तो गुरु तो मुक्ति का द्वार है, वहां से तो आखिर निकल ही जाओगे। जैसे आनंद ने लगभग 40 वर्षों बाद बुद्ध से पूछा कि मुझे अभी तक ज्ञान क्यों नहीं हुआ, तो बोले — तुम सबसे मुक्त होकर मुझ में फंस गए। आनंद रात-दिन बुद्ध के साथ ही रहते थे, उनके स्नेह, प्रेम, लगाव में फंसे थे; लेकिन जैसे ही बुद्ध का शरीर छूटा, आनंद को उपलब्धि हो गई, क्योंकि बुद्ध मुक्त पुरुष थे और उन्होंने उनको ज्ञान दिया था। तो अगर तुम गुरु में भी फंसते हो, वो मुक्ति का द्वार है — तुम आखिरी जगह आकर खड़े हो गए।
इसके अलावा यह देखना है कि गुरु का मेरे प्रति क्या आदेश है। जब गुरु के पास रहोगे तो गुरु आपकी स्थिति को देखकर आपको आदेश देगा कि आपको क्या करना है — मुझे बस गुरु के शब्दों का इंतजार करना है, और अगर मुझे लगता है तो अपनी बात रख देनी है कि मैं क्या करूं। गुरु यह देखेगा कि तुम्हारे अंदर काबिलियत क्या है — पूरी साधना की, सेवा के साथ साधना की, या सेवा की — और क्या करके तुम्हारा उद्धार होगा, वो मार्ग बता देगा; फिर बस उसी में लग जाना है। अगर उसने कह दिया पौधों को पानी दे, तो मेरा काम है वृक्ष बनने तक पौधों की देखरेख करना — वही मेरी साधना है, वही मेरी तपस्या है। पहले कुछ दिन जाकर रहो, अपने प्रश्नों को रखो, फिर पूछो कि मेरे लायक सेवा क्या है। वो घर भी भेज सकता है — वो देखेगा कि आपकी जरूरत कहां है, आप घर की जिम्मेदारी निभा के आए हो या नहीं; जैसे ज्ञानेश्वर के पिता को उनके गुरु ने घर भेज दिया था। बुद्ध ने बहुत शिष्यों को उपलब्धि के बाद कहीं भेज दिया, किसी को साधना बता दी, और आनंद को अपने पास ही रखा। गुरु सबकी स्थिति देखता है; वो जाते ही आदेश नहीं देगा, वो तो आप ही के लिए कर रहा है।
हां, एकदम हो जाएगा। क्योंकि जब आप सत्कर्म कर रहे हो तो हर काम को ध्यान से ही तो कर रहे हो — यही ध्यान है; हमें तो ध्यान से भी मुक्ति चाहिए। और समाधि तो एक अवस्था है — समाधि लगाई नहीं जाती, जैसे आप योग्य होगे, समाधि अपने आप घट जाएगी।
किसी ने शुरुआत में परंपरा बनाई थी आवरण से मुक्त होने के लिए, पर आज परंपरा बंधन हो गई है — वो एक परंपरा का आवरण है और उस आवरण को लोगों ने पकड़ लिया। हमें धारणाओं से मुक्त होना था, अब हमने धारणाएं बना लीं, एक समूह बना लिया, उसमें उठने-बैठने लगे। तो हमें परंपराओं को भी छोड़ना पड़ेगा, तभी हम आगे बढ़ पाएंगे। परंपराएं हमारे लिए सहायक हैं, जैसे किताब पढ़ने तक के लिए क, ख, अ, आ सहायक हैं — लेकिन जिंदगी भर यही मत पढ़ते रहो, नहीं तो जिंदगी भर क, ख में ही खत्म हो जाओगे। जीवन में हम कहां फंसे हैं, यह समझने के लिए हमने शब्दों का सहारा लिया और शब्द में ही फंस गए। हमें शब्दों के द्वारा मुक्ति तक जाना था। तो मुझे यह देखना-समझना पड़ेगा कि मेरा उद्धार कैसे होगा।
शुरुआत में तो कोई योग्य ही बनाता है; परंपरा ऐसे ही नहीं बन जाती, कोई साधारण आदमी परंपरा नहीं बना सकता — परंपरा बनाने वाला हमेशा श्रेष्ठ होता है। फिर लोगों ने उसमें मिलावट कर दी। लोग बोलते हैं बुद्ध ने, कबीर ने मूर्ति पूजा का विरोध किया — उन्होंने कभी विरोध नहीं किया; कबीर का गुरु तो खुद मूर्ति पूजक था, और बोधगया चले जाओ, बुद्ध की मूर्ति ही तो रखी है। एक तरफ मूर्ति का विरोध कर रहे हैं और एक तरफ उन्हीं की मूर्ति बना रहे हैं — बनानी ही पड़ेगी, क्योंकि मूर्ति के पीछे एक चरित्र है; मूर्ति इसलिए रखी गई कि आपको चरित्र याद रहे। उस मूर्ति को प्रणाम करके मुझे वो चरित्र अपनाना है; लेकिन तुम चरित्र नहीं अपनाते, मूर्ति धोते रहते हो। कबीर ने संदेश दिया समभाव, समदृष्टि; बुद्ध ने प्रेम, दया, करुणा; महावीर ने अहिंसा परमो धर्म; कृष्ण भगवान ने कहा कर्म ही पूजा है — कौन सा कर्म? निष्काम कर्म। तुमने पकड़ लिया बच्चे पैदा करना, परिवार की सेवा करना — ये तो जानवर भी करते हैं। राम ने कहा बुराई का नाश करो, अच्छाई में जियो। लोग उनके गुण छोड़कर सिर्फ रूप की पूजा करते रहे, और राग-द्वेष में फंस गए।
अब कहा जाए कि यहां मोबाइल का नेटवर्क है — क्या वो आपको दिख रहा है? नहीं; लेकिन है, तभी तो लाइव चल रहा है। नेटवर्क ऐसे दिख नहीं सकता, उसे समझने के लिए एक सिस्टम है; अब आप कहो सिग्नल दिखाओ, तो दिखेगा क्या? लेकिन परिणाम दिख रहा है — तो आप समझ के साथ परिणाम देख सकते हो। तो मुझे अपनी समझ का उपयोग करके आगे बढ़ना है।
जिसके साथ रहोगे, उसका गुणधर्म आपको धारण करना ही पड़ेगा, नहीं तो उसका साथ छूट जाएगा — वो आपको अपने साथ नहीं रखेगा, तुरंत अलग कर देगा। जैसे तेल में पानी मिलाओ तो नहीं मिलेगा, पर पानी में पानी और तेल में तेल मिल जाता है। तो आप जिसके साथ हो, उसका गुणधर्म अपनाओगे तभी साथ रह सकते हो।
दुख नहीं है तो फिर क्या है? सुख है, तो सुख में भी आत्मज्ञान नहीं होगा, क्योंकि सुख के बाद ही तो दुख आएगा। अगर सुख में जी रहे हो तो दुख भी आएगा, राग में जी रहे हो तो द्वेष भी आएगा, क्योंकि जिसके द्वारा सुख ले रहे हो वो जब छूटेगा तो दुख होगा। हो सकता है आज दुख नहीं है, लेकिन जहां से सुख ले रहे हो, वो दुख ही तो बनने वाला है। तो देखो — आप सुख में हो, इसलिए दुख नहीं है।
देखिए, नहीं दे सकता। एक बार मैंने लोगों को ध्यान में पहुंचाने का प्रयास किया था, वो लोग असफल हो गए — उस ऊर्जा को बर्दाश्त नहीं कर पाए, फिर मुझे उन्हें वापस लाना पड़ा। कहने का मतलब है, किसी को क्षमता से ज्यादा दे दो तो वो भार नहीं संभाल पाएगा, और उसकी जिम्मेदारी स्वयं की बनती है। हर आदमी आत्मज्ञान तक पहुंचना चाहता है — वो खुद अपने आप से पूछे कि क्या सच में वो आत्मज्ञान तक पहुंचने के लायक है या नहीं।
क्यों नहीं? हर जीव के पीछे तो वही है। मुसलमान-हिंदू — ये तो जन्म के बाद जहां हमारा जन्म हुआ, वहां के लोगों ने हमें ये आवरण दिया है; आखिर में तो वही है। क्या मुसलमान और हिंदू के शरीर में अलग-अलग खून है, अलग हड्डियां हैं? अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश — पांच तत्व से ही शरीर बना है, शरीर में देखो तो वही मिलेगा; तो उस शरीर में रहने वाला भी तो वही है।
आपकी मर्जी — एक सेकंड से लेकर एक मिनट, एक घंटा, एक दिन, एक महीना, एक साल, कई सालों तक, जब तक आपकी मर्जी है आप यहां रह सकते हो। यह अपनों की कुटिया है, यहां का कोई मालिक नहीं है; अपनों की तरह आप निसंकोच रह सकते हो। बस यहां की व्यवस्था में, जो सिस्टम बनाया गया है उसमें रहना होगा — उस सिस्टम में कोई रहेगा तो चाहे जितने वर्षों तक रहे, और सिस्टम को तोड़ना चाहेगा तो एक मिनट भी नहीं रह पाएगा। आप यहां साधना कर सकते हैं, किसी भी मार्ग पर चल सकते हैं। मेरा बस इतना है कि मुझे साधकों की सहायता करनी है — भोजन, रहना, और अगर मुझसे हो सका तो उनके लिए मार्ग बताना। यहां आपके लिए एकांत है।
उस कमी को हटाइए। रोना क्यों आता है, देखिए उसके पीछे कारण क्या है — ऐसा तो नहीं कि दुख से निराश होकर रोना आ रहा है, या आप सामर्थ्यवान, संपन्न होने के बाद उसके लिए रो रहे हैं? देखिएगा, ऐसा तो नहीं कि जीवन से हताश हो गए हैं, निराश हो गए हैं, कामनाएं पूरी नहीं हो रहीं इसलिए रोना आ रहा है। संभल के चिंतन करिए, संभल के मनन करिए, संभल के आध्यात्मिक यात्रा करिए, क्योंकि इसमें आप स्वयं हो।
पता नहीं, इसका कुछ टाइम नहीं दिया जा सकता, कभी भी पूरी हो सकती है। आत्मज्ञान के बाद ब्रह्मज्ञान होना पक्का हो जाता है, और वो आंतरिक यात्रा होती है — उसमें बाहर से पूछने की, किसी से बातचीत करने की जरूरत नहीं होती। बस इंतजार है, उसमें कुछ नहीं किया जा सकता।
अब देखिए, सिद्धि लेकर क्या करोगे? सिद्धि तो नरक का द्वार है — कैसे भी उससे छुटकारा पाओ और अपने स्वयं तक पहुंचने के लिए यात्रा करो। क्या करोगे सिद्धियां — नाम, शोहरत, पैसे के लिए? पैसा तो ईमानदारी से मेहनत करके कमाओ।
नियम व्यवस्था के लिए और इसलिए रखे गए हैं कि किसी साधक को तकलीफ ना हो। जैसे मोबाइल स्विच ऑफ करना — इतने लोग रहेंगे, सब अपनी-अपनी जगह बात करेंगे तो एकांत टूट जाएगा। पहले दिन आए तो यहां का एक नंबर है, वो अपने घर वालों को दे दीजिए, इमरजेंसी में आपको कॉल कर देंगे। किसी से व्यावहारिक बात नहीं करनी है। एक टाइम नाश्ता और एक टाइम पेट भर भोजन मिलेगा — रोटी, दाल, चावल, दलिया। कुटिया की जगह, नर्मदा तट और बड़ के पेड़ के आसपास ही जाना है, बाहर नहीं जाना है; यहां की व्यवस्था में रहना होगा, बाहर की व्यवस्था आप ला नहीं सकते। और यह व्यवस्था निशुल्क रखी गई है, आप जब तक चाहें रह सकते हो।
ठीक है, आप एक बार अपने आप से पूछो — क्या मैं ईश्वर के लायक हूं? क्या मैंने अपने आप को इतना पवित्र कर लिया है कि वह मुझे मिले और मैं उसे गले लगाऊं? ऐसा तो नहीं कि मेरी पवित्रता से वह अपवित्र हो जाए? एकांत में बैठिए और चिंतन करिए — क्या सच में मुझे वही चाहिए, उसके पीछे और आगे कुछ भी नहीं चाहिए? क्या इस संसार में मेरा कुछ भी नहीं रहा, मुझे "मैं" भी नहीं चाहिए? क्या मैं उसके लिए अपने बनाए हुए अस्तित्व को, अपने वजूद को मिटाने के लिए पूरी तरह तैयार हूं — कि गले लगाकर दो से एक हो जाऊं और मेरा मिटना हो जाए, क्या मैं बर्दाश्त कर पाऊंगा? क्या पक्का हो गया कि इस दुनिया में ना कोई मेरा इंतजार कर रहा है, ना मैं किसी का, और मैं बस उसी के इंतजार में चुपचाप, खामोशी में बैठ गया हूं — कुछ नहीं चाहिए, ना आगे ना पीछे? जरा अपने आप से पूछो, क्या ऐसी स्थिति है।
बातें बस समझने के लिए हैं। कलयुग केवल नाम आधारा — तो नाम के अलावा कुछ और जपना भी नहीं है, कोई और कर्म ही नहीं करना है, तब कुछ हो सकता है। और पता चला एक माला, दो माला, 11, 21, 108 माला जप लिया, और दिन भर आपने क्या किया — वो मायने रखता है। नाम के अलावा अगर आप जीवन में कुछ नहीं कर रहे हो तो सब कुछ हो सकता है; और नाम के बाद और कुछ कर रहे हो तो कुछ नहीं होने वाला। नाम के साथ उसका चरित्र भी अपनाना पड़ेगा, तब कुछ हो सकता है। भ्रम में मत जियो — जरा टटोलो कि क्या कहा गया है।
जैसे किसी से पूछिए शादी के पहले और शादी के बाद की क्या स्थिति है, या कोई मां बन गई हो तो उससे पूछिए मां बनने के पहले और बाद की स्थिति क्या है — तो आत्मज्ञान के बाद की स्थिति क्या बताएं? अपनों की दुनिया हो जाती है, बस। जब तक अज्ञानता है, तब तक "मेरा" की दुनिया है; और जब ज्ञान हो जाता है, तो अपनों की दुनिया हो जाती है। पहले हम अपने लिए जीते थे, अब समाज के लोगों के लिए जीते हैं, अपना जीवन लगा देते हैं — बस यही फर्क रहता है।