आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P28-0060 · भाग 28

गुरु जी, जितनी सेवा यहां आप हम लोगों की करते हैं, उतनी हमारे माता-पिता भी नहीं करते; वे पढ़ाते-लिखाते हैं पर वो ज्ञान नहीं दे पाते जो आप देते हैं — ऐसा क्यों?

यह हमें समझना पड़ेगा कि हमारे माता-पिता एक उम्मीद में हमारे लिए करते हैं। वो चाहे हमें पढ़ाएं, चाहे लिखाएं, उसके पीछे उनकी एक उम्मीद बनी हुई है कि यह मेरा नाम रोशन करेगा, मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा, मेरे खानदान का नाम रोशन करेगा। लेकिन गुरु के यहां ऐसी कोई बात नहीं है — तू दूसरी बार आया है, पर तेरा नाम भी मुझे पता नहीं है। गुरु तो मुक्त हो गया, तो वो जितना भी करता है आपके लिए करता है, और उसकी एक ही इच्छा रहती है कि तुम्हारा उद्धार हो जाए। इसलिए इस पृथ्वी पर गुरु को सर्वश्रेष्ठ बोला गया है — वो बस यही चाहता है कि आपका आत्मिक उद्धार कैसे हो जाए, आप इस दुख भरे भवसागर से कैसे पार हो जाओ, उस परम सत्ता से कैसे मिलना हो जाए, उस परम आनंद को कैसे उपलब्ध हो जाओ। और उतनी व्यवस्था वो देता है कि तू अपना उद्धार कर ले — अब तेरे ऊपर है कि तू क्या कर रहा है।

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