प्रश्नोत्तर P28-0174 · भाग 28
गुरु जी, आप बार-बार कहते हैं — पूर्ण वह, अपूर्ण पूर्ण है, वो अपूर्ण में शांति या सुख ढूंढ रहा है। इसको विस्तार से समझाइए।
पूर्ण मतलब — कोई भी अपने आप को अपूर्ण से पूर्ण करना चाहता है, यही उसकी अपूर्णता है। बस ये भाव छोड़ दे, वो पूर्ण है, वो स्वयं पूर्ण है। लेकिन अपने आप को अपूर्ण से पूर्ण करना चाहता है — बस यही उसकी अज्ञानता है। वह दायरे से, "मेरा" से अपने आप को पूर्ण करना चाहता है। मैं और मेरा — ये दोनों अपूर्ण हैं। एक "मैं" परम सत्य में है; जब तक "मेरा" है तब तक वो अहम मैं है। जब तक तुम हो तब तक मैं हूं — मैं अकेले नहीं खड़ा हुआ, तुमसे मैं खड़ा हूं। तो तुम मिटोगे तभी मैं मिटूंगा। और लोग क्या कर रहे हैं — तुम को पकड़ के मैं को मिटाना चाहते हैं। मैं को मिटाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वो तुमसे तैयार हुआ है; मिटाना तुमको है, तुमको छोड़ना है। यहां तुम का मतलब — सामने कोई भी, जिससे आपको कुछ चाहिए, वो तुम है। जिससे कुछ नहीं चाहिए, वहां ना तुम है ना मैं। जब आपको चाहिए, तो तुम खड़ा हो गया, और जब तक तुम है तब तक मैं है; तुम के रहते मैं कभी नहीं मिटेगा। तुमको मिटा दो, मैं मिट जाएगा अपने आप।
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वीडियो: भाव, गुण और लक्षण में भेद क्या है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान · 2026-05-30