प्रश्नोत्तर P27-0172 · भाग 27
गुरु जी, मैं 2002 से एक गुरु द्वारा दीक्षित हूं और माला फेरता हूं। पूर्ण विश्वास कैसे होगा कि इसी मनुष्य योनि में आत्म-कल्याण हो जाए?
आप उन गुरु से क्यों नहीं पूछे जिनकी माला फेर रहे हो? 22 साल आपने संशय में माला फेरी — 22 साल कम नहीं होते। जिस गुरु ने मुझे दीक्षा दी थी, उन्होंने कहा जन्म-जन्म लगते हैं; मैंने कहा फिर इस जन्म में दीक्षा क्यों दी? मैं तीन दिन में आश्रम से निकल गया। मैंने अपना समय बर्बाद नहीं किया — हां में रुकना, ना में जाना। बिना संशय मिटे आपने माला कैसे पकड़ ली? पहले बातचीत कर लेते कि पक्का है या नहीं — यही गलती लोगों से हो रही है। संशय में आगे मत बढ़िए, संशय वहीं मिटाइए; एक संशय ले जाओगे तो वह अनेक संशय पैदा कर देगा। संशय मिटा के जाओगे तो समझ के जाओगे, फिर आगे की यात्रा होगी। और संशय हुआ तो गड़बड़ी या तुम में है या मुझ में — जांच लेना; आप में है तो अपना सुधार करो, और मुझ में है तो छोड़ के आगे खोजो। ईमानदारी और सत्कर्म अपनाइए, और जिस गुरु की माला जप रहे हैं, उनसे पूछिए।
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वीडियो: जीवन में आध्यात्म की जरूरत क्यों पड़ती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-05-30