प्रश्नोत्तर P27-0182 · भाग 27
गुरु जी, शरीर से आत्मा अलग दिखती है और शरीर अलग दिखता है — यह कौन महसूस करता है?
अगर आत्मा भी अलग है, शरीर भी अलग दिख रहा है, और दोनों आपको दिख रहे हैं, तो देखने वाला फिर कौन है? यह तीसरा कहां से पैदा हो गया? तो आपको एक नया भ्रम पैदा हो गया — आपने एक नए आत्मा का निर्माण कर लिया। भ्रम तो अज्ञानता का ही प्रतीक है; आपको प्रत्यक्ष नहीं हुआ। हैं तो दो ही — एक आत्मा, एक शरीर; आत्मा मतलब आप। लेकिन अगर आपने अपने आप को आत्मा से अलग किया, तो फिर आप कौन? इच्छा-अपेक्षा में आत्मा जीवात्मा हो गया — जैसे पानी फ्रिज में रखा तो बर्फ हो गया; उसे सामान्य जगह ला दो, फिर वह पानी हो जाएगा, बर्फ का नाश हो गया। बर्फ कहां से आया, कहां गया, पता नहीं — उसका होना भ्रम था। बर्फ के जितने भी टुकड़े करो, हर टुकड़े के पीछे पानी ही है। और इच्छा-अपेक्षा से मुक्त करा लिया तो जीव का नाश हो जाएगा, आत्मा स्थिर हो जाएगी। जैसे ही आत्मा इच्छा-अपेक्षा के दायरे में आया, वह जीवात्मा हो गया — उसने अपने एक नए अस्तित्व का निर्माण कर लिया।
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वीडियो: जीवन में आध्यात्म की जरूरत क्यों पड़ती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-05-30