प्रश्नोत्तर P27-0183 · भाग 27
गुरु जी, जब (अवधूत स्थिति में) सब मिटता हुआ दिखा, तब आपको कैसा महसूस हुआ?
बस दिख रहा था, और उस मिटने में मैं नहीं था — बस मैं मिटते हुए देख रहा था। आंसू भी थे आंखों में, लेकिन उन आंसुओं में भी मैं नहीं था। उस समय अपनी व्याकुलता को भी देख रहा था, तड़प को भी देख रहा था — सबको देख रहा था, लेकिन मैं किसी में नहीं था। चिल्लाता भी था, पर उस चिल्लाने में भी मैं नहीं था; बस होते हुए देख रहा था। मिटते हुए इसलिए देख रहा था कि मिटाने वाला भी तो मैं था और बनाने वाला भी मैं था — तैयार तो मैंने ही किया था; उसी को मिटाने के लिए तो यात्रा की। अवधूत स्थिति को अद्भुत भी कह सकते हो — उसमें कुछ नहीं रहता; उसके सामने ही उसका बनाया हुआ सब खत्म हो जाता है और वह बस देखता रहता है।
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वीडियो: जीवन में आध्यात्म की जरूरत क्यों पड़ती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-05-30