आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P27-0194 · भाग 27

गुरु जी, प्रमाणिक और प्रत्यक्ष में क्या अंतर है?

प्रमाण की जरूरत वहां पड़ती है जहां प्रत्यक्ष ना हो पाए; जहां प्रत्यक्ष है, वहां प्रमाण की जरूरत नहीं है। प्रमाण देना मतलब आप किसी और की बातें कह रहे हैं, इसलिए आपको प्रमाण देना पड़ रहा है। जब आप अपनी बात रखेंगे तो आप स्वयं प्रमाण हैं। मां जब अपने बच्चे को अपना दूध पिलाती है तो उसे गर्म करने की, मिलावट करने की जरूरत नहीं — वह अमृत तुल्य है। लेकिन किसी और का दूध पिलाएगी तो उसे गर्म करना पड़ेगा, आश्वासन देना पड़ेगा, लोरी सुनानी पड़ेगी, चम्मच से डालना पड़ेगा, और बच्चा उगल भी देगा। बाहर के दूध में मिलावट होती है, पर स्वयं के दूध में मिलावट नहीं है — की भी नहीं जा सकती। यही सत्संग है — सत्संग अमृत तुल्य है, जो आपको जन्म-मरण से मुक्त कर देता है।

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वीडियो: जीवन में आध्यात्म की जरूरत क्यों पड़ती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-05-30