आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P28-0020 · भाग 28

गुरु जी, आप जो सिखाते हो — ईमानदारी और सत्कर्म — तो सबको सही रास्ता दिखाना, इससे बड़ा सत्कर्म क्या हो सकता है? पर आप अपनी सेहत का भी ध्यान रखिए, सुबह से भोजन भी नहीं किया।

हां, यही काम सबसे उच्च कोटि का है, इसीलिए तो समय दे रहा हूं, इसीलिए तो भूख भी नहीं लगती। भोजन तो मैं कभी भी कर लूंगा; पता नहीं इनमें से कल कोई हो न हो, पर जिसलिए वह आया था, वह उसे मिले। मैं अपने कर्म के प्रति बहुत ईमानदार और जवाबदार रहा — अगर मैंने कुछ बोला तो किया, नहीं तो बोला नहीं। मैं लोगों को कहता हूं, आप जवाबदार इंसान बनिए: अगर आप किसी से कुछ कहते हैं तो आपने उसके अंदर एक उम्मीद जगाई; उस उम्मीद को ईमानदारी से पूरा करना आपका कर्तव्य, आपका दायित्व है। सेहत का ध्यान जिसको रखवाना होगा, वह रख रहा है — सेहत एकदम सही है। मैं इसलिए थकता नहीं, क्योंकि आपके लिए बोल रहा हूं; अपने लिए बोलता तो कब का थक जाता। थकता वह है जो अपने लिए जीता है, दायरे में जीता है, क्योंकि उसको दायरे से ऊर्जा है; जो दायरे से मुक्त होकर लोगों के लिए जीता है, उसके ऊपर अनंत से सीधा ऊर्जा है — उसे कोई थका नहीं सकता। बहुत होगा तो शरीर गिर जाएगा, लेकिन वह नहीं थकेगा।

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वीडियो: जीवन में आध्यात्म की जरूरत क्यों पड़ती है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-05-30